Wednesday, January 2, 2008

शादी से पहले आखिर एचआईव्ही टैस्टिंग क्यों नहीं ??-- प्लीज़, सोचिए !!

दोस्तो, पिछले काफी अरसे से यह विचार परेशान किए जा रहा है कि आखिर शादी से पहले कब हम लोग एचआईव्ही टैस्टिंग के बारे में सोचने लगेंगे। दोस्तो, मुझे खुद नहीं पता जो मैं कह रहा हूं यह कितना प्रैक्टीकल है, लेकिन दोस्तो यह बात मेरी दिल की गहराईयों से निकलती रहती है कि शादी से पहले लड़के एवं लड़की का एच.आई.व्ही टैस्ट तो होना ही चाहिए। दोस्तो, इस बात से तो आप भी सहमत हैं न कि एड्स जैसी भयंकर बीमारी ने विकराल रूप धारण किया हुया है। ऐसे में हम लोगों की इस के बारे में टैस्टिंग की झिझक आखिर कब जाएगी, दोस्तो। नये साल के संबंध में कुछ लोगों के नए-नए सैक्सुअल एडवेंचरस की बातें आप और हम मीडिया में देखते-सुनते रहते हैं। लेकिन इन संबंधों के संभावित खौफनाक नतीजों की चर्चा क्यों नहीं होती???--वैसे एक बात यह भी है न कि इस संबंध में हमारे अपने ही देश में अपने ही लोगों के साथ चर्चा छेड़ने के लिए कोई फिरंगी तो आने से रहा--- यह चर्चा तो हम सब को देर-सवेर छेड़नी ही है, तो क्यों न अभी से छेड़ ली जाए। बाहर के देशों वाले तो दोस्तो इन सब एडवेंचरस को पहले से भुगतने के आदि से जान पड़ते हैं--- मुझे कईं बार लगता है कि हमारे सीधे-सादे लोगों को भी यह रास्ता दिखाने में उन के मीडिया की अच्छी खासी भूमिका रही है। तो फिर करें क्या ??
जी हां, मैं अपनी बात पर ही आ रहा हूं , हम क्यों शादी से पहले एचआईव्ही टैस्ट जरूरी नहीं कर देते---- नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं.....कृपया इसे सरकारी तौर पर अनिवार्य करने की बात मैं बिल्कुल नहीं कर रहा हूं, क्योंकि फिर तो ड्राईविंग लाइसेंस लेने की तरह यह भी इतना आसान हो जाएगा कि कोई भी दलाल यह बिना किसी टैस्ट के ओके रिपोर्ट के साथ दिला दिया करेगा। काश , हमारे समाज में ही इतनी जागरूकता सी आ जाए कि अनपढ़ लोग भी इस संबंध में बातें करनें लगें.......प्लीजृ आमीन कह दीजिए। मुझे तसल्ली हो जायेगी।
दोस्तो, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि आज कल के युवा कुछ पाश्चात्य प्रभाव के कारण ज्यादा उन्मु्क्त से होते जा रहे हैं, लेकिन इस संबंध में हम उन की कितनी लगाम कस सकते हैं,मैं नहीं जानता। लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि विवाह से पूर्व इस टैस्टिंग के द्वारा एक बिल्कुल भोली भाली अल्हड़ सी गुड़िया की अथवा एक सीधे-सादे नौजवान की जिंदगी ही बचा लें। दोस्तो, बात यह बहुत गहरी है,पता नहीं मैंने भावावेश में कैसे लिख दी है, पता नहीं आप सब का क्या रिएक्शन होगा। लेकिन मैंने बीज डालने का अपना काम कर दिया है। और वह भी उस समाज में,दोस्तो, जहां पर अभी तक यौन-शिक्षा के ऊपर ही सहमति नहीं बन पा रही है..........कारण??---कहीं, यह हमारे बच्चों को गंदा न कर दे। ऐसे विचार रखने वालों से क्या आप को घिन्न नहीं आती ??---भई, मुझे तो बहुत ज्यादा आ रही है, तभी तो बेटे को आवाज़ लगा कर नाक ढंकने के लिए एक बड़ा रूमाल (रूमाल से क्या बनेगा, तौलिया ही मंगवा लेता हूं ) मंगवा रहा हूं।
Very Good morning, friends!!

3 comments:

  1. आपकी बात से सहमत हूँ, अच्छे खासे पढे लिखे लोग भी भावनाओं में आकर सुरक्षित यौन सम्बन्धों की बात भूल जाते हैं । मेरे ही एक मित्र ने ऐसा किया था और फ़िर मैनें और एक अन्य मित्र ने उसकी खाट खडी की थी । खैर उसकी किस्मत अच्छी थी और वो किसी रोग की चपेट में नहीं आया लेकिन अभी पिछले महीने मेरे मोहल्ले के एक सज्जन और उनकी पत्नी एड्स के शिकार होकर चल बसे ।

    समस्या वाकई बडी गम्भीर है और हम इसे समस्या मानने को ही तैयार नहीं हैं ।

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  2. आपकी बात से सहमत हूँ । संस्कृति की दुहाई देकर बच्चों को खतरे में डालने के बजाय उन्हें सुरक्षित रहना सिखाया जाना चाहिये । पहल माता पिता को ही करनी होगी क्योंकि यह हमारे बच्चों के जीने मरने का प्रश्न है ।
    घुघूती बासूती

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  3. बिल्कुल सही मुद्दा आपने समने रखा है. पर टेस्ट् की बात उठाने पर लोग इसे व्यक्तिगत आरोप की तरह लेते है. पर बात यहा से बहुत आगे जाती है. बहुत से झोला डाक्टर और कुकुर्मुत्ते की तरह उगते प्राईवेट हस्पताल इस हलत मे है, कि नर्से, बिना ग्लोव्स के चीर फाड करती है. सुईया बार-बार इस्तेमाल होती है, ब्लडेस भी. इसीलिये,HIV,
    संकर्मण किसी को भी हो सकता है.

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