Monday, February 8, 2016

निदा फ़ाज़ली साब को विनम्र श्रद्धांजलि


आज बाद दोपहर टीवी से पता चला कि निदा फ़ाज़ली साब नहीं रहे ...मन बहुत दुःखी हुआ...मुझे इन की शायरी बहुत पसंद है ...बिल्कुल जीवन से जुड़ी हुआ रोज़मर्रा की बातें जो किसी की भी समझ में आसानी से आ जाती हैं और उसे उद्वेलित भी करती हैं... अभी आठ दस दिन पहले ही तो निदा फ़ाज़ली साहब लखनऊ महोत्सव में अपनी शायरी का जलवा बिखेर कर गये हैं....मुझे हमेशा यह मलाल रहेगा कि मैं उस दिन उस प्रोग्राम में शिरकत नहीं कर पाया...मुझे इस की खबर ही नहीं था दरअसल।

मैं याद कर रहा था कि मैंने शायद १५ वर्ष पहले इन का वह शेयर कहीं पढ़ा था...मन को छू गया था...फिर किसी बुक प्रदर्शनी में इन की एक किताब हाथ लग गई थी... उसे भी पढ़ना एक सुखद अनुभव था।

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए 
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए

अब तो इंटरनेट पर यू-ट्यूब पर इन की शेयरो-शायरी के एक से बढ़ के एक वीडियो हैं ...बस, अब तो बड़ा मसला फुर्सत का है...शायद आज के इंसान को यही मयस्सर नहीं।

इन की बातें हमेशा ध्यान में रहेंगी... quite thought provoking and inspirational indeed!


दुनिया जिसे कहते हैं मिट्टी का खिलौना है
मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है


कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे औरों को समझाया है


कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बात की
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है


अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए

मुझे कुछ महीने पहले शेयरो शायरी -- inspirational- पढ़ने और लिखने का शौक चढ़ गया था....लिखना?...मतलब शायर की ही बात को अपनी नोटबुक में नोट कर लेने का शौक ..ताकि फ़ुर्सत के लम्हों में रेडियो सुनते हुए मैं उस का लुत्फ़ बार बार उठा सकूं....वह काम अभी तक तो हो नहीं पाया, बहरहाल वह शौक भी कुछ दिनों के बाद अपने आप ही ठंडा पड़ गया...अभी ध्यान आया तो स्टडी से इस नोटबुक को ढूंढा ...इस में जो निदा फाज़ली साहब के शेयर मैंने लिखे हुए हैं, यहां पेस्ट कर रहा हूं ...










अभी मैं यह लिख रहा हूं और मेरे कानों में किसी टीवी चैनल पर इन के बारे में चल रहे किसी प्रोग्राम की आवाज़ पड़ रही है ...इन्होंने ने हमें बेहतरीन हिंदी गीतों का भी तोहफ़ा दिया है.. अभी यह गीत बज रहा था इन्हीं का लिखा हुआ...याद आ रहा है हमारे कालेज के दौर का एक सुपर डुपर गीत...महीने में कईं कईं बार यह चित्रहार में दिख जाया करता था..



गीत तो इन के बहुत से हैं ..एक से एक बेहतरीन...आज दोपहर में सरफरोश का यह गीत भी बार बार बजाया जा रहा था ...फ़ाज़ली साब का ही लिखा हुआ...



ऐसे महान् फनकार कभी मरते नहीं हैं...जब तक कायनात रहेगी ये अपने अल्फ़ाज़ के माध्यम से दुनिया में जीवित रहेंगे और कईं पीढ़ियों को सही रास्ता दिखाते रहेंगे.....इन्हें विनम्र श्रद्धांजलि..... May his soul rest in peace!