Thursday, June 9, 2016

चुनावी मौसम के मजे...


कईं तरह के मौसम वैसे तो होते हैं...लेकिन मैं उन सब की बात नहीं कर रहा हूं...दूसरे कुछ तरह के मौसम...छुट्टियों का मौसम, त्योहारों का मौसम, आम का मौसम, शादियों का मौसम.....यहां तो बस मौसम ही मौसम हैं..

मुझे कुछ दिनों से चुनावी मौसम का ध्यान आ रहा है...आज सोच रहा हूं इसे लिख कर छुट्टी करूं..

जब हम लोग छोटे थे तो हमें बस इतना पता था कि चुनावी मौसम में गरीब जनता को भी भरपेट खाना मिलता है..वे उन का प्रचार-प्रसार करते हैं ..इस के बदले में पैसे और दारू पाते हैं..

फिर कुछ और बड़े हुए तो पता चला कि इस चुनावी मौसम में लोगों के कुछ रुके हुए काम भी हो जाते हैं...थोड़ा कह-कहलवा कर ... अच्छा लगता था जब पता चलता था कि किसी का राशन-कार्ड बन गया या किसी का कोई सर्टिफिकेट..

अच्छा, एक बड़ी भयंकर विडंबना है हमारे यहां कि यहां पर जितना एक आम आदमी आप को डरा-सहमा मिलेगा, उतना कोई नहीं मिलेगा.. उन लोगों के लिए राशन कार्ड मिल जाना भी एक उपलब्धि से कम नहीं होता...छोटे छोटे काम के लिए दलालों के चंगुल में फंसना, फिर दफ्तरों के धक्के खाना, फिर किसी बाबू की चापलूसी करना ...जो अपनी मुट्ठी गर्म करवा के भी काम नहीं करते..

चुनावी मौसम में इस तरह के टुच्चे काम आराम से हो जाते हैं...किसी को पकड़ कर लोग कोई न कोई जुगाड़ कर ही लेते हैं..

किसी की बिल्डिंग का नक्शा पास न हो रहा हो, वह भी चुनावी मौसम के शोरगुल में हो जाता है आराम से.. यहां तक की लोग अपनी ईमारतें भी इसी मौसम में खड़ी करना चाहते हैं क्योंकि इंस्पैक्टर लोग ज़्यादा चिक चिक नहीं करते...
हां, एक बात और बहुत अहम् कि ट्रांसफर सीजन भी यही होता है चुनाव की तारीखों के घोषित होने से पहले...
इतना सब कुछ राजनीति से प्रेरित होता है कि क्या क्या लिखें...यहां गैर-राजनीतिक बंदे के ऊपर तरस आता है ...वही बस डरा, सहमा और सिमटा सिकुड़ा रहता है ...

मैंने एक बात और नोटिस की है ..इन दिनों जब चुनावों के बादल मंडराने लगते हैं तो लोग अपने घर के आगे जितनी संभव हो सके अतिक्रमण (encroachment) कर लेना चाहते हैं... मुझे इस बात का बड़ा दुःख होता है कि घर के अंदर बीस कमरे होते हुए भी बाहर पैदल चलने वाले की  पांच फीट जगह पर ही इन की नज़र होती है ...मुझे बहुत बुरा लगता है ....और एक बात जिस का जहां मन चाहे स्पीड-ब्रेकर बनवा लेता है .. और खतरनाक किस्म के .. मैंने भी देखा आज सुबह एक ऐसा ही स्पीड-ब्रेकर जो बिल्कुल स्टीप (steep) सा था...मैं हैरान था...लेिकन इस तरह के कामों में भी पूरी रस्साकशी का खेल चलता है ... स्पीड ब्रेकर अगर दबंग १ ने बनाया है और दबंग २ उस से ज़्यादा पहुंच वाला है तो वह उसे तुड़वा देगा... यह सब चलता रहता है ... देखते रहते हैं...

ये सब बाते एक तरफ़ और जो बात मैं  अब लिखने लगा हूं वह सब से गंभीर है...बिहार चुनाव के बाद शराब पर प्रतिबंध लगा दिया गया...लेकिन यूपी में जहां तक मुझे याद है कुछ एक हज़ार से ज़्यादा शायद १५०० करोड़ के आसपास राजस्व (revenue) शराब की बिक्री से इस वर्ष कमाने का लक्ष्य है ...

शायद इसीलिए मैं लखनऊ शहर में बहुत सी जगहों पर देशी शराब के नये ठेकों के बोर्ड देख रहा था...यकीन मानिए, लगभग पंद्रह दिन पहले ऐसे ही टाट पर देशी शराब का ठेका लिख कर टंगा दिखा..फिर लड़की का कच्चा सा खोखा दिखा...कुछ दिनों खूब विरोध हुआ...विशेषकर महिलाएं बहुत रोईं-पीटी...लेिकन सुनता कौन है...दो दिन पहले देख रहा था कि अच्छे से बढ़िया टिन के ठेके तैयार हो गये हैं....और लोग बैठे वहां दारू भी पी रहे थे...

मुझे सब से ज़्यादा दुःख नये ठेके खुलने का होता है ...ठीक है, लोग दूसरे ठेके पर जा कर ले लेंगे...मैं समझता हूं..लेकिन फिर भी कुछ तो अंकुश लगेगा...और अब मैंने देखा है कि अच्छे पॉश एरिया में भी ये देशी दारू के ठेके खुलने लगे हैं...वही शोले फिल्म की लीला मौसी और अमिताभ बच्चन के संवाद वाली बात की तरह ...एक बार देशी दारू की दुकानें खुलेंगी तो दूसरे कईं तरह के अनाप शनाप धंधे भी साथ ही खुल जाएंगे....

सरकारें बड़े बड़े मैडीकल कालेज खोलती है... मुझे उन की जितनी खुशी होती है उस से कहीं गुणा ज़्यादा दुःख एक देशी दारू के ठेके के खुलने का होता है ....क्योंकि ये ठेके नहीं है, ये अरमानों के कत्लगाह हैं...ये अच्छे भले लोगों को हैवान बनाते हैं...घर बर्बाद करते हैं..घरेलू कलह...मारपीट ...हत्या, क्रूरता, बलात्कार, चोरी, डकैती ...सब को बढ़ावा देते हैं...जब किसी एरिया में कोई देशी दारू का ठेका खुलता है तो उस एरिया में लोगों को शोक मनाना चाहिए... ऐसा नहीं है इंगलिश दारू पीने वाले नहीं मरते ...या दारू नहीं पीने वाले अमर हो जाते हैं...लेकिन देशी दारू पीने वाले मिलावटी दारू, घटिया दारू, घटिया गुणवत्ता के शिकार ज़्यादा होते हैं ... लेकिन कौन सुनता है ...सब खेल राजनीति का है ....चुनावी मौसम में तो ऐसा है जैसे लूट मची हो ..

सुना है इसी चुनाव के चक्कर में बेचारे अनुराग कश्यप की फिल्म उड़दा पंजाब पर कैंची पर कैंची चली जा रही है...

फिर भी यह तो कहना ही पड़ेगा...यह जो पब्लिक है, सब जानती है...

आज मैंने यह नोट किया अपनी कापी में...
हमारी कालोनी के लोग बड़े क्रिएटिव हैं...