रविवार, 31 मई 2026

पैसे के ज़ोर पर मंदिरों में व्ही-आई.पी दर्शन गलत एवं भेदभावपूर्ण ....


यह मेरी स्टेटमेंट नहीं है, मैं इतनी हिम्मत नहीं रखता कि अपने रिस्क पर इस तरह की बात लिख दूं अपने ब्लॉग में ….और उस से फ़र्क भी क्या पड़ता?....गालियां ज़रूर यहां वहां से पड़ जातीं….लेकिन जब मद्रास उच्च न्यायालय ने ही यह बात परसों कह दी तो 50 बरसों तक मेरे दिल के अंदर दबी बातें भी उछल-कूद करने लगीं…इसीलिए मैं भी महीने के आखिरी रविवार के दिन अपने मन की बात लिखने बैठ गया….

निदा फ़ाज़ली बहुत से बढ़िया दोहे, गज़लें, शे’र …हमें थमा कर गए हैं….ऐसा ही एक आज याद आ रहा है …

सीधा सादा डाकिया जादू करे महान्…

एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान….।


इस से सुंदर और बड़ी बात चंद अल्फ़ाज़ में और कोई कैसे ही लिख लेगा….ठीक इसी तरह के खयाल मैं अखबार के बारे में रखता हूं …यह भी एक पूरा पैकेज लिए रहती है …सारी अखबार बलात्कार, दलित शोषण, छीना-झपटी, मार-धाड़, नकली दवाईयां, नकली दारू, नकली मिठाईयां, धोखा-धड़ी, जाल-साज़ी, छुरेमारी, कत्ल, खुदकुशी, ससुराल-बहु के लफड़े…पेपर लीक होने की दिल को हिला देने वाली खबरों से सनी होती हैं जिन्हें पढ़ कर सुबह सुबह ही दम घुटने लगता है लेकिन बीच बीच में कोई किसी पन्ने पर मई जून के महीने में किसी ताज़ा हवा के झोंके की तरह ऐसी ख़बरें भी दिखती हैं जिस से मानवता पर, व्यवस्था पर और सब से ऊपर अपनी अदालतों पर विश्वास पक्का होता है ….जजों की सोच, उन की निडरता और उन के बेखौफ़ फ़ैसलों की झलत इस में मिलती है….इस वक्त वह जज याद आ रहा है जब सिरसे वाले बाबे को उम्र कैद की सज़ा किसी सीबीआई कोर्ट के एक जज ने सुनवाई ….टीवी पर लाइव कवरेज चल रहा था ….सारा पंजाब हरियाणा कोर्ट के बाहर पंचकूला में पहुंचा हुआ था …2017 की बात है …लेकिन बंदे ने वही फ़ैसला किया जो उसे करना था …ऐसी बहुत सी मिसालें मिल जाएंगी ..लेकिन कुछ दिन, कुछ फैसले हमारे दिलो-दिमाग में सदा के लिए फ्रीज़ हो जाते हैं….दुनिया ऐसे लोगो के भरोसे ही टिकी हुई है …

कुछ पुरानी बातें हम सब के ज़ेहन में दफ़न ज़रूर हो जाती हैं लेकिन सारी उम्र वे तूफ़ान की तरह बीच बीच में उठती रहती हैं ….जैसे कि मेरी यह याद …


आज से लगभग 45-50 बरस पुराने दिन …यही कोई 1979-80 के दिन थे …अमृतसर में रहते थे, दो हज़ार रुपए के करीब पैसा था हमारे पास जो उन दिनों अच्छी खासी रकम थी… (पहले यह मज़ेदार बात थी कि घर में लगभग हर किसी को दूसरे की जेब के बारे में पता होता था …अब तो अपनी ही जेब में क्या है, कईं बार पता ही नहीं होता..)  ..मैं, मेरा बड़ा भाई और मां बस में किसी धार्मिक स्थान के लिए चले ..चार पांच घंटे के बाद वहां पहुंच गए ….


लेकिन यह क्या, इतनी भीड़…मई-जून का महीना, इतनी गर्मी, इतनी उमस, याद आ रहा है भाई ने पता किया कि लाईनों में खड़े रहे तो एक-डेढ़ दिन लग जाएगा…दर्शन करने में ….अभी लाईन में खड़े कुछ वक्त ही बीता था तो किसी ने उसे कुछ कहा …वह उस के साथ चला गया….हमें फ़िक्र हुई ..यह गया कहां?...वापिस लौट आया …दस-पंद्रह मिनट में …जो आदमी उसे लाइन में से पिक-अप कर के ले गया था ….वह कौन था, क्या कहूं ..वह दलाल किस्म का था, जिस की अंदर सैटिंग थी …सैटिंग क्या, दरअसल वह उस जगह में कार्यरत था….लेकिन मैं तो दलाल ही लिखूंगा ….कलम इस वक्त मेरे हाथ में है। जो महसूस किया उसे ही न लिखा तो फिर लिख ही क्यों रहा हूं यह डॉयरी !! 


मेरी उम्र उन दिनों 16-17 साल की थी…भाई ने उस दलाल से मिलने के बाद हमें आ कर बताया कि वह कह रहा है अभी फ़ौरन दर्शन करवा देगा …तीन सौ रुपए एक आदमी के लगेंगे …इतने ही लेगा ….कह रहा था वह तो सेवा कर रहा है, पैसे तो उसे आगे देने हैं…अभी लिखते हुए बरसों बाद यह बात याद आ गई कि इतना पैसा उन दिनों दर्शनों पर लगा देना ….बहुत बडी़ बात थी …मां ने भाई को कहा कि ऐसा कर ..तू ही दर्शन कर ले ..हम कतार में खड़े रहते हैं, अगर जल्दी नंबर आ गया तो ठीक, वरना ऐसे ही लौट जाएंगे…यहां तक पहुंच तो चुके ही हैं…शायद मैंने भी कहा कि आप दोनों दर्शन कर के आ जाओ…मैं यहीं रहता हूं …कहने का मतलब यही कि किसी न किसी के तीन सौ रुपए बच जाएं…


लेकिन भाई कहां किसी की सुनने वाला था ..नहीं, नहीं, सभी दर्शन करेंगे …तो जी नौ सौ रुपए उस दलाल को थमा दिए गए और वह किन्हीं तंग गलियों, चौबारों, घरों में से निकाल कर हमें अगले चंद मिनटों में ही झटपट दर्शन करवा के बाहर तक छोड़ भी गया …लेकिन यह क्या, दस बीस मिनट ही में हम फारिग भी हो गए …न कोई मेहनत लगी, न पसीना बहा, न ही खडे़ रहने की थकावट ही हुई …ऐसा मुझे तो लग रहा था जैसे कुछ छूट गया ..क्या हो सकता था …इंतज़ार का रोमांच ….इंतज़ार के दौरान लोगों में उमड़ता जोश, जयकारों के उदघोष….कहीं न कहीं बाल मन में यह बात बैठ गई कि हम तो चीटिंग से पास भले ही हो गए हैं, मेहनत तो इन की सफल होगी ….अर्ज़ी तो इन की ही कबूल की जाएगी….


खैर, चलिए, खाने पीने की बात करें ..जो बात अमृतसरियों को सब से ज़रूरी लगती है …हम लोग बढ़िया से होटल में तंदूरी रोटियां, राजमाह और पनीर का लंच करने और लस्सी पीने बैठ गए….आनंद आया। 


ऐसे लग रहा था जैसे दर्शन करने का बोझ सा था, वह सिर से उतर गया है …और इमानदारी से यह भी लिख दूं कि उस दिन जो एक व्ही-आई-पी जैसा महसूस किया …वैसा ज़िंदगी में फिर न कभी महसूस किया ..और न ही करने की इच्छा ही है …हां, हो सकता है वह बालमन की नासमझी होगी …ज़रूर होगी….क्योंकि जब हम लोग दर्शन कर के वापिस उन्हीं लाइनों को देख रहे थे तो मुझे तो कुछ अलग सा लग रहा था …क्या लिखूं….कुछ कुछ होता है ….वैसे ही कुछ…यानी के हम तो अभी गए और झट से दर्शन कर के बाहर भी आ गए…और यह लोग अभी भी पसीने से तर-बतर उमस में झुलस रहे हैं………छोटी उम्र की नासमझी वाली बातें…

और बाकी लोगों का रिएक्शन….मां को तो 900 रुपए यूं ही बरबाद होने का मलाल था ..भाई को बिलकुल नहीं था, वह कह रहा था, क्या हुआ, आराम से दर्शन भी तो कर आए…लेकिन वह दलाल के लिए जो बातें बोल रहा था ..वह सुन कर हम तीनों बार बार हंस रहे थे…लिखने वाली नहीं हैं वे पंजाबी बातें ….कुछ बातें सिर्फ़ मज़ा लेने के लिए होती हैं…लिखने विखने से बवाल हो जाता है …


यह तो मैं इतने लंबा लिखने लग गया ..चलिए, वापिस अमृतसर के बस-अड्डे पर पहुंचते हैं …हम लोगों ने खूब मज़े से वापिसी की यात्रा की, खाया पीया…(पीया मतलब लस्सी, कोल्ड-ड्रिंक्स…शिंकजी आदि) …थोड़ी बहुत खरीदारी की, परशाद के पैकेट खरीदे……..और हालत हम लोगों की यह थी कि बस अड्डे से घर के लिए हमें दो साईकिल रिक्शे लेने थे ….दस रुपए मेरी मां के पर्स में बचे थे और दस रुपए मेेरे भाई की की जेब में … हम रिक्शे पर बैठते वक्त भी बहुत हंसे …कि शुक्र है कि रिक्शा का किराया तो बचा ….घर पहुंच गए तो यह बात जितनी बात भी याद आती …हम लोग हंसते हंसते लोटपाट हो जाते ….

लोटपोट हो जाना बात ठीक है …लेकिन मेरे बालमन पर इस घटना ने एक अमिट छाप छोड़ दी …दिल में बहुत से सवाल पैदा हो गए कि क्या ऐसे दर्शन करना ठीक है, उन लोगों का क्या जो घंटों तक लाइन में खड़े रहे ….हम उन से आगे कैसे निकल गए …कभी भी वैसे वाली फील फिर न आई जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि दर्शन कर के बाहर लौटते वक्त उन इंतज़ार कर रहे भगतों को देख कर आई थी ….हां, यह ज़रूर है कि इतने साल बीतने के बाद भी जब भी वह बात याद आती है तो खुद पर शर्मिंदगी ज़रूर महसूस होती है ….


खैर, यह तो मैंने अपना अनुभव बांट दिया …हां, शायद इस अनुभव ने अंदर ही अंदर मुझे बहुत बड़ी सीख दे डाली ….मुझे याद नहीं मैंंने फिर कभी इस तरह से व्ही-आई-पी दर्शन या किसी तरह से अतिरिक्त पैसे का भुगतान कर के कहीं पर दर्शन किए हों….और यह अभी तक कायम है …अभी भी मैं ऐसे किसी मौके का फायदा न उठाना चाहूंगा …व्ही-आई-पी दर्शन बिना पैसे के भी मिल रहे हों तो भी मेरा दिल इस के लिए राज़ी न होगा….


पिछले पचास बरसों से लोगों के किस्से सुनते रहा हूं …किस तरह से किस बंदे ने किस जगह पर विशेष दर्शन, व्ही आई पी दर्शन का जुगाड़ कर लिया …साथ में पूरा सरकारी गाड़ीयों को काफिला गया …वहां पर पहले ही से सूचना दे दी गई ….इस तरह की जब कुछ लोगों को शेखी बघारते देखा या किसी बडे़ उद्योगपति की ऐसी जगहों पर स्पैशल दर्शन करते हुए तस्वीरें देखीं तो कुछ भी ऐसा न लगा जिस से प्रभावित हुआ जा सके…सिर्फ़ इन सब की अज्ञानता पर ही तरस आया …यही सोच कर कि अर्ज़ी तो इन की ऐसे कैसे धौंस जमा कर मंज़ूर होगी …नामुमकिन ….ऐसा मुझे लगता है…क्या पता ऊपर वाले का निज़ाम कैसे चल रहा है? …


बहुत सी जगहें हैं जहां पर यह सुविधा उन लोगों के लिए उपलब्ध है जो इन की चाहत रखते हैं और उस के लिए पैसे या रसूख का इस्तेमाल करने के सक्षम हैं……भई, उन सब को ये सब दर्शन, स्पैशल दर्शन, व्ही-आई-पी दर्शन मुबारक…….हम इस तरह से बैक-डोर बिना दर्शन के ही सही हैं।


हमें तो मद्रास हाईकोर्ट के फैसले की बहुत खुशी है …इतने बरसों बाद किसी कोर्ट-कचहरी में यह मुद्दा तो उठा और कोर्ट ने अच्छे से खबर भी ली ….आगे पढि़ए माननीय उच्च न्यायालय में क्या कहा …


“Paid VIP darshan at Hindu Temples is wrong and discriminatory, Madras HC said on Friday while rejecting state’s submission that withdrawing paid VIP darshan would cause loss of revenue. No such practice is followed in churches and mosques, HC further said. 


Hearing a PIL, the vacation bench said….Let ministers and MLAs not think that they could walk into a temple any time and that God would be waiting for them. Why do we need VIP darshan at all? Everyone is equal before God.” 


इसे भी पढ़ लीजिए….भगवान के सामने सब बराबर हैंं….


इसी खबर में यह छोटी सी खबर भी दुबकी पड़ी थी ...टाइम्स आफ इंडिया दिनांक 30 मई 2026 



हम पढ़ लेते हैं …संतों की वाणी पढ़ते हैं, पीर पैगंबरों की बातें सुनते हैं…भावना के भूखे भगवन….किस तरह से भगवान राम को जब शबरी ने दिल से पुकारा तो उस के जूठे बेर खाने के लिए उस की कुटिया पर पहुंच गए ….गुरु नानक देव जी महाराज ने भी भाई लालो और मलिक भागो की साखी के ज़रिए यही संदेश दिया…भाई लालो एक ईमानदार गरीब बढ़ई था और मलिक भागो एक भ्रष्ट बेईमान रईस इंसान ….वे भाई लालो के यहां ठहरना स्वीकार करते हैं ...




लिखते लिखते तो कागज़ काले करते जाएंगे …बस, बात पल्ले पढ़नी चाहिए …मेरे तो पल्ले पचास साल पहले ही पड़ गई थी ..खुशकिस्मती से …ऊपर लिखे उस एक वाक्ये के ज़रिए….न कभी फिर अभी तक इस तरह के दर्शन की इच्छा ही हुई और न ही शायद होगी ….बस, एक ही बात स्मरण रहे ….भावना के भूखे भगवन….। बाकी, हर किसी की अपनी आस्था है, विश्वास, भरोसा, अकीदा है ….सब की आस बनी रहे …विश्वास पक्का बना रहे लेकिन ओछी हरकतों से, दिखावे से कुछ होने वाला नहीं ….। 


इस बात को यहीं पर विराम देते हैं….


काली घटा छाई .....मुंबई 31 मई 2026 

आज सुबह छः बजे उठा तो मौसम खुशनुमा था ….चंद मिनटों में बरसात शुरु हो गई ….कुछ मिनट तक बूंदाबांदी हुई …व्हीडियो बना ली ….प्री-मानसून की बौछार थी या कुछ और …नहीं पता, यह बताना मौसम वैज्ञानिकों का काम है, कल अखबार में पढ़ लेंगे….लेकिन इस ने बचपन-जवानी की बरसात की पहली बौछार वाले दिन याद दिला दिए….कपड़े उतार कर पहली बारिश में भीगनी, सूखी मिट्टी पर पड़ी बरसात से निकलती सौंधी सौंधी खुशबू और पेड़-पौधों का पहली बारिश में झूमना ….सब यादें हैं…….अब बहुमंज़िला इमारतों तक कैसे पहुंचे पहली बारिश के बाद मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू ……वैसे भी हम लोगों ने मिट्टी का कहीं नामोनिशां ही कहीं छोड़ा हो तभी तो ऐसी तमन्ना भी करें …..हर तरफ़ कंकरीट के जंगल खड़े हैं, बिछे पड़े हैं……



पहली बौछार में डिजीटली ही भीगने का आनंद लीजिए....मई 31, 2026 मुंबई


दुआ करते हैं कि इस बार की मानसून बढ़िया हो ….दुआ में आप भी इस गीत के ज़रिए शामिल हो जाइए ….



शुक्रवार, 29 मई 2026

उम्र नब्बे साल …. बैटिंग अभी जारी है ….




परसों के अंग्रेज़ी के अखबार में एक फीचर देखा …रस्किन बॉंड पर था ..90 साल के हैं …वह अच्छे से जीने के गुर बता रहे थे उसमें…हर दिन पेपर में कुछ तो खास होता है …उस को काट कर रख लेते हैं, या सोचते हैं कि कतरन सहेजेंगे लेकिन बहुत बार भूल-भुला जाते हैं …कईं बार कुछ लेख ऐसे भी होते हैं जिन्हें फ्रेम करवा के रखने की चाहत होती है …


रस्किन बॉंड का फीचर भी ऐसा ही था …अगले दिन तक वह मेरे पास पड़े एक विंटेज-फ्रेम के अंदर पहुंच ही गया …


अगर इसे पढ़ना चाहें तो इस फोटो पर क्लिक करिए, वरना आन-लाईन सर्च कर के पढ़िए...


मुझे बॉंड का लिखा बहुत पसंद है …पिछले कुछ बरसों में मैंने इन को खूब पढ़ा है…लिखने का स्टाईल बहुत बढ़िया है …बिल्कुल सीधी सादी भाषा…और अपने आस पास से प्रेरित लेख, कहानियां….यह जो परसों फीचर था, इसमें भी अधिकांश बातें मैंने इनकी किसी न किसी किताब में पढ़ी हुई हैं, कहीं इन के किसी इंटरव्यू में सुनी हुई हैं …लेकिन फिर भी यह फीचर स्पैशल तो था …इसीलिए फ्रेम में जा पहुंचा ….चाहे ए.आई से बनी एक फोटो भी इसमें थी, लेकिन वह भी इतनी दिलकश और कुदरत के बीचोंबीच ….जैसी ज़िंदगी वे मसूरी के पास जी रहे हैं ..बिल्कुल वैसी ही तस्वीर ….। 


परसों बहुत बार रस्किन बॉंड का ख्याल आया…


कल की अखबार में एक और 90 साल की उम्र वाली की दास्तान पढ़ी….देश का नामचीन डाक्टर, एक बहुत प्रतिष्ठित मेडीकल कालेज में प्रोफैसर एंड हैड रह चुका …बहुत नाम वाला डाक्टर …फोटो भी छपी थी जिस में वह लकड़ी की कुर्सी पर बैठे हैं और उन के नौकर-चाकर उस कुर्सी को उठा कर उन को ऊपर तीसरी मंज़िल पर उन के फ्लैट तक ले जा रहे हैं…चलने-उठने में दिक्कत है …और ऊपर से कोर्ट-कचहरी चल रही है मालिक मकान के साथ …पगड़ी-वगड़ी वाली व्यवस्था के ज़माने से फ्लैट में रह रहे हैं….अपने सेवक को कुछ दिन पहले गोद ले लिया है और अपनी जायदाद उस के नाम लिख दी है…और लिखा था कि कोर्ट-कचहरी में जो केस चल रहे हैं उन सब की जड़ वही सेवक है …उकसाता रहता है, पट्टियां पढ़ाता रहता होगा….


चाहे कपड़े उन्होंने एकदम चकाचक पहने हुए थे …लेकिन उस से क्या होता है …इस उम्र की अपनी परेशानियां क्या कुछ कम होती हैं ..ऊपर से यह सब झेलना…..। मालिक मकान ने खराब लिफ्ट को रिपेयर ही नहीं करवाया…कोर्ट ने अब आदेश दिया है कि लिफ्ट नई लगवा लो….। 


बुरा लगा इतने बडे़ नामचीन की ऐसी हालत देख कर ….


पिछले दो दिनों से यही 90 साल की उम्र तक पहुंचने वालों की याद आती रही …कुछ नामचीन हस्तियां जब 90 साल की थीं तो उन के किसी न किसी प्रोग्राम में जाने का मौका मिला था….उन प्रोग्रामों के दौरान यही लगता था कि ये सब देश-समाज के बेशकीमती नगीने हैंं, काश…ये ऐसे ही चलते रहें लंबे अरसे तक …


आज से 13-14 बरस की बात है …शायद 2013 की …महान् गीतकार गोपाल दास नीरज जी का 90 वां जन्मदिन था..लखनऊ के विशाल सभागार में था …उस में शिरकत करने का मौका मिला….एक बिजनेस हाउस था जिस के द्वारा यह आयोजित किया गया था …उन्हें 90 हज़ार रुपए नगद दिए गए …उपहार स्वरुप ..और यह घोषणा की गई कि हर साल उन की सालगिरह मनाई जाएगी और वे जितने बरस के होंगे उतने हज़ार उन को तोहफ़े में दिए जाएंगे …


वे व्हील-चेयर पर थे …लेकिन बोलचाल में एक्टिव थे …उस दिन का यह व्हीडियो देखिए…अफसोस, अगले दो तीन बरसों में ही चल बसे…



लखनऊ में मुशायरे अकसर होते हैंं…जब भी बज़ुर्ग शायरों को देखते-सुनते उन की सलामती की दुआ करते …बाल काले रंग लेने से कुछ होता वोता नहीं …उम्र तो झलक ही जाती है …लेकिन इन सब में मुनव्वर राणा और राहत इंदौरी तो बेवक्त ही चले गए …आपने खबर पढ़ी होगी ..कल जनाब बशीर बद्र भी चले गए …कुछ अरसा पहले इन की कुछ व्हीडियो देखी थीं, बीमार चल रहे थे …बहुत बढि़या लिखते थे …लखनऊ में रहने के दौरान शायरों को देखने-सुनने- पढ़ने और इन की लिखी किताबें खरीदने के मौके मिले …एक नोटबुक रखने का आइडिया आया …2015 में लिखा यह पेज़ अभी खोल के देखा …बशीर बद्र साहब की शायरी इसमें दर्ज हैं …दूसरे कुछ शायर जिन के शेयर इस में लिखे हुए हैं ….निदा फ़ाज़ली, मुन्नवर राणा, राहत इंदौरी, वसीम बरेलवी, अकबर इलाहाबादी, फ़ैज़, गोपाल दास नीरज, जावेद अख्तर, साहिर लुधियानवी….मुझे इन सब की कही बातें ही समझ में आती हैं…बातें बहुत बड़ी होती हैं लेेकिन कहते इतने आसान अल्फ़ाज़ में हैं कि सीधी दिल में उतर जाती हैं ….


2015 में मैंने नोटबुक में लिखी थी ..उम्मीद की, फिर से उठ कर खड़े होने की ...बशीर बद्र की कही बात...

खु़दा बशीर बद्र साहब को जन्नत में जगह दे …नेक इंसान, हरदिल अज़ीज़….आम आदमी की बात उसी की सादी ज़ुबान में कहने वाले अज़ीम शायर ...



बस, पिछले दो तीन दिनों से 90 साल की उम्र वाले ही दिलो-दिमाग पर छाए रहे ….सबब भी कुछ ऐसा बना कि कल कुछ ढूंढ रहा था तो दो किताबें भी ऐसे ही लोगों की हाथ में पड़ गईं….एक तो थी खुशवंत सिंह की …लेसन्ज़ आफ़ मॉय लाईफ …Lessons of my life! आप को पता ही है कि खुशवंत सिंह भी कलम के बहुत धनी थे….जो लोग जानते हैं वे उन को इलस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया के दिनों से जानते हैं …और कईं बरसों तक हर हफ्ते हिंदी और इंगलिश की अखबारों में उन का लेख छपता था …उन की भी किताबें पढ़ने का मौका मिला …यह किताब भी उन्होंने 90 साल पूरे होने के बाद लिखी थी ..बढ़िया है ..हर लेखक अपने अनुभव साझा करता है ..कोई सबक सीखना चाहे तो सीख ले, वरना वे तो अपना काम कर के चले गए……।



दूसरी किताब जो हाथ पड़ गई …वह संत पुरुष दलाई लामा की थी ..खुशी के ऊपर …आधी पढ़ी थी ..बहुत बढि़या लिखते हैं…ये भी 90 साल की उम्र का माईल-स्टोन कहीं पीछे छोड़ चुके हैं…ईश्वर से प्रार्थना है कि ये सेंचुरी मार के और भी आगे चलते रहें ….मानवता को प्यार और खुशियां बांटने का सबक सिखाते रहें …


ज़िंदगी हर इंसान की अलग होती है, अलग हालात….जब लेखक लिखते हैं तो अपने अनुभव लिखते हैं …जो उन्होंने भोगा, उसे वे लिख देते हैं …इसलिए जो भी ऐसे लोग लिख कर गए हैं मौका मिले तो उन को पढ़ते रहना चाहिए ..क्या पता कोई ज्ञान का मोती हमें भी मिल जाए और हमारी ज़िंदगी ही बदल दे ….


ये तो उन कुछ बड़े नामचीन लोगों की बातें हैं …लेकिन आम लोग भी जो 90 का लक्ष्य पार कर जाते हैं, मैं उन से बड़ा मुतासिर होता हूं जैसे मेरे इर्द-गिर्द तीन जो सहायक हैं वे खामखां मेरे से मुतासिर हैं …ये सब बीस-तीस-और चालीस वाली उम्र वाले हैं…कभी कोई बात चलती है तो कईं बार कह चुके हैं कि पता नहीं हम लोग आप की उम्र तक भी पहुंच पाएंगे या नहीं, जैसी आबोहवा है, जैसा हम लोग खा-पी रहे हैं ..हम तो अभी से ही….।


फिर कहते हैं कि इस उम्र में भी आप के इतने घने बाल हैं और आप उस उम्र में भी …….मैं उन की इस बात से डर जाता हूं …पहली बात तो ये कि कहीं इन की नज़र ही न लग जाए…फिर मैं कहता हूं कि मेरे घुटनों की हालत तो तुम लोग देखते ही हो …फिर कहते हैं कि घुटनों का क्या है, सर, वे तो आज कल जवान लोगों के भी घिस जा रहे हैं…..


मैंने ऊपर लिखा कि मैं 90 साल और उस के पार पहुंच चुके लोगों से बहुत प्रभावित हूं. और जब भी इस उम्र के मरीज़ मेरे पास आते हैं तो अकसर उन के साथ पांच-सात मिनट बिताने का वक्त निकाल लेता हूं और मौका मिलने पर एक फोटो भी उन के साथ खिंचवा ही लेता हूं …हर बार मेरा उन से एक सवाल तो होता ही है कि इस सेहत का राज़ हमें भी बताएं….जब वे यह राज़ बताते हैं तो मेरे तीनों सहयोगी अच्छी तरह से कान खोल कर सुन रहे होते हैं और दो चार दिन पहले जो 91 बरस का शख्स एक दम फिट चलता फिरता आया ….तो बाद में कहने लगे ..सर, हम तीनों की उम्र भी अगर जोड़ दें तो इन की उम्र 91 तक पहुंचते हैं …हैरान थे …बहुत हैरान थे…मुझे ही देख कर हैरान रहते हैं तो मेरे से 25-30 साल बड़े बंदे को देख कर तो इन की आंखें फटी की फटी रह जाती हैं… हा हा हा हा हा हा …चलिए, सभी 90 की उम्र वाले और उस के पार वाले कम से कम सेंचुरी तो ज़रूर ही लगाएँ ….


पहले 80 साल की उम्र तक पहुंचना बहुत बार थी …1975 में दादी और 1981 में नाना जी चल बसे….मुझे याद है कि मां-पिता जी तो गमगीन थे ही, मां-बाप होते हैं.. ..लेकिन हम बच्चे थे, हमारे सामने ऐसा दिखावा करते थे कि अब उम्र हो गई थी, कितना वकत और ….दादी की तो गुसलखाने में गिरने से कूल्हे की हड़़्ड़ी टूट गई थी..बस, कुछ महीने वह बिस्तर पर ही पड़ी कराहती रही …जब तक की बेड-सोर ने उन को हम से छीन ही न लिया…दादी, नाना और नानी ये सभी 80-82 की उम्र तक पहुंच चुके थे …नानी को जब ब्लैडर-कैंसर हुआ ..जितना संभव था, इलाज हुआ …फिर भी चल बसीं….बाद में यही सुना कि इस उम्र में तो बस बहाना ही बनता है ….. 


खैर, आज कल 80 की उम्र पार करना कोई बडी़ बात नहीं रही ….अकसर लोग चलते-फिरते मिल जाते हैं….अब जो आंकड़ा प्रभावित करता है वह 90 साल वाला है ….इसलिए 90 साल या ऊपर के लोगों से मुझे बात करना, उन की ज़िदगी से कुछ सीख लेना ….अकसर मेरी प्रॉयर्टिटी लिस्ट में शामिल होता है…


पिछले 15-20 बरसों से जिन भी उम्रदराज़ लोगों से मिलना हुआ…उन की बात मैंने दर्जनो ब्लॉगों में सहेज रखी हैं, यही सोच कर कि अगर ये लोग किताब नहीं लिख पाए, या इन का किसी ने इंटरव्यू नहीं भी मिला तो कोई बात नहीं, इन की सीख भी तो सहेजने लायक है ..हर इंसान की होती है….मैं अकसर कहता हूं कि हर इंसान अपने आप में एक अच्छा-खासा नावल है जिसे छपने का मौका नहीं मिला ……


दस साल पहले ..91 स्कोर कर चुके शर्मा जी के साथ लेखक 

वह अलग बात है कि अपना लिखा बाद में मैं कभी खुद भी नहीं पढ़ता ..लेकिन अभी कोई एक तो ऐसा ढूंढ ही लूंगा…अपने ब्लाग पर जा कर सर्च किया ..बुज़ुर्ग की सीख तो बहुत से लेख दिख गए (मेरे ब्लॉग के डेस्कटाप वर्शन में जाकर आप भी यह एक्सरसाईज़ कर सकते है…)फिलहाल उसे ज़रूर पढ़िए…91 वर्षीय शख्स की सीख ….(इन की सीख आप लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं)...


अभी मुझे 10-15 साल पुराने ब्लाग दिखे तो कुछ 80-90 साल के बुजुर्गों की बातें भी उसमें दिखीं…फोटो भी दिखीं कि चींटी की चाल से ही सही, लेकिन फिर भी बाग में टहलने ज़रुर आते है और पूरा चक्कर लगाते हैं …कुछ तो वॉकर लेकर आते हैं …इन सब की ज़िंदादिली को सलाम…..


90 की उम्र का आंकडा़ ही कुछ ऐसा है ….अब बच्चों की यह तमन्ना होती है कि कैसे भी उन के मां-बाप 90 की उम्र तक तो पहुंचे ….मुकद्दर वाले पहुंचते भी है और एक बार यह बैरियर पास होने पर वही हसरत सेंचुरी मारने वाली जन्म ले लेती  है …स्वभाविक सी बात है ….बच्चों के लिए मां-बाप का यही रुतबा होता है ….हां, कईं बार विभिन्न वजहों से बुजुर्ग खुद ही थक जाते हैं …वहां तक पहुंचते पहुंचते …वह अलग बात है …वह अपने आप में एक बहुत बड़ा मुद्दा है ….। 

टांवे टांवे ही सेंचुरी मार पाते हैं ….कईं महीने पहले मैने अखबार में किसी 100 साल के बंदे के बारे में शोक-संदेश देखा तो उस की कतरन रख ली….यह भी एक कलेक्टर-आईटम लगी मुझे ……क्या जाने कितने बरसों बाद अखबार मेें ऐसा संदेश दिखता हो …


जाते जाते एक बात …हमें अपने मां-बाप की बढ़ती उम्र का आभास ही नहीं होता अकसर …जब तक कोई हमें जताता नहीं …हमें लगता है खा पी रहे हैं, खुश हैं, मस्त है, चलते फिरते हैं …अभी तो ये लंबे अरसे तक हमारे आस पास ही हैं लेकिन जब मेरी मां को 87-88 साल की उम्र में पेन्क्रियाटिक कैंसर ने धर दबोचा, तो सभी जांचो् के बाद एक तरह से जवाब ही मिल गया….मैंने जब कीमो के लिेए डाक्टर से पूछा तो उसने उन की पतली हालत को देख कर मेरी ही तरफ़ सवाल उछाल दिय….क्या ये सब झेल पाएंगी यह इस हालत में ? ..मैं बुझा हुआ बाहर आ गया ..लेकिन एक बड़े हास्पीटल के बडे़ डाक्टर के शब्द मुझे बहुत चुभे….अभी तक चुभते हैं …असहाय दर्द से निजात पाने के लिए उन की छाती पर मारफीन के पैच लगते थे …वह लगते ही वह बेसुध ही पड़ी रहती कईं कईं घंटों तक …एक बार मैे जब उन के पास गया कुछ पैच लेने तो मुझ से पूछने लगा कि कैसी हैं मां, मैंने कहा कि बस सोई रहती हैं हर वक्त …उसने आगे कहा …देखना, भई. माता कहीं सोई की सोई न रह जाए, ध्यान रखना। 


मुझ उस की बात बहुत बुरी लगी ….बात सच्ची थी, लेकिन कहने का अंदाज़ बहुत बेहूदा था …कितनी दिन टिकतीं, तीन-चार महीनों में ही यह गई, वो गई ..90 तक न पहुंच सकी…….लेकिन जाते जाते वह भी एक ऐसी सीख दे गई जिसने मेरे आंसू सुखा दिए….


इस नश्वर शरीर को छोड़ने से एक दो दिन पहले मुझे परेशान देख कर ईशारे से अपनी तरफ़ बुलाया ….और धीरे धीरे बोल कर मुझे सीख दी….


“ प्रवीण, दिल बड़ा रखना होता है, मां-बाप हमेशा साथ नहीं रहते”.......


अभी इस पोस्ट को बंद करते वक्त मुझे गोपाल दास नीरज का कलमबद्ध किया हुआ यह गीत याद आ रहा है ...मां नहीं, बाप नहीं .....कुछ भी नहीं रहता है ....


रविवार, 24 मई 2026

शुकराने का भी हिसाब किताब रखना बड़ी फिरंगी सोच....


शुकराने का हिसाब किताब रखने वाली डॉयरी (ग्रेटीट्यूड जर्नल) के बारे में यही पेपर में कभी कभी पढ़ लेता था...कुछ किताबों में भी पढ़ा था यहां-वहां ...बात तो बढ़िया लगी थी...दिन के अंत में रोज़ाना उस में लिखो ...

दो तीन हफ्ते पहले ऑन-लाइन कोई किताब खरीदने के लिए ढूंढ रहा था तो इस ग्रेटीट्यूड जर्नल पर नज़र पढ़ गई...देख कर बहुत अच्छा लगा....800 रुपए में बिक रहा था...आइडिया बढ़िया लगा ...

खैर, ग्रेटीट्यूड जर्नल मिलने पर मैंने उस में रोज़ कुछ न कुछ लिखना शुरु कर दिया....कुछ न कुछ, सोच विचार कर के लिख रहा था ...लेकिन थोड़ी सी मेहनत करनी पड़ रही थी जब कि ऐसा होना बिल्कुल नहीं चाहिए था...यह मेरा पक्का विश्वास है ...मैं आस्तिक हूं, नास्तिक हूं ....कुछ भी हूं लेकिन इतना तो है कि कोई तो है जो इस सारी कायनात को चला रहा है जिस का शु्क्रिया हर पल किया जाना चाहिए....



मुझे लगता है की यह जर्नल हाथ में आते ही और उस पर लिखना शुरू करते ही मन में यह बात आने लगी कि यार, क्या लिखें इस में...दिन भर की तीन चीज़ें ही क्यों लिखें जिस के लिए शुक्रिया करते बन रहा है ...मेरे पास तो हज़ारों हैं, बेहिसाब हैं ...हर किसी के पास हैं..., किस के पास नहीं हैं?-- हाथ खड़ा करो, नाशुक्रो....और इसी वक्त बैंच पर खड़े हो जाए...जब तक की मैं इस ब्लॉग को ख़त्म न कर लूंं...

मुझे लगता है कि यही सोच को जब मैं इस जर्नल को लिखते लिखते चौथे ही दिन तक पहुंचा तो मैंने अपने मन की बात उस में लिख ही दी ....आप इस लिंक कर क्लिक कर भी के पढ़ सकते हैं....

तीन चीज़ें जिस के लिए आप आज़ शुक्रगुज़ार हैं...

इस में मैंने पहली बात यही लिखी ....(in english....For each and every breath, i am grateful)...

और जब यह लिखने की बात आई कि दो ऐसी बातें लिखें जिस के लिए आप दुनिया के शुक्रगुज़ार हैं....

इस में भी एक ही बात लिख कर मैंने पिंड छुडा़ लिया....At mirco-level, there are 1000 times....though i can't document any such for today.




मुझे यह बात उस जर्नल में लिखते हुए ही बड़ा अजीब सा लग रहा था कि लिखने के लिए कुछ नहीं है....दो ही कारण हो सकते हैं...या तो लिखने के कुछ नहीं या फिर लफ्ज़ साथ नहीं दे रहे ....दोनों ही बातों में से कोई बात न थी....लेकिन फिर भी जब लिखने की बारी आई तो मैंने कैसे कन्नी काट ली....

हां, मैंने आप को बताया कि मैं कुछ दिनों से लिख रहा था ...यही दो तीन दिन से नहीं लिख पा रहा था ...गर्मी ही इतनी है, उमस इतनी है...कौन सोते वक्त यह पोथी पकड़़ कर हिसाब-किताब करने बैठे....

लेकिन यह एक बहाना है ....शायद मुझे इस तरह से फिरंगी स्टाईल में शुक्रिया लिखना एक फ़िज़ूल बात ही लग रही थी ....और साथ में एक गालिब की बात याद आ रही थी ....और यह अकसर रोज़ आती है ...हर रोज़....बिना नागा यह बात स्मरण में रहती है ....

गालिब ने यह कह कर तोड़ दी तसबीह ...

क्यूं गिन के नाम लूं उसका ..जो देता है बेहिसाब....

तसबीह (माला) 

इस बात को मैंने बहुत साल पहले पढ़ा तो था ..और लगातार याद भी आती थी इसकी...लेकिन यहां लिखने से पहले गूगल पर इसे डाल कर चैक किया तो पता चला कि यह बात ग़ालिब मियां की कही नहीं है, बस यह जैसे हमारे लोकगीत चल निकलते हैं ...इसी तरह से बात भी चल ही रही है ...जो भी है, लेकिन बात पते की है ...एक बार जब इसे पढ़ लिया तो हमेशा के लिए याद रह गई...अपना अपना विश्वास है, तरीका है ...लोकल ट्रेन में, या सड़कों पर जब कभी लोगों को काउंटर हाथ में पकडे़ अपने इष्टदेव का नाम लेते देखता हूं या ट्रेन ही किसी को अपने इष्टदेव का नाम लिख लिख कर कापी भरते देखता हूं तो भी यह तसबीह तोड़ने वाली बात याद आ जाती है ...। 

शुकराने का तो यह आलम है कि हर बाहर निकली सांस के लिए हम शुक्रगुज़ार हैं कि वह तुरंत लौट के आ गई ....वरना न आए तो हमारी सारी सोच, समझ, सयानप ...वही मिट्टी का ढेर हो जाए। इसलिए मुझे इस जर्नल में कुछ लिखना थोड़ा अटपटा लग रहा था ...आज मैंने वही गालिब के नाम से मशहूर बात ही इसमें लिख दी ....और हां, अभी भी इस में लिखूंंगा तो ज़रूर ..लेकिन शायद वह लिखने के अभ्यास के लिए होगा ...। वैसे भी अब इतने पैसे खर्च किए हैं ....बेकार थोडे़ न जाने देंगे...। 

शुक्रिये का स्तर अलग अलग दिखा ...चालीस-पैंतालीस सालों से पब्लिक लाइफ में हैं....हर तरह के इंसान से पाला पड़ता है ...जिन के पास दुनियावी तौर पर कुछ खास नहीं लेकिन शुक्रिये से ऊपर तक भरे हुए और दूसरी तरफ़ वे जो दुनियावी ऐशो-आराम से पूरे तरह से सने हुए हैं लेकिन फिर भी शुक्रिया तो दूर, शिकायतों का पुलिंदा हर वक्त उन के पास होता है ....

ऐसे ऐसे लोग देखे हैं कि घर के तीन-चार जितने मैंबर हैं, सभी गंभीर रोगों से जूझ रहे हैं ...दो कैंसर से, तीसरा गुर्दे की गंभीर बीमारी से, चौथा...बिस्तर से उठ नहीं सकता ......फिर भी पूरी ताकत से आशावान होकर, धैर्य रखते हुए लगे हुए हैं ...शुक्रिया करते नहीं थकते कि सांसें चल रही हैं ...सब ठीक हो जाएगा......जैसे उस कहावत पर उन पर अडिग विश्वास हो ...जब तक सांस तब तक आस।

इस के आगे क्या लिखें ...लिखने को बहुत कुछ है ..लेकिन इतना लिखना भी बेकार है ....

दंत चिकित्सक हूं ...इतने लंबे समय से मरीज़ों से मिलता हूं ....कुछ मरीज़ जिन के मुंह में दांत नहीं हैं, सभी टुकड़े पड़े हैं ....हैरानी होती है कि ये खाते कैसे होंगे ...पूछने पर बताते हैं कि हम तो सब कुछ खा लेते हैं, चने भी थोड़े तोड़ कर खा लेते हैं ....और यह बात हंसते हंसते कहते हैं....अब क्या कोई इन को कहे कि ये सारे टुकडे़ निकलवा दो...वे तो उस से भी पूरे मज़े में हैं....और मैं यह भी जानता हूं, पक्का यकीन है ...इसमें से अधिकतर ने अगर सारे टूटे फूटे दांत निकलवा भी दिए तो विभिन्न कारणों की वजह से यह नकली दांत (फिक्स की सोचें ही नहीं) ..के सैट के लिए बीस-तीस हज़ार का जुगाड़ नहीं कर पाएंगे ....क्योंकि वे मस्त हैं ....और खुश हैं ....

दूसरी तरफ़ कुछ लोग ...कुछ क्या, बहुत से लोग ऐसे भी देखता हूं जिन्होंने हज़ारों क्या, लाखों रुपए खर्च कर दो-चार-पांच  डेंटल इंप्लांट तो लगवा लिए हैं ...लेकिन फिर भी खुश नहीं है ....उस में यह कमी इस में यह कमी, स्माईल बदल गई है ...थोड़े ऊंचे लग रहे हैं, थोडे़ नीचे लग रहे हैं, होंठ उतना बाहर नहीं आया जितना आना चाहिए था, गाल भी अदंर धंसे लग रहे हैं...वह वाली बात नहीं है जैसे पहले अपने दांतों के साथ थी ....

नहीं होगी न यार, अपने दांतों वाली बात ....कुछ न कुछ तो थोड़ा बहुत समझौता तो करना ही पड़ता है ....अगर नहीं करते तो अपने आप से ही नाराज़ रहेगे ....शुक्र करिए की आप ने नकली दांत लगवा लिए, अधिकतर लोगों की (पूरे विश्वास से कहूं तो 99 फीसदी लोगों की तो पहुंच ही में नही है यह सब.....)...

मैने ऊपर यह सब लिख कर किसी खराब दांतों की स्थिति को ग्लैरमराईज़ बिल्कुल नहीं किया ..लेकिन यह सब लिखा इसलिए कि अगर कोई इंसान अनेक कारणों की वजह से अपने दांतों का इलाज नहीं करवा पा रहा तो ....नकली दांत की तो छोड़िए, टूटे -फूटे दांत निकलवा ही नहीं पा रहा ...तो क्या मुस्कुराना ही छोड़े दे....

नहीं, उन सब को भी पास से खूब हंसते-मुस्कुराते देखा है ...और बहुत खूबसूरत लगते हैं , दांतों की परवाह कौन करता है ...एक कहावत भी है कि कोई भी हंसता-मुस्कुराता चेहरा ऐसा नही दिखता जो खूबसूरत न हो ....हां, यह भी ज़रूर है कि कुछ चमकते-दमकते खूबसूरत चेहरों की हंसी कईं बार कुटिल ज़रूर लगती है (खुल कर हंसते नहीं, दबी हंसी किस काम ...!!)... जैसे कि वे सही मायने में हंस नहीं रहे होते, दूसरों का मज़ाक करते हुए हंस रहे होते हैं....और  दांतों पर लगी नकली, महंगी, ज़िर्कोनियां टोपियों की धौंस जमा रहे हों...। 

आज के बिन मांगे ज्ञान की पोटली यहीं पर बंद करता हूं ...यह लिख कर ...

शुकराना ..शुकराना...शुकराना ...हर पल शुकराना .....हर हालत में शुकराना.....।। यह जर्नल वर्नल लिखने वाली बातें फिरंगी हैं और गिन गिन कर इष्टदेव का स्मरण करने वाली बात भी.......! क्या है, आप जानते हैं, मेरा मुंह क्यों खुलवा रहे हैं खामखां....😎

 जो वीडियो मैं नीचे लगा रहा हूं , इस से बेहतर कोई क्या ही शुकराना अदा कर पाएगा....सब कुछ समो दिया गया हो जैसे इस कवि ने अपने शब्दों में ...इसे सुनना ही इतना सुखद अहसास है ....सुनिए फिर, आप भी ....भाषा की कोई दीवार नहीं होती, पंजाबी सब की समझ में आ जाती है ....जितनी 2 किसी को ज़रुरत होती है ...


गुरुवार, 21 मई 2026

भूले-बिसरे किस्से- 1979 में शुरु हुए पंजाब पीएमटी के .....

पिछले कुछ दिनों से मन बहुत उचाट सा है ...नीट के पेपर की खबरें देख-पढ़ कर ....अनपढ़, कम पढ़े लिखे लोग, कल ही रईस बने लोग इस में लिफ्त हैं, कोई बड़ी बात नहीं ...लेकिन अच्छे खासे प्रोफैसर ही इस के मास्टर-माइंड निकले ....यह बहुत दुःखी करने वाली बात है ...अगर इन लोगों ने दलाली ही करनी थी तो कोई दूसरा धंधा ही चुन लेते, दिल्ली बंबई चले जाते ....ज़्यादा कमाई कर लेते ....लेकिन २३ लाख युवाओं से इतना बड़ा धोखा....युवा भी क्या, अभी बच्चे ही हैं वे सभी...१७ साल की कच्ची उम्र वाले सभी बच्चे ही तो होेते हैं, आंखों में कितने ही रंग-बिरंग सपने बसाए रखते हैं.....देखते हैं, क्या होता है इन दलालों का ....लेकिन लोगों की यादाश्त बहुत कमज़ोर है...भूल भुला जाएंगे कुछ वक्त के बाद....दो तीन दिन पहले अखबार में नीट के बारे में एक भी खबर नहीं है ...पहले तो मैंने सोचा कि शायद पहले पेज पर नहीं है, अंदर के पन्नों पर होगी...लेकिन नहीं, कहीं पर कुछ भी न था...।

अच्छा तो मैंने अपनी पिछली पोस्ट में उस सिस्टम की गंदगी की बात लिखी थी जहां पर एमबीबीएस बीडीएस के दाखिले का सारा दारोमदार प्री-मैडीकल की परीक्षा के नंबरों पर ही होता था....और इस में होशियार बच्चे तो बेशक ऊपर आते ही थे लेकिन इस के साथ शहर के रसूख वाले, ऊंचे रुतबे वाले अधिकारियों के बच्चे, कालेजों के प्रोफैसर, मेडीकल कालेज के प्रोफैसरों के भी अपने मां-बाप की पोजीशन के ज़ोर पर अच्छे नंबर पा लेते थे ...इस के पीछे की सारी कहानी मैंने उस पोस्ट में लिखी है ....इन लोगों में से भी शायद कुछ बच्चे होते होंगे होशियार लेकिन जब थोड़ी बहुत होशियारी के साथ मां-बाप की पोजीशन की वजह से प्रेक्टीकल और इंटर्नल एसेसमैंट में पूरे नंबर लग जाएं तो फिर तो वारे-न्यारे होएंगे ही ....

एमबीबीएस-बीडीएस की सीटें....1979 में ....

उस वक्त पंंजाब में तीन मैडीकल कालेज थे...सरकारी मैडीकल कालेज अमृतसर (150 सीटें), सरकारी मैडीकल कालेज पटियाला (150 सीटें), सरकारी मैडीकल कालेज फरीदकोट (60सीटें)...और दो डेंटल कालेज थे....सरकारी डेंटल कालेज अमृतसर (30 सीटें) और सरकारी डेंटल कालेज पटियाला (20 सीटें)....ये सब पंजाब की अलग अलग यूनिवर्सिटियों से सम्बद्ध थे ...गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला और फरीदकोट मेडीकल कालेज पंजाब यूनिवर्सिटी चंड़ीगढ़ से सम्बद्ध था....

1979 में शुरु हुआ पंजाब पीएमटी....

1979 में मैंने प्री-यूनिवर्सिटी (मेडीकल) की परीक्षा पास की ...उन दिनों पंजाब ने यह फैसला किया कि अब मेडीकल-डैंटल दाखिला प्री-मैडीकल के नंबरों के आधार पर न होकर, एक प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर किया जाएगा….जिसे प्री-मैडीकल टेस्ट (पीएमटी) कहा गया। 

पहली बार जब यह टेस्ट 1979 में हुआ तो इस के कुल अंक 60 थे ….और मैंने सुना था कि उन दिनों इस टेस्ट में छः हज़ार के करीब छात्र-छात्राओं ने अपना भाग अजमाया था …शायद एक हफ्ते के बाद रिजल्ट आया और बिना किसी तरह के शोर-शराबे के इस परीक्षा के आधार पर ऊपर बताए गए कालेजों में दाखिले हो गए ….

कुछ कमियां ज़रूर रह गई होंगी….लेकिन कभी किसी को पता नहीं चला …क्योंकि अगले ही साल से 1980 से इस के फार्मेट में बदलाव हुआ …

1980 के पीएमटी की आपबीती …..

आप बीती इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि यह पीएमटी मैंने दिया था …कोई भड़ास नहीं निकाल रहा हूं …बरसों से कुछ सवाल जो दिल में दबे पड़े हैं, उन का लिख देना चाहता हूं….वैसे भी भड़ास क्या निकालनी, मुझे जो मिला…वह उन दिनों भी हज़ारों को न मिल सका…। 

अच्छा, इस से पहले कि इस पेपर के कच्चा-चिट्ठा खोलना शुरु करूं…यह बता दूं कि पंजाब सरकार ने उन दिनों यह फैसला किया था कि हर बरस यह टेस्ट करवाने की जिम्मेदारी पंजाब की किसी एक यूनिवर्सिटी को बारी बारी से दी जाएगी…मुझे यह इस वक्त याद नहीं आ रहा कि 1979 में यह किस यूनिवर्सिटी ने कंडक्ट किया था …(गूगल करने से भी पता नहीं चला…)..खैर, मैंने पता कर के अब करना भी क्या है…मुझे 1980 वाले पीएमटी की बात रखनी है और उस के बारे में मुझे सब अच्छे से याद है। 

1980 में यह पीएमटी टेस्ट करवाने की जिम्मेदारी गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को दी गई …

1980 में हमारा प्री-मैडीकल एग्ज़ाम हुआ ..(आज कल का प्लस-2) …यह परीक्षा अप्रैल में हुई …मई में रिजल्ट आ गया…69 प्रतिशत नंबर आए …बिना किसी ट्यूशन के,  प्रैक्टीकल में किसी माई-बाप के सहारे के ….। 

इतने में अखबार में पीएमटी का भी इश्तिहार आ गया …इसे वे छात्र दे पाएंगे जिन के प्री-मैडीकल में कम से कम 50 प्रतिशत अंक थे …आरक्षित वर्ग के लिए छात्र-छात्राओं के यह प्रतिशत 45 प्रतिशत था। चलिए, जी फार्म भर दिए….

अभी एक महीने का समय था पीेएमटी होने में ….डीएवी स्कूल ने एक महीने के लिए साठ प्रतिशत से ज़्यादा अंक पाने वालों शायद 60-70 छात्रों के लिए एक महीने के लिेए पीएमटी स्पैशल नाम की क्लासेस शुरु कर दीं …सारे सिलेबस की रिवीज़न के लिए…। भयंकर गर्मी वाले दिन थे …सुबह से दोपहर तक रोज़ कालेज जाते, दोपहर में थक-टूट कर आते और घर में आकर देर शाम तक सोए रहते। 

20 जून का दिन भी आना ही था……आ गया…

बकरे का मां कब तक खैर मनाती….20 जून 1980 का दिन आ गया ….पीएमटी परीक्षा का दिन….अच्छा उस दिन होने वाले पेपर का पैटर्न तो बता दूं पहले आप को …..

कुल अंक ..100 

फिज़िक्स -30, कैमिस्ट्री-30, बॉयोलॉजी-30, अंग्रेजी- 10 अंक…कुल हो गए ….100 अंक…

हां तो फ़िज़िक्स-कैमिस्ट्री का पेपर उस दिन सुबह के वक्त हुआ था …10 से एक वाली शिफ्ट में ….देखिए,जब चीज़ें लिखी नहीं जातीं तो सब कूछ भूल जाता है …अब मुझे यही याद नही्ंं आ रहा कि क्या हमें दस बजे ही दोनों पेपर-फ़िज़िक्स और कैमिस्ट्री के एक साथ दे दिए गए थे या डेढ़ घंटे बाद दूसरा पर्चा दिया गया था …जहां तक मेरी यादाश्त मेरा साथ दे रही है ..दोनों प्रश्न पेपर उत्तर पुस्तिकाओं के साथ हमें थमा दिए गए थे …हमारा सेंटर भी गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी कैंप्स ही बना था …सारे डरे सहमे चेहरे वहां दिखे…मेरे पिता जी मुझे लेकर गए थे …मुझे परीक्षा केंद्र के अंदर जाते कैसा लग रहा था?

कुछ खास नहीं …बस ऐसे लग रहा था जैसे कोई बकरा कसाईवाड़े की तरफ़ कदम बढ़ा रहा हो ….बिल्कुल जीने-मरने जैसी बात लग रही थी …

एक बजे के बाद दो घंटे की ब्रेक थी….इतनी धूप में बाहर कहां भटके कोई।उन दिनों आज से लगभग पचास साल पहले यूनिवर्सिटी नई नई बनी थी …और वहां पर पेड़-पौधे भी इतने नहीं थे …और जो थे भी, इतने बड़े नहीं थे कि छायादार हो चुके हों…(यह भी याद आ रहा है कि गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर की स्थापना 1969 में गुरु साहब की 500 वीं सालगिरह के उपलक्ष्य में की गई थी …)....। 

लंच ब्रेक के बाद ..बॉयोलाजी और अंग्रेज़ी का पेपर था …दोनों पेपर एक साथ दे दिए गए थे ….और समय सीमा थी दो घंटे …तीन से पांच बजे तक। 

चलिए, पांच बजते ही हम तो फ़ारिग हो गए ….

फिर अगले दिन से खबरें आने लगीं कि इस बार रिज़ल्ट एक हफ्ते के बाद निकल जाएगा….लेकिन वह हफ्ता भी ऐसा लग रहा था जैसे कि एक बरस हो ….उत्तर पुस्तिकाएं कहीं बाहर नहीं गईं ….सारे पंजाब से उत्तर-पुस्तिकाएं अमृतसर में ही जमा हो गईं और उन को जांचने वाले प्रोफैसर साहब उन की चैकिंग वहां आकर चलते थे …जहां तक याद आ रहा है, मेरे घर से यूनिवर्सिटी दो तीन किलोमीटर ही दूर थी …एक दिन साईकिल उठा कर ऐसे ही उधर का रुख किया ….रोड-इंस्पैक्टरी करने का भी उन दिनों अपना मज़ा होता है …जेबें खाली लेकिन दिल दुनिया भर के सुनहरे ख्वाबों से लदा हुआ ….

25 जून 1980 का दिन याद आ गया ….

अभी हम लोग अपने रिजल्ट का इंतज़ार कर ही रहे थे कि 25 जून का दिन आ गया ….शाम के वक्त पता चला कि संजय गांधी की एक हवाई-हादसे में मौत हो गई है …बहुत बुरा लगा था ….बहुत ज़्यादा बुरा…। 

आखिर 30 जून, 1980 भी आ गई ….

जी हां, रिजल्ट का दिन भी आ गया ….30 जून ..देर शाम के वक्त चौक पुतलीघर इलाके की एक दुकान में रिजल्ट का गजट आ गया था…छात्रों का हुजूम लगा हुआ था …एक छात्र से पांच रुपए लेे रहा था …और एक पर्ची पर छात्र का रोल नंबर लिख कर उस के आगे उस के प्राप्त किए अंक लिख रहा था और मेरिट लिस्ट में नंबर क्या था….यह सब लिख रहा था ….

मुझे भी जब मेरी चिट मिली …तो अंक थे …44 और मेरिट लिस्ट में नंबर 266…फौरन लगा कि एमबीबीएस की सीटें तो 360 हैं और मेरा नंबर 266 है, इस का मतलब हो गया अपना काम….

वहां पर रुका रहा ..दूसरे लोग भी रिजल्ट देखने आए थे …ऐसा नहीं कि वहां रुक कर अच्छा लग रहा था …बस, ऐसे ही खड़ा रहा …फिर से रिजल्ट भी देखा, दोबारा फीस देकर ….कहीं पहली बार गल्त ही न देख लिया हो …खैर, वही सही था …अंक 44 (रैंक 266)...

फिर वहां खड़े खड़े यह भी देखा कि लोग बातें करने लगे हैं कि 360 सीटों में आरक्षित वर्ग के लिए भी सीटें हैं…शायद उन दिनों आरक्षित सीटें -30-35 प्रतिशत ही थीं…बस, थोड़ी सी दिल की धड़कन बढ़ गई कि यार, यह तो मामला थोड़ा पेचीदा हो गया…। 

वहां खड़े खडे़ यह भी जाना कि इस बार कुल दस हज़ार एक सौ छात्रों ने पीएमटी दिया था ….पिछली बार 1979 में छः हज़ार ने दिया था…और पिछली बार के हारे पछाड़े सभी इस बार भी शामिल थे, फिर से पूरी तैयारी के साथ….(और यह संख्या आने वाले सालों में बढ़ती ही गई….) 

हां, जो मैंने फ़िज़िक्स, कैमिस्ट्री और बायोलाजी, अंग्रेज़ी के पर्चे के बारे में लिखा ऊपर उस का पैटर्न ऐसा था कि उस विषय के तीस अंकों में छ-चार, तीन, दो अंकों वाले डिस्क्रिपटिव सवाल भी थे और एक एक अंक वाले ओब्जैक्टिव सवाल भी थे …मल्टीपल-च्वॉईस….

पीएमटी के रिजल्ट के गजट को देखते हुए यह भी देखा कि यहां तो नंबरिंग प्वाईंट्स में हुई है …कहने का मतलब यह की टॉपर के कुल अंक थे …62 और उस के बाद 61.75, 61.50, 61.25, 61 और आगे भी ऐसे ही ….और 44 तक पहुंचते पहुंचते रैंक हो गया 266…

उस वक्त या उन दिनों तो यही लगा कि वाह, कितनी कड़क मार्किंग हुई है ….प्वाईंट्स में नंबर दिए गये हैं। इससे ज्यादा समझ भी न थी …बात वही है कि अगर समझ होती भी तो क्या ही किसी का उखाड़ पाता….
बहुत सालों बाद, जब यह मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला उजागर हुआ तो ख्याल आया कि पीएमटी जैसी परीक्षा में डिस्क्रिप्टिव सवाल …और वे भी छः नंबर के, चार नंबर के …इन में से न्यूमैरिकल तो दो तीन ही थे…बाकी में तो पेपर चैक करने वाले को पूरी छूट …अपनी मर्ज़ी से छात्रों की किस्मत का फैसला करने की पूरी छूट। 

पूरी ज़िम्मेदारी से लिख रहा हूं…मुझे नहीं पता कि किसी तरह के घोटाले हुए होंगे या नहीं, लेकिन क्या यही कम है कि पीएमटी में डिस्क्रिप्टिव सवाल पूछे गए …एक तो पेपर चैक करने वाले को पूरी छूट …ऊपर से उन दिनों में रुतबे-हैसियत के मुताबिक किसी पेपर-चैकर तक पहुंचना कोई इतना ही मुश्किल काम होता होगा….दुनिया उन दिनों भी बहुत आगे निकल चुकी थी ….। 

मैं बार बार एक ही बात दोहरा रहा हूं कि पंजाब के बुद्दिजीवी, अ्च्छे रुतबे वाले, अफसर, प्रोफैसर, डाक्टर, इंजीनियर …इन के बच्चे अपनी काबिलियत के बलबूते ज़रुर आए होंगे…….लेकिन ऐसा नहीं कि इन सब के सभी बच्चे ही एक ही बार में उस जयपुर के प्रापर्टी डीलर की तरह टैस्ट क्लियर कर लें….असंभव जान पड़ता है ना…..लेकिन उस पीएमटी के पहले 100 रैंक की लिस्ट देख कर यही लगा ….लेेकिन आज से पचास साल पहले ..कौन कहे, किसे कहे ..कब कहे और कैसे…….आज ही देख लीजिए नीट यूजी और पीजी का हम लोगों ने मज़ाक बना रखा है …उन दिनों तो कोई मुंह भी न खोल सकता था …….

लेकिन गंदगी और सड़न तो थी सिस्टम में …..इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मेरा 266 रैंक आया …आया तो आया….वह बात नहीं ……..लेकिन सिस्टम चल कैसे चल रहा था वह सारा मैंने ऊपर लिख दिया कि पीएमटी जैेसे पर्चे में छ-चार, तीन नंबरों के डिस्क्रिपटिव सवाल और ऊपर से कोढ़ में खुजली वाली कहावत को चरितार्थ करती ….नंबरों में प्वाईंट सिस्टम …। ऐसा कौन सा थर्मामीटर, बैरोमीटर मिल गया  उत्तर पुस्तिका जांचने वाले महान मास्टरों को कि ………………ऐसा क्यों किया गया, आप भी कल्पना कर सकते हैं। 

हां, लिखते लिखते बोरियत होने लगती है तो पोस्ट बंद करने का मन होता है …वही कर रहा हूं …इस बात के साथ उस साल आरक्षित वर्ग से जिस छात्र का दाखिला एमबीबीएस में हुआ …उस के अंक छः (6) थे और जिस की बीडीेएम में दाखिला हुआ था उस का स्कोर तीन (3) था…खैर, चलिए, यह बात तो हुई आरक्षित वर्ग की …….खैर, मैंने अपने 44 अंकों के साथ क्या किया….अगली पोस्ट में बताऊंगा…। 

वैसे उस दिन रिजल्ट देखने के बाद जब साईकिल पर घर लौट रहा था तो मन मरा हुआ सा था….बहुत बोझिल महसूस कर रहा था कि पता नहीं 360 सीटों वाले कोर्स में 266 रैंक (ओपन वर्ग) होने पर भी कोर्स में घुस पाऊंगा भी या नहीं …आरक्षित सीटों की गिनती का सही पता नहीं चल रहा था …लेकिन मन उदास ही था….

हां, रिजल्ट के दो दिन पहले आशा फिल्म देखी थी ….बार बार अगले कुछ दिनों तक वह गीत याद आता रहा जैसे मेरे लिए ही आनंद बक्शी ने इसे लिख कर, लता जी ने गा कर , रीना राय पर फिल्माने के लिए दे दिया हो …शीशा हो या दिल हो ….टूट जाता है ….हां, ऐसे लग रहा था टूट रहा है दिल….इश्क विश्क का तो नाम ही न पता था, हां, रिजल्ट की वजह ही से टूट रहा था ….ऐसे लगता रहा अगले कईं दिनों तक …बाद में क्या हुआ, उसे अगली पोस्ट में पोस्ट करता हूं….जुडे़ रहिए….

हां, एक बात और ...मैं अपने इस ब्लॉग में अपने पुराने पीएमटी कार्ड को ढूंढ रहा था कि एक पोस्ट में मुझे मेरा प्राईमरी क्लास का कार्ड मिल गया ...फोटो के साथ ...हा हा हा हा हा ...लगा रहा हूं यहां पर ....

Primary Merit Scholarship - one of biggest events in my life....1973😎

बुधवार, 20 मई 2026

जब जूतों की लाइफ बढ़ाने के भी जुगाड़ थे .....



पिछले दो-तीन दिन से मैं एक चीज़ का नाम न ढूंढ पाने के लिए बहुत परेशान था…चीज़ का अच्छे से ख़्याल था..लेकिन नाम ही याद न आए तो क्या करता। सोचा, कि कौन मेरी मदद कर सकता है ….बड़ी बहन का ख्याल आया कि उस से पूछूं…फिर जैसे कुलकर्णी ,वाघमारे को नीट के अपने सवालों पर यकीन था, मुझे भी इस बात का यकीन था कि और कोई मेरी इसमें मदद नहीं कर सकता..पंजाब मेें रह रहा एक नामचीन डाक्टर मेरे कॉलेज का साथी ज़रूर मुझे इस मुश्किल से निकाल लेगा….

वही हुआ …जब मैंने हार मान ली ….तो मैंने अपने कॉलेज के उस साथी को फोन लगाया….वह बहुत बिज़ी रहता है….प्रोफैश्नल कामों ही में नहीं, आध्यात्मिक और सामाजिक कामों में भी बहुत सक्रिय है …ऐसे साथी वे लोग होते हैं जिन्हें जब भी फोन करो, कोई राम-दुआ नहीं, जो बात करनी है, बात करो और फोन रख दो, कोई भूमिका बांधने की ज़रूरत नहीं ….


फोन की घंटी गई …चुप हो गई…


इन साथियों से कैसे हार मान लें….कॉल-बॉक का इंतज़ार तो बेगाने करते हैं, जो झिझकते हैं…कुछ आधे घंटे बाद फिर फोन किया तो उसने उठा लिया….


हां, यार, कुछ पूछने के लिए फोन किया है, तुम बिज़ी हो इस वक्त…बस, वही बात करूंगा…मैंने कहा। 


हां, हां, बता, उसने कहा …


यार, दो चार दिनों से एक चीज़ का नाम याद नहीं आ रहा ….यार, जो हमारे ज़माने में लोग शूज़ के नीचे वे लोहे के मोटे मोटे से जुगाड़ फिक्स करवा लेते थे, उन का नाम याद नहीं आ रहा ….


खुरियां, खुरियां, यार …..अगले ही पल उस ने खुल कर हंसते हंसते जवाब दिया…

मुझे इतनी राहत महसूस हुई…


मैंने झिझकते 2 उसे कहा कि यार डोंट माईंड (वैसे यह कहने की कोई ज़रुरत भी न थी)...खामखां कईं बार हम लोग फार्मेलिटी में पड़ जाते हैं…हां, यार, जहां तक मुझे याद है जब तुम कॉलेज में आए तो तुम जो ब्रॉउन सोल के शू़ज़ पहनते थे, उस के नीचे भी ये खुरियां (खुरियां- बहुवचन है…पंजाब का लफ़्ज़ है ..खुरी) लगी होती थीं …


हां, हां, प्रवीण, तुझे बिल्कुल सही याद है….उसने हंसते हंसते कहा और साथ में याद दिलाया कि अपने प्रोफैसर साहब डा बी के भी तो अपने जूतों पर ये खुरियां लगवाते थे …..फिर हम दोनों ने  अगले एक दो मिनट ठेठ पंजाबी में बात की और जाहिलों की तरह हंसते रहे …..उसने यह भी याद किया कि वह अमृतसर के बस-अड्डे के सामने किसी मोची से अपने मेचे (अपने नाप के) शूज़ बनवाता था …और फिर उन शूज़ के नीचे खुरियां फलां फलां जगह से लगवा लेता था….


चलिए, मुझे राहत मिली ..कि कम से कम उस चीज़ का नाम पंजाबी ही में सही याद तो आ गया…..हिंदी या हिंदोस्तानी में उसे क्या कहते हैं वह तो मैं ढूंढ ही लूंगा…


लेकिन हिंदी में क्या कहते हैं, पता कर लूंगा …लेकिन ओव्हर-कांफिडेंस काम न आया….रास्ते में चलते चलते एक मोची भाई की शरण में जाना पड़ा। पचास के करीब होगा वह बंदा..मैंने पूछा कि बहुत साल पहले जूतों के नीचे जो लोहे की खुरियां सी लगाते थे …वे हैं क्या?....सोचा यही था कि अगर होंगी तो दो चार ले लूंगा…। 

अच्छा, आप नाल की बात कर रहे हैं, वे तो 10 बरसों से बंद हो चुकी हैं…उसने बताया….

मुझे झटका सा लगा कि बड़े से बड़े, कड़े नियम कानून आने पर भी गुटखा तो बंद नहीं हुआ, इस को बंद करने वाला तो कोई कानून मेरी नज़र से गुज़रा भी नहीं ….

मैंने कहा कि नाल तो घोड़े के पैरों के नीचे लगती है….


उसने कहा कि जिस चीज़ की आप बात कर रहे हैं उसे भी नाल ही कहते हैं….

जब घोड़े ही नहीं रहे तो नाल कहां से मिलेंगी….पास बैठी उस की 80-85 साल की मां ने भी इस चर्चा में अपना हिस्सा डाल दिया ….वह ज़रूर तांगे याद कर रही होगी जो घोड़े चलाते थे….


खैर, मैं आश्वस्त हो गया….कि हां, उस खुरी को ही नाल कहते हैं …मैंने गूगल से भी जब पूछा तो उसी नाल के आकार के जुगाड़ दिखे …अलबत्ता वे लोहे के नहीं, किसी प्लास्टिक-वास्टिक के थे….


घोड़े की नाल से याद आया….बहुत अंधविश्वास है हमारे यहां कि घोड़े की नाल घर के बाहर दरवाज़े पर फिक्स करना बहुत शुभ होता है …यह बात मैंने पंजाब में नहीं सुनी थी कभी …यही बंबई में ही पहली बार यह सुना और देखा….। और तो और, जैसे इतना ही अंधविश्वास काफी न हो, उस से ऊपर यह वाली बात कि अगर भागते हुए घोड़े के पैर की नाल कहीं मिल जाए और उसे घर के दरवाज़े पर लगा लें तो बहुत ज़्यादा लाभदायक होती है …….सब बेकार की बातें हैं….अगर ये बातें मानना शुरु करें तो यह भी पता करना होगा कि अंबानी, अडानी को घोड़ों की ऐसी कितनी नालें मिलीं…पिछले पचास बरसों में….मुझे तो जिस प्रक्रिया में घोड़े के पांव के नीचे ये नाल फिक्स की जाती है, वह देख कर ही बहुत दुःख होता है ….


अभी लिखते लिखते यह लग रहा है कि घोड़े के पैर के नीचे तो ये नाल इसलिए फिक्स की जाती होगी ताकि उस के पैरों पर आंच न आए…लेकिन 50 बरस पहले जो नाल या पंजाबी में कहें तो खुरी ….हम लोग शूज़ के नीचे एड़ी (हील) पर लगवा लेते थे उस का तो एक ही मक़सद होता था कि एड़ी कम घिसे …..

लेकिन यह क्या …एक बात तो मैं लिखनी भूल गया …जब कल उस कॉलेज के दोस्त से बात हुई तो उसने इतना भी कहा कि यार, उसे लगवाने से बंद की टोर (रुआब, डैश) बढ़ जाती थी ….मैंने भी कहा …हां, हां, हां…..उस की आवाज़ ही ऐसी आती थी चलने में ….

जहां तक टोर, रुआब, डैश की बात है वह यह है कि ऐसे शूज़ पहन कर बंदा अपने आप में खामखां बड़ा स्ट्रॉंग सा फील करने लगता था ….जहां कभी भी जाए ..ठक, ठक, ठक …..पैंचो दूसरे भी परेशान और खुद भी परेशान…ऐसे लगता था कि जैसे कोई सिर पर चोट कर रहा है ….

मुझे इतना कैसे पता है इस ठक ठक …ठक ठक….

क्योंकि मुझे याद है कि देखा-देखी मुझे भी एक बार शूज़ के नीचे ये खुरियां लगवाने का शौक चढ़ा था…मैंने भी किसी मोची भाई से लगवा भी ली थीं दो तीन खुरियां दोनों एडियों पर ….लेकिन एक दो दिन में मैं तो भाई परेशान हो गया और निकलवा के बाहर की थीं….। 


जी हां, फैशन भी होगा ….शूज़ से ठक-ठक की आवाज़ आना, चलते हुए शूज़ से चूं-चूं की आवाज़ निकलना (उतनी नहीं जितनी छोटे बच्चों के शूज़ से निकलती है…किसी स्टेशन-अड़्डे पर वह सुन कर तो मज़ा आ जाता है, रौनक लग जाती है…हंसी आ जाती है…दो दिन पहले ही मुंबई सेंट्रल के स्टेशन पर मैं लोकल ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था कि ऐसा ही एक बच्चा टहल रहा था …पांच सात मिनट बाद गाड़ी आई….गाड़ी में चलते चलते मैंने उस बच्चे के अब्बे को कह ही दिया….इस बच्चे के शूज़ की वजह से इंतज़ार के पल बहुत जल्दी खत्म हो गए….वह मुस्कुरा दिया…..) ….मैं अनजान लोगों से बतियाने की अपनी पुरानी आदत से मजबूर…..))....और ऊपर से उस दौर के खुले खुले बैलबाटम, लंबे लंबे बाल ….और कुत्ते कालर वाली लंबी लंबी कमीज़ें…..इस का रिजल्ट यही देखने में मिलता कि बंदा खुद को चाहे जितना मर्ज़ी हिप्पी या मॉड समझ ले …छोटा मोटा विलेन लगने लगता था ….जिसे हम रुआब, डैशिंग ….या मर्दाना लुक्स (मेस्कुलीन लुक).....। 


मैंने लिखा है कि उस दौर में इस तरह से जुगाड़ इसलिए किए जाते थे कि एड़ी कम से कम घिसे क्योंकि एड़ी घिसने के बाद जूता बेकार हो जाता था ….और हां, एडी़ भी उन दिनों यही चमड़े जैसे किसी मेटिरियल की ही होती थी या कोई नरम सा और कोई मेटिरियल होता था …इस नाल के लगने से उस जूते की उम्र बढ़ जाती थी ….


अब क्या लगवाएं लोग ये खुरियां या नालें…..कईं घरों के बाहर इतने जूते पड़े होते हैं …हर मौके के लिए टहलने वाले, दौड़ने वाले, स्कूल कालेज दफ्तर वाले, पार्टी वाले ….फॉर्मल टाइप ….इस के अलावा दो चार ऐसे जो दिल के बहुत करीब लगे, इसलिए खरीद लिए, ऑन-लाईन सेल में 50 फीसदी छूट पर बिक रहे थे …..लेकिन इस सब चक्कर में इतने जूते दिखते हैं घरों के बाहर जितने पुराने ज़माने में किसी घर में धार्मिक आयोजन…..सत्यनारायण कथा, महिला कीर्तन, लेडीज़ संगीत या सत्संग के वक्त भी नहीं मिलते थे….और इनमें कितने तो खराब होने के लिए, फटने के लिए ही रखे होते हैं जैसे ….पड़े पड़े अपनी तकदीर कोसते होंगे कि उन की किस्मत में दुनिया देखना जैसे लिखा ही न हो ….जैसे अलमारी में बंद किताबें तकती रहती हैं कि कब कोई उन को खोल कर उन के पन्ने उलटे ….पलटे….उन को भी कुछ हवा लगे।


अब तो शूज़ घिसने से पहले ही नए आ जाते हैं …घिसने की नौबत ही कहां आने देते हैं….एक बात याद होगी मेरी उम्र के लोगों को कि घरों में इतने ही जूते-चप्पले होती थीं कि कौन सी चपप्ल मां की है, कौन सी बहन की ….सब कुछ सब को पता रहता था …अब तो आए दिन ऑन-लाईन के डिब्बे आते हैं नए नए शूज़ के …कईं कईं दिन बंद ही रहते हैं….फिर कुछ दिन बाद खुलते हैं…अगर तंग हों या पसंद न आए तो लौटा दिए जाते हैं…पहले घर में शूज़ अगर कोई आता तो सारे घर को ख़बर होती ….अगले एक दिन दिन यही मुद्दा डिस्कस होता कि तंग तो नहीं है, है तो बदल ले…..कईं बार झिझक की वजह से तंग जूते न बदले जाते तो वे अगले एक-दो साल तक नाक में दम कर देते …छाले, चलने में दिक्कत…..और इंसान अपनी दूसरी तकलीफ़े भूल जाता क्योंकि सारा ध्यान उन की तरफ़ ही रहता…..


एक कहावत भी तो चली थी पिछले दिनों कि अगर आप अपनी सारी तकलीफ़े भूल जाना चाहते हैं तो आप एक तंग जूता खरीद लीजिए…..इस पर मैंने एक बात और जोड़ दी थी कि अगर और भी अच्छे से भूलना चाहते हैं ..सभी ग़मों को …तो एक बहुत तंग कच्छा (अंडरवियर) भी लगे हाथों खरीद लीजिए….। 


पहले हम चीज़ों की बहुत कद्र करते थे ….जूते के नीचे नालें लगवाना ही नहीं, आज से पचास साठ बरस पहले हम लोग जूतों के सोल भी बदलवा लेते थे जिस से नए जूते खरीदने से बच जाते थे और यह काम पांच छः रूपए में हो जाता था ..मैं पांचवी छठी क्लास में था, मेरे पिता जी एक बार मेरे सैंडल सोल बदलवाने के लिए ले गए….दो तीन दिन की वेटिंग लिस्ट हुआ करती थी …मैं रोज़ उन के आने की इंतज़ार करता कि आज तो मेरे सैंडल वापिस आ ही जाएंगे…..जब चार पांच दिन बाद वे नये सोल के साथ मुझे मिले तो मैं इतना खुश हुआ …कि ये तो नए हो गए हैं…..। 


एक खुशी और याद आ रही है ..कालेज में था ….नया नया….मेरी बडी़ बहन लेक्चरार लगी थी ….10 साल बड़ी हैं…एक बार मुझे अपने साथ बाज़ार ले गईं ….तो ज़िद्द करने लगी कि एक स्पोर्ट्स् शूज़ ले लो ….तुम्हारे पास नहीं हैं….मेरा भी मन तो था..लेकिन बहन से लेना नहीं चाहता था …पर उस की ज़िद्द के सामने मेरी न चली और उन्होंने मुझे अमृतसर की एक दुकान से 125 रूपए के नार्थ-स्टॉर के शूज़ ग्रे कलर के दिला दिए….वाह, क्या शूज़ थे, इतने आरामदायक ….पहली बार मैंने ऐसे शूज़ पहने थे …चमड़े के ही पहनते थे …बस, उन शूज़ को पहन कर मुझे इतना मज़ा आया कि अगले तीन चार साल तक जब तक वे फट नहीं गए, मैंने उन का साथ नहीं छोड़ा …..यह 1978-1979 की बातें हैं ….लेकिन आज भी जब मैं यह बात उस से करता हूं तो हम दोनों भावुक हो जाते हैं….अब पंद्रह-बीस हज़ार के भी शूज़ खरीदते हैं, कुछ दिन पहनते हैं और फिर रख देते हैं ….लेकिन वे 125 रुपए वाले नार्थ-स्टॉर वाले शूज़ बहुत ही ज़्यााद स्पैशल थे …और अभी तक हैं……..


पता है क्यों थे वे इतने स्पैशल ?.....क्योंकि मुझे उस वक्त उस दौर में उन की बहुत ज़रूरत थी ….।


लिखना तो अभी भी बाकी है ..लेकिन ब्लॉगिंग का यही इशू  है जैसे ही लिखते लिखते थोड़ा सी भी बोरियत महसूस होती है, फ़ौरन बंद करने की चाह होती है …हो गया आज के लिए…..बस, बार बार इन नालों वाले शूज़ का ख्याल आते ही उस दौर के खूंखार विलेन भी याद आते हैं (जो ऐसे शूज़ पहनते थे जिन से ठक-ठक की आवाज़ आती है) और उस दौर के सुपर-डुपर हिप्पी गीत भी …..जो 50 सालों के बाद भी दिल के उतने ही करीब हैं …..


अगर आप के पास भी इन नालों, इन खुरियों की कोई याद है तो लिखिएगा….कमैंट में नहीं लिखना चाहते तो ईमेल करिए मुझे …या मुझे वाट्सएप करिए….मैं एक बात भूल रहा हूं कि खुरियों के बारे में तो मैंने लिख दिया …लेकिन एक चलन और भी था, मोटे मोटे लोहे के कील ए़डी पर लगवा लेने का…..मकसद वही, दोस्तो, जूते कम घिसे ….बस, वही राष्ट्रीय मुद्दा था उन दिनों ……मैंने भी एक बार लगवाए थे लेकिन उन से भी दो दिन बाद ही निजात पा ली थी ….

 

चलिए, आज मेरे उस दौर की वजह से यह पोस्ट लिखी गई…ये पुरानी बातें पुराने लोग न लिखेंगे तो कौन लिखेगा….यह पोस्ट उसी दोस्त को समर्पित है ….अगर उस से यह खुरी लफ्ज़ का पता ही न चलता तो मैं कैसे यह लिख पाता …..हां, एक बार इस पंजाबी लफ़्ज़ याद आ गया तो फिर मेरे शब्दकोष ने भी उस दोस्त और उस मोची भाई की बात पर पक्की मुहर लगा दी…यह शब्दकोष बहुत बढ़िया है …1500 पन्ने हैं इस के …पंजाबी मेरी मां-बोली है और अगर किसी पंजाबी फिल्म, गीत में या किसी किस्से कहानी में मुझे किसी पंजाबी लफ़्ज़ का अर्थ पता नहीं होता तो मुझे बहुत बुरा लगता है ….अपनी मां-बोली ही समझ में न आए तो और क्या ही समझ लेंगे।इसीलिए यह शब्दकोष खरीदा था….