Sunday, May 11, 2008

तुझे सब है पता, है न मां !!


आज सुबह अखबार देख के पता चला कि कुछ भारतीयों को कल पद्म-श्री, पद्म-विभूषण जैसे अवार्डों से नवाज़ा गया है....कुछ की फोटो भी छपी थी....लेकिन आज मां-दिवस होने की वजह से मैं समाचार-पत्र में ढूंढ रहा था कि शायद कहीं किसी मां को भी कोई छोटा-मोटा इनाम मिल गया हो। लेकिन फिर सोचा कि मैं भी क्या बचकानी बातें सोचने लगता हूं कभी कभी ....अब यह सर्वोत्तम मां, अद्वितीय मां......अब इस तरह के अवार्ड भी क्या सरकार घोषित करेगी क्या!! क्योंकि मां तो हम सब की लाइफ में वो शख्स है जिस के जिम्मे तो बस सब तरह के काम ही आते हैं और हमारा फर्ज़ सिर्फ़ इतना ही है कि हम ने इस को हमेशा टेकन-फॉर-ग्रांटड ही लेना है।

तो, चलिये आप को अपनी मां ( हम इन्हें बीजी) से मिलवाता हूं....ये हमारी बीजी हैं...श्रीमति संतोष चोपड़ा जी....इस देश की करोड़ों माताओं की तरह की ही एक मां। पता नहीं मुझे इस देश की सारी मातायें हमेशा एक जैसी ही क्यों दिखती हैं....इन की सोच एक जैसी होती है ....बस जिस में सब का भला हो ये जगह जगह बारम्बार यही दुआयें करती रहती हैं।

जब से होश संभाला है मैंने तो बीजी को बार-बार पाठ-पूजा करते पाया है, बार-बार रामायण पढ़ते देखा है। कुछ विचार आज मां-दिवस पर मन में आ रहे हैं जो लिख रहा हूं। सब से बहुत बढ़िया विचार तो यही आ रहा है कि मेरी मां ने मेरी एक बार भी पिटाई नहीं की है........बीजी कहती हैं कि तुम थे ही इतने अच्छे कि इस की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। लेकिन यह बिल्कुल सच्चाई है कि अपनी मां के हाथों पिटे हों, इस की कोई धुंधली याद भी नहीं है।

एक बार और कहना चाह रहा हूं कि जब भी मैं अपनी बीजी के साथ बचपन में सब्जी या राशन लेने जाया करता था तो कभी अपनी मां के पर्स की फिकर किये बिना कोई न कोई फरमाईश रख दिया करता था...लेकिन आज तक याद नहीं कि कभी भी मां ने उस फरमाईश को तुरंत पूरा न किया हो। एक बात और भी है ना कि स्कूल-कालेज के दिनों में जब भी मां से 10-15 रूपये मांगे मुझे पता नहीं अपनी अलमारी के किस कौने से एमरजैंसी के लिये रखे पैसे निकाल कर तुरंत हाज़िर कर देती थीं............जैसे जैसे मैं बड़ा हुया तो मुझे अहसास हुया कि यार ,इस से मां के बजट को झटका तो ज़रूर लगता होगा...........लेकिन इस मां ने कभी भी इस बात को मुझे महसूस नहीं होने दिया। लेकिन इतना तो तय ही था कि मांगने पर पैसा तो मिलना ही है।

एक बात और याद आ रही है कि मेरे दो मामे बिल्कुल यौवनावस्था में चल बसे...एक मामे की उम्र तो मात्र 28 साल की थी और जब वे गुज़रे तो मैं 10-12 साल का था, दूसरे मामा के इंतकाल का 30 साल की आयु में ही हो गया था। मैं यह सब इसलिये यहां लिख रहा हूं कि इन मौकों पर मुझे अपनी मां के मजबूत होने का एक नमूना दिखा.....इतने युवा भाईयों के अचानक चले जाने के सदमे में मां पता नहीं कितना विर्लाप, क्रंदन करती होगी....लेकिन यकीन मानिये, जब हम भाई-बहन सामने होती तो बीजी बिल्कुल नार्मल-सा ही बिहेव करतीं ......मां चाहे कुछ कहे या न कहे लेकिन वे बच्चे भी क्या जो मां के चेहरे की खुली किताब को ही न पढ़ पायें......मुझे तब से ही यही लगता रहा मां बिल्कुल नार्मल-सा दिखने की कोशिश केवल हम बच्चों की सलामती के लिये करती हैं....वे सोच रही हैं कि कहीं उसे रोते देख बच्चों को कुछ न हो जाये। तो, देखिये इस देश की मातायें जो अपनों के चले जाने पर बच्चों की सलामती के लिये खुल कर रोती भी नहीं हैं। मेरे पिता जी के स्वर्गवास होने पर भी मैंने अपनी मां का यही रूप देखा......अंदर से दुःख, बाहर से काफी हद तक नार्मल सा दिखने की कोशिश।

और हर एक पर इतनी जल्दी विश्वास करने वाली कि क्या बताऊं....मुझे याद है कि मैं तब तीसरी-चौथी कक्षा में पढ़ता होऊंगा जब मैं और मेरी मां अमृतसर से अंबाला( जहां मेरे नानी-नाना रहते थे).... जा रहे थे तो जब ट्रेन लुधियाना स्टेशन पर पहुंची तो मैं लगा पानी के लिये मचलने । हमारे सामने की सीट पर बैठे एक व्यक्ति ने कहा कि मैं भी पानी पीने जा रहा हूं तो मेरी मां ने मुझे भी उस के साथ प्लेटफार्म पर पानी पीने भेज दिया था......( नल हमारे डिब्बे से काफी दूर था...)...और मुझे याद है उस बंदे ने मुझे बुक से ( बहते नल से अपनी हथेलियों को जोड़ कर पानी पिलवाया था। और गाड़ी छूटने से पहले हम लोग वापिस सीट पर पहुंच भी गये थे।

लिखने को तो दोस्तो इतना कुछ है कि मां-बच्चों के संबंधों पर पोथियां लिखी जा सकती हैं.....हमारी सब की मातायें एक जैसी ही हैं.....कोई फर्क नहीं है.....पहरावे का फर्क हो सकता है , बोली थोड़ी भिन्न हो सकती हैं लेकिन दिल इन सब का एक जैसा ही है। आज मां-दिवस पर मैं अपने आप से कुछ सवाल पूछ रहा हूं.....

जब हम लोग बचपन में पहला कदम चलते हैं तो हमारे मां-बाप की खुशी का कोई ठिकाना नहीं होता...ऐसा लगता है कि मानो खुशी के मारे उन की सांसे ही थम गई हैं। और फिर उन की तपस्या शुरू होती है बच्चे की अंगुली थाम कर छोटे छोटे कदमों से उसे चलना सिखाने की। लेकिन,दोस्तो, मैं जब किसी नौजवान को अपनी मां-बाप का हाथ थामे देखता हूं तो मुझे वह अपनापन, वह स्नेह नज़र नहीं आता......अकसर ऐसा लगता है कि भीड़ भाड़ वाले एरिये से अपनी मां को सेफ्ली निकाल कर या सेफ्ली सड़क क्रास करवा कर उस पर कोई एहसान सा किया जा रहा है। मैं भी कौन सा कम हूं......सोचता हूं कि मां के साथ घर के बाहर रोज़ थोड़ा टहलूं .....लेकिन तब विचार आता है कि यार, बीजी तो बहुत धीमा चलती हैं और मैं इतनी तेज़। ध्यान फिर यही आता है कि अगर बचपन में मां-बाप भी कुछ ऐसी ही सोच रखते तो तेरा क्या होता कालिया !!

दूसरी बात यह कि जब बच्चा बिल्कुल ही छोटा होता है तो झट से उस के कानों के सामने चुटकी बजा कर चैक किया जाता है कि वह ठीक तरह से सुन भी पाता है कि नहीं। यही नहीं , मां-बाप तरह तरह की छोटी छोटी बातें उस से करते नहीं थकते.......वह कोई जवाब थोड़े ही देता है....लेकिन बस मां-बाप के इसी मेहनत का रिज़ल्ट यह निकलता है कि वह धीरे धीरे बोलना शुरू कर देता है......मां......मां.........पा...पा....., पा.....पा। लेकिन आज मां –दिवस के दिन अपने आप से यह पूछने की इच्छा हो रही है कि यार, मां को अगर अब थोड़ा ऊंचा सुनाई देता है और कईं बार कोई बात दूसरी बार दोहराने में मुझे कभी कभी थोड़ी तकलीफ़ सी क्यों होती है.............मां को तो बचपन में अपने नन्हों मुन्नों के साथ तोतली भाषा में घंटों बतियाते न तो कोई तकलीफ ही होती है और ना ही झुंझलाहट।

दोस्तो, आप सब बहुत पढ़े-लिखे ज्ञानी लोग हो, आप सब कुछ समझते हो...कुछ उदाहरणें ही यहां मैंने दी हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि दोस्तो हमारी मातायें वे यूनिवर्सिटियां हैं जिन से हम हर रोज़ सीखते हैं..........दुनियावी यूनिवर्सिटी तो चुस्त-चलाकी सिखाती हैं, अपनी उल्लू कैसे सीधा करना है सिखाती हैं.................लेकिन यूनिवर्सिटी जो हमारे घर में बसती हैं यह हमें जीने का सलीका सिखाती हैं, हमें सिखाती हैं कि सब इंसान एक जैसे हैं, जात-पात कुछ नहीं होती, गिरे को कैसे उठाया जाता है यह सिखाती हैं, रोते हुये के आंसू पोंछने का आर्ट भी तो यही सिखाती है, चोरी से बचने के लिये वह मां के कान कुतरने वाली बात भी सब से पहले यही सुनाती है, रामायण-महाभारत की कहानियां सुनाती भी ये नहीं थकतीं....................और क्या क्या लिखूं......सीधी सी बात है कि मां-दिवस पर अगर हम लोग मां की महानताओं का बखान करना चाहते हैं तो फिर समुंदर जितनी तो दवात चाहिये और दुनिया के सभी सरकंड़ों से तैयार की गई कलम भी छोटी पड़ जायेगी।

हां, लिखते लिखते ध्यान आया कि जब हम लोग स्कूल से लौटकर अपनी मां के साथ छोटी छोटी बातें करते थे तो उस ने तो अपने सारे काम रोक-राक कर हमारी बातें सुनीं......और हम ने इन बातों को एक ही बार थोड़े ही सुनाया, जब तक हम लोग इन बातों को बार बार सुनाते थक नहीं जाते थे , वह भी कहां हां में हां मिलाते हुये थकती थी। लेकिन अपने आप से पूछ रहा हूं कि आज जब मेरी मां किसी धार्मिक पुस्तक से कोई प्रसंग सुनाना शुरू करती है तो मुझे क्यों यह लगता है कि यार, बीजी ने तो बहुत लंबा प्रंसग चुन लिया है....................सीधा सा मतलब है दोस्तो कि मेरे मन में ही कुछ गड़बड़ है, और कुछ नहीं। बेचारी मां का क्या है, उसे लगता है कि बच्चे ध्यान नहीं दे रहे.....या टीवी में ज्यादा इंटरैस्ट ले रहे हैं तो वह अपने किसी दूसरे काम में लग जाती हैं।

पोस्ट लंबी ही हो गई है...लेकिन एक दो बातें करनी अभी बाकी हैं.......एक तो यह कि ये जो वृद्ध आश्रम हैं .....क्या आप को लगता है कि वहां लोग खुशी से रहते हैं....नहीं ना, तो फिर केवल यही प्रार्थना है कि जिन मां –बाप के भी बच्चे जिंदा हैं अगर इस देश में भी ऐसे मां-बाप को इन ओल्ड-एज होम्ज़ में रहना पड़ रहा है.......तो मैं समझता हूं कि अपने मां-बाप को इस से बड़ी गाली हम दे ही नहीं सकते, इस से ज़्यादा अपमानित हम उन्हें कर ही नहीं सकते। मां-दिवस है आज.....एक बात का और ध्यान आया है कि यह जो वूमैन रिज़र्वेशन बिल आने वाला है..........इस को पास करने वालों को काश आज ही मातृ-शक्ति के ऊपर लिखी विभिन्न पोस्टों के बारे में भी पता लगे ताकि इस बिल का किसी तरह का भी विरोध करने से पहले ये मातृ-शक्तियों की कुरबानियों की तरफ तो थोड़ा ध्यान कर लें। इस देश की अधिकांश माताओं का दिन तो सुबह मुंह-अंधेरे ही रोटियां सेंकने और बार-बार चाय के पतीले आंच पर रखने से ही शुरू हो जाता है.......लेकिन यह आज की बात थोड़े ही है......आज तो गैस के बटन का कान मरोड़ा और हो गये शुरू......लेकिन बात तो उन दिनों की थी दोस्तो जब सुबह सुबह ठिठुरती ठंडी में जब मैं और आप रजाई में दुबके पड़े होते थे और हमारी मातायें हमारे स्कूल का डिब्बा बनाने में लगी होती थीं..............जिस के परिणामस्वरूप आज मैं और आप सब अचानक इतने महान हो गये कि ब्लॉगर ही बन बैठे।

एक बात और करनी है कि ठीक है यार अंग्रेज़ों ने हमें एक दिन दिया तो अपनी मां की भूमिका को याद करने के लिये। लेकिन हमारे देश की तो दोस्तो संस्कृति ही कुछ ऐसी है कि हम सब के लिये तो शायद रोज़ ही मां-दिवस होता है। ये हमारे पुरातन संस्कार हैं..............। रोज़ाना ही मां –दिवस वाली बात कुछ ज़्यादा ही नहीं लग रही.....यह कैसे संभव होगा..............उस का सीधा सादा फार्मूला यही है जो कि मैं समझा हूं कि हमें अपनी मां को अपने सब से छोटे बच्चे की तरह ही समझना होगा और उस से वैसा ही व्यवहार भी करना होगा.....कहीं भी गड़बड़ हो रही हो तो हम यही मानक तय कर लें...........तो आप भी मेरी तरह इस से सहमत हैं तो दें ताली............वरना कैसा मां-दिवस और कैसा मदर्स-डे !!

पुनश्चः --- अब पोस्ट लंबी है, खफ़ा न हों....अब मुझे इस देश की सारी मातायों की महानता बखान करने की चाह हुई थी तो इतनी लंबाई की तो छूट दे ही दीजिये। और हां, देखिये, इस समय भी मेरी मां ने ही मुझे ( या आपको ?) बचा लिया क्योंकि बेटे ने आकर बुलावा दे दिया है कि बीजी बुला रही हैं , खाना खा लो, वरना मेरा क्या है.............मैं तो पता नहीं कहां कहां की गप्पें हांकता रहता !