Friday, October 30, 2015

पाइन एपल, एचआईव्ही और वाट्सएप

सोशल मीडिया से हमें बहुत तरह की जानकारी मिल रही है ..साथ में बहुत सी फालतू जानकारी भी मिल रही है...कुछ अफ़वाहें फैलाती बातें भी दिख जाती हैं...सब कुछ चल रहा है..

ज़ाहिर सी बात है हम लोग सभी विषयों पर सारी जानकारी तो रख नहीं सकते...इसलिए हमें किसी भी बात को शेयर करते समय सचेत रहना चाहिए।

क्लिक कर के इसे पढ़िए..पाईऩएपल- HIV link
आज दोपहर में एक वाट्सएप मैसेज अचानक दिख गया जिस में लिखा था कि किसी १० साल के बालक को किसी पाइन-एपल बेचने वाले दुकानदार से खरीद कर पाईन-एपल खाने से एचआईव्ही संक्रमण हो गया...पूरी कहानी पढ़ी...बिल्कुल हजम नहीं हुई...सोचा कि चलिए कोई बात नहीं, आगे चलते हैं।

लेकिन मन माना नहीं....जो जानकारी हमारे पास है अगर उस के आधार पर हम किसी तरह की भ्रांति का खंडन ही न कर पाएं तो फिर उस जानकारी का क्या फ़ायदा।

बस ऐसे ही लिख दिया कि यह जानकारी भ्रमित करने वाली है....एचआई्व्ही एड्स इस तरह से नहीं फैला करती...उस वाट्सएप ग्रुप के एडमिन सचेत बंधु है...उन्होंने मेरी पोस्ट को उस जगह पर फारवर्ड कर दिया जहां से वह सूचना उन को मिली थी....(उन्होंने तो उस पाइन-एपल वाली बात को बस फारवर्ड ही किया था)..

और उन्होंने गूगल सर्च भी किया ...पाईन-एपल और एड्स का संबंध और इस लिंक को उस ग्रुप पर शेयर किया...उस का लिंक यह रहा (गूगल सर्च परिणामों के पहले परिणाम पर क्लिक कर के इसे आप पढ़ सकते हैं)....मैंने उसे अध्ययन किया तो मुझे पता चला कि यह अफवाह ... तो पिछले १० सालों से फैलाई जा रही है.....दुःख हुआ...पहले कहा जाता था कि किसी एचआईव्ही संक्रमित बंदे से जो पानी पूरी बेचा करता था किसी दूसरे बंदे में (जिसने उस के यहां से पानी-पूरी खाई) एचआईव्ही संक्रमण पहुंच गया...लेकिन ये सब लोगों को गुमराह करने की बातें हैं....आज वाली उस पोस्ट में तो वड़ा-पाव का भी नाम ले दिया गया था।

(Please click  on this picture to read comfortably)
इसी लिंक पर मैडीकल वैज्ञानिकों ने इस बात की साफ़ पुष्टि भी कर दी कि ये सब बेकार की बातें हैं...एचआईव्ही संक्रमण फैलने के कुछ माध्यम हैं....उन के सिवा यह संक्रमण नहीं फैलता...

मुझे ध्यान आया कि मैंने अपने यू-ट्यूब चैनल पर मुंबई में बिक रहे पाईन-एपल की एक वीडियो भी डाली थी...आप भी देखिए...बस, ऐसी ही रिकार्ड किया था क्योंकि वहां पर रेहड़ी वाले पाईन-एपल काटने में खासे एक्सपर्ट हैं...


इस तरह की अफवाह या गलत जानकारी जब जंगल की आग की तरह फैलने लगती है तो लोगों के मन में कुछ भ्रांतियां घर कर लेती हैं जिससे बिना वजह का डर तो पैदा हो ही जाता है ...और इससे संक्रमित व्यक्ति के प्रति भेदभाव भी होने लगता है।

विषय बहुत लंबा है लेकिन बस इसी बात पर इसे समाप्त करते हैं कि हम सब को सचेत रहने की ज़रूरत है....आज का सोशल मीडिया ..विशेषकर वाट्सएप ..इतना पावरफुल मीडियम हम सब के हाथों में आ गया है कि हमारी बात ..अपनी या पीछे से कहीं आई हुई....चंद लम्हों में बहुत दूर निकल जाती है..

बस आज के लिए इस विषय पर इतना ही काफ़ी है...आप को कुछ शेयर करना हो तो इस पोस्ट के नीचे टिप्पणी में जाकर कर सकते हैं ...

 इतनी भारी भरकम बातों से अगर ऊब गये हों तो जाते जाते मेरी पसंद का यह गीत ही सुन लीजिए...

Saturday, October 24, 2015

मेरी मजबूरी समझो....कारड को तार

उस दिन मैं डाकिया डाक लाया वाला गाना सुन रहा था तो उस के लिरिक्स में यह भी आता है ...मेरी मजबूरी समझो..कारड को तार...(कार्ड को कारड कहने का देशी अंदाज़)...

जाने पहचाने लगे ये शब्द जिन्हें अकसर लोग अपने ख़तों में लिख दिया करते थे।

चाहे तार (टेलीग्राम) को यह देश शायद पिछले साल २६ जनवरी वाले दिन विदा कर चुका है...तारीख मुझे अच्छे से याद नहीं है...लेिकन कभी कभी तार पाने और भिजवाने के दिन यूं ही याद आ जाया करते हैं।

मेरी सब से पहली धुंधली सी याद मेरी दादी जी की बीमारी की टेलीग्राम थी...हम लोग तुंरत उन के पास चले गये...कुछ दिन ठहरे मेरे ताऊ जी के यहां...उन की हालत संभली तो हम लोग वापिस आ गये...लेिकन लगभग एक महीने बाद फिर उन के स्वर्गवास होने की ही तार आई ....मन बहुत दुःखी हुआ.

फिर कुछ महीनों में जनवरी १९७५ की २७ जनवरी की सुबह की मनहूस सुबह...मेरे २८ वर्षीय मामा चल बसे....मामूली खांसी जुकाम कुछ दिन हुआ..बिगड़ गया...छाती में जम गया...मोहल्ले के एक डाक्टर ने आकर टीका दिया बलगम सुखाने के लिए...टीका रिएक्शन कर गया...बस, सब कुछ खत्म हो गया। अभी शादी हुए दो तीन साल हुए थे और एक साल की छोटी प्यारी सी बच्ची थी प्रीति। मैं तब १२-१३ साल का रहा होऊंगा।

इस वाली टेलीग्राम की बात याद आई तो मुझे इस के साथ जुड़ी एक बात और याद आ गई....जिसे मैं कभी भी शेयर नहीं करूंगा...लेकिन उस घटना ने भी मेरे बाल मन को बहुत उद्वेलित किया था ...इसीलिए मैं अकसर सोचता हूं कि जिन लेखकों को हम लोग पढ़ते हैं और जो बिंदास हो कर अपनी सभी बातें खुले दिल से साझा कर लेते हैं....वे सब कलमकार मेरे हीरो हैं......सच्चे हीरो.....बड़ा मुश्किल काम होता है यह सब लिखना...आज कल मैं पंजाबी साहित्यकारों की आप बीतीयां नाम से एक किताब पढ़ रहा हूं....उन का लिखा पढ़ कर मैं दंग रह जाता हूं।

बहरहाल, वह दौर था दोस्तो ...जब खुशी, गमी आदि की सूचना पाने और भिजवाने का सब से सुलभ साधन ही तार हुआ करती थी....

लेकिन जैसे ही किसी के दरवाजे पर कोई डाकिया-नुमा बंदा अपनी साईकिल खड़ी कर के टेलीग्राम...टेलीग्राम की आवाज़ देता...तो सच में एक बार तो दिल बैठ ही जाया करता कि अब पता नहीं कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है।
डाकिये को पता तो रहता था कि इस के अंदर कैसी खबर है....अगर खबर बुरी होती तो वह हस्ताक्षर करवाते ही अपनी साईकिल पर पैर रख कर निकल जाता ..लेकिन अगर खुशी की कोई खबर होती ...तो उसे दो पांच रूपये ले कर जाने की चाह होती और उसे यह ईनाम दिया भी जाता।

जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ मैं यह  सोचने लगा कि याह यह दो तीन रूपये में बुक होने वाली तार के लिए डाक विभाग इतना काम करता है....टेक्नीकल काम यानि तार भिजवाने के साथ साथ, एक मुलाजिम तार किसी के घर पहुंचाने के लिए बुक कर दिया जाता है.......मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी अगर यह सब पढ़ेगी तो उसे बहुत हैरानगी होगी....लेिकन केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के बहुत से काम सामाजिक उत्तरदायित्व के दायरे में भी आते हैं...रेल  के द्वितीय श्रेणी के भाड़ों को ही देख लीजिए।

बहरहाल, यह तो हो गई तार को पाने की यादें......तार भिजवाने की भी बहुत सी यादें हैं....हां, एक बात तो मैं कहना भूल ही गया कि पहले बहुत बार ऐसा होता था कि हम लोग अगर घर से बाहर िकसी दूसरे शहर में जा रहे हैं तो वहां पहुंच कर एक तार अपने सकुशल पहुंचने की भी कर दिया करते थे। मैं तो अकसर ऐसा अवश्य कर दिया करता था क्योंिक मेरे पिता जी अकसर चिंता करने लगते थे..और अपनी छुट्टी को आगे बढ़वाने के लिए भी तार का ही सहारा लिया जाता था और ऐसा सुनते हैं कि फौजी भाई इस काम में सब से आगे थे!

हां, एक और याद...आप टेलीग्राम के दफ्तर में पहुंच गये... वहां पर आप को एक फार्म दे दिया जाता था...जिसे आप को भरना होता था....काउंटर पर बैठा बाबू फिर उस के शब्द अपने अनूठे अंदाज़ में गिन कर जब डिक्लेयर किया करता था कि तीन रूपये पचास पैसे....या पांच रूपये तो एक तरह की इत्मीनान हो जाया करता था....इस से पहले तार के फार्म पर टेक्स्ट लिखते समय भी दसवीं कक्षा में पढ़े संक्षिप्त लेखन (precise writing) की एक तरह से रिवीजन हो जाया करती थी।

कोशिश यही रहती थी कि जितने कम शब्दों में पाने वाले का पता लिखा जा सके और जितने कम शब्दों में संदेश भेजा जा सके.....वैसे इस काम की आसानी के लिए तार विभाग ने कुछ संदेश सेट कर रखे थे ...जैसे बधाई वाले, शादी वाले या जन्मदिवस, सालगिरह के समय भेजने वाले संदेश......वही भिजवाने में पैसे कम लगा करते थे। इस की एक लिस्ट इन्होंने टांग रखी होती थी।

एक बात और भी तो थी कि तार बुक करते समय तार बाबू यह ज़रूर पूछा करता था कि आर्डनरी या एक्सप्रेस....और मेरे जैसा बंदा यह भी हर बार ज़रूर पूछा करता था कि आर्डनरी कब पहुंचेगी और एक्सप्रेस कब....और फिर उन पर होने वाले खर्च की जानकारी हासिल कर लिया करते थे और फिर जैसा भी उस समय ध्यान बनता कर लिया करते।

लेकिन फिर १९७० के दशक के अंत में ही शायद कुछ ऐसा हो गया कि शाम को पांच बजे के बाद से सुबह सात-आठ बजे तक (समय अच्छे से ध्यान में नहीं है) ...बुक होने वाली तारें एक्सप्रेस ही बुक की जाने लगीं....यानि के डबल रेट पर....कईं बार लोगों को बहस करते देखा...लेिकन बाबू क्या करे, जो नियम होते हैं सब के लिए एक ही से होते हैं।

उस के बाद बाबू अपने सामने रखी मशीन में वह तार वाला फार्म डाल देता ....और उस में से गड़-गड़ की आवाज के साथ कुछ प्रिंट होता और वह फार्म बाहर निकलता और पतली सी एक रसीद हमें थमा दी जाती।

छोटे शहरों में कईं बार इस के बाद भी जुगाड़ लगाने से लोग बाज़ नहीं आते......अंदर जिस बाबू के पास तारों के ढेरों फार्म पड़े रहते, उस ने जान पहचान निकालते कि बाबू जी, मेरी तार पहले भिजवा दीजिए। लेिकन वे भी बड़े समझदार तरह के सुलझे लोग हुआ करते ....मृत्यु की खबर को सब से ज़्यादा तरजीह दिया करते......बाकी तारें उस के बाद।

तार से जुड़ी एक बात और यह है कि अकसर सरकारी कर्मचारी और विशेषकर फौजी भाई अपने परिवारीजनों  से किसी एमरजैंसी की तार भिजवाने की बात कह दिया करते ...इससे छुट्टी मिलने में आसानी हो जाया करती थी।
तार की बात लिखते लिखते भी जब उस टेलीग्राम की आवाज़ का ध्यान आता है तो उस का खौफ़ रात में दो बजे लेंडलाइन की घंटी बजने से भी कहीं ज़्यादा हुआ करता था....ठीक है अगर खुशी की बात होती....वह तो बाद में पता चलता लेकिन आधी जान तो उस का टेलीग्राम वाला शब्द पहले ही निकाल चुका होता...शायद खुशी भी थोड़ी फीकी पड़ जाती तब तक जब तक सांस में सांस वापिस न आ जाती.....और बहुत बार तो वे जो चंद सैकेंड होते थे ...तार रिसीव करते वक्त ...उस मुलाजिम के कागज़ पर हस्ताक्षर करने वाले वे चंद लम्हे....इतने में घर के दो तीन मैंबर और दो तीन अड़ोस पड़ोस वाले भी साथ ही खड़े हुए मिलते...सुख दुख के सच्चे साथी हुआ करते थे एक तरह से।

और आज की व्यवस्था चाहे आप हर पल सात समुंदर पार वाट्सएप पर सारा दिन तारें भेजते रहिए....तारे पाते रहिए...कितने बजे तार पहुंची कितने बजे किसी ने पढ़ी ...सब कुछ तुरंत जानते जाईए...लेिकन सोचने वाली बात यह है कि इस के अपने फायदे भी हैं, नुकसान भी हैं......आप कहेंगे कि वह तो आधुनिक तकनीक में हर जगह होता ही है.....जी हां, होता है, लेिकन इतना कुछ बेवजह बहुत बार लिखने से....लिखते भी हम कहां हैं अकसर, जो पीछे से आता है आगे ठेल देते हैं, ऐसा ही करते हैं ना, ऐसे में हमारी बातों का वजन कम होता जा रहा है निरंतर......ऐसा मैं समझता हूं....यह हमें निर्णय करना होता है कि क्या शेयर करना है क्या नहीं.....और एक बात उस तार में तो पांच सात शब्द हुआ करते थे ......यहां तो ये भी मजे हैं कि व्हाटसएप रूपी तार में कोई शब्द सीमा तो क्या, पन्नों तक की भी सीमा नहीं है, चाहे तो ऑडियो भिजवा दें या फिर लंबे लंबे वीडियो....बस, सामने वाले के जैसे सब्र का हम लोग इम्तिहान लेने लगते हैं....आप का क्या ख्याल है?




Friday, October 23, 2015

साहित्य अकादमी ने भी कर दी निंदा

अभी अभी मुझे टीवी के टिक्लर पर एक न्यूज़ दिख रही है कि साहित्य अकादमी ने लेखकों की हत्या की निंदा की है और लेखकों को अपने अवार्ड वापिस लेने की अपील की है।

हम पिछले कुछ दिनों से देख रहे हैं कि ये अवार्ड लौटाने की खबरें मीडिया पर छाई रहीं...हर जगह....संपादकीय पन्नों पर रोज़ाना एक दो व्यंग्य भी दिखते रहे, संपादकीय लेख भी ...और दो एक न्यूज़ स्टोरी भी दिखती रहीं।

कोई कहता कि अवार्ड ऐसे कैसे लौटा दिया...पैसे तो वापिस किए नहीं, कोई कह रहा था कि अवार्ड के साथ जो इतनी प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है ..वह कैसे लौटाएंगे....हर भारतीय भाषा में किताब छप जाती है जिसे साहित्य अकादमी अवार्ड मिल गया है....और एक बार ऐसा अवार्ड जिसे मिल जाता है जिस के साथ इतनी प्रतिष्ठा जुड़ी रहती है, उस की वजह से इन लेखकों को बहुत सी कमेटियों के सदस्यों के रूप में विदेश यात्राएं करने का भी अवसर मिल जाता है...ऐसी बहुत सी बातें मुझे पढ़ने सुनने का मौका मिला..

और हां, मुनव्वर राना के नाम पर भी खूब बातें हुईं कि पहले तो इन्होंने अवार्ड वापिस देने वालों के फैसले को ठीक नहीं ठहराया...फिर अपना अवार्ड भी लौटा दिया....फिर कल की ही टाइम्स आफ इंडिया के पहले पन्ने से पता चला कि मुनव्वर राना साहब को प्रधानमंत्री मोदी ने आमंत्रित किया है...

इतने विविध लेख इस विषय पर दिखे .....आखिर हो भी क्यों ना, प्रजातंत्र है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ...

जो भी हो, मुझे तो भई कल के हिन्दुस्तान के पहले पन्ने पर मेरे फेवरेट कवि गोपाल दास नीरज जी की यह बात भा गई...बहुत सटीक बात की उन्होंने.....नीरज जी को यहां लखनऊ में अकसर देखने-सुनने का अवसर मिलता रहता है....उन के दर्शन ही हो जाना हर बार एक आध्यात्मिक अनुभव जैसा....सच...उन की किताबों के पन्ने भी कभी उलट-पलट लेता हूं...ऐसी शख्शियतों की बातें पढ़ सुन कर लगता है कि समाज में लोकमत कैसे बनाया जाता है...


मेरी तरह आप भी नीरज जी की इस बात को हमेशा ध्यान में रखिएगा.

Tuesday, October 20, 2015

संवाद के बदलते आयाम

संवाद की बात चलते ही चालीस-पचास सालों से दिख रही चिट्ठी पत्री की याद आती है ...और इस के साथ अगर यह गीत याद आ आए... फिर तो बात ही क्या है!



मुझे यह गीत बहुत पसंद है..रेडवे पे तो अब यह बजता नहीं, जिस दिन इच्छी होती है यू-ट्यूब पर सुन लेता हूं...वैसे तो इस फिल्म की सी.डी भी है लेिकन उस ढूंढने का सब्र कहां रह गया है!

मुझे यह गीत इसलिए भी अच्छा लगता है क्योंकि इस में उस दौर की सारी कहानी दर्ज कर दी है...हम लोग इस के प्रत्यक्ष गवाह रह चुके हैं। मुझे यह भी याद आया अभी कि गैर-मेडीकल विषय पर मैंने सब से पहले जो लेख लिख कर केन्द्रीय हिंदी निदेशालय को भेजा था ..उस का नाम भी संयोगवश ...डाकिया डाक लाया ही था। यह २०००-०१ की बात होगी...फिर मुझे आसाम के जोरहाट में एक नवलेखक शिविर में जाने का मौका मिला.

बात डाकिये की हो रही थी...हम लोगों ने वह दौर देखा है कि जब कोई भाई-बंधु कहीं गया है तो उस के कुशल-क्षेम पहुंचने का समाचार भी ख़त से आता था....मैंने अपने पिता जी को इस तरह से कैलकुलेट करते देखा .....अच्छा मंगल को यहां से निकला है, बुध को शाम को पहुंचा होगा....गुरू को भी अगर चिट्ठी डाल दी हो तो भी तीन चार दिन तो यहां आने में लगेंगे ही ...इसलिए जब तक एक दिन चिट्ठी पहुंच नहीं जाती थी ऐसे ही मन ही मन में जोड़-तोड़ कर के जैसे तैसे बहला लिया जाता था...हां, आठ दस दिन बाद चिंता सताने लगती थी।

एक बात और यहां दर्ज कर दूं...चिंता करना करवाना भी जैसे रेसिपरोकल ही था....उस जमाने में लोग किसी को खत लिखते थे ..एक...दो ...तीन ...अगर कोई रिस्पांस नहीं आया तो वे भी बिना कुछ कहे किनारा कर लेते थे.....उस बंदे की चिंता खत्म कर के उसे राम भरोसे छोड़ दिया करते थे।

डाक...डाकिया...चिट्ठी-पत्री...खत...बैरंग चिट्ठी ...इतने इतने संस्मरण है कि छोटी मोटी किताब तैयार हो जायेगी.....हां, एक का ध्यान आया...मुझे अच्छे से याद है कि तीसरी चौथी कक्षा में जब मैंने नया नया लिखना सीखा तो मुझे पता चल गया कि बिना टिकट के भी चिट्ठी दूसरे तक पहुंच जाती है....मैं कुछ बार ऐसा भी किया...कापी का पन्ना फाड़ा...उस पर ख़त लिखा और दूसरे पन्ने में उसे लपेट कर उस पर पता लिख कर डाक पेटी के हवाले कर दिया.....मौसी के पास पहुंच जाता था....उसे डबल टिकट के पैसे देने पड़ते थे.......एक बार उन्होंने उलाहना किया तो .यह सिलसिला बंद हो गया।

पिछले ज़माने की बातों को यहीं विराम लगाते हैं...आज का युग देखिए....इंस्टेंट मैसेंजर, स्कापई, व्हाट्सएप ......और भी पता नहीं क्या क्या.....नब्बे के दशक में जब पेजर आया था, हमें तो तब ही इतनी हैरानगी हुई थी।

सोचने वाली बात यह है कि क्या इतने सारे अत्य-आधुनिक यंत्रों से हमारा आपसी संवाद बेहतर हो गया है......मुझे कभी ऐसा नहीं लगा।

बल्कि मैं तो यह समझता हूं कि हम पहले से कहीं अधिक अधीर, उतावले, चिंतातुर....परेशान से होते जा रहे हैं....जैसा कि हमारे बचपन का दौर कि महीने में एक चिट्ठी आ गई और एक चली गई......बस मन शांत हो गया। फिर लैंड-लाइन से रोज़ रोज़ फिजूल की बातें होने लगीं.......मोबाइल ने तो और भी आसान कर दिया ....मिनट मिनट की खबरें इधऱ से उधर होने लगीं....इन सब यंत्रों के बहुत से फायदे तो हैं ही, ये मेरे कहने से ही तो माना जायेगा नहीं लेकिन ये बहुत से फ़साद के कारण भी बनते गये......सहनशीलता ने सब से पिछली सीट ले ली, बस उसी क्षण फैसला हो जाना चाहिए......आर या पार की बात अभी हो जाए!

एसएमएस का दौर भी उसी दौरान चल निकला था.....ठीक है, अपनी बात लिख दी ....और दूसरी तरफ़ से उस का जवाब आ भी गया।

लेकिन जिस तरह से आज के इंस्टेंट मैसेजिंग, व्हाट्सएप का फार्मेट हो गया है, यह कहीं सिर दुःखाने का कारण तो नहीं बन रहा। आप ने मैसेज लिखा...ठीक है लिख दिया....भेज दिया.....एक टिक-मार्क आ गया......लेकिन उसी समय दूसरे तक वह संदेश पहुंच गया तो ठीक है, क्योंकि दूसरा टिक-मार्क आ गया.........वाह जी वाह, इत्मीनान हो गया कि मेरा संदेश पहुंच गया....लेकिन अगर किसी कारण वह दूसरी टिक नहीं दिख रही तो टेंशन कि यार, अभी तक उस के पास पहुंचा क्यों नहीं.....और अगर पहुंच गया और उस टिक का रंग बदला नहीं ..जो यह बताता है कि आप का मैसेज पढ़ लिया गया है...हां, अगर यह रंग बदला नहीं ......तो दूसरी टेंशन कि क्या सब कुछ ठीक ठाक तो होगा, उसने अभी तक मेरे मैसेज को पढ़ा क्यों नहीं......हम कितनी बेवकूफ़ी करने लगे हैं यह सोच कर कि दूसरे बंदे का तो जैसे कोई अपना पर्सनल स्पेस है नहीं.....क्यों नहीं वह स्मार्ट-फोन की तरह इतना स्मार्ट बन जाता कि टॉयलेट में भी इसे साथ ही लेकर जाए! मैं बहुत बार सोचता हूं कि ये हमारी सुविधा के लिए है या फिर हम इस के गुलाम बन चुके हैं।

एक बात और भी तो है...प्राईव्हेसी पर इतना अतिक्रमण कि दूसरे को यह भी दिखता है कि आप पिछली बार कब व्हाट्सएप पर सक्रिय थे ..पूरा टाइम आ जाता है....और अगर किसी व्हाट्सएप ग्रुप में हैं तो और भी सुविधाएं हैं...आप का संदेश किस किस के पास पहुंच गया है और किस किस ने इसे पढ़ लिया है, और अगर आपने कोई वीडियो क्लिप भेजा है तो किन मित्रों ने उसे खोल कर देख लिया है......बाकी, रह क्या जाता है!

हां, तो बात चल रही थी आप ने किसी प्रिय को भेजा वाट्सएप मैसेज (आज कल तो वही है सब से ज़्यादा चलन में)..आप के पास दो टिक के निशान आ गये...लेकिन एक टिक का निशान बदला नहीं ..जो यह इंगित करता है कि उसने आपका लिखा पढ़ लिया है...हां, अगर यह बदला नहीं तो बहुत बार दिमाग़ सटक जाने के लिए काफ़ी है। ओह माई गॉड, क्या हो गया, आखिर हुआ क्या होगा, क्यों नहीं पढ़ा उसने अभी तक यह मैसेज....सब ठीक तो होगा.......कुछ हो तो नहीं गया होगा.......इस तरह के ऊल-जलूल विचार ......फिर तैश में आकर फेसबुक पर देखना कि आखिरी बार वह कब फेसबुक पर देखा गया था......फेसबुक मैसेंजर पर भी कोई ऐसी वैसी स्माईल भेज देते हैं.....वह भी पहुंच गई ....लेिकन उस ने जवाब दिया क्यों नहीं...दिल की धड़कन बढ़ जाती है कि यार, कुछ तो गड़बड़ है।

मतलब हम इतने अधीर हो चुके हैं ...इतना निगेटिव सोच लेते हैं कि हम दूसरे बंदे को बाथरूम में जाते समय भी फोनवा अंदर न ले जाने की आज़ादी देने के लिए राज़ी नहीं हैं...

फिर आगे क्या करें...व्हाट्सएप पर कोई जवाब नहीं, फेसबुक पर नहीं, फिर एक दो एसएमएस भी भेजे जाते हैं....और वहां भी पता चल जाता है कि मेसेज पहुंच गये हैं......तो, ठीक है, थोड़ी जान में जान आई तो कि चलो फोन तो चल रहा है....कहीं न कहीं आशा की किरण दिखती है कि फोनवा ठीक है तो बबुआ भी ठीक ही होगा........लेकिन आप देखिए कि अगर इन में से कोई भी मैसेज उस बंदे के फोन तक पहुंचा नहीं तो क्या हालत होती होगी!

हां जी, कर लिया इंतज़ार लगभग एक घंटा .....कोई रिप्लाई नहीं.......अब तो फोन करना बनता है .......लेिकन यह क्या फोन की घंटी बजती रही .......तीन चार बार......उठा ही नहीं रहा........बस, अब रहा नहीं जाता, भयंकर से ख्याल छोड़ ही नहीं रहे (थैंक्स तो सीआईडी सीरियल ....और उस बंदे का भी जो रोज़ हमें कहता है....चैन से सोना है तो जाग जाइए) ......तब पड़ोस में फोन, काम करने वाली बाई को फोन, सोसायटी के गोरखे को फोन, होस्टल के दूसरे साथियों को फोन, होस्टल के केयर-टेकर को फोन.........बिल्कुल बावलों जैसी हालत....दिमाग की दही तब तक हो चुकी होती है, पसीने से चेहरा तर-बतर.... और भी बहुत कुछ ...  इसी बहाने पेट अच्छे से साफ भी हो जाता है... हा हा हा हा .....!

लेकिन तभी एक घंटी बजती है .......सुस्त सी आवाज़ में दूसरी तरफ़ से आवाज़ आती है........ "है...लो........यार, इतनी मिस्ड काल, फोन साईलेंट पर था......आप लोग भी ना....."

इसलिए अब हम लोग स्मार्ट-फोन इस्तेमाल करने वाले इतने स्मार्ट हो गये हैं कि बैटरी पांच परसेंट होते ही किसी पनवाड़ी से फोन लेकर सूचना दे देते हैं कि मेरी बैटरी कम है .....बस, मैं आधे घंटे तक पहुंच रहा हूं।

वैसे तो आज के युवा यह नौबत भी आने ही नहीं देते वे एक्सट्रा चार्जर भी साथ ही लेकर चलते हैं....चार्जर की चिंता है, लेकिन सोचने वाले बात है कि हम अपनी ज़िंदादिली को कब चार्ज कर पाएंगे, कर भी पाएंगे या नहीं...
अब आप ने इतनी लंबी कथा पढ़ ली ......आप ही फैसला करें कि क्या हम लोग ठीक रास्ते पर चल रहे हैं या मेरी तरह बार बार इन मैसेजों के चक्कर में पड़ कर अपना सिर भारी करवा लिया करते हैं!

हां, एक बात और जिसे मैंने ज़रूर लिखना था ...दुःख तब बहुत ज़्यादा होता है जब आप अपने किसी मित्र को कोई संदेश भेजें, वह उसे तुरंत पढ़ भी ले, लेकिन उस का जवाब न दे........यह बात मन को बहुत कचोटती है, और मेरे जैसा भावुक इंसान तो मन ही मन तो कह भी उठता है.......क्या हासिल इस सोशल मीडिया से ......हम लोग बस अपना उजला पक्ष ही दूसरों के सामने रख पाते हैं......निःसंदेह हम सोशल मीडिया के तो बेताज होते जा रहे हैं लेकिन भावनात्मक स्तर पर हमारा जुड़ाव दिनप्रतिदिन कम होता जा रहा है......निरंतर गिरावट  आ रही है......चलिए, अभी से थोड़ा संभलने का प्रयाय करिए........कैसे?......मैं अधिकतर व्हाट्सएप मैसेज पढ़ता ही नहीं, यार कौन सैंकड़ों मैसेजों में सिर गढ़ाए रखे, कौन सिर दुःखाए, कौन किस रूठे को मनाए........बेकार में ये सब झंझट हैं, जहां तक हो सके अपनी ज़िंदगी को जितना सहज और साधारण बनाए रखेंगे, उतना ही बेहतर है........ज्ञान की चिंता मत करिए जनाब, जितना मुझे और आप को चाहिए, वह हमारे तक यह सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता हमारे तक पहुंचा ही देगी।

आप ने पिछली बार कब किसी बंदे से पूछा कि आप को मोबाइल नंबर क्या है तो उसने कहा कि साहब, हम नहीं रखते यह मोबाइल ........ठीक है, वह मोबाइल नहीं रखता होगा, लेकिन अगली बार उस की सहजता, उस की सादगी और चेहरे के शांत के भाव भी अपने मन में कहीं दर्ज कर लीजिएगा..........ओ हो, ड्यूटी पर जाने का समय आ गया, लेिकन एक विषय तो छुआ ही नहीं, व्टाह्सएप और फेसबुक पर होने वाले तर्क-वितर्क, वाद विवाद ........पता नहीं ज़िंदगी में इन में से किसी को कभी हासिल भी हुआ है या नहीं, लेकिन फिर भी रूस्वाईयां....गिले शिकवे....मैं तो इस से बहुत दूर भागता हूं.....कभी भी किसी बहस में पड़ा ही नहीं, यह मेरा बड़प्पन नहीं है, शायद कायरता होगी या समझी जाती होगी, लेकिन मैं खुश हूं...क्योंकि मुझे लगता है कि किसी से भी बहस करने से सिर तो मेरा ही दुःखेगा.......और मुझे मेरे सिर दर्द से बहुत डर लगता है......आज के लिए इतना ही ज्ञान काफी है, जल्दी से एक गीत ध्यान में आ रहा है, लगाए दे रहा हूं.....

Friday, October 16, 2015

67 की उम्र में 70 किलोमीटर साईक्लिंग

श्रीपाल.. उम्र ६७ वर्ष 
श्रीपाल जी से मिलिए...इन की उम्र है ६७ वर्ष..सेवानिवृत्त हुए सात आठ बरस हो गये हैं...लखनऊ के पास गांव में रहते हैं जो ३५ किलोमीटर की दूरी पर है। आज एक दांत उखड़वाने के लिए पधारे हैं..

मैंने जैसे ही इन का रक्तचाप मापने के लिए कहा तो श्रीपाल ने कहा कि ३५ किलोमीटर साईकिल चला कर आया हूं...उन के कहने का मतलब यही रहा होगा कि जितनी दूर से वह आ रहे हैं ऐसे में शायद रक्तचाप बढ़ा हुआ ही होगा।

लेिकन नहीं रक्त चाप उन का बिल्कुल सामान्य ही निकला..

यह ३५ किलोमीटर साईकिल चलाने वाली बात जब मेरे कानों में पड़ी तो मुझे भी इन के बारे में जानने की उत्सुकता हुई...वैसे तो इन के चेहरे के ओजस को देख कर भी इच्छा तो हो रही थी.

मैंने कहा कि दांत तो आप समझिये आप का उखड़ ही गया, बस आप ज़रा संक्षेप में अपनी दिनचर्या बतलाईए।

श्रीपाल सुबह साढ़े चार बजे जाग जाते हैं, तुरंत टहलने निकल पड़ते हैं और छः बजे लौटते हैं...वापिस लौट कर नहाना धोना और उस के बाद नाश्ता....इसके आगे कुछ नहीं बोले...मैंने सोचा कुछ करते होंगे टाइम-पास के लिए..
हमें बड़ी तलब होती है न यह जानने के लिए कि बंदा टाइम-पास के लिए कर क्या रहा है!....हैरानगी हुई शायद श्रीपाल को मेरी बात से......इतना तो कहा इन्होंने कि क्या करना है! बस ऐसे ही दिन बीत जाता है।

मैंने सोचा टीवी देखते रहते होंगे.....नहीं, टीवी घर में है तो लेकिन ये कभी नहीं देखते... रेडियो है नहीं, अखबार का मैंने पूछना ज़रूरी समझा नहीं। मेरे जैसे लोग लेिकन सुबह सुबह अखबार पढ़ कर जमाने भर की निगेटिविटि अपने अंदर ठूंस लेते हैं ...उस के बाद कुछ और काम करते हैं! यह रहा इस का एक छोटा सा नमूना....मेरे दिन की शुरुआत। वैसे मैंने कल यह पोस्ट लिखी और आज सुबह मैंने भी अखबारें नहीं पढ़ीं...बस, इंगलिश पेपर को पांच दस मिनट के लिए देखा....यकीन मानिए, मुझे बहुत अच्छा लगा....मैंने समय से पहले सब काम निपटा लिए।

इन्हें इस बात का बड़ा दुःख है कि सारे एरिया में जैसे सूखा पड़ा हुआ है ....खेत खाली पड़े हैं, बस बालू वाली हवा चला करती है (जैसे रेगिस्तान में चलती है) ...कुछ काम धंधा है नहीं...इन्हें आर्थिक तौर पर कोई दिक्कत नहीं, पेन्शन आती है..

सेहत के बारे में बताते हैं कि बिना वजह मैं अस्पताल आता नहीं हूं...जब कोई तकलीफ़ ही नहीं है, कभी सिर दर्द तक नहीं हुआ और न ही कभी बुखार आया।

यह आज ही साईकिल पर नहीं आए हैं...जब भी लखनऊ का कोई काम होता है तो साईकिल पर ही आते हैं...बता रहे थे कि आज मैं तो अस्पताल में आठ बजे ही पहुंच गया था...साढ़े पांच बजे सुबह चल पड़ा था और अढ़ाई घंटे लगे आने में..बीच में थोड़ा सुस्ता लेता हूं, पानी पी लेता हूं .......जब १५ साल निरंतर ड्यूटी करने लखनऊ आता था तो यही दूरी डेढ़ घंटे में तय हो जाया करती थी।

आप को श्रीपाल की बात सुन कर कैसा लग रहा है?...हम लोग शहरों में हमेशा किसी न किसी बहाने की फिराक में रहते हैं कि आज टहलने न जाना पड़े या साईकिल न चलाने के लिए सड़कों को या भारी भीड़ को कोस देते हैं लेिकन ये बताते हैं कि सड़क बहुत बढ़िया है.....कोई दिक्कत नहीं है।

श्रीपाल के बारे में पढ़ कर आप को लग तो रहा होगा कि शहर और गांव की ज़िंदगी में अभी भी कितना फ़र्क है, और चाहे सिक्के के दो पहलू होते हैं......फिर भी गांव की ज़िंदगी, वहां की आबो-हवा सेहत के लिए बढ़िया तो है ही .......श्रीपाल का चमकता-दमकता चेहरा इस की गवाही दे रहा है।

मुझे भी इन से प्रेरणा मिली कि शरीर से काम लेना चाहिए......मेरे जैसों का क्या है, हम लोग प्रेरणा बटोरते बटोरते ही ज़िंदगी बिता देंगे ऐसा लगता है.....Ideas don't work unless we do!.......बस, इस तरह की अंग्रेजी की चंद बातें कह लेते हैं .......इससे ज़्यादा कुछ नहीं..

दो चार मिनट उन्होंने अपनी बात सुनाई.....फिर दांत उखड़वा कर चले गये......मैंने जाते समय उन्हें कहा कि आप से मिल कर बहुत अच्छा लगा......आप की जीवनशैली दूसरों के लिए प्रेरणा-स्रोत है।

आप किस सोच में पड़ गये?... विचार करने योग्य बात केवल यही है कि श्रीपाल की जीवनशैली में हमारे लिए क्या संदेश धरा-पड़ा है!



Thursday, October 15, 2015

इन सुर्खियों से दिन की शुरूआत हुई आज

आज जिस अखबार को देख कर मैंने दिन की शुरूआत की थी...उस में ये सुर्खियां थीं....अखबार के नाम से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, वैसे भी अखबार ने वही छापा जो घटित हुआ...अखबार ठहरा समाज का आईना...ऐसे में मैं अपने आप से यह प्रश्न पूछ रहा हूं कि इस तरह से दिन की शुरूआत करना कितना मुनासिब है!.....सोच रहा हूं कि कल से सुबह अखबार नहीं देखा करूंगा....दोपहर-शाम को देखा करेंगे.....सुबह सुबह मूड बड़ा खराब होता है, सारी निगेटिविटि भर जाती है...


























यह सब आज की सुर्खियां थीं....पढ़ते पढ़ते जब कोई थका महसूस करे तो स्फूर्ति लाने के लिए शिलाजीत और जापानी कैप्सूल तो थे ही और साथ में वशीकरण के भी जुगाड़..
ये सब सुर्खियां पाठकों के आगे बहुत सवाल छोड़ कर चली जाती हैं, रोज़ नितप्रतिदिन...