Tuesday, August 12, 2014

बिना काटे आम खाना बीमारी मोल लेने जैसा

फिर चाहे वह लखनऊवा हो, सफ़ेदा हो या दशहरी ....किसी भी आम को बिना काटे खाने का मतलब है बीमार होना। अभी आप को इस का प्रमाण दे रहा हूं।

मुझे वैसे तो आमों की विभिन्न किस्मों का विशेष ज्ञान है नहीं लेकिन यहां लखनऊ में रहते रहते अब थोड़ा होने लगा है। वैसे तो मैं भी कईं बार लिख चुका हूं कि आम को काट कर खाना चाहिए, उस के छिलके को मुंह से लगाना भी उचित नहीं लगता ---हमें पता ही नहीं कि ये लोग कौन कौन से कैमीकल इस्तेमाल कर के, किन किन घोलों में इन्हें भिगो कर रखने के बाद पकाये जाने पर हम तक पहुंचाते हैं......तभी तो बाहर से आम बिल्कुल सही और अंदर से बिल्कुल गला सड़ा निकल आता है।

मेरी श्रीमति जी मुझे हमेशा आम को बिना काट कर खाने से मना करती रहती हैं। और मैं बहुत बार तो बात मान लेता हूं लेकिन कभी कभी बिना वजह की जल्दबाजी में आम को चूसने लगता हूं। लेकिन बहुत बार ऐसा मूड खराब होता है कि क्या कहें.....यह दशहरी, चौसा, सफ़ेदा या लखनऊवा किसी भी किस्म का हो सकता है। सभी के साथ कुछ न कुछ भयानक अनुभव होते रहते हैं।

आज भी अभी रात्रि भोज के बाद मैं लखनऊवा आम चूसने लगा.......अब उस जैसे आम को लगता है कि क्या काटो, छोटा सा तो रहता है, लेकिन जैसे ही मैंने उस की गुठली बाहर निकाली, मैं दंग रह गया......वैसे इतना दंग होने की बात तो थी नहीं, कईं बार हो चुका है, हम ही ढीठ प्राणी हैं, वह अंदर से बिल्कुल सड़ा-गला था....अजीब सी दुर्गंध आ रही थी, तुरंत उसे फैंका।

काटे हुए लखनऊवे आम का अंदरूनी रूप 
अभी मुझे इडिएट-बॉक्स के सामने बैठे पांच मिनट ही हुए थे कि श्रीमति ने यह प्लेट मेरे सामने रखते हुए कहा...विशाल के बापू, आप को कितनी बार कहा है कि आम काट के खाया करो, यह देखो। मैं तो यार यह प्लेट देख कर ही डर गया। आप के लिए भी यह तस्वीर इधर टिका रहा हूं।

मेरी इच्छा हुई कि उसे उलट पलट कर देखूं तो कि बाहर से कैसा है, तो आप भी देखिए कि बाहर से यही आम कितना साफ़-सुथरा और आकर्षक लग रहा है। ऐसे में कोई भी धोखा खा कर इसे काटने की बजाए चूसने को उठा ले।

बाहर से ठीक ठाक दिखता ऊपर वाला लखनऊवा आम 
लेकिन पता नहीं आज कर चीज़ों को क्या हो गया है, कितनी बार इस तरह के सड़न-गलन सामने आने लगी है।

अब दाल में कंकड़  आ जाए, तो उसे हम थूक भी दें, अगर ऐसे आम को चूस लिया और गुठली निकालने पर पर्दाफाश हुआ तो उस का क्या फायदा, कमबख्त उल्टी भी न हो पाए.......अंदर गया सो गया। अब राम जी भला करेंगे।

पहले भी मैं कितनी बार सुझाव दे चुका हूं कि आम की फांकें काट कर चमच से खा लेना ठीक है।

वैसे श्रीमति जो को आम इस तरह से खाना पसंद है.........अब मुझे भी लगने लगा है कि यही तरीका या फिर काट कर चम्मच से खाना ही ठीक है, कम से कम पता तो लगता है कि खा क्या रहे हैं, वरना तो पता ही नहीं चलता कि पेट में क्या चला गया। फिर अब पछताए क्या होत.......वाली बात।

आम खाने का एक साफ़-सुथरा तरीका 
दो दिन पहले ही मैं पढ़ रहा था कि किसी दूर देश में किस तरह से भुट्टे (मक्के) में किसी तरह की बीमारी को मानव जाति में किसी बीमारी से लिंक किया जा रहा है और वहां पर हड़कंप मचा हुआ है। उस जगह का ध्यान नहीं आ रहा, कभी ढूंढ कर लिंक लगाऊंगा।

यह पहली बार नहीं हुआ .....बहुत बार ऐसा हो चुका है, और बहुत से फलों के साथ ऐसा हो चुका है। मेरी श्रीमति जी मुझे हर एक फल को काट कर खाने की ही सलाह देती रहती हैं....... अमरूदों, सेबों के साथ भी ऐसे अनुभव हो चुके हैं.

मुझे बिल्कुल पके हुए पीले अमरूद बहुत पसंद हैं.......मैं उन्हें ऐसे ही बिना काटे खा जाया करता था, लेकिन मिसिज़ की आदत चाकू से काटने के बाद भी उस का गहन निरीक्षण करने के बाद ही कुछ खाती हैं या खाने को देती हैं।

ऐसी ही एक घटना पिछले साल की है .....उन्होंने मेरे सामने एक अमरूद काट कर रखा कि आप देखो इस में कितने छोटे छोटे कीड़े हैं, मैंने तुरंत कहा कि यह तो बिल्कुल साफ सुथरा है, इस में तो कीड़े हैं ही नहीं, लेकिन जब उन्होंने मुझे वह कीड़े दिखाए तो मैं स्तब्ध रह गया........मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि मैं कितनी गलती करता रहा। वैसे मैंने अमरूद में मौजूद कीड़ों के खाए जाने पर होने वाले नुकसान के बारे में नेट पर बहुत ढूंढा लेकिन मुझे कुछ खास मिला नहीं, लेिकन बात फिर भी वही है कि मक्खी देख कर तो निगली नहीं जाती।

हां, मैंने उस अमरूद में मौजूद कीड़ों के चलने -फिरने की एक वीडियो ज़रूर बना ली और अपने यू-ट्यूब चैनल पर अपलोड कर दी, आप भी देखिए.........(और गल्ती से इसे पब्लिक करना भूल गया..)

लगता है आज से एक बार फिर संकल्प करना होगा कि बिना काटे केवल आम ही नहीं, कोई भी फल खाना ही नहीं,  यह बहुत बड़ी हिमाकत है.............आप भी सावधान रहियेगा।

मछली खाने का सलीका

अगर किसी रिपोर्ट का शीर्षक यह है ... Relearning how to eat Fish...... तो मेरी तरह आप को भी यही लगेगा कि शायद यहां मछली के खाने का कुछ विशेष सलीका बताया जा रहा होगा।

मैं झट से उस लिंक पर क्लिक कर के उधर पहुंच गया इस उम्मीद के साथ कि शायद इस में लिखा हो कि मछली खाते समय इस के कांटों से कैसे अपना बचाव करना है क्योंकि बचपन में जाड़े के दिनों में चंद बार जो भी मछली खाई उस का कभी भी मज़ा इसलिए नहीं आया कि ध्यान तो हर पल उधर ही अटका रहा कि कहीं हलक में कांटा-वांटा अटक न जाए...हर बार खाते समय बंगाली बंधुओं का ध्यान कि कैसे वे लोग मछली इतनी सहजता से खा लेते हैं और वह भी चावल के साथ........और हैरानी की बात सारे कांटे मुंह के अंदर ही अलग करते हैं और इक्ट्ठे होने पर बाहर फैंक देते हैं. मेरे को यह बात हमेशा अचंभित करती है।

हां, तो मैंने उस लिंक पर जाकर देखा कि वहां तो बातें ही बहुत ज़्यादा हाई-फाई हो रही हैं, न तो मेरी समझ में कुछ आया न ही मैंने कोशिश की...क्योंकि जितने नियंत्रण की, जिस तरह से मछली की श्रेणियों की बातें और जितनी एहतियात मछली खरीदने वक्त करने को कहा गया, मुझे वह सब बेमानी सा लगा.........क्योंकि यहां पर ऐसा कुछ भी कंट्रोल तो है नहीं, जो बिक रहा है, लेना हो तो लो, वरना चलते बनो।

अगर खाने का सलीका नहीं सिखाया जा रहा इस लिंक में तो मैंने लिंक क्यों टिका दिया........केवल इस कारण से कि अपने मछली खाने वाले बंधु न्यूयार्क टाइम्स की इस रिपोर्ट से कुछ तो जान लें, शायद कुछ काम ही आ जाए। 

पहले ९० दिनों में विकसित हो जाता है बच्चों का आधा दिमाग

बच्चों का मस्तिष्क बहुत तेज़ी से विकसित होता है लेकिन इसके विकास का स्तर ऐसा है कि यह जन्म के बाद पहले ९० दिनों में व्यस्क स्तर के आधे स्तर तक विकसित हो जाता है, यह पता चला है एक बहुत ही महत्वपूर्ण रिसर्च के द्वारा।

वैज्ञानिकों को इस अध्ययन से मस्तिष्क से जुड़ी कुछ बीमारियों की जड़ तक भी पहुंचने में मदद मिलेगी।

मस्तिष्क के इतने तेज़ी से विकास का समाचार सुनने के बाद मेरा ध्यान दो-तीन मुद्दों की तरफ़ जा रहा है। 

स्तनपान...... दुनिया के सारे चिकित्सक माताओं को जन्म के तीन महीने तक केवल अपना स्तनपान करवाने की ही सलाह देते हैं। यह दूध न हो कर एक अमृत है.....जो बढ़ते हुए बच्चे के लिए एक आदर्श खुराक तो है , यह उस बच्चे को कईं तरह की बीमारियों से भी बचा कर रखता है। 

जब बच्चा पहले तीन माह तक मां के दूध पर ही निर्भर रहता है तो वह बाहर से दिये जाने वाले दूध-पानी की वजह से होने वाली विभिन्न तकलीफ़ों से बचा रहता है। यह तो आप जानते ही हैं कि पहले तीन महीने तक तो चिकित्सक बच्चे को केवल मां के दूध के अलावा कुछ भी नहीं----यहां तक कि पानी भी न देने की सलाह देते हैं। 

अब विचार करने वाली बात यह है कि जिस मां के दूध पर बच्चा पहले तीन महीने आश्रित है और जिस के दौरान पहले तीन महीनों में ही उस का मस्तिष्क आधा विकसित होने वाला है, उस मां की खुराक का भी हर तरह से ध्यान रखा जाना चाहिए....यह बहुत ही, बहुत ही ज़्यादा ज़रूरी बात है। 

चूमा-चाटी से परहेज..   और मुझे ध्यान आ रहा था कि पहले हम देखा करते थे कि बच्चे जब पैदा होते थे तो कुछ दिन तक अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार आदि उस के ज़्यादा खुले दर्शन नहीं कर पाते थे.....हां, झलक वलक तो देख लेते थे, लेकिन यह चूमने-चाटने पर लगभग एक प्रतिबंध सा ही था......कोई कुछ नहीं कहता था, लेकिन हर एक को पता था कि नवजात शिशु पर पप्पियां वप्पियां बरसा कर उसे बीमार नहीं करना है। अब लगने लगा है कि लोग इस तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं देते......

लेिकन अब यह रिसर्च ध्यान में आने के बाद लगता है हम सब को और भी सजग रहने की ज़रूरत है.....

और एक बात, डाक्टर लोग जैसे बताते हैं कि जन्म के बाद बच्चे को चिकित्सक के पास डेढ़ माह, अढ़ाई माह और साढ़े तीन माह के होने पर लेकर जाना चाहिए, यह सब भी करना नितांत आवश्यक है क्योंकि इस के दौरान शिशुरोग विशेषज्ञ उस के विकास के मील पत्थर (Development mile-stones) चैक करता है, स्तनपान के बारे में चंद बातें करता है, उस के सिर के घेरे को टेप से माप कर उस के विकास का अंदाज़ा लगाता है। 

यह पोस्ट केवल यही याद दिलाने  के लिए कि पहले तीन माह तक बच्चे का विशेष ध्यान रखा जाना क्यों इतना ज़रूरी है, क्यों उसे केवल मां ही दूध ही दिया जाना इतना लाजमी है, इस का उद्देश्य केवल उसे दस्त रोग से ही बचाना नहीं है......