Thursday, December 11, 2014

जी का जंजाल बन चुके ये लाउड-स्पीकर

मेरा अपना अनुभव है कि आज से चालीस साल पहले हर तरफ़ एक तरह का सन्नाटा पसरा रहता था..शायद हम लोग इस सन्नाटे के भंग होने की इंतज़ार किया करते थे.....अधिकतर ये भंग होता था..पेढ़ों के पत्तों की आवाज़ों से, पंक्षियों के गीतों से....भंग शब्द कुछ ज़्यादा जंच नहीं रहा, लेकिन कोई अच्छा शब्द इस के लिए मिल भी तो नहीं रहा.....हां, एक बात और, यह सन्नाटा बहुत बार बचपन में लाउड-स्पीकर की आवाज़ से भी भंग हुआ करता था। 

लाउड-स्पीकर की आवाज़---बचपन में ये आवाजें अकसर किसी धार्मिक प्रोग्राम के दौरान या फिर शादी ब्याह के समय आती थीं.....टीवी आने से पहले वाले दिनों की बातें हैं.....रेडियो तो बस अपने टाइम पर फिल्मी गीत बजाता था....लेकिन जब यह शादी-ब्याह के मौसम में घर के आसपास कहीं लाउड-स्पीकर फिट होता दिखता तो हमारी बांछें खिल जातीं.......क्योंकि फिर बार बार हमें अपने पसंदीदा फिल्मी गीत सुनने को मिला करते......मैं जट पगला दीवाना, तेरे हुस्न का मुझ पे हुआ यह असर है, गोरे रंग पे न इतना गुमान कर, ड्रीम-गर्ल, दस-नंबरी, डॉन, लैला-मजनू.....इस रेशमी की पाजेब की झंकार के सदके....क्या क्या गिनवाएं...लिस्ट बहुत लंबी है, यादों की रेल जितनी। 

अब वैसे लोगों में सहनशीलता नहीं रही...किसी दूसरे के बारे में हम लोगों ने सोचना ही बंद दिया है....और दूसरा लाउड-स्पीकर बजाने वाले भी संवेदन-विहीन होते दिख रहे हैं। सरकारें कितने प्रतिबंध लगाए हुए है कि इतने से इतने बजे के दरमियान लाउड-स्पीकर नहीं बजेंगे लेकिन कोई सुने तो। 

आज तो वैसे ही हर तरफ़ इतना शोर-शराबा है कि हर बंदा चाहता है कि कम से कम सुबह, शाम और रात की चंद घड़ियां तो कोई उसे सुकून से काटने दे। 

कल की हिन्दुस्तान में एक खबर छपी कि पुराने लखनऊ के वजीरगंज इलाके में मंगलवार रात एक घर में मजलिस के दौरान लाउडस्पीकर बजाने के विवाद में दो पक्ष भिड़ गए। इस दौरान करीब आधे घंटे तक पथराव हुआ जिसमें एक महिला समेत चार लोग चोटिल हो गए। 

इसी अखबार के संपादकीय पन्ने पर एक कॉलम छपता है ..नजरिया.......कल यहां पर पंकज चतुर्वेदी का एक लेख दिखा.......आफत बनते भोंपू और चुप्पी साधते लोग जिस में कितनी सही लिखा गया है कि तमाम नियम-कायदों के वावजूद दिन-रात बजने वाले लाउड-स्पीकरों से मुक्ति का कोई तरीका नहीं। 

यह लेख अच्छा लगा...हम सब की ही बात करता दिखा......सच में हम लोग इन मुद्दों पर अपने आप को कितना असहाय पाते हैं। इस का शीर्षक लिख कर गूगल किया तो यह लेख ऑनलाइन भी मिल गया.....यह रहा इस का लिंक ... आफते बनते भोंपू और चुप्पी साधते लोग। 
अभी कुछ दशक पहले तक सुबह आंखे खुलने पर पक्षियों का कलरव हमारे कानों में मधु घोलता था, आज देश की बड़ी आबादी अनमने मन से धार्मिक स्थलों के बेतरतीब शोर के साथ अपना दिन शुरू करता है। यह शोर पक्षियों, प्रकृति प्रेमी कीट-पतंगों, पालतू जीवों के लिए भी खतरा है। बुजुर्गों, बीमार लोगों व बच्चों के लिए यह असहनीय शोर बड़ा संकट बन कर उभरा है। पूरी रात जागरण या शादी, जन्मदिन के लिए डीजे की तेज आवाज़ कईं के लिए जानलेवा बन चुकी है।
(इसी लेख से)
लो जी, अभी अभी मेरे कानों में भी बाहर से आ रहा शोर पड़ना शुरू हो गया.....अभी तक कितनी शांति थी, लगता है अब फिर से एक घंटे के लिए रजाई में ही घुस जाया जाए। अगर आप का कुछ धार्मिक सुनने का मूड है तो इस लिंक पर क्लिक करिए........राम चंदर कह गये सिया से.....ऐसा कलयुग आएगा।

 

सपनों की सौदागरनी-- पुष्पक एक्सप्रेस



कल रात हम लोग जैसे ही लखनऊ जंक्शन स्टेशन पर पहुंचे तो प्लेटफार्म पर लंबी सी कतार देख कर हैरानी हुई कि आजकल तो पीक पीरियड भी नहीं है। लेकिन फिर ध्यान आया कि बंबई जाने वाली सभी गाड़ियों का सारा साल ही यही हाल होता है...त्योहार के समय बहुत ज़्यादा।

इस लंबी सी पंक्ति को गुज़रते गुज़रते अचानक उन अगणित सपनों का ध्यान आ गया जो इस लाइन में खड़ा हर बश्र अपने साथ लेकर जा रहा है। फिर अचानक सपनों का सौदागर फिल्म का वह गीत याद आ गया....

सपनों का सौदागर आया,
ले लो ये सपने ले लो,
किस्मत तुम से खेल चुकी,
अब तुम किस्मत से खेलो।।

(यह रहा इस टीस से भरे सुंदर गीत का यू-ट्यूब लिंक, अगर आप सुनना चाहें तो)...

१९७० के दशक में जब मैं १०-१२ साल का रहा हूंगा और जब नया नया टी वी आया था तो दूरदर्शन पर दिखाई गई थी....अच्छी लगी थी......यह गीत ही याद रहा .....बाकी सब कुछ भूल गया......किसी दिन यू-ट्यूब पर ही फिर से देखूंगा....अगर कभी फुर्सत मिली तो!)

हां, तो बात चल रही थी कि लंबी सी पंक्ति में खड़े हर शख्स के सपनों की......बहुत बार सुनता रहा हूं कि सारा यू.पी- बिहार बंबई, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़ पहुंच गया है, इस तरह की टिप्पणी मुझे बेहद घटिया लगती हैं, इन शहरों ने क्या किसी को रोक रखा है, कोई भी जा कर अपना सिक्का मनवा ले।

मैं पिछले लगभग दो वर्षों से यूपी में रह रहा हूं......यहां के लोगों को थोड़ा समझने लगा हूं.....इरादे के पक्के, मेहनती नहीं बहुत ज़्यादा मेहनती, बातचीत में दक्ष.......और चाहिए क्या होता है किसी भी जगह पर अपने पांव जमाने के लिए। छःसात वर्ष पहले की बात है ....हम लोग मनाली के आगे रोहतांग पास पर बैठे बर्फबारी का आनंद उठा रहे थे, वहां पर आदमी एक-दो घंटे से ज़्यादा टिक नहीं पाता...वहां पर जो बंदे चाय-काफी और भुट्टे बेच रहे थे, उनमें से अधिकांश यू.पी के ही रहने वाले थे...उस जगह पर यह सब बेचने उन के लिए कितनी बड़ी चुनौती थी यह सुनने लायक था, किस तरह से बस के ऊपर अपना सारा सामान रख कर रोज़ सुबह उस जगह पहुंचते हैं, और कैसे शाम होने से पहले वापिस अपने ठिकानों पर पहुंचते हैं....इस की कल्पना वे लोग बेहतर कर पाएंगे जो कभी रोहतांग पॉस गये हों।

हां, ये जो लाइनें आप देख रहे हैं ये लोग पुष्पक एक्सप्रेस है......यह गाड़ी बंबई जाने के लिए बड़ी लोकप्रिय ट्रेन है....रात ७.४५ बजे लखनऊ जंक्शन स्टेशन से छूटती है, और २४ घंटे लेती है बंबई पहुंचने के लिए। मुझे यही लग रहा था कि यह ट्रेन जैसे सपनों की सौदागरनी है......यह सपने ही इधर उधर करती रहती है......लेकिन बड़ा संभल कर ....किसी के सपने को ठेस नहीं लगनी चाहिए। वैसे भी दुनिया में हर इंसान अपने भीतर ही भीतर एक जंग लड़ रहा है जिस के बारे में दूसरे किसी को कुछ भी तो नहीं पता। मैंने बहुत साल पहले एक इंगलिश की कहावत पढ़ी थी......Never laugh at anybody's dreams!! ........कितनी सुंदर बात है ना!!

आज के खुले वातावरण में जिस तरह से कुछ अरसा पहले बंबई में हुआ कि ये बाहर वाले लोग हैं.......इन सब बातों का कोई आधार नहीं है, ये बातें करने वालों का ही आप देखिए चुनावों में पत्ता ही साफ़ हो गया। वैसे भी घर से बाहर रहना कोई आसान काम नहीं है, हम लोग सब सुविधाएं होते हुए भी घऱ से एक-दो दिन के लिए ही बाहर जाएं तो यही इंतज़ार रहती है कि यार कब लौटेंगे अपने ठिकाने पर...हर कोई अपने परिवेश में ही रहना चाहता है..जड़ों के पास...इन से जुड़ा हुआ, लेकिन फिर भी मजबूरियां कहां की कहां ले जाती हैं.....कभी इन हज़ारों-लाखों लोगों के बारे में भी सोचिएगा कि इन में से अधिकांश वहां पर किन परिस्थितियों में वहां रहते हैं...आखिर ये करें तो क्या करें, जहां रोज़ी-रोटी होगी, वहां लोग जाएंगे ही...और बेशक जाना भी चाहिए....पिछले दिनों मैंने नादिरा बब्बर द्वारा लिखा गया और निर्देशित एक नाटक देखा था....दयाशंकर की डॉयरी, इसी समस्या को दर्शाया गया था उस में भी।

ये लाइनें जर्नल (बिना आरक्षण) डिब्बों में बैठने वालों की है.......मैंने देखा कि जैसे ही जर्नल डिब्बों के दरवाजे खुले, ये लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी......एक बार, जब वे डिब्बे भी ठसाठस भर गये, तो भीड़ ऐसा भागी कि जिस की लाठी उस की भैंस...जो दौड़ सकता था, उस ने कोशिश कर ली, वरना लोग फिर से लाइन में लग गए...गाड़ी छूटने के बाद जब मैंने इस नईं लाइन के पास जा कर एक शख्स से पूछा कि अब यह लाइन किस गाड़ी के लिए है.....तो उसने बताया कि यह १० बजे रात में छूटने वाली एक दूसरी सुपरफॉस्ट गाड़ी के लिए है, वह भी २४ घंटे में बंबई पहुंचा देती है।
लखनऊ से पुष्पक एक्सप्रेस छूटने से १० मिनट पहले का दृश्य 
जैसे ही जर्नल डिब्बे भर गये, फिर तो सारा हिम्मत का ही खेल दिखा......जो जीता वही सिकंदर.......जो भाग सका, उसने अपनी जगह कहीं न कहीं बना ली........यह वीडियो देखिए...



सपनों की सौदगरनी चल दी.......ठसाठस भरे सपनों को अपने कंधों पर उठाए
यह सौदागरनी किसी को कुछ नहीं कहती......सभी का स्वागत है!

पुष्पक छूटने के बाद ...एक दूसरे सपनों की सौदागर की इंतज़ार में
सुबह सुबह इस अमृत वेला में यहीं विराम लेता हूं ...इस प्रार्थना के साथ कि ईश्वर सब को सपने देखने की शक्ति तो दे ही, इन्हें साकार करने का हौसला और जुगाड़ भी दे...........आमीन।

इस लाइन में खड़े हर बश्र के जज्बे को सलाम करते हुए इन्हें समर्पित यह गीत.........