Wednesday, January 30, 2008

अब इन बेकरी वालों को समझाने की बारी आप की है!



मैं तो दोस्तो इन बेकरी वालों को यह छोटी सी बात समझाते समझाते थक सा गया हूं...लेकिन मुझे आप से बहुत उम्मीदें हैं। शायद आप की ही बात उन के मन को लग जाए।

चलिए मैं अपनी बात रखने से पहले एक बेकरी की अच्छी बात भी आप के सामने रख रहा हूं। कुछ दिन पहले पास ही के एक शहर की किसी मशहूर बेकरी पर पेस्ट्री खाने का मौका मिला। साफ़-सफ़ाई बहुत बढ़िया थी। और मज़े की बात तो यह थी कि पेस्ट्री को भी एक पेस्ट्री से थोडसे बड़े साइज़ के एक कप मेपरोसा जा रहा था। इस कप को आप इस तसवीर में देख रहे हैं। ये छोटी छोटी बातें ही होती हैं जो कुछ जगहों का नाम काफी ऊपर उठा देती हैं।


हां, तो अब मैं अपनी बात पर आता हूं। मैंने देखा है कि अच्छी अच्छी बेकरियां भी जो केक बना कर बेचती हैं , वे जिस डिब्बे में केक डाल कर ग्राहक के हाथ में देती हैं वे तो बहुत बढ़िया होते हैं, लेकिन कभी आप ने ध्यान किया है कि जिस वस्तु के ऊपर यह केक पड़ा होता है, वह एक थर्ड-क्लास किस्म का गत्ता (cardboard) ही होता है, जो सरे-आम बीमारियों को खुला निमंत्रण दे रहा होता है। हां, कुछ चालाक किस्म के दुकानदारों ने इसे एक बिलकुल पतले से कागज़ से ( वही कागज जो गिफ्ट रैपिंग के लिए इस्तेमाल होता है) कवर रखा होता है, कुछ तो इस काम के लिए किसी अखबार का ही इस्तेमाल कर लेते हैं। क्या हम यह नहीं जानते कि ये सब हमारी सेहत के लिए कितना हानिकारक हैं....शायद आप ने भी नोटिस किया होगा कि घर तक लाते-लाते यह कागज़ गल चुका होता है और केक के साथ शायद आप के शरीर में ज़रूर जाता होगा।

मैंने कईं बार इन बेकरी वालों को टोका है कि क्या एक-दो रूपये बचाने के पीछे लोगों को बीमार कर रहे हो। इस गत्ते के ऊपर कम से कम ढंग का एल्यूमीनियम फॉयल तो लगाया करो(जिस में हम लोग आज कल चपातियां रैप करते हैं)। लेकिन आप को भी यह तो पता ही है कि दुकानदार के पास हर बात का जवाब पहले से तैयार होता है कि क्या करें...ग्राहक इतने पैसे कहां खर्च करता है। लेकिन मैं उन के इस तर्क से कभी भी न तो सहमत हुआ हूं और न ही कभी होऊंगा। अब जो ग्राहक किसी केक के लिए 165 रूपये खर्च रहा है तो उसे मेरे ख्याल में एक साफ़-सुथरी पैकिंग में दिए गये केक के लिए 170रूपये खर्च करने में भी कहां चुभन होती है।

लेकिन मैं देखता हूं कि मेरे बार बार कहने पर भी इन बेकरी वालों के सिर पर जूं तक नहीं रेंगी...अब उम्मीद की डोर आप के हाथ में थमा रहा हूं कि आप भी अपने अपने शहर में एवं अपने परिवारजनों में इस छोटी सी ( लेकिन स्वस्थ रहने के लिए बहुत बड़ी) बात की अवेयरनैसे बढायेंगे। और मैं कर भी क्या सकता हूं?