Tuesday, August 5, 2008

डाक्टर क्या करें?...मरीज अपनी जगह सच्चे हैं, वे क्या करें ?

आज मेरे पास एक अधेड़ महिला आई...दांतों का इलाज करवाने के बाद कहने लगी कि मेरे शरीर में बेहद खारिश रहती है..उस के लिये भी मुझे दो-टीके लिख दो...मैंने कहा कि यह तो मेरा फील्ड नहीं है। आप किसी चमड़ी रोग विशेषज्ञ से मिलें.....कहने लगी कि पिछले 15 वर्षों से जगह जगह धक्के खा चुकी हूं। बस, ऐसे ही चल रहा है। कहने लगी कि कुछ समय देसी दवाई की पुड़ियां भी खूब खाई हैं, लेकिन बाद में पता चला कि वह नीम-हकीम तो स्टीरायड्ज़ ही पीस-पीस कर लोगों को खिलाता रहा...जिस की वजह से शरीर फूल गया है। फिर कहने लगी कि उस के बाद मैंने होम्योपैथिक दवाई भी ली, लेकिन मेरी तकलीफ़ दूर नहीं हुई। पीजीआई तक के चमड़ी-रोग विभाग के डाक्टरों को दिखा के आ चुकी हूं। बेहद निराश सी थी।

मैंने उस को इतना ज़रूर समझाना चाहा कि जितने भी इलाज आप ने मेरे को बताये हैं, उन में से जब तक आप चमड़ी-रोग के माहिर डाक्टर की देख-रेख में इलाज करवाती रहीं...वही श्रेष्ट था। मैंने कहा कि मैं भी अगर आप को खारिश बंद करने का कोई टीका लिख भी दूंगा या कोई ट्यूब का नाम लिख कर दे भी दूंगा तो मैं आप का कोई इलाज-विलाज नहीं कर रहा हूं.....बस, आप को कुछ दिनों के लिये कुछ राहत दे रहा हूं ....लेकिन हो सकता है कि उस ट्यूब से आप का रोग दब तो जाये लेकिन कुछ अरसे बाद वह रोग और भी उग्र रूप में सामने आ जाये।
मैंने उसे यह भी बताया कि यह तो आप जान ही गई होंगी कि कुछ चमड़ी-रोगों का ठीक होना इतना आसान भी नहीं होता, ऐसे में अगर आप किसी विशेषज्ञ से सलाह लेकर दवाई या परहेज करती रहेंगी तो कम से कम बीमारी के अंधाधुध फैलने के चांस तो कम होंगे या बिना-वजह ऐसे ही तरह-तरह की दवाईयां खाने या लगाने से जो बुरे प्रभाव शरीर पर होंगे, उन से तो बचे रहेंगे।

सोच रहा हूं कि उस महिला के मन में तो मैंने दो बातें डालने की कोशिश की, लेकिन पता नहीं कितना असर हुआ होगा। लेकिन आजकल मुझे यह ध्यान आने लगा है कि इस तरह से सारा दिन बोलते रहना ही हम जैसे डाक्टरों का कर्म है.....मरीज के ऊपर होने वाले असर रूपी फल का विचार छोड़ दें, क्या ऐसा संभव है ?

मैं और मेरी डाक्टर पत्नी अकसर यह डिस्कशन कर के बहुत फ्रस्टरेटेड होते हैं कि यार, क्या आज कल क्या हो गया है ......मरीज़ों को क्या हो गया है, हमें क्या हो गया है, दवाईयों को क्या हो गया है, ओवर-ऑल सारा सिस्टम ही ऊपर-नीचे हो गया लगता है।

अस्पताल में आम साधारण बीमारियों के मरीज़ों की लंबी लंबी लाइनें लगी होती हैं.....मैं अनेकों बार कहता हूं कि ये छोटी मोटे खांसी-जुकाम के लिये हम लोग मुलैठी चूसने वाले हैं, गरारे करने वाले हैं, शहद-नींबू लेते हैं और शायद ही कोई डाक्टर होगा जो इन छोटे मोटे रोगों के लिये इतने ऐँटीबॉयोटिक वगैरा लेता होगा.......लेकिन.......अब क्या लिखूं ?

8-10 साल के बच्चे आते हैं .....इतने कमज़ोर से....आंखें अंदर धंसी हुईं......मां-बाप ने तीन टॉनिकों की शीशीयां पकड़ी होती हैं कि ये खिलाने के बावजूद भी यह बढ़ नहीं रहा.......बार बार कहना पड़ता है कि बंद करो इस का सारा जंक-फूड् और इसी टॉनिक की शीशीयों की बजाये दाल-रोटी-सब्जी खिलाना शुरू करो।

कुछ दिन पहले मैं एक इंजैक्शन को देख रहा था, जो कि एंकाईलोज़िंग-स्पांडीलाइटिस के एक मरीज़ को लगना था, उस की कीमत देख कर मैं दंग रह गया.....उस की कीमत 42000रूपये( ब्यालीस हज़ार रूपये) थी.....और ऐसे कईं इंजैक्शन इस तरह के मरीज़ों को लगाने पड़ते हैं। मैं सोच रहा था कि ठीक है, हमारा विभाग अपने कर्मचारियों एवं उन के परिवारजनों को इस तरह की सुविधा उपलब्ध करवाता है, लेकिन बाहर, प्राइवेट ज़्यादातर लोग इस तरह का इलाज कहां करवा पाते होंगे !!

समस्या बहुत विषम है.....इलाज इतना महंगा है कि ज़्यादातर लोगों की पहुंच से बाहर है। समस्या इस लिये भी विकट है कि बहुत से लोग तो उपर्युक्त डाक्टर तक पहुंच ही नहीं पाते और अगर पहुंच भी जाते हैं तो इलाज करवाना इतना महंगा है कि पूरा करवा ही नहीं पाते !!

लिखते लिखते लगने लगा है कि इस विषय पर तो मेरे पास ऐसे ऐसे अनुभव हैं कि मैं एक अच्छी खासी किताब लिख सकता हूं। वही बात है कि डाक्टर आखिर क्या करें ?...और मरीज़ अपनी जगह पर ठीक हैं कि वे क्या करें ?
बाकी अनुभव फिर कभी बांट लेंगे लेकिन अपने इतने लंबे अनुभव का निचोड़ कुछ ही पंक्तियों में रखना चाह रहा हूं.......ज़्यादातर बीमारियों ( 80फीसदी से भी ज़्यादा) का संबंध हमारी जीवन-शैली से है। हमें अपना खान-पीन ठीक ठाक रखना चाहिये, सभी तरह के व्यसनों से दूर रहना चाहिये, शारीरिक कसरत नियमित करनी चाहिये और प्रतिदिन प्राणायाम् करना चाहिये।

पता नहीं ऐसा लिख के मैं ठीक कर रहा हूं कि नहीं, लेकिन आज लिख ही देता हूं कि मेरे लिये तो डाक्टरी पेशा एक बहुत ज़्यादा फ्रस्टरेटिंग एक्सपीरियंस है.....क्या यार, ज़्यादातर बीमारियों क्रॉनिक होती हैं....उस में हमारी दवाईयों ने केवल बीमारी के लक्षणों को दबाना मात्र होता है, मैंने तो यही देखा है कि कोई कुछ भी दावा कर ले जब तक लाइफ-स्टाइल में बदलाव नहीं किया जाता, कुछ भी....बिलकुल कुछ भी ...होना संभव ही नहीं है (इस से संबंधित मेरी एक पोस्ट के लिये यहां क्लिक कीजिये)

अकसर सोचता हूं कि कोई मरीज अगर गुर्दे फेल होने से या लिवर फेल होने से ऑफ हो गया.....तो हम ने उसे उस हालत तक पहुंचने से रोकने के लिये क्या किया ....हम ने उन बीमारियों से बचाव के उपायों को कितनी हद तक इस्तेमाल किया। हां, वो बात दूसरी है कि इन क्रॉनिक रोगों में तो मरीज़ का भी काफी रोल रहता ही है, लेकिन वही बात है कि उस को जागरूक करने का काम क्या सारे समाज का नहीं है ?

पता नहीं, मैंने इस में क्या लिखा है, क्या नहीं लिखा है.....लेकिन कुछ तो हल्का महसूस कर रहा हूं। मैं तो अपने अटैंडैंट से मज़ाक कर रहा था कि यार, हम लोग रिटायर हो कर किसी बड़े से हस्पताल के बारे एक तंबू गाड़ कर डेरा जमा लेंगे.....धूनी रमायेंगे, हस्पताल से बाहर आ रहे निराश लोगों को खूब सारे आशीर्वाद दिया करेंगे....... और उन्हें बीमारियों के बारे में जागरूक किया करेंगे.....तंबाकू, दारू उन का छुड़वाया करेंगे।

इतना सब कुछ लिखने के बावजूद यही कहना चाह रहा हूं कि एक्अूट बीमारियों के लिये तो चलो आज की आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ठीक है, डायग्नोस्टिक टैस्ट बहुत उम्दा चल पड़े हैं.......लेकिन पुरानी बीमारियों के समाधान के लिये और अपनी इम्यूनिटी को परफैक्ट रखने के लिये तो बाबा रामदेव की शरण में जाना ही होगा। इसीलिये मैं सोच रहा हूं कि बाबा को तो मैडीकल फील्ड का नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिेये जिस ने योग क्रिया एवं प्राणायाम् को इतना लोकप्रिय बना दिया कि बाबा के नाम का डंका पश्चिमी देशों में भी बजने लगा है।