शुकराने का हिसाब किताब रखने वाली डॉयरी (ग्रेटीट्यूड जर्नल) के बारे में यही पेपर में कभी कभी पढ़ लेता था...कुछ किताबों में भी पढ़ा था यहां-वहां ...बात तो बढ़िया लगी थी...दिन के अंत में रोज़ाना उस में लिखो ...
दो तीन हफ्ते पहले ऑन-लाइन कोई किताब खरीदने के लिए ढूंढ रहा था तो इस ग्रेटीट्यूड जर्नल पर नज़र पढ़ गई...देख कर बहुत अच्छा लगा....800 रुपए में बिक रहा था...आइडिया बढ़िया लगा ...
खैर, ग्रेटीट्यूड जर्नल मिलने पर मैंने उस में रोज़ कुछ न कुछ लिखना शुरु कर दिया....कुछ न कुछ, सोच विचार कर के लिख रहा था ...लेकिन थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ रही थी जब कि ऐसा होना बिल्कुल नहीं चाहिए था...यह मेरा पक्का विश्वास है ...मैं आस्तिक हूं, नास्तिक हूं ....कुछ भी हूं लेकिन इतना तो है कि कोई तो है जो इस सारी कायनात को चला रहा है जिस का शु्क्रिया हर पल किया जाना चाहिए....
मुझे लगता है की यह जर्नल हाथ में आते ही और उस पर लिखना शुरू करते ही मन में यह बात आने लगी कि यार, क्या लिखें इस में...दिन भर की तीन चीज़ें ही क्यों लिखें जिस के लिए शुक्रिया करते बन रहा है ...मेरे पास तो हज़ारों हैं, बेहिसाब हैं ...हर किसी के पास हैं..., किस के पास नहीं हैं?-- हाथ खड़ा करो, नाशुक्रो....और इसी वक्त बैंच पर खड़े हो जाए...जब तक की मैं इस ब्लॉग को ख़त्म न कर लूंं...
मुझे लगता है कि यही सोच को जब मैं इस जर्नल को लिखते लिखते चौथे ही दिन तक पहुंचा तो मैंने अपने मन की बात उस में लिख ही दी ....आप इस लिंक कर क्लिक कर भी के पढ़ सकते हैं....
तीन चीज़ें जिस के लिए आप आज़ शुक्रगुज़ार हैं...
इस में मैंने पहली बात यही लिखी ....(in english....For each and every breath, i am grateful)...
और जब यह लिखने की बात आई कि दो ऐसी बातें लिखें जिस के लिए आप दुनिया के शुक्रगुज़ार हैं....
इस में भी एक ही बात लिख कर मैंने पिंड छुडा़ लिया....At mirco-level, there are 1000 times....though i can't document any such for today.
मुझे यह बात उस जर्नल में लिखते हुए ही बड़ा अजीब सा लग रहा था कि लिखने के लिए कुछ नहीं है....दो ही कारण हो सकते हैं...या तो लिखने के कुछ नहीं या फिर लफ्ज़ साथ नहीं दे रहे ....दोनों ही बातों में से कोई बात न थी....लेकिन फिर भी जब लिखने की बारी आई तो मैंने कैसे कन्नी काट ली....
हां, मैंने आप को बताया कि मैं कुछ दिनों से लिख रहा था ...यही दो तीन दिन से नहीं लिख पा रहा था ...गर्मी ही इतनी है, उमस इतनी है...कौन सोते वक्त यह पोथी पकड़़ कर हिसाब-किताब करने बैठे....
लेकिन यह एक बहाना है ....शायद मुझे इस तरह से फिरंगी स्टाईल में शुक्रिया लिखना एक फ़िज़ूल बात ही लग रही थी ....और साथ में एक गालिब की बात याद आ रही थी ....और यह अकसर रोज़ आती है ...हर रोज़....बिना नागा यह बात स्मरण में रहती है ....
गालिब ने यह कह कर तोड़ दी तसबीह ...
क्यूं गिन के नाम लूं उसका ..जो देता है बेहिसाब....
तसबीह (माला)
इस बात को मैंने बहुत साल पहले पढ़ा तो था ..और लगातार याद भी आती थी इसकी...लेकिन यहां लिखने से पहले गूगल पर इसे डाल कर चैक किया तो पता चला कि यह बात ग़ालिब मियां की कही नहीं है, बस यह जैसे हमारे लोकगीत चल निकलते हैं ...इसी तरह से बात भी चल ही रही है ...जो भी है, लेकिन बात पते की है ...एक बार जब इसे पढ़ लिया तो हमेशा के लिए याद रह गई...अपना अपना विश्वास है, तरीका है ...लोकल ट्रेन में, या सड़कों पर जब कभी लोगों को काउंटर हाथ में पकडे़ अपने इष्टदेव का नाम लेते देखता हूं या ट्रेन ही किसी को अपने इष्टदेव का नाम लिख लिख कर कापी भरते देखता हूं तो भी यह तसबीह तोड़ने वाली बात याद आ जाती है ...।
शुकराने का तो यह आलम है कि हर बाहर निकली सांस के लिए हम शुक्रगुज़ार हैं कि वह तुरंत लौट के आ गई ....वरना न आए तो हमारी सारी सोच, समझ, सयानप ...वही मिट्टी का ढेर हो जाए। इसलिए मुझे इस जर्नल में कुछ लिखना थोड़ा अटपटा लग रहा था ...आज मैंने वही गालिब के नाम से मशहूर बात ही इसमें लिख दी ....और हां, अभी भी इस में लिखूंंगा तो ज़रूर ..लेकिन शायद वह लिखने के अभ्यास के लिए होगा ...। वैसे भी अब इतने पैसे खर्च किए हैं ....बेकार थोडे़ न जाने देंगे...।
शुक्रिये का स्तर अलग अलग दिखा ...चालीस-पैंतालीस सालों से पब्लिक लाइफ में हैं....हर तरह के इंसान से पाला पड़ता है ...जिन के पास दुनियावी तौर पर कुछ खास नहीं लेकिन शुक्रिये से ऊपर तक भरे हुए और दूसरी तरफ़ वे जो दुनियावी ऐशो-आराम से पूरे तरह से सने हुए हैं लेकिन फिर भी शुक्रिया तो दूर, शिकायतों का पुलिंदा हर वक्त उन के पास होता है ....
ऐसे ऐसे लोग देखे हैं कि घर के तीन-चार जितने मैंबर हैं, सभी गंभीर रोगों से जूझ रहे हैं ...दो कैंसर से, तीसरा गुर्दे की गंभीर बीमारी से, चौथा...बिस्तर से उठ नहीं सकता ......फिर भी पूरी ताकत से आशावान होकर, धैर्य रखते हुए लगे हुए हैं ...शुक्रिया करते नहीं थकते कि सांसें चल रही हैं ...सब ठीक हो जाएगा......जैसे उस कहावत पर उन पर अडिग विश्वास हो ...जब तक सांस तब तक आस।
इस के आगे क्या लिखें ...लिखने को बहुत कुछ है ..लेकिन इतना लिखना भी बेकार है ....
दंत चिकित्सक हूं ...इतने लंबे समय से मरीज़ों से मिलता हूं ....कुछ मरीज़ जिन के मुंह में दांत नहीं हैं, सभी टुकड़े पड़े हैं ....हैरानी होती है कि ये खाते कैसे होंगे ...पूछने पर बताते हैं कि हम तो सब कुछ खा लेते हैं, चने भी थोड़े तोड़ कर खा लेते हैं ....और यह बात हंसते हंसते कहते हैं....अब क्या कोई इन को कहे कि ये सारे टुकडे़ निकलवा दो...वे तो उस से भी पूरे मज़े में हैं....और मैं यह भी जानता हूं, पक्का यकीन है ...इसमें से अधिकतर ने अगर सारे टूटे फूटे दांत निकलवा भी दिए तो विभिन्न कारणों की वजह से यह नकली दांत (फिक्स की सोचें ही नहीं) ..के सैट के लिए बीस-तीस हज़ार का जुगाड़ नहीं कर पाएंगे ....क्योंकि वे मस्त हैं ....और खुश हैं ....
दूसरी तरफ़ कुछ लोग ...कुछ क्या, बहुत से लोग ऐसे भी देखता हूं जिन्होंने हज़ारों क्या, लाखों रुपए खर्च कर दो-चार-पांच डेंटल इंप्लांट तो लगवा लिए हैं ...लेकिन फिर भी खुश नहीं है ....उस में यह कमी इस में यह कमी, स्माईल बदल गई है ...थोड़े ऊंचे लग रहे हैं, थोडे़ नीचे लग रहे हैं, होंठ उतना बाहर नहीं आया जितना आना चाहिए था, गाल भी अदंर धंसे लग रहे हैं...वह वाली बात नहीं है जैसे पहले अपने दांतों के साथ थी ....
नहीं होगी न यार, अपने दांतों वाली बात ....कुछ न कुछ तो थोड़ा बहुत समझौता तो करना ही पड़ता है ....अगर नहीं करते तो अपने आप से ही नाराज़ रहेगे ....शुक्र करिए की आप ने नकली दांत लगवा लिए, अधिकतर लोगों की (पूरे विश्वास से कहूं तो 99 फीसदी लोगों की तो पहुंच ही में नही है यह सब.....)...
मैने ऊपर यह सब लिख कर किसी खराब दांतों की स्थिति को ग्लैरमराईज़ बिल्कुल नहीं किया ..लेकिन यह सब लिखा इसलिए कि अगर कोई इंसान अनेक कारणों की वजह से अपने दांतों का इलाज नहीं करवा पा रहा तो ....नकली दांत की तो छोड़िए, टूटे -फूटे दांत निकलवा ही नहीं पा रहा ...तो क्या मुस्कुराना ही छोड़े दे....
नहीं, उन सब को भी पास से खूब हंसते-मुस्कुराते देखा है ...और बहुत खूबसूरत लगते हैं , दांतों की परवाह कौन करता है ...एक कहावत भी है कि कोई भी हंसता-मुस्कुराता चेहरा ऐसा नही दिखता जो खूबसूरत न हो ....हां, यह भी ज़रूर है कि कुछ चमकते-दमकते खूबसूरत चेहरों की हंसी कईं बार कुटिल ज़रूर लगती है (खुल कर हंसते नहीं, दबी हंसी किस काम ...!!)... जैसे कि वे सही मायने में हंस नहीं रहे होते, दूसरों का मज़ाक करते हुए हंस रहे होते हैं....और दांतों पर लगी नकली, महंगी, ज़िर्कोनियां टोपियों की धौंस जमा रहे हों...।
आज के बिन मांगे ज्ञान की पोटली यहीं पर बंद करता हूं ...यह लिख कर ...
शुकराना ..शुकराना...शुकराना ...हर पल शुकराना .....हर हालत में शुकराना.....।। यह जर्नल वर्नल लिखने वाली बातें फिरंगी हैं और गिन गिन कर इष्टदेव का स्मरण करने वाली बात भी.......! क्या है, आप जानते हैं, मेरा मुंह क्यों खुलवा रहे हैं खामखां....😎
जो वीडियो मैं नीचे लगा रहा हूं , इस से बेहतर कोई क्या ही शुकराना अदा कर पाएगा....सब कुछ समो दिया गया हो जैसे इस कवि ने अपने शब्दों में ...इसे सुनना ही इतना सुखद अहसास है ....सुनिए फिर, आप भी ....भाषा की कोई दीवार नहीं होती, पंजाबी सब की समझ में आ जाती है ....जितनी 2 किसी को ज़रुरत होती है ...