Friday, November 13, 2009

कुपोषित बच्चे --- मध्यप्रदेश हो या पंजाब, की फ़र्क पैंदा ए !!

कल सुबह मैं बीबीसी की एक रिपोर्ट पढ रहा था ---यह भारत में कुपोषण का शिकार बच्चों के ऊपर थी। बेशक एक विश्वसनीय रिपोर्ट थी---यह पढ़ते हुये मुझे यही लग रहा था कि जिन बड़े लोगों को लाखों-करोड़ों रूपये रिश्वत में लेने की कभी न शांत होने वाली खुजली होती है या जो लोग इतनी ही बड़ी रकम के घपले कर के दिल के दर्द की बात कह कर बड़े बड़े अस्पतालों में भर्ती हो जाते हैं, उन्हें इस तरह की रिपोर्टें दिखानी चाहियें ---- शायद वे चुल्लू भर पानी ढूंढने लगें ---- लेकिन इन दिल के दर्द के मरीज़ों के पास दिल कहां होता है ?

यह रिपोर्ट पढ़ते हुये मेरा ध्यान अपने फुरसतिया ब्लॉग के श्री अनूप शुक्ल जी की तरफ़ जा रहा था --एक बार उन्होंने मुझे इ-मेल की थी कि उन्होंने मेरी तंबाकू वाली सचित्र पोस्टों के प्रिंट आउट अपने ऑफिस में लगा रखे हैं और इस से उन के ऑफिस में काम कर रहे बहुत से वर्करों को तंबाखू, गुटखा, पानमसाला छोड़ने की प्रेरणा मिलती है।

लेकिन इस देश से रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार को उखाड़ने के लिये क्या करना चाहिये --- मुझे लगता है कि जो लोग इस तरह से पैसा इकट्ठा करने में लगे रहते हैं उन के दफ्तरों में बड़ी बड़ी हस्तियों की तस्वीरें टांगने से तो कुछ नहीं होता ----सीधी सी बात है कि इन्हें इन तस्वीरों के बावजूद भी शर्म नहीं आती ----लेकिन ये इन तस्वीरों की आंखों ज़रूर झुका देते होंगे। अगर इस तरह की रिपोर्टों के प्रिट आउट सामन रखने में ऐसे लोगों को कोई झिझक महसूस हो तो कम से कम भ्रष्टाचार की आंधी में अंधे हो चुके ये लोग गांधीजी के उस कथन का ही ध्यान कर लिया करें ----जिस में उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें एक तैलिसमैन ( Touchstone) देता हूं --जब भी आप कोई काम करने लगो तो देश के सब से गरीब आदमी की तस्वीर अपनी आंखों के सामने रख कर यह सोचो कि मेरा यह फैसला क्या उस अभागे आदमी का कुछ भला कर के उस की तस्वीर बदल सकता है ?

ऐसे रिश्वतखोरों के दफ़्तर में बीबीसी की इस रिपोर्ट के प्रिंट आउट उन के ऑफिस के पिन-अप बोर्ड पर या फिर टेबल के कांच के नीचे रखे होने चाहिये जिस पर कागज़ रख कर वे किसी बात के लिये अपनी सहमति देते हैं ---शायद इन बच्चों की तस्वीरें देख कर उन का मन बदल जाए।

रिपोर्ट में बड़ा हृदय-विदारक दृश्य बताया गया है ---यह भी नहीं है कि यह सब हम लोग पहले ही से नहीं जानते ---लेकिन बीबीसी संवाददाता ने जिस तरह से पास से इसे कवर किया है वह इन तथ्यों को अत्यंत विश्वसनीय बना देता है।

रिपोर्ट में मध्यप्रदेश की बात की गई है --- वहां पर एक करोड़ बच्चे हैं और जिन में से 50से 60प्रतिशत भूखमरी एवं कपोषण का शिकार हैं। इस बीमारी का इलाज करवा रहे बच्चों के पास संवाददाता गया। इस तरह के बच्चों का वर्णऩ भी इस रिपोर्ट में है जो कि इतने कमज़ोर हैं कि वे खाना न खाने/चबाने की हद तक लाचार हैं।

रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है इस सब के लिये बहुत सी बातें जिम्मेदार हैं ---- पिछले कुछ सालों से सूखा पड़ा हुया है, भ्रष्टाचार है ----विभिन्न स्तरों पर है, इन बच्चों के लिये आने वाले राशन को इधर-करने पर भी इन सफेदपोश लुटेरों का दिल नहीं पसीजता----केवल इस लिये कि कुछ एफ.डी और जमा हो जाएं, कुछ शेयर और खरीद लिये हैं या फिर छोटी उम्र में ही बहुत से प्लॉट खरीद लिये जाएं ------लेकिन स्वर्ग-नरक यहीं हैं ----- ऐसे लोगों को बड़ी बड़ी बीमारियों से कोई भी बचा नहीं सकता क्योंकि अकसर इस तरह के स्मार्ट लोग इतने स्ट्रैस में जीते हैं कि सारी सारी उम्र की कमाई बड़े बड़े कार्पोरेट अस्पतालों को थमा कर इन्हें अपने पापों का प्रायश्चित तो करना ही पड़ता है।

हां, तो कल शाम मैं और मेरी मां अंबाला छावनी से जगाधरी की लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहे था --- सामने वाली सीट पर एक दादी अपने दो पोतों के साथ बैठी हुई थी --- 13-14 साल की उम्र के थे वे दोनों लाडले। 50-55 मिनट का सफ़र है---लेकिन जब हम लोग गाड़ी में चढ़े तो उन्होंने ने बिस्कुटों का एक एक पैकेट पकड़ा हुआ था ----उस के बाद प्यारी दादी ने उन्हें ब्रैड-पकोडे खरीद कर दिये ---- अभी वे खत्म ही नहीं हुये थे कि दादी अम्मा ने अपने पिटारे से मठरीयां निकाल लीं और साथ में भुजिये का पैकेट पड़ा था और तली हुई मूंगफली बेचने वाले को भी दादी ने यूं ही जाने नहीं दिया ----इस के बाद बारी आई घर में बने रोटियों की नींबू के आचार के साथ खाने की।

कमबख्त नींबू के आचार के महक इतनी बढ़िया कि मेरी जैसे पास बैठे बंदे का जो दिल मितला रहा था वह उस की रूहानी खुशबू से ही ठीक हो गया। लेकिन दादी के बार बार मिन्नतें करने के बाद भी उन लाडले पोपलू बच्चों ने रोटी नहीं खाई ---- आखिर हार कर दादी खुद ही खाने लगीं। दादी उन्हें बार बार यह कहे जा रही थी कि गाड़ी में खाने का बहुत मज़ा आता है ( जिस से आप भी सहमत होंगे) और उस बेचारी ने तो इतना भी कहा कि साथ में वह उन को चाय भी दिला देगी ---- लेकिन उन दुलारों के पेट में जगह भी तो होनी चाहिये थे -----और वैसे भी जब इतनी लाडली दादी साथ तो भला कौन पड़े घर की रोटियों के चक्कर में !!

कल ही सुबह मध्यप्रदेश के बच्चे में कुपोषण की बातें पढ़ीं थीं और शाम को गाड़ी में मैं पंजाब-हरियाणा में कुपोषित बच्चे तैयार होने की प्रक्रिया देख कर यही सोच रहा था कि काश, लोग समझ लें कि बच्चों का यह खान-पान भी उन्हें कुपोषण की तरफ़ ही धकेल रहा है। दादी जी, फूल कर कुप्पा हो रहे बबलू-पपलू की सेहत पर थोड़ा सा रहम करो।

क्या इस तरह बच्चों को खाय-पिया लग जायेगा ?

हनी, हम लोग बच्चों को मार रहे हैं !!

वैसे, इस गाने में भी ये लोग अपने हिंदोस्तान की ही बात कर रहे हैं ना ?

Wednesday, November 11, 2009

ब्रेस्ट कैंसर से बचाव सारी महिलायों का हो तो बात बने !!


मुझे न्यू-यार्क टाइम्स की साइट पर एक चर्चा पढ़ने का अवसर मिला जिस का शीर्षक था ---ब्रैस्ट कैंसर ---किस की जांच होनी चाहिये ? इस चर्चा मे कुल 117 लोगों ने भाग लिया हुया था --पहले ही पेज़ पर शूरू शुरू के दो-तीन कमैंट्स का मैं हिंदी में अनुवाद कर के यहां लिख रहा हूं ---आशा है कि यह जानकारी आप के लिये भी उपयोगी होगी। मेरा ख्याल है कि मैमोग्राफी से तो अधिकांश पाठक परिचित ही होंगे---अगर इस के बारे में कुछ जानना चाहें तो यहां क्लिक करिये।
AL -- मैं जब अपनी छाती के इलाज के लिये ( mastitis) - वक्ष-स्थल की सूजन-- के लिये अपने डाक्टर के पास न्यूयार्क सिटी में पिछले हफ्ते गई तो उस ने मुझे कहा --- जब तुम 35 साल की हो जायोगी तो स्क्रिनिंग के लिये आना। अगर सब कुछ ठीक ठाक हुआ तो फिर अगले पांच साल तक ( जब तक तुम चालीस की नहीं हो जायोगी) तुम्हें मैमोग्राफी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
मैंने पूछा कि इतनी कम उम्र में ही इस तरह के चैक-अप का क्या लाभ जब कि अभी तक ठीक से रिसर्च से यह भी पता नही चला कि इस से कुछ लाभ भी होगा कि नहीं।
तब मेरे डाक्टर ने मुझे जवाब दिया -- मैंने अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि जिन महिलायों ने स्वयं अपनी छाती में किसी गांठ को महसूस किया और फिर बाद में उस का इलाज करवाया उन में से 75 फीसदी महिलायें 10 साल तक जीवित रहीं जब कि जिन महिलायों में यह मैमोग्राफी द्वारा पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट में कुछ गड़बड़ी है ऐसे महिलायो से फिगर 95 प्रतिशत थी।
स्टीफन -- मेरी पत्नी 1998 में 43 वर्ष की थी जब मैमोग्राफी के द्वारा यह पता चला कि उ की छाती में बिल्कुल मामूली सी कैल्सीफिकेशन सी है ---डाक्टरों को पूरा विश्वास था कि यह कुछ भी नहीं है लेकिन बॉयोप्सी से पता चला कि यह स्टेज0 कैंसर था। मेरी पत्नी का आप्रेशन कर के खराब टिश्यू को निकाल दिया गया और बाद में रेडियोथैरेपी दी गई --- डाक्टरों ने अनुमान लगाया कि 95प्रतिशत चांस हैं कि यह इलाज मुकम्मल हो गया है। लेकिन एक बार फिर वे गलत साबित हुये जब यही कैंसर दोबारा से वापिस लौट आया और यह बहुत उग्र तरह का कैंसर था। इस के लिये मेरी पत्नी का वक्ष-स्थल निकालना पड़ा ( mastectomy) और बाद में पलास्टिक सर्जरी कर दी गई ---और यह 1999 की बात है। सौभाग्यवश कैंसर आसपास के एरिया में ( lymph nodes) में फैला नहीं था । तब से लेकर अब तक उस का नियमित चैकअप होता है और कैंसर वापिस लोट कर नहीं आया।
यह बात साफ़ है कि मेरी पत्नी जो रूटीन मैमोग्राम 1998 में करवाया उसी ने उस को जीवन दान दे दिया। उस समय उसे कोई लक्षण नहीं थे, न ही किसी तरह की कोई गांठ आदि ही थी ----इसलिये अगर उस समय उस ने वह मैमोग्राम न करवाया होता तो कैंसर चुपचाप अंदर ही अंदर फैलता रहता और यह अपनी जड़े इस हद तक मजबूत करलेता कि फिर इस का इलाज ही संभव न होता।
यह ठीक है कि स्क्रीनिंग के तरीके परफैक्ट नहीं हैं लेकिन फिर भी कुछ न करवाने से तो बहुत बेहतर ही हैं।
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यह बातें हैं अमीर देशों की ---लेकिन महिलायों में छाती के कैंसर के बहुत से केस तो अपने देश में होते हैं। कभी कभी अखबार में विज्ञापन दे देने कि महिलायें अपने वक्ष-स्थल की स्वयं जांच किया करें ---- कोई भी कठोरता अथवा गांठ आदि का पता चलने पर तुरंत अपनी डाक्टर से मिलें।
जब टैक्नोलॉजी उपलब्ध है तो ऐसे में क्यों कोई भी महिला इस मैमोग्राफी का टैस्ट करवाने से वंचित रहे --- देश में इस टैस्ट के बारे में घोर अज्ञानता है ----इस के बारे में कुछ होना चाहिये। हर बड़े शहर में एक-दो ऐसे एक्स-रे क्लीनिक तो होते ही हैं जहां पर मैमोग्राफी करने की सुविधा होती है। सात-आठ सौ रूपये का खर्च आता है।
मुझे लगता है कि यह सुविधा मोबाईल यूनिट्स के द्वारा गांव गांव तक पहुंचनी चाहिये ----क्योंकि हमारे देश में ऐसे कईं कल्चरल कारण भी हैं कि अनेकों महिलायें इस तरह की तकलीफ़ आदि से परेशाना होते हुये भी ढंग से न तो डाक्टर के पास ही जाती हैं और न ही विभिन्न कारणों की वजह से उन का इलाज पूरा ही हो पाता है।
और हम तो इलाज की बात ही नहीं कर रहे ---हमारा तो लक्ष्य है कि किसी भी महिला को यह तकलीफ़ हो ही क्यों ----हम क्यों न उसे बिल्कुल प्रारंभिक अवस्था में ही डायग्नोज़ कर के दुरूस्त कर दें।
बहुत बड़ी बड़ी गैर-सरकारी संस्थायें बड़े बडे़ काम करती हैं, बढ़िया से बढ़िया धार्मिक स्थल तैयार किये जाते हैं लेकिन इस तरह की मशीनें धर्मार्थ अस्पतालों में लगाई जाएं जिस में सभी जरूरतमंद महिलायों का यह टैस्ट बिल्कुल कम दाम पर या मुफ्त किया जा सके------ और अकसर यह महिलायें वो हैं जिन्हें पता भी नहीं है कि इस टैस्ट की कितनी बड़ी उपयोगिता है। क्या इस तरह की सुविधा उपलब्ध करना किसी धर्मार्थ कर्म से कम है।
इन लेखों को भी अवश्य देखिये
दस साल में कितना कुछ बदल गया है
स्तन कैंसर पर आर अनुराधा का लेख
वैसे तो देखा जाये तो सभी सरकारी अस्पतालों में भी इस तरह की सुविधायें होनी ही चाहियें ------- कम पैसे की वजह से भला क्यों कोई किसी जीवन रक्षक टैस्ट से वंचित रहे ?

धीमी गति से खाना बचाये रखता है मोटापे से ...

हम सब लोग बचपन से ही यह बात सुनते आ रहे हैं कि अगर खाते समय जल्दबाजी करोगे तो मोटे हो जाओगे। लेकिन शायद कभी लोग इस तरफ़ इतना ध्यान नहीं देते कि यह भी कोई बात है कि हमारे खाने की स्पीड अब हमारा वज़न तय करेगी !!

लेकिन वास्तविकता यह है कि यह एक वैज्ञानिक सच्चाई है। अब रिसर्चरों ने इस का कारण ढूंढ निकाला है। होता यह है कि जब हम इत्मीनान से खाना खाते हैं---निवाले छोटे छोटे लेते हैं, चम्मच में चावल आदि थोड़े थोड़े लेकर खाने का लुत्फ़ उठाते हुये खाते है तो कुछ समय बाद ही हमारे पाचन प्रणाली से दो हार्मोन रिलीज़ होते हैं --- पैप्टाइड वाय वाय ( peptide YY- PYY) एवं GLP-1 ( ग्लुकोन लाइक पैप्टाइड)।

ये हार्मोनज़ रिलीज़ होते ही हमारे मस्तिष्क में मौजूद भूख नियंत्रण तंत्र ( appetite control centre) को संदेश देते हैं कि अब और खाने की तलब नहीं है, अब हो गया। इसलिये धीमी गति से खाये गये कम खाने से ही भूख शांत हो जाती है। सीधा सा मतलब है कि अगर खाना की कम मात्रा से तृप्ति हो गई है तो शरीर में कैलरीज़ की मात्रा भी कम ही गई ------इस से आदमी मोटापे से भी बचा रहता है।

लेकिन तेज़ तेज़ अफरा-तफ़री में खाने वालों में होता यह है कि जब तक ये हार्मोन उन की पाचन-प्रणाली रिलीज़ करती है वे तब तक ही खूब सारा खाना लपेट चुके होते हैं --इसलिये उन के शरीर में बिना वजह ज़्यादा खाना पहुंच जाता है।

यह तो बात आजकल हो रही है कि अब रिसर्च से यह पता चल गया है कि खाने में उतावलापन, हड़बड़ाहट एवं जल्दबाजी दिखाना मोटापे को बुलाना है क्योंकि आज की युवा पीड़ी हर बात का प्रूफ मांगती है। और यही जैनरेशन है जो कि हर समय जल्दी में रहती है और जगह जगह से चलते फिरते जल्दबाजी में कुछ भी लेकर खाते रहते हैं -----इसलिये इन का पेट नहीं भरता।

काश, हम लोग इत्मीनान से बिना बात करते हुये दाल-रोटी को लुत्फ उठाने की कला सीख लें ---- यह बात सब से पहले तो मैं अपने आप ही से कह रहा हूं कि अकसर मैं भी इस काम को बहुत ही जल्दबाजी से निपटा लेने के चक्कर में रहता हूं।

कल रात जब मैंने सेब जैसे और नाशपती जैसे मोटापे की बात कही तो एक मित्र ने कहा कि यार, बताओ इसे केले जैसा कैसे करें ----मुझे पढ़ कर बहुत हंसी आई ---और मित्र को इस समय यही कर रहा हूं कि यह रहा पहला सबक ----हम खाना धीरे धीरे इत्मीनान से खायें ----ऐसा करने से कम खाने से ही हमारा पेट भर जायेगा।

जानवर आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है !!

इस देश में जब कभी कोई गली का कुत्ता रोता है तो आसपास के घरों वाले लोग कांप जाते हैं ----क्योंकि यहां एक मान्यता सी बन चुकी है कि जब कुत्ता को भविष्य में कोई अनिष्ट होने का अंदेशा होता है तो ही वह रोता है। इसलिये लोग घर से बाहर निकल कर उसे दूर भगा कर अपनी आफ़त को दूसरे घरों की ओर ट्रांसफर कर के इत्मीनान कर लेते हैं। अब इस में कोई सच्चाई है कि नहीं यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन इतनी बात तय है कि अमेरिका में इस तरह के कुत्ते हैं जो लोगों की जान बचाने का काम कर रहे हैं।

अमेरिका में ऐसे ऐसे कुत्ते हैं जिन्हें बॉयो-डिटैक्शन डॉग्स कहते हैं और जो अपने मालिकों की सेहत पर एक सच्चे मित्र की तरह नज़र ऱखे रहते हैं। अगर इन का स्वामी मधुमेह के रोग से पीड़ित है और अगर उसे जब भी हाइपोग्लाईसीमिक एपीसोड ( hypoglycaemic episode) होने लगता है तो ये अजीब अजीब सी हरकत करने लग जाते हैं ---पूरी रिपोर्ट आप यहां पढ़-देख सकते हैं। अपने पालतू की इस तरह की हरकतें एक खतरे की घंटी जैसा काम करती हैं और मालिक अपनी गिरते शूगर स्तर को लाइन पर लाने के लिये तुरंत उचित उपाय कर लेता है।( हाइपोग्लाईसीमिक ऐपीसोड में क्या होता है कि किसी मधुमेह के रोगी की ब्लड-शूगर काफ़ी नीचे गिर जाने से उसे चक्कर जैसा आने लगता है ----और अगर तुरंत कुछ खा-पी न लिया जाये तो वह गिर भी सकता है !)
इसी तरह से ही अपने स्वामी में कैंसर की शिनाख्त करने में भी कुछ कुत्ते माहिर होते हैं। है कि नहीं हैरतअंगेज़ ? ऐसे ही तो नहीं इस जानवर को आदमी की सच्चा दोस्त कहा जाता !!
मेरा नाम जोकर के उस गाने का ध्यान आ रहा है ----जानवर आदमी से ज़्यादा वफ़ादार --- क्योंकि आदमी जिस थाली में खाता है उसी में छेक करने से रती भर भी गुरेज़ नहीं करता।

Tuesday, November 10, 2009

सैक्स पॉवर बढ़ाने के नाम पर हो रहा गोरखधंधा

मुझे इतना तो शत-प्रतिशत विश्वास है ही कि भारत में तो यह सैक्स पॉवर बढ़ाने वाले जुगाड़ों का गोरखधंधा पूरे शिखर पर है। यहां पर इस तरह की दवाईयों, टॉनिकों, बादशाही कोर्सों के द्वारा पब्लिक को जितना ज़्यादा से ज़्यादा उल्लू बनाया जा सकता है उस से भी ज़्यादा बनाया जा रहा है ।

लेकिन जब मैं कभी देखता हूं कि अमेरिका जैसे देश में भी यह सब चल रहा है तो मुझे इस बात की चिंता और सताती है कि अगर उस जगह पर जिस जगह पर दवाईयों की टैस्टिंग करना करवाना इतनी आम सी बात है, लोग सजग हैं, पढ़े-लिखें हैं ---अगर वहां पर सैक्स पावर बढ़ाने वाले फूड-सप्लीमैंट्स में वियाग्रा जैसी दवाई मिली पाई जाती हैं और इसके बारे में लेबल पर कुछ नहीं लिखा रहता तो फिर अपने देश में क्या क्या चल रहा होगा, इस का ध्यान आते ही मन कांप जाता है।

अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट दिखी जिस में उन्होंने लोगों को चेतावनी दी है कि सैक्स पॉवर बढ़ाने के लिये "स्टिफ-नाईट्स" नाम के एक फूड-सप्लीमैंट में वियाग्रा जैसी दवाई पाई गई है। अब सब से बड़ी मुसीबत यही है कि लोग इस तरह के प्रोडक्ट्स को बस योन-पावर को बढ़ाने के लिये खाई जाने वाली आम टॉनिक की गोलियां या कैप्सूल समझ कर खा तो लेते हैं लेकिन इन में कुछ अघोषित दवाईयों की मिलावट होने के कारण ये कईं बार मरीज़ों का रक्त-चाप खतरनाक स्तर तक गिरा देती हैं।

जिस तथाकथित सैक्स-एनहांसर की बात हो रही है इस के इंटरनेट द्वारा भी बेचे जानी की बात कही गई है --- और यह छः,बारह और तीस कैप्सूलों की बोतल में भी आती है और बेहद आकर्षक ब्लिस्टर पैकिंग में भी आती हैं।

इतना सब पढ़ने के बाद क्या आप को अभी भी लगता है कि हमारे यहां जो सो-काल्ड सैक्स पावर बढ़ाने के नाम पर सप्लीमैंट्स धड़ल्ले से बिक रहे हैं क्या उन में ऐसी कुछ अऩाप-शनाप मिलावट न होती होगी ? ----पता नहीं, मुझे तो हमेशा से ही लगता है कि यह सब गोरखधंधा है, पब्लिक को लूटने का एक ज़रिया है , उन की भावनाओं से खिलवाड़ है ----और इस देश में हर दूसरा बंदा सैक्स कंसल्टैंट ( कम से कम डींगे हांकने के हिसाब से !!!!) होते हुये भी लोग सैक्स के बारे में खुल कर बात नहीं करते, किसी क्वालीफाईड सैक्स-विशेषज्ञ को मिलते नहीं ----इसलिये जिन्हें इस तरह की दवाईयों से तरह तरह के साईड-इफैक्ट्स हो भी जाते हैं वे भी मुंह से एक शब्द नहीं कहते ------क्योंकि उन्हें लगता है कि बिना वजह उन का मज़ाक उड़ेगा और इसी वजह से इस तरह की जुगाड़ बेचने वाली कंपनियां फलती-फूलती जा रही हैं।

हां, तो मैं पोस्ट लिख कर इस से संबंधित कुछ वीडियो यू-टयूब पर ढूंढने लगा तो मुझे दिख गया कि किस तरह से देश के फुटपाथों पर लोगों की योन-शिक्षा की स्पैशल क्लास ली जा रही है।

मोटापा --सेब जैसा या नाशपती जैसा ?


Photo courtesy : Medlineplus

शायद आपने पहले ना सुना हो कि मोटापे की दो श्रेणीयां होती हैं -- सेब जैसा तथा नाशपती जैसा।

जो मोटापा कमर से ऊपरी हिस्से में होता है उसे Apple-shaped obesity कहते हैं और जो मोटापा कमर से नीचे वाले हिस्से में जमा होता है उसे नाशपती जैसा मोटापा ( pear-shaped obesity) कहा जाता है। यह तस्वीर देखने पर आप को अच्छी तरह से क्लियर हो जायेगा।

सेब के आकार वाला मोटापा नाशपती के आकार वाले मोटापे से ज़्यादा खतरनाक होता है क्योंकि नाशपती आकार मोटापे में जांघों एवं नितंबों पर जमा फैट कोशिकाओं की विशेषतायें सेब-आकार मोटापे में मौजूद फैट-कोशिकाओं से भिन्न होती हैं।

एक और बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है कि जो लोग धूम्रपान करते हैं उन में मोटापा अकसर सेब आकार जैसा और दूसरे लोगों में यह नाशपती के आकार जैसा होता है।

मोटापा से होता है मधुमेह का रिस्क 90 गुणा

आज सुबह मैं CNN की साईट पर डायबिटीज़ से संबंधित लेख पढ़ रहा था। कुछ बातें यहां दोहराने योग्य हैं ---हम में से बहुत से लोग पहले ही से इन्हें जानते हैं लेकिन फिर भी पुनरावृत्ति ज़रूरी है।

यह तो हम सब जानते ही हैं कि भारत में मधुमेह की समस्या इतनी विकराल हो गई है और दिन प्रतिदिन यह ऐसी विकट हो रही है कि इंडिया पर सारे विश्व में डायबिटीज़ की राजधानी होने का ठप्पा लगाया जा रहा है।

विकसित देशों में भी यह बहुत बड़ी समस्या है। अमेरिका में ही 240 लाख लोगों को डायबिटीज़ है, और 57 लाख लोगों की अवस्था प्री-डायबिटीज़ वाली है। अब यह प्री-डायबिटीज़ का क्या चक्कर है ? जब हम लोग खाली पेट ब्लड-शुगर का टैस्ट करवाते हैं तो 99mg% तक तो नार्मल है, 100-125 mg% को प्री-डायबिटिक कहा जाता है जिन में अभी बीमारी तो नहीं है लेकिन उन्हें अपनी जीवनशैली एवं खानपान में पूरी एहतियात की ज़रूरत है और जिन लोगों में फास्टिंग ब्लड-शुगर की मात्रा 126 एवं उस से ऊपर आती है उन को डायबिटिक लेबल किया जाता है।

दो बातें टाइप वन एंड टू डायबिटीज़ के बारे में करते हैं --- अधिकांश टाइप 1 डायबिटीज़ के केसों का अठराह वर्ष ( under 18) से कम उम्र में पता चल जाता है। इसे टाइप 1 इसलिये कहा जाता है क्योंकि यह एक ऑटोइम्यून डिसीज़ है जिस में पैनक्रिया ग्रंथी में मौजूद सैल( कोशिकायें) जो इंसुलिन बनाते हैं नष्ट हो जाते हैं जिस की वजह से इंसुलिन नहीं बन पाती और मधुमेह की बीमारी हो जाती है।

Type I Diabetes cases are mostly detected in under 18 years of age though it can strike at any age. It is an autoimmune disease in which the insulin-producing cells of the pancrease get destroryed which lead to diabetes.

और जहां तक टाइप 2 डायबिटीज़ का सवाल है यह पहले तो बड़ी उ्म्र के लोगों को ही अपना शिकार बनाया करती थी लेकिन अब मोटापा इतना आम सी बात होने के कारण यह बीमारी छोटी उम्र में भी ---यहां तक कि बच्चों को भी ----धर-दबोचने लगी है। टाइप2 डायबिटीज़ में यह होता है कि मरीज के शरीर में इंसुलिन के प्रति इन-सैंसिटिविटी उत्पन्न हो जाती है जिस की वजह से शरीर में ग्लुकोज़ की मात्रा बढ़ी रहती है।

अकसर लोगों में यह धारणा है कि जिस किसी भी परिवार में मधुमेह है बस फिर तो यह अगली पीड़ियों में भी आगे ही चलता है। लेकिन ऐसा नहीं है ---- CNN जैसी विश्वसनीय साइट पर यह जानकारी उपलब्ध है कि रिस्क तो बढ़ता है लेकिन यह धारणा ठीक नहीं है। जिस परिवार में टाइप 1 डायबिटीज़ है, उस में आगे बच्चों को यह बीमारी होने का रिस्क पांच प्रतिशत ज़्यादा होता है और टाइप 2 डायबिटीज़ में यह रिस्क तीस प्रतिशत होता है. इसलिये अगर परिवार में डायबिटीज़ का कोई मरीज़ है तो खाने पीने में एवं शारीरिक परिश्रम करने में तो और भी नियमितता की ज़रूरत है ताकि इस 30% को बस एक आंकड़ा ही बने रहने दिया जाए।

ऐसा भी नहीं कि स्लिम-ट्रिम लोग डायबिटीज़ के शिकार नहीं होते, दुनिया भर के बीस प्रतिशत डायबिटीज़ के रोगी दुबले पतले ही हैं।

हमारे पेट का मोटापा ( abdominal obesity) डायबिटीज़ के लिये सब से खतरनाक है-- क्योंकि इस मोटापे में हमारे शरीर के अंदरूनी अंगों के आसपास जो फैट जमा हो जाता है बस वही हमें ले डूबता है ----लेकिन हमारे देश में तो अकसर जब तक पेट बाहर निकल कर लटकने न जाये तब तक तो उसे खाता-पीता मानते ही नहीं हैं। मोटापा होने से डायबिटीज़ होने का रिस्क 90 गुणा बढ़ जाता है।

पंजाब की तो मैं गारंटी लेता हूं कि वहां पर तो लोगों की सेहत की यही परिभाषा है कि बंदा अच्छा तगड़ा होना चाहिये। शादी से पहले दुबले पतले लोगों को यह कह कह कर सांत्वना दी जाती है कि कोई गल नहीं, विवाह के बाद सब ठीक हो जायेगा। और अकसर होता भी यही है ----सुबह से परांठे, पूरी-छोले, दाल-मक्खनी, मलाई दार लस्सी, ज़्यादा मीठे वाली चाय--मलाई मार के, चिकन-शिकन, बटन चिकन, मच्छी फ्राई,....अब क्या क्या लिखूं ----बस समझिये हर तरफ़ दूध( पता नहीं असली या सिंथैटिक), देसी घी, फ्राई चीज़ों की भरमार और सारा दिन सब जगह इन्हीं के खाने पीने की बातें -------और मेहनत का काम न के बराबर ---ऐसे में भला कैसे फूल के कुप्पा हुये बिना रह सकता है ----लेकिन परिवार वाले , सगे -संबंधी गबरू की सेहत देख देख कर फूले नहीं समाते कि हुन बनी गल----एह होई न गल -----ऐन्नू कहंदे ने सेहत ---- लेकिन यह वाली सेहत साथ में ढ़ेरों बीमारियां भी तो ले आती है।

वैसे दूसरे की बातें क्या करें ----पहले हम लोग अपनी तरफ़ ही क्यों न देखें ----तो फिर आज ही से कम से कम फीकी चाय पीनी शुरू करें , मैं तो कर रहा हूं , आपने क्या सोचा है ?

Monday, November 9, 2009

सूचना के अधिकार कानून के लिये फीस

मैंने सूचना के अधिकार के लिये कुछ समय पहले एक आवेदन किया था ---जिस का जवाब मुझे मिला कि आप पहले सात हज़ार नौ सौ रूपये जमा करवायें क्योंकि इस तरह की सूचना जुटाने के लिये विभाग का इतना खर्च आयेगा ----कुछ वर्कर इतने दिन के लिये यही काम पर लगे रहेंगे, इसलिये उन की उतने दिनों की तनख्वाह मुझे भी भरनी होगी। खैर, मैंने इस की अपील भी की लेकिन फिर वही जवाब आ गया ।
हां, तो आज सुबह आज की पंजाब केसरी अखबार पर जब नज़र पड़ी तो इस के पृष्ट पांच पर यह खबर दिखी जिसे आप से शेयर करना चाह रहा हूं ------लीजिये, पढ़िये ...
सूचना देने के लिये केवल निर्दिष्ट राशि ही वसूली जाएगी : सी आई सी
नई दिल्ली 8 नवंबर -- एक बहुप्रतीक्षित फैसले के तहत केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा है कि सूचना मुहैया कराने के लिये आवेदक से सूचना का अधिकार कानून में निर्दिष्ट शुल्क के अलावा कोई राशि की मांग नहीं की जा सकती। सूचना का अधिकार कानून के तहत आवेदन करने वाले लोगों के लिये यह फैसला राहत लेकर आया है क्योंकि जब बड़ी मात्रा में सूचना मांगी जाती है तो दिल्ली पुलिस सहित कई सरकारी एजेंसियां अतिरिक्त शुल्क के तहत लाखों रूपये की राशि का मांग करती हैं. ये सरकारी एजैंसियां इसका हवाला देती हैं सूचना दिखाने के लिये काफी मानव संसाधनों के इस्तेमाल की जरूरत पड़ेगी या उन्हें परिवर्तित करना होगा। इसके लिये आवेदक को प्रशासन की गणना के मुताबिक कार्य दिवसों के आधार पर भुगतान करना होगा।
आप का इस खबर के बारे में क्या ख्याल है ?

सेहत का फंडा ---भाग 2.......इन बच्चों का क्या होगा ?

निर्धन से निर्धन और रईस से रईस के बच्चों को मिल चुका हूं ---इन्हें बिस्कुट के पैकेट, चिप्स, और तरह तरह के जंक फूड के प्यार ने एकता की माला में पिरो कर रखा हुआ है।
यह भी मैंने देखा है कि कारण कोई भी हो मां बाप इस के लिये ज़्यादा टैंशन लेते नहीं हैं और मूर्खता की हद तब दिखती है जब बड़ी शेखी बघेरते हुये हम से ही यही कहते हैं कि इसे तो बस बिस्कुट ही पसंद हैं, जब भी खाता है पूरा पैकेट तुरंत खत्म कर देता है। यह क्या है ? ---- शर्तिया तौर पर मोटापा, ब्लड-प्रैशर, मधुमेह जैसी बीमारियों को आमंत्रण है और क्या है ?
एक बात और बहुत नोटिस की है कि अकसर लोग बिस्कुटों को जंक-फूड में शामिल नहीं करते, लेकिन ऐसी बात नहीं है --- दिन में एक दो बिस्कुट खाने की बात और है और पूरा पूरा पैकेट लपेट लेना कहां की अकलमंदी है ? अब अगर बच्चे पूरा पूरा पैकेट खाने लगेंगे तो खाने के लिये कहां से जगह बचेगी और हो भी यही सब कुछ ही रहा है ।
मुझे बड़ी खीझ होती है कि जब इन्हीं बच्चों के अभिभावक यही कहते हैं कि हमें तो यही लगता है कि बच्चा है ,इस के खाने के यही दिन हैं ---क्या फर्क पड़ता है। लेकिन बहुत फर्क पड़ता है क्योंकि खाने पीने की सारी अच्छी बुरी आदतों की शुरूआत ही इसी उम्र में ही होती हैं।
एक समस्या और भी है कि हमारे यहां दुकानदारों ने एक अच्छा ब्रॉंड तो शायद ही रखा हो लेकिन चालू किस्म के लोकल ब्रांड के बिस्कुटों के दर्जनों ब्रांड इन के यहां मिल जायेंगे।
बिस्कुटों की इतनी खिंचाई होते देख आप को लगता होगा कि क्या डाक्टर बिस्कुट नहीं खाता होगा ? --- ऐसा नहीं है कि मैं नहीं खाता, खूब खाये हैं, पहले इतना कहां लोग सोचा करते थे --खास कर बेकरी वाले बिस्कुट मुझे बहुत ही पसंद हैं। लेकिन वैसे 40 की उम्र पार करने पर बहुत कुछ सोचना ही पड़ता है ----मैं बेकरी वाले बिस्कुट नहीं खाता ---क्योंकि तरह तरह की मिलावटों के बारे में पढ़ कर मन इतना भर चुका है कि जब इन्हें खाने की तलब लगती है तो बेकरियों द्वारा इन के बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले घी के बारे में सोच लेता हूं तो अपने आप तलब शांत हो जाती है ।
कुछ लोग यह भी कह देते हैं कि उस में क्या है, हम लोग अपने सामने अपने मैटीरियल से बेकरी से बिस्कुट तैयार करवा लेते हैं ----शायद यह अच्छा विकल्प है लेकिन फिर भी 35-40 से ऊपर वाली उम्र के लोग इस तरह के पदार्थ जो घी, चीनी भरे होते हैं उऩ से थोड़ा सा बच कर रहा जाये तो ठीक ही लगता है, आप क्या सोच रहे हैं ?
अब तो मैं केवल ब्रिटॉनिया मैरी जैसे एक-दो बिस्कुट ही लेता हूं और मेरे बहुत से डाक्टर मित्र भी यही लेते हैं --- यह कोई पब्लिसिटी शटंट नहीं है --- यह बिस्कुट वैसे ही बहुत हल्का फुल्का है और ब्रिटॉनिया की क्वालिटी के बारे में तो आप जानते ही हैं !!
मुझे इस बात की भी बहुत फिक्र होती है कि जब लोग यह बताते हैं कि उन के बच्चे दालों, सब्जियों से दूर भागते हैं ---- यह अपने आप में एक बहुत ही ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात है --- यह एक ऐसी बात है कि जिस के लिये इन बच्चों के मां-बाप को शोक मनाना चाहिये क्योंकि ऐसे अधिकांश केसों में ऐसा होता है कि इस तरह के बच्चे बड़े होकर भी फिर पिज़्जा, बर्गर, हॉट-डॉग, हाका-नूडल्स पर ही पलते हैं और तरह तरह की शारीरिक व्याधियों के शिकार हुये रहते हैं।
हमारे सारे स्वाद बचपन में ही डिवेल्प होते हैं ----इसलिये यह बहुत ही ज़रूरी है कि हम बच्चों में सब दालों सब्जियों को स्वाद डिवेल्प करवायें। मुझे याद है कि मैं बचपन में केवल करेला खाने में थोड़ा नाटक किया करता था ----इतना बड़ा होने के बाद भी मुझे करेला कभी भी अच्छा नहीं लगा -----कभी कभी एक-दो खा तो लेता हूं लेकिन बस मजबूरी में।
बच्चे स्कूल की कैंटीन से जंक-फूड लेकर खाते रहते हैं ----कुछ अच्छे स्कूलों में तो अब कैंटीनें होती ही नहीं हैं लेकिन बच्चों को घर से भी दिया जाने वाला खाना सेहतमंद होना चाहिये ----लंच-बाक्स में बिस्कुट, चिप्स, भुजिये का क्या काम !!
सोच रहा हूं कि सेहत के फंडे में जितनी बातें पाठकों से शेयर करूंगा वे सभी मैं अपने आप से भी करूंगा, दोहराऊंगा और इंटरोस्पैक्शन करने का अवसर भी मिलता रहेगा कि कहीं दीपक के तले ही अंधेरा तो नहीं है।

सेहत का फंडा ---भाग 1.

मैं इस विषय पर बहुत सोचता हूं कि आखिर अच्छी सेहत का फंडा है क्या। सोच विचार करने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि सेहत के लिये कुछ बातें करने की ज़रूरत है और कुछ न करने की।
न करने वाली बातों में सब से अहम् है कि तंबाकू,गुटखे के किसी भी तरह के उपयोग से दूर रहा जाये। शराब -चाहे कितनी भी महंगी क्यों न हो और चाहे कितने ही डाक्टर कहें कि थोड़ी पीने से कुछ नहीं होता --- से पूरी तरह से दूर रहा जाए।
यह लिखते लिखते ध्यान आ रहा है कि सेहत की फंडे की जब बात करते हैं तो यह भी नहीं है कि हम लोग इन बातों से पहले से वाकिफ़ नहीं हैं -- अधिकांश बातें हम लोग पहले से जानते हैं लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि हमें इन बातों को आपस में बार बार दोहराने की ज़रूरत होती है।
कुछ दिनों पहले मैं एक इंटरव्यू लेने गया हुआ था ---वहां नॉन-मैडीकल मैंबर भी थे लेकिन वे सब बिना शक्कर वाली चाय पी रहे थे । कुछ समय बाद मेरे एक सीनियर से बात हो रही थी -बता रहे थे कि उन्होंने कभी भी दूध में चीनी नहीं डाली। शक्कर आदि की ढ़ेरों बुराईयां गिना रहे थे और मेरा बढ़ता वजन देख कर मुझे भी कह रहे थे कि तुम्हें भी मीठे पर कंट्रोल करना चाहिये।
अगर हम लोग इस तरह की छोटी छोटी बातों पर बार बार बात करते हैं तो पता नहीं किस समय किस के मन में कौन सी बात बैठ जाती है।
इसी तरह नमक के इस्तेमाल में भी बहुत ही ज़्यादा एहतियात रखने की ज़रूरत है। वरना कौन सा रोग किसी की कब धर दबोचे यह सब बिना किसी दस्तक के ही हो जाता है।
कुछ भी हो सेहत के लिये परहेज़ तो करना ही होगा, कुछ भी मुंह में डालने से पहले पूरी तरह से सचेत रहते हुये यह निर्णय करना होगा कि इस खाध्य पदार्थ में क्या क्या मिला हुआ है और इन में से किन किन इंग्रिडिऐंट्स के मिलावटी होने की पूरी पूरी आशंका है, क्या यह मेरी सेहत के लिये ज़रूरी है और क्या मैं इस के बिना रह सकता हूं ?
मुझे लगता है कि अगर हम लोग कुछ भी खाने से पहले यह सोच लें तो काफ़ी हद तक हम बहुत सा कचरा खाने से बच सकते हैं ----वैसे मैंने भी यह अप्रोच रखी हूई है और इसी कारण मैं बाज़ार की बहुत सी वस्तुओं से बचने की कोशिश कर लेता हूं।

मरीज़ों की प्राइवेसी की परवाह कैसी ?

आज कल मुंह के कैंसर से बचाव के लिये चले एक जागरूकता अभियान के अंतर्गत एक विज्ञापन फिल्म विभिन्न चैनलों पर दिख रही है ---आशा है आपने भी देखी होगी।
लेकिन इस में आखिर ऐसा क्या है जो मुझे ठीक नहीं लग रहा ? --इस का कारण यह है कि इस में मरीज़ों के चेहरों को दिखाया गया है। इस में मरीज़ों की प्राइवेसी की सम्मान नहीं किया गया।
वैसे यह मुंह के कैंसर से बचाव की जागरूकता अभियान के लिये बनाया गया एक बहुत प्रभावपूर्ण विज्ञापन है लेकिन यह मरीज़ों के चेहरे दिखाने वाली बात अजीब सी लगती है।
मुझे ऐसा लगता है कि जिन मरीज़ों के चेहरे इस फिल्म में दिखाये जाते हैं उन के प्रति कभी भी अगर समाज के द्वारा किसी तरह का भी भेदभाव किया जाए तो यह बहुत गड़बड़ हो जायेगी। वैसे तो एक शिष्ट समाज में जब हम लोग एक मरीज़ की बात किसी के साथ किसी दूसरे के साथ शेयर नहीं करते तो ऐसे में कैसे हम मुंह के कैंसर जैसे रोग से लाचार रोगियों की तस्वीरें इतने व्यापक स्तर पर दिखा सकते हैं।
मानता हूं कि इस तरह की तस्वीरें दिखाने से लोगों के मन में तंबाकू आदि के बारे में डर पैदा होगा। लेकिन हमें बीमार आदमियों एवं उन के परिवारजनों के बारे में भी सोचना चाहिये कि नही ?
अगर तस्वीरें दिखानी ही हैं तो हम क्यों नहीं उन की आंखों पर कुछ इस तरह के डाट्स आदि दिखाते जिन से उन की पहचान को गुप्त रखा जा सके। यह बहुत ज़रूरी है।
कईं बार मैं सोचता हूं कि शायद समाज में आम आदमी की प्राइवेसी का ध्यान रखा ही नहीं जाता। मेरे विचार में यह फिल्म बनाने वालों में संवेदनशीलता की घोर कमी की तरफ़ इशारा करती है। इस तरह के विज्ञापन को तुरंत दुरूस्त किये जाने की ज़रूरत है।
यह तो एक विज्ञापन फिल्म की बात है --अकसर हमारी मैडीकल कि किताबों में भी मरीज़ों की फोटो की आंखों पर काली पट्टी सी लगाई जाती है ताकि उन की पहचान न हो सके। मुंह के कैसर से संबंधित मेरी पोस्टों में भी मैंने मरीज़ों की तस्वीरें इस तरह से ली हैं कि उन फोटो के द्वारा उन की पहचान संभव न हो।
देश में कुछ बहुत बड़े प्रतिष्ठित लोग भी मुंह के कैंसर जैसी बीमारी से जूझ रहे हैं तो ऐसे में इस तरह की विज्ञापन फिल्म में इन हस्तियों का भी कुछ संदेश जनता तक पहुंचा दिया जाता तो शायद ठीक होता। लेकिन शायद इन हाई-फाई लोगों की प्राईवेसी आम आदमी की प्राइवेसी से ज़्यादा मायने रखती है ?
अब अगह कोई यह दलील दे कि उस विज्ञापन फिल्म में जिन मरीज़ों के चेहरों को दिखाया गया है उन से समुचित कंसैंट (सहमति) ली गई है तो भी यह कैसी कंसैंट है, मेरे विचार में तो इस तरह की कंसैंट के बावजूद भी उन का चेहरा इस तरह से ना दिखाया जाए कि कोई भी उन की शिनाख्त कर सके।