Tuesday, March 4, 2008

लेकिन इस परी के पंख काटने से तुझे क्या मिला ?


कल शाम के वक्त मैं रोहतक स्टेशन पर पानीपत की गाड़ी में इस के चलने की इंतज़ार कर रहा था। इतने में मेरी नज़र पड़ी सामने वाले प्लेटफार्म पर....वहां पर एक छोटी-सी बहुत प्यारी नन्ही मुन्नी परी जैसी एक लड़की (3-4साल की होगी)......खूब चहक रही थी। हां, बिल्कुल वैसे ही जैसे इस उम्र में बच्चे होते हैं...बिल्कुल बिनदास, मस्तमौला टाइप के। मुझे उसे देख कर अच्छा लग रहा था।
वह अपने पिता के इर्द-गिर्द उछल कूद मचाये जा रही थी जो कि लगातार मोबाइल फोन पर बातें करने में मशगूल था। लेकिन वह नन्हीं मुन्नी बच्ची खूब मज़े कर रही थी। कभी पापा की पैंट खींचती, कभी मम्मी के पीछे जा कर खड़ी हो जाती, कभी इधर देखती , कभी उधर देखती। लेकिन यह क्या .........किसे पता था कि उस की इस नटखट दुनिया को इतनी जल्दी नज़र लग जायेगी।
हुया यूं कि उस की मां या बाप को बार-बार उसे थोड़ा रोकना पड़ रहा था....डैडी तो ज्यादातर फोन पर बतियाने में ही मशगूल था लेकिन मम्मी से शायद अब और सहन नहीं हो रहा था...............क्या यह कह दूं कि बच्ची की खुशियां देखी नहीं जा रही थीं...................वह झट से उठी और पास ही खड़े रेलवे पुलिस के तीन चार जवानों के पास उसे ले गई। अब मैं कुछ सुन तो सकता नहीं था लेकिन मैं उस औरत के आव-भाव से अनुमान ज़रूर लगा सकता था कि वह उस परी को डराने धमकाने के लिये ही उन के पास ले गई थी। बस , अगले ही पल उस नन्ही परी ने खूब ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया और डर कर, सहम कर बेहद लाचारी से मैं की बगल में बैठ कर दिल्ली वाली गाड़ी का इंतज़ार करने लग गई।
उस की लाचारी ने मुझे यही सोचने पर मजबूर किया कि आखिर उस महिला को इस परी के पंख काटने से क्या हासिल हुया ...........ऐसा करने से उस ने अनजाने में ही उस बच्ची के मन में पुलिस के खौफ़ का बीज बो दिया और जब आने वाले समय में यह अपनी जड़ें पक्की कर के एक भीमकाय पेड़ की शक्ल हासिल कर लेगा तो हम लोग ही यही लकीर पीटेंगे कि पुलिस को अपनी छवि सुधारनी होगी।
खैर, जो भी हो उस परी के दुःख को देख मैं भी थोड़ा तो पिघल ही गया और लगा सोचने कि क्या हम लोग अपने बच्चों के भी आये दिन ये पंख पता नहीं कितनी बार काटते हैं और उन की कल्पना शक्ति को संकुचित किये जाते हैं।

तब मैं अपने हाथ खड़े कर ही देता हूं !


सोच रहा हूं कि एक डाक्टर होने के नाते मेरे लिए कुछ पल बेहद निराशात्मक होते हैं .....उन क्षणों के दौरान मैं अपने आप को बेहद फ्रस्टरेटड महसूस करता हूं। उन में से एक नज़ारा जो मुझे परेशान करता है , वह यह है कि जब मैं किसी को भी मुंह में गुटखा उंडेलते देखता हूं.........मुझे एक बार तो उसी समय लगता है कि इस के लिए मैं ही उत्तरदायी हूं और मैं एक बार फिर अपना संदेश इस बदकिस्मत इंसान तक पहुंचाने में नकामयाब रहा। और अपने आप पर यह खुन्नस तो और भी ज़्यादा होती है जब किसी युवा को , किसी बच्चे को इस का इस्तेमाल करते देखता हूं। मैं ब्यां नहीं कर पा रहा हूं कि यह सब देखना कितना फ्रस्टरेटिंग अनुभव है।

यार, यह भी कोई डाक्टरी है कि पहले इन को गुटखों, तंबाकू, शराब से आत्महत्या करते देखते रहो, फिर जब ये बदकिस्मत इंसान( वैसे इमानदारी से बतला दूं तो इतनी सहानुभूति भी मुझे इन से कम ही होती है क्योंकि मैं समझता हूं कि मान भी लिया पढ़ाई लिखाई नहीं आती, किसी बड़े –बुजुर्ग ने बताया ही नहीं , लेकिन वह जो सारा दिन एफएम वाला 100रूपये में खरीदा डिब्बा चिल्ला कर कहता रहता है उस की भी तो सुनो। वह सैक्स में संयम रखने की सलाह दे रहा हो, गुटखे, तंबाकू, शराब से बचे रहने की सलाह दे रहा है, बड़े से बड़े विशेषज्ञों को यह रेडियो आप की खाट पर आप के तकिये के किनारे खड़ा कर देता है.........तो फिर भी इन की बेशकीमती बातें अच्छी नहीं लगतीं क्या.................बस, वही गाना ही अच्छा लगता है..........थोड़ी सी जो पी ली है, चोरी तो नहीं की है.....इतना सब कुछ यह रेडियो बतला रहा है....................और 100 रूपये में क्या इस की जान ही निकाल लोगो क्या ?............................................हां, तो मैं बात कर रहा था....जब ये सब पदार्थ अच्छी तरह इस्तेमाल करने के बाद.....अपने फेफड़े खतरनाक हद तक सिंकवाने के बाद, लिवर को बुरी तरह से जला लेने पर, मुंह के कैंसर या मुंह की किसी अन्य गंभीर बीमारी हो जाने पर, या दिल को एक-आध छोटा-मोटा झटका लगने के बाद होश में आये तो क्या खाक होश में आये.....................सोच रहा हूं कि ज़्यादातर केसों में इन सब नशीली वस्तुओं के प्रभाव लंबे समय तक चलने वाले होते हैं या कईं बार तो स्थायी ही होते हैं.....................ऐसे में चिकित्सक के पास ऐसी कौन सी संजीवनी बूटी है जिसे पिलाने के बाद पिछला सब हिसाब छु-मंतर हो जायेगा।

नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा, .....जब तक इस प्रकार की सभी लतों को पूरे ज़ोर से लात नहीं मारी जायेगी, कुछ नहीं होगा। अब सांस लेने में दिक्कत होगी, चलने पर सांस फूलेगा तो डाक्टर कोई टैबलेट थमा ही देगा....लेकिन यह कब तक चलेगा। दारू पी पी कर अगर लिवर ही जल गया तो क्या कर लेगा डाक्टर......................मुझे तो नहीं लगता कि कोई भी इलाज प्रभावी होगा अगर कोई बंदा यह अधिया मारना बंद नहीं करेगा...................तंबाकू से जनित मुंह के रोग क्या तंबाकू बिना छोड़े ठीक हो जायेंगे? ---यह आप भी जानते हैं।

Oh, my goodness, day in and day out ….this all is so very much frustrating. We keep on seeing these souls consuming all sorts of harmful stuffs recklessly, we keep on seeing all other high-risk activities…………………But I always ask myself what else to do… to make them aware of all this is your duty and that you have done…………….What else?

I had read something very interesting somewhere which I want to share …..

Cancer cures smoking !!!

आज जब मैं यह लिख रहा हूं तो मेरी अंतर्रात्मा ने मुझे यह कह कर झकझोरा है तू करता तो है बहुत कुछ .......लेकिन यह तेरी हाथ खड़े करने वाली बात मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई। मेरा मन मेरे से पूछ रहा है कि तू इस बात की कल्पना कर कि अगर कल को तेरा बेटा ही यह गुटखा शुरू कर दे तो क्या हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहेगा या फिर बेबसी से तब भी अपने हाथ खड़े कर देगा....................नहीं, नहीं,....................मेरी अंदर से आवाज़ आई......मैं तो उस की यह लत छुड़वाने के लिए ज़मीन-आसमां एक कर दूंगा।

तो फिर अपने आप से जो प्रश्न किया वह यही था कि क्या तू इस देशों के लाखों बच्चों के लिए भी ज़मीन-आसमां एक नहीं कर सकता...............तुझे ऐसा करने से कौन रहा है................ये भी तो किसी के बच्चे हैं ....किसी के सगे हैं....................सो, ऐसे हाथ खड़े करने से काम नहीं चलेगा। चल उठ जा, और इन नशीले पदार्थों के विरूद्ध छेड़ी जंग को पूरी बहादुरी से बिना किसी बात की परवाह किये बिना लड़।

इसलिए अब तो वह हाथ खड़े करने वाली बात के बारे में कभी सोचूंगा भी नहीं... क्योंकि अभी तो इस जंग की शुरूआत ही हुई है।

इसे दुनिया का आठवां अजूबा न कहूं तो और क्या कहूं?

बहुत दिनों से सोच रहा हूं कि दुनिया के सातों अजूबों के बारे में तो बहुत कुछ जानते हैं .....और हां , इन हिंदी ब्लोगर महिलाओं को अब यदा-कदा प्रिंट मीडिया में जगह दी जा रही है.....देख कर, पढ़ कर अच्छा लगता है। आप को भी लग रहा होगा कि ये आठवें अजूबे में महिला ब्लोगरज़ को कहां ले आया तूं..............आप ठीक कह रहे हैं ...लेकिन मैंने आज इस देश की अरबों ऐसी महिलाओं की बात करने का निश्चय किया है, जो इस देश के तमाम पुरूषों को इस लायक बनाती हैं कि वे अपने अपने क्षेत्र में जीत के परचम फहरा कर अपनी उपलब्धियों की शेखी बघेर सकें....और जिसके बारे में शायद बड़ी ही लापरवाही से बिना सोचे-समझे यह कह दिया जाता है या ज़्यादातर वह अपने आप को कुछ इस तरह से इंट्रोड्यूस करने में ही विश्वास करती है......हमारा क्या है, सारा दिल्ला चुल्हे-चौके में ही निकल जाता है और वह इतनी भी तो नहीं जानती कि आज कल उसे हम होम-मेकर कह कर पंप देने लगे हैं......................और सब से महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ये अरबों महिलायें वे हैं जो सब अपने हाथों से अपने सारे कुनबे का भरन-पोषण करती हैं( इस से भी मेरा मतलब यह तो बिल्कुल नहीं है कि महिला बलोगर्स स्वयं खाना नहीं बनाती होंगी !)……….और हां ,इसे खाने वाली बात की ही तो बात आज मैंने करनी है।

एक एक्सपेरीमैंट( प्रयोग) की तरफ़ मेरा ध्यान जा रहा है.......क्या है ना, कि अगर हम एक किसी दिन दाल या सब्जी की एक सी मात्रा अपने किसी नज़दीकी रिशतेदार महिला( मां, नानी-दादी, पत्नी, बहन, भाभी, मौसी.....) को दें और साथ एक जैसे मसाले एक ही मात्रा में दे दें, उसे पकाने के बर्तन भी एक जैसे ही उपलब्ध करवा दें, किस प्रकार की आंच सभी प्रतिभागियों द्वारा उस दाल-सब्जी को बनाने में इस्तेमाल होगी, लगे हाथों इस को भी स्टैंडर्डाइज़ड कर दिया जाये.........................इतना सब करने के बावजूद क्या आपको लगता है कि उन सब के द्वारा बनाये हुये खाने का ज़ायका एक सा ही होगा। नहीं ना, कभी हो ही नहीं सकता, आप भी मेरी तरह यही सोच रहे हैं ना..........बिल्कुल सही सोच रहे हैं। अपनी नानी के हाथ के पकवान आखिर क्यों हम सब उस कागज की किश्ती और बाऱिश के पानी की तरह हमेशा अपनी यादों की पिटारी में कैद कर लेते हैं..........आखिर यार कुछ तो बात होगी। क्यों हमारी माताओं द्वारा हमें बेहद प्यार से बना कर खिलाये गये पकवान अगली पीढ़ी के लिए बिल्कुल एक स्टैंडर्ड का काम करते हैं......यार, मां तो ऐसा बनाती है या बनाती थीं........इस में अगर मां के बनाये पकवान की तरह यह होता तो क्या कहने......। बस, ऐसी ही बहुत ही बातें , जो इस देश के घर-घर में नित्य-प्रतिदिन होती रहती हैं।

सोचता हूं कि यह तो थी ...रोटी, दाल, सब्जी की बात......लेकिन अगर इसी प्रयोग को चाय के ऊपर भी किया जाये तो भी इस के परिणाम हैरतअंगेज़ ही निकलेंगे.....आप एक घूंट भर कर ही बतला दोगो कि आज चाय बीवी ने बनाई है या यह मां के हाथ की है.............................सोचता हूं कि ऐसा कैसे संभव है, घर की सभी महिलायें इन में एक जैसा चीज़ें डालती हैं, .....आंच भी एक जैसा , समय भी लगभग एक ही जैसा, लेकिन आखिर यह सब संभव कैसे हो पाता है कि हम झट से ताड़ लेते हैं कि आज की दाल तो पानी जैसी पतली बनी है , सो यह करिश्मा तो सुवर्षा मौसी ही कर सकती है ...................केवल फिज़िकल अपियरैंस ही क्यों, इस की महक, इस का स्वाद सब कुछ एक दम बदल सा जाता है। मेरी लिये तो भई यह ही इस दुनिया का आठवां अजूबा है.......क्या आप को यह किसी भी तरह के अजूबे से कम लगता है। लेकिन इस का जवाब देने से पहले अपने नानी –दादी के प्यार से बनाये गये और उस से दोगुने लाड से परोसे गये पकवानों की तरफ़ ध्यान कर लेना और तब अपने दिल पर हाथ रख कर इस बात का जवाब देना।

चलते चलते ज़रा इस की तरफ़ भी तो थोड़ा झांके कि आखिर ऐसा क्यों है......ऐसा इसलिये है क्योकि चाहे एक जैसे मसाले यूज़ हो रहे हैं, एक ही प्रकार का आंच यूज़ हो रहा है( बार –बार मैं इस आंच के एक ही तरह के होने की बात जो किये जा रहा हूं ...वह केवल इसलिए ही है कि इस हिंदी ब्लोगिंग कम्यूनिटि में कुछ युवा लोग ऐसे भी तो होंगे जिन्होंने कभी चुल्हे पर पकाई गई दाल खा कर उंगलीयां न चाटी हों......etc.) …….तो आखिर फिर यह अंतर कैसे पड़ जाता है ....................मेरा विचार है यह जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है ना....इसे आप प्यार कहिए, दुलार कहिए, इसे आप भावना कहिये, इसे आप श्रद्धा कहिये.......................मेरा क्या है, मैं तो लिखता हूं जाऊंगा.........सारा अंतर इस की वजह ही से होता है............हमें वह बात तो पहले ही से पता है...जाकी रही भावना जैसी.....................। बाकी इस पर ज़्यादा प्रकाश तो निशा मधुलिका जी डाल सकती हैं जो कि अपने हिदी बलोग के माध्यम से नाना प्रकार के व्यंजनों से तारूफ करवाती रहती हैं।

और हां, एक बात और भी याद आ रही है कि पहले तो इन मसालों वगैरह के नाप-तोल के लिए ये चम्मच तक भी इसेतमाल नहीं होते थे........................मेरी नानी के के चौके में भी एक लकड़ी की नमकदानी( पंजाबी में इसे लूनकी और आज कल रैसिपि बुक के एक एक लाइन पढ़ कर खाना बनाने वाले कुछ लोग इसे masala-box भी कह देते हैं---क्या है ना कम से कम नाम तो ट्रेंडी हो.....ऐसा भी ना हो कि लूनकी कह दो और किसी की भूख ही मर जाये) .....................हुया करती थी, और मुझे अच्छी तरह से याद है कि चुस्तीलेपन से, बेपरवाह लहजे से, पूरे आत्मविश्वास के साथ बस झट से कुछ चुटकियां भर भर कर वह सब्जी बनाते समय पतीले में या कडाही में उंडेल दिया करती थीं..............और लीजिए तैयार है खाना –खजाना शो-वालों को ओपन-चैलेंज देता हुया एक डिश............ओह नो, सारी, डिश नहीं भई, तब तो सीदी सादी दाल, रोटी , सब्जी ही हुया करती थी.........जिसे खाने के बाद एकदम खूब नशा हो जाया करता था।

लेकिन इन फाइव-स्टारों के खाने में मज़ा क्यों नहीं आता......................क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस खाने में टैक्नीकली सब कुछ ठीक ठाक होता है, शायद शुद्धता भी पूरी, परोसने का सलीका भी रजवाड़ो जैसे, ...........लेकिन आखिर इस में फिर कमी क्या रह जाती है...........................बस वही भावना की कमी होती है, और क्या । इस भावना से एक बात और भी याद आने लगी है कि पहले जब रसोई-घर में सब एक साथ बैठ कर खाना खाते थे तो ज़ायका अच्छा हुया करता था....या अब ड्रैसिंग-टेबुल पर सज कर जो खाया जाता है......................ओ.के......ओ.के..........मैं भी थोड़े अनकम्फर्टेबल से प्रश्न पूछने लगा हूं.....ठीक है, हमारा मन तो सच्चाई जानता है, बस इतना ही काफी है, लेकिन भई आखिर क्या करें, इस संसार में रहना भी तो है, थोड़ा दिखावा भी तो ज़रूरी है।

मेरा ख्याल है अब बस करूं........इसे चाहे तो आप मेरे द्वारा इस महान देश की हर मां, हर बहन, हर बीवी, हर भाभी , हर नानी, हर दादी ....................के मानवता की अलख जगाये रखने के लिए उस के द्वारा दिये गये अभूतपूर्व योगदानों के लिए उसे थोड़ा याद कर लेने का एक तुच्छ प्रयास ही समझें , चाहे कुछ और समझें......लेकिन मेरे लिए तो यही दुनिया का आठवां अजूबा है.........................
अफसोस, इन्हें कभी किसी समारोह में लाइफ-टाइम अचीवमैंट अवार्ड से सम्मानित नहीं किया.... वैसे पता है क्यों., क्योंकि इस देवी को किसी भी बाहरी सम्मान की न तो कभी भूख थी, न ही कभी भूख रहेगी। इस ने तो बस केवल अपने आप को इस मेहनत-मशक्तत की भट्ठी में जलाना ही सीखा है...................लेकिन वह इस में भी खुश है.................। पता नहीं, कईं बार सोचता हूं कि इस देश की नारी के ऊपर , उस के द्वारा दिये जा रहे योगदानों के ऊपर यथार्थ-पूर्ण किताबैं लिखी जानी चाहिये।

और एक तरफ हम हैं............हमारी नीचता देखिए ...कितने सहज भाव से बिना कुछ सोचे-समझे कितने बिनदास मोड में कईं बार कह देते हैं , कह चुके हैं और शायद कहते रहेंगे.....................कि यार, अपनी नानी भी थी बिल्कुल अनपढ़ लेकिन खाना बनाने में तो बस उस का कोई जवाब भी नहीं था। सोचने की बात है कि इस तरह के वाक्य बोल कर हम इन महान देवियों के योगदान को कितनी आसानी से नज़र-अंदाज़ करने का प्रयत्न कर लेते हैं। तो, फिर अब आप कब अपनी नानी-दादी की बातें हम सब को सुना रहे हैं।

पोस्ट लंबी ज़रूर है , लेकिन मुझे तो बस इतना ही लग रहा था कि मेरी स्वर्गीय नानी मेरे पास ही बैठी हुई थीं जिस से मैं बातें कर रहा था.......................अब बारी आप की है !!!!