Friday, November 21, 2014

सोवा मेथी के बारे में कल पहली बार सुना

देश के जिन हिस्सों में मैं अभी तक रहा वहां मेथी का मतलब...मेथी आलू की सब्जी या फिर मेथी वाली मक्के की रोटी। दोनों की फोटो मैंने अपने गांव में पिछले महीने ली थीं.......यहां नीचे लगाई हैं..।
आलू मेथी की सब्जी... पकौड़ी का रायता

मेथी वाली मक्की की रोटी 
कल पहली बार इधर लखनऊ में सोवा मेथी के बारे में सुना... सोवा भी एक सब्जी है, और मेथी तो आप जानते ही हैं। कल पता चला कि यहां लखनऊ में यह सब्जी इक्ट्ठी मिलती है। मेथी का स्वाद थोड़ा कसैला होता है और सोवा का स्वाद उस से बेहतर......इसलिए दोनों को मिला कर सब्जी को तैयार किया जाता है।
सोवा और मेथी के पत्ते 
सोवा सब्जी की फोटो भी यहां ऊपर लगाई है। गूगल पर सोवा लिख कर सर्च किया तो पता चला कि यह तो एक बहुत ज़्यादा पौष्टिक साग है। इन्हें इंगलिश में Dill leaves कहते हैं।

मुझे जब इस नईं सब्जी के बारे में पता चला तो मैं यही सोच रहा था कि बाज़ार में इतनी सब्जियां हैं और हम लोग बचपन से सब्जियां खाते आ रहे हैं.....फिर भी अभी नईं नईं सब्जीयां दिखती रहती हैं जिन्हें अभी तक देखा नहीं, जिन के नाम तक नहीं जानते.....खाना तो दूर रहा।

विचार यह भी आ रहा था कि  आज की इंटरनेट पीढ़ी को कितना ज्ञान होगा इन दाल-सब्जियों का......अधिकतर युवा आज कल सब्जियों और दालों से दूर भागते हैं......यही लगा कि सब्जी खरीदते समय युवाओं को भी साथ लाना चाहिए...शायद उन की रूचि इसी बहाने साग-सब्जियों-दालों में बढ़ जाए। काश!!

एक सब्जी देखी जिस का मुझे नाम ही नहीं पता......यह रही उस की फोटो....सब्जीवाले से उस का नाम तो पूछा लेकिन याद नहीं रहा।
क्या आप इस सब्जी का नाम जानते हैं?
आगे देखा अलग तरह के शलगम नज़र आए........वैसे तो अब आम ही दिखने लगे हैं......लाल रंग के.........जैसे कि इन लोबिया की फलियों का रंग भी अलग ही दिखा।

इस रंग की लोबिया फलियां बहुत कम दिखती हैं ना..
सब्जी मार्कीट में जा कर सच में अपने अल्प ज्ञान का अहसास होने लगता है। ऐसा लगने लगा है कि बच्चों को सब्जी मार्कीट में साथ ज़रूर लेकर जाना चाहिए। वो जिन सब्जियों को जानेंगे तो फिर खाएंगे भी .....वरना, जो सब्जियां बच्चे बचपन या युवावस्था में नहीं खाते, वे फिर ताउम्र उन से दूर ही रहते हैं।

मिलखा सिंह जैसे नहीं हैं तो क्या घर बैठ जाएं.....



मिलखा सिंह अगर किसी समाज कल्याण के विज्ञापन में आकर लोगों को सक्रिय रहने के लिए प्रेरित करता तो मुझे बहुत खुशी होती......जब वह एक टॉनिक के विज्ञापन में आकर एक आदमी को कंप्लैक्स देता दिखता है कि क्या आप सीनियर सिटिज़न हैं तो मुझे तो यह ठीक नहीं लगता।

हर आदमी की अपनी शारीरिक क्षमता है...अपनी सीमाएं हैं, अपनी शारीरिक, मानसिक मनोस्थिति है....यह विज्ञापन ज़्यादा ठीक नहीं लगा मुझे कभी, इस से गलत संदेश जाता दिखता है कि जैसे एक चम्मच रोज़ाना खा लेने से ही सब कुछ बदल जाएगा। नहीं, ऐसा नहीं है।

हमें किसी को किसी भी तरह का कंप्लेक्स नहीं देना है.....हर एक को सुबह सवेरे या शाम को घर से निकलने के लिए प्रेरित करना है।

अकसर आपने सुना होगा कि रोज़ाना ३०-४० मिनट रोज़ाना टहलना शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। यह शरीर और मन में नई स्फूर्ति प्रदान करता है, ऐसा हम सब ने अनुभव तो किया ही है, चाहे हम इस का नियमित अभ्यास करें या ना करें।

तो फिर क्या इस का यह मतलब है कि जो इतना ना चल पाए या इतनी तेज़ न चल पाए... तो वह घर ही बैठ जाए। मुझे लगता है कि लोगों में इस बारे में बहुत गलतफहमी है।

मेरे पास दिन में बहुत से मरीज़ बुझे हुए चेहरे लेकर आते हैं......मुझे पता है कि केवल दवाईयां इन का कुछ नहीं कर पाएंगी। बात करने पर पता चलता है कि वे घर से बाहर निकलते नहीं, टहलने जाते नहीं, घुटने दुःखते हैं.....सांस फूल जाती है। ठीक है, ये सब जीवनशैली से संबंधित रोग एक उम्र के बाद घेर ही लेते हैं लेकिन इस का भी यह मतलब नहीं कि आप घर पर ही डटे रहें और सुबह सुबह सतपाल के आश्रम से बरामद होने वाली ऐश्वर्य की चीज़ों की लिस्ट बनानी शुरू कर दें।

कल ही मेरे पास एक बुज़ुर्ग महिला अपने पति की बात करने लगी कि सारा दिन अखबार, सारा दिन टीवी, सारा दिन खबरें.....कह रही थीं कि घर से निकलते ही नहीं, मैं कईं बार कहती हूं....कि कितनी देखोगे खबरें, क्या प्रधानमंत्री बनोगे?  कह रही थीं कि मेरी तो ज़िंदगी की अपनी इतनी लंबी सीडी तैयार हो चुकी है कि मैं तो वही देख देख कर थक जाती हूं।

आज एक बुज़ुर्ग आया....उसे बहुत सी तकलीफ़ें हैं...मैंने जब टहलने की बात की तो कहते हैं कि हां, सुबह घर की छत पर चला जाता हूं......घर के पास ही एक बाग है, मैंने कहा कि आप वहां चले जाया करें......और रोज़ाना एक घंटा वहां बिताएं.....सूर्योदय का आनंद लें, हरियाली देखें, पक्षियों के गीत सुने, पुराने दोस्तों-परिचितों से हंसी-ठ्ठा करिए.....आप दो चार दिन यह कर के देखिए तो आप अपने आप को कितना खुश पाएंगे.......शायद उन्हें मेरी बात अच्छी लगी, हंसने लगे, कहने लगे कि मेरा ध्यान इस तरफ़ तो कभी गया ही नहीं........मैंने कहा कि यह किस ने कहा कि कि आपने अपनी क्षमता से ज़्यादा तेज़ तेज़ चलना है, हांफना है......ऐसा कुछ नहीं है, आप खुशी खुशी जितना मस्ती से अपनी रफतार में टहल सकते हैं, टहलिए.......३०-२०-१० मिनट टहल कर अगर मन करे तो कहीं बैठ जाएं....फिर से टहलना शुरू कर दें.......वह एक घंटा बस अपने लिए रखें।

वैसे यह नुस्खा हम सब के लिए हैं.....काश, हम सब की परिस्थितियां ऐसी बन पाएं कि वे सुबह का एक घंटा हम सब प्रकृति की गोद में बिता पाएं.......

जिस बाग में मैं जाता हूं उस में जो जगह मुझे बहुत पसंद है ये तस्वीरें मैंने आज सुबह उस जगह की खींची थी......इस जगह पर पहुंचते ही मुझे जंगल में पहुंच जाने का अहसास होता है....



िजस बाग में मैं टहलने जाता हूं वहां का एक कोना
एक बात और है कि बागों में बहुत से बैंच लगे होने चाहिए ताकि कोई भी जब चाहे जहां चाहे बैठ कर सुस्ता लें, ध्यान हो जाए, प्राणायाम कर लें........

तो फिर आपने क्या सोचा.....बस हवन ही करेंगे या मस्ती से थोड़ा बहुत टहलेंगे भी !!

ऐसा ताज़ा बकरा, मुर्गा, और मछली किस काम के !!

थोड़े से पानी में छटपटाती ये मछलियां.. मार्केटिंग टूल 
आज बाद दोपहर जब मैं एक दुकान पर खड़ा था तो सामने वाली दुकान मीट-मछली की थी.....मेरा ध्यान एक बर्तन की तरफ़ गया जिस में बहुत कम पानी में कुछ मछलियां छटपटा रही थीं....बहुत बुरा लगा ये देख कर। यह जो तस्वीर आप यहां देख रहे हैं, वहीं की तस्वीर है।

ज़ाहिर सी बात है कि वह दुकानदार अपनी बिक्री चमकाने के लिए यह सब ड्रामेबाजी कर रहा था....उसी समय आप छटपटाती हुई कोई भी मछली पसंद करिए...उसे समय उसे काट कर आप को थमा िदया जायेगा। 

बात इस दुकानदार की ही नहीं है, मैंने बहुत जगहों पर इधर लखनऊ में नोटिस किया है कि मछली बेचने वालों ने एक बर्तन में थोड़ा पानी डाल कर कुछ मछलियां छटपटाने के लिए छोड़ रखी होती हैं। मुझे यह मंजर बहुत ही बुरा लगता है....अमानवीय तो है बेशक। 

इस तरह से ताज़ा-तरीन मछलियों के दाम भी दूसरी पहले से मृत मछलियों से ज़्यादा होती होगी शायद......क्योंकि मैं शाकाहारी हूं पिछले २५ वर्षों से .....कोई भी धार्मिक कारण नहीं ..बस यह सब खाना अच्छा नहीं लगता, इसलिए बिल्कुल भी नहीं.......घर में कोई भी नहीं खाता। 

कभी आपने साईकिल के पीछे मुर्गे-मुर्गियों को ठूंस कर एक जाल में ले जाते देखा है......मैंने बहुत बार देखा है.....कितना असहाय महसूस कर रहे होते हैं वे जानवर उस समय.....और तौ और, एक बात और नोटिस की कि लोग अपने सामने ज़िंदा मुर्गे को कटवाते, साफ़ करवाते हैं......सोचने वाली बात यह है कि उस जानवर के शरीर में डर खौफ़ की वजह से क्या क्या हार्मोन्ज़ रिलीज़ न होते होंगे.........लेकिन हमें क्या, हमें तो ताज़े मुर्गे से मतलब है!

मुझे जांघ चाहिए, मुझे गुर्दा, मुझे कलेजा...मुझे सिरी (दिमाग)...मुझे चांप
जब मैं स्कूल कालेज में था तो खूब मीट खाया करते थे.....मेरे पिता जी को बहुत शौक था....अलग अलग चीज़ें उस में डाल कर लज़ीज़ मीट तैयार होता था...हमें भी कहां इतना समझ थी कि हम खा क्या रहे हैं.....बस, इतना पता था कि शायद मीट की दो तरह की दुकानें हुया करती थीं...अमृतसर शहर की बात कर रहा हूं.....लेिकन मीट खरीदते जाते वक्त यह हिदायत दी जाती थी कि फलां फलां झटकई से ही लाना है......झटकई पंजाबी का शब्द है जिस का मतलब है जो झटका मीट बेचता है अर्थात् जिस कसाई के यहां बकरे की गर्दन को एक झटके ही में अलग कर दिया जाता है। 

हां, वह बात तो बताना भूल ही गया कि मीट खाना कब से बंद किया....यह १९९० के दशक के शुरूआत की बात है.....मैं और मेरी बीवी हम लोग पूना गये थे.....एक हॉटेल में गये.....वहां जो मीट हमें दिया गया......वह चबाया ही नहीं जा रहा था......हम सारी बात समझ गये.....बस उस दिन के बाद फिर मीट-मछली-मुर्गा खाने का मन ही नहीं किया। 

वैसे भी आज कल मुर्गे वुर्गे बड़े करने के चक्कर में क्या क्या गोरखधंधे हो रहे हैं, किस तरह से कैमीकल्स और हारमोन्ज़ इन में टीके की शक्ल में पहुंचाए जाते हैं, यह तो हम सब मीडिया में देखते सुनते रहते हैं...है कि नहीं?

 मुझे पता है मेरे यहां चार पंक्तियां लिखने से यह सब बंद नहीं होने वाला, लेकिन फिर भी हम लोग इस क्रूरता के बारे में तो सोच ही सकते हैं.........क्या आप को लगता है कि पानी में छटपटाती उस मछली को काट कर खा लेने से हम लोग ज़्यादा मर्द बन जाएंगे?...

नोट........इस पोस्ट को लिखने का कोई भी धार्मिक उद्देश्य नहीं है... वैसे भी मैं बस एक ही धर्म को जानता हूं जिसे मानवता कहते हैं। मछलियों की पीड़ा आज देखी तो दिल को बात लग गई, आप से साझा कर ली। 

इस फिल्मी गीत में भी शूटिंग के िलए एक मछली को छटपटाया तो गया......

बच्चों को तो हम शुरू से पढ़ाते ही हैं.....शायद उन की पहली कविता......मछली जल की रानी है, जीवन उस का पानी है, बाहर निकालो मर जायेगी.............जितनी हवा हमारे लिए ज़रूरी है, उतना ही पानी भी मछली की श्वास प्रक्रिया के लिए ज़रूरी है....कल्पना करिये किस तरह से खिड़कियां बंद होने पर हवा थोड़ी सी कम होने पर ही जब हमारा दम घुटने लगता है और हमारी फटने लगती है........है कि नहीं??