Friday, December 12, 2014

रोड़ सेफ्टी की ऐसी की तैसी

अकसर हम लोग बड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में कह देते हैं ना कि नियम कानून तो कमज़ोर तबके के लिए होते हैं...दबंगों के आगे कहां नियम-कायदे टिक पाते हैं।.....लेकिन कहीं हम सड़क नियमों के बारे में भी ऐसा नहीं सोच लेते। वैसे तो आज कर देश में हर जगह ट्रैफिक को देख कर यही लगता है।

कॉलेज के दिनों में एक गीत बार बार बजा करता था ......लखनऊ के दो नवाबों की गाड़ी पहले आप पहले आप के चक्कर में छूट जाती है.....मुझे तो यहां ऐसा माहौल नहीं दिखा....हर कोई जल्दी में है। वैसे यह लखनऊ की ही बात तो है नहीं, हर तरफ़ लगभग यही मंजर दिखेगा।

मेरे पास सड़क दुर्घटना में चोटिल हुए बहुत से मरीज़ आते हैं..... आगे के दांत टूटे हुए, होंठ कटे-फटे हुए, जबड़े की हड्डी टूटी हुई....और लगभग हर केस में यही देखता हूं कि दुर्घटना के समय उस ने हेल्मेट नहीं पहना हुआ था....क्या करें, फिर भी हम ने तो हौंसला तो देना ही होता है....मैं अकसर इन्हें कहता हूं कि आप गनीमत समझें कि आंखें बच गईं, सिर फटने से बच गया....दांतों और चेहरे पर लगने वाली चोटें अकसर बहुत गंभीर होती हैं। टूटी हड्डियां-वड्डियां जुड़ तो जाती हैं लेिकन इस दौरान एक-दो महीने तक उन्हें खाने-पीने की कितनी दिक्कत होती है, इस की शायद ही आप कल्पना कर पाएंगे। और बहुत से केसों में दाग वाग तो रह ही जाते हैं सदा के लिए.....कहां लोग प्लास्टिक सर्जरी करवाते हैं!

पिछले हफ्ते मेरे पास एक ३० वर्ष के लगभग उम्र का एक युवक आया था.....उस का मुंह बहुत ही बुरी तरह से चोटिल हुआ था....पहले ही बहुत से टांके लगे हुए थे.....बात करने पर पता चला कि रात के समय बिना हेल्मेट के मोटरसाइकिल चला रहा था, मोबाईल पर बात भी करता जा रहा था कि पीछे से एक बड़े ट्रक ने टच कर दिया.....दूर जा कर गिरा खेतों में। आधे घंटे के बाद किसी पुलिस वाले ने उठा कर अस्पताल पहुंचा दिया। उस के ऊपर नीचे वाले दांत आपस में मिल नहीं रहे थे, खाया कुछ भी नहीं जा रहा था, मैंने चेक किया तो ऊपर वाले जबड़े का फ्रैक्चर पाया......ठीक तो हो ही जाएगा, वह बात नहीं है। उस के चेहरे को फोटो मैं यहां नहीं लगा रहा क्योंकि इससे आप विचलित हो जाएंगे।

लखनऊ में मैंने एक ट्रेंड और नोटिस किया है कि डिवाइडर वाली रोड पर लोग उल्ट डायरेक्शन पर अपने दोपहिया वाहन लेकर चले आते हैं..एक बार तो मैंने एक कार चालक को यह डेयरिंग काम करते देखा।


दो तीन दिन पहले की बात है कि मैंने स्कूटर के पीछे एक महिला को देखा जिसने एक बड़ा सा लकड़ी का रैक थामा हुआ था......लेिकन यह क्या, हम नितप्रतिदिन रोड़ सेफ्टी को चिढ़ाने वाले इस तरह के दृश्य देखते ही रहते हैं।

अभी कल परसों की बात है कि मैंने एक रिक्शे को इतनी तेज़ी से जाते देखा कि एक बार तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे रिक्शे में किसी ने मोटर लगवाई हो......(आज से तीस वर्ष पहले पंजाब में एक ट्रेंड चला था, साइकिल रिक्शा को मोटर लगवाने का....फिर पता नहीं वह क्रेज जल्द ही पिट गया था)... लेिकन फिर ध्यान गया कि यह तो इस मोटरसाइकिल सवार बांके की कारगुजारी थी.......इसने अपने पांव उस रिक्शे पर रखा हुआ था...एक तरह से यह उसे धकेलता जा रहा था... आगे चौक पर पहुंचने से पहले इसने कुछ क्षणों के लिए पैर हटा लिया.......लेकिन फिर से रख लिया......मैं यही सोच कर कांप रहा था कि अगर इस का पैर उस रिक्शे में कहीं अटक जाए.......कितना जोखिम भरा काम है यह.....



लेकिन अभी लिखते लिखते ध्यान आ गया कि हम भी स्कूल के दिनों में एक जोखिम उठाया करते थे...साइकिल पर आते जाते थे.....रास्ते में कोई ट्रैक्टर-ट्राली दिख जाती तो उस के संगल पकड़ कर दो मिनट मेहनत से सुकून पा लिया करते थे......एक खतरनाक खेल होता था वह भी।

हां, एक बात यह कि मैं इस बांके की जब ये फोटू खींच रहा था, तो इन की इतनी स्पीड थी कि मुझे मेरे दुपहिया वाहन की स्पीड उतनी रखने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि मैं तो हमेशा २५-३० की स्पीड में चलाने वाला बंदा हूं। सोचने की बात है कि आखिर मेरे को भी ऐसी क्या एमरजैंसी दिखी कि मुझे ये तस्वीरें खींचनी ही थीं, ज़ािहर है यह कोई एमरजैंसी नहीं थी, यह भी तो एक जोखिम है कि आप ऐसी सड़क पर अपने फोन से फोटो खींचने की कोशिश कर रहे हैं, एक हाथ से अपने स्कूटर के हैंडल को थामे हुए। काश, मुझे भी सद्बुद्धि प्राप्त हो कि मैं भी इस तरह से रोड़-सेफ्टी को नज़र अंदाज़ न किया करूं।

लेकिन एक बात है कि रोड़ पर सब गड़बड़ थोड़े ही ना होता है, कभी कभी बहुत अच्छा भी दिख जाता है जैसे इस नन्ही सी बच्ची और उस के बापू का प्यार.....जिस अंदाज़ में उसने बापू को थाम रखा था, देखने लायक था, मैंने अपना स्कूटर धीमा कर के कहा कि तुम्हारी बेटी बड़ी समझदार है, हंसने लगा था वह बंदा मेरी बात सुन कर।

इतनी छोटी बच्ची की इतनी मजबूत पकड़
हां, एक बात और.....आज सुबह जब गूगल इंडिया का ब्लॉग देखा तो वहां पता चला कि २०१४ में एक वीडियो  जो सातवें नंबर पर रहा ..जो इतना वॉयरल हो गया कि इसे लगभग पचास लाख लोग देख चुके हैं और यह भी रोड़ सेफ्टी के ऊपर एक सोशल मैसेज है... आप देखेंगे कि किस तरह से ट्रांसजेंडर्स की मदद  इस अभियान में इतनी क्रिएटिविटी के साथ ली गई है.....लीजिए आप भी देखिए यह वीडियो ....


शरीर पर भारी स्मार्टफोन की खुमारी

पिछले महीने एक दिन मेरी तबीयत खराब थी, मैं लेटा हुआ था, लेकिन बार बार मेरे स्मार्टफोन पर कुछ न कुछ आ रहा था और मैं उसे उसी समय चैक किए जा रहा था।

उस समय मेरे बेटे ने अचानक मुझे सलाह दी......."Dad, be cool!....take some rest. You are checking and responding to your messages with the agility of a 13-year old"....यही शब्द उस ने कहे थे, मुझे भी यही लगा कि इतना भी क्या चस्का इस स्मार्टफोन का, ठंड रखनी चाहिए। कोशिश कर रहा हूं यह सीखने की कि कैसे स्मार्टफोन हाथ में रहते हुए भी ठंड रखी जाए। 

दो दिन पहले १० दिसंबर की हिन्दुस्तान अखबार में विशाल माथुर की एक रिपोर्ट छपी थी......शरीर पर भारी स्मार्टफोन की खुमारी। यह रिपोर्ट मुझे बहुत अच्छी लगी, मैं चाहता हूं कि इसे सभी स्मार्टफोन यूज़र्ज देखें। मैं इसे नेट पर भी ढूंढने की कोशिश की, लेकिन नहीं मिला इस का लिंक। इसलिए मैं इस में से कुछ अंश आप की जानकारी के लिए यहां रखना चाहता हूं। 

कहते हैं, दुश्मन से दिल्लगी अच्छी नहीं होती। कुछ यही बात स्मार्टफोन की लत पर भी लागू होती है। कभी काम तो कभी चैटिंग के बहाने स्मार्टफोन से िदन भर चिपके रहने की आदत न सिर्फ आंख, बल्कि गर्दन और रीढ़ की सेहत पर भी भारी पड़ रही है। 

रिसर्च में पाया गया है कि सीधी मुद्रा में बैठने या खड़े होने के दौरान औसत इन्सान के सिर का वजन ४.५ से ५ किलोग्राम होता है। लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति सिर आगे या पीछे की ओर झुकाने लगता है, ग्रेविटी के चलते भार बढ़ता जाता है। ऐसा बताया गया है कि गर्दन १५ डिग्री तक झुकाने पर सिर का वजन २७ पौंड (लगभग १२ किलोग्राम), ३० डिग्री नीचे करने पर ४० पौंड (लगभग १८ किलोग्राम), ४५ डिग्री पर ४९ पौंड (लगभग २२ किलोग्राम), और ६० डिग्री पर ६० पौंड (लगभग २७ किग्रा) तक पहुंच जाता है। 

ऐसे कम करें नुकसान ...
  • स्मार्टफोन, टैबलेट या ई-बुक को आंख से १२ से १४ इंच की दूरी पर रखकर प्रयोग करें। 
  • अंधेरे में और लेटकर या आराम-कुर्सी पर बैठकर स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने से बचें। 
  • एंड्रायड उपभोक्ता ब्लूलाइट फिल्टर डाउनलोड करें, गूगल प्लेस्टोर पर मुफ्त में उपलब्ध। 
  • गर्दन से जुड़ी एक्सरसाइज़ करें, रोज २०-२० बार गदर्न सीधी रखकर दाएं व बाएं घुमाएं।
  • फोन आंख की बराबरी मे लाकर इस्तेमाल करें। 
शरीर पर पड़ रहे दुष्प्रभाव ..
गर्दन
सिर झुकाकर स्मार्टफोन खंगालने के दौरान गर्दन पर दबाव पड़ता है। इससे नसों के दबने और उनमें खून का प्रवाह बाधित होने से असहनीय दर्द की शिकायत उभर सकती है। साथ ही आसपास की हड्डियों, मांसपेशियों और ऊतक कमजोर होने से कईं दूसरी परेशानियां घेर सकती हैं। 

आंख..
कंप्यूटर और स्मार्टफोन चलाने के दौरान पलकें कम झपकाने से आंखों में आंसू का उत्पादन नहीं हो पाता है। इससे व्यक्ति ड्राई-आई की चपेट में आ जाता है, जिसमें आंखों में जलन, खुजली, कमजोर रोशनी, सिरदर्द, चक्कर, मिचली और एकाग्रता में कमी की शिकायत होने लगती है। 

रीढ़ की हड्‍डी 
किताब पढ़ने, फोन पर काम करने या फिल्म देखने के दौरान अक्सर लोग गर्दन तानकर आगे की तरफ झुका लेते हैं। इससे रीढ़ की हड्डी पर अत्याधिक दबाव पड़ता है. उसमें सूजन आने से डिस्क के बीच अंतर बढ़ने लगता है। व्यक्ति को असहनीय दर्द तो झेलना ही पड़ता है, साथ में सर्वाइकल स्पांडलाइटिस का खतरा भी बढ़ जाता है। 

हां, तो दोस्तो आपने क्या सोचा.....स्मार्टफोन ठीक है यार अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है, लेकिन अति तो किसी भी चीज़ की सेहत पर भारी पड़ती ही है....ये जो बातें ऊपर लिखी हैं ये सब रिसर्च के परिणाम हैं, न्यूयार्क स्पाइन सर्जरी एंड रिहैबिलिटेशन मेडिसिन सेंटर के हालिया अध्ययन में स्मार्टफोन के ये दुष्परिणाम गिनाए गए हैं। 

देखिए, दोस्तो, आप अपने विवेक अनुसार निर्णय लें, जानता हूं स्मार्टफोन के बिना अब गाड़ी चलने वाली नहीं तो फिर क्यों न हम ऊपर लिखी सावधानियों को मान लें........और जैसे गर्दन की एक्सरसाइज करने को कहा गया है, वह भी कर लिया करें, मैंने भी बेटे की बात को मन में बसा लिया है कि हर समय १३ साल के लोंडे की तरह हर मैसेज को तुरंत उसी समय देखना और तुरत-फुरत उस का उसी पल जवाब देना क्या सेहत से भी ज़्यादा ज़रूरी है क्या, बिल्कुल नहीं!! Take care, friends!

अच्छा एक काम करते हैं, आप अपना स्मार्टफोन थोड़ा दूर रखें, इतने सीरियस टॉपिक के बाद आप को एक गीत सुनाता हूं...it is thought provoking too!


टीचरों के अनुभव ताउम्र मार्गदर्शन करते हैं....

हर स्तर पर टीचर पूजनीय है, यह तो हम सब मानते हैं......वह कक्षा में केवल विषय ही तो पढ़ा नहीं रहा होता, वह अपने उम्र भर के अनुभव आप के सामने रख देता है...है कि नहीं?

कुछ लोग शायद इस गलतफहमी में रहते हैं कि फलां फलां ने क्या पढ़ाना है, सब कुछ तो किताबों में लिखा ही है, पढ़ लेंगे, उस में समझने लायक है ही क्या। लेिकन यह बहुत बड़ी भूल है, जो हर क्लास में ये महारथी पांच मिनट के लिए अपने अनुभव साझा कर रहे होते हैं, वही तो सुनने और समझने वाली बात होती है, जो किसी किताबों में नहीं मिलतीं।

मेरे पास बहुत से मरीज़ ऐसे आते हैं जो आम खांसी जुकाम के लिए ऐंटीबॉयोटिक की फरमाईश करते हैं....मुझे पता है कि इन्हें इन की ज़रूरत नहीं है, फिर भी ...अपने आप किसी डाक्टर को ऐंटीबॉयोटिक लिखने के लिए कहना या अपनी मरजी से ही बाज़ार से खरीद लेना एक बड़ा मुद्दा है। इसी वजह से कारगर से कारगर ऐंटीबॉयोटिक अब अपनी धार खोने लगे हैं....अब वे असर ही नहीं करते।

छोटे छोटे बच्चों की आम खांसी-जुकाम के लिए दी जाने वाली दवाईयों की तो कितनी आलोचना हो रही है, आप देखते ही होंगे।

हां, तो मैं अपनी एक मैडम की बात करना चाहता हूं....यह थीं डा सीता शर्मा, जो अमृतसर के मैडीकल कालेज की फार्माकालोजी विभाग के अस्सी के दशक के दौरान हैड थीं....वह हमें फार्माकालोजी पढ़ाती थीं......बहुत ही ज़हीन प्रोफैसर थीं...अच्छे से समझा देती थीं, मैं उन की एक भी क्लास मिस नहीं करता था।

अगर पांच छः छात्र भी होते थे तो भी वे अपनी क्लास ज़रूर लिया करती थीं।

एक दिन की बात है मुझे अच्छे से याद है कि उन्होंने हम से साझा किया कि ये जो इतनी दवाईयां खाने का ..विशेषकर छोटी मोटी तकलीफ़ों के लिए...ट्रेंड सा चल पड़ा है, यह खतरनाक है। हमें तो उम्र की उस अवस्था में कहां दीन- दुनिया के बारे में इतना कुछ पता होता है... एक दिन उन्होंने बताया कि किस तरह से पंजाब के गांव के आदमी बुखार होने पर एक कप चाय पीने से ही दुरूस्त हो जाते हैं.......सामान्यतयः ये चाय पीते नहीं हैं...शायद यह ३० साल पुरानी बात थी, आज का मैं नहीं कह सकता......और जब ये बुखार में चाय पीते हैं... तो चाय में मौजूद कैफीन इन के लिए एक दवाई का काम करती है, इन्हें पसीना आ जाता है और ये एकदम फिट हो जाते हैं......यही बात वे ऐस्प्रिन की गोली के बारे में बताया करती थीं कि यह सस्ती सी गोली, कितनी असरदार है........यह आप लोग नहीं समझोगे, आप लोग तो बस मैडीकल रिप्रेजेंटेटिव के प्रलोभन में  महंगी महंगी दवाईयां ही लिखा करोगे, इन्हें यह भी अंदेशा था.......अब यह हमारे दिल को पता है कि यह कितना सच साबित हुआ, कितना झूठ।

पंजाब के गांवों में लोग अमूमन दवाईयां कम ही खाते हैं.....इस का इफैक्ट देखना चाहेंगे?..कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझे व्हाट्सएप पर यह वीडियो भेजी थी.....मैं यहां शेयर कर रहा हूं, देखिएगा...और इन के घुटनों की और इन के उत्साह की तारीफ़ में दो शब्द तारीफ़ के शेयर किए बिना बिल्कुल मत आगे बढ़िएगा.....

बड़ा इम्पैक्ट पड़ता है अपने टीचरों का हमारे व्यक्तित्व को तराशने में......शर्त यही है कि हम लोग उन्हें पूरा सम्मानपूर्वक सुनें तो.......एक ऐसे ही टीचर थे हमारे डा कपिला सर...ये हमें ओरल सर्जरी का विषय पढ़ाया करते थे...दिल से पढ़ाते थे......इसलिए उन की सभी बातें सीधा दिल में उतर जाया करती थीं....अमृतसर के दिसंबर-जनवरी के महीने में कोहरे के िदनों में आठ बजे सुबह की क्लास में पांच मिनट पहले पहुंचना उन की आदत थी......कहां गये ऐसे लोग......हर बात को अच्छे से समझाना.....कहा करते थे कि जबड़े की हड्डियां अपने तकिये के नीचे रख के सोया करो.....कहने का भाव यही कि अपने विषय को अच्छे से पढ़ा करो......शत शत नमन......अब वे नहीं रहे।

हां, तो एक बात......मैंने पिछले एक महीने से चाय छोड़ रखी है..........बिल्कुल......कारण यह रहा.........चाय से ऩफरत के मेरे कारण। 

कल से बड़ा जुकाम परेशान कर रहा था, आज सुबह अच्छी सी चाय दवाई के तौर पर पी तो इतना अच्छा लगा कि अपनी मैडम डा सीता शर्मा की जी बातें याद आ गईं और आपसे शेयर करने बैठ गया।

मैडीकल पी जी प्रवेश में खेला जा रहा सॉल्वर का खेल

आज की हिन्दुस्तान में मनीष मिश्र की इस रिपोर्ट  ने चौंकाया तो बिल्कुल नहीं ..क्योंकि मुन्ना भाई फिल्म से तो काफी कुछ पहले से पता लग ही चुका है एक बात.......और दूसरा अब तो आए दिन इस तरह की खबरें दिखने लगी हैं लेकिन एक बात की जानकारी पुष्ट हो गई कि किस तरह से डाक्टर १० -२० लाख रूपये की साफ़-सुथरी कमाई कर रहे हैं।

लखनऊ के मैडीकल कालेज केजीएमयू के डाक्टर पीजी की सीट में दाखिले में सॉल्वर बन रहे हैं। ज्यादातर खेल प्राइवेट मेडीकल कालेजों की सीटों को लेकर चल रहा है। एक एक सीट को लेकर छात्र १० से २० लाख रूपए तक कमा रहे हैं।

दाखिला कराने का जाल कर्नाटक और महाराष्ट्र के मेडीकल प्रवेश परीक्षा तक फैला हुआ है। एमबीबीएस के मेधावी साल्वर बनकर परीक्षा में सेंधमारी कर रहे हैं।

दरअसल कर्नाटक के प्राइवेट मेडिकल कालेजों में पीजी कक्षाओं के सीटों का आवंटन राज्य सरकार व कॉलेज प्रबंधन मिलकर करते हैं। ८५फीसदी सीटें सरकार आवंटित करती है। १५ फीसदी सीटें मैनेजमेंट कोटे से आवंटित होती हैं। इसके लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा होती है। इसे कोमेड पीजीईटी (कर्नाटक कॉमन मेडिकल इंट्रेंस टेस्ट) कहते हैं।

कोमेड में केजीएमयू के छात्र बढ़-चढ़ हिस्सा लेते हैं। हर साल ५०-६०छात्रों का चयन भी हो रहा है। काउंसलिंग की प्रक्रिया होने के बाद से ही असली खेल शुरू होता है। कॉलेज प्रबंधन के एजेंट छात्रों को सीट छोड़ने के एवज में मोटी रकम का लालच देते हैं।

केजीएमयू के ८० फीसदी मेडिकोज हर साल अपनी सीटों को सरेंडर कर रहे हैं। बदले में वे १० से २० लाख रूपए की रकम ले रहे हैं।

कुछ ऐसा ही खेल महाराष्ट्र के मेडिकल कॉलेजों में भी चल रहा है। एमबीबीएस अंतिम वर्ष के अलावा एमबीबीएस कर चुके छात्र भी इन परीक्षाओं में हिस्सा लेते हैं। पीजी की पढ़ाई कर रहे छात्र भी इसमें शामिल हैं।

यूं बिकती हैं सीटें 

कर्नाटक सरकार के नियमों के मुताबिक छात्रों द्वारा सरेंडर सीटों को फिर से भरने की जिम्मेदारी कॉलेज प्रबंधन की होती है। कॉलेज प्रबंधन विषयावर सीटों की बोली लगाता है। जानकारों की मानें तो एक-एक सीट ५० से ६० लाख में बुक होती है। क्लीनिकल विषयों के रेट ज्यादा हैं। यही वजह है कि क्लीनिकल विषय चुनने वाले छात्रों को ज्यादा मोटी रकम मिलती है।

विदेशी डॉक्टरों से पैसा वसूल रहे देशी मेधावी 

देश में हर वर्ष चीन, रूस, यूगोस्लाविया और चेकोस्लवाकिया से हजारों छात्र डाक्टरी की पढ़ाई कर लौट रहे हैं। इन देशों में पढ़ाई सस्ती है ऐसे में ऊंचे घरानों के लिए यह देश पहली पसंद बने हुए हैं। इन विदेशी डाक्टरों को देश में प्रैक्टिस करने या फिर पीजी में प्रवेश परीक्षा होने से पहले एक परीक्षा पास करनी होती है। इसे फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट इंट्रेंस एक्जाम (एफएमजीई) कहते हैं। इस परीक्षा को नेशनल बोर्ड ऑफ एक्जामिनेशन (एनबीई) कराता है।

आमतौर पर ९० फीसदी विदेशी डाक्टर इस परीक्षा में फेल हो जाते हैं। इन कमजोर विदेशी डॉक्टरों को पास कराने में भी केजीएमयू के मेडिकोज शामिल होते हैं। जानकार बताते हैं कि यहां मेडिकोज की भूमिका सॉल्वर की होती है। इस परीक्षा में शामिल होने वालों का न तो बायोमेट्रिक रिकार्ड रखा जाता है और न ही परीक्षा कक्ष में फोटो ली जाती है. ऐसे में यह गेम पूरी तरह सुरक्षित होता है। हर आवेदक से मेडिकोज चार से पांच लाख रूपये वसूलते हैं।

यह तो थी रिपोर्ट----->>>>>अब इस की खबर लेते हैं। मेरे विचार में ये जो मेधावी डाक्टर अपनी काबिलियत के बल पर कर्नाटक जैसे राज्यों में पहले तो सीट ले लेते हैं फिर छोड़ने का उन्हें १०-२० लाख रूपया मिलता है, इस में आखिर क्या बुराई है......यह उन का हुनर है, उन्होंने तपस्या की इतने वर्ष...विषयों का पढ़ा और फिर पेपर पास किया..बाद में सीट ली, नहीं ली.....हम क्यों इस चक्कर में पड़ें, उन्होंने दस-बीस लाख की साफ़-सुथरी कमाई हो गई....हमें तो यही खुशी है........खुशी इसलिए है कि ये जो प्राइवेट कालेज इन्हें सीट छोड़ने के लिए इतनी मोटी रकम दे रहे हैं, ये भी कोई इन पर एहसान थोड़े ही कर रहे हैं, बोली लगती है इन के यहां इन सीटों के लिए , और आपने मीडिया में भी देखा-सुना होगा कि कुछ कुछ सीटें तो २-३ करोड़ में बिकती हैं, इसलिए इन के लिए १०-२० लाख रूपये देने तो कुछ भी नहीं हैं, मेरे विचार में यह रकम तो खासी कम है।

अब आते हैं सॉल्वर की भूमिका पर...... यकीनन यह सरासर गैरकानूनी है कि आप किसी की जगह पेपर दो और उसे पास करवाओ....यह तो पूरा पूरा जूते खाने और जेल की सैर करने का रास्ता है। मुझे नहीं लगता कि अगर परीक्षा लेने वाले चाहें तो इस प्रैक्टिस पर नकेल न कसी जा सके.....यहां पर देखता हूं कि रेलवे में खलाशी की भर्ती के लिए भी इस तरह के सॉल्वर आए दिन पकड़े जाते हैं....ऐसे में अगर परीक्षा हाल में बॉयोमेट्रिक्स का इस्तेमाल नहीं हो रहा, उन की फोटो नहीं खींची जाती है तो इस से तो भाई साफ पता चलता है कि सब कुछ ऊपर से मिलीभगत से ही चल रहा है। वरना आज की तारीख में यह सब करना क्या मुश्किल काम है।

ये जो चीन-रूस से पढ़ कर आने वाले डाक्टरों की बात है, मुझे याद है कि एक ऐसा ही मुन्नाभाई हमारे भी केन्द्रीय सरकार के अस्पताल में कईं वर्ष काम करता रहा....(एक उदाहरण नहीं है, बहुत मिल जाएंगे अगर ढूंढने निकलेंगे) ...एक दिन जब हम लोग शाम को घर पहुंचे तो टीवी पर खबर आ रही थी..किसी चेनल का स्टिंग आप्रेशन था कि कुछ मुन्नाभाईयों की चीन-रूस की डिग्री ही फर्जी हैं........उस दिन के बाद वह डाक्टर कहीं नहीं दिखा.......मामला ऐसे ही रफा-दफा हो गया (यही होता है).......आप दबंगाई देखे कि वह इतने वर्षों पर मरीज़ों का इलाज करता रहा.......उस की दबंगाई से भी ज़्यादा चयन-समिति शक के घेरे में आती है कि आपने क्या चैक किया.........बाबा जी का ठुल्लू?

और ऊपर मैंने बात की उन डाक्टरों की जो अपनी सीट छोड़ देते हैं १०-२० लाख रूपये में ......इस में इतनी आपत्ति क्यों, मैं नहीं समझ पाया......जब ये छोटे मोटे एक्टर लोग टीवी पर आने के लिए लाखों पाते हैं तो इन ज़हीन डाक्टरों ने क्या अपराध किया है..........अपनी काबलियित के बलबूते कोई टेस्ट पास किया...और फिर वह सीट छोड़ दी........सब कुछ साफ साफ.........लेकिन वह किसी की जगह पर बैठ कर पेपर सॉल्वर का काम तो एकदम खतरनाक खेल है, पता नहीं इतने पढ़े लिखे हो कर डाक्टर इस तरह से सॉल्वर बनने के चक्कर में कैसे पड़ (फंस) जाते होंगे!!

इन सॉल्वरों आदि की बैसाखियों के सहारे डाक्टर बने वे अमीरज़ादे क्या कर लेंगे एमबीबीएस....एमडी की डिग्री पाकर............ये कागज़ के फूल आखिर खुशबू कहां से लाएंगे?