Wednesday, November 12, 2014

यादाश्त के अनूठे कारनामे को सलाम...

आज से ठीक २० वर्ष पहले जब मैंने सिद्ध समाधि योग का प्रोग्राम किया...इन के एडवांस्ड रेज़िडेंशियल प्रोग्रामों में भाग लिया तो इन के सुपर मेमोरी प्रोग्राम के बारे में पता चला कि किस तरह से एक संतुलित जीवनशैली के बलबूते ये स्कूली बच्चों की यादाश्त को बहुत ही ज़्यादा सुधार देते हैं.....यह कार्यक्रम बहुत सुंदर था.....स्कूली बच्चों के स्कोर बढ़ाने के लिए इसे खूब इस्तेमाल किया गया...सब कुछ वैज्ञानिक ढंग से...बच्चों में योग, प्राणायाम् और ध्यान के द्वारा उन की यादाश्त बढ़ती देखी मैंने इस संस्था में।

फिर कुछ समय बाद देखा कि कुछ तरह के कमर्शियल लोग भी इस प्रोफैशन में आ गए......इन के विज्ञापन तो आप लोगों ने अखबारों में भी देखे ही होंगे ......और फिर हिंदी के अखबारों के वे विज्ञापन कि बच्चों को ये सिरिप पिला दें तो उन की यादाश्त इतनी ज़्यादा बढ़ जाएगी.........उस तरह की सारी बकवास से आप वाकिफ़ ही हैं।

चलिए, ये तो बातें होती रहेंगी लेकिन आज सुबह जब मैंने आज का टाइम्स ऑफ इंडिया देखा तो उस में एक न्यूज़-रिपोर्ट थी एक जैन साधु के बारे में.... ये २४ वर्ष के हैं जिन का नाम है.. मुनिश्री अजीतचंद्रा सागर जी...और आने वाले रविवार को बंबई के एक स्टेडियम में यह दर्शकों के ५०० प्रश्न लेंगे.....ये पांच सौ के पांच सौ प्रश्न याद कर लेंगे और फिर उन्हें बढ़ते या घटते क्रम में जैसा भी कोई चाहे ये उन सभी प्रश्नों के उत्तर देंगे। है कि नहीं, दांत के तले अंगुली दबाने वाली बात......मुझे भी ऐसा ही लगा।
यह इवेंट सरस्वती साधना रिसर्च फाउंडेशन आयोजित कर रही है।

इतना ही नहीं, जब वे सारे ५०० प्रश्न सुन लेंगे तो कोई श्रोता अगर बीच ही में कह देगा कि आप प्रश्न नंबर ६३ को रिपीट करें और उस का जवाब बताएं ...तो वह भी काम करेंगे।

कुछ इंगलिश में लिखता हूं जो पेपर में लिखा था.....अच्छा लगा था पढ़ कर....
The 'Shatavdhan' or 100-question challenge is a remarkable achievement in itself. The challenger must recall 100 questions posed by onlookers, and repeat the questions and answers in ascending and descending order: When the audience calls out a random number, say 21, he must remember the question against that number. Sunday's challenge involves 500questions, so the effort is five-fold.
The previous such challenge of 1,000 questions is believed to have been accomplished by another jain monk, Muni Sunder Suriswarji Maharaj Saheb, in the court of Raja Bhoj 500 years ago. He had earned the title of 'Sahastravdhani'.

और एक बात आप इन से केवल जैन धर्म से ही संबंधित सवाल नहीं पूछ सकते, बल्कि आप जटिल से जटिल अंकगणित और इतिहास के प्रश्न भी पूछ सकते हैं।

कितनी हैरान करनी बात है ना.......हो भी क्यों नहीं. दरअसल जैन धर्म दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धर्मों में से है जो पूरी तरह से वैज्ञानिक जीवनशैली पर आधारित है..इन का सब कुछ संतुलन में रहता है....खानपान, विचार, आचार-व्यवहार.....इन की साधना........शायद इस सब का ही यह परिणाम होता होगा कि जैन साधु इस तरह की हैरतअंगेज सिद्धियां प्राप्त कर लेते हैं........सही तरह से जैन धर्म को मानने वालों से मैं हमेशा बेहद प्रभावित रहा हूं ..इन की बोलचाल...व्यवहार, सहज ही अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है.....आप ने नोटिस किया होगा िक मैं जैन सरनेम की बात नहीं कर रहा हूं .....मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं जो जैन हैं और जैन धर्म की मर्यादा में रहते हुए अपना जीवनयापन करते हैं........

मुझे भी रविवार का इंतज़ार है, कोई न कोई चैनल वाला तो इस इवैंट को दिखाएगा ही.....

वैसे मेरे विचार में आप ने मेरी बात तो सुन ली, अगर आप ओरिजनल खबर भी पढ़ना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं....  Jain monk to recall 500 questions by audience.

मैंने यह सन्नाटा तो नहीं मांगा था....

कुछ दिन पहले मैं ट्रेन से लखनऊ से बंबई जा रहा था... सैकेंड ए.सी के डिब्बे में एक फैमली थी.. शायद किसी प्राईव्हेट कंपनी में काम कर रहे थे...और तबादला होने पर बंबई जा रहे थे.....छोटी छोटी दो बेटियां.....एक होगी कोई तीन चार वर्ष की और दूसरी तो अभी बहुत ही छोटी थी.....बोतल में दूध पीती थी।

इतनी बातें, इतनी बातें ......मैं तंग आ गया था.....लेकिन कोई करे तो क्या करे, किसी को कुछ कहा भी तो नहीं जा सकता कि आप बातें थोड़ी सी कम कर देंगे क्या..और बच्चे तो आज कल वैसे ही बच्चे नहीं रहे....वह छोटी लड़की कभी मां की क्लास लेनी शुरू कर दे कि आपने पापा को अभी ऐसा क्यों कहा.....हार कर मां को कहना ही पड़ता कि मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा....लेकिन फिर वह बच्ची मां को कहने लगी....आप पापा को डांट को देती हो?

शायद बंदे के बापू का फोन आया......उसने शायद खुद पहले बात करनी चाहिए....तो फिर जब बच्ची की बारी आई तो शिकायत करने लगी अपने दादू से कि मुझे आप से बात भी नहीं करने देते।

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था....पांच छः बार चाय भी पी चुके थे वे सब, दो तीन टमाटर के सूप और लंच डिनर अच्छे से संपन्न होने के बाद ...जैसे कहावत है ना......खाली दिमाग शैतान का घर........औरत को पता नहीं क्या सूझा कि वह एक कंट्रोवरशियल मुद्दा ले कर बैठ गई.....कि मैं तो फलां फलां जगह इन बेटियों से राखी भिजवाया करूंगी। बंदे ने कुछ ऐसा कहा कि हर जगह थोड़ा ही भेजती रहोगी राखियां.....बस फिर तो उस बंदी ने उस की ऐसी क्लास ली....कि आप बताओ कि आप के मना करने का कोई लॉजिक है या बस जो आप को अच्छा नहीं लगे, वह नहीं करना है। हाथ धो कर ऐसा उस के पीछे पड़ी कि उस ने भी जान छुड़वाई यह कह कर कि ठीक है, जहां जहां मन करे , भेज देना राखियां......

इतने लंबे समय के सफ़र में मैं उन की बातें सुन सुन कर इतना थक और पक गया कि उस दिन निश्चय किया कि अगली बार से लंबा सफ़र तो फर्स्ट एसी श्रेणी से ही करने की कोशिश करूंगा। यह भी सोचा कि कान में ठूंसने के लिए कोई प्लग आदि का भी पता करना चाहिए.........जैसे रोशनी में सोने के लिए आंख के ऊपर काली पट्टी भी तो मिलती है।

बहरहाल, वापिस भी लौटना था दो दिन बाद.......सैकेंड एसी में ही आना था....डिब्बे में आते ही दिखा कि एक १८-२० वर्ष की युवती एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ (जो उस की मां थी, बाद में पता चला)...मेरे सामने वाली सीट पर बैठी हुई थीं। उस युवती ने चेहरे पर मास्क पहना हुआ था और सिर पर एक कैप जैसा कुछ कस के बांध रखा हुआ था....ठीक से पूरी बात नहीं कर पा रही थी.....अटक अटक के अपनी बात पूरी कर रही थी.....मैं समझ गया कि ये लोग टाटा अस्पताल में किसी कैंसर आदि का इलाज करवा के लौट रहे हैं।

जी हां, वही बात थी....मन बहुत बुरा हुआ जब पता चला.....मैंने पूछा नहीं ..मुझे ऐसे पहले ही से परेशान बंदे से पर्सनल से प्रश्न पूछने अच्छे नहीं लगते...क्या हरेक को वे बार बार वही बातें दोहराएं.....लेकिन रिश्तेदार और मित्रों के उन को जो फोन आ रहे थे उससे ही पता चला कि ये दोनों उस युवती का इलाज करवा के ही लौट रहे हैं..

मैंने उस महिला को कहा कि आप भी नीचे वाली सीट पर ही आ जाएं......मैं ऊपर चला जाता हूं क्योंिक उसे बार बार उस युवती को लेकर बाथरूम जाना पड़ रहा था....पानी भी मां उसे बार बार एक माप में बार बार पिला रही थी ... डाक्टरों ने ऐसा कुछ कहा होगा......बार बार उस युवती को जूता पहना कर, उसे थोड़ा सहारा देकर बाथरूम ले कर जातीं और लौट कर उसे फिर से सेटल करतीं।

मैं तो वैसे ही गाड़ी में चुपचाप ही रहता हूं.....मुझे नहीं याद कि हम लोग परिवार में भी जब चलते हैं तो ज़्यादा बातचीत करते हैं....हमारा सिर भारी होने लगता है....बस लेटे ही रहते हैं.....इसलिए मैं भी लेटा ही रहा पूरा दिन.....लाइट बंद.....उस केबिन में एकदम सन्नाटा सा ही रहा ... बस बीच बीच में कभी कोई फोन जब आता तो वे मां-बेटी बड़ी शालीनता से बात तो कर लेतीं........एक बार तो वे दोनों किसी से बात करते करते हंसने लगीं.......मुझे बड़ा अच्छा लगा.....वरना बेटी तो लेपटाप पर लगी रही अधिकतर और मां चुपचाप चिंता में डूबी ही दिखी।

उस महिला ने बताया कि यह इंजीनियर है, सर्विस करती थी ...फिर यह तकलीफ़ हो गई.... इलाज करवाने पर ठीक ही थी लेकिन फिर से ग्रोथ हो गई है ..अब फलां फलां अस्पताल टाटा वालों ने रेफर किया है.....मैंने नहीं पूछा कि किस जगह का कैंसर है, मुझे ठीक नहीं लगा उन के मन के घाव को कुरेदना....

जब मैं ऊपर वाली सीट पर लेटा हुआ था तो मैं चुपचाप यही सोच रहा है कि भगवान, मैंने ऐसा सन्नाटा तो नहीं मांगा था.......ईश्वर से यही प्रार्थना है कि सब लोग हंसते-खेलते, मुस्कुराते और स्वस्थ रहें........बातों का क्या है, कोई ज़्यादा बातें कर भी रहा है तो उन को सुनते रहने की आदत डालनी कौन सा मुश्किल काम है......उस पूरे दिन का सन्नाटा मेरे मन को कचोट रहा था।

लखनऊ स्टेशन पहुंचते पहुंचते मेरे से रहा नहीं गया....मैंने उस बेटी को इतना आशीर्वाद तो दिया ही.......God bless you with some magical recovery! Wish you all the very best!!

ईश्वर उस युवती को तंदरूस्त करे और आगे भी सेहतमंद रखे। आमीन!!