शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

आस्था के साथ साथ पर्यावरण से दोस्ती भी ज़रूरी !

आज सुबह पांच बजे से भी पहले मैं उठ गया....वैसे भी 5-6 बजे तो उठ ही जाता हूं..लेेकिन जब पूरी रात ए.सी में सोया रह जाता हूं, सुबह अकसर सिर भारी ही होता है ...वह बड़ी खराब फीलिंग होती है ...एक कहानियों की किताब लेकर पढ़ने लगा लेकिन सिर के भारीपन की वजह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, थोड़ी चाय ली ...और फिर सोचा कि बहुत दिन हो गए साईकिल को हवा लगाए हुए...आज वर्सोवा बीच तक हो कर आया जाए...एक दो बार ख्याल आया कि अभी तो पांच सवा पांच बजे हैं, और कॉलोनी में एक-दो स्ट्रे-डॉग्स भी हैं, जिस की वजह से मैं सुबह उठ कर भी ऐसे ही बिस्तर पर पसरा रहता हूं...लेकिन फिर सोचा कि नहीं, आज चलता हूं ..देखा जाएगा....

कॉलोनी वाले डॉगी ने तो कुछ नहीं कहा ...सो रहा होगा बेचारा कल त्योहार का माल खा कर कहीं ...वैसे भी कुछ दिन पहले कोई कह रहा था कि वह हल्का हो गया है ...मतलब पगला गया है ...क्योंकि कुछ लोगों को आते जाते काटने को दौड़ रहा है ...यह भी कैसी विडंबना है कि हमें इन जानवरों का और दूसरे लोगों को हल्कापन तो आसानी से दिख जाता हैं...हम उन की लेबलिंग भी कर देते हैं....बस, हमें ख़ुद का ही पता ही नहीं मिलता कहीं भी ..वैसे भी आज का इंसान इसे भी बस एक केमीकल लोचे की तरह लेकर सोचता है कि एक टेबलेट मूड भी अच्छा कर देगी, चिंताओं से निजात भी दिला देगी......मैं कोई मनोरोग विशेषज्ञ नहीं हूं लेकिन अकसर सोचता हूं कि आखिर यह कैसे मुमकिन है ...हमारी मुश्किल यही है कि हम न खुल कर बात करते हैं, न खुल कर हंसते हैं...न ही किसी की बात ठीक से सुनते ही हैं...और यह सब इसलिए नहीं करते कि कहीं कोई हमारा फायदा ही न उठा ले....बस, यही मुश्किल है ...लेकिन मैं इस वक्त यह क्या लिखने लग गया, मैं तो साईकिल पर घूमने निकला था...

रास्ते में टर्नर रोड़ पर मुझे देख कर एक बार कोई डॉगी भौंका तो ...लेकिन उस वक्त उस सुनसान सड़कर पर यह भी मुझे कल से उस रास्ते से न निकलने का फैसला लेने के लिए काफी था। इन जानवरों से बड़ा डर लगता है ...एक बार बेटों ने एक डॉगी पाल लिया ...मैं और मेरी मां उस से इतना डरते...हर वक्त उसे चैन से बांधे ऱखना पड़ता ...बेटे कहने लगे कि यह तो बापू इस जानवर पर अत्याचार है ....चूंकि हमारी डरने की बीमारी ठीक न हुई ...और वह हर वक्त बंधा होने की वजह से चिढ़चिढ़ा सो हो गया और एक दिन हमें उसे खुले खेतों में जाकर आज़ाद छोड़ ही देना पड़ा...

चलते चलते अभी मैं जूहू बीच पर पहुंचा ही था कि मुझे वहां कुछ चीज़ों के बड़े बड़े अंबार लगे देखे...मैं रुक गया...पहले तो मुझे यही समझ मे आया कि यहां क्यों आज इतनी गंदगी हो रखी है...यहां तो रोज़ाना सुबह बीसियों वर्कर सफ़ाई किया करते हैं...फिर अचानक नज़र कुछ कलशों और मूर्तियों पर पड़ी तो बात समझ में आ गई कि कल मूर्तियों एवं कलशों का विसर्जन हुआ होगा...

प्रशासन ने इस तरह के बैरीकेड लगा कर व्यवस्था भी कर दी ..लेकिन फिर भी समंदर के अंदर तक लोग पहुंच जाते हैंं ..

ज़रा यह सोचिए कि यह मंज़र मुंबई की एक बीच का है, बहुत सी और जगहें हैं जहां पर यह सब इक्ट्ठा हुआ होगा, समंदर में जा कर मिल भी गया होगा..!!





हमारी दिक्कत यह है कि जब किसी धर्म, आस्था की बात होती है तो उसे हम लोग बड़ी दबी आवाज़ में कहते हैं, और ज़्यादातर तो कुछ कहते ही नहीं, इन बातों को दरी के नीचे ही सरका के, छिपाए रखते हैं....लेकिन हमें ज़रूरत है अब इन सब आस्था के प्रतीकों के रख-रखाव और विसर्जन के वक्त भी पर्यावरण के साथ दोस्ताना रवैया रखने की ... आज मुझे जुहू बीच पर जाकर यह लगा कि हां, सच में कोरोना चला गया है, हम वापिस अपनी पुराने रंग-ढंग दिखाने लगे हैं...

जो मैंने मंज़र जुहू बीच पर आज देखा, उस के बारे में कुछ ज़्यादा कहूंगा नहीं....बस, आप से वे तस्वीरें शेयर करूंगा...आप सब मुझ से कहीं ज़्यादा समझदार हैं, आप भी सोचिए कि क्या हम इस गतिविधि को पर्यावरण की अच्छी सेहत के अनुसार थोड़ा ढाल सकते हैं....पिछले कुछ सालों में कितना आ रहा है कि मूर्तियां इको-फ्रेंडली तैयार हुआ करेंगी ..इन सब चीज़ों के बारे में सोचना ही होगा अब हम सब को ...आस्था बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या उस में हम छोटे प्रतीक इस्तेमाल नहीं कर सकते...मैंने वहां समंदर में बहुत से स्टॉर-स्टडड कलश भी देखे ...कुछ लोग पानी के अंदर जा कर उन में से कुछ तलाश कर रहे थे ...मां भगवती की कुछ मूर्तियां भी खड़ी हुई थीं...जल प्रवाह के बीचों बीच ..फिर अचानक वे लहरों में समा गईं...

इस मौज़ू पर ज़्यादा बातें कहना-सुनना-सुनाना मुनासिब नहीं लगता...एक बार किसी फिल्मी में शम्मी कपूर एक बुज़ुर्ग आदमी का किरदार निभा रहा था, उसका एक संवाद भी यही है.....कुछ बातें कहने-सुनने में अच्छी नहीं लगतीं, उन्हें ख़ुद ही महसूस करना होता है। 





उस दिन में जब अपनी पोस्ट में अपने बचपन के नवरात्रोत्सव की बातें याद कर रहा था तो मुझे अच्छे से याद है कि उन दिनों जब हम लोग खेतरी प्रवाह करने मंदिर में जाते तो वहां उन का बड़ा सा पहाड़ लगा देख कर मां बहुत महसूस करतीं और मुझे वह बात कहती भी ...लेकिन एक बात तो थी कि उस पहाड़ में एक भी पॉलीथीन (जिसे पंजाबी मेंं मोमजामा कहते हैं) न हुआ करता था ...लेकिन ये जो जुहू बीच पर तरह तरह के चीज़ों के अंबार लगे हुए थे, उन में प्लास्टिक की थैलियों की भी भरमार दिखी ..मुझे तो यही समझ नहीं आता कि हम आखिर सुधरेंगे कब ...आए दिन हम क़ुदरत की विनाश लीला देख रहे हैं....कभी यहां, कभी वहां, लेकिन हम वातावरण के बारे में नहीं सोचते ...हमारे मन में तो बस स्वच्छता अभियान वाले दिन किसी साफ़ सी जगह पर फोटू खिंचवाने का फ़ितूर सवार रहता है, और कुछ नहीं, बाकी, हम समझते हैं हमारा फ़र्ज़ नहीं है..

बात सोचने वाली यह है कि ठीक है, बीच की सफाई हो जाएगी...लेकिन कितने कैमीकल, कितना और सामान तो समंदर में ऐसा मिल गया जो समंदर में रहने वाले प्राणियों के प्राणों के लिए आफ़त है ....कितना कोई कहेगा, कितना लिखेगा ...समझदार को इशारा ही काफ़ी होता है ...पर्यावरण से दोस्ती करिए...यही मां भगवती की सच्ची आराधना है, उपासना है ....यह जितना प्रकृति का पसार है, जल,थल, आकाश में यह सब मां भगवती की कृपा से ही हम देखते हैं ...हम अपनी आस्था के नाम पर उस क़ुदरत से, उस के जीवों से छेड़छाड़ करें और मां को अच्छा लगे, यह कैसे संभव है। 

आस्था रखिए, त्यौहार मनाइए ..लेकिन मां प्रकृति का भी ख़्याल रखिए....यही सच्ची भक्ति है, यही मां भगवती की आराधना है। 


और हां, मेरे सिर के भारीपन का क्या हुआ.....जी, बिल्कुल मां भगवती की कृपा से मां के इतने विराट दर्शन-दीदार कर के वह बिल्कुल ठीक हो गया कुछ ही वक्त में ........बस, मां, मुझे यह आशीर्वाद भी दीजिए कि मैं सुबह सुबह अच्छे कामों पर निकलने के लिए आलस न किया करूं...जय माता दी। सलीम ने इस भेंट को गाया है, इसे सुन कर मन झूमने लगता है ...वाह...क्या बात है!