Saturday, December 6, 2014

ऐसे कैंप लगने ही नहीं चाहिए..

अभी मैं आज की हिन्दुस्तान अखबार का संपादकीय लेख पढ़ रहा था..

इस संपादकीय का शीर्षक है... स्वास्थ्य का अंधेरा पक्ष..... "पंजाब में आंखों के ऑपरेशन के एक कैंप में ऑपरेशन करवाने वाले ६० लोग अंधे हो गए हैं। छत्तीसगढ़ में नसबंदी कैंप में कईं महिलाओं की मौत के तुरंत बाद यह हादसा बताता है कि हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में कितनी लापरवाही है।"
मैं चाहता हूं कि आप भी यह संपादकीय पढ़ें....इस का ऑनलाइन लिंक मैं नीचे दे रहा हूं।
इस की कुछ पंक्तियां मैं नकल कर के यहां लिख रहा हूं.....बस, ताकि ये बातें मेरे भी ज़हन में उतर जाएं.....
  • मोतियाबिंद के ऑपरेशन में सबसे बड़ा खतरा अगर कुछ हो सकता है, तो यह संक्रमण का है। अगर ऑपरेशन के बाद अच्छी गुणवत्ता की दवाएं दी गई हैं, तो इसमें कुछ भी गड़बड़ी होने का खतरा न के बराबर होता है। ऐसे ऑपरेशनों में अमूमन गड़बड़ी होती नहीं है, इसलिए डाक्टर और ऐसे कैंपों के आयोजक सफाई और सुरक्षा को लेकर लापरवाह होते जाते हैं। किसी दिन इस की कीमत इसी तरह मरीज चुकाते हैं, जैसे पंजाब के मरीज़ों ने चुकाई है। 
  • कुछ लापरवाही होती है और कुछ पैसे बचाने की जुगत। कायदे के इंतजाम में वक्त भी लगता है और पैसा भी। कैंपों में गरीब मरीज़ ही होते हैं, इसलिए उनका इलाज या ऑपरेशन भी एहसान की तरह ही किया जाता है। आयोजक ज़्यादा खर्च नहीं करना चाहते और डॉक्टर कम वक्त में ज्यादा ऑपरेशन कर डालना चाहते हैं। 
  • होना तो यह चाहिए कि इस तरह के कैंप लगे ही नहीं। किसी भी मरीज का इलाज और खार तौर पर ऑपरेशन किसी नियमित अस्पताल के कायदे के ऑपरेशन थिएटर में ही होना चाहिए। 
  • स्कूलों और धर्मशालाओं में कामचलाऊ ऑपरेशन थिएटर बनाकर टेंट वालों से किराये के बिस्तरों पर मरीज़ों को लिटाकर ऑपरेशन करना किसी भी सूरत में असुरक्षित है। लेकिन ऐसा होता इसलिए है कि गरीब मरीज़ों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं होती ही नहीं हैं। 
  • गरीब महिलाओं की नसबंदी सरकारी आदेश पर लगाए गए कैंपों में और गरीब वृद्ध लोगों को मोतियाबिंद का ऑपरेशन दान के पैसों पर लगे कैंपों में होते हैं। कोई इमरजेंसी न हो, तो ऐसे कामचलाऊ ऑपरेशन थिएटरों पर पाबंदी होनी चाहिए। लेकिन भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत इस हद तक खराब है कि इन हादसों के बावजूद निकट भविष्य में कुछ बदलने की उम्मीद भी नहीं है। 
(यह मैंने आज के हिंदुस्तान के संपादकीय से लिया है.......पूरा संपादकीय पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक करिए.. स्वास्थ्य का अंधेरा पक्ष)




हिंदु-मुस्लिम भाईचारे के रोशन चिराग...

अभी टाइम्स ऑफ इंडिया देखी तो वहां एक रिपोर्ट दिखी......Paramhans used to bring fruits, I carried roti and achaar. दरअसल मेरी मां ने मेरे से पहले यह इंटरव्यू पढ़ी, इस का सार मेरे से साझा किया और पेपर मुझे थमा दिया।

इस में हाशिम अंसारी साब का इंटरव्यू छपा है... ये साब बाबरी मस्जिद केस लड़ने वाले सब से पुराने शख्स हैं... ६५वर्ष तक कानूनी प्रक्रिया के बाद में अब इन्होंने केस की कमान अपने बेटे के हाथ सौंप दी है।

इस छोटी सी इंटरव्यू में अंसारी साब याद कर रहे हैं कि शुरूआती दौर में यह मामला कितना मामूली सा था... और बता रहे हैं कि ये १९४९ से इस केस की पैरवी कर रहे हैं।

इन्हें याद है कि १९५० में मंदिर की तरफ़ से रामचन्द्र दास परमहंस ने केस की कमान संभाली। फैज़ाबाद के सिविल जज के यहां केस की सुनवाई हुआ करती थी।

अंसारी साब याद कर रहे हैं कि वह और परमहंस एक ही टांगे पर कोर्ट जाया करते थे। सुनवाई के बाद, वे लोग अयोध्या और फैज़ाबाद के बीच जलपा नाले पर एक साथ बैठ कर खाना खाया करते थे। परमहंस कुछ फल लाया करता था और मैं रोटियां और आचार ले आया करता था और मिल कर खाना खाते थे। हम उस समय इस समस्या के शांतिपूर्ण हल की भी चर्चा किया करते। वे यह भी याद कर रहे हैं कि एक समय ऐसा भी आ गया था कि वे दोनों सोचने लगे कि अगर मस्जिद में नमाज और राम चबूतरे पर पूजा की सहमति बन जाती है तो हम केस ही वापिस ले लेंगे। 

लेकिन आगे लिखते हैं कि किस तरह से वोटों की राजनीति में इस समस्या का राजनीतिकरण हुआ और स्थिति बद से बदतर होती चली गई।

बहुत अच्छा लगां, अंसारी मियां का यह लेख देख कर......ऐसे लोग हैं हिंदु-मुस्लिम दोस्ती के प्रकाश-स्तंभ।

वेव-लेंथ की बात देखिए.......मैं यह लिख ही रहा था कि पांच मिनट पहले मेरी मां मेरे को यह कागज़ का टुकड़ा पकड़ा कर गई हैं कि इसे मेरे (उनके) ब्लॉग पर डाल देना (वे भी ब्लॉग लिखती हैं) .......इसलिए उस पेज़ को उसी रूप में यहां डाल रहा हूं....
अंसारी साब के नाम मां का संदेश

सच में हम लोगों की दोस्ती कितनी पुख्ता है, बस वोटों की राजनीति ने सारी गड़बड़ी कर रखी है......कोई बात नहीं, लोग अब बिल्कुल सचेत होने लगे हैं....किसी की बातों में नहीं आते अकसर........

आप इस इंटरव्यू पर यहां देख सकते हैं... Paramhans used to bring fruits, I carried roti and achaar

हो सके तो इसे भी देखिएगा.......बात आस्था की...

योगेन्द्र मुदगिल की ये पंक्तियां ध्यान में आ गईं.....
मस्जिद की मीनारें बोलीं,
मंदिर के कंगूरों से, 
हो सके तो देश बचा लो, 
इन मज़हब के लंगूरों से ।।

नफ़रत की लाठी को तोड़ देने की याद दिलाता यह सुपरहिंट गीत भी सुनिएगा........




पाकिस्तानी टीवी पर भी सेक्स गुरू

अभी मैं बीबीसी न्यूज़ पढ़ रहा था तो मेरी नज़र पड़ गई इस न्यूज़-स्टोरी पर ---Pakistan sex taboos challenged by TV Phone-in Show. 

जब आप इस रिपोर्ट को पढ़ेगे तो शायद यह आप के लिए रोचक होगा कि पाकिस्तान जैसे देश में भी किस तरह से यह शुरूआत हो चुकी है कि टीवी प्रोग्राम के द्वारा सैक्स के बारे में पाई जाने वाली भ्रांतियों को हटाया जाए।

रिपोर्ट में साफ साफ लिखा तो है कि डाक्टर वैसे तो सटीक जानकारी देता है लेकिन बीच बीच में इधर उधर की भी हांकने लगता है। रिपोर्ट के पिछले हिस्से में किसी ने बड़ा अच्छा लिखा है कि सैक्स के विषय पर भी कहां डाक्टर खुल कर बोल सकते हैं....धार्मिक गुरूओं को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, और बड़ी अच्छी बात यह भी लिखी है कि चर्चा करने वाले डाक्टर जिसे अपने विश्वास अथवा अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार ठीक समझता है, वही बातें करता है, साफ़ साफ़ िलखा है कि ऐसा करने से वैज्ञानिक पक्ष कहीं पीछे छूट जाता है।

मैं इस बात से सहमत हूं......मैंने भी पांच छः महीने पहले आप का एक इंडियन सैक्स गुरू से तारूफ़ करवाया था....अगर आपने उस लेख को देखा होगा तो उसे भूल तो नहीं पाए होंगे.......अगर नहीं भी देख पाए तो अब देख सकते हैं.....चलिए मिलते हैं आज 90 वर्ष के युवा सैक्स गुरू से..  मैं समझता हूं कि इस लिंक को आप को ज़रूर देखना चाहिए।

पांच दिन पहले की ही तो बात है कि एड्स दिवस था....देश की स्थानीय भाषाओं में एक दो लेख दिखे.....मैं हैरान रह गया कि किस तरह से पहले दो चार पैराग्राफ में वे सीधा सीधा असुरक्षित संभोग की जगह गल्त काम, गलती... जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। हैरानी नहीं कि कुछ लोग इस की जगह पर पाप कर्म का उपयोग भी करने लगें या पहले ही करते हों....

अब ज़रा उस पाकिस्तानी गुरू की बात कर लें.......मुझे ऐसा लग रहा है कि यह कोई प्रायोजित किस्म का कार्यक्रम है...आप बीबीसी की स्टोरी में एम्बेड की गई एक वीडियो में देख सकते हैं कि एक अस्पताल का नाम भी पीछे लिखा गया है....इसलिए मुझे तो यह स्पांसर्ड कार्यक्रम का ही एक रूप दिखा......हम नहीं देखते क्या अपने यहां विभिन्न चैनलों पर विशेषतयः देर रात के समय और अमृत बेला में सुबह सुबह इस तरह के विषयों को विज्ञापन के रूप में सरेआम परोसते रहते हैं.....कभी कोई स्वामी, कभी कोई शाही हकीम......मकसद इन सब का एक कि सारा हिंदोस्तान कैसे भी एक बार उठ तो जाए, तन जाए, खड़ा हो जाए.........अरे भाई,  वे पहले ही से अच्छे से उठे हुए हैं, ऐसे ही थोड़ा १२५ करोड़ हो गये हैं।

वैसे सैक्स की सलाह देने वाले पाकिस्तानी टीवी के इस कार्यक्रम के बारे में मैं यह भी सोच रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जो देश इतना रूढ़िवादी प्रथाओं में जकड़ा हुआ है ... वहां पर कैसे अचानक एक प्रोग्राम शुरू होता है और महिलाएं तक अपने सवाल इतनी बेबाकी से पूछ रही हैं..जिस तरह के प्रश्न आप बीबीसी स्टोरी में पढ़ेंगे।

पता नहीं बात मेरे तो हलक से नीचे नहीं उतर रही.......कुछ न कुछ तो लोचा है उस्ताद......वरना लोग क्या नहीं जानते कि सब कुछ अनानीमस होते हुए भी क्या प्रश्न पूछने वाले की आवाज़ से उन की शिनाख्त नहीं हो सकती.....अगर वे ऐसा नहीं समझते तो मैं उन की हिम्मत की दाद देता हूं और उन की इस पहल के लिए उन्हें बधाई देता हूं।

बस, इतना ही काफ़ी है इस पोस्ट में........इस गंदी बात का ज़िक्र कर के इस बात पर यहीं मिट्टी डाल देते हैं......





बिना ज़रूरत के एक्सरे वाला गोरखधंधा अमेरिका में भी ...

बचपन के दिनों की एक याद यह भी है कि जब कभी किसी डाक्टर के पास जाना होता तो अकसर देखा करता था कि वह लगभग हर मरीज़ को अच्छे से चैक कर रहा है, उस से दो-चार बातें कर रहा है उस की तकलीफ़ के बारे में, ज़रूरत पड़ने पर उसे कॉउच पर लिटा कर पेट एवं अन्य जांच भी करता था... इस में दो राय नहीं कि मरीज़ और डाक्टर के बीच में संवाद अलग किस्म का हुआ करता था।

अब एक जर्नल परसेप्शन सी बन चुकी है कि डाक्टर ज़्यादा बात नहीं करते.....हाथ तक लगा कर नहीं देखते। मैं इस बारे में सोचता हूं कि शायद कुछ डाक्टरों का क्लीनिकल अनुभव इतना होता है कि उन्हें मरीज़ से लंबी बातचीत की ज़रूरत ही नहीं होती, वे तुरंत मरीज़ का रोग समझ जाते हैं और नुस्खा लिख कर उसे थमा देते हैं। 

लेकिन फिर भी मरीज़ की संतुष्टि होनी बहुत ज़रूरी होती है। एक तो उसे यह आभास होना लाज़मी है कि उस की सभी बातें डाक्टर ने सुन ली हैं और दूसरा यह कि डाक्टर ने उस की अच्छे से जांच कर ली है। 

ऐसी भी एक धारणा बनती जा रही है कि डाक्टर लोग टेस्ट बड़े लिखते हैं......और अधिकतर डाक्टर किसी एक लैब के ही टेस्ट मानते हैं। यही नहीं, अब टेस्ट, एक्स-रे आदि भी ज़्यादा ही होने लगे हैं। 

शायद हमें लगता होगा कि विभिन्न कारणों की वजह से यह समस्या हमारे जैसे देशों की ही होती होगी......लेकिन कल मैंने देखा कि अमेरिका जैसे देश में भी किस तरह से बिना किसी ज़रूरत के ही बच्चों के एक्स-रे करवाये जा रहे हैं।
आप इस लिंक पर पहुंच कर डिटेल पढ़ सकते हैं..  Many kids exposed to unneeded x-rays. 

वहां पर हुए इस अध्ययन से पता चला कि लगभग 88 प्रतिशत केसों में जिन बच्चों के छाती के एक्स-रे किये गये, उन का उन बच्चों के इलाज के साथ कोई संबंध नहीं था.....कहने का अभिप्रायः यह कि उस एक्स-रे ने उन का इलाज का निर्णय करने में कुछ मदद नहीं मिली--  88% x-rays did not influence treatment. 

खर्च बढ़ने के साथ साथ बिना ज़रूरत के एक्स-रे किये जाना सेहत के लिए भी ठीक नहीं है क्योंकि इस से शरीर में रेडिऐशन्ज़ इक्ट्ठा होती रहती है जो हानिकारक है। 

समस्या तो यह भारत में भी है, लेकिन इस का कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता... और इस धंधे में नीम-हकीम भी बढ़ चढ़ कर लगे हुए हैं। 

इस तरह की प्रैक्टिस पर कैसे काबू पाया जाए, यह आसान काम नहीं है। कोई भी चिकित्सक किसी मरीज़ को जब कोई टेस्ट करवाने के लिए कहता है तो मरीज़ बेचारा या उस के मां-बाप कहां इतने दबंग होते हैं कि वे टेस्ट नहीं करवाएं। एक बार लिखा गया है तो टेस्ट हो कर ही रहेगा। 

भारत में इस तरह की बातों के बारे में काफ़ी लिखा जा रहा है.....लेकिन कुछ होता दिख नहीं होता। 
वैसे भी अगर हम अपने आप को मरीज़ का जगह पर रख कर देखें तो पाएंगे कि वह कितना मजबूर प्राणी है...उसे बिना किसी किंतु-परंतु के सारी बातें अच्छे बच्चों की तरह माननी ही हैं। 

सीधी बात यह है कि इस बात का समाधान इतना आसान नहीं है, क्योंकि मैं समझता हूं कि इस तरह की प्रैक्टिस का सीधा सीधा संबंध डाक्टर के मन से भी, मार्कीट शक्तियों के प्रभाव या दबाव से भी ज़रूर होता है........इतनी इतनी महंगी करोड़ों की मशीनें ये डॉयग्नोस्टिक पर पहुंचती हैं तो उन्हें मुनाफ़े के लिए भी कुछ हद तक यह सब करना/करवाना ही  पड़ता है....मुझे इस में कोई शक नहीं है। 

बात वही है कि आखिर मरीज़ करे तो क्या करे........मुझे ऐसा लगता है कि सब से पहले तो यह जो नीम-हकीम हैं ना, इन के चक्कर में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहिए। जगह जगह गांव, कसबों और बड़े शहरों में भी ये हर तरफ़ फैले हुए हैं, इन की लैब एवं एक्स-रे सैंटरों के साथ सांठ-गांठ एक दम पुख्ता होती है.(केवल इन्हीं की ही नहीं!!)......मैंने बहुत बार देखा है कि ये अपनी पर्ची पर जिस टेस्ट का नाम लिखते हैं, उस के बारे में जानना तो दूर, ये उस का नाम तक ढंग से नहीं लिख पाते। लेकिन मरीज़ का क्या है, उसे कहा गया है तो वह कैसे भी उसे करवा के ही लौटता है!! 

मैं सरकारी अस्पताल में हूं ...मरीज़ मेरे को कहते हैं ना कि सिर दर्द के लिए एक सी.टी स्केन ही करवा दीजिए, पेट के िलेए अल्ट्रासाउंड, पीठ दर्द के लिए एम आर आई तो मैं उन्हें यही कहता हूं कि कोई भी विशेषज्ञ यह बेहतर जानता है िक आप के लिए किस टेस्ट की ज़रूरत है। और मैं उन्हें यह भी कहता हूं कि बाहर प्राईवेट सेंटर में जा कर ऐसा कभी मत कहना अपनी इच्छा से कि मुझे यह टेस्ट करवाना है......यकीन मानिए अधिकतर निजी डॉयग्नोस्टिक केंद्रो में तुरंत हो जाएगा.......लेकिन क्या उस की ज़रूरत थी भी, यह केवल एक अनुभवी एवं प्रशिक्षित चिकित्सक ही बता सकता है। 

वैसे मैं इस विषय पर लिखता तो जा रहा हूं लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि क्या इस तरह की प्रैक्टिस पर कंट्रोल कर पाना आसान काम है!..और मुझे नहीं लगता कि विभिन्न कारणों की वजह से यह सब इतनी आसानी से कंट्रोल हो पाएगा। 

वैसे एक सुझाव है कि किसी भी टेस्ट के बारे में सटीक जानकारी पाने के लिए आप लैबटैस्टआनलाईन नामक साईट को भी विज़िट कर सकते हैं, यह रहा उस का लिंक... http://labtestsonline.org/

लैब टेस्टों की बात हुई तो ध्यान आ गया ....कल सुबह मैं भ्रमण कर रहा था, एफएम सुन रहा था.....किसी लैब का विज्ञापन चल रहा कि सर्दीयों का मौसम आ गया है..बहुत सी बीमारियां लेकर आया है यह मौसम इसलिए अपनी सभी जांचें एक पैकेज के रूप में घर बैठे करवाएं.......रक्त का सैंपल हम लोग घर से ही ले लेंगे। मुझे ध्यान आया कि यह सर्दी के मौसम से लोगों को डरा रहे हैं और देश के प्रधानमंत्री रेडियो पर मन की बात में सर्दी को स्वास्थ्य-वर्धक मौसम कह कर पुकारते हैं। 

सोचने वाली बात है कि सब कुछ बिक रहा है........बस खरीददार थोड़ा सचेत रहें, शायद इस से ही हालात कुछ बदल जाएं....काश!!

मौसम की बात छिड़ी तो अचानक मौसमों की बात करते इस गीत का ध्यान आ गया......सुबह सुबह आप भी सुनिए...पतझड़-सावन-बसंत-बहार... एक बरस के मौसम चार..पांचवा मौसम प्यार का......ये लोग बढ़िया बातें सुना रहे हैं..