शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

डाक्टर के चेंबर की एम्बिऐंस

कभी कभी हमें जब पुराने दौर के लोग यकायक याद आते हैं तो उन के साथ एक ज़माना याद आ जाता है ....

कुछ दिन पहले मुझे किसी ने कहा कि उनके यहां जो डाक्टर है न ..दिल्ली में ... उसने अपने सारे कमरे को अपनी डिग्रीयों, प्रशंसा पत्रों और यहां तक कि जितनी कांफ्रेंसों में वह जा चुका है वहां से मिले सर्टिफिकेटों को सजा रखा है? ....मुझे उस बंदे का बात सुनते ही बड़ी हैरानी सी हुई, मन ही मन मैंने सोचा कि इसे सजा रखा कहते हैं....मेरे नज़र में तो इसे कहेंगे बेचारे ने अपना जीना ही दूभर कर रखा है..

ऐसे ही मुझे याद आया कि कुछ साल पहले - यही कोई चार पांच साल पहले की बात होगी- तब हम लोग टीवी देखा करते थे...एक बार किसी बहुत बड़े आर्मी के डाक्टर की कोई ब्रीफ सी इंटरव्यू दिखी - इंटरव्यू में उसने क्या कहा, उस तरफ़ तो कुछ ध्यान नहीं गया, ट्राफियों, शील्डों से खचाखच भरे उस के कमरे को तकते ही सिर दुखने लगा था...कोई कोना ऐसा न था जिसे बंदे ने छोड़ दिया हो ...हर तरफ़ यही सब फ्रेमों में लटका रखा था...शेल्फों पे सजा रखा था...

1997 की बात है ...छोटे बेटे का जन्म अभी न हुआ था... यही कुछ दो चार दिन ही बाकी थे...महिला रोग विशेषज्ञ को कुछ संदेह हुआ होगा...उन्होंने ग्रांट रोड में एक अल्ट्रासाउंड क्लिनिक में भेजा...ज़ाहिर सी बात है हम बहुत टेंशन में थे...होता ही है...लेकिन आज भी याद है कि जब उस के क्लिनिक के वेटिंग एरिया मे एक पोस्टर को देखा तो जैसे कहते हैं न मन ठहर सा गया...मन की सुकून मिल गया...मैंने तो उसे बार बार पढ़ा...मिसिज़ तो अंदर चली गईं...लेेकिन मैं जितनी बार भी उसे पढ़ रहा था मुझे अच्छा लग रहा था, उस में लिखे अल्फ़ाज़ हमेशा मेरे साथ रह गए....वहां टंगे एक साधारण से पोस्टर पर (जो पहले कागज़ के न आते थे, जिन्हें फ्रेम करवा लिया जाता था...) यह लिखा था...Seek the will of God, nothing more, nothing less, nothing else! 

उस दिन पढ़ी यह बात कहीं न कहीं हमारी मोटी बुद्धि में भी घर कर ही गई 😎

बात है भी तो कितनी बढ़िया, होता तो वही है मंज़ूरेख़ुदा होता है ....बाकी तो हम जितना मर्ज़ी हाथ पांव मार लेते हैं...ये बातें हमने प्रत्यक्ष रूप से देखी हैं अनेकों बार...यह क्या मैंंने एक उर्दू लफ़्ज़ लिख दिया..मंज़ूरेख़ुदा- कोई बवाल न उठ जाए...ये जो नया फितूर हम लोगों के दिलो-दिमाग पर चढ़ गया है न ...उर्दू लिखने से हिंदुत्व कम न हो जाए, इस के बारे में भी बहुत से विचार आ रहे हैं जब से फैबइंडिया ने अपनी फेस्टिवल रेंज को लॉंच करते वक्त लिख दिया जश्ने-रिवाज़ ....एक दम ट्विटर पर तो जैसे बवाल उठ गया कि ये क्या है। इस वक्त इस मज़मून के बारे में लिखना मुनासिब नहीं है, इस पर बाद में बात करेंगे कभी..लेकिन करेंगे ज़रूर...

मैं जब किसी डाक्टर के कमरे मे जाता हूं और अगर वहां पर किसी तरह की न तो फोटो ही होती है...हमारे लाखों-करोड़ों देवी-देवताओं में से भी किसी की नहीं, और न ही कोई शील्डें, ट्राफीयां.....बस, डाक्टर का मुस्कुराता हुआ चेहरा ही दिखता है ...तो मुझे बहुत अच्छा लगता है...सोचने वाली बात है कि जब कोई मरीज़ भी किसी डाक्टर के पास जाता है तो  उसे इस के अलावा चाहिए भी क्या! बिल्कुल कुछ नहीं...

लिखते लिखते ख़्याल आया है कि कहीं पढ़ने वाले यही न सोच लें कि मैं यह सब इसलिए तो नहीं लिख रहा हूं कि मेरे पास कमरे में टांगने के लिए कुछ न होगा...चलिए, छोटा मुंह और बड़ी बात कर ही लेते हैं थोड़ी सी ..हमें भी 60 बरस तक पहुंचते पहुंचते इतना कुछ तो हासिल हो ही गया है कि पूरा कमरा हम भी आसानी से भर सकते हैं...डिग्रीयां ही इतनी हैं, अवार्ड इतने हैं (जिन के बारे में हमने किसी को बताया भी नहीं कभी)...यह काम हम भी कर सकते हैं...लेकिन हमें इन सब का डिस्पले करने में बहुत लज्जा आती है...(मेरे जैसे इंसान को आनी तो नहीं चाहिए, लेकिन यह बीमारी पता नहीं कहां से लग गई ....) इसलिए सब कुछ एक अल्मारी के किसी कोने में छिपा कर रखते हैं...कईं बार चोरी भी हो जाती है ...1989 में मुझे यहीं बंबई में हाटेल पाम-ग्रोव में फेडरेशन ऑफ आप्रेटिव डेंटिस्ट्री ऑफ इंडिया की काँफ्रेस में बेस्ट-पेपर अवार्ड मिला था...पहली बार ...बहुत बड़ा कप था..लेकिन वह कप ही कोई चुरा कर ले गया....बाद में मुझे हंसी भी आती है जब सोचता हूं कि शायद उसे भी पता होगा कि मुझे इन सब चीज़ों को सजाने का कोई शौक नहीं है, इसलिए वह मेरा भार हल्का कर गया....एक मज़ेदार बात बताऊं...वह कप बहुत बड़ा था, मुझे लगा चांदी का है, होगा कई हज़ारों का...मैं कुछ दिनों बाद उसे एक ज्यूलर-शाप में दिखाने भी गया (बेचने नहीं, बस दिखाने ही 😎)- वहां पता चला कि यह चांदी-वांदी कुछ नहीं है ...लेकिन उन दिनों मेरे लिए इसे हासिल करना ही बहुत बड़ा सम्मान था, अखबारों में ख़बर भी आई थी...

अपना राग अलापना कुछ ज़्यादा ही न हो जाए....लेकिन अपने बारे में इतना ही कहूंगा कि थोथा चना बाजे घना...इस के आगे कुछ नहीं...सोचने वाली बात यह भी है कि अगर हम सच में तीस मार खां हैं, डाक्टरी की बहुत सी किताबें पढ़ी हैं, मरीज़ों को ठीक किया है, तो यह समझ लीजिए कि मरीज़ भी इतने अनाड़ी नहीं हैं, वे यह सब कुछ सुन कर ही आ रहे हैं हमारे पास....अगर हमारे पास हुनर है तो हमें अपने कमरों में, अपने वेटिंग रूम में इतना कुछ डिस्पले करने की कुछ भी ज़रूरत नहीं है, और अगर मेरे जैसे बंदे के पल्ले कुछ भी नहीं है तो मेरी सैंकड़ों, ट्राफियों की पोल मरीज़ के सामने चार दिन में खुल जाएगी...यकीन मानिए, यही होता है ...लेकिन हम समझते नहीं, हमारी दिक्कत यही है कि हम समझते हैं कि हम अपने आप को ही स्मार्ट समझते हैं, मरीज़ को कुछ नहीं पता ऐसा लगता है हमें, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, अनपढ़ मरीज़ भी दुनिया की पढ़ाई अच्छे से किया हुआ है...वह ऐसे ही अपना शरीर डाक्टर के  सुपुर्द नहीं कर रहा ...ज़्यादातर तो वह सोच-विचार कर के ही आप तक पहुंचता है...

हां, कुछ एक्सेपशन्ज़ हैं. जैसे बच्चे के डाक्टरों के यहां कुछ ऐसा रखा हो, कुछ ऐसा टंगा हो...जैसा भी शिशुरोग विशेषज्ञ चाहें, तो बच्चों का मन लगा रहता है, उन को बिंदास और खुश देखकर  साथ उन के मां-बाप भी बच्चे की तकलीफ़ तो भूल ही जाते हैं, कुछ ही समय के लिए ही सही तो भी काफ़ी है ....क्योंकि बाकी तकलीफ़ अंदर बैठा कोई डाक्टर आर के आनंद जैसा शिशु रोग विशेषज्ञ दूर कर देगा। जी हां, हमें 23-24 साल पहले की इस डाक्टर की बड़ी ख़ुशनुमा यादे हैं...मैं किसी से भी बहुत कम इंप्रेस होता हूं..इसे नखरा कहें या कुछ कहें ..लेकिन एक बार होता हूं तो फिर ताउम्र उस का कायल रहता हूं...हम छोटे बेटे को इन के पास लेकर जाते रहे ...नियमित जांच के लिए ...वह कहते हैं न कुछ कुछ महीने बाद बच्चों के डाक्टर के पास शिशु के लेकर जाना चाहिए..इन का क्लिनिक इतना शांत और ये डाक्टर साहब और इन की मैडम डबल शांत....बच्चा तो बच्चा, उस के मां-बाप भी उस की बीमारी भूल जाएं...इतनी चोटी का डाक्टर होते हुए भी इतनी हलीमी, आंखों से झलकता कंसर्न....क्या कहें, कुछ लोग होते ही ऐसे हैं....लेकिन जो बात मैं कहना चाह रहा हूं वह यही कि पूरे क्लिनिक में एक भी पोस्टर नहीं, एक भी बाबा-फाबा की कोई तस्वीर नहीं ....कहीं किसी डिग्री या किसी अवार्ड की कोई नुमाइश नहीं....बस, इन के बारे में फिर कभी डिटेल में बात करूंगा...अभी डा आनंद को इस वक्त थैंक-यू-फॉर एवरीथिंग कह कर इन से रूख्सत होते हैं... 

अब आप को लेकर चलते हैं पंजाब में एक जगह ...शहर नहीं बताऊंगा ...न ही डाक्टर कौन था....वैसे पता मुझे भी नहीं, बिलकुल सुनी सुनाई बाते हैं, कहीं से सुन ही रखा होगा...रिटायरमैंट के बाद कुछ रह गए हिसाब चुकता करने हैं, तब इन बातों को ठीक से पता करूंगा ...तो सुनिए जनाब बीस साल पहले एक डाक्टर के बारे में सुना करते थे जिसने अपने कमरे में दुनिया भर के देवी-देवताओं की तस्वीरें, अपने दोनों हाथों की दसों उंगलियों में दस तरह के नगीने, नग, स्टोन (जो भी आप कहें, मुझे में कभी इन में कोई रूचि रही नहीं) ...हमें तो एक अंगूठी पहनना भी गले की फांस जैसा लगता है...और हां, यही नहीं, हाथों पर तरह तरह के धागे, माथे पर टीका..सुनते हैं कमबख़्त घोर पाखंडी था या है, कमरे में धूप, ज्योति, अगरबत्ती....लेकिन उस का काम करने का तरीका था एकदम शर्मनाक..बिना पैसा लिए किसी का कोई भी काम न करता था...एक तरह से बिकाऊ था, यही कहना मुझे मुनासिब लगता है...सुबह सुबह निगेटिव लोगों से न तो बात करना चाहिए और न ही इन का ख़्याल ही करना चाहिए, सारे दिन की वाट लग जाती है....रिटायरमेंटी के बाद फ़ुर्सत में लिखने के लिए मोमायर्ज़ के लिए भी तो कुछ मसाला और किरदार चाहिए...उस दौरान भी तो टाइम-पास का कोई ज़रिया चाहिए, वरना तो पगला जाने के पूरे चांस हैं, क्योंकि दिमाग में ठूंस ही इतना कुछ रखा है 😎...लेकिन मैं इतना ज़रूर कहता हूं कि मैं लिखूं चाहे कितना भी खराब, व्याकरण के नज़रिए से या लिटरेचर के तयशुदा मापदंडों के नज़रिए से भी , लेकिन लिखता मैं हमेशा सच ही हूं....वरना झूठ बात कहने से जो आत्मग्लानि होती है, वह मेरा सिर दुखा देती है ...जो फिर सारा दिन ठीक नहीं होता, बिना डिस्प्रिन की एक गोली खाए।

एक ज़माना बीत गया ...हरियाणा में एक महिला रोग विशेषज्ञ के अस्पताल में दो-तीन बार जाने का मौका मिला ...लेकिन यह क्या, यह तो यार मेडीकल कालेज के अनॉटमी डिपार्टमैंट का म्यूज़ियम दिखाई पड़ रहा था, हर तरफ़ बड़े बड़े मर्तबानों में बड़ी बडी़ रसौलियों, ट्यूमरों आदि के स्पैसीमेन और साथ में टंगी हुई ऐसी ही ख़तरनाक तस्वीरें....आसपास बैठे बीसियों मरीज़, वे भी ज़्यादातर आस पास के गांव वाले...सोचने वाली बात यह है कि इन सब को देख कर उन सब के मन में क्या ख्याल आते होंगे...अनुमान लगाइए....वैसे तो अनुमान भी क्या लगाना है, बात तय है कि इन्हें देख कर उन के मन में डर, खौफ़ का भाव ही पैदा होता होगा....और क्या...। एक बार मैं अपने आप को रोक नहीं पाया ...वो कहते हैं न मुझे खामखां की तरह दूसरों के झमेलों में पड़ने की पुरानी आदत है ...मैने उस डाक्टर साहिबा को बेहद शालीनता से, विनम्रता से अपने मन की बात कह दी ....मैम ने सुन तो ली, पता नहीं उस का कुछ असर हुआ भी कि नहीं। 

जिस सामाजिक परिवेश में लोग ़डाक्टर के सफेद कोट को देख कर अपना ब्लड-प्रैशर 10-20 प्वाईंट बढ़ा लेते हों, उन्हें क्या इतने बड़े बडे़ मर्तबान  मानसिक तौर पर प्रताडि़त न करते होंगे...ज़रूर करते होंगे...

अधिकतर मरीज़ हमारे पास हमेशा नहीं आते....कुछ तो चंद मिनट के लिए आते हैं, फिर कभी उन का आना हो ही नहीं पाता...विभिन्न कारणों की वजह से ...लेकिन वे अपनी यादें तो छोड़ ही जाते हैं...हमारा बहुत कुछ भी साथ ले कर चले जाते हैं.....हमारे कमरे का माहौल, हमारे स्टॉफ का बर्ताव, हमारी बोलचाल, हमारा दोस्ताना रवैया....और हां, हमारा नुस्खा भी .....(दर्द से बेहाल, परेशान, फटेहाल उसे हमारी उपलब्धियों को निहारने की फ़ुर्सत कहां...) ....मुझे इस पोस्ट के अंत तक पहुंचते पहुंचते यही लगने लगा है कि मैने कुछ ज़्यादा ही आईडियल चीज़ें लिख दी हैं...लेकिन वह भी ठीक है, कम से कम हम उन की तरफ़ ताकते रह सकते हैं जैसे हम एक अरसा पहला उस अल्ट्रा-साउंड के माहिर डाक्टर के वेटिंग रूम में बैठे एक साधारण सी बात को ताकते-पढ़ते रह गए थे और वह बात हमारे अंदर भी कहीं न कहीं घर कर गई...

जाते जाते एक मशविरा और...डाक्टर एक से एक बढ़ कर हैं, कोई किसी से कम नहीं...लेकिन फिर भी इस वाट्सएपिया दौर में मरीज़ों की प्राईव्हेसी और देखने वालों के मानसिक स्तर को देखते हुए तस्वीरें वही शेयर करें जिन्हें देखने वाले झेल पाएं.....बहुत बार सुना है कि डाक्टर अपने मरीज़ों को भी अपने सर्जीकल कारनामों की फोटो फारवर्ड कर देते हैं.....लेकिन क्या यह इमेज बिल्डिंग है, या मरीज़ों की मोरल-बूस्टिंग है......नहीं, यार, कुछ नहीं है यह, सिवाए उसे डराने के। 

अब इतनी सारी भारी-भरकम बोरिंग बातें कर के, इतना फालतू ज्ञान बांटने के बाद मेरे लिए अगला मुद्दा है ...अपने माइंड को फ्रेश करने का ....जिसके लिए मुझे इस वक्त मेरे दौर के इस गीत के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा ....जिसे मैं अब कईं बार सुन कर ही दम लूंगा....आप भी सुन लीजिए, गुज़रे दिनों की यादों के समंदर में गोते लगाने का थोड़ा तो लुत्फ़ लीजिए...


मेरे ख़्याल में डाक्टर का कमरे की दीवारें बिल्कुल खाली होनी चाहिएं...अगर किसी हंसते-खिलखिलाते बच्चे या किसी खूबसूरत कुदरती नज़ारे की तस्वीर हो तो टांग दें...हंसते खिलखिलाते बच्चों की तस्वीरें सब से बढ़िया स्ट्रैस-बस्टर होती हैं...अब वह दौर भी गुज़र गया जब एक नर्स की फोटो वेटिंग एरिया में डाक्टर टांग देते थे जिस में उसने अपने मुंह पर उंगली रखी हुई है और ऩीचे लिखा हुआ है...बातचीत मत करें। मरीज़ों बेचारों की तो वैसे ही बोलती बंद हुई होती है, उन्हें इस तरह के रिमांइडर देना भी मुझे तो मुनासिब नहीं लगता...बाकी देश आज़ाद है, सब का अपना अपना नज़रिया और उसे ज़ाहिर करने का भी सब को पूरा पूरा हक़ है, जिस का मैंने अभी अभी इस्तेमाल किया 😄

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

महालक्ष्मी रेस-कोर्स का वॉकिंग-ट्रैक

मुंबई के महालक्ष्मी लोकल स्टेशन से ऊपर आकर इधर-उधर थोड़ा नज़रें दौडाएं तो फ़ौरन महसूस हो जाता है कि इस के आस पास सारा फ़लक ही कितना बदल चुका है...हर तरफ़ गगनचुंबी इमारतें जो बीस साल पहले न थीं...हर तरफ़ आकाश निर्बाध दिख जाया करता था..लेकिन आकाश ही क्यों, कुछ तो ज़मीन भी बदल गई - स्टेशन से थोड़ी ही दूरी पर पास ही जो महालक्ष्मी प्रिंटिंग प्रैस हुआ करती थी, अब उस की जगह एक खंडहर है ...मैं ेएक साल पहले साईकिल चलाता हुआ एक दिन सुबह उधर निकल गया था...मुझे नहीं पता अब वह ढह गई या वैसे ही पड़ी है...

मुंबई में रहते हुए कुछ साल बीत गये होंगे जब 1995 या उस के एक दो साल बाद यह मालूम हुआ कि रेस-कोर्स में घोड़े ही नहीं दौड़ते, लोग सुबह-शाम टहलते भी हैं...बॉम्बे सेंट्रल में जहां रहते थे वहां से 12 वें माले से रेस-कोर्स की हरियाली नज़र आती
थी...बारिश के दिनों में उधर देखना ही कितना सुखद हुआ करता था...

मुंबई वासियों के कभी न हार मानने के इसी जज़्बे पर मैं फ़िदा हूं....जीवन चलने का नाम...घुटनों की ऐसी की तैसी...चलेंगे कैसे नहीं 😄😎!


एक बार जब पता चला कि रेस-कोर्स में सुबह टहलने भी जाया जा सकता है...तो मैं कईं बार सुबह सुबह या कभी शाम के वक्त उधर निकल जाया करता। ज़्यादातर तो स्कूटर पर ही चला जाता, कभी कभी ट्रेन तक महालक्ष्मी और वहां से पैदल चल कर रेस-कोर्स तक जाने में 10 मिनट लगते थे..वहां जाकर कर दो चक्कर लगाता ...शायद पौने दो किलोमीटर का वॉकिंग ट्रैक है ...अच्छा तो लगता ही है जब हम सुबह -सवेरे इन हरी भरी जगहों पर जा पहुंचते हैं...एक तो क़ुदरत की अनुपम छटा, ठंड़ी ठंडी हवा के झोंके ...और उस वक्त मेरा नया नया खरीदा हुआ सोनी का वॉकमैन ...

उन्हीं दिनों हाजी हली के सामने हीरा-पन्ना कम्पलेक्स से 1500 सौ रूपये में सोनी का एक वॉकमैन खरीदा था....जब भी मैं इधर टहलने आता -सुबह या शाम कभी भी ...तो यह मेरा बढ़िया साथी हुआ करता था...उसे मैं वेस्ट-पाउच पर दो कैसटों के साथ टांग लेता और टहलते हुए दिल तो पागल है (गाना सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करिए),  दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे, और एक फिल्म थी अब ध्य़ान में नहीं.....लेकिन यह जो दिल तो पागल है वाली कैसेट थी न, इस की तो ए और बी साइड को बदल बदल कर सैंकड़ों बार उस के गाने सुन कर भी दिल न भरता था...






सैंकड़ों बच्चों को एक साथ फुटबाल खेलते देख कर अच्छा लगा....



इन बाज़ों के दिल में क्या चल रहा है, मैं यह समझ नहीं पाया....

सोचा मैं एक सेल्फी ही ले लूं...


अभी कुछ दिन पहले भी एक दिन रविवार की सुबह उसी रेस-कोर्स में लगभग बीस बरसों बाद जाने का मौका मिला ... वहां तो ऐसे लग रहा था जैसे मेला लगा हुआ हो कोई...बहुत से लोग आए हुए थे...हां, मुझे याद आया जब मैं 1990 के दशक की बात करता हूं तो तब मोबाइल फोन भी न थे, शायद किसी किसी के पास पेजर वेजर दिखने लगे थे। मुझे याद है उन दिनों एक्ट्रेस नादिरा, बिंदु और सतीश शाह अकसर वहां पर सुबह या सवेरे टहलते दिखते थे...नादिरा और बिंदु तो साथ में आती थीं और हमेशा गुफ़्तगू में मशगूल दिखतीं ...हंसती-मुस्कुराती हुई। कुछ दिन पहले जब हम वहां थे तो एम्एच्ओर राइडर्स क्लब में कंगना रानौत घुड़सवारी करती दिख गई ..देख कर अच्छा लगा कि कुछ लोगों पर अपने शौक पूरे कर लेने की धुन अच्छी सवार होती है ....अभी सीख रही है घुड़सवारी...उसी वक्त मेरा ख़्याल उस वॉयरल वीडियो की तरफ़ गया जिसमें वह एक डम्मी-घोड़े पर सरपट भागी जा रही है....लेकिन उसने लगता है कि ठान लिया कि अब तो मैं झांसी की रानी की तरह घोड़े पर सरपट भाग कर ही दम लूंगी....बहुत अच्छे, ऐसा ही जज़्बा दरकार है कुछ भी करने के लिए।

रेस-कोर्स में एक वाकिंग टैक है जो सुबह चार घंटे और शाम को शायद तीन घंटे तक खुला रहता है ...शाम को शायद चार से सात बजे तक और सुबह पांच से नौ बजे तक ....इसे ऑनलाइन चैक कर लीजिए ..वहां पर भी बोर्ड लगा हुआ है। मुझे अभी लिखते हुए ख़्याल आ रहा है कि अभी तो लंबे समय से रेसिंग बंद है ...लेकिन बीस साल पहले जिन दिनों में मैं वहां जाता था, कईं दिनों वाकिंग ट्रैक के साथ वाले ट्रैक में जॉकी घोड़ों पर रेस की तैयारी करते भी दिखते थे...एक दम दुबले-पतले से लड़के घोड़ों पर चढ़े हुए और हवा से बातें करते हुए....पंजाबीयों में तो सेहत की निशानियां यह तो रही ही हैं...गालों और पेट का बाहर निकला हुआ होना...मैंने एक बार ऐसे ही जॉकीयों का ज़िक़ करते हुए यही दुबले-पतले लफ़्ज़ का इस्तेमाल कर दिया ...जिस के सामने कहा था, उसने मुझे इतना ही कहा कि तुम्हें उन के फिटनेस लेवल का कुछ इल्म है कि वे अपनी फिटनैस के लिए और अपने वज़न को एक किलो भी इधर-उधर न होने दोने के लिए क्या क्या करते हैं...ये जॉकी करोड़पति भी हैं जिन की फिटनेस के ऊपर रेस के घोड़ों की जीत हार मुन्हसिर होती है...

लिखते लिखते कल वाट्सएप पर हासिल हुई इस वीडियो का ख्याल आ गया...

मैं तो अब महालक्ष्मी रेस-कोर्स से काफ़ी दूर रहता हूं और टहलने के लिए वहां जाना मेरे लिए संभव नहीं है, लेकिन जो दोस्त पास ही में रहते हैं ...उन्हें वहां जाने का मशविरा ज़रूर दे सकता हूं...शायद जाते भी हों, लेकिन यहां वाट्सएप के आंकड़ों के आगे बात ही कहां हो पाती है किसी से। सुबह शाम टहलने के लिए अच्छी जगह तो है ही ....जिस दिन मैं वहां गया मुझे वहां टहलते हुए बड़ी बड़ी गगनचुंबी इमारतें देख कर यही लग रहा था जैसे मैं न्यू-यार्क के किसी नेबरहुड में हूं ...सूरज देवता उदय हो रहे थे तो जब हमें उस उदय हो रहे सूरज की सतरंगी, अनुपनम छटा के अच्छे से दीदार न हो पा रहे थे तो एक बार तो लगा कि ये स्काईस्क्रेपर जैसे यहां टहलने आए लोगों के हिस्से का सूरज भी हड़प लेने की फ़िराक में हों...लेकिन वो अपनी बॉलकनी में चाय की चुस्कीयां लेते सोचते होंगे कि हमें हमारे हिस्से की हरी-भरी जमीन, समंदर तो मयस्सर हुआ ...

वहां टहलते हुए भी वाट्सएप ने पीछा न छोड़ा ... एक इश्तिहार दिख गया...उस का मतलब क्या है, बेटे ने बता तो दिया लेकिन मुझे उस फीचर में कुछ ज़्यादा दिलचस्पी लगी नहीं...क्या एक बार और क्या अनेक बार ....जब कहीं पर कोई फोटो शेयर कर ही दी तो वह आप के हाथ से तो गई ...कोई उसी वक्त स्क्रीन-शॉट ले ले या दूसरे कैमरे से फोटो खींच ले और आप बिला वजह ख़ुशफ़हमी में रहिए कि हमारा तो यह फीचर एक्टिव है....

खैर चलते चलते निगाह चली गई ...उन स्पैक्टेटर गैलरियों की तरफ़ जो  रेस के दौरान खूचाखच भरी होती हैं...जिन बोर्डों पर रेस के नतीज़ें दिखा करते थे उन के भी चीथड़े उड़ चुके हैं...हां, उन गैललियों के पास ही लंबी लंबी लाइनों में बाज़ बैठे दिख रहे थे ...रेस कोर्स की तरह शायद वे भी रेसिंग शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हों....लेकिन नहीं, रेस कोर्स तो अपने मालदार शौकीनों का इंतज़ार करे तो बात पल्ले पड़ती है लेकिन ये बाज़ किस फ़िराक में हैं, यह समझ में नहीं आया....चलो, यार, समझ में नहीं आया तो दफ़ा करो,  दुनिया भर की चीज़ें सोचने समझने का ठेका हम ने ही थोड़े न ले रखा है, कुछ तो दूसरों के लिए भी छोड़ दिया जाए....

एक शायर कह रहे हैं....कुछ अल्फ़ाज़ में मैने गड़बड़ कर दी है शायद, लेकिन खूबसूरत बात जो उस शायर ने कह दी है कि थोड़ी सी नादानी भी रह जाए तो अच्छा ही होता है ....दूसरों के लिए भी, अपनी सेहत के लिए भी...😄

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है...

सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला...

वहां से लौटते हुए नज़र पड़ गई कुछ घास काटने वालों पर ....गोरखपुर से हैं, यहां पास ही में रहते हैं...ठेकेदार के बंदे हैं....शाम तक घास के जितने गट्ठे काटेंगे, उस के मुताबिक ही पेमेंट होगी, एक गट्ठे में 2-3 किलो घास रहती होगी...जिस के दो रूपये साठ पैसे मिलते हैं...कोई सौ काटे,दो सौ काटे ...उसी के हिसाब से पेमेंट...ठेकेदार के अपने ट्रक-ट्रालियां हैं जिन पर लाद कर यह घास गाय-भैंसों के लिए तबेलों तक पहुंच जाती है ...उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा था कि इस चारे को बिना काटे ही डाल देते हैं सेठ लोग अपने पशुओं को ..कह रहे थे कि वे भी क्या करें, 100-150 पशु पाले होते हैं उन लोगों ने भी ....मैने पूछा कि दोपहर के खाने का क्या करते हैं, बताने लगे सब कुछ साथ ही लाए हैं...पांच किलो की एक प्लास्टिक की बोतल भी सब ने अलग अलग पास ही रखी हुई थी...और खाना भी ...देर शाम तक काम करते रहेंगे...नवंबर के आखिर तक रेसें शुरु हो जाएंगी शायद ..

मुझे किसी ने बताया था कि इतने बड़े घास में सांप भी होते हैं ..उन्होंने कहा कि होते तो हैं हमें कुछ नहीं कहते, हम उन्हें कुछ नहीं कहते ...वे हमें दिखाई देते हैं, लेकिन तुरंत दूर कहीं निकल जाते हैं...उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें कुदरत सांप के पास होने का अलार्म दे देती है ...वह कैसे....आकाश में उड़ रहे पंछियों की तरफ़ इशारा कर के बताने लगे कि ये पंछी आते जाते रहते हैं, मस्त-मलंग उड़ते हैं लेकिन अगर ये कभी कहीं ठहर जाएं और ऊंची ऊंची आवाज़ें निकालने लगें तो इस का मतलब इन्होंने किसी ऐसे प्राणी को देख लिया है .....बस, हम उस वक्त सचेत हो जाते हैं...





उन से बातें करते वक्त मैं यही सोच रहा था कि कुदरत के भी कैसे कानून-कायदे हैं......ज़रूरत है तो बस क़ुदरत के कायदों को थोड़ा बहुत पढ़ने की ....इन कायदों के साथ मिल-जुल कर रहने की ....वाट्सएप पर बहुत से मैसेज आते रहते हैं....मुझे भी एक ऐसा ही मैसेज याद आ गया और मैंने उन्हें हंसते हंसते कह दिया कि यार, यहां तो पब्लिक अपना खाना हज़्म करने के लिए परेशान है सो आई है...और आप लोग इतनी खुली फ़िज़ाओं में सारा दिन रहते हो, अपना काम करते हो, ख़ुश रहते हो...वे सब मेरी इस बात पर ख़ूब हंसे और मैं उन के इन ठहाकों की मीठी खनखनाहट को अपने साथ लेकर बाहर आ गया, क्योंकि अब धूप भी हो चुकी थी... !

एक बेहद सुरमयी गीत ....जिसे बार बार सुनना अच्छा लगता है...राखी जी का भी जवाब नहीं!


मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

कुंजीओं, गाईडों, गेस पेपरों, टेन-एयर पेपरों के सच्चे किस्से ....

कल मैं मराठी में लिखा कुछ पढ़ रहा था, मैंने गेस कर के उस में कही बात को समझने की कोशिश की ...और मुझे पता है मैंने गुज़ारे लायक समझ ही लिया था...लेकिन उसी वक्त मुझे ख्याल आ गया कि यह गेस-लगाने का काम तो हम लोग बचपन से करते आए हैं अपने स्कूल के ज़माने से ...इस बात का ख़्याल लंबे अरसे के बाद आया ...

गेस-पेपर्स (Guess Papers) का जब मैं नाम लेता हूं तो मुझे हमारे दौर की (यही कोई 40-45 साल पहले का दौर) कुंजीयां और टेन-एयर पेपर्ज़ भी याद आते हैं...आज इन की यादों को सहेज कर इस ब्लॉग रूपी संदूकची में सहेजने की कोशिश करता हूं...

1970 का दशक - 1975-76 के आस पास मैं सातवीं आठवीं कक्षा में जब पढ़ता था तो हमारे स्कूल में भी कुंजीयों का अच्छा खासा चलन था। लेकिन इन कुंजीयों का इस्तेमाल बड़ी खराब बात समझी जाती थी...अच्छा, कुंजीयों का चिट्ठा खोलने से पहले एक याद आप से साझा कर लूं...मैं पांचवी-छठी कक्षा में था, गर्मी की छुट्टियां 45-50 दिनों की होती थीं...खूब सारा होम-वर्क मिलता था...एक तो होता था, हर रोज़ हिंदी, पंजाबी और इंगलिश की कापी में सुलेख लिखना है ...और गणित के खूब सारे सवाल भी हल करने होते थे। 

तो पहले सरकारी पाठ्य पुस्तकों में होता यह था कि किसी भी विषय, चेप्टर के सवाल की एक दो उदाहरणें हल कर के हमें उस में इस्तेमाल किए गए फार्मूले के बारे में समझा दिया जाता था, क्लास में भी ऐसा ही होता था, और फिर हमारे मास्टर हमें कह देते कि अब तुम लोगों ने उस चेप्टर के पीछे दिए गए सवाल हल करने हैं...अब उन में दिमाग लगता था...क्योंकि सोच, समझ के यह काम करना पड़ता था..कईं बार कोई सवाल का हल नहीं भी निकलता था, जिसे हम लोग अगले अपने मास्साब को बताते और वह उसे ब्लैक-बोर्ड पर सॉल्व कर देते और हमें फिर वह फार्मूला अच्छे से याद भी हो जाता...

और ग्रीष्म अवकाश का होम-वर्क भी ऐसी तादाद में हमें थमाया जाता कि हर रोज़ आठ-दस सवाल सॉल्व करते तो ही काम पूरा हो पाता....और हां, यह काम करना इसलिए भी ज़रूरी था कि जो छुट्टियों का काम पूरा कर के नहीं जाते थे, उन की ठुकाई होनी या नहीं होनी, यह मास्साब के मूड पर मुनस्सर था...कईं बार वे स्कूल खुलने के बाद भी दो-तीन का वक्त दे दिया करते थे ..कि अपना अपना काम कर लो पूरा...लेकिन होम-वर्क पूरा न कर के ले जाना...बड़ा बेइज़्ज़त होने वाला काम था, बड़ी किट किट थी ...इतने सारे सब्जेक्ट्स के टीचर्ज़ का मुंह देख कर उन के मूड का जायज़ा ही लगाते रहो ...

हां, तो मैं याद कर रहा था ऐसी ही एक गर्मी की छुट्टियों के शुरूआती दिनों को ...पांचवी-छठी के दिन थे...मुझे हमारे पड़ोस में रहने वाली एक लड़की ने आइडिया दिया कि गणित की कुंजी ले ले मेरे से ...और दो तीन दिन में काम खत्म कर , फिर खेला करेंगे। कुंजी में सभी सवाल सॉल्व किए हुए दिए होते थे...मैंने उस की बात मान ली ...और अगले दो तीन दिन में गणित के काम वाला कांटा निकाल कर लगा हुडदंग मचाने ...लेकिन मेरी बड़ी बहन की मेरी पढ़ाई पर पूरी नज़र रहती थीं...एक दिन उन्होंने पूछा और मैंने बता दिया कि मैंने तो आसान रास्ता निकाल लिया है ..और पड़ोस से मिली कुंजी के बारे में बता दिया...उन्होंने मुझे कहा तुम इसी वक्त कापी ले कर आओ...मैंने कापी हाज़िर कर दी ....उन्होंने उसी वक्त उस को पूरी तरह से फाड़ दिया ....और कहा कि चुपचाप कल से क़ायदे से होमवर्क करो....दिमाग लगा कर गणित के सवाल हल करो...कुंजी जहां से आई थी, उन्हें भी प्यार से समझा दिया कि यह सब मत किया करो ....आज सोचता हूं कि उस दिन बहन ने उस कापी को फाड़ कर बहुत अच्छा काम किया ...बड़ी बहनें होती ही ऐसी हैं....अब मां नहीं हैं, तो मुझे वह छोटी मां ही लगती हैं.....तीन चार साल पहले मां बहुत बीमार थीं तो मैं मां के पास ही बैठा रहता, बिल्कुल मुझे लगने लगता उन दिनों जैसे वह मेरी बेटी हैं ... 

और एक बात कुंजीयों की करनी है कि गणित के अलावा भी दूसरे विषयों के लिए भी ये आती थीं...उसमें क्या होता था, वही पंगा होता था कि अगर कोई छात्र उन्हें पढ़ कर पेपर दे आयेगा..नंबर तो शायद ले भी लेगा, नंबर अगर न भी आए तो शायद पास हो ही जाएगा,  ..लेकिन बात उस की समझ में आयेगी नहीं। और हां, इन कुंजियों एवं गाईड्स का भरपूर इस्तेमाल एग्ज़ाम-सेंटर के बाहर खड़े पेपर दिलाने आए या नकल करवाने आए कुछ प्रोफैशनल किस्म के करिंदों द्वारा खूब किया जाता था...अकसर हम देखते थे कि जो सब्जेट का किसी दिन पेपर होता उस की कुंजी या गाइड को इन नकल करवाने वाले अपने पास रखते। और फिर स्टॉफ के अंदर वाले स्टॉफ, पेपर देनेे वालों को पानी पिलाने वालों की सांठ-गांठ से उस किताब में से पर्चियां फाड़ फाड़ कर भिजवा रहते थे...

मुझे कभी इस तरह की नकल के लिए पर्चियां हासिल हुईं? नहीं, नहीं ....इन चक्करों से मुझे बहुत ज़्यादा डर लगता था ...और वैसे भी हमेशा से ही यह लगता रहा कि हम लोग तेज़ तेज़ लिख कर भी पेपर पूरा नहीं लिख पाते...ऐसे में पर्चियों से लिख कर पेपर पूरा करना तो नामुमकिन ही होता होगा...और जिस हम अकसर देखते कि जिस अफरा-तफरी में बाहर खड़े शुभचिंतक अंदर पर्चियां पहुंचाते और जिस खौफ़ के साये में अंदर बैठा बंदा उन को हु-ब-हू अपनी उत्तर-पुस्तिका पर छाप रहा होता...उस से तो बस शायद पास ही हुआ जा सकता था। 

अच्छा, तो यह गाईड्स क्या होती हैं.....ये भी कुंजीयों जैसी ही होती हैं...शायद कुछ इज़्ज़तदार नाम रखने के लिए इन्हें गाइड कहा जाने लगा था...लिखते लिखते कुछ बातें कैसे याद आने लगती हैं...मुझे याद आ रहा है कि हमारी आठवीं-नवीं-दसवीं कक्षा के दिनों में एमबीडी और कोहेनूर नाम से गाइडें बिका करती थीं...एमबीडी की गाइडें बहुत पापुलर हुआ करती थीं...मल्होत्रा बुक डिपो याने एमबीडी ...मुझे हिस्ट्री-ज्योग्राफी के लिए ये गाइडें खरीदना पड़ती थीं...बाकी तो मैं शुरू ही से क्लास में अच्छे से पढ़ता था, रोज़ाना पढ़ता भी था और नोट्स भी बनाता था...लेकिन हिस्ट्री-ज्योग्राफी की किताबों की तरफ़ देखने से भी मुझे चिढ़ थी...ये नक्शे वक्शे मेरे लिए बिल्कुल काला अक्षर भैंस बराबर हुआ करते थे...कभी भी इन्हें पढ़ना रूचिकर न लगा...दिक्कत यह थी कि हिस्ट्री-ज्योग्राफी की गाइड़ों को भी पढ़ने की इच्छा न होती थी...न ही मुझे हिस्ट्री-ज्योग्राफी पढ़ कर मुझे कुछ याद ही रहता था...हमारा मास्टर को भी हमें मुक्के, थप्पड़ मारने में ज़्यादा दिलचस्पी हुआ करती थी....इसलिए हम सब सहमे रहते उस के पीरियड में ...थप्पड़ भी ऐसा जड़ता था कि सिर घूम जाता था...पर मैं कुछ सालों बाद सोचता था उस के बारे में कि उस की अपनी परेशानियां थीं....उस के बारे में कुछ भी न लिखना चाहूंगा...पर था बड़ा विलेन टाइप....

अब चलते हैं टेन-एयर पेपर्ज़ की ओर....हमें एग्ज़ाम से तीन चार महीने पहले हमारे मास्साब भी कह दिया करते थे कि पिछले दस सालों के पेपर भी देखा करो...हर साल के दो पेपर होते थे ..वार्षिक एवं सप्लीमेंटरी ...अच्छा, जहां तक मुझे इस वक्त ख्याल आ रहा है कि ये टेन-एयर पेपर्ज़ अलग अलग विषयों के भी मिलते थे ..लेकिन एक बड़ी सी किताब भी मिलती थीं जिन में सभी विषयों के पिछले दस सालों के बोर्ड के पेपरों के परचे मिल जाया करते थे...उन्हें हम ज़रूर खरीद लिया करते थे..लेकिन ना जाने क्यूं उन्हें बार बार पढ़ना भी बोरिंग सा काम लगता था मुझे तो...फिर भी, देख तो लेते ही थे। 

और हां, एक बात और याद आ गई कि एग्ज़ाम के कुछ हफ्तों या कुछ दिनों पहले बोर्ड के पेपरों के गेस-पेपर्ज़ भी बाज़ार में मिलने शुरू हो जाते थे...एक दम रद्दी गेस हुआ करता था...मुझे तो नहीं याद कि कभी बोर्ड के किसी पेपर को देख कर लगा हो कि यह फलां फलां गेस-पेपर में भी दिया गया था। जहां तक मुझे याद है कि मैं कभी इन गेस-पेपरों वेपरों के चक्कर पड़ा नहीं, ज़रूरत ही न महसूस हुई. कभी क्योंकि हिस्ट्री-ज्योग्राफी को छोड़ कर सब कुछ अच्छे से पढ़ा ही होता था...

अभी एक बात गाइडों के बारे में लिखनी यह भी ज़रूरी है कि जैसे जैसे विभिन्न विषयों की गाइड़ों छात्रों की ज़िंदगी में आना शुरू हुईं...उत्तर लिखने के लिए मौलिकता (ओरिजिनेलेटी) ख़त्म होती चली गई...वही रटी-रटाई बात पेपर में लिखो और अपना रस्ता नापो। 

हां, गेस पेपरों की बात करते करते यह ख़्याल भी आ गया कि बोर्ड के एग्ज़ाम से पहले हमें लगभग एक महीने की लिए पेपर की तैयारी के लिए छुट्टियां मिलती थीं....उसे कहते थे प्रेपरेटरी होलीडेज़- उन दिनों हिंदी और इंगलिश के पेपरों में बोर्ड ेके पेपरों के गेस-पेपर्ज़ छपा करते थे ...मुझे याद है हम उन्हें ऐसे ही कभी कभी देख लिया करते थे ...कभी उन्हें भी इतनी गंभीरता से नहीं लिया...

एक बात और कहीं लिखना भूल न जाऊं....एग्ज़ाम के दो तीन पहले एक छोटी सी गाइड कह लें, कुंजी कह लें या कुछ कह लें, अलग अलग विषयों की आ जाया करती थी, जो छात्र 360 दिन अच्छे से नहीं पढ़ पाए ...उन्हें पढ़ने का आखिरी चांस देने के लिए...इन्हें तैयार तो बड़े क्रिएटिव तरीके से जाता था. लेकिन अकसर परचे के दिन (हमारे दौर में एग्ज़ाम को परचा भी कह देते थे...जैसे पापा पूछते थे-- कल किस का परचा है, मतलब किस विषय का एग्ज़ाम है) ....ही इन की किस्मत खुलती थी, क्योंकि पेपर करवाने (या नकल करवाने) आए बाहर खड़े लड़कों के हाथ में यही मिनी-गाइडें ही हुआ करती थीं...जिसमें से कागज़ फाड़ फाड़ कर वे अंदर अपने दोस्त तक पहुंचाया करते थे। 

नकल का काम बड़ी स्टिंकिग था तब भी ....कभी कभी परीक्षा-हाल की खिड़कियों के रास्ते से माल पहुंचाया दिया जाता, कभी किसी पत्थऱ के ऊपर लपेट कर (यह मैंने बहुत कम ही देखा) , कभी किसी पेपर देने वाले उस वक्त उस की सर्वाइवल किट पहुंचा दी जाती जब वह वॉश-रूम का बहाना बना कर दो मिनट के लिए बाहर हो कर आता...और कईं बार तो अपने इर्द-गिर्द जब हम देखते कि किसी छात्र ने बीस-तीस पेज़ का पर्चियों का पुलिंदा पकड़ा हुआ है जो उसे पानी पिलाने ने अभी अभी थमा दिया है...और वह उसमें से अपने काम की चीज़ बड़ी झुंझलाहट के साथ ढूंढ रहा है.. क्योंकि उसे सवाल ही समझ में नहीं आ रहा, तो जवाब वह कहां से ढूंढे....फिर वह पानी पिलाने वाले को गुस्से से कहता ...कभी कभी बाहर खड़े दोस्त के लिए अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल करता कि उसे कहो यह क्या भेज दिया है, वह अच्छे से पढ़ कर भेजे....बहुत बार इस तरह की पर्चियों को वापिस बाहर एक्सपोर्ट करने की जिम्मेदारी भी इन पानी पिलाने वाले चपरासियों की ही होती..जिस के लिए इन्हें कुछ मेहनताना दिया जाता था...और कईं बार जब स्कूल का कोई बड़ा खिलाड़ी परचा लिख रहा होता तो यह काम स्कूल के पी.टी मास्टर को भी करते हम ने देखा...लेकिन वे पूरे आत्मविश्वास से यह काम कर जाया करते.......और दूसरे छात्रों की तरफ़ देखते तक नहीं थे...

पर्चियां मैं भी बनाया करता था, कभी कभी छोटी छोटी ...दो चार बार याद है..लेकिन डरपोक इतना कि अगर किसी ने पकड़ लिया तो बड़ी बदनामी हो जाएगी कि स्कूल के एग्ज़ाम में तो टॉप करता है, लेकिन यहां बोर्ड में परची चलाता है, वहां भी परची ही चलाता होगा, और दूसरा यह कि अगर स्कूल ने निकाल दिया या बोर्ड ने दो चार साल के लिए बाहर कर दिया तो क्या होगा...बस, यही सोच कर उन पर्चियों को इस्तेमाल नहीं किया....कईं बार तो पेपर से पहले मैं वॉश-रूम की टंकी के पास छिपा कर आता कि बीच में आकर थोड़ा देख लूंगा लेकिन एग्ज़ाम में बैठे वक्त यह सोच कर ही दिल धड़कने लगता कि अब उन को जा कर निकाल कर देखूंगा...नहीं, नहीं यह न होगा...एक बार यह काम किया भी ..लेकिन एक मिनट में उन को पढ़ कर कोई क्या पहाड़ खोद लेगा...पहले से ही पढ़ा हुआ ही काम आता है हमेशा। मेरे मामा का बेटा मेरी नानी के पास रहता था अंबाला में....पेपर से पहले वाली रात को ऐसी ही एक गाइड लाता, पर्चियां तैयार करता और हमें बताता कि वह अच्छे से यूज़ भी कर लेता है ...एक तरह से सारी गाइड ही साथ लेकर चलता ...और वह जब छोटा भी था तो अपनी निक्कर के अंदर अपनी जांघों पर लिख कर ले जाता...नानी उसे बहुत कहा करती ....वे पप्पूआ, न करया कर एह कम्म, पढ़ लिया कर... (पपू, यह काम मत किया करो, इस से अच्छा तो पढ़ ही लिया करो)....और नानी को डर इस लिए भी लगता होगा कि नाना जी अम्बाला के जाने माने गणित और इंगलिश के टीचर और पोता यह सब काम करने में मशगूल ...पपू ने जैसे तैसे बीए तो कर ली ....लेकिन वह उस के काम न आई..

बात बहुत लंबी हो गई है, मैं भी लिखते लिखते बोर होने लगा हूं.....सौ बात की एक बात ......अच्छे से पढ़ने-लिखने का कोई विकल्प न ही था, न ही है और न ही होगा...अगर नहीं पढ़ेंगे तो उस विषय में ता-उम्र कमज़ोर ही रहेंगे....जैसे मुझे हिस्ट्री-ज्योग्राफी बिल्कुल नहीं पता ...इसलिए जहां भी देश-दुनिया की बातें चलती है तो मैं उन लोगों के बीच में बैठा बिल्कुल अपने आप को अनपढ़ महसूस करता हूं ..और यह बात मैं बढ़ा-चढ़ा कर नहीं लिख रहा हूं...ऐसा ही होता है आजकल मेरे साथ...जो कुछ अच्छे से पढ़ा है, वही काम आ रहा है...बाकी, जिस बात में फिसड्डी रह गया, अब भी वैसा ही हूं...लेकिन मुझे इस का कोई गम भी नहीं है, बहुत कुछ देखा है, महसूस किया है, जिया है, हंडाया है...किसी चीज़ की अब तमन्ना रह नहीं गई...

लेकिन एक बात है कि ये बातें तो मैंने लिख डालीं एग्ज़ाम की ...पेपरों की, परचों की .....हम सब कहीं न कहीं एग्ज़ाम से डरते तो थे...लेकिन यह भी ध्यान आ रहा है कि आजकल तो बच्चों के लिए काउंसलर होते हैं, साइकोलॉजिस्ट होते हैं...अपने लिए सब कुछ अपने पेरेन्ट्स ही हुआ करते थे...बीजी और पापा ने कभी भी किसी तरह का एग्ज़ाम का प्रेशर फील नहीं होने दिया...कभी भी नहीं...हर एग्ज़ाम से पहले मेरी टेंशन देख कर दोनों यही कहते ....कोई बात नहीं, जो आता है, वही लिख कर आ जाओ। यही बात जो हमें विरसे में मिली हम ने अपने बच्चों को दी ...हमेशा उन्हें यही कहा कि ज़िंदगी में तो हर दिन एग्ज़ाम है ....इसलिए मस्त रहो और जो काम कर रहे हो, उसे अच्छे से करते रहो...

आनंद बक्शी के बेटे को यह भेजा था कुछ दिन पहले....मैं बक्खी साब के सभी लिरिक्स का बहुत बड़ा फैन जो हूं...

PS... आज सुबह सुबह इतना लंबा लिखने बैठ गया, क्योंकि बाहर कहीं जाना नहीं है, दायां घुटना फिर से कह रहा है, चुपचाप टिके रहो खटिया पर ही, अपनी उम्र का ख़्याल रख करो..इसलिए दो तीन दिन से बाहर निकलना बिल्कुल बंद है, चलने में बहुत दर्द है, कुछ दिन आराम करने से, दवाई लेने से, एक्सरसाईज़ करने से राहत मिल जाएगी...कुछ महीने पहले भी हुआ था...अब उम्र के साथ यह तो लगा ही रहेगा....65 की उम्र तक पहुंचते पहुंचते तो घुटनों की तो बिल्कुल ही ऐसी की तैसी हो जाएगी....मुझे ऐसा लगता है सच में और डर भी लगता है। लेकिन जो है, सो है। जब अपनी उम्र के किसी बंदे के घुटनों की परेशानी के बारे में सुना करता था तो कभी न सोचता था कि हमारा भी यही हश्र होने वाला है ...

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

आस्था के साथ साथ पर्यावरण से दोस्ती भी ज़रूरी !

आज सुबह पांच बजे से भी पहले मैं उठ गया....वैसे भी 5-6 बजे तो उठ ही जाता हूं..लेेकिन जब पूरी रात ए.सी में सोया रह जाता हूं, सुबह अकसर सिर भारी ही होता है ...वह बड़ी खराब फीलिंग होती है ...एक कहानियों की किताब लेकर पढ़ने लगा लेकिन सिर के भारीपन की वजह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, थोड़ी चाय ली ...और फिर सोचा कि बहुत दिन हो गए साईकिल को हवा लगाए हुए...आज वर्सोवा बीच तक हो कर आया जाए...एक दो बार ख्याल आया कि अभी तो पांच सवा पांच बजे हैं, और कॉलोनी में एक-दो स्ट्रे-डॉग्स भी हैं, जिस की वजह से मैं सुबह उठ कर भी ऐसे ही बिस्तर पर पसरा रहता हूं...लेकिन फिर सोचा कि नहीं, आज चलता हूं ..देखा जाएगा....

कॉलोनी वाले डॉगी ने तो कुछ नहीं कहा ...सो रहा होगा बेचारा कल त्योहार का माल खा कर कहीं ...वैसे भी कुछ दिन पहले कोई कह रहा था कि वह हल्का हो गया है ...मतलब पगला गया है ...क्योंकि कुछ लोगों को आते जाते काटने को दौड़ रहा है ...यह भी कैसी विडंबना है कि हमें इन जानवरों का और दूसरे लोगों को हल्कापन तो आसानी से दिख जाता हैं...हम उन की लेबलिंग भी कर देते हैं....बस, हमें ख़ुद का ही पता ही नहीं मिलता कहीं भी ..वैसे भी आज का इंसान इसे भी बस एक केमीकल लोचे की तरह लेकर सोचता है कि एक टेबलेट मूड भी अच्छा कर देगी, चिंताओं से निजात भी दिला देगी......मैं कोई मनोरोग विशेषज्ञ नहीं हूं लेकिन अकसर सोचता हूं कि आखिर यह कैसे मुमकिन है ...हमारी मुश्किल यही है कि हम न खुल कर बात करते हैं, न खुल कर हंसते हैं...न ही किसी की बात ठीक से सुनते ही हैं...और यह सब इसलिए नहीं करते कि कहीं कोई हमारा फायदा ही न उठा ले....बस, यही मुश्किल है ...लेकिन मैं इस वक्त यह क्या लिखने लग गया, मैं तो साईकिल पर घूमने निकला था...

रास्ते में टर्नर रोड़ पर मुझे देख कर एक बार कोई डॉगी भौंका तो ...लेकिन उस वक्त उस सुनसान सड़कर पर यह भी मुझे कल से उस रास्ते से न निकलने का फैसला लेने के लिए काफी था। इन जानवरों से बड़ा डर लगता है ...एक बार बेटों ने एक डॉगी पाल लिया ...मैं और मेरी मां उस से इतना डरते...हर वक्त उसे चैन से बांधे ऱखना पड़ता ...बेटे कहने लगे कि यह तो बापू इस जानवर पर अत्याचार है ....चूंकि हमारी डरने की बीमारी ठीक न हुई ...और वह हर वक्त बंधा होने की वजह से चिढ़चिढ़ा सो हो गया और एक दिन हमें उसे खुले खेतों में जाकर आज़ाद छोड़ ही देना पड़ा...

चलते चलते अभी मैं जूहू बीच पर पहुंचा ही था कि मुझे वहां कुछ चीज़ों के बड़े बड़े अंबार लगे देखे...मैं रुक गया...पहले तो मुझे यही समझ मे आया कि यहां क्यों आज इतनी गंदगी हो रखी है...यहां तो रोज़ाना सुबह बीसियों वर्कर सफ़ाई किया करते हैं...फिर अचानक नज़र कुछ कलशों और मूर्तियों पर पड़ी तो बात समझ में आ गई कि कल मूर्तियों एवं कलशों का विसर्जन हुआ होगा...

प्रशासन ने इस तरह के बैरीकेड लगा कर व्यवस्था भी कर दी ..लेकिन फिर भी समंदर के अंदर तक लोग पहुंच जाते हैंं ..

ज़रा यह सोचिए कि यह मंज़र मुंबई की एक बीच का है, बहुत सी और जगहें हैं जहां पर यह सब इक्ट्ठा हुआ होगा, समंदर में जा कर मिल भी गया होगा..!!





हमारी दिक्कत यह है कि जब किसी धर्म, आस्था की बात होती है तो उसे हम लोग बड़ी दबी आवाज़ में कहते हैं, और ज़्यादातर तो कुछ कहते ही नहीं, इन बातों को दरी के नीचे ही सरका के, छिपाए रखते हैं....लेकिन हमें ज़रूरत है अब इन सब आस्था के प्रतीकों के रख-रखाव और विसर्जन के वक्त भी पर्यावरण के साथ दोस्ताना रवैया रखने की ... आज मुझे जुहू बीच पर जाकर यह लगा कि हां, सच में कोरोना चला गया है, हम वापिस अपनी पुराने रंग-ढंग दिखाने लगे हैं...

जो मैंने मंज़र जुहू बीच पर आज देखा, उस के बारे में कुछ ज़्यादा कहूंगा नहीं....बस, आप से वे तस्वीरें शेयर करूंगा...आप सब मुझ से कहीं ज़्यादा समझदार हैं, आप भी सोचिए कि क्या हम इस गतिविधि को पर्यावरण की अच्छी सेहत के अनुसार थोड़ा ढाल सकते हैं....पिछले कुछ सालों में कितना आ रहा है कि मूर्तियां इको-फ्रेंडली तैयार हुआ करेंगी ..इन सब चीज़ों के बारे में सोचना ही होगा अब हम सब को ...आस्था बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या उस में हम छोटे प्रतीक इस्तेमाल नहीं कर सकते...मैंने वहां समंदर में बहुत से स्टॉर-स्टडड कलश भी देखे ...कुछ लोग पानी के अंदर जा कर उन में से कुछ तलाश कर रहे थे ...मां भगवती की कुछ मूर्तियां भी खड़ी हुई थीं...जल प्रवाह के बीचों बीच ..फिर अचानक वे लहरों में समा गईं...

इस मौज़ू पर ज़्यादा बातें कहना-सुनना-सुनाना मुनासिब नहीं लगता...एक बार किसी फिल्मी में शम्मी कपूर एक बुज़ुर्ग आदमी का किरदार निभा रहा था, उसका एक संवाद भी यही है.....कुछ बातें कहने-सुनने में अच्छी नहीं लगतीं, उन्हें ख़ुद ही महसूस करना होता है। 





उस दिन में जब अपनी पोस्ट में अपने बचपन के नवरात्रोत्सव की बातें याद कर रहा था तो मुझे अच्छे से याद है कि उन दिनों जब हम लोग खेतरी प्रवाह करने मंदिर में जाते तो वहां उन का बड़ा सा पहाड़ लगा देख कर मां बहुत महसूस करतीं और मुझे वह बात कहती भी ...लेकिन एक बात तो थी कि उस पहाड़ में एक भी पॉलीथीन (जिसे पंजाबी मेंं मोमजामा कहते हैं) न हुआ करता था ...लेकिन ये जो जुहू बीच पर तरह तरह के चीज़ों के अंबार लगे हुए थे, उन में प्लास्टिक की थैलियों की भी भरमार दिखी ..मुझे तो यही समझ नहीं आता कि हम आखिर सुधरेंगे कब ...आए दिन हम क़ुदरत की विनाश लीला देख रहे हैं....कभी यहां, कभी वहां, लेकिन हम वातावरण के बारे में नहीं सोचते ...हमारे मन में तो बस स्वच्छता अभियान वाले दिन किसी साफ़ सी जगह पर फोटू खिंचवाने का फ़ितूर सवार रहता है, और कुछ नहीं, बाकी, हम समझते हैं हमारा फ़र्ज़ नहीं है..

बात सोचने वाली यह है कि ठीक है, बीच की सफाई हो जाएगी...लेकिन कितने कैमीकल, कितना और सामान तो समंदर में ऐसा मिल गया जो समंदर में रहने वाले प्राणियों के प्राणों के लिए आफ़त है ....कितना कोई कहेगा, कितना लिखेगा ...समझदार को इशारा ही काफ़ी होता है ...पर्यावरण से दोस्ती करिए...यही मां भगवती की सच्ची आराधना है, उपासना है ....यह जितना प्रकृति का पसार है, जल,थल, आकाश में यह सब मां भगवती की कृपा से ही हम देखते हैं ...हम अपनी आस्था के नाम पर उस क़ुदरत से, उस के जीवों से छेड़छाड़ करें और मां को अच्छा लगे, यह कैसे संभव है। 

आस्था रखिए, त्यौहार मनाइए ..लेकिन मां प्रकृति का भी ख़्याल रखिए....यही सच्ची भक्ति है, यही मां भगवती की आराधना है। 


और हां, मेरे सिर के भारीपन का क्या हुआ.....जी, बिल्कुल मां भगवती की कृपा से मां के इतने विराट दर्शन-दीदार कर के वह बिल्कुल ठीक हो गया कुछ ही वक्त में ........बस, मां, मुझे यह आशीर्वाद भी दीजिए कि मैं सुबह सुबह अच्छे कामों पर निकलने के लिए आलस न किया करूं...जय माता दी। सलीम ने इस भेंट को गाया है, इसे सुन कर मन झूमने लगता है ...वाह...क्या बात है!

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

हर पोस्ट कार्ड एक कहानी कहता है ...

सन् 2001-2002  के आस पास की बात रही होगी...मैंने केंद्रीय हिंदी डायरेक्ट्रेट की तरफ़ से एक विज्ञापन अख़बार में देखा...उन्होंने लिखा कि अहिंदी भाषी नवलेखकों के लिए एक नवलेखक शिविर का आयोजन कर रहे हैं...लेकिन उस की एक चयन प्रक्रिया होगी...और उस के लिए पहले आप को अपना कोई एक लेख लिख कर भेजना होगा....

पढ़ा, अच्छा लगा ...इस से पहले मैं केवल छुट-पुट मेडीकल एवं डेंटल विषयों पर ही लिखता था , अपने स्कूल की पत्रिका का स्टूडेंट-एडिटर भी रहा...बाद में पत्रिकाओं के लिेए लिखता था..लेकिन क्रिएटिव राइटिंग के बारे में कुछ पता न था...इसलिए सोचा कि देखते हैं अगर मौका मिलेगा तो इस नवलेखक शिविर में हो कर आएंगे। 

अपने पास यादों का बढ़िया ज़खीरा तो है ही ..हम एक ऐसे दौर में रहे हैं जिस में बहुत कुछ देखा, महसूस भी किया ....और ज़िंदगी को नज़दीक से देखा भी। तो, जनाब, हिदी की टाइपिंग तो तब आती न थी, मैंने भी कागज़ पर एक लेख लिख कर दाग दिया...उस का शीर्षक लिखा...डाकिया डाक लाया। सच बताऊं उसे लिखने में ही मुझे इतना मज़ा आया कि मैं बता नहीं सकता...इस में मैंने लिखना क्या था, अपनी दादी, नानी, मामा, चाचा, बुआ और पापा की चिट्ठीयों की यादें लिख डालीं...और कुछ दिन बाद मुझे चिट्ठी मिल गई कि आप का 15 दिन के नवलेखक शिविर के लिए चयन कर लिया गया है ...मैं बहुत खुश ...जोरहाट में यह शिविर हुआ...गुवाहाटी से भी एक रात का सफर था ..उस दौरान मुझे समझ आया कि लिखना किसे कहते हैं....बस, अपने दिल की बातों को लिखते लिखते कोई भी लिक्खाड़ बन  सकता है, कोई रॉकेट साईंस नहीं है यह भी ...आप को पता ही है कि सरकारी महकमों के खलारे भी कैसे होते हैं...वहां पर उन्होंने बड़े बड़े नामचीन लेखकों को बुलाया था...हमें कहानी, लेख, संस्मरण लिखने की विधा से रू-ब-रू करवाने के लिए। 

वापिस पोस्ट कार्ड पर लौटें...मेरी ड्यूटी का समय हो रहा है ...बात छोटी ही रखेंगे आज... हां, तो पोस्ट कार्ड से जुड़ी मेरी सभी यादों को मैंने अपने एक पंजाबी ब्लाग में सहेज दिया है ...बहुत बार सोचा कि उस का ही हिंदी अनुवाद कर के इस ब्लॉग पर भी टिका दूं लेकिन कभी कोई मोटीवेशन लगी नहीं...लेकिन कभी इस ब्लॉग पर भी लिखूंगा ज़रूर पोस्ट कार्ड से जुड़ी मेरी बेशुमार यादें। आप को सुन-पढ़ कर भी मज़ा आएगा। 

बहरहाल, उस दिन विश्व पोस्ट कार्ड दिवस था ...मैं मुंबई के जीपीओ में गया तो पता चला कि अभी स्पेशल कवर तैयार हो कर नहीं आया...मुझे वह ज़रूरी चाहिए था...वह अब मुझे मिल गया है, लीजिए आप भी उस के दीदार कर लीजिए....

जब हम लोग अमृतसर के डीएवी स्कूल में पढ़ते थे तो हमारी क्लास में हमारा एक साथी था, उसने पेन-फ्रेंड बना रखे थे, उन को चिट्ठीयां लिखता था, उन की चिट्ठीयां उन्हें आती थीं, वह हमें दिखाता था, उस ख़तों पर लगी शानदार टिकटें देख कर ही हम हैरान होते रहते थे ..लेकिन कभी पेन-फ्रेंडशिप की दुनिया में जा न सके...शायद इसलिए कि हमें घर में आने-जाने वाले ख़तों को पढ़ने-लिखने से ही फुर्सत न थी...और मेरी तो एक और ड्यूटी भी थी ...अडो़स पड़ोस के कुछ लोगों की चिट्ठीयां पढ़ कर उन्हें सुनाना और उन की चिट्ठीयों के जवाब लिख कर देना...मैं कभी भी उन्हें इस काम के लिए मना नहीं करता था...लेकिन वह चाहते थे कि मैं ही उन की चिट्ठीयां लिखूं...😄..मुझे कहीं न कहीं अपनी नानी का ख़्याल भी आ जाता उन दिनों ,जो बस दो-चार क्लास गुरमुखी पढ़ी थीं, इसलिए उन्हें हिंदी में खत लिखने-पढ़ने के लिए पड़ोस की लड़कीयों की खुशामद करनी पड़ती थी...

खैर,...पेनफ्रेंड शिप के बारे में बाद में भी सोचता रहा ...लेकिन इस पूल में डुबकी न लगाई ..फिर तो डिजिटल दुनिया में इस तरह के शौक की कोई जगह ही न थी.....लेकिन कल ही मुझे एक नवयुवक से पता चला है पोस्टक्रासिंग डॉट काम के बारे में ..आप भी एक बार इसे देख तो ज़रूर लीजिए... postcrossing.com ---मुझे तो इसे देख कर बहुत मज़ा आया। 

और हां, उस दिन मैंने जब जीपीओ के बाबू को एक ख़त स्पीड पोस्ट के लिए दिया तो उसने मुझे कहा कि यह आप की हैंड-राइटिंग है ...मैने कहा ..जी, मेरी ही है ..उसने कहा कि आप को हैंड-राईटिंग बहुत सुंदर है । मैं किसी के साथ शेयर कर रहा था कि यह कंप्लीमेंट मेरे लिए अभी तक का सब से कीमती कंप्लीमैंट है ..एक बाबू जिस की नज़रों से हज़ारों-लाखों हस्त-लिखित काग़ज़ गुज़र गए ...अगर उस ने भी तारीफ़ कर दी एक पते को देख कर तो .....!! लेकिन अपने आप को यह याद दिलाना भी ज़रूरी है कि ज़मीन पर टिका रहो..इतना उड़ने की भी ज़रूरत भी नहीं...बडे़ से बड़े कलाकार पड़े हैं, मैंने अभी दुनिया देखी ही कितनी है...! 

और हां, उस दिन एक संयोग यह भी तो हुआ कि पोस्ट-बाक्स की रंगाई-पुताई हो रही थी ...मैं यह देख कर रूक गया और इन को कहा कि आज पहली बार किसी पोस्ट-बाक्स की रंगाई होते देख रहा हूं , अच्छा लगा, इसलिए एक फोटो ले रहा हूं....वह दोनों भी बहुत खुश हुए और कहने लगे कि बंबई जीपीओ के अंतर्गत आने वाली सभी डाक-पेटियों की रंगाई-पुताई हर बरस होती है ...यह बात भी ऩईं पता चली थी....

आप के काम को मैं सलाम करता हूं...

अब यहीं ब्रेक लगा रहे हैं.....और डाकिये पर फिल्माया मेरा बेहद पसंदीदा गीत आप भी सुुनिए...और गुज़रे दौर की यादों में खो जाइए कुछ लम्हों के लिए ही सही ...बाद में दिन भर की भाग-दौड़ में तो हम सब को दौड़ना ही है ...

अरे यार, बंद करते करते निदा फ़ाज़ली साहब की बात याद आ गई...

"सीधा सादा डाकिया जादू करे महान....

एक ही थैले में भरे, आंसू और मुस्कान ..

वो सूफी का क़ौल हो या पंडित का ज्ञान.

जितनी बीते आप पर उतनी ही सच मान....."😎👏

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

बिग बी ने छोड़ा पान मसाले का विज्ञापन

अभी अभी अखबार में यह ख़बर पढ़ी तो मुझे बहुत खुशी हुई ...वरना जब से मुझे पता चला था कि बिग बी अब पान मसाले की सरोगेट एड्वर्टाईज़िंग कर रहा है, मुझे उस पर गुस्सा तो आ ही रहा था..लेकिन वही बात है, मेरे जैसे तुच्छ बंदे के गुस्से का उस की सेहत पर भला क्या असर, सिर्फ़ अपने आप में कुढ़ने वाली बात ही तो है...


लीजिए, आप भी टाइम्स ऑफ इंडिया में आज प्रकाशित हुई इस ख़बर को ख़ुद पढ़ लीजिए...अगर पढ़ने में दिक्कत लगे तो इस की तस्वीर पर क्लिक करिए। अमिताभ कह रहे हैं कि उन को यही न पता था कि वे पान मसाले का सरोगेट एड्वर्टाईज़िंग कर रहे हैं...इस के बारे में आप क्या सोचते हैं, चलिए, आप जो भी सोचें...सोचते रहिए। 

पान मसाले से पैदा होने वाले ओरल-सब-म्यूक्स फाईब्रोसिस के सैंकड़ों मरीज़ देखे, कई कईं बरसों तक उन का फालो-अप भी किया ..डेंटल कॉलेज जैसी प्रीमियर संस्थाओं के विशेषज्ञों के पास उन को इलाज के लिए भी भेजा लेकिन मुझे इस वक्त यह ख्याल नहीं आ रहा कि पान मसाले से पैदा हुई यह बीमारी किसी की ठीक हो गई हो ....हां, सैंकड़ों में कोई ऐसा मरीज़ ज़रूर दिखा जिस का मुंह इस बीमारी की वजह से पहले बिल्कुल कम खुलता था, लेकिन जब पान मसाले को छोड़ दिया तो बहुत लंबे अरसे के बाद उस का मुंह बिल्कुल थोड़ा सा थोडा़-बहुत निवाला धकेलने लायक खुलने लगा ...और यह उसने ख़ुद कहा कि अब मुंह में घाव न होने की वजह से और मुंह थोड़ा ज़्यादा खुलने की वजह से खाना तनिक आराम से खा ले पा रहा हूं...लेकिन वैसे तो जो एक अपंगता आ जाती है, मैंने वह एक भी मरीज़ की जाती नहीं देखी...

लेकिन एक बात तो पक्की है कि जब भी कोई पान मसाला छोड़ देता है - उसे मुंह के घाव-वाव में तो थोड़ी राहत महसूस होती ही है..अगर तब तक उस के मुंह के अंदर की चमड़ी में कैंसर के बदलाव न आ चुके हों तो थोड़ा बहुत आराम तो उसे महसूस होता ही है... लेकिन दो एक केस मैंने ऐसे भी देखे हैं कि जिन को पान मसाले से उत्पन्न यह बीमारी थी, उसने पान मसाला भी छोड़ दिया (जैसा उन्होंने मुझे बताया) लेकिन 10-15 साल बाद उन्हें फिर भी मुंह का कैंसर हो गया। 

पान मसाले की बुराईयां गिनाते-सुनाते, इस से पैदा होने वाले बीमारयों से जूझ रहे मरीज़ों की आपबीती दुनिया तक पहुंचाते पहुंचाते हम बूढ़े हो गए हैं...पिछले 15-20 बरसों में यही कोई 150-200 लेख तो इस ज़हर के विभिन्न पहलुओं को कवर करते हुए हिंदी और इंगलिश में लिख लिख कर बहुत से काग़ज़ काले कर डाले 😄 ...अब इच्छा नहीं होती...इस के लिए जितना ज़रूरी कंटैंट क्रिेएट करना था, कर दिया है ...सब कुछ ऑनलाइन पडा़ है ... बिल्कुल कॉपी-लेफ्टेड रखा है ....उसे कोई भी कापी करे, पेस्ट करे, कहीं भी इस्तेमाल करे...बिल्कुल भी किसी तरह का क्रेडिट भी नहीं चाहिए.....लेकिन बस पान मसाला हमेशा के लिए छुड़वाने में जुट जाए।

पान मसाले पर चाहे मैं अब लिखता नहीं हूं लेकिन इस का इस्तेमाल करने वाले हर इंसान की 10-15 मिनट की ब्रेन-वॉशिंग क्लास मैं ज़रूर लेता हूं ...बस, कुछ लिखने का मन नहीं करता ...जितना कहना था, कह लिया...वैसे भी लोग इस पर लिखी वार्निंग से नहीं डरे,...फिर सरकार ने डरावनी तस्वीरें इस के पैकेट पर छपवानी शुरू कीं...उस से भी नहीं डरे...यह एक बहुत बड़ा काम था सरकार के लिए...पान मसाला, गुटखा व्यापारीयों का खेल बहुत बड़ा है, वे नहीं चाह रहे थे इस रूप में पिक्टोरियल वार्निंग जिस तरह की हम आज कल इन पैकेटों पर देखते हैं... सुप्रीम कोर्ट तक बात गई...सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही ये ख़तरनाक तस्वीरें इन पैकेटों पर छपने लगीं। लेकिन मुझे यह कभी नहीं लगा कि लोग इन तस्वीरों से डर गये हों....नहीं, वैसे ही धड़ल्ले से चबा-खा रहे हैं, और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी हर दिन मारे जा रहे हैं....

गुटखे पर बैन लगा तो पानमसाला और पिसी हुई तंबाकू के अलग अलग पाउच मिलने लगे ... और इन को मिला लिया तो हो गया गुटखा तैयार ...यही हम आज कल हर जगह देख रहे हैं...जब यह सब देखते हैं तो बहुत दुःख होता है, सर भारी हो जाता है ...

जिस तरह से मुंह के कैंसर के रोगी का आप्रेशन करते करते कैंसर सर्जन के घंटों खड़े रहते हुए पसीने छूटने लगते हैं....8-10 घंटे चलनी वाली सर्जरी, पहले दांतों के साथ जबड़े की हड्डी को सर्जरी के द्वारा काट कर अलग करना ..फिर प्लास्टिक सर्जन का घंटों तक काटे हुए गालों को शरीर के दूसरे हिस्से से चमड़ी लेकर थोड़ा बहुत बनाने की कोशिश करना ...और सोचने वाली बात यह भी है कि कितने लोग इस तरह का इलाज करवा पाते हैं....सीधी सीधी बात है 100 में से दो चार प्रतिशत ही करवा पाते हैं...कारण आप भी जानते हैं...अधिकतर नीम हकीमों के चक्कर में पड़े पड़े हार जाते हैं...

Areca Nut- Smokeless Tobacco plays havoc with young lives! 

Oral Submucous Fibrosis in a 58-year old pan-masala chewer 

Mouth Pre-cancer in a 32-year old male 

आज बिग बी की खबर दिखी तो इस पर लिखने बैठ गया...अच्छा किया बिग बी ने जो यह पान मसाले की सरोगेट एड्वर्टाईज़िंग से किनारा कर लिया ....चलिए, आप भी मान लीजिए कि बिग बी को पता ही न था कि वे पान मसाले की सरोगेट ए्ड्वर्टाईज़िंग कर रहे थे ...होता है, कभी कभी बड़े बड़ों को धोखा हो जाता है ..

शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

बी.ए किया है, एम.ए किया ....लगता है वो भी ऐवें किया..

 यह जो खूबसूरत गीत है न यह "मेरे अपने" फिल्म का है ...बहुत अच्छी फिल्म थी...1973-74 के आसपास अमृतसर में नया नया टीवी आया था- हमारे पड़ोसी कपूर साहब ने भी उन्हीं दिनों खरीद लिया था...उन्हें मुबारक देने गए तो वहां यह फिल्म चल रही थी .. उन्होंने उठने नहीं दिया और फिर यह फिल्म वहीं बैठे बैठे देखी...यह गाना दिल में समा गया हो जैसे ...उस के बाद तो अकसर रेडियो पर बजता यह गीत सुनाई दे ही जाता था...

लेकिन यह सुबह सुबह ...बी ए किया है, एम ए किया...लगता है सब कुछ ऐवें किया...यह गीत का ख्याल कैसे आ गया। कोई भी चीज़ बिना वजह नहीं होती ...बस, इस की भी है। उस दिन मैंने एक एंटीक शॉप पर जब सुंदर फ्रेमों में आज से 55-60 साल पुरानी एक डाक्टर (नाम जान कर आप क्या करेंगे, बस इतना जानना आप के लिए काफ़ी है कि मैं सच कह रहा हूं) की कुछ डिग्रीयां दुकान में दिख गईं...

डिग्रीयां कौन सी? - इन चार फ्रेमों में बंबई यूनिवर्सिटी की एमबीबीएस, एम डी (आब्सटेट्रिक्स etc branch) -ऐसा ही एट्सेट्रा भी लिखा हुआ था ..और कॉलेज ऑफ फिज़िशियन से फैमली प्लानिंग का डिप्लोमा और गाईनी-ओब्स का डिप्लोमा....मुझे बेटे कहते हैं कि मैं एक क्यूरेटर हूं ...मुझे भी अब यही लगने लग गया है ....क्योंकि मैं पुरानी यादों को ही नहीं सहेजता, मुझे सभी एंटीक चीज़ें बहुत ज़्यादा रोमांचित करती हैं...और मैं इन को हर कीमत पर खरीद ही लेता हूं...आज से 60 साल पुराना कोई मैगज़ीन जिस के ऊपर उस की कीमत 75 पैसे लिखी हुई है ...उसे एक हज़ार में भी खरीद लेता हूं ...वह कहते हैं न कि शौक का कोई मोल नहीं होता ...यही हाल फाउंटेन पेन, एंटीक कलमदानों, इंक-पॉस्ट्स का, किताबें है...जब मैं इस तरह की एंटीक की दुकानों पर जाता हूं तो मुझे यह देख कर बड़ी राहत महसूस होती है कि इस तरह का नमूना मैं ही नहीं, और भी बहुतेरे हैं...लखनऊ की एक एंटीक शॉप पर मैंने देखा एक महिला को ...ड्राईवर के साथ अपनी बीएमडब्ल्यू में आई थी और बाबा आदम के ज़माने की कपड़े इस्त्री करने वाली प्रेस ले कर चली गई ...वह प्रेस जिसे हम लोग घर में कोयले डाल कर पहले गर्म करते थे। अपने इस शौक के चलते मुझे अपने जैसे बहुत से नमूनों को देखने का, उन से गुफ़्तगू करने का सबब हासिल होता ही है ...

खरीदते समय लगता भी है कि यार इस चीज़ की इतनी कीमत क्यों दे रहे हैं..लेकिन वह ख़्याल दो मिनट के लिए ही आता है ...

हां, तो बात रही थी उन बेहद खूबसूरत लकड़ी के पुराने फ्रेमों की ...मैंने वह नहीं खरीदे क्योंकि उन में रखी डिग्रीयां देख कर मेरा मूड खराब हुआ...पैसे वह 2 हज़ार मांग रहा था ..लेकिन दो चार सौ कम भी कर लेता, कह रहा था...लेकिन मेरी इच्छा ही नहीं हुई उन फ्रेमों को वहां से उठाने की ...

दो तीन साल पहले की बात है मैंने जब यहीं बंबई में एंटीक फ्रेम देखे तो उन में बुज़ुर्ग लोगों की तस्वीरें भी पड़ी दिखीं...मुझे तब भी बहुत ज़्यादा अजीब लगा था ..मैं कईं दिन यही सोचता रहा कि जिसने भी इन्हें इस दुकान तक पहुंचाने का काम किया ...वह बुज़ुर्ग औरत उस की भी कुछ तो लगती ही होगी....और यहां एंटीक शॉपस में चीज़ें स्क्रैप-डीलर ही पहुंचाते हैं....ये दुकानदार कोई क्यूरेटर नहीं है जो इन सब चीज़ों के लिए जगह जगह हंटिंग करते हों...लेकिन कुछ लोग करते हैं...लखनऊ में मैंने जब एक बुज़ुर्ग बंदे से एक बहुत ही खूबसूरत क़लमदान खरीदा तो मैंने उसे पूछ ही लिया कि ये सब आप को मिलते कहां हैं...उसने बताया कि इन चीज़ों को हासिल करने के लिए हमें गांव गांव की ख़ाक छाननी पड़ती है...और मुझे विश्वास है कि वह सच ही कह रहा था। 

डाक्टर साहब की डिग्रीयां देख कर मन में कईं तरह के विचार आते रहे ....किस ने उन्हें यूं ही फिंकवा दिया होगा ...क्या डाक्टर साहब ज़िंदा होंगे ..कहीं कोरोना तो नहीं खा गया उन को ..डिग्री पर लिखी तारीख से मैंने यह हिसाब भी लगाया कि अगर वे अभी होते तो आज कुछ ज़्यादा नहीं, यही 80 साल के करीब होते....आज के हालात में यह कोई इतनी बड़ी उम्र भी नहीं है ..कल ही पता चला कि लगभग इसी उम्र का एक कैंसर विशेषज्ञ रोज़ाना दस लाख रूपये कमा लेता है...जब यह पता चला तो मैंने उस के शतायु होने की दुआ की ...ताकि अच्छे से कमाई करने की उस की हसरत भी पूरी हो जाए...

ज़िंदगी में कुछ वाक्यात ऐसे होते हैं जो अमिट छाप छोड़ जाते हैं...हम अपनी डिग्रीयों को कितना संभाल संभाल कर रखते हैं...पहले तो हम लेमीनेट भी करवा लेते थे ..फिर उन्हें यहां वहां फ्लांट भी करते थे ...फ्रेम में लगा कर टांग भी देते थे ... और मैंने देखा है, अनुभव किया है कि जब ये डिग्रीयां नईं नईं हासिल होती हैं तो चंद महीनों-बरसों के लिए हम आसमां पर जैसे उड़ते रहते हैं, नीचे उतरते ही नहीं....फिर आहिस्ता आहिस्ता जैसे जैसे ज़िंदगी के थपेड़े पड़ते हैं, आटे दाल का सही भाव मालूम होने लगता है...ज़िंदगी की असलियत समझ में आने लगती है ...इन डिग्रीयों से परे भी ज़िंदगी है, यह जान जाते हैं ...इन डिग्रीयों से कहीं ज़्यादा तो जब हमें हमारे मरीज़ ही सिखा जाते हैं...बहुत कुछ तो दुनिया ही सिखा देती है ...हम जब अच्छे से घिस जाते हैं तो एक फलदार पेड़ की तरह पूरी तरह से झुक जाते हैं ......और मैंने अनुभव किया है कि जितना कोई घिस चुका है ...वह उतना ही नरम और विनम्र होता चला जाता है....यह स्टेटमेंट मैं बड़ा सोच समझ कर दे रहा हूं....वैसे भी 60 साल की उम्र में जो कुछ भी कहा जाता है, वह बड़ा सोच विचार  कर ही कहा जाता है...😄और वैसे भी हम सब देखते ही हैं कि जो शाखाएं एकदम तनी रहती हैं, झुकना जो सीख नहीं पातीं, वे अकसर आंधीयों में टूट जाती हैं..😔

चलिए, इन यादों को यहीं समेटते हैं...उस डाक्टर की याद को सलाम- क्या, आप उस का नाम जानना चाहते हैं? - नहीं, यार, यह काम नहीं होगा...वह अपने मरीज़ों के राज़ लंबी उम्र तक राज़ ही रखता रहा, और मैं उस का नाम लिख कर यह जगजाहिर कर दूं कि उस की डिग्रीयां यूं बीच बाज़ार यूं फ्रेम समेत नीलाम हो रही थीं...नहीं, नहीं, यह काम मैं नहीं कर सकता। क्योंकि सोचने वाली बात यह है कि हम लोगों का भी देर-सवेर हश्र तो यही होने वाला है ...

इसलिए नाम-वाम के चक्कर में मत पड़िए., आराम से सुबह सुबह मेरे साथ सुंदर सा फिल्मी गीत सुनिए....और जो बात इस में कही जा रही है, उसे भी याद रखिए ...आने वाला पल जाने वाला है ...😄😄कालेज के दिनों में कड़की होते हुए भी कोई भी फिल्म देखने से महरूम न रहे...और कालेज की पढ़ाई से कहीं ज़्यादा इन की सपनीली दुनिया के सुनहरों ख़्वाबों में ही खोेए रहे....क्या करें, यह तो भई सारा कसूर उस बाली उम्र का था!!!😉

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

अमृतसर का नवरात्रि उत्सव ...यादों के पिटारे से

पंजाबी में हम नवरात्रि को नवरात्रे या कई बार जल्दबाजी में नराते भी कह देते हैं ...कल दोपहर में पता चला कि हमारे एक साथी ने यहां मुंबई में अपने घर में घट की स्थापना की है ...यह पता लगने पर हमने भी सोचा कि अपने यादों की पिटारी को हम भी खोल लें...

जी हां, यह पचास साल पुरानी यादें हैं....अब आप सोच रहे होंगे कि यह सब लिखने की क्या ज़रूरत ...यह भी कोई लिखने वाली बात हुई...लेकिन ये सब बातें अगली पीढ़ीयों तक पहुंचाने के लिए दर्ज करनी ज़रूरी हैं...जैसे हम लोग पुराने लेखकों का 100 साल पुराना लिखा पढ़ते हैं तो मस्त हो जाते हैं.. उस ज़माने की बातें पता चलती हैं...ये सिर्फ लेख ही नहीं, उस ज़माने के दस्तावेज़ हैं।  अगर हम नहीं लिखेंगे अपनी आपबीती तो अगली पीढ़ीयां कहां से हमारे ज़माने की बातें जान पाएगी...कैसे वह अतीत के झरोखे में झांक पाएगी। 

रही बात फ़ुर्सत की ...कोई इतना भी ज़्यादा खाली नहीं होता कि वह लिखने लग जाए....बस एक जज़्बा होता है कुछ संजो कर रख लेने का ....और हां, जब कोई नया नया ब्लॉगिंग में कदम रखता है तो उसे यह बात बड़ी अजीब सी लगती है कि उसे अपने बारे में इतनी सारी बातें लिखनी पड़ती हैं ..कुछ पर्सनल भी ...लेकिन लिखते लिखते फिर एक स्टेज ऐसी आती है कि ब्लॉग के ज़रिए हमारी ज़िंदगी एक खुली किताब जैसी ही लगने लगती है ...लेकिन इसमें भी कुछ मेरे जैसे लोग उस किताब को चाहते हुए भी पूरी तरह से नहीं खोल पाते, हर आदमी की खास कर के नौकरी पेशा लोगों की कुछ मजबूरियां होती हैंं ...खैर, कोई बात नहीं ...किताब जितनी खुल पाए, उतनी ही ठीक है । वैसे लिखने को तो ऐसी ऐसी बातें हैं कि सुनामी आ जाए...लेकिन हंगामा खड़ा करना अपना मक़सद भी तो नहीं।

बहरहाल, अमृतसर के नरातों की जो बचपन की यादें मेरे ज़ेहन में करीने से पड़ी हुई हैं इस वक्त उन्हें साझा कर रहा हूं...इस वक्त सुबह के साढ़े पांच बज रहे हैं ...आज नवरात्रि का दूसरा दिन है ...मैं सीधा 50-52 बरस पहले आप को अमृतसर शहर में लेकर जा रहा हूं...नवरात्रि के इन दिनों में मां और उन की चार पांच सहेलीयां सुबह घर से नंगे पांव चल कर घर से दो एक किलोमीटर दूर अमृतसर के प्रसिद्ध दुर्ग्याना मंदिर जातीं...जाते जाते रास्ते में माता की भेंटें गुनगुनाती जातीं महिलाओं की यह टोली ...और एक टोली नहीं, सडक पर महिलाओं की टोलियां ही टोलियां दिखतीं...यह वह दौर था जब महिलाओं बेधड़क इतनी सुबह भी कहीं आने जाने का बिना किसी डर के सोच सकती थीं...

मुझे कैसे पता है यह सब ...क्योंकि जहां तक मेरी यादाश्त मेरा साथ दे रही है इस वक्त दो एक बार मैं भी इतनी सुबह उठ बैठा था और मां और उन की सहेलीयों की टोली के साथ हो लिया था...मैंने उस दिन देखा कि वहां दुर्ग्याना मंदिर में ये सब महिलाएं माथा टेकती हैं, और वहां से पुजारी इन्हें छोटी गड़वी (लोटे) में कच्चा दूध देते हैं ...(कच्चा दूध मतलब पानी और दूध का मिश्रण)....लिखते वक्त कुछ बातें अपने आप ही याद आने लगती हैं...कल तक मुझे यही याद था कि वहां से महिलाएं पानी ले कर आती थीं...अभी लिखते लिखते ख्याल आया कि नहीं, वह तो कच्चा दूध होता था ...

फिर वहां से लौटते वक्त मैं किसी न किसी मिट्टी के खिलौने के लिए मचलने लगता था ...मुझे यह तो बड़ा अच्छा से याद है कि एक दिन मैं नींद से उठा और मैंने देखा मां मेरे लिए मिट्टी का खिलौना लाई हैं...एक हरे रंग का तोता- और मैं बहुत खुश हुआ था... ऐसे ही मैं कभी साथ जाता तो मिट्टी की गोलक या कोई भी और खिलौना मां ज़रूर दिलवा देती ....(एक बात जो बार बार लिखने को दिल करता है कि हमारी मां ने कभी पिटाई करना तो दूर, कभी गुस्से से देखा तक नहीं...किसी काम के लिए मना नहीं किया ..मां जब 80-85 बरस की हो गईं तो हम भाई बहन जब मिलते तो उन को यह कह कर छेड़ा करते कि आप भी कैसी मां हैं, बीजी, आपने किसी भी बच्चे को कभी पीटा ही नहीं...)

ख़ैर, आगे चलें.... लो जी ्अमृतसर के मंदिर से कच्चा दूध ले आई मां ...और हां, एक बात तो लिखनी भूल ही गया कि सुबह मंदिर जाने से पहले नहाना भी ज़ूरूरी होता था...और फिर वहां से लौट कर उस कच्चे दूध को खेतरी में डाला जाता था ...हर जगह पर अलग अलग नाम हैं...बहुत सी जगहों पर जिसे घट स्थापना (कलश स्थापना) कहते हैं...उसे अमृतसर में खेतरी बीजना कहते थे ... नवरात्रि शुरू होने के एक दिन पहले ही एक मिट्टी का बर्तन ले आते थे ..और साथ में जौं भी मिलते थे ..आजकल की तरह मिट्टी भी बाज़ार से नहीं लानी पड़ती थी ...क्योंकि हम लोग हर मिट्टी ही से जुड़े रहते थे...आस पास मिट्टी की कोई कमी न थी, इसलिए उस मिट्टी के खुले से कटोरे में जौ बीज दिए जाते थे ...और रोज़ाना बड़ी श्रद्धा भाव से उस में कच्चा दूध डाला जाता था...

दो तीन दिन पहले मुंबई के भायखला इलाके में भी घट बिकते दिखे- मिट्टी समेत!

बात एक और याद आ रही है कि नवरात्रि के दिनों में मां पूरी रामायण ज़रूर पढ़तीं ...वैसे भी मां को रामायण पढ़ते हम अकसर देखा करते थे ..लेकिन नवरात्रि में तो पूरी पढ़ती थीं...सभी श्लोकों को पूरी लय के साथ पढ़ती और दुर्गा स्तुति का पाठ भी ज़रूर करतीं ... एक दो दिन नवरात्रि के व्रत भी रखतीं ...और उन दिनों संघाडे के आटे, कुट्टू के आटे के जो तरह तरह के पकवान बनते और विशेष तरह का फलाहार जो हम सब लोग खाते, वह हमें बहुत अच्छा लगता...तब हम ने यह कुट्टू के आटे के मिलावट के बारे में कुछ नहीं सुना था...यह तो बीस साल से ही हम देख सुन रहे हैं कि मिलावटी या पुराने कुट्टू के आटे की वजह से इतने लोग बीमार हो गए और इतने लोग परेशान हो गए।.

लीजिए, एक सप्ताह बीत गया... खेतरी में जौ की शाखाएं लहलहाने लगीं... लोग इतने सीधे कि अगर किसी की खेतरी में जौ कम अंकुरित होती तो गृहणियां उदास सी हो जाती और अगर शाखाएं बड़ी बड़ी होती तो उल्लास का माहौल होता कि भगवती मां की कृपा अपार हो गई। दुर्गाष्टमी के दिन सुबह कन्या-पूजन किया जाता ... सात कन्याएं एवं एक बालक (जिसे वीर लौंकड़ा कहा जाता था) को सादर बुलाया जाता ...मैं या मेरा भाई, कईं बार मां भी पानी से उन के पैर धोते, फिर बहन उन सब के हाथों पर मौली बांधती, मां उन्हें तिलक लगातीं...और फिर बड़े प्रेम से उन्हें पूरी-छोले-हलवा का प्रसाद खिलाया जाता और जाते समय बडे़ प्रेम से कुछ पैसे भी दिए जाते ....कितने ...अच्छे से याद है  50 साल पहले तो ये 25 या 50 पैसे का सिक्का होता, फिर एक रूपया का सिक्का ... कुछ सालों बाद हर कन्या को दस रूपये के नोट की भेंट दी जाने लगी ...कईं बार मां उन के लिए कोई स्टील का बर्तन जैसे प्लेट ले कर आतीं ...हर एक को वह दी जाती ...कईं बार रबड़ का गेंद, लकड़ी के गीटे (अब गीटे अगर आप नहीं जानते तो मैं आप को यह हिंदी में समझा नहीं पाऊंगा) या मां उन के लिए लाल रंग की चुन्नियां पहले से खरीद कर रखतीं उन्हें भेंट देने के लिए। 

कन्या पूजन को पंजाबी में कंजक बिठाना ही कहते हैं ...कंजकों के जाने के बाद ही हम लोग पूरी-छोले और हलवे पर टूट पाते ...और तब तक खाते रहते जब तक खाते खाते थक ही न जाते ..और अकसर उस दिन दोपहर में भी हलवा-पूरी ही चलता ...

अब सुनिए...दुर्गाष्टमी के दिन शाम को मोहल्ले की औरतें इक्ट्ठा हो कर बच्चों को साथ लेकर उस खेतरी को प्रवाह करने जातीं...अभी मैं अपनी बहन के साथ बैठा उन दिनों को याद कर रहा था तो वह भी झट से बोलीं...बिल्ले, हमें उस मेले में जाकर कितना मज़ा आता था। जी हां, उस खेतरी को हम लोग दुर्ग्याणा मंदिर में रख आते थे ...वहां पर हम हज़ारों खेतरियों का पहाड़ लगा हुआ देख कर हैरान हो जाया करते ...फिर वहां से मंदिर के प्रबंधक उन्हें किसी ट्रक-ट्राली में डाल कर सामूहित तौर पर बहते पानी में प्रवाह कर देते थे ...और उस शाम मंदिर के बाहर एक मेला लगा होता था ...आलू की टिक्की, तीले वाली कुल्फी, चाट-पापड़ी, गोलगप्पे, बर्फी-जलेबी ..क्या था जो उस दिन हमें वहां दिखता न था....सब लोग जितना दिल चाहे खाते थे ...मैंने उन मेलों में 60 पैसे की आलू की टिक्की जो खाई हैं कुछ बरसों तक वैसी मैंने कभी 60 रूपये में भी नहीं खाई...वह हरी चटनी, और प्याज़...कुछ अलग ही जादू है अमृतसर के खाने-पीने में ....मैं कहीं पर भी इस की गवाही देने के लिए तैयार हूं...

फिर जैसे जैसे हम बड़े हो गए...हम झिझकने लगे...उस मेले में जाना बंद हो गया...मां ही सहेलीयों साथ चली जातीं....

नवरात्रि के दिनों के बारे में एक बात और भी तो दर्ज करनी है कि वैसे भी हमारे घर में मंगलवार के दिन मीट-अंडा नहीं बनता था ..लेकिन नवरात्रि के दिनों में तो बिल्कुल नहीं ..लोग लहसून-प्याज़ तक का इस्तेमाल नहीं करते थे...अब मुझे याद नहीं कि इतने सब पतिबंध हमारे यहां भी लगते थे या नहीं, लेकिन मेरे ख्याल में नहीं.... बस, मीट-अंडे से उस हफ्ते दूर रहते थे...अब तो 25 साल से सब कुछ छोड़ रखा है ..कभी यह सब खाने की इच्छा ही नहीं होती ...अंडा तो मैंने कभी भी नहीं खाया, बताते हैं कि बचपन में अगर देने की कोशिश की जाती थी तो मैं थूक देता था ...बस, इसीलिए आज तक अंडा खाया ही नहीं। 

अरे यार, मैं पोस्ट बंद करने लगा हूं और अमृतसर के नवरात्रों की एक विशेष बात तो शेयर करनी भूल ही गया ....वह यह है कि जो नवरात्रे इन दिनों में आते हैं वहां पर छोटे बच्चों और बड़ों को लंगूर बनाने का चलन है ...यह क्या है, सुनिए....लोगों ने जैसे कोई मन्नत मांगी ...और जब उन की मनोकामना पूर्ण होती है तो वे उस बच्चे या बड़े को सात-आठ दिनों के लिए अमृतसर के हनुमान मंदिर में लंगूर बना कर ले जाते थे...

घर ही से बच्चे को लंगूर के कपडे़ पहना कर ढोल बाजे के साथ मंदिर तक जाना होता था ...वहां जा कर माथा टेक कर फिर ढोल-बाजे की रौनक के साथ घर वापिस लौटना होता था ...मुझे अच्छे से याद है कि लंगूर की ड्रेस कुछ लोग तो सिलवा लेते थे, और कुछ मंदिर के पास ही बनी दुकानों से किराये पर भी ले लेते थे ...हमें लंगूर देख कर बहुत मज़ा आता था..हम घर के अंदर कुछ भी कर रहे होते, जैसे ही हमें ढोल की आवाज़ सुनती हम सब काम छोड़ कर लंगूर के नाच का आनंद लेने बाहर आ जाते और तब तक वहीं खडे़ रहते जब तक वह आंखों से ओझिल न हो जाता ....और हां, जो परिवार अपने किसी बच्चे या बड़े को लंगूर बनाता तो आस पास रहने वाले अपने सगे-संबंधियों और मित्रों को भी निमंत्रण देता कि आप भी हमारे साथ चला करिए ...और लोग जाते भी थे....

अभी मैं अपनी बात पूरी कह नहीं पाया...लेकिन उसे पूरी ज़रूर करूंगा. ..अमृतस के इन नवरात्रों के बारे में और भी लिखूंगा....महान गायक नरेंद्र चंचल से जुड़ी यादें भी अभी साझा करनी हैं...मधुरतम यादें बचपन की। 

अब बहुत हो गया....कुछ और याद आएगा तो फिर से लिख दूंगा ...अभी के लिेए इतना ही काफी है...यही सोच रहा हूं कि हम लोगो का बचपन भी कितना ख़ुशग़वार गुज़रा है ...सुनहरी यादों का ख़ज़ाना है अपने पास ....आज के दौर का गाना भी है न एक सुंदर सा ...यह दिल है मेरा यारा इक यादों की अल्मारी, जिस में रखी है मैंने यह दुनिया सारी...यह रहा इस गीत का लिंक (अगर नीचे दिया लिंक न चले तो।...

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

धीरे धीरे सुबह हुई ...जाग उठी ज़िंदगी..

मैं अपने मरीज़ों को यह ज़रूर कहता रहा हूं कि दिन में जब भी मौका मिले टहल लिया करो....और सुबह का वक्त तो इस काम के लिए सब से बेहतरीन होता ही है... दोस्तो, मैंने ऐसे ऐसे लोगों को वॉकर के साथ टहलते देखा है कि अगर ८-९ बजे तक लंबी ताने सोए रहने  जवान लोग उन्हें बाग में टहलते देख लें तो शर्म से पानी पानी हो जाएं...

मुझे अगर मरीज़ कहते कि हम ज़्यादा चल नहीं सकते तो मैं उन्हें कहता कि आप ने रेस नहीं लगानी, जितना आराम से चल सकते हैं, उतना चलिए...चलने का लुत्फ़ लीजिए...कुछ ऐसे महिलाएं जो कहतीं कि बिल्कुल भी कहीं जाने की तमन्ना ही नहीं होती...चलने की तो बिल्कुल नही....मैं उन्हें कहता कि जब भी वक्त मिले घर के पास के किसी बगीचे में ही बैठ जाइए..सर्दी है तो धूप का आनंद लीजिए, पेड़ पौधे, फूल-पत्ते देख कर तबीयत को हरा-भरा रखिए....कुछ तो मान भी लेते हैं ...

मैं सब को यही कहता हूं कि जितना भी हो सके एक-आध घंटे के लिए ही सही, घर से निकला तो करिए...जब भी हम लोग सुबह बाहर निकलते हैं, कुछ न कुछ नया दिखता है, क़ुदरती नज़ारे दिखते हैं...अचानक रास्ते में वे चीज़ें दिख जाती हैं जिन की तरफ़ वैसे दिन भर की आपा-धापी में कभी ध्यान ही नहीं जाता। 

कहते तो हम रहते हैं जब भी मौका मिलता है सभी को ...जो नहीं मानते उन से भी कोई गिला-शिकवा नहीं ...क्योंकि हम लोग नसीहत देने वाले ही कहां अपनी कही बातें ख़ुद मानते हैं...मैं सुबह सुबह साईकिल पर दूर तक जाना बहुत पसंद करता हूं ...मैं पिछले साल इन्हीं दिनों साईकिल पर रोज़ सुबह २०-२५ किलोमीटर घूम कर आता है ..ज़्यादातर तो बांद्रा से जुहू बीच होते हुए, वर्सोवा बीच तक जाता था और वहां से वापिस लौट आता था...कईं बार तो जुहू बीच की रेत पर अपनी फैट-बाइक भी चलाता था ..


फिर किसी बंदे ने नेक सलाह दे दी कि उस रेत में साई्कल चलाने में जितना ज़ोर लगता है न, तुम अपने घुटनों की बची-खुची सलामती भी खो दोगे... और मैंने यह सलाह मान ली। २ महीने साईकिल चलाया और वज़न १०-१२ किलो कम हो गया था...लेकिन पिछले ११ महीनों से साईकिल नहीं चलाता ...कोई कारण नहीं, जा सकता हूं लेकिन नहीं, आलस करता हूं ...पता भी है कि इस उम्र में बहुत ज़रूरी है ..अभी मैं कुछ दिन पहले सुबह साईकिल पर घूमने गया था ...बहुत अच्छा लगा था...बांद्रा से जुहू होते हुए इस्कॉन टेंपल तक गया और वापिस लौट आया...वही बात है, जैसे एक प्रसिद्ध कहावत है कि ...कुछ भी करने के मौसम नहीं, मन चाहिेए।

और जहां तक सुबह टहलने की बात है....वह भी कईं कईं दिन बाद ही होता है ....घर के आस पास ही किसी काम की वजह से जहां भी जाना होता है, वह पैदल ही जाता हूं और इसीलिए मैं यहां नया स्कूटर नहीं खरीद रहा हूं ..क्योंकि मुझे अपना पता है अगर मेरे पास स्कूटर होगा तो जैसा मैं हूं ...मैं अपनी टांगों को थोड़ी बहुत ज़हमत देनी भी बंद कर दूंगा। 

जहां हम अब रहते हैं...उस के सामने बीच है ...बढ़िया प्रॉमेनेड है, पास ही ख़ूबसूरत जागर्स पार्क है...और 10-15 मिनट की पैदल की दूरी पर बैंड-स्टैंड है वहां का भी प्रॉमनेड बहुत बढ़िया है ...इस एरिया में फिल्मी हस्तियां, मॉडल टहलते दिखते हैं अकसर ...लेकिन हम कईं कईं दिन बाहर निकलने का मूड बनाने में ही निकाल देते हैं...और जिस दिन अगर कभी टहल ही आएं तो सारा दिन वे तस्वीरें शेयर कर कर के दूसरों का जीना दूभर कर देते हैं... जैसा कि मैं अभी करने वाला हूं ...😎

मेरी बहन आई हुई हैं ...मेरे से 10 साल बड़ी हैं...डाक्ट्रेट हैं, यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर रही हैं...अभी भी यूनिवर्सिटी क्लासेस के लिए बुलाती है ..मुझे आठवीं तक इंगलिश-विंग्लिश खूब अच्छे से पढ़ाती थीं, मैं इन से अपने दिल की सभी बातें शेयर कर लेता था... आठवीं में पढ़ ही रहा था कि इन की शादी हो गई, मुझे बुरा लग रहा था, लेकिन मन में कहीं न कहीं यह भी खुशी थी कि अब इन का साईकिल मुझे मिल जाएगा...कल सुबह उन्हें बैंड-स्टैंड की तरफ़ लेकर गया तो बहुत अच्छा लगा...आलस त्याग कर जब भी सुबह उठ जाते हैं तो अच्छा ही लगता है ... 

ज़िंदगी की आपा-धापी में हम लोग बहुत सी चीज़ों को तो नोटिस भी नहीं करते ...बैंड-स्टैंड के पास ही अभिनेत्री रेखा के बंगले (बसेरा) के सामने यह बैंच हमने कभी आते जाते नोटिस ही नहीं किया था ... यह भी कोई दो एक सौ साल पुराना है ...और देखने लायक है ..

ध्यान से देखिए बंदा वॉकर की मदद से नीचे समंदर की लहरों तक पहुंच गया है ...जहां चाह वहां राह!!

रिमांइडर हर तरफ़ मिलते हैं हमें, लेकिन हम किसी की बात सुनें तों...यह एलडीएल को देख कर मुझे भी ख्याल आया कि कुछ दिन पहले करवाए मेरे लिपिड प्रोफाईल में भी कुछ लफड़ा था..डा जायस्वाल मैम ने कहा भी था कि ख़ूब तेज़ तेज़ रोज़ टहला करो...आज यह रिमांइडर फिर से मिला...

हैरानगी की बात यह भी है कि इतनी बार गये हैं इस तरफ़ लेकिन कभी यह चिल्ड्रन-पार्क की तरफ़ ध्यान ही न गया...आप यह तो नहीं सोच रहे न कि चिल्ड्रन पार्क में तुम क्या कर रहे हो...हम भी तो अभी बच्चे ही हैंं!

कौन है जिसे इन सुंदर फूलों को यूं ज़मीन पर पड़े देख कर "पु्ष्प की अभिलाषा" याद न आ जाती होगी!


सी.एस.आर भी अच्छी बात है ....कुछ बातें याद दिलाते रहना भी एक बड़ी ख़िदमत है ...

एक नेक महिला प्लेट में इस महारानी को खानी परोस रही दिखी ...और इसे बड़े प्यार से कुछ कह भी रही थीं साथ साथ ...शायद यह कह रही होगी कि तुम इतना बिगड़ा मत करो, अब मान भी जाओ...घर से निकलते निकलते कभी देर हो भी जाती है....मैं ऐसी सभी महिलाओं के इस जज़्बे के आगे नतमस्तक हूं ...

जनाब कौआ जी धरने पर बैठे हों जैसे...मानो कह रहे हों कि यह तो सब कुछ कबूतरों के लिए लिखा है, मेरे पेट पर क्यों लात मार रहे हो, मुझे भी तो कुछ खिलाओ...पिलाओ

सिर्फ इस लिए खीले (कील) ठोंक दिए गये हैं ताकि आते-जाते कोई थका-मांदा राही गल्ती से भी दो मिनट चैन की सांस न ले ले .....यह भी है मुंबई नगरिया तू देख बबुआ...जो अमिताभ न दिखा पाया डॉन फिल्म के उस गाने में ...

आज यहीं बंद करते हैं ..आज तो हम नहीं गए टहलने, कल के नज़ारों को ही इस पोस्ट में समेटने में लग गए...और कल सुबह से जिस गीत का बार बार ख़्याल आ रहा है, अब हम सब मिल कर वह गीत सुनते हैं- 'धीरे धीरे सुबह हुई...जाग उठी ज़िंदगी'...मेरे लिए यही सुबह की प्रार्थना, इबादत भी है ...जिसे बार बार कहने-सुनने को दिल मचलता है....😄यसुदास की मधुर आवाज़ के नाम!