इस वक्त वहां कौन धुआँ देखने जाए..
अखबार में पढ़ लेंगे कहां आग लगी…
यह बहुत ही मशहूर और व्यंग्यात्मक पंक्ति है , जो मशहूर शायर अनवर मसूद की एक ग़ज़ल का हिस्सा है …
ये पंक्ति उन लोगों (मैं भी उन में शामिल हूं) और हमारी आज की मानसिकता पर कटाक्ष करती है, जो किसी हादसे या घटना स्थल पर जाकर मदद करने या हक़ीक़त जानने के बजाय आराम से घरों में बैठना पसंद करते हैं और दूर-दराज की घटनाओं से बस मनोरंजन या जानकारी के लिए जुड़े रहना चाहते हैं।
| मेरे फ्लैट की खिड़की से दिख रहा था यह खौफ़नाक मंज़र ...यही कोई ५०-१०० मीटर की दूरी होगी |
कल रात सोने का वक्त था तो पता चला कि हमारी बिल्डिंग से थोड़ा ही आगे किसी बिल्डिंग में आग लग गई है …खिड़की से बाहर देखा तो यह दिल दहलाने वाला मंज़र था ..रात १०-१०३० बजे का वक्त था…
चिंता यही हुई कि माल का तो कुछ नहीं, जान सब की सलामत रहनी चाहिए…यही दुआ करता रहा…इतनी भयानक लपटों को देख कर ….
मुंबई में फॉयर ब्रिगेड सेवा तो बेहतरीन है ही …जल्दी ही इन के आने की आवाज़ें आने लगीं और पानी की बौछारें भी दिखाई दे रही थीं…
आधे-एक घंटे के बाद आग बुझ गई थी …चलिए, ईश्वर का शुक्र है…लेकिन यह चिंता तो रही कि उस में बसने वाले सभी लोग सकुशल हों …।
जब आग की लपटें थोड़ी कम हुईं तो देखा कि बड़ी बड़ी टार्चों से, सर्च लाईटों से उस फ्लैट के अंदर देखा जा रहा था …
फिर कुछ एक डेढ़ घंटे के बाद आग बुझ गई …यहां तक की धुआं भी नहीं दिख रहा था …
सात मंज़िला बिल्डिंग की सब से ऊपरी मंज़िल में आग लगी थी, यह आज सुबह पेपर से पता लगा …
आग की घटनाएं ज़्यादा ही होने लगी हैं ….देश के हर कोने में …बड़ी चिंता की बात है …ऐसे लगता है जैसे हम सभी बारूद के ढेर पर ही बैठे हुए हैं …और लाटरी सिस्टम से सब कुछ चल रहा है …और क्या कहें। क्या आप को भी ऐसा नहीं लगता?
| इस आग की वह फोटो जो अखबार में छपी |
आज की अखबार में यह आग लगने वाली खबर तीसरे पेज पर थी …एक बंदे के गुम होने की बात भी लिखी थी …
आज रात नौ बजे के करीब मैं उस बिल्डिंग को देखने गया ….सन्नाटा पसरा हुआ था …सारी बिल्डिंग की बिजली गुल थी ..शायद बिल्डिंग के लोग फ़िलहाल कहीं दूसरी जगह रहने चले गए थे …क्या करें….दिलों में दहशत बैठ जाती है …
बिल्डिंग के सामने एक फोटोग्राफर फोटो खींच रहा था …शायद किसी पत्रकार के साथ था…पहले तो वॉचमैन से बात कर रहा था…
जब वे दोनों बाहर आए तो मैंने पूछा ..कि किसी को चोट तो नहीं आई…
उसने इशारे से कहा कि एक आदमी की ज़िंदगी चली गई …बहुत दुःख हुआ …उसने कहा कि अभी कंफर्म नहीं है, लेकिन सातवीं मंज़िल पर रहने वाले फलां-फलां दंपति थे …क्या आप उन को जानते हैं…
मैंने कहा ..नहीं…
उसने बताया कि वह पुरुष बेडरुम में था जिस के ए.सी को आग लग गई और वह चल बसा। उस की पत्नी लिविंग रूम में थी, बच गईं…
बहुत बुरा हुआ….अफ़सोसनाक।
हमारे घर में भी पच्चीस वर्ष पहले पंजाब में आग लग गई थी ..हम लोग घर पर नहीं थे, पूरा घर स्वाहा हो गया था …सब कुछ …बहुत बड़ा शुक्र यही था कि घर के किसी सदस्य का बाल बांका नहीं हुआ..क्योंकि कोई भी घर पर नहीं था …लेकिन उस में सामान सारा जल कर राख हो गया….सब कुछ ख़ाक….दूसरों के लिए कहना आसान होता है लेकिन जिन के ऊपर बीतती है, आटे दाल का भाव उन्हीं को असल में पता चलता है …कईं बरसों तक हम फिर से सारा सामान बनाने में जुटे रहे ….। घर की इंश्योरंस भी न थी…।
यह उन दिनों की बात है जब मुंबई में एक अभियान के अंतर्गत अनाधिकृत्त बस्ती को हटाया जा रहा था …यह सरकार के काम पर कोई टिप्पणी नहीं है, वह तो जो मुनासिब समझेगी और जो इमारतें गैर-कानूनी या सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर के बनाई होंगी, उन को तो कानूनी प्रक्रिया के बाद सरकार जब चाहे ज़मीदोज़ कर दे …लेकिन उन्हीं दिनों जब मेरे घर के ड्राईंग रुम की छत का प्लास्टर नीचे गिरा तो रह रह कर मुझे उन घरों में रहने वालों का ख्याल आता रहा …कहां होंगे, किस हाल में होंगे, कहां सोते होंगे, कहां होता होगा खाना-पीना…चूल्हा-चौका ….।
बशीर बद्र की बात अकसर याद आ जाती है …जब लोग नफ़रत में, धर्म के नाम पर एक दूसरे धर्म, सम्प्रदाय की बस्तियां जला देते हैं….
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में….
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