Tuesday, June 2, 2015

सुबह सुबह फिर से पेड़ों की बातें करें?

मैं शेल्फी खींच रहा था और ....
दो दिन पहले टाइम्स ऑफ इंडिया एवं राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान की तरफ से आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत करने का मौका मिला...

उस कार्यक्रम में एक बाबा जी भी थे जो एक आश्रम चलाते हैं ..आंगन में लावारिस गऊएं, कुत्ते तो रखते ही हैं, साथ में बहुत से पक्षी भी वहां रोज़ाना आ जाते हैं...उन की बातें सुन कर अच्छा लगा। उन्होंने बताया कि कैसे उन के घर के बाहर सीमेंट के डिब्बे जैसे बना रखे हैं...लोगों को कहा कि आप लोग घर में इस्तेमाल होने वाली सब्जियों के छिलके आदि यहां पर फैंक जाया करें, कहने लगें कि लोग ज़्यादा मान नहीं रहे थे, फिर इन्होंने कुछ बार ऐसा कह दिया  कि जो भी ऐसा काम करते हैं उन का शनि सध जाएगा...हंसते हंसते बता रहे थे कि बात फैल गई, बाबा जी कह रहे हैं तो पक्का ऐसा ही होगा. देखते देखते लोगों ने बात मान ली और रोज़ाना उस में छिलके फैंक कर जाने लगे।

उन का बात सुन कर मुझे वही ध्यान आ रहा था ....टी वी पर कुछ वर्ष पहले एक विज्ञापन आया करता था..स्कूली बच्चे मैदान में खेल रहे होते हैं, एक बच्चा कीचड़ में गिर जाता है, बस, उस की सभी बच्चों से दोस्ती हो जाती है ...उस विज्ञापन का थीम यही था...दाग अच्छे हैं।

उसी तरह मुझे हमेशा से यही लगता है कि जो भी आस्थाएं लोगों की इस तरह की हैं कि उस से पर्यावरण को लाभ होता हो, वे सब बहुत अच्छी हैं....मैं जब भी सड़क पर चलते हुए किसी भीमकाय पेड़ पर खूब सारे नीचे पीले धागे बंधे देखता हूं तो मन खुश होता है कि चलो, यह तो बच गया.....इसे कोई न हाथ लगा पाएगा।

कल भी घूमते हुए देखा कि एक घर के बाहर बहुत बड़ा पेड़ है और उस के साथ ही चबूतरा बना दिया गया है....अच्छा लगा, एक मंदिर की शक्ल दे दी गई थी उस चबूतरे को ......ठीक है, लेकिन अगर उसे ऐसे ही खुला छोड़ा जाता तो बेहतर होता जहां पर कोई राहगीर आते जाते दो पल छाया में बैठ जाता ....

हां, एक बात और ...उस कार्यक्रम के बाद बाबा जी बता रहे थे कि आज एक यह बहुत बड़ी समस्या यह भी हो गई है कि फुटपाथों पर टाइलें लगने लगी हैं, हर तरफ, अच्छी बात है, लेकिन इस चक्कर में इन्हें बनाने वाले पेड़ों के आसपास थोड़ी सी भी जगह नहीं छोड़ते ...पेड़ के तने तक टाइलें फिक्स कर देते हैं.....बता रहे थे कि मैं जब भी इस तरह के काम होते देखता हूं तो रूक कर उस काम करने वाले ठेकेदार का नाम पूछता हूं ....बस, इतने से ही वे लोग समझ जाते हैं और पेड़ के आसपास कच्ची जगह छोड़ देते हैं......वे बता रहे थे कि हर पेड़ के आसपास लगभग एक डेढ़ फुट की जगह चाहिए, आप कह सकते हैं उसे सांस लेने के लिए....लेकिन यह जगह पानी के नीचे तक जाने के लिए चाहिए, ठीक है विशाल पेड़ नीचे ज़मीन से पानी लेते हैं लेिकन नीचे पानी के वॉटर स्तर को बरकरार रखने के लिए भी तो कुछ सोचना होगा...



कल मैंने जब देखा यहां लखनऊ के काशी राम मेमोरियल एवं ईको-गार्डन के पास कि किस तरह से पेड़ों के आस पास जगह छोड़ी हुई है तो मुझे अच्छा लगा....लेकिन पता नहीं मैं यह निर्णय नहीं ले पाया कि जिस तरह से इन पेड़ों के आस पास जगह छोड़ी गई है, वह वैज्ञानिक तौर पर भी ठीक है या बस लैंड-स्केपिंग के लिए ही यह सब किया गया है....मुझे पता नहीं क्यों लग रहा था कि यहां पर तो बरसात का पानी तो बस वही पेड़ के आस पास के केचमेंट एरिया में जा पाएगा जो ऊपर से पत्तियों और टहनियों से नीचे गिरेगा.......मुझे ऐसा लगा, अगर आप को कुछ अलग लग रहा हो तो लिखिएगा....बस इतना इत्मीनान है कि चलिए पेड़ों के आसपास उस के फैलने के लिए खाली जगह तो है।


लेकिन अभी मैं थोड़ा ही आगे गया था तो क्या देखा कि एक फुटपाथ पर छोटे छोटे से सजावटी पेड़ तो लगे हुए हैं, लेकिन आप देखिए कि पैदल चलने वाले राहगीरों के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी गई है....आप देखिए इन तस्वीरों में आप को भी इन्हें देख कर बड़ा अजीब लगेगा.......पता नहीं किस इंजीनियर ने इस प्लॉन को बनाया और किस ने इसे स्वीकृत्त किया......देखना होगा, मुझे यही लगा कि अगर प्रदेश की राजधानी में और वह भी इतने पॉश एरिया में इस तरह की People-unfriendly landscaping हो सकती है तो बाकी जगहों की तो बात ही क्या करें....


हां, एक बात तो मैं आप से शेयर करनी भूल ही गया ...जब मैं कल सुबह साईकिल पर घूम रहा था कि मैंने रायबरेली रोड़ पर एक बहुत पॉश कालोनी देखी ...इतनी बढ़िया कॉलोनी कि उस के बीचोबीच एक झील भी थी...और जगह जगह बोर्ड लगे हुए थे ....यह झील आप की है, इस में गंदगी मत फैंकिए...लेकिन झील गायब थी, पानी तो था ही नहीं, जिस तरह से गांव के पोखर, तालाब गायब होते जा रहे हैं, उसी तरह यह झील भी बस नाम की ही झील थी......वैसे इस झील के आसपास एक पक्का फुटपाथ होने की वजह से लोग वहां सुबह टहलते हैं, यह भी बढ़िया है।

गांवों के पोखर-तालाब जिस तरह से गायब होते जा रहे हैं, पशुओं के साथ साथ मानव जाति के लिए भी बड़ी मुश्किल हो गई है...पर्यावरण को तो खराब करने में हम कोई कोर-कसर छोड़ ही नहीं रहे, पहले तालाबों में गर्मी के दिनों में गाए-भैंसे उसी में दोपहर काट लिया करती थीं. ..और उन के बहाने गांव के बच्चों का भी उन की पीठ पर खेलते हुए समय बढ़िया कट जाता था....गर्मी से निजात, खेल कूद और मस्ती .......ऑल इन वन!


अच्छा अभी मुझे भी अपनी साइकिल पर घूमने निकलना है......आप भी टहलने निकलिए......अच्छा लगता है......आप सब को सुप्रभात ....हार्दिक शुभकामनाएं....


इतनी गप्पें हांकता रहता हूं....कभी कभी तो प्रार्थना भी कर लेनी चाहिए....आज कर लें?......साहिब, नज़र रखना, मौला नज़र रखना.....बेहतरीन प्रार्थना........मुझे फिल्मी गीत से कहीं ज़्यादा यह एक भजन लगता है......एक एक शब्द पर ध्यान देते हुए इस में आप भी शामिल हो जाइए...