चलिए , यह भी एक इत्मीनान की ही बात है कि इन चित्रकारों का टेलेंट तो रेलगाड़ी के बाथरूमों तक ही सीमित रहता है। उन की यह कला उस से बाहर न ही आए तो ही ठीक है, नहीं तो गदर मच जाएगा। जब ये तरह तरह की अश्लील बातें अथवा ऊट-पटांग बातें मोटे मोटे अक्षरों में वहां लिखते हैं तो यह क्यों भूल जाते हैं कि इन पर समाज के हर आयु वर्ग के लोगों की नज़र पढ़ेगी। कई बार तो अबोध बच्चे भी यह सब पढ़ कर, चित्रकारी देख कर हैरान परेशान हो जाते होंगे। मैं अकसर सोचता हूं कि इस देश के अबोध बच्चों की यौन-शिक्षा के पहले पाठ तो शायद यहीं लिखे रहते हैं...।अफसोस तो बस इसी बात का ही होता है कि इन बाथ-रूम बलागरों को भी लगता है कि अपनी कला के जौहर दिखाने का उचित मौका मिला नहीं। इस अजीबो-गरीब बलागरी का दुनिया भी कुछ इंटरनैट ब्लागरी जैसी ही चलती है----अर्थात् कई लोग तो ये विवरण देख कर एवं लाइन ड्रांईंग देख कर इतने भड़क जाते हैं कि उन्होंने टिप्पणी के रूप में अपना करारा सा जवाब भी लिखा होता है। इस तरह की ग्रैफिटी रेल के बाथरूमों में ही नहीं, कईं बार तो मुझे मुंबई की लोकल गाड़ीयों में भी देखने को मिलीं। लेकिन बम्बई में इस तरह की ग्रैफिटी के ऊपर तुरंत कुछ पेंट पोत दिया जाता है...भई, ऐसे तो हज़ारों लोगों की नज़रों में यह सब आ जाएगा। कई बार तो नोटों पर भी इस तरह की ग्रैफिटी देखने को मिलती है, लेकिन वह बड़ी शालीन सी ही दिखती है। बंटी लव्स बबली या पिंचू लव्स पिंकी तक ही यह सीमित होती है। लेकिन कईं बार तो ये कलाकार एतिहासिक स्थानों को भी स्पेयर नहीं करते-- और उन पर भी अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश करते हैं। अरे भाई, कुछ ऐसी छाप ही छोड़नी है तो शाहजहां का अनुसरण करिए......उस ने कैसे अपने प्यार को अमर ही कर दिया। इन छोटी-मोटी हरकतों से तो कुछ हासिल होने से रहा, rather you are only corrupting the tender yound minds of our dear youngsters which happen to be our greatest assets!!
काश!! ऊपर वाला इन आत्माओं को सदबुद्धि प्रदान करें ताकि वे अपनी कलम के जौहर दिखाने के लिए बलागरी में पांव रखें।
ब्लॉग लेखक- डा.प्रवीण चोपड़ा.. 2007 से ब्लॉग लेखन एवं प्रशिक्षण में सक्रिय... drparveenchopra@gmail.com
गुरुवार, 3 जनवरी 2008
सांस की दुर्गंध----परेशानी !..........कोई तो रास्ता होगा इस से बचने का...
जी हां, जरूर है और वह भी बिल्कुल सस्ता, सुंदर और टिकाऊ। यह रास्ता,दोस्तो, यह है कि अगर हम अपने दांतों को रात में सोने से पहले भी ब्रुश करें और प्रतिदिन सुबह-सवेरे अपनी जुबान को जुबान साफ करने वाली पत्ती से साफ कर लें,तो यकीन मानिए हम सब इस दुर्गंध की परेशानी से बच सकते हैं। दोस्तो, हम अकसर देखते हैं कि अपने लोग यह साधारण से काम तो करते नहीं---महंगी महंगी माउथ-वाश की बोतलों के पीछे भागना शुरू कर देते हैं। यह तो दोस्तो वही बात है कि मैं दो दिन स्नान न करूं,और हस्पताल जाने से पहले अपने शरीर पर यू-डी-क्लोन या कोई और महंगा सा इत्र छिड़क लूं। दोस्तो, इस से पसीने की बदबू शायद कुछ घंटे के लिए दब तो जाएगी , लेकिन दूर कदापि न होगी। उस के लिए तो दोस्तो खुले पानी से स्नान लेना ही होगा। ठीक उसी तरह ---रात में दांत साफ करना व रोज सुबह सवेरे अपनी जुबान को पत्ती से साफ करना भी मुंह की महक को कायम रखने के लिए नितांत जरूरी है। दोस्तो, यह कोई नहीं बात नहीं है, अपने देश में तो जुबान को नित्य प्रतिदिन साफ करने की आदत तो हज़ारों साल पुरानी है। बस, कभी कभी हम ही सुस्ती कर जाते हैं।
दोस्तो, इस का रहस्य यह है कि अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारे मुंह में दुर्गंध पैदा करने वाले कीटाणु हमारी जुबान की कोटिंग (वही, सफेद सी काई, दोस्तो) में ही फलते फूलते हैं और अगर हम इस काई को रोज सुबह सवेरे साफ करते रहें तो फिर सारा दिन सांसें महकती रहेंगी। यहां एक बात और साफ करनी जरूरी है कि आज कल लोग पानमसाले को भी माउथ-फ्रैशनर के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। यही खतरनाक है-इस प्रकार हम कई बीमारियों को मोल ले लेते हैं। अपनी वोह पुरानी वाल छोटी इलायची या सौंफ ही ठीक है। पानमसालों वगैरह के चक्कर में कभी न पड़ें। लेकिन एक बात का और भी ध्यान रखना जरूर है कि आप के मसूड़े एवं दांत स्वस्थ होने चाहिए ---क्योंकि अगर पायरिया है तो उस का इलाज करवाना भी बहुत जरूरी है क्योंकि पायरिया भी मुंह की दुर्गंध पैदा करने में बहुत ज्यादा जिम्मेदार है।
दोस्तो, इस का रहस्य यह है कि अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारे मुंह में दुर्गंध पैदा करने वाले कीटाणु हमारी जुबान की कोटिंग (वही, सफेद सी काई, दोस्तो) में ही फलते फूलते हैं और अगर हम इस काई को रोज सुबह सवेरे साफ करते रहें तो फिर सारा दिन सांसें महकती रहेंगी। यहां एक बात और साफ करनी जरूरी है कि आज कल लोग पानमसाले को भी माउथ-फ्रैशनर के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। यही खतरनाक है-इस प्रकार हम कई बीमारियों को मोल ले लेते हैं। अपनी वोह पुरानी वाल छोटी इलायची या सौंफ ही ठीक है। पानमसालों वगैरह के चक्कर में कभी न पड़ें। लेकिन एक बात का और भी ध्यान रखना जरूर है कि आप के मसूड़े एवं दांत स्वस्थ होने चाहिए ---क्योंकि अगर पायरिया है तो उस का इलाज करवाना भी बहुत जरूरी है क्योंकि पायरिया भी मुंह की दुर्गंध पैदा करने में बहुत ज्यादा जिम्मेदार है।
सांस की दुर्गंध----परेशानी !..........कोई तो रास्ता होगा इस से बचने का...
जी हां, जरूर है और वह भी बिल्कुल सस्ता, सुंदर और टिकाऊ। यह रास्ता,दोस्तो, यह है कि अगर हम अपने दांतों को रात में सोने से पहले भी ब्रुश करें और प्रतिदिन सुबह-सवेरे अपनी जुबान को जुबान साफ करने वाली पत्ती से साफ कर लें,तो यकीन मानिए हम सब इस दुर्गंध की परेशानी से बच सकते हैं। दोस्तो, हम अकसर देखते हैं कि अपने लोग यह साधारण से काम तो करते नहीं---महंगी महंगी माउथ-वाश की बोतलों के पीछे भागना शुरू कर देते हैं। यह तो दोस्तो वही बात है कि मैं दो दिन स्नान न करूं,और हस्पताल जाने से पहले अपने शरीर पर यू-डी-क्लोन या कोई और महंगा सा इत्र छिड़क लूं। दोस्तो, इस से पसीने की बदबू शायद कुछ घंटे के लिए दब तो जाएगी , लेकिन दूर कदापि न होगी। उस के लिए तो दोस्तो खुले पानी से स्नान लेना ही होगा। ठीक उसी तरह ---रात में दांत साफ करना व रोज सुबह सवेरे अपनी जुबान को पत्ती से साफ करना भी मुंह की महक को कायम रखने के लिए नितांत जरूरी है। दोस्तो, यह कोई नहीं बात नहीं है, अपने देश में तो जुबान को नित्य प्रतिदिन साफ करने की आदत तो हज़ारों साल पुरानी है। बस, कभी कभी हम ही सुस्ती कर जाते हैं।
दोस्तो, इस का रहस्य यह है कि अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारे मुंह में दुर्गंध पैदा करने वाले कीटाणु हमारी जुबान की कोटिंग (वही, सफेद सी काई, दोस्तो) में ही फलते फूलते हैं और अगर हम इस काई को रोज सुबह सवेरे साफ करते रहें तो फिर सारा दिन सांसें महकती रहेंगी। यहां एक बात और साफ करनी जरूरी है कि आज कल लोग पानमसाले को भी माउथ-फ्रैशनर के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। यही खतरनाक है-इस प्रकार हम कई बीमारियों को मोल ले लेते हैं। अपनी वोह पुरानी वाल छोटी इलायची या सौंफ ही ठीक है। पानमसालों वगैरह के चक्कर में कभी न पड़ें। लेकिन एक बात का और भी ध्यान रखना जरूर है कि आप के मसूड़े एवं दांत स्वस्थ होने चाहिए ---क्योंकि अगर पायरिया है तो उस का इलाज करवाना भी बहुत जरूरी है क्योंकि पायरिया भी मुंह की दुर्गंध पैदा करने में बहुत ज्यादा जिम्मेदार है।
दोस्तो, इस का रहस्य यह है कि अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारे मुंह में दुर्गंध पैदा करने वाले कीटाणु हमारी जुबान की कोटिंग (वही, सफेद सी काई, दोस्तो) में ही फलते फूलते हैं और अगर हम इस काई को रोज सुबह सवेरे साफ करते रहें तो फिर सारा दिन सांसें महकती रहेंगी। यहां एक बात और साफ करनी जरूरी है कि आज कल लोग पानमसाले को भी माउथ-फ्रैशनर के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। यही खतरनाक है-इस प्रकार हम कई बीमारियों को मोल ले लेते हैं। अपनी वोह पुरानी वाल छोटी इलायची या सौंफ ही ठीक है। पानमसालों वगैरह के चक्कर में कभी न पड़ें। लेकिन एक बात का और भी ध्यान रखना जरूर है कि आप के मसूड़े एवं दांत स्वस्थ होने चाहिए ---क्योंकि अगर पायरिया है तो उस का इलाज करवाना भी बहुत जरूरी है क्योंकि पायरिया भी मुंह की दुर्गंध पैदा करने में बहुत ज्यादा जिम्मेदार है।
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दोस्तो, मिठाइयों के ऊपर लगे चांदी के वर्क के बारे में आप क्या कहते हैं ?
दोस्तो, इस के बारे में मेरा तो यह दृढ़ विश्वास यही है कि कुछ कुछ केसों में तो ये और कुछ भी हो, चांदी तो हो नहीं सकती। जिस जमाने में पनीर, दूध, दही तो हमें शुद्ध मिलता नहीं, ऐसे में मिठाईयों के ऊपर शुद्ध चांदी के वर्क लगे होने की खुशफहमी पालना भी मेरी नज़र में मुनासिब नहीं है। तो दोस्तो, मैंने इस समस्या से जूझने का एक रास्ता निकाल लिया है-- वैसे तो हम लोग मिठाई कम ही खाते हैं, लेकिन अगर यह सो-काल्ड चांदी के वर्क वाली मिठाई खाने की नौबत आती भी है तो पहले तो मैं चाकू से उस के ऊपर वाली परत पूरी तरह से उतार देता हूं। दोस्तों, कुछ समय पहले मीडिया में भी इसे अच्छा कवर किया जाता रहा है कि मिलावट की बीमारी ने इस वर्क को भी नहीं बख्शा ....कई केसों में इसे एल्यूमीनियम का ही पाया गया है। अब आप यह सोचें कि अगर यह एल्यूमीनियम का वर्क हम अपने शरीर के सुपुर्द कर रहे हैं तो यह हमारे गुर्दों की सेहत के साथ क्या क्या खिलवाड़ न करता होगा। इस लिए,दोस्तो, चाहे यह मिठाई महंगी से महंगी दुकान से खरीदी हो, मैं तो इस वर्क को खाने का रिस्क कभी भी नहीं लेता। आप भी कृपया आगे से ऐसी मिठाईयां खाने से पहले इस छोटी सी बात का ध्यान रखिएगा---दोस्तो, वैसे ही हमारे चारों इतनी प्रदूषण --जी हां, सभी तरह का-- फैला हुया है , ऐसे में चांदी के वर्क के चक्कर में न ही पड़ें तो ठीक है। यह तो हुई,दोस्तो, इन वर्कों की बात, तो इन में इस्तेमाल रंगों एवं फ्लेवरों की बात कभी फिर करते हैं।
Good morning, friends !!
दोस्तो, मिठाइयों के ऊपर लगे चांदी के वर्क के बारे में आप क्या कहते हैं ?
दोस्तो, इस के बारे में मेरा तो यह दृढ़ विश्वास यही है कि कुछ कुछ केसों में तो ये और कुछ भी हो, चांदी तो हो नहीं सकती। जिस जमाने में पनीर, दूध, दही तो हमें शुद्ध मिलता नहीं, ऐसे में मिठाईयों के ऊपर शुद्ध चांदी के वर्क लगे होने की खुशफहमी पालना भी मेरी नज़र में मुनासिब नहीं है। तो दोस्तो, मैंने इस समस्या से जूझने का एक रास्ता निकाल लिया है-- वैसे तो हम लोग मिठाई कम ही खाते हैं, लेकिन अगर यह सो-काल्ड चांदी के वर्क वाली मिठाई खाने की नौबत आती भी है तो पहले तो मैं चाकू से उस के ऊपर वाली परत पूरी तरह से उतार देता हूं। दोस्तों, कुछ समय पहले मीडिया में भी इसे अच्छा कवर किया जाता रहा है कि मिलावट की बीमारी ने इस वर्क को भी नहीं बख्शा ....कई केसों में इसे एल्यूमीनियम का ही पाया गया है। अब आप यह सोचें कि अगर यह एल्यूमीनियम का वर्क हम अपने शरीर के सुपुर्द कर रहे हैं तो यह हमारे गुर्दों की सेहत के साथ क्या क्या खिलवाड़ न करता होगा। इस लिए,दोस्तो, चाहे यह मिठाई महंगी से महंगी दुकान से खरीदी हो, मैं तो इस वर्क को खाने का रिस्क कभी भी नहीं लेता। आप भी कृपया आगे से ऐसी मिठाईयां खाने से पहले इस छोटी सी बात का ध्यान रखिएगा---दोस्तो, वैसे ही हमारे चारों इतनी प्रदूषण --जी हां, सभी तरह का-- फैला हुया है , ऐसे में चांदी के वर्क के चक्कर में न ही पड़ें तो ठीक है। यह तो हुई,दोस्तो, इन वर्कों की बात, तो इन में इस्तेमाल रंगों एवं फ्लेवरों की बात कभी फिर करते हैं।
Good morning, friends !!
1 comments:
- Raviratlami said...
-
अल्यूमिनियम से याददाश्त पर भी दुष्परभाव पड़ता है ऐसा मैंने भी कहीं पढ़ा था...
- January 4, 2008 9:32 PM
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पौरूषता बढ़ाने वाले सप्लीमेंटस से सावधान !!-----मैं नहीं, अमेरिकी एफडीआई यह कह रही है....
अमेरिकी फूड एवं ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने लोगों को ऐसे खाद्य़ पदार्थों को खरीदने अथवा खाने से मना किया है जिन की मार्केटिंग ही पौरूषता की कमी के मामले ठीक करने वाले डाइटरी सप्लीमेंटस के रूप में की जा रही है ---इस चेतावनी का कारण यह है कि इन पदार्थों को खाने से कुछ लोगों का ब्लड-प्रेशर खतरनाक लेवल तक गिर सकता है। इन पदार्थों को चीन में बनाया गया है।
चिंता की बात यही है ,दोस्तो, कि चाहे इन की मार्केटिंग डायटरी सप्लीमेंटस के रूप में की जाती है, लेकिन इन में एक्टिव दवाईयां भी होती हैं जिन के बारे में इस की पैकिंग पर कुछ नहीं लिखा होता और वैसे जिन दवाईयों को बिना डाक्टरी नुस्खे के कोई खरीद नहीं सकता। इसलिए एफडीआई के अनुसार ऐसे उत्पाद गैर-कानूनी हैं क्योंकि इन्हें एफडीआई की एपरूवल प्राप्त नही है। आप भी उत्सुक हो रहे होंगे कि ऐसा क्या मिला है इन चीनी खाद्य पदार्थों में कि एफडीआई इतना भड़क गई है। दोस्तो, इन सप्लीमेंटस में सिलडिनाफिल नाम की दवाई मिली हुई है, जी हां, बिलकुल वही जो वियाग्रा में होती है। अब, आप देखें कि वैसे तो वियाग्रा डाक्टरी सलाह से ही लेनी चाहिए----अब अगर इसे दवाई से लैस कुछ खाद्य पदार्थों को अगर लोग कुरमुरे की तरह छकने लगेंगे तो क्या होगा !!---अब जब डाक्टर किसी को यह दवाई दे रहे हैं ,तो उस बंदे के स्वास्थ्य के बारे में सारी खबर उस को रहती है। लेकिन अगर इन से लैस डिब्बों कोलोग डाइटरी सप्लीमेंटस के रूप में ही लेने लगें तो फिर तो .....। वास्तव में खतरा यही है कि ये दवाईयां जिन की सूचना डिब्बे के ऊपर नहीं की गई होती, ये नाईट्रेटस नामक दवाईयों की वर्किंग के साथ कुछ पंगा ले कर इन सप्लीमेंटस को लेने वालों में ब्लड-प्रेशर का स्तर खतरनाक लेवल तक गिरा सकती हैं। डायबिटीज़, हाई ब्लड-प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रोल एवं हृदय रोग वाले मरीज़ सामान्यतयः ये नाइट्रेटस नामक दवाईयां लेते है। थोडी़ बहुत पौरूषता की कमी (इरैक्टाइल डिसफंक्शन) इन मैडीकल अवस्थाओं में आम समस्या है---ऐसे में इन खाद्य़ पदार्थों को खाना कितना जोखिम भरा है, यह अब हम जानते हैं। अब भला अमेरिका यह सब कैसे बरदाशत कर सकता है....
रही अपने यहां की बात, यहां तो,दोस्तो, सब कुछ बिलकुल धड़ल्ले से बिक रहा है......पता ही नहीं, सड़क के किनारे तंबू गाड़ कर नीम हकीम इस पौरूषता को बढ़ावा देने के लिए इस देश के आम बंदे को क्या क्या पुड़ीयों में डाल कर खिलाए जा रहे हैं। अमेरिका वालों को यह तो पता चल गया कि उन के बंदे क्या खा रहे हैं........हमें तो अफसोस इस बात का ही है कि हमें तो यह भी नहीं पता कि हमारे बंदे इन नीम हकीमों एवं खानदानी दवाखानों से क्या क्या ले कर छके जा रहे है। और जब इन को कुछ हो भी जाता होगा....तो हम ही लोग बड़ी लापरवाही की चादर ओड़ कर यही कह कर बात आई-गई कर देते हैं कि इस की लिखी ही इतनी थी।
वैसे , मुझे तो यह भी लगता है कि जब ये चीनी सप्लीमेंटस अमेरिका वाले अपने देश से बाहर निकाल देंगें-----फिर यही सप्लीमेंटस हमारे देश के चाइनों बाज़ारों में ही बड़े धडल्ले से बिकेंगे......................क्या आप को भी ऐसा ही लग रहा है??
बुधवार, 2 जनवरी 2008
क्या आप बाज़ार जूस पीने जा रहे हैं ?- इसे भी पढ़िए !!
दोस्तो, कुछ न कुछ बात हम डाक्टरों की जिंदगी में रोज़ाना ऐसी घट जाती है कि वह हमें अपनी कलम उठाने के लिए उकसा ही देती है। वैसे तो कईं बार ही ऐसा हो चुका है कि लेकिन आज भी सुबह ऐसा ही हुया---एक मरीज जिसमें खून की बहुत कमी थी, मैं उसे इस के इलाज के बारे में बता रहा था, जैसे ही मैं उसे खाने-पीने में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताने लगा तो उस ने झट से कहा कि मैं तो बस रोज़ अनार का जूस पी लिया करूंगा। फिर उस को यह भी बताना पड़ा कि उस अकेले अनार के जूस के साथ-साथ उसे और भी क्या क्या खाना है....क्योंकि बाज़ार में बिकते हुए अनार के जूस के ऊपर कैसे भरोसा कर लूं.....मौसंबी एवं संतरे का जूस तो बाज़ार में ढंग से लोगों को मिलता नहीं, अनार के जूस का सपना देखना तो भई मुझे बहुत बड़ी बात लगती है।
दोस्तो, आप कभी जूस की दुकान को ध्यान से देखिए, उस ने जूस निकालने की सारी प्रक्रिया आप की नज़रों से दूर ही रखी होती है। कारण यह है कि उस ने उस गिलास में बर्फ के साथ ही साथ, चीनी की चासनी, थोडा़ बहुत रंग भी डालना होता है और यह सब कुछ जितना आप की नज़रों से दूर रहेगा, उतनी ही उसको आज़ादी रहेगी। मैं भी अकसर बाजार में मिलते जूस का रंग देख कर बड़ा हैरान सा हो जाया करता था ---फिर किसी ने इस पर प्रकाश डाल ही दिया कि कुछ दुकानदार इस में रंग मिला देते हैं--नहीं तो जूस में 10अनार के दानों का जूस मिला होने से भला जूस कैसे एक दम लाल दिख सकता है। दोस्तो, अब बारी है चासनी की, अगर हम ने बाजारी जूस के साथ साथ इतनी चीनी ही खानी है तो क्या फायदा। अब , रही बात बर्फ की...तो साहब आप लोग बाज़ारी बर्फ के कारनामे तो जानते ही हैं, लेकिन इस जूस वाले का मुनाफा बर्फ की मात्रा पर भी निर्भर करता है। तो फिर क्या करें...आप यही सोच रहे हैं न..क्या अब जूस पीना भी छोड़ दें....जरूर पीजिए, लेकिन इन बातों की तरफ ध्यान भी जरूर दीजिए.....वैसे अगर आप स्वस्थ हैं तो आप किसी फळ को अगर खाते हैं तो उस से हमें उस का जूस तो मिलता ही है, साथ ही साथ उस में मौजूद रेशे भी हमारे शरीर में जाते हैं,और इस के इलावा कुछ ऐसे अद्भुत तत्व भी हमें इन फलों को खाने से मिलते हैं जिन को अभी तक हम डाक्टर लोग भी समझ नहीं पाए हैं। हां, गाजर वगैरा का जूस ठीक है, क्योंकि आदमी वैसे कच्ची गाजरें कितनी खा सकता है। हां, अगर कोई बीमार चल रहा है तो उस के लिए तो जूस ही उत्तम है और अगर वह भी साथ साथ फलों को भी खाना चालू रखे तो बढ़िया है।
जूस का क्या है....कहने को तो बंबई के स्टेशनों के बाहर 2 रूपये में बिकने वाला संतरे का जूस भी जूस ही है---जिस में केवल संतरी रंग एवं खटाई का ही प्रयोग होता है। जितने बड़े बड़े टबों में वे ये जूस बेच रहे होते हैं अगर वे संतरे लेकर उस का जूस निकालना शुरू करें तो शायद एक पूरी घोड़ा-गाडी़ (संतरों से लदी हुई ) भी कम ही होगी।
आप क्या सोचने लग गए ??
दोस्तो, आप कभी जूस की दुकान को ध्यान से देखिए, उस ने जूस निकालने की सारी प्रक्रिया आप की नज़रों से दूर ही रखी होती है। कारण यह है कि उस ने उस गिलास में बर्फ के साथ ही साथ, चीनी की चासनी, थोडा़ बहुत रंग भी डालना होता है और यह सब कुछ जितना आप की नज़रों से दूर रहेगा, उतनी ही उसको आज़ादी रहेगी। मैं भी अकसर बाजार में मिलते जूस का रंग देख कर बड़ा हैरान सा हो जाया करता था ---फिर किसी ने इस पर प्रकाश डाल ही दिया कि कुछ दुकानदार इस में रंग मिला देते हैं--नहीं तो जूस में 10अनार के दानों का जूस मिला होने से भला जूस कैसे एक दम लाल दिख सकता है। दोस्तो, अब बारी है चासनी की, अगर हम ने बाजारी जूस के साथ साथ इतनी चीनी ही खानी है तो क्या फायदा। अब , रही बात बर्फ की...तो साहब आप लोग बाज़ारी बर्फ के कारनामे तो जानते ही हैं, लेकिन इस जूस वाले का मुनाफा बर्फ की मात्रा पर भी निर्भर करता है। तो फिर क्या करें...आप यही सोच रहे हैं न..क्या अब जूस पीना भी छोड़ दें....जरूर पीजिए, लेकिन इन बातों की तरफ ध्यान भी जरूर दीजिए.....वैसे अगर आप स्वस्थ हैं तो आप किसी फळ को अगर खाते हैं तो उस से हमें उस का जूस तो मिलता ही है, साथ ही साथ उस में मौजूद रेशे भी हमारे शरीर में जाते हैं,और इस के इलावा कुछ ऐसे अद्भुत तत्व भी हमें इन फलों को खाने से मिलते हैं जिन को अभी तक हम डाक्टर लोग भी समझ नहीं पाए हैं। हां, गाजर वगैरा का जूस ठीक है, क्योंकि आदमी वैसे कच्ची गाजरें कितनी खा सकता है। हां, अगर कोई बीमार चल रहा है तो उस के लिए तो जूस ही उत्तम है और अगर वह भी साथ साथ फलों को भी खाना चालू रखे तो बढ़िया है।
जूस का क्या है....कहने को तो बंबई के स्टेशनों के बाहर 2 रूपये में बिकने वाला संतरे का जूस भी जूस ही है---जिस में केवल संतरी रंग एवं खटाई का ही प्रयोग होता है। जितने बड़े बड़े टबों में वे ये जूस बेच रहे होते हैं अगर वे संतरे लेकर उस का जूस निकालना शुरू करें तो शायद एक पूरी घोड़ा-गाडी़ (संतरों से लदी हुई ) भी कम ही होगी।
आप क्या सोचने लग गए ??
क्या आप बाज़ार जूस पीने जा रहे हैं ?- इसे भी पढ़िए !!
दोस्तो, कुछ न कुछ बात हम डाक्टरों की जिंदगी में रोज़ाना ऐसी घट जाती है कि वह हमें अपनी कलम उठाने के लिए उकसा ही देती है। वैसे तो कईं बार ही ऐसा हो चुका है कि लेकिन आज भी सुबह ऐसा ही हुया---एक मरीज जिसमें खून की बहुत कमी थी, मैं उसे इस के इलाज के बारे में बता रहा था, जैसे ही मैं उसे खाने-पीने में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताने लगा तो उस ने झट से कहा कि मैं तो बस रोज़ अनार का जूस पी लिया करूंगा। फिर उस को यह भी बताना पड़ा कि उस अकेले अनार के जूस के साथ-साथ उसे और भी क्या क्या खाना है....क्योंकि बाज़ार में बिकते हुए अनार के जूस के ऊपर कैसे भरोसा कर लूं.....मौसंबी एवं संतरे का जूस तो बाज़ार में ढंग से लोगों को मिलता नहीं, अनार के जूस का सपना देखना तो भई मुझे बहुत बड़ी बात लगती है।
दोस्तो, आप कभी जूस की दुकान को ध्यान से देखिए, उस ने जूस निकालने की सारी प्रक्रिया आप की नज़रों से दूर ही रखी होती है। कारण यह है कि उस ने उस गिलास में बर्फ के साथ ही साथ, चीनी की चासनी, थोडा़ बहुत रंग भी डालना होता है और यह सब कुछ जितना आप की नज़रों से दूर रहेगा, उतनी ही उसको आज़ादी रहेगी। मैं भी अकसर बाजार में मिलते जूस का रंग देख कर बड़ा हैरान सा हो जाया करता था ---फिर किसी ने इस पर प्रकाश डाल ही दिया कि कुछ दुकानदार इस में रंग मिला देते हैं--नहीं तो जूस में 10अनार के दानों का जूस मिला होने से भला जूस कैसे एक दम लाल दिख सकता है। दोस्तो, अब बारी है चासनी की, अगर हम ने बाजारी जूस के साथ साथ इतनी चीनी ही खानी है तो क्या फायदा। अब , रही बात बर्फ की...तो साहब आप लोग बाज़ारी बर्फ के कारनामे तो जानते ही हैं, लेकिन इस जूस वाले का मुनाफा बर्फ की मात्रा पर भी निर्भर करता है। तो फिर क्या करें...आप यही सोच रहे हैं न..क्या अब जूस पीना भी छोड़ दें....जरूर पीजिए, लेकिन इन बातों की तरफ ध्यान भी जरूर दीजिए.....वैसे अगर आप स्वस्थ हैं तो आप किसी फळ को अगर खाते हैं तो उस से हमें उस का जूस तो मिलता ही है, साथ ही साथ उस में मौजूद रेशे भी हमारे शरीर में जाते हैं,और इस के इलावा कुछ ऐसे अद्भुत तत्व भी हमें इन फलों को खाने से मिलते हैं जिन को अभी तक हम डाक्टर लोग भी समझ नहीं पाए हैं। हां, गाजर वगैरा का जूस ठीक है, क्योंकि आदमी वैसे कच्ची गाजरें कितनी खा सकता है। हां, अगर कोई बीमार चल रहा है तो उस के लिए तो जूस ही उत्तम है और अगर वह भी साथ साथ फलों को भी खाना चालू रखे तो बढ़िया है।
जूस का क्या है....कहने को तो बंबई के स्टेशनों के बाहर 2 रूपये में बिकने वाला संतरे का जूस भी जूस ही है---जिस में केवल संतरी रंग एवं खटाई का ही प्रयोग होता है। जितने बड़े बड़े टबों में वे ये जूस बेच रहे होते हैं अगर वे संतरे लेकर उस का जूस निकालना शुरू करें तो शायद एक पूरी घोड़ा-गाडी़ (संतरों से लदी हुई ) भी कम ही होगी।
आप क्या सोचने लग गए ??
दोस्तो, आप कभी जूस की दुकान को ध्यान से देखिए, उस ने जूस निकालने की सारी प्रक्रिया आप की नज़रों से दूर ही रखी होती है। कारण यह है कि उस ने उस गिलास में बर्फ के साथ ही साथ, चीनी की चासनी, थोडा़ बहुत रंग भी डालना होता है और यह सब कुछ जितना आप की नज़रों से दूर रहेगा, उतनी ही उसको आज़ादी रहेगी। मैं भी अकसर बाजार में मिलते जूस का रंग देख कर बड़ा हैरान सा हो जाया करता था ---फिर किसी ने इस पर प्रकाश डाल ही दिया कि कुछ दुकानदार इस में रंग मिला देते हैं--नहीं तो जूस में 10अनार के दानों का जूस मिला होने से भला जूस कैसे एक दम लाल दिख सकता है। दोस्तो, अब बारी है चासनी की, अगर हम ने बाजारी जूस के साथ साथ इतनी चीनी ही खानी है तो क्या फायदा। अब , रही बात बर्फ की...तो साहब आप लोग बाज़ारी बर्फ के कारनामे तो जानते ही हैं, लेकिन इस जूस वाले का मुनाफा बर्फ की मात्रा पर भी निर्भर करता है। तो फिर क्या करें...आप यही सोच रहे हैं न..क्या अब जूस पीना भी छोड़ दें....जरूर पीजिए, लेकिन इन बातों की तरफ ध्यान भी जरूर दीजिए.....वैसे अगर आप स्वस्थ हैं तो आप किसी फळ को अगर खाते हैं तो उस से हमें उस का जूस तो मिलता ही है, साथ ही साथ उस में मौजूद रेशे भी हमारे शरीर में जाते हैं,और इस के इलावा कुछ ऐसे अद्भुत तत्व भी हमें इन फलों को खाने से मिलते हैं जिन को अभी तक हम डाक्टर लोग भी समझ नहीं पाए हैं। हां, गाजर वगैरा का जूस ठीक है, क्योंकि आदमी वैसे कच्ची गाजरें कितनी खा सकता है। हां, अगर कोई बीमार चल रहा है तो उस के लिए तो जूस ही उत्तम है और अगर वह भी साथ साथ फलों को भी खाना चालू रखे तो बढ़िया है।
जूस का क्या है....कहने को तो बंबई के स्टेशनों के बाहर 2 रूपये में बिकने वाला संतरे का जूस भी जूस ही है---जिस में केवल संतरी रंग एवं खटाई का ही प्रयोग होता है। जितने बड़े बड़े टबों में वे ये जूस बेच रहे होते हैं अगर वे संतरे लेकर उस का जूस निकालना शुरू करें तो शायद एक पूरी घोड़ा-गाडी़ (संतरों से लदी हुई ) भी कम ही होगी।
आप क्या सोचने लग गए ??
1 comments:
- शास्त्री जे सी फिलिप् said...
-
प्रिय डॉक्टर इस चिट्ठे के लिये एवं इस लेख के लिये शत शत आभार. लिखते रहें बहुत लोगों को फायदा होगा.
- January 2, 2008 9:37 PM
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नो, नो, किड्स.......नो हिंदी, नो पंजाबी, ओनली इंगलिस, डियर गोलू
दोस्तो, आधी बात तो आप ऊपर लिखे शीर्षक से ही समझ चुके हैं---जी हां, उन लोगों की बात जो बच्चों के नाम तो हिंदी की डिक्शनरी देख-देख कर रखते हैं, और हां, कईं बार तो नाम भी ऐसे कि उन्हें हिंदी अंदाज़ में ही कहने से आनंद मिलता है। लेकन जैसे ही वह बच्चा होश संभालता है उसे उस की राष्ट्र-भाषा से तो अलग करने की कोशिश की जाती है...लेकिन अफसोस तो इस बात का है, मेरे दोस्तो, कि उसे उस की मातृ-भाषा से भी तोड़ने की कोशिश की जाती है। जिन बच्चों को उस की माटी की खुशबू से ही अलग कर दिया जाए----दोस्तो, वह आग चल कर गुलाब बन भी गया, तो खुशबू कहां से लाएगा। बिल्कुल कागजी, बनावटी फूल की तरह ही बन कर रहेगा। दोस्तो, हम लोगों ने इंगलिश तो सारी उम्र सीखनी है, उस भाषा में कईं काम करने होते हैं, लेकिन घर -- मां-बाप, भाई-बहन बच्चे जब अपनी ही भाषा में बात करते हैं तो पता है न कितना मज़ा आता है, कितना खुलापन झलकता है। क्यों कि किसी भी व्याकरण का ध्यान रखने की जरूरत ही नहीं होती। मैंने भी ऐसे बहुत से मध्यमवर्गीय मां-बाप को देखा है जो इस बात का बेहद गर्व महसूस करते हैं कि हमारे पिंचू के स्कूल में तो जैसे ही हिंदी बोलो, दस रूपये का फाइन ठुक जाता है, इसलिए तो हम सब घर में भी इंगलिश बोलना चाहते हैं, लेकिन इस के दादा-दादी का क्या करें---वे गांव के हैं न, बस वही प्राब्लम है। जीहां, सब से बड़ी प्राबल्म हो आप ही हो, आप भी गांव के ही हो, लेकिन बड़े शहर ने थोड़ी एक्टिंग करनी सिखा दी है। बस, इस से ज्यादा असलियत कुछ और नहीं।...
तो क्या, बच्चों को इंगलिश से दूर रखें। दोस्तो, ऐसा मैंने कब कहा है ??-- इंगलिश तो एक इंटरनैशनल भाषा है, उस पर पकड़ एकदम सरिये जैसी मजबूत होनी चाहिए। हम उसे काम-काज में इस्तेमाल करें....टैक्नीकल विषयों से संबंधित जानकारी के प्रसार प्रचार में इस्तेमाल करे.......बिना वजह अपने से कम पढ़े लिखे बंदे को या कम भाग्यवान बंदे के ऊपर अपनी अंग्रजी की धाक जमा कर आखिर हम क्या सिद्ध कर लेंगे ? कुछ नहीं। और जहां तक छोटे बच्चों की बात है, उन्हें हम अपने देश की ,अपने प्रदेश की , अपने गांव की, अपनी चौपाल की मीठी बोली रूपी मिट्रटी में पनपने का मौका तो दें..........इस पौधे को पल्लवित-पुष्पित होने की सही खुराक तो वहीं से मिलनी है। एक बार अगर इस पौधे की बस जड़ें मजबूत होने दीजिए--फिर देखिए, आप को यह एक सच्चा अंतराष्ट्रीय मानस बन कर दिखायेगा-----जात-पात, धर्म,नस्ल के भेदों से कोसों दूर-----फिर चाहे आप उस से दुनिया की कोई भी भाषा बुलवा लीजिएगा।
तो क्या, बच्चों को इंगलिश से दूर रखें। दोस्तो, ऐसा मैंने कब कहा है ??-- इंगलिश तो एक इंटरनैशनल भाषा है, उस पर पकड़ एकदम सरिये जैसी मजबूत होनी चाहिए। हम उसे काम-काज में इस्तेमाल करें....टैक्नीकल विषयों से संबंधित जानकारी के प्रसार प्रचार में इस्तेमाल करे.......बिना वजह अपने से कम पढ़े लिखे बंदे को या कम भाग्यवान बंदे के ऊपर अपनी अंग्रजी की धाक जमा कर आखिर हम क्या सिद्ध कर लेंगे ? कुछ नहीं। और जहां तक छोटे बच्चों की बात है, उन्हें हम अपने देश की ,अपने प्रदेश की , अपने गांव की, अपनी चौपाल की मीठी बोली रूपी मिट्रटी में पनपने का मौका तो दें..........इस पौधे को पल्लवित-पुष्पित होने की सही खुराक तो वहीं से मिलनी है। एक बार अगर इस पौधे की बस जड़ें मजबूत होने दीजिए--फिर देखिए, आप को यह एक सच्चा अंतराष्ट्रीय मानस बन कर दिखायेगा-----जात-पात, धर्म,नस्ल के भेदों से कोसों दूर-----फिर चाहे आप उस से दुनिया की कोई भी भाषा बुलवा लीजिएगा।
शादी से पहले आखिर एचआईव्ही टैस्टिंग क्यों नहीं ??-- प्लीज़, सोचिए !!
दोस्तो, पिछले काफी अरसे से यह विचार परेशान किए जा रहा है कि आखिर शादी से पहले कब हम लोग एचआईव्ही टैस्टिंग के बारे में सोचने लगेंगे। दोस्तो, मुझे खुद नहीं पता जो मैं कह रहा हूं यह कितना प्रैक्टीकल है, लेकिन दोस्तो यह बात मेरी दिल की गहराईयों से निकलती रहती है कि शादी से पहले लड़के एवं लड़की का एच.आई.व्ही टैस्ट तो होना ही चाहिए। दोस्तो, इस बात से तो आप भी सहमत हैं न कि एड्स जैसी भयंकर बीमारी ने विकराल रूप धारण किया हुया है। ऐसे में हम लोगों की इस के बारे में टैस्टिंग की झिझक आखिर कब जाएगी, दोस्तो। नये साल के संबंध में कुछ लोगों के नए-नए सैक्सुअल एडवेंचरस की बातें आप और हम मीडिया में देखते-सुनते रहते हैं। लेकिन इन संबंधों के संभावित खौफनाक नतीजों की चर्चा क्यों नहीं होती???--वैसे एक बात यह भी है न कि इस संबंध में हमारे अपने ही देश में अपने ही लोगों के साथ चर्चा छेड़ने के लिए कोई फिरंगी तो आने से रहा--- यह चर्चा तो हम सब को देर-सवेर छेड़नी ही है, तो क्यों न अभी से छेड़ ली जाए। बाहर के देशों वाले तो दोस्तो इन सब एडवेंचरस को पहले से भुगतने के आदि से जान पड़ते हैं--- मुझे कईं बार लगता है कि हमारे सीधे-सादे लोगों को भी यह रास्ता दिखाने में उन के मीडिया की अच्छी खासी भूमिका रही है। तो फिर करें क्या ??
जी हां, मैं अपनी बात पर ही आ रहा हूं , हम क्यों शादी से पहले एचआईव्ही टैस्ट जरूरी नहीं कर देते---- नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं.....कृपया इसे सरकारी तौर पर अनिवार्य करने की बात मैं बिल्कुल नहीं कर रहा हूं, क्योंकि फिर तो ड्राईविंग लाइसेंस लेने की तरह यह भी इतना आसान हो जाएगा कि कोई भी दलाल यह बिना किसी टैस्ट के ओके रिपोर्ट के साथ दिला दिया करेगा। काश , हमारे समाज में ही इतनी जागरूकता सी आ जाए कि अनपढ़ लोग भी इस संबंध में बातें करनें लगें.......प्लीजृ आमीन कह दीजिए। मुझे तसल्ली हो जायेगी।
दोस्तो, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि आज कल के युवा कुछ पाश्चात्य प्रभाव के कारण ज्यादा उन्मु्क्त से होते जा रहे हैं, लेकिन इस संबंध में हम उन की कितनी लगाम कस सकते हैं,मैं नहीं जानता। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि विवाह से पूर्व इस टैस्टिंग के द्वारा एक बिल्कुल भोली भाली अल्हड़ सी गुड़िया की अथवा एक सीधे-सादे नौजवान की जिंदगी ही बचा लें। दोस्तो, बात यह बहुत गहरी है,पता नहीं मैंने भावावेश में कैसे लिख दी है, पता नहीं आप सब का क्या रिएक्शन होगा। लेकिन मैंने बीज डालने का अपना काम कर दिया है। और वह भी उस समाज में,दोस्तो, जहां पर अभी तक यौन-शिक्षा के ऊपर ही सहमति नहीं बन पा रही है..........कारण??---कहीं, यह हमारे बच्चों को गंदा न कर दे। ऐसे विचार रखने वालों से क्या आप को घिन्न नहीं आती ??---भई, मुझे तो बहुत ज्यादा आ रही है, तभी तो बेटे को आवाज़ लगा कर नाक ढंकने के लिए एक बड़ा रूमाल (रूमाल से क्या बनेगा, तौलिया ही मंगवा लेता हूं ) मंगवा रहा हूं।
Very Good morning, friends!!
जी हां, मैं अपनी बात पर ही आ रहा हूं , हम क्यों शादी से पहले एचआईव्ही टैस्ट जरूरी नहीं कर देते---- नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं.....कृपया इसे सरकारी तौर पर अनिवार्य करने की बात मैं बिल्कुल नहीं कर रहा हूं, क्योंकि फिर तो ड्राईविंग लाइसेंस लेने की तरह यह भी इतना आसान हो जाएगा कि कोई भी दलाल यह बिना किसी टैस्ट के ओके रिपोर्ट के साथ दिला दिया करेगा। काश , हमारे समाज में ही इतनी जागरूकता सी आ जाए कि अनपढ़ लोग भी इस संबंध में बातें करनें लगें.......प्लीजृ आमीन कह दीजिए। मुझे तसल्ली हो जायेगी।
दोस्तो, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि आज कल के युवा कुछ पाश्चात्य प्रभाव के कारण ज्यादा उन्मु्क्त से होते जा रहे हैं, लेकिन इस संबंध में हम उन की कितनी लगाम कस सकते हैं,मैं नहीं जानता। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि विवाह से पूर्व इस टैस्टिंग के द्वारा एक बिल्कुल भोली भाली अल्हड़ सी गुड़िया की अथवा एक सीधे-सादे नौजवान की जिंदगी ही बचा लें। दोस्तो, बात यह बहुत गहरी है,पता नहीं मैंने भावावेश में कैसे लिख दी है, पता नहीं आप सब का क्या रिएक्शन होगा। लेकिन मैंने बीज डालने का अपना काम कर दिया है। और वह भी उस समाज में,दोस्तो, जहां पर अभी तक यौन-शिक्षा के ऊपर ही सहमति नहीं बन पा रही है..........कारण??---कहीं, यह हमारे बच्चों को गंदा न कर दे। ऐसे विचार रखने वालों से क्या आप को घिन्न नहीं आती ??---भई, मुझे तो बहुत ज्यादा आ रही है, तभी तो बेटे को आवाज़ लगा कर नाक ढंकने के लिए एक बड़ा रूमाल (रूमाल से क्या बनेगा, तौलिया ही मंगवा लेता हूं ) मंगवा रहा हूं।
Very Good morning, friends!!
मंगलवार, 1 जनवरी 2008
रेलवे के वेटिंग रूम के अटैंडैंट के साथ बिना वजह की टसल----सारी खुन्नस उस पर !!
रेलवे के वेटिंग रूम के अटैंडैंट के साथ बिना वजह की टसल----सारी खुन्नस उस पर !!
दोस्तो, मुझे ऐसे लोगों से बड़ी शिकायत है जो कि रेलवे के वेटिंग रूम के अटैंडैंटो के साथ यूं ही गर्म हो पड़ते हैं--- मेरी तरह शायद आपने भी बडी़ बार यह नोटिस किया होगा कि जब भी वह किसी यात्री की टिकट देखना चाहता है तो यात्री अकसर भड़क से पड़ते हैं। भई, इस में उस बेचारे का आखिर क्या दोष क्या----उस की जो ड्यूटी है वह तो वही कर रहा है।ि सरकार ने उसे इस काम के लिए ही तो रखा हुया है। अकसर ऊंची श्रेणी से यात्रा करने वाले कुछ यात्रियों में मैंने यह बात नोटिस की है। दो दिन पहले ही जब नई दिल्ली स्टेशन के ऐसे ही एक वेटिंग रूम की परिचारिका ने किसी जैंटलमैन से टिकट के बारे में पूछा, तो उस ने तपाक से उत्तर दिया----तुम क्या समझ रही हो, शताब्दी का टिकट है !! उस की बात सुन कर हंसी भी आई कि भई, इस पर शताब्दी की धाक जमाने की क्या पड़ी है....शताब्दी की टिकट है या राजधानी की....हुया करे, उसे तो बस एक प्रूफ चाहिए। ज्यादा लंबी चौड़ी बात तो है नहीं। इस तरह की टसल मई-जून में तो कुछ ज्यादा ही नहीं आती है----यात्री पसीनो-पसीना, ऊपर से भारी भरकम सूटकेसों ने दिमाग घुमाया होता है या कुलियों के साथ अभी बहसबाजी खत्म नहीं हुई होती कि इस वेटिंग रूम के अटैंडैंट की इस ड्रामे में एंट्री हो जाती है। ऐसे में किस की खुन्नस किस पर निकलती है, कुछ पता नहीं।
वैसे आज कल जब सार्वजनिक स्थानों पर उपद्रवी घटनाएं बढ़ गई हैं, ऐसे में हमें तो उस अटैंडैंट का शुक्रिया ही करना चाहिए कि वह हम सब के लिए एक सुरक्षा चक्र की भूमिका अदा कर रहा है। वैसे भी आप ने नोटिस किया होगा कि इन वेटिंग रूम के बाथ-रूम को प्लेट-फार्म पर घूम रहे यात्रियों द्वारा इस्तेमाल करने की अकसर कोशिश रहती है----अब दिल्ली बम्बई जैसे नगरों में यह एंट्री बिना किसी तरह की रोक-टोक के हो जाएगी तो इन बाथ-रूमों में गदर मच जाएगा, दोस्तो। तो फिर, दोस्तो, अगली बार उस वेटिंग रूम अटैंडैंट के ऊपर हम किसी की खुन्नस न निकालने की शपथ आज ले ही लें।
दोस्तो, मुझे ऐसे लोगों से बड़ी शिकायत है जो कि रेलवे के वेटिंग रूम के अटैंडैंटो के साथ यूं ही गर्म हो पड़ते हैं--- मेरी तरह शायद आपने भी बडी़ बार यह नोटिस किया होगा कि जब भी वह किसी यात्री की टिकट देखना चाहता है तो यात्री अकसर भड़क से पड़ते हैं। भई, इस में उस बेचारे का आखिर क्या दोष क्या----उस की जो ड्यूटी है वह तो वही कर रहा है।ि सरकार ने उसे इस काम के लिए ही तो रखा हुया है। अकसर ऊंची श्रेणी से यात्रा करने वाले कुछ यात्रियों में मैंने यह बात नोटिस की है। दो दिन पहले ही जब नई दिल्ली स्टेशन के ऐसे ही एक वेटिंग रूम की परिचारिका ने किसी जैंटलमैन से टिकट के बारे में पूछा, तो उस ने तपाक से उत्तर दिया----तुम क्या समझ रही हो, शताब्दी का टिकट है !! उस की बात सुन कर हंसी भी आई कि भई, इस पर शताब्दी की धाक जमाने की क्या पड़ी है....शताब्दी की टिकट है या राजधानी की....हुया करे, उसे तो बस एक प्रूफ चाहिए। ज्यादा लंबी चौड़ी बात तो है नहीं। इस तरह की टसल मई-जून में तो कुछ ज्यादा ही नहीं आती है----यात्री पसीनो-पसीना, ऊपर से भारी भरकम सूटकेसों ने दिमाग घुमाया होता है या कुलियों के साथ अभी बहसबाजी खत्म नहीं हुई होती कि इस वेटिंग रूम के अटैंडैंट की इस ड्रामे में एंट्री हो जाती है। ऐसे में किस की खुन्नस किस पर निकलती है, कुछ पता नहीं।
वैसे आज कल जब सार्वजनिक स्थानों पर उपद्रवी घटनाएं बढ़ गई हैं, ऐसे में हमें तो उस अटैंडैंट का शुक्रिया ही करना चाहिए कि वह हम सब के लिए एक सुरक्षा चक्र की भूमिका अदा कर रहा है। वैसे भी आप ने नोटिस किया होगा कि इन वेटिंग रूम के बाथ-रूम को प्लेट-फार्म पर घूम रहे यात्रियों द्वारा इस्तेमाल करने की अकसर कोशिश रहती है----अब दिल्ली बम्बई जैसे नगरों में यह एंट्री बिना किसी तरह की रोक-टोक के हो जाएगी तो इन बाथ-रूमों में गदर मच जाएगा, दोस्तो। तो फिर, दोस्तो, अगली बार उस वेटिंग रूम अटैंडैंट के ऊपर हम किसी की खुन्नस न निकालने की शपथ आज ले ही लें।
हवाई यात्रा के दौरान टी.बी से ग्रस्त महिला के साथ बैठे लोगों की तलाश
अमेरिका में स्वास्थ्य अधिकारी आज कल वहां के 17 स्टेटों में एक तलाश में बेहद मसरूफ हैं। दिसंबर07 के शुरू शुरू में नेपाल मूल की एक 30वर्षीय महिला ने भारत से सैन-फ्रांसिस्को तक हवाई-यात्रा की, जिस दौरान शिकागो में उस का यात्रा-विराम भी हुया- ऐसे ही लगता है कि इस महिला का उस तलाश से क्या संबंध ?- यह महिला इस तरह की टीबी से ग्रस्त है जिस में दवाईयों भी बेअसर होती हैं।
सैन-फ्रांसिस्को पहुंचने के एक हफ्ते बाद जब वह महिला इलाज के लिए स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी अस्पताल में पहुंची तो विशेषज्ञों को उस का परीक्षण करने का बाद यह पता चला कि वह तो टीबी के अति व्यग्र एवं खतरनाक किस्म से ग्रस्त है।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने तो इस की सूचना भी दी है कि वह महिला भारत से शिकागो की फ्लाईट के दौरान 35वीं लाइन में बैठी हुईं थीं। स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि उस फ्लाईट में यात्रा कर रहे अन्य 44 यात्री जो उस महिला के इतने आस-पास थे कि उन्हें भी टीबी रोग हो सकता है, लेकिन इस रिस्क को इतना ज्यादा भी नहीं बताया गया है। स्वास्थ्य एजॆंसी ने यह सलाह दी है कि इन सब 44 लोगों को अब टीबी के लिए अपना टैस्ट करवा लेना चाहिए और उस के 10 सप्ताह बाद भी दोबारा से यह टैस्ट करवाना चाहिए। जून2006 से जून 2007 के बीच यह सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी ( सेंटर फार डिसीज़ कंट्रोल) लगभग एक सौ ऐसी ही तलाशों में व्यस्त रही।
यह सब आप को भी बहुत हैरत-अंगेज़ लग रहा होगा-- मुझे भी लगा। लेकिन उन देशों में टीबी जैसे संक्रमक रोगों से बचाव के प्रोग्राम कुछ इस तरह के ही जबरदस्त हैं कि हम लोग दांतों तले उंगली दबाते दबाते रह जाते हैं। अब आप ही देखिए एक फ्लाईट में यात्रा कर रही टीबी रोगी के सह-यात्रियों की तलाश और उन्हें अपने टैस्ट करवाने की सलाह। इसे ही कहते हैं बचाव !! दोस्तो, आप भी इस टीबी के बारे में अकसर मीडिया में देखते-पढ़ते रहते होंगे जिस में टीबी की दवाईयां भी कुछ असर नहीं करतीं। इस का कारण ?---मुख्यतः तो यही कि टीबी से ग्रस्त मरीज बीच बीच में इलाज छोड़ देते हैं, पूरा कोर्स करते नहीं, पूरी डोज़ लेते नहीं----और इस सब के साथसाथ आज कल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो एड्स जैसी बीमारी से जुझ रहे मरीज़ों के लिए भी यह भयंकर किस्म का टीबी रोग जिस में कोई दवा काम नहीं करती, जानलेवा सिद्ध होता है। ऐसे में अमेरिका की स्वास्थ्य एजेंसी कैसे भला कोई चांस कैसे ले सकती है।
दोस्तो, आज मुझे मैडीकल कालेज में अपनी पढाई के दौरान की एक बात याद आ रही है---किसी ने मैडीसन के प्रोफैसर साहब से प्रश्न किया कि सर, हमारे देश में टीबी कितने लोगों को है ?- उन्होंने ने जवाब दिया कि आप इस का कुछ कुछ अंदाज़ा इस बात से लगा लें कि आप जिस बस में यात्रा कर रहे हैं, आप यह मान कर चलें कि उस में एक टीबी से ग्रस्त व्यक्ति है---साथियो, इस बात को ध्यान रखिए कि यह बात 20साल पुरानी है। लेकिन दोस्तो, क्या हम ने उस यात्री के सहयात्रियों को क्या कभी ढूंढने की कोशिश की ??????----ठसाठस भरी हुईं हमारी बसें, बंदे के ऊपर बंदा चढ़ा हुया, बीडी़ के धुएं का लगातार साथ - चाहे खांस-खांस कर पेट दुःखने लग जाए और मुंह पर रूमाल या हाथ रखने का कोई रिवाज़ नहीं--- ऐसे में हम कब उन सहयात्रियों को ढूंढ पाएंगे। वैसे बात सोचने की है या नहीं ,दोस्तो। आप को भी क्या लग नहीं रहा कि दुनिया तो हमारे सिर्फ आंकड़ों के दीवानेपन के बहुत आगे निकल चुकी है। चलिए , हम भी इस से सबक सीखने की कोशिश करते हैं।
Wish you a wonderful 2008 full of HAPPINESS.......HAPPINESS......HAPPINESS....................yes, so much happiness that literally no space is left for anything else to stay on . God bless you all.....take care!!
सैन-फ्रांसिस्को पहुंचने के एक हफ्ते बाद जब वह महिला इलाज के लिए स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी अस्पताल में पहुंची तो विशेषज्ञों को उस का परीक्षण करने का बाद यह पता चला कि वह तो टीबी के अति व्यग्र एवं खतरनाक किस्म से ग्रस्त है।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने तो इस की सूचना भी दी है कि वह महिला भारत से शिकागो की फ्लाईट के दौरान 35वीं लाइन में बैठी हुईं थीं। स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि उस फ्लाईट में यात्रा कर रहे अन्य 44 यात्री जो उस महिला के इतने आस-पास थे कि उन्हें भी टीबी रोग हो सकता है, लेकिन इस रिस्क को इतना ज्यादा भी नहीं बताया गया है। स्वास्थ्य एजॆंसी ने यह सलाह दी है कि इन सब 44 लोगों को अब टीबी के लिए अपना टैस्ट करवा लेना चाहिए और उस के 10 सप्ताह बाद भी दोबारा से यह टैस्ट करवाना चाहिए। जून2006 से जून 2007 के बीच यह सरकारी स्वास्थ्य एजेंसी ( सेंटर फार डिसीज़ कंट्रोल) लगभग एक सौ ऐसी ही तलाशों में व्यस्त रही।
यह सब आप को भी बहुत हैरत-अंगेज़ लग रहा होगा-- मुझे भी लगा। लेकिन उन देशों में टीबी जैसे संक्रमक रोगों से बचाव के प्रोग्राम कुछ इस तरह के ही जबरदस्त हैं कि हम लोग दांतों तले उंगली दबाते दबाते रह जाते हैं। अब आप ही देखिए एक फ्लाईट में यात्रा कर रही टीबी रोगी के सह-यात्रियों की तलाश और उन्हें अपने टैस्ट करवाने की सलाह। इसे ही कहते हैं बचाव !! दोस्तो, आप भी इस टीबी के बारे में अकसर मीडिया में देखते-पढ़ते रहते होंगे जिस में टीबी की दवाईयां भी कुछ असर नहीं करतीं। इस का कारण ?---मुख्यतः तो यही कि टीबी से ग्रस्त मरीज बीच बीच में इलाज छोड़ देते हैं, पूरा कोर्स करते नहीं, पूरी डोज़ लेते नहीं----और इस सब के साथसाथ आज कल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो एड्स जैसी बीमारी से जुझ रहे मरीज़ों के लिए भी यह भयंकर किस्म का टीबी रोग जिस में कोई दवा काम नहीं करती, जानलेवा सिद्ध होता है। ऐसे में अमेरिका की स्वास्थ्य एजेंसी कैसे भला कोई चांस कैसे ले सकती है।
दोस्तो, आज मुझे मैडीकल कालेज में अपनी पढाई के दौरान की एक बात याद आ रही है---किसी ने मैडीसन के प्रोफैसर साहब से प्रश्न किया कि सर, हमारे देश में टीबी कितने लोगों को है ?- उन्होंने ने जवाब दिया कि आप इस का कुछ कुछ अंदाज़ा इस बात से लगा लें कि आप जिस बस में यात्रा कर रहे हैं, आप यह मान कर चलें कि उस में एक टीबी से ग्रस्त व्यक्ति है---साथियो, इस बात को ध्यान रखिए कि यह बात 20साल पुरानी है। लेकिन दोस्तो, क्या हम ने उस यात्री के सहयात्रियों को क्या कभी ढूंढने की कोशिश की ??????----ठसाठस भरी हुईं हमारी बसें, बंदे के ऊपर बंदा चढ़ा हुया, बीडी़ के धुएं का लगातार साथ - चाहे खांस-खांस कर पेट दुःखने लग जाए और मुंह पर रूमाल या हाथ रखने का कोई रिवाज़ नहीं--- ऐसे में हम कब उन सहयात्रियों को ढूंढ पाएंगे। वैसे बात सोचने की है या नहीं ,दोस्तो। आप को भी क्या लग नहीं रहा कि दुनिया तो हमारे सिर्फ आंकड़ों के दीवानेपन के बहुत आगे निकल चुकी है। चलिए , हम भी इस से सबक सीखने की कोशिश करते हैं।
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सोमवार, 31 दिसंबर 2007
जब केबल टी.वी ने भी रेडियो की दुनिया में घुस-पैठ कर डाली...
....लगभग 1985-86 के आस-पास तक तो हम लोग रेडियो के साथ साथ दूरदर्शन टीवी का आनंद लूटने में लगे हुए थे। दूरदर्शन के प्रोग्राम दिन में कुछ घंटों तक ही प्रसारित हुया करते थे -- बाकी समय तो अपना रेडियो के मनोरंजक प्रोग्रामों के नाम ही लगा होता था। अब तक मैंने भी 3-4 छोटे-छोटे ट्रांजिस्टर इक्टठे कर रखे थे। एक हास्पीटल में फुर्सत के लम्हों में सुनने के लिए रखा हुया था, एक घर के लिए ....मुझे, दोस्तो, अभी ध्यान आ रहा है कि यह वह समय था जब मैं नहाते हुए भी एक ट्रांजिस्टर गुसलखाने( जी हां, तब गुसलखाने ही हुया करते थे, ये बाथ-रूम तो अब हम ने बनाने शुरू किए हैं...) की शैल्फ पर रखना न भूलता था- आखिर उस दौरान भी मैं अपने चहेते विविध भारती की फिल्मी गीतों की बौछार से कैसे दूर रह सकता था !! उन दिनों यह भी बात होने लगीं कि अब वीसीपी या वीसीआर खरीदने या किराये पर लाने का भी कोई झंझट नहीं, अब तो भई केबल आ गया है, सारा दिन हिंदी फिल्मी व हिंदी फिल्मी गीतों पर आधारित कार्यक्रम छकाया करेगा --और वह भी सिर्फ 120रूपये महीने की दर से। खैर, हम लोगों को कभी यह केबल -वेबल लगवाने की बात जंची नहीं--बस यूं ही---शायद इस का कारण होगा कि हम लोग रेडियो एवं दूरदर्शन के कार्यक्रमों में बुरी तरह से ( या कहूं, अच्छी तरह से) डूबे रहते थे। तो दोस्तो, मैं कहना यह चाह रहा हूं कि इस केबल टीवी के आने से भी रेडियो की प्यारी सी दुनिया में कोई खास असर नहीं पड़ा। लोग, वही हिंदी फिल्में बार-बार देख कर ऊबने से लगे थे----वही गीत सुन सुन कर सिर फटा करता था।
दोस्तो, 1991 में मेरी सर्विस दिल्ली के सरकारी हस्पताल में लग गई। अभी कुछ दिन ही इस नौकरी को लगे हुए थे--- मुझे अभी पहली तनख्वाह भी न मिली थी। दोस्तो, मैं और मेरे बीवी चांदनी चौंक एरिया में टहल रहे थे- उस दिन मेरा जन्म-दिन था, बीवी ने पूछा कि बर्थ-डे प्रेसेंट क्या लोगे ?----मेरा कुछ खास जवाब न आने पर उस ने कहा कि आप को रेडियो सुनने का इतना शौक है, चलो एक रेडियो ही ले लेते हैं। सो, दोस्तो, मैं और मेरी पत्नी उस दिन सामने ही एक रेडियो की दुकान के अंदर गए--- हमें एक 600रूपये के करीब का ट्रांजिस्टर पसंद आया ....फिलिप्स का था....उस की यह खासियत कि चाहे तो सेल से चलाओ, चाहो तो बिजली से। दोस्तो, आप से क्या छिपाना, उन दिनों तो सैल भी बार-बार खरीदने चुभते थे। खैर, उस रेडियो पर मेरा दिल आ ही गया--- लेकिन मेरी जेब में केवल अढ़ाई-तीन सौ रूपये ही थे, मैं कुछ आना-कानी करने लगा था, लेकिन मिसिज ने जैसे मुझे उस दिन वह सैट दिलाने की ठान रखी थी, तो,दोस्तो, हम दोनों ने मिल कर उसे खरीद ही लिया। बस, उस दिन से उसे बिजली के साथ चलाने लगा और मेरी दुनिया में एक अनूठा संसार जुड़ गया --- यह सैट खरीदने से पहले तो सैल ज्यादा फुंकने की टेंशन होती थी, लेकिन अब तो बिना किसी रोक-टोक के दिन में जितना समय चाहो, आल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम सुनने को मिलते थे। दोस्तो, मैं तो भई आज तक इस सैट के बारे में बड़ा इमोशनल हूं--- अब बीवी को भी अकसर कहता हूं कि हम दोनों द्वारा आज तक जितनी भी परचेजि़ग की गई है, वह रेडियो वाली खरीद मेरे लिए सब से ज्यादा मायने रखती है और सारी उम्र रखेगी। उस दिन मुझे उस रेडियो की ही जरूरत थी। एक तरह से देखा जाए तो उस रेडियो सैट की खरीद की याद हम दोनों के बीच एक भावनात्मक पुल का काम करती है। प्लीज़, आप कृपया इतने सीरियस न हो जाइए, लेकिन मुझे पता है कि इस पर आप का भी वश कहां है, ये लेखक लोग होते ही कुछ भावुक किस्म के हैं !!!
कुछ महीनों बाद, दोस्तो, हम दोनों की पोस्टिंग बम्बई हो गई ( मैं क्या करूं, मुझे तो दोस्तो अभी भी उसे पुराने नाम से ही पुकारने में आनंद मिलता है!!) सो , उस सैट के माध्यम से विविध भारती के प्रोग्रामों का भरपूर मजा लूटना जारी रहा। अभी बंबई गए हुए 2-3 महीने ही हुए थे कि वहां पर फिलिप्स का स्टीरियो (टू-इन वन) खरीद लिया और इस की स्टीरीयोफोनिक आवाज़ होने की वजह से उस का आनंद ज्यादा आने लगा। सो, अब उस पुराने वाले सैट के साथ साथ इस स्टीरिरयो पर भी रेडियो को सुनने का मजा आने लगा। पता नहीं, कितनी बार, शायद सैंकड़ो बार उन दिनों उस बेटा फिल्म की कैसेट के गीत सुन कर भी मैं कभी बोर नहीं हुया----!! लेकिन दोस्तो अब इन पुरानी यादों के झरोखों पर खड़ा-खड़ा ऊब सा गया हूं--- सो, फिर मिलते हैं।
Wish all of you and yours a Wonderful 2008------------may god fill your life with health and happiness during this year !!!!!!!
दोस्तो, 1991 में मेरी सर्विस दिल्ली के सरकारी हस्पताल में लग गई। अभी कुछ दिन ही इस नौकरी को लगे हुए थे--- मुझे अभी पहली तनख्वाह भी न मिली थी। दोस्तो, मैं और मेरे बीवी चांदनी चौंक एरिया में टहल रहे थे- उस दिन मेरा जन्म-दिन था, बीवी ने पूछा कि बर्थ-डे प्रेसेंट क्या लोगे ?----मेरा कुछ खास जवाब न आने पर उस ने कहा कि आप को रेडियो सुनने का इतना शौक है, चलो एक रेडियो ही ले लेते हैं। सो, दोस्तो, मैं और मेरी पत्नी उस दिन सामने ही एक रेडियो की दुकान के अंदर गए--- हमें एक 600रूपये के करीब का ट्रांजिस्टर पसंद आया ....फिलिप्स का था....उस की यह खासियत कि चाहे तो सेल से चलाओ, चाहो तो बिजली से। दोस्तो, आप से क्या छिपाना, उन दिनों तो सैल भी बार-बार खरीदने चुभते थे। खैर, उस रेडियो पर मेरा दिल आ ही गया--- लेकिन मेरी जेब में केवल अढ़ाई-तीन सौ रूपये ही थे, मैं कुछ आना-कानी करने लगा था, लेकिन मिसिज ने जैसे मुझे उस दिन वह सैट दिलाने की ठान रखी थी, तो,दोस्तो, हम दोनों ने मिल कर उसे खरीद ही लिया। बस, उस दिन से उसे बिजली के साथ चलाने लगा और मेरी दुनिया में एक अनूठा संसार जुड़ गया --- यह सैट खरीदने से पहले तो सैल ज्यादा फुंकने की टेंशन होती थी, लेकिन अब तो बिना किसी रोक-टोक के दिन में जितना समय चाहो, आल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम सुनने को मिलते थे। दोस्तो, मैं तो भई आज तक इस सैट के बारे में बड़ा इमोशनल हूं--- अब बीवी को भी अकसर कहता हूं कि हम दोनों द्वारा आज तक जितनी भी परचेजि़ग की गई है, वह रेडियो वाली खरीद मेरे लिए सब से ज्यादा मायने रखती है और सारी उम्र रखेगी। उस दिन मुझे उस रेडियो की ही जरूरत थी। एक तरह से देखा जाए तो उस रेडियो सैट की खरीद की याद हम दोनों के बीच एक भावनात्मक पुल का काम करती है। प्लीज़, आप कृपया इतने सीरियस न हो जाइए, लेकिन मुझे पता है कि इस पर आप का भी वश कहां है, ये लेखक लोग होते ही कुछ भावुक किस्म के हैं !!!
कुछ महीनों बाद, दोस्तो, हम दोनों की पोस्टिंग बम्बई हो गई ( मैं क्या करूं, मुझे तो दोस्तो अभी भी उसे पुराने नाम से ही पुकारने में आनंद मिलता है!!) सो , उस सैट के माध्यम से विविध भारती के प्रोग्रामों का भरपूर मजा लूटना जारी रहा। अभी बंबई गए हुए 2-3 महीने ही हुए थे कि वहां पर फिलिप्स का स्टीरियो (टू-इन वन) खरीद लिया और इस की स्टीरीयोफोनिक आवाज़ होने की वजह से उस का आनंद ज्यादा आने लगा। सो, अब उस पुराने वाले सैट के साथ साथ इस स्टीरिरयो पर भी रेडियो को सुनने का मजा आने लगा। पता नहीं, कितनी बार, शायद सैंकड़ो बार उन दिनों उस बेटा फिल्म की कैसेट के गीत सुन कर भी मैं कभी बोर नहीं हुया----!! लेकिन दोस्तो अब इन पुरानी यादों के झरोखों पर खड़ा-खड़ा ऊब सा गया हूं--- सो, फिर मिलते हैं।
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