Friday, November 7, 2008

क्या हाई-ब्लड-प्रैशर, शूगर एवं हार्ट-पेशेन्ट्स का दांत उखड़वाने का डर मुनासिब है ?--भाग दो.

इस से पहली कड़ी में बातें हुईं थी हाई-ब्लड एवं शूगर के मरीज़ों के दांत उखड़वाने के डर के बारे में। आज देखते हैं कि हार्ट पेशेन्ट्स क्यों डरते हैं दांत उखड़वाने से ---क्या इस में कोई जोखिम इन्वाल्व है ?

सब से पहले तो यह बताना चाह रहा हूं कि हार्ट के पेशेन्ट्स अलग अलग तरह के होते हैं अर्थात् हार्ट की तकलीफ़ों की अलग अलग किस्में होती हैं और इन में डैंटिस्ट अलग अलग तरह की सावधानियां बरतते हैं।

सब से पहले तो हार्ट-पेशेन्ट्स को दिये जाने वाले टीके की बात करते हैं--- दांत उखड़वाने से पहले दिल के मरीज़ों को जो लिग्नोकेन( lignocaine) लोकल-अनसथैटिक का टीका दिया जाता है ---सुन्न करने के लिये—वह प्लेन टीका होता है –जिस में एडरिनेलीन( Adrenaline) नहीं होती। एडरिनेलीन रक्त की नाड़ियों में संकुचन पैदा करती है, और मरीज़ में पैल्पीटेशन( palpitations) पैदा कर सकती है इसलिये हार्ट पेशेन्ट्स में ऐसे इंजैक्शन को इस्तेमाल किया जाता है जिस में यह नहीं होती।

दूसरी बात यह है कि कुछ हार्ट पेशेन्ट्स रक्त को पतले रखने के लिये एस्पिरिन की टेबलेट लगातार ले रहे होते हैं--- ये सब बातें या तो मरीज़ हमें स्वयं ही बतला देते हैं वरना हमें खुद पूछनी होती हैं। अब ऐसे मरीज़ों को यह बहुत डर लगता है कि खून पतले करने वाली एस्पिरिन की वजह से दांत उखड़वाने के बाद तो उन का रक्त तो जमेगा ही नहीं।

अकसर ये लोग एस्पिरिन की आधी गोली ही ले रहे होते हैं ----तो मरीज़ का ब्लीडिंग टाइम एवं क्लाटिंग टाइम ( bleeding time and clotting time) --- अर्थात् मरीज़ का रक्त एक नीडल से प्रिक करने के बाद कितने समय में बंद होता है और फिर कितने समय में उस जगह पर ब्लड-क्लाट ( blood-clot) बन जाता है ---इस के लिये एक बहुत ही साधारण सा ब्लड-टैस्ट है जिसे करवा लिया जाता है। और मेरा अनुभव यह रहा है कि ऐसे मरीज़ों में लगभग हमेशा( पता नहीं मैंने लगभग क्यों लिखा है, क्योंकि मैंने तो हमेशा ही इसे लिमट्स में ही देखा है) ....ही इसे लिमट्स में ही पाया है।

वैसे कुछ इस तरह की सिफारिशें भी हैं कि सर्जरी से पहले मरीज़ की एस्पिरिन कुछ दो-चार दिनों के लिये बंद कर दी जाये। लेकिन वह मेजर-सर्जरी की बात होगी –मैंने दांत उखाड़ने के लिये कभी भी इस की ज़रूरत नहीं समझी क्योंकि एस्पिरिन लेने वाले मरीज़ों में भी मैंने दांत उखड़वाने के बाद रक्त बंद होने या उस का क्लॉट बनने में कोई विघ्न पड़ता देखा नहीं है। जो मरीज़ मुझे स्वयं ही इस के बारे में पूछता है कि क्या उसे एस्पिरिन दो-तीन दिन के बंद करनी होगी या वह कहता है कि उस के फिजिशियन ने उसे ऐसा करने को कहा है तो मैं उसे ज़रूर इसे कुछ दिनों के लिये बंद करने की सलाह दे देता हूं----ताकि वह संतुष्ट रहे ---लेकिन जहां तक मैंने देखा है ऐसे मरीज़ों में भी कोई तकलीफ़ होती मुझे तो दिखी नहीं।

कुछ क्ल्यूज़ (clues) हम लोग एस्पिरिन लेने वाले मरीज़ों से ऐसे भी ले लेते हैं कि अगर कहीं कोई कट-वट लग जाता है या शेव करते वक्त मुंह पर कट लग जाता है तो क्या रक्त नार्मल तरीके से आसानी से बंद हो जाता है ---इस का जवाब हमेशा ही हां में मिलता है।

लेकिन एक हार्ट प्राब्लम होती है जिस में मरीज़ रक्त पतला रखने के लिये ओरल-एंटीकोएगुलेंट्स (oral anticoagulants) ले रहा होता है जैसे कि टेबलेट एटिट्रोम (Tablet Acitrom) --- जो मरीज़ ये टेबलेट ले रहे होते हैं उन में बहुत ही एहतियात की ज़रूरत होती है—वैसे तो जो मरीज़ ये टेबलेट ले रहे होते हैं वे स्वयं ही बता देते हैं कि रक्त पतला करने के लिये वे इसे अपने फिजिशियन की सलाह से ले रहे हैं लेकिन कुछ केसों में मैंने देखा है कि कईं बार कुछ कम पढ़े-लिखे लोगों को इस का पता ही नहीं होता और वे किसी डैंटिस्ट के पास पहुंच जाते हैं। और डैंटिस्ट को इस दवाई का पता केवल तब ही चल सकता है अगर वह मरीज़ की फिजिशियन वाली प्रैसक्रिपशन देखता है। इसलिये हार्ट पेशेन्ट्स के साथ थोड़ी पेशेन्स की ज़रूरत रहती है---जल्दबाजी की गुंजाइश नहीं होती। और कुछ नहीं तो अगर मरीज़ को हम कह दें कि जो दवाईयां आप अपनी हार्ट-प्राब्लम के लिये ले रहे हैं उन्हें एक बार मुझे दिखा दें। ऐसा करने से भी पता चल जाता है कि मरीज़ का क्या क्या चल रहा है।

हां, तो अगर हार्ट पेशेन्ट टेबलेट एसीट्रोम ले रहा है और दांत उखड़वाने के लिये हमारे पास आया है तो उस का एक विशेष तरह का टैस्ट करवाया जाता है ---प्रोथ्रोंबिन टैस्ट – prothrombin time एवं आईएनआर ( INR – International normalized ratio) – और इस टैस्ट के लिये अथवा टैस्ट के बाद मरीज़ को उस के फिजिशियन अथवा कार्डियोलॉजिस्ट के पास रेफर करना ही होता है ---उस की स्वीकृति के लिये कि क्या इस मरीज़ को डैंटल एक्सट्रेक्शन के लिये लिया जा सकता है---और फिर आगे सारा काम उस की सलाह से ही चलता है।

ओरल –एंटीकोएग्यूलैंट्स ले रहे मरीज़ों का यह टैस्ट तो वैसे भी फिजिशियन समय समय पर करवाते रहते हैं –यह देखने के लिये सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है ---उन्हें यह भी आगाह किया होता है कि अगर आप के पेशाब में आप को रक्त दिखे या मसूड़ों से अपने आप ही रक्त बहने लगे तो तुरंत फिजिशियन से मिलें----वह फिर इन दवाईयों की डोज़ को एडजस्ट करता है। वैसे तो टेबलेट एसीट्रोम जैसी दवाईयां ले रहे मरीज़ों के लिये सलाह यही होती है कि उन्हें अपना दांत किसी बहुत अनुभवी डैंटिस्ट के पास जा कर ही उखड़वाना चाहिये ---- इस से भी बेहतर यह होगा कि किसी टीचिंग हास्पीटल में जाकर ही यह काम करवाया जाये ---वहां पर सारे स्पैशलिस्ट मौजूद होते हैं और सारी बातों का वे बखूबी ध्यान कर लेते हैं।

तो हम ने यह देखा कि डैंटिस्ट के पास जा कर अपनी सारी मैडीकल हिस्ट्री बताने वाली बात कितनी ज़रूरी है। एक और हार्ट की तकलीफ़ होती है ----रयूमैटिक हार्ट डिसीज़ ( Rheumatic heart disease ---इसे आम तौर पर मैडीकल भाषा में शॉट में RHD) भी कह दिया जाता है ----इस के साथ वैलवुलर हार्ट डिसीज़ होती है ---( valvular heart disease) अर्थात् मरीज़ के हार्ट के वाल्वज़ में कुछ तकलीफ़ होती है ---ऐसे मरीज़ों में भी दांत निकलवाने से पहले एक ऐंटीबायोटिक हमें कुछ समय पहले देना होता है --- ताकि एक खतरनाक सी तकलीफ़ –सब-एक्यूट बैकटीरियल एंडोकार्डाईटिस – Sub-acute bacterial endocarditis—SABE से मरीज़ का बचाव हो सके।

वैसे तो बातें ये सब बहुत बड़ी बड़ी लगती हैं----शायद थोड़ा खौफ़ भी पैदा करती होंगी ---लेकिन मेरी बात सुनिये की यह सब जितना कंप्लीकेट्ड लिखने में लगता है , उतना वास्तव में है नहीं। बस, बात केवल इतनी सी है कि बिल्कुल मस्ती से अपने डैंटिस्ट के पास जायें----इस से उसे भी अपना काम करने में बहुत आसानी होती है---मैं कईं बार मरीज़ों को कहता हूं कि डरे हुये मरीज़ का काम करते हुये तो हाथ ही नहीं चलता, वो बात अलग है कि यह सब कहां मरीज़ के भी हाथ में होता है। इसलिये हमें अगर कभी कभार लगता है कि मरीज़ बहुत ही टेंशन करने वाली प्रवृत्ति वाला है तो हमें उसे कभी-कभार बहुत रेयरली कोई टैबलेट भी देनी होती है। लेकिन जैसा कि मैं अकसर बार बार कहता रहता हूं कि मरीज़ का अपने डैंटिस्ट पर विश्वास और डैंटिस्ट द्वारा कहे गये चंद प्यार एवं सहानुभूति भरे शब्द किसी जादू से कम काम नहीं करते ----शायद इन्हें(विभिन्न कारणों की वजह से) काफी बार ट्राई ही नहीं किया जाता और टेबलेट पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा किया जाता है।

चंद शब्द उन मरीज़ों के बारे में जिन को हाल ही में हार्ट-अटैक हुआ हो ---ऐसे मरीज़ों में सामान्यतयः डेढ़-महीने तक दांत उखाड़ा नहीं जाता, लेकिन वह दूसरी तरह का नॉन-इनवेज़िव डैंटल ट्रीटमैंट करवा सकते हैं ---दांतों की तकलीफ़ के लिये दवाईयों से ही काम चला सकते हैं ---वैसे आम तौर पर देखा गया है कि हार्ट-अटैक के डेढ़-दो महीने बीत जाने से पहले वो डैंटिस्ट के पास दांत उखड़वाने आते भी नहीं हैं----- मेरे पास भी अभी तक शायद दो-चार केस ही ऐसे आये होंगे जिन का टाइम-पास हमें खाने वाली दवाईयां या दांतों एवं मसूड़ों पर लगाने वाली दवाईयां देकर ही किया था।

लगता है कि अब बस करूं ---बहुत ही महत्वपूर्ण तो सारी बातें लगता है हो ही गई हैं इस विषय के बारे में , कोई और बाद में याद आई तो फिर कर लेंगे। हां, अगर आप का कोई प्रश्न हो तो आप का प्रश्न पूछने हेतु स्वागत है।
।।शुभकामनायें।।