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Monday, December 8, 2008

क्या आप भी नईं दवाईयों से ज़्यादा इंप्रैस होते हैं ? -----लेकिन थोड़ा संभल कर !!

जिस तरह से नईं दवाईयों को अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा थोड़ी जल्दबाजी में मान्यता ( अपरूवल) रूपी हरी झंडी कभी कभार दिखा दी जाती है और उस के तुरंत बाद संबंधित कंपनियों के द्वारा जितने अत्यंत आधुनिक तरीकों के द्वारा इन दवाईयों की मार्केटिंग की तूफ़ानी मुहिम चलाई जाती है उसे देखते हुये यह आवाज़ भी उठनी शुरू हो गई है कि इस से काफ़ी मरीज़ों को उनके खतरनाक दुष्परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। बेहतर होगा कि इन्हीं अत्य-आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल मरीजों को इन दुष्परिणामों से बचाने के लिये भी किया जाए।
यूनिवर्सिटी ऑफ कॉलोरेडो- हैल्थ साईंसिस सेंटर के डा डेविड काओ के अनुसार अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के नये तौर-तरीकों ( procedures) की वजह से कुछ दवाईयों को हरी झंडी दिखाने में जल्दबाजी दिखाई गई है।

एक उदाहरण के तौर पर बताया गया कि किस तरह से सूजन के इलाज के लिये इस्तेमाल की जाने वाली एक कंपनी की दवाई रोफीकाक्सिब ( anti-inflammatory drug Rofecoxib) को दी गई मंज़ूरी को 2004 में दो करोड़ मरीज़ों पर टैस्ट करने के उपरांत वापिस इस लिये लेना पड़ा क्योंकि उस दवाई के हार्ट पर बुरे असर देखने को मिलने लगे।

ब्रिटिश मैडीकल जर्नल में डा काओ ने लिखा है कि जब से 1992 प्रेसक्रिपशन ड्रग यूजर फीस एक्ट के अंतर्गत कंपनियों द्वारा फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन को अपरूवल में जल्दी करने को कहा जाता है ---तब से ही किसी नई दवाई का रिव्यू करने हेतु ( time needed to review a new drug) एफडीआई द्वारा जो समय लिया जाता था उस में अच्छी खासी कमी आई है --- 1979-86 तक यह अवधि 33.6महीने हुआ करती थी लेकिन 1992-2002 के दौरान यह घट कर 16 महीने रह गई है।

सोचने की बात यही है कि अगर ऐसा हो रहा है तो आखिर यह किस के हित में है ?

एक बात विशेष ध्यान देने योग्य यह है कि दवा कंपनियों से जो इस तरह की फीस वसूली जाती है इस से जितनी रकम जमा होती है यह एफडीआई के ड्रग टैस्टिंग बजट का लगभग आधा हिस्सा ( 43%) इसी रकम से ही जमा हो पाता है। और ब्रिटेन में तो इस तरह का काम कर रही सरकारी एजेंसी के 75%फंड इसी तरह की फीस से जमा होते हैं।

क्या आप को लगता है कि यह दवाईयों की सेफ्टी के हक में है ?

होता अकसर यह है कि नईं दवाईयों को कुछ हज़ार लोगों पर टैस्ट किया जाता है ओर इन्हें अप्रूवल की हरी झंडी मिल जाती है, लेकिन इन दवाईयों के ऐसे साइड-इफैक्ट्स जो इतने आम तौर पर दिखते नहीं हैं, इसलिये इन के बारे में पता तभी चलता है जब इन्हें बहुत से मरीज़ों पर इस्तेमाल किया जाता है – इसे पोस्ट-अप्रूवल सरवेलेंस( post-approval surveillance) कहा जाता है --- कहने का मतलब यही कि किसी दवा को हरी झंडी तो मिल गई लेकिन जब उसे हज़ारों-लाखों लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन का उस के साथ कैसा अनुभव रहता है इन सब की निगरानी को ही post-approval surveillance कहा जाता है। अब देखने में यह आता है कि यही सरवेलेंस बडी कमज़ोर पड़ी हुई है।

डायबिटिज़ में इस्तेमाल होने वाली एक दवा सिटैगलिप्टिन को उस की खोज होने के बाद एफडीआई का अप्रूवल लेने में लगभग चार वर्ष( 3.8 वर्ष) लगे , उसी प्रकार सूजन के लिये नईं दवा राफीकोक्सिब ढूंढने के बाद उसे फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का अप्रूवल लेने में पांच साल लगे जब कि 1990-99 के दौरान इस तरह की अप्रूवल लेने के लिये औसतन चौदह साल ( 14.2 वर्ष) से भी ज़्यादा का समय लग जाया करता था।

रिपोर्ट के अनुसार जैसे ही दवा सिटैगलिप्टिन को अप्रूवल मिला उस की जबरदस्त मार्केटिंग तुरंत ही शुरू हो गई – अप्रूवल मिलने के 90 मिनट के अंदर इस दवा की वेबसाइट शुरू हो गई और अगले आठ दिनों में जितने डाक्टरों को इस से अवगत करवाया जाना था उन में से 70 प्रतिशत डाक्टरों को कवर भी कर लिया गया और फार्मेसियों को इस की पहली डिलीवरी भी कर दी गई। डा. काओ का कहना है कि इस का यह मतलब नहीं है कि इस दवाई से मरीज़ों को खतरा है ---लेकिन यह तो एक जबरदस्त तूफ़ानी मार्केटिंग की एक उदाहरण है और विशेष बात यही है कि पोस्ट-अप्रूवल सरवेलेंस के लिये भी इन आधुनिक मार्केटिंग तकनीकों को इस्तेमाल किया जाना चाहिये।
शिक्षा ----- तो इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है , देखते हैं !!

जब हम लोग मैडीकल कॉलेज में पढ़ा करते थे तो अपने बहुत सीनियर डाक्टरों के पर्चे देख कर बहुत हैरान हुआ करते थे ---अधिकांश तौर पर बस हम लोग यही सोचा करते थे कि जितना पुराना डाक्टर उतना ही पुराना उस का नुस्खा। कईं बार शायद हम लोगों के मन में यह भी विचार आ जाया करता था कि फलां फलां सीनियर डाक्टर को तो बस पुरानी दवाईयों के ही नाम याद हैं। और हमारा ज़माना जब आया हाउस-जाब का तो अकसर जिस कंपनी का मैडीकल –रैप कुछ पैड-पैन या कोई कैलेंडर या कोई बढ़िया सा छल्ला दे जाता था, दो चार नईं नईं दवा के सैंपल टेबल पर रख जाया करता था , हम अकसर उन दिनों उन नईं दवाईयों से बहुत इंप्रैस हो जाया करते थे। और शायद अगले दो-चार दिनों तक उस की दवाई की कुछ पर्चियां भी लिख देते थे। कईं बार तो अगर कोई मरीज़ थोड़ा बहुत नखरा करता था ( यह नखरा शब्द भी बीस साल पहले ही हम लोग इस्तेमाल कभी कभी कर लिया करते थे -----अभी हम लोग भी कच्चे डाक्टर हुआ करते थे ) तो हम लोग उसे 18-20 रूपये वाली टेबलेट लिख दिया करते थे।

लेकिन फिर धीरे धीरे जब हम पकना शुरू होते हैं तो हमें हमारा अनुभव ही सब कुछ सिखाने लगता है ---जैसे कि मैं पिछले 25 सालों से दांत के एबसैस के लिये केवल और केवल शायद 99 प्रतिशत केसों में कैप्सूल अमोक्सीसिलिन और साथ में सूजन और दर्द के लिये आइबूब्रूफन और पैरासिटामोल ही लिखता हूं और मेरे 95 प्रतिशत मरीज़ों की पस इसी से सूखती है और मैं आगे उन का इलाज कर पाता हूं ----अब इन पच्चीस सालों में इतने हायर ऐंटीबायोटिक्स आये, इतने नये नये दर्द निवारक टेबलेट और सूजन को कम करने वाले साल्ट आये लेकिन मैंने कभी इन को आज़माने का ज़रूरत इसलिये नहीं समझी क्योंकि मैं अपनी दोनों दवाईयों से बेहद संतुष्ट हूं ---मरीज ठीक होते हैं और साइड-इफैक्ट्स भी बेहद कम !!

हां, तो इस लेख से मिलने वाली शिक्षा की बात हो रही थी ----वह यही है कि कभी भी यह मत सोचा करें कि नईं दवाईयां हैं तो वे पुरानी तकलीफ़ों के लिये वरदान हैं-----हो सकता है कि ऐसा न हो, कंपनियों ने तो अपना राग अलापना ही है लेकिन जैसा कि हमने ऊपर लेख में देखा कि कुछ नईं दवाईयां अभी केवल हज़ारों या लाखों लोगों ने ही इस्तेमाल की होती हैं , इसलिये इन की सेफ्टी प्रोफाइल इतनी क्लियर नहीं हो पाती। इसलिये ज़रा बच कर चलने में ही बचाव है।

अगर आप का ब्लड-प्रैशर किसी ऐसी टेबलेट से कंट्रोल में है जो कि आप बीस साल से ले रहे हैं या आप की शूगर किसी बहुत पुरानी दवा से कंट्रोल में है तो ठीक है , तो नईं नईं दवाईयों के चक्कर में क्या पडना। हां, कईं बार कुछ मैडीकल कारण हो सकते हैं आप की पुरानी दवा को चेंज करके या उस के साथ साथ कोई नया साल्ट शुरू करने के---लेकिन अच्छे मरीज़ की तरह कृपया आप कभी भी अपने चिकित्सक को किसी नईं दवा का नाम लेकर यह मत कहें कि क्या वह मेरे लिये ठीक रहेगी -----इस से डाक्टरों को बड़ी चिड़ मचती है ---- तो, जब अपने आप को चिकित्सक को सौंप ही दिया तो वह वही करेगा जो हमारे हित में होगा।

Sunday, October 26, 2008

कितना उचित है बार बार टैटनस का टीका लगवाना !

कोई भी छोटी-मोटी चोट लगने पर बाज़ार से टैटनेस का टीका खरीदकर लगवा लेना लोगों के लिये एक आम सी बात हो सकती है, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है। बार-बार टीके लगवाने से कुछ साइड-इफैक्ट्स भी हो सकते हैं और प्रतिरोधक क्षमता में कमी आने की संभावना रहती है।

टैटनस से बचाव के टीके दो प्रकार के आते हैं- टेटनेस टाक्साइड (टी टी) का टीका लगवाने पर हमारा शरीर टेटनस से बचाव की प्रतिरोधक क्षमता स्वयं उत्पन्न करता है जिसमें थोड़ा समय लगता है जबकि टेटनस इम्यूनोग्लोबुलिन (टीआई जी) द्वारा यह प्रतिरोधक क्षमता हम रेडीमेड रूप से ही मरीज़ के शरीर में पहुंचाते हैं। सामान्यतः हम टेटनेस के जिस टीके की बात करते हैं, वह टी टी की ही बात है।

जिस किसी भी व्यक्ति को सामान्य टीकाकरण के दौरान टेटनेस की सभी खुराकें दी जा चुकी हैं, उसे पांच से दस साल तक टेटनेस से सुरक्षा मिल जाती है। इसलिये आमतौर पर दस साल से पहले टेटनेस का टीका लेने की ज़रूरत नहीं रह जाती है। अगर किसी व्यक्ति का घाव गहरा हो, जलने या सड़क दुर्घटना में चोट लगने से घाव हुआ हो, तो उसे टी टी का टीका लगवा ही लेना चाहिये। अगर किसी को यह न मालूम हो कि उसे कब टेटनेस का टीका लगा था , तो उसे गहरा घाव होने पर भी टीका लगवा लेना चाहिये।

टी आई जी का टीका चिकित्सक के परामर्श के बाद ही लगवाना चाहिये।

Friday, October 10, 2008

कुछ बातें सेहत की ..

मुझे आज ही पता चला कि अमेरिका में लोग जितना पैसा अपने खाने पर खर्च करते हैं, उस का 95फीसदी हिस्सा वे प्रोसैसड फूड पर खर्च करते हैं। यह जानना मेरे लिये एक शॉक से कम न था। साथ ही में यह लिखा हुआ देख कर यह हैरत न हुई कि इसी की वजह से वहां पर आज की पीढ़ी पिछली पीढ़ी से कम जीती है।

परसों अमेरिका की सरकार की शारीरिक कसरत करने के बारे में सिफारिशें देखने का मौका मिला। उन की सिफारिश है कि हर व्यक्ति को हफ्ते में अढ़ाई घंटे शारीरिक परिश्रम करना चाहिये - रोजाना आधा घंटे, हफ्ते में पांच दिन और बच्चों के लिये कहा गया है कि उन का रोज़ाना एक घंटे अच्छी तरह से खेलना-कूदना निहायत ही ज़रूरी है। इसलिये अब बच्चों को भी टीवी या कंप्यूटर से जबरदस्ती उठा कर बाहर खेलने के लिये कहना होगा।

आपने सुना है न कि कईं बार बिलकुल छोटे बच्चे की सोते सोते ही मौत हो जाती है --इसे Sudden Infant Death Syndrome कहते हैं । वैज्ञानिकों ने इस की स्टडी करने के बाद पाया है कि अगर बच्चा किसी हवादार कमरे में सोया हुया है और जिस में मौसम के अनुसार पंखा चल रहा है तो इन छोटे नन्हे-मुन्नों को काफी हद तक अकाल मृत्यु का ग्रास बनने से बचाया जा सकता है। और साथ में यह भी बताया गया है कि बिल्कुल छोटे बच्चों को पेट के बल या साइड पोज़ में नहीं सुलाना चाहिये ----उन्हें पीठ के बल सुलाना चाहिये अर्थात् उन का मुंह छत की तऱफ़ होना चाहिये ( supine position) ---और न ही उन के मुंह को ढांप कर रखना चाहिये। होता क्या है कि इस Sudden Infant Death syndrome में बच्चा पेट के बल सोया पड़ा है, कमरे में हवा पूरी है नहीं, वैटीलेशन है नहीं तो ऐसे में उस के मुंह के पास बहुत मात्रा में कार्बन-डाई-आक्साईड गैसे जमा हो जाती है और जिसे बच्चे द्वारा इस्तेमाल किया जाने लगता है जो ऐसे अनहोनी का सबब बन जाती है जिस से बचा जा सकता था।

बच्चों के अनीमिया के बारे में पिछली पोस्ट मैंने लिखी थी। लेकिन क्या केवल आयरन फोलिक एसिड की गोलियां खा कर ही ठीक हो जायेगा अनीमिया ---- बच्चों में अनीमिया ठीक करने के लिये हमें उस की डि-वर्मिंग ( de-worming) भी करनी होगी ---अर्थात् उसे डाक्टरी सलाह के अनुसार पेट के कीड़े मारने की दवा भी देनी होगी। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने देखा है कि जिन बच्चों में कीड़े नहीं होते उन में वैक्टीनेशन के परिणाम दूसरे बच्चों की बजाए बेहतर होते हैं ।और यह तो हम जानते ही हैं कि पेट में कीड़े बच्चे के अनीमिया को कैसे ठीक होने देंगे !!

डि-वर्मिंग के साथ-साथ हमें बच्चे को विटामिन-ए सप्लीमैंटेशन देना भी बेहद ज़रूरी है ....बच्चों को विटामिन -ए सप्लीमैंटेशन देने का भी अपना एक शैड्यूल है । ठीक है, अगर आपने नहीं दिया तो आज ही बाल-रोग विशेषज्ञ से बात करें और उसे विटामिन-ए सप्लीमैंट्स दें। यह उस के शरीर में विटामिन ए का रिज़र्व स्टाक तैयार करने के लिये एवं उस के नार्मल विकास के लिये बेहद ज़रूरी है। देश में तो कुछ बच्चों में रतौंधी रोग ( रात में दिखाई न देना) होने का कारण ही यह विटामिन ए की घोर कमी होती है। वैसे भी बच्चे आज कल जो खा-पी रहे हैं और जो खा भी रहे हैं वह कितना शुद्ध है, कितना मिलावटी -----तो इस हालात में तो बच्चों को ये सप्लीमैंट्स देने बहुत ही ज़रूरी हैं।


अभी मैं जब कीडे़ मारने के दवा का ज़िक्र कर रहा था तो मुझे आज सुबह के पेपर में पढ़ी एक बेहद दुःखद घटना का ध्यान आ गया ....चूहे मारने की दवा तो आप को पता ही है कि कितनी आसानी से मिल जाती है । तो बंबई की एक इमारत में एक परिवार जो कि ग्राउंड फ्लोर पर रहता था वह चूहों से बेहद परेशान था। इसलिये ब्रेड पर अकसर चूहे मारने वाली दवाई लगा कर किचन में रख देते थे। एक दो पहले भी यही हुआ । लेकिन अचानक उन का प्लस दो कक्षा में पढ़ रहा बेटा बाहर से आया जिसे बहुत भूख लगी हुई थी और जिस ने तुरंत वह ब्रेड-पीस खा लिया। उसे तुरंत उल्टियां शुरू हो गईं और हस्पताल पहुंचने तक बेचारे की मौत हो गई। बेहद दुःखद समाचार।

मैंने देखा है कि अकसर लोग ऐसे काम रात को सोने से पहले करते हैं ---और घर में सब को थोड़ा पहले से बता कर रखते हैं। लेकिन लगता है कि वो जो पहले रैट-ट्रैप हुया करते थे ....वे भी ठीक ही थे ....वो बात अलग है कि चूहा अब आप की रसोई में ना रह कर चार बिल्डिंग दूर किसी दूसरे के सिर का दर्द बनेगा। लेकिन मुझे याद है कि जब हम छोटे थे तो किसी रैट-ट्रैप में पकड़े चूहे को साईकिल पर सवार हो कर किसी दूर जगह छोड़ने जाने का काम भी अच्छा खासा रोमांचक हुआ करता था। साथ में कुछ यार-दोस्त मिल कर इस काम को और भी रोमांचक बना दिया करते थे। और उस रैट-ट्रैप की यही खासियत हुआ करती थी कि उस में चूहा मरता नहीं था, केवल उस के अंदर बंद हो जाया करता था जिसे इस मौह्लले वाले उस मौहल्ले में और उस मौह्लले वाले इस मौह्लले की नाली या थोडी़ खाली पड़ी जगह में छोड़ कर बिना वजह निश्चिंत से हो लिया करते थे ....चाहे आज सोचूं तो इस निश्चिंता की कोई खास वजह तो जान पड़ती नहीं ...क्यों कि चूहों की गिनती तो उतनी की उतनी ही रही। वैसे एक बात है कि अगर गल्ती से (?) या जान-बूझ कर चूहा उस रैट-ट्रैप से रिहा कर अपने ही गली-मोह्लले के किसी घर में घुस जाता था तो लड़ने-लड़ाने की नौबत आती भी देखी है।

उस के बाद आये ऐसे रैट-ट्रैप जिस जो देखने में तो छोटे थे ....लेकिन थे बहुत नृशंस ....यानि कि चूहा उन के अंदर कैद तो हो ही जाता था और साथ में एक कील उस के शरीर में घुस जाया करता था जिस की वजह से उस की मौत हो जाया करती थी और लोग किसी तरह का चांस न लेने की मंशा से आटे की गोली के साथ रैट-प्वाईज़न तो लगा ही देते थे । और फिर उस मृत प्राणी को घर के बाहर की नाली में फैंक दिया जाता था। सोच रहा हूं कि समय के साथ साथ हम लोग भी कितने क्रूर हो गये हैं।

लेकिन जो भी हो, जब बंबई जैसा हादसा ,जैसा उस 17 साल के लड़के के साथ हुआ, कभी कभार हो जाता है तो इतना दुःख होता है कि ब्यां नहीं किया जा सकता। लेकिन ये हादसे ........पंजाब में तीन-चार पहले हुये एक हादसे की याद हरी हो गई। एक मजदूर के पांच-छः छोटे छोटे बच्चे अपनी मां के साथ मस्ती करने में मशगूल थे और वह खाना बना रही थी। इतने में उसे चंद लम्हों के लिये कमरे से बाहर जाना पड़ा ---बच्चों को मस्ती सूझी, बड़ा ट्रंक साथ ही खुला पड़ा हुया था...वे सारे के सारे --एक को छोड़ कर जो इतना छोटा था कि अंदर नहीं जा सकता था ...उस ट्रंक के अंदर घुस गये और तभी अचानक ट्रंक का दरवाजा हो गया बंद और उन के वह खुल नहीं पाया। मां अंदर आई..बच्चों को ढूंढने लगी ...लेकिन जब तक वह कुछ समझ पाई बहुत देर हो चुकी थी और सभी बच्चों का दम घुट चुका था ।

ऐसे दर्दनाक हादसे हमें चीख-चीख कर, छाती पीट पीट कर कुछ सोचने के लिये मजबूर करते हैं ।

Sunday, August 17, 2008

कितने सारी बातें तो वही पुरानी ही हैं ?

I have written this post in English and later on using quillpad have arrived at this form. I think it is Hindi and Bhojpuri and Bangla mixed !!........
आज में खाली बैठा यही सोच रहा था की हम सब लोग चिकित्सा क्षेत्रा में हो रही नयी नयी खोजों को जानने के लिए तो बहुत बेताब रहते हैं लेकिन सोचने वाली बात यह भी है की क्या जिन बातों का हमें पहले से पता है क्या हम उन को मान भी रहें है ?

अब सीधी सीधी बात करते हैं ….क्या आप को लगता है की जितनी बातें हम लोगों को अपने खाने पीने के बारे में पता हैं ….क्या हम उन को अपनी ज़िंदगी में उतार पाए हैं. हमें अपने आप से ही इस का जवाब पुकछना होगा. हमें पता है की चीनी हमारे लिए इतनी खराब है…..फिर भी क्या हम चीनी खाने से चूकते हैं क्या !!

हमें पता है की रेग्युलर शारीरिक परिश्रम करना हम लोगों के लिए बहुत ही ज़रूरी है तो क्या हम लोग यह सब करते हैं क्या.?

हमें पता है की हमारे पानी में घड़बड़ है…तो फिर भी हम लोग क्यों बार बार अपने सिस्टम को टेस्ट करते हैं. मैं एक डॉक्टर हून…….जितनी बार भी बाहर गया हून, हमेशा पेट खराब ही हुआ है…..कहीं भी …चाहे दो दिन के लिए ही गया हून, लेकिन पेट खराब होने की सौघट साथ ही लेकर आया हून.
अब इस के बारे में मेरे कुत्छ भाई कहेंगे की तुम अक़ुआगुआर्द का हमेशा पानी पीट हो….इस लिए इम्यूनिटी कमज़ोर पद जाता होगा बाहर जेया कर. इस लिए कई लोग सोचते हैं की तोड़ा तोड़ा ऐसे ही पानी कहीं से भी ( होटेल, पार्टी एट्सेटरा) पे लेना ही चाहिए……इस से इम्यूनिटी ठीक रहती है.
कुत्छ साल पहले तक तो भाई मैं भी कुत्छ ऐसा ही सोचता था……लेकिन अब मेरी सोच में बदलाव आ गया है………नहीं, यह कोई वैज्ञानिक समाधान नहीं है की हम लोग सब जानते हुआी भी अपनी इम्यूनिटी को टेस्ट करें.

पानी की ही बात लीजिए…….उस की वैज्ञानिक टेस्टिंग की तो बात क्या करें…..हमें बहुत बार पता भी होता है की जो पानी हमारे सामने जुग में पड़ा हुआ है उस का रंग सॉफ नहीं है अर्थात हू क्लियर नहीं है लेकिन फिर भी हम लोग विभिं कारणों की वजह से उस झट से पी कर आफ़त मोल ले लेते हैं.
लेकिन, एक समस्या दूसरी भी तो है ना……हर आदमी के बस की क्या बात है की हू बाहर जाने पर केवल बॉटल का ही पानी पीया करे……..नहीं ना, तो फिर इस का क्या समाधान है ? मैं कल बेज़ार में घूम रहा था बरोडा में तो मेने देखा की एक फुटपॅत पर एक मेज पर रखी एक एक रुपी की थैलियाँ बिक रहीं थी…………..देख कर, बहुत अजीब सो लगा………यही लगा की अब शायद अपनी मया की अंगुली पकड़ कर बेज़ार में आया हुआ बूतचा यह कहेगा की मया, सॉफ पानी की एक थैली दिला दो ना !!!

बस में बात केवल इतनी ही कहना चाह रहा हून की हमें पता है की पानी अगर सॉफ नहीं हा तो यह हमारे लिए ठीक नहीं है ……लेकिन फिर भी हम लोग ऐसे पानी को पे कर कितने ही बार वोही पेट ही बीमारिओं को खुला न्योता देने से कहाँ पेरहेज़ करते हैं?
ऐसी बहुत सारी बाते हैं जिन्हे हम लोग बहुत लाइट्ली ले लेते हैं.
इस लिए हमें छ्होटी छ्होटी बातों का भी बहुत ख़याल रखना चाहिए…..
कितने सारी बातें तो वही पुरानी ही हैं ?
( Document created using Quillpad on 17th Aug, 2008)

Thursday, April 24, 2008

डिस्पोज़ेबल सिरिंजों एवं सूईंयों के बारे में इसे जरूर पढ़ें...

दो-चार दिन पहले मैं जब एक पारिवारिक समारोह में जयपुर गया हुया था तो वहां मुझे अपने मामा को टैटनस का टीका लगाना था। टीका लगाने के बाद मेरी वही उलझन कि उस डिस्पोज़ेबल सिरिंज एवं सूईं को कहां फैंकूं.....यानि कि इन डिस्पोज़ेबल्स को कैसे डिस्पोज़ ऑफ करूं!!....खैर, आप अगर मेरी जगह होते तो क्या करते ?....शायद आप दिमाग पर इतना ज़्यादा ज़ोर दिये बिना उस सूईं पर टोपी लगाकर किसी कूड़ेदान में फैंक देते। लेकिन मैं एक डाक्टर होने के नाते ऐसा न कर सका !
मैंने उस दिन भी वही किया जो मुझे थोड़ा सा ठीक लगा ( पूरा ठीक तो यह भी नहीं था ! )….मैं कुछ समय बाद बाज़ार जाते समय उस सिरिंज एवं नीडल को साथ ले गया और घर के पास ही एक कैमिस्ट की दुकान के सामने जहां इस तरह का कूड़ा पड़ा हुया था वहां मैंने इसे भी फैंक कर थोड़ी राहत महसूस की। वहां फैंकने का कारण यही था कि वहां से जो भी रैगुरर्ली इस तरह का कचरा उठाता होगा, वह तो सावधानी पूर्वक ही यह सब करता होगा। लेकिन गहराई से सोचता हूं तो यही पाता हूं कि यह सब एक खुशफहमी ही है......कहां ये सफाई वाले इतनी बातों का ध्यान रख पाते होंगे.....इन में कहां इतनी अवेयरनैस कि ये सब समझ पाते होंगे।
मैं अकसर सोचता हूं कि हम मैडीकल प्रोफैशन वाले अकसर मीडिया में ढींगे तो बहुत लंबी लंबी मारते हैं कि हम ने लिवर ट्रांस्पलांट कर दिया, रक्त की नाड़ी की रुकावट समाप्त कर दी..........लेकिन अकसर हम छोटी-छोटी बातों के ( जो वास्तव में बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं) बारे में लोगों की जागरुकता का स्तर बढ़ा नहीं पाये......इस के कारण तो बहुत से हैं....लेकिन एक उदाहरण यह ही लीजिये......कि बड़े हस्पतालों में तो बॉयोमैडीकल वेस्ट मैनेजमेंट के बड़े लंबे चोड़े कानून तैयार हो गये....अब इन पर कितना चला जा रहा है, यह एक अलग मुद्दा है.......लेकिन घर में एक डिस्पोज़ेबल सीरिंज एवं सूईं का डिस्पोज़ल ही एक सिरदर्दी बन जाता है....हां, हां, सिरदर्दी उस के लिये जो सोचते हैं.....अन्यथा, कूड़ेदान में फैंक कर ही फारिग !!
अब जब हम तो इस नीडल-सीरिंज को कूड़ेदान में फैंक कर फारिग हो लिये लेकिन सब से पहले तो इस से हमारे यहां काम करने वाले सफाई कर्मचारी को यह चुभेगी.....फिर जहां पर बाहर बड़े डस्ट-बिन में इसे फैंका जायेगा ....वहां से भी इसे उठाते हुये कोई न कोई इस से चोट खायेगा......फिर आगे चल कर जहां पर सारे शहर का कूड़ा डाला जाता है वहां पर ये सूईंयां रैग-पिकर्जं की सेहत के साथ खिलवाड़ करेंगी। उस के बाद इन का क्या अंजाम होता है .....अब उस के बारे में क्या लिखूं...इन सीरिंजों एवं सूईंयों की रीसाईक्लिंग की खबरें अकसर चैनलों वाले दिखाते ही रहते हैं जहां पर एक टब में इस तरह डिस्पोज़ेबल मैडीकल वस्तुयें एक बड़े से टब में उबलती हुई दिखाई जाती हैं ...जिस के बाद इन्हें पैक कर के वापिस मार्कीट में बेचा जाता है....यह तो हुई इस रीसाईक्लिंग के गोरख-धंधे की बातें।
इसी तरह की क्रॉस-इंफैक्शन पर लगाम कसने के लिये ही और इस तरह की लोगों की सेहत को बर्बाद करने वाली री-साईक्लिंग को रोकने के लिये ही हर एक अच्छे क्लीनिक, दवाखाने या ओपीडी में जहां भी इंजैक्शन लगते हैं उन के पास एक नीडल एंड सिरिंज कटर होता ही है या होना ही चाहिये....ऐसे ही एक नीडल कटर एवं सिरिंज कटर की तस्वीर आप यहां देख रहे हैं।
इस तस्वीरों में आप देखिये कि एक इस्तेमाल की गई सूईं को नीडल-बर्नर में डाल कर जलाया जा रहा है और अंत में वह नीडल पूरी तरह जल जाती है जिस की आप तस्वीर भी आप यहां पर देख रहे हैं।
यह तो हो गया इस्तेमाल की गई नीडल का काम तमाम, अब बारी आती है सिरिंज की.......ध्यान रहे कि इन सीरिंजों की भी बहुत ज़्यादा री-साईक्लिंग होती है । ऐसे में हम लोग इसी मशीन के द्वारा ही इस सिरिंज की नोज़ल ही काट देते हैं.............कितनी बढ़िया बात है ना कि ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी। इस सिरिंज की नोज़ल कटने की तस्वीरें भी आप इधर देख सकते हैं।
अब, आप शायद यह सोच रहे होंगे कि बस यह सब करके काम खत्म हो गया। नहीं, फिर इस तरह के इकट्ठे हुये प्लास्टिक को डिस्पोज़ ऑफ करना होता है। या तो इस तरह के प्लास्टिक को एक हाट-एयर ओवन में डाल कर कुछ इस तरह से पिघला सा दिया जाता है कि यह एक प्लास्टिक का छोटा मोटा गोला सा ही बन जाता है ...फिर इसे या तो हास्पीटल के आस पास खुदे किसी गड्ढे में डाल दिया जाता है या बड़े-बड़े हास्पीटलों में इंसीनेरेटर में इसे डाल कर राख बना दिया जाता है। यह तो मैंने सिर्फ़ सीरिंज और नीडल की ही बात की है ....पर अस्पतालों में तो रोज़ाना ही सैंकड़ो तरह के इस तरह के डिस्पोज़ेबल्ज़ इस्तेमाल होते हैं......अब आप भी सोचिये कि इन का सेफ़- डिस्पोज़ेबल कितना बड़ा चैलेंज है।
अब आप का यह सोचना भी मुनासिब है कि इतना सारा मैडीकल ज्ञान आखिर हमें क्यों परोसा जा रहा है। इस का केवल इतना उद्देश्य है कि एक तो आप को इस बॉयो-मैडीकल वेस्ट मैनेजमैंट के दहकते मुद्दे के बारे में सैंसेटाइज़ किया जा सके और दूसरा जब हम लोग घर में सीरिंज और सूईं इस्तेमाल करते हैं तो उस के डिस्पोज़ल के बारे में भी सोचें। अब आप स्वयं ही बतायेंगे कि आप क्या सोचते हैं कि आप इस इस्तेमाल की हुई सूईं को कैसे डिस्पोज़ ऑफ कर सकते हैं....हां, हां, मैं आप की इस बात से सहमत हूं कि अब घर में कभी-कभार इस्तेमाल होने वाली सिरिंजो-सूईंयों के लिये हम तो नहीं इस नीडल-सिरिंज कटर को खरीद सकते !!!......तो फिर आप भी कोई रास्ता निकालिये और मुझ से भी साझा करिये। वैसे, प्लास्टिक सिरिंज के बारे में मैं इतना कहना चाहूंगा कि अब कुछ हास्पीटलों में इस की जगह कांच की सिरिंजें इस्तेमाल हो रही हैं जिन्हें अगली बार इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह स्टैरीलाइज़ कर लिया जाता है। कम से कम इन सीरिंजों के कारण इक्ट्ठा हो रहे प्लास्टिक के ढ़ेरों पर तो अंकुश लगेगा ........और इन की री-साईक्लिंग के दुष्परिणामों से भी जनता बची रहेगी।
मैंने इस विषय पर इतना लंबा चौड़ा इसलिये भी लिख दिया है कि अकसर घरों में कभी कभार सिरिंजे-सूईंयां दिख ही जाती हैं......चाहे तो किसी को कोई टीका वगैरह लगना हो या किसी का कोई ब्लड-सैंपल लेने के लिये ही........और हां, एक बहुत ही ज़रूरी बात का यह तो खास ध्यान रखें कि इस्तेमाल की गई सूईं पर उस की टोपी चढ़ाने से गुरेज करें( जैसा कि आप इस तस्वीर में देख रहे हैं) ......क्योंकि मैडीकल सैटिंग्स में देखा गया है कि चिकित्साकर्मीयों को ज़्यादातर इन सूईंयों से नीडल-प्रिक इंजरी इन को वापिस कैप चढ़ाते समय ही होती हैं। और अभी एक बात का ध्यान आ रहा है कि जब किसी चिकित्सा कर्मी को किसी मरीज़ पर इस्तेमाल की गई सूईं अचानक चुभ जाती है तो वह उस चिकित्सा कर्मी एवं उस के परिवार की ज़िंदगी में किस तरह से खलबली मचा देती है.....इस का खुलासा कभी मूड में हुया तो करूंगा...जिस से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। मैंने तो एक राष्ट्रीय संस्था के साथ भी ये बेहद खौफ़नाक अनुभव बांटने चाहे थे ताकि सभी तरह के चिकित्साकर्मी इस से कुछ सीख ले सकें...........लेकिन उन्होंने कोई खास रूचि नहीं दिखाई........अब किसी के पीछे पड़ने वाले तो हम भी नहीं.......लेकिन ये सारे अनुभव किसी न किसी प्लेटफार्म पर साझे जरूर करने हैं.....देखते हैं ये सब कुछ कब संभव हो पाता है।
मैं भी कहां का कहां पहुंच गया.....और जाते जाते एक बात यह भी करनी है कि अब डिमांड कर के इंजैक्शन लगवाने वाले दिन लद गये हैं......ऐसी डिमांड कभी नहीं करनी चाहिये। और हां, मेरे मामा के टैटनस के टीके वाली बात तो कहीं पीछे ही छूट गई.........क्योंकि यह जो हर छोटी-मोटी चोट के बाद टैटनस का टीका लगवाने का एक क्रेज़ सा है......यह भी कितनी उचित है , कितना अनुचित.........इस की चर्चा भी शीघ्र ही करूंगा।
जाते जाते यह भी ज़रूर कहना चाहूंगा कि जब भी कभी डिस्पोज़ेबल सिरिंज एवं नीडल की ज़रूरत पड़े तो बढ़िया क्वालिटी की ही सिरिंज एवं नीडल खरीदें.......पहले मैं सोचता था कि इस का नाम मुझे नहीं लेना चाहिये....लेकिन अब लगने लगा है कि अगर मैं किसी आइटम को ज़रूरत पड़ने पर अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिये इस्तेमाल कर रहा हूं और उस स संतुष्ट हूं तो इस को आखिर आप लोगों के साथ शेयर करने में दिक्कत क्या है.........ओबवियस्ली कोई नहीं.....तो, फिर मैं आप को यह बताना चाहता हूं कि मैं कभी भी अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिये DISPOVAN नामक सीरिंजों एवं सूईंयों का ही इस्तेमाल करता हूं......और भी बहुत ही अच्छी कंपनियां होंगी, लेकिन मैं तो इस प्रोडक्ट को ही इस्तेमाल करता हूं और मेरा इस में पूर्ण विश्वास है। मुझे यह लगने लग गया है कि मैंने क्या लेना देना है इन कंपनियों से .....जो भी मेरे अनुभव हैं मुझे बिल्कुल बेपरवाह होकर पूरी इमानदारी से आप से बांटने चाहिये क्योंकि आप लोग अकसर मेरी बातों को बहुत सीरियस्ली लेते हो............Thank you, so very much !!

Wednesday, March 19, 2008

अब इस कंबल के बारे में भी सोचना पड़ेगा क्या !




बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम अकसर जाने-अनजाने नज़रअंदाज़ कर ही देते हैं...आज कुछ ऐसी ही बातों की चर्चा करते हैं। मुझे किसी के भी यहां जाकर कंबल ओढ़ना कभी नहीं भाता। अब आप भी सोच रहे होंगे कि यह कौन सी नई सनक सवार हो गई भला !!....जी नहीं, यह कोई सनक-वनक नहीं है। आज कल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह एक अच्छा खासा मुद्दा है।
मुझे किसी के यहां जाकर और यहां तक अपने ही घर में कंबल ओढ़ने में बहुत संकोच होता है। आप इस का कारण समझ ही रहे होंगे !....इस का कारण केवल यही है कि अकसर हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले ये कंबल वगैरा विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं की खान होते हैं।
वह पल बहुत अजीब लगता है जब कभी घरों में इस तरह की बातें चलती हैं कि ये कंबल देख रहे हो, जब मुन्ने के पापा ने नई नई इंटर पास की थी...तब खरीदा था...और आज भी देख लो, वैसा का वैसा ही लगता है। लेकिन लगता ही है ना, लगने का क्या है........जो इस ने अरबों-खरबों कीटाणुओं को अपने अंदर छिपाया हुया है , उस का उल्लेख कौन करेगा ?.....जी हां, हमारे घरों में इस्तेमाल हो रहे कंबल कुछ इसी तरह के ही होते हैं। इन को ड्राई-क्लीन करवाने का कोई कल्चर न तो हमारे देश में कभी रहा और मेरे ख्याल में कभी हो ही नहीं पायेगा। वैसे बात वह भी तो है कि जब दो-साल में एक गर्म-सूट ड्राई-क्लीन करवाने में ही आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं, तो क्या अब हम कंबलों को ड्राई-क्लीन करवाने के सपने कैसे देखें ?....बात बिल्कुल सही भी है...वैसे हम लोगों के कपड़े खरीदते समय निर्णय भी तो कईं बार इस बार पर ही निर्भर करते हैं कि भई, कहीं इस को ड्राई-क्लीन करवाने की ज़रूरत तो नहीं ना पड़ेगी।

खैर बात कंबल की चल रही थी......और वैसे भी हम अपने घरों में देखते हैं कि इन कंबलों का तो बंटवारा कहां होता है कि यह पपू का है , यह टीटू वाला है....। और यहां तक मेहमान वगैरा भी वही कंबल इस्तेमाल करते हैं। और जब कभी किसी की तबीयत थोड़ी नासाज़ हो, कोई खांसी-जुकाम से बेज़ार हो ..... तो यही कंबल पसीने से लथ-पथ होते हैं। और फिर अगले दिन वही कंबल दूसरे सदस्य द्वारा ओढ़ा जाता है। संक्षेप में बात करें तो यही है कि इस प्रकार से कंबलों का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिये ठीक नहीं है।
तो क्या करें अब कंबल लेना भी बंद कर दें ?....नहीं, नहीं ,ऐसी बात नहीं है। लेकिन पहले लोग जो कंबल के ऊपर सूती कवर डाल कर रखते थे, यह बहुत ही बढ़िया आइडिया है क्योंकि इन्हें थोड़े थोड़े समय के बाद धो दिया जाता था ताकि अंदर कंबल काफी हद तक साफ़-स्वच्छ रह सके। और फिर कंबल को नियमित तौर पर धूप में सेंका भी जाता था ..ताकि उसे कीटाणुरहित किया जा सके। इसलिये हमें इन सूती कवरों को वापिस इन कंबलों पर लगाना चाहिये। नहीं तो इन महंगे ग्लैमरस कंबलों बिना किसी प्रकार के कवर के बीमारियों की खान बना डालें ...,यह फैसला हमारे अपने हाथ में ही है।
आज कल जो नये नये मैटीरियल के कंबल बाज़ारों में दिखने लग गये हैं ...कहने को तो कह देते हैं कि वे धोये जा सकते हैं । लेकिन हम लोग अकसर प्रैक्टिस में देखते हैं कि कौन इन्हें नियमित धोने के चक्कर में पड़ता है। वैसे मुझे याद आ रहा है कि एक बार एक ऐसे ही कंबल को धोने के बाद मैंने भी उसे बाहर बरामदे में सुखाने के लिये बाहर घसीटने में थोड़ी मदद की थी........यकीन मानिये , नानी याद आ गई थी। कहने से भाव है कि मान भी लिया जाये कि यह धोये जा सकते हैं लेकिन यह आइडिया कुछ ज़्यादा प्रैक्टीकल नहीं है....हां, अगर कहीं ये नियमित धुलते हैं तो बहुत बढ़िया बात है।
लेकिन जहां भी संभव हो, इन कंबलों को सूती कवह डले ही होने चाहियें क्योंकि इन में जमा धूल-मिट्टी-जीवाणु भी तरह तरह की एलर्जी बढ़ाने में पूरी भूमिका निभाते हैं। लेकिन लोग तो अकसर एलर्जी के लिये उत्तरदायी एलेर्जन ढूंढने की अकसर नाकामयाब कोशिश करते हैं लेकिन अपने आसपास ही इस तरह के एलर्जैन्ज़ की तरफ़ ज़्यादा ध्यान ही नहीं देते। तो, आगे से ध्यान दीजियेगा।
यह तो हुई कंबलों की बात, लेकिन परदों का भी कुछ ऐसा ही हाल होता है। अकसर इन्हें तब तक धोया नहीं जाता जब तक इन्हें देखते ही उल्टी करने जैसा न होने लगे। ये भी कईं कईं महीनों तक गंदगी समेटे रहते हैं...। वैसे तो हर घर में ही ..लेकिन जिन घरों में एलर्जी के केस हैं, सांस में तकलीफ़ के मरीज़ हैं, दमा के मरीज़ हैं....उन के लिये तो ये सावधानियां शायद दवाई से भी बढ़ कर हैं। लेकिन हमारी समस्या यही है कि हमें परदे तो चाहिये हीं, लेकिन साथ में हमारी सम्पन्नता का दिखावा भी तो होना चाहिये। इसी चक्कर में इतने भारी भारी परदे शो-पीस के तौर पर टांग दिये जाते हैं कि न तो उन्हें नियमित धोते बने और न ही उतारते बने। अकसर इन्हें धोने के नाम पर कईं बार तो बाई ही काम छोड़ कर भाग जाये !!...आखिर हमें सीधे-सादे हल्के फुल्के ऐसे परदे टांगने में दिक्कत क्या है जिन्हें हम नियमित धुलवा तो सकें।
लेकिन यह बात परदों तक ही तो सीमित नहीं है ना.....आज कल हम लोगों के घर में सोफे सैट देख लो। इन को भी देख कर उल्टी आती है। ये भी अपने अंदर इतनी गंदगी समेटे होते हैं कि क्या कहें !!.....कारण वही कि सब कुछ ..सीट कवर, कुशन वगैरा के ऊपर महंगे महंगे कपड़ों के कवर फिक्स हुया करते हैं..........और पता नहीं इन के ऊपर कितने लोगों का पसीना लगा रहता है, कितने छोटे छोटे बच्चों ने इन्हें कितनी ही बार पवित्र किया होता है( समझ गये ना आप!)…, कितनी बार इन के ऊपर खाने पीने की चीज़े गिर चुकी होती हैं, कितनी बार बच्चे गंदे पैरों से इन के ऊपर उछलते रहते हैं........लेकिन इन के कवर चेंज करने का झंझट भला कौन बार बार ले सकता है .....भई खूब पैसा लगता है.....ऐसे में सालों तक ये गंदगी से भरे रहते हैं। एक दूसरी समस्या इन सोफा-सेटों के साथ यह भी तो है ना कि ये सब इतने भीमकाय होते हैं कि इन के रहते ठीक तरह से कमरे की सामान्य सफाई भी तो नहीं हो पाती ।
अकसर मेरी आब्जर्वेशन है कि लोगों को इन बातों की खास फिक्र है नहीं, उन्हें तो बस अपनी बैठक को चकाचक रखने में ही मज़ा आता है। इसीलिये कईं घरों में तो बच्चों को डराया जाता है कि खबरदार, अगर तुम सोफे की तरफ भी गये, पता है जब कोई आ जाता है तो कितनी शर्म आ जाती है। मेरा इस के बारे में विचार एकदम क्रांतिकारी है ...............शायद बहुत से लोगों को न पच पाये............मेरा विचार है कि घर आप का है, आप के रहने के लिये, बच्चों के लिये ताकि वे पूरी मस्ती कर सकें..............मज़ा कर सकें ताकि बड़े हो कर उन के पास अनगिनत मीठी यादें हों...........इसलिये घरों में सीधे-सादे फ्रेम वाले सोफे हों, कुर्सियां हों जिन के ऊपर कपड़े के इस तरह के कवर हों कि उन्हें आसानी से धुलाया जा सके। इस से एक तो आपका ड्राइंग-रूम साफ-स्वच्छ दिखेगा....दिखेगा ही नहीं , होगा भी.....और बच्चे भी खुश रह कर बिना किसी रोक टोक के जहां मरजी मस्ती कर सकते हैं, ऊधम मचा सकते हैं। और रही बात मेहमानों की , वे ना ही तो महंगे परदे और न ही महंगे, भारी भरकम सोफे देखने आ रहे हैं और न ही एक काजू और दो किशमिश के दाने खाने के लिये......अतिथि के लिये हमारा सत्कार हमारी आंखों से झलकता है.....उसे चाहे हम चटाई पर बैठा कर सादा पानी ही पिला दें....वो हमारी आंखों को पढ़ता है कि उस का स्वागत हुया है या नहीं।
पता नहीं ...मैं भी कहां का कहां निकल जाता हूं...मेरा बेटा वैसे मुझे अकसर चेतावनी देता रहता है कि बापू, अगर तुम ने ब्लोगगिरी में कुछ करना है ना तो कुछ टैक्नीकल लिखा करो, यह फलसफा आज कल कोई पढ़ना नहीं चाहता । खैर, यह उस का अपना ओपिनियन है और उसे अपना ओपिनियन रखने का पूरा पूरा हक है। लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है , मैं तो भई लिख कर फारिग हो जाता हूं, और मुझे क्या चाहिये। लेकिन आज यह कंबल, परदों एवं सोफों वाली बात है बहुत ही ..बहुत ही ...बहुत ज़्यादा ही महत्त्वपूर्ण ............इसिलये इस के बारे में थोड़ा ध्यान करियेगा.....ताकि हम अपने इर्द-गिर्द इन कीटाणुओं, जीवाणुओं के अंबार तो न लगा लें।

6 comments:

राज भाटिय़ा said...
चोपडा जी आप ने लेख तो बहुत अच्छा लिखा हे बिजली के स्वीच, दरवाजे के हेडिल, जाली वाले दरवाजे , ओर बर्तनॊ पर लगे स्टीकर तो छोड ही दिये,ओर भी बहुत सी चीजे हे,हमारे नोट जिन्हे हाथ लगने को भी दिल नही करता कभी इन पर भी लिखऎ,बहुत उप्योगी बाते लिखी हे.
अनिल रघुराज said...
सफाई का नया संस्कार ही सिखा दिया आपने। वैसे मेरी पत्नीश्री कई साल से पूरे परिवार को इसकी ट्रेनिंग दे रही हैं। सब के तौलिये अलग, कंबल अलग, साबुन अलग। स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है यह सब।
गुस्ताखी माफ said...
बहुत काम का लेख लिखा है.
पत्नियां अक्सर सही ही होती हैं
Kaput Pratapgarhi said...
डा साहब आप मेरे भाई जैसे दिखते हैं।
एक डॉक्‍टर साहब को ब्‍लॉग पर देखकर अच्‍छा लगा।
Neeraj Rohilla said...
डाक्टर साहब,
हम तो आपके इसी फ़लसफ़े के मुरीद हैं । आपकी पालीथीन वाली पोस्ट ने सीधा असर किया था । कुछ दिन पहले मैं अपने रूममेट से बात कर रहा था कि यहाँ ह्यूस्टन में कितना कबाडा हर रोज पैदा होता है मेरे अपार्टमेंट में, हर चीज तो डिब्बाबंद है ।

खैर आप लिखते रहे, हम पढने और अमल में लाने का प्रयास करने के लिये तैयार हैं । एक बात का सुकून है कि हमारे घर पर सबकी अपनी रजाई/कंबल फ़िक्स है और सभी पर सफ़ेद सूती कवर चढे हुये हैं । अब याद आ रहा है कि सर्दी की शुरूआत में बडे सन्दूक से रजाई गद्दे निकालकर धूप लगाकर और कवर धो-सुखा कर प्रयोग में लाये जाते थे । ठीक यही उपक्रम सर्दी खत्म होने पर उनको सन्दूक में रखने से पहले किया जाता था ।
Gyandutt Pandey said...
सच में डाक्टर साहब - यात्रा में सरकारी कम्बल की बजाय मैं अपनी रजाई घर से ले कर चलता हूं। कभी फंस गये तो मजबूरी है। वैसी अवस्था मे एक बार स्किन एलर्जी भी हो चुकी है।

Friday, March 14, 2008

आज की हैल्थ-टिप.....मेरी आपबीती !


कल का दिन मेरे लिये बहुत बेकार था....कल सुबह जब मैं पांच बजे के करीब उठा तो सिर में बहुत ज़्यादा दर्द था,सोचा कि बस यूं ही मौसम में ठंडी की वजह से हो रहा होगा....कुछ समय में ठीक हो जायेगा। लेकिन यह तो अलग किस्म का ही सिर दर्द था। खैर, सिर को बांध कर लेटना चाहा लेकिन इस से भी चैन कहां पड़ना था। सोचा, ऐसे ही ठंड-वंड लग गई होगी....परसों रात को यमुनानगर से 15-20 किलोमीटर दूर गांव कागोवाली में एक सत्संग में सम्मिलित होने गया था...आते समय कार की खिड़की खुली थी , सो ऐसा लगा कि ठंडी हवा लग गई होगी। लेकिन ऐसी ठंडी हवा भी इतनी तकलीफ़ नहीं देती जितनी मुझे कल हो रही थी।
खैर, तब तक घर के सब मैंबरर्ज उठ चुके थे। मिसिज़ ने कहा कि कुछ चाय-बिस्कुट ले लो....मैंने हां तो कह दी लेकिन जब चाय तैयार हो गई तो उस की तरफ़ देखने की इच्छा नहीं ! खैर,सुबह सुबह ही मुझे बार बार मतली सी आने लगी...बार-बार सिंक पर जाता और थोड़ा सा हल्का हो के आ जाता। लेकिन फिर वही समस्या....बस, चैन नहीं आ रहा था, और सिर तो जैसे फटा जा रहा था। ( हां, यहां एक बात शेयर करना चाहता हूं कि मुझे कभी भी उल्टी करने वाले मरीज़ से घिन्न नहीं आई.....पता नहीं, जब कोई मरीज़ में रूम में भी उल्टी कर देता है तो मुझे बिलकुल भी फील नहीं होता, मुझे उस से बहुत सहानुभूति होती है और मैं उसे कहता हूं ....कोई बात नहीं, आराम से कर लो...........पता नहीं, मुझे कुछ अपना पुराना टाइम याद आ जाता है ).........खैर, हास्पीटल तो जाना ही था.....क्योंकि कल मैं हास्पीटल के चिकित्सा अधीक्षक का कार्य भी देख रहा था।
हस्पताल में बैठ कर भी हालत में कुछ सुधार हुया नहीं। एक एसिडिटी कम करने के लिये कैप्सूल लिया तो, लेकिन वह भी चंद मिनटों के बाद सिंक में बह गया। खैर, श्रीमति जी ने भी कह दिया कि अकसर सिर-दर्द होने लगा है, कहीं न कहीं लाइफ-स्टाईल में गडबड़ तो है ही ना। मुझे पता है कि वे यही कर रही थीं कि नियमित सैर-वैर के लिये जाते नहीं हो, योग करते नहीं हो। खैर, उस समय तो कुछ सूझ नहीं रहा था।
जैसे जैसे दोपहर बाद एक बजे घर आ कर लेट गया....लेकिन कुछ खाने की इच्छा नहीं हो रही थी। जूस मंगवाया ...लेकिन जूस की दुकान बंद होने की वजह से अपना रामू गन्ने का रस ले आया । लेकिन उसे भी पीने की इच्छा नही हुई। । बस ,सिर दुखता ही रहा और बीच बीच में मतली सी होती रही।
यह सब स्टोरी बताना ज़रूरी सा लग रहा है इसीलिये लिख रहा हूं। खैर, कुछ समय बाद समय में आया कि घर में पिछले दो-तीन दिन से बाज़ार का आटा इस्तेमाल हो रहा था......बस सब कुछ समझ में आते देर न लगी। झट से समझ में आ गया कि क्योंकि पिछले दो-तीन दिनों से ही पेट नहीं साफ हो रहा था, रबड़ जैसी सफेद रोटी देख कर उसे खाने की भी इच्छा नहीं हो रही थी और दो -तीन दिन से ही एसिडिटी की तकलीफ भी रहने लगी थी। हमारे यहां किसी को भी बाज़ार के लाये आटे की रोटी कभी नहीं सुहाती ........सब सदस्य इस के घोर विऱोधी हैं। हम जब बम्बई में पोस्टेड थे तो हमारी सब से बड़ी समस्या ही यही थी कि बाजार में हमें कभी ढंग का आटा मिला ही नहीं थी। बंबई सैंट्रल एरिया में एक स्टोर में पंजाबी आटा मिल तो जाता था.........लेकिन उस में भी वो बात न थी। खैर, जब हम वापिस पंजाब में आये तो हमे (खासकर मुझे) इस बात की तो विशेष खुशी थी कि अब आटा तो ढंग का खायेंगे।
पिछले दो तीन से घऱ मे बाजार का आटा इसलिये इस्तेमाल हो रहा था कि दो -तीन बार जब भी रामू चक्की पर गया थो तो बिजली बंद ही मिली। ऐसा है न कि हम सब को मोटे आटे की आदत पड़ चुकी है। इसलिये हमें बाज़ार में यहां तक की आटा चक्की में मिलने वाला भी पतला आटा कभी भी नहीं चलता .....कहने को तो वे इसे पतला आटा कह देते हैं...ऐसे लगता है कि इस का दोष केवल इतना ही है कि इस को ज़्यादा ही बारीक पीसा हुया है ...लेकिन नहीं , इस का तो पहले इन्होंने रूला किया होता है जिस के दौरान आनाज के दाने की बाहर की चमड़ी उतार ली जाती है......और इसे रूला करना कहने हैं....और जो झाड़ इसे रूला करने की प्रक्रिया में प्राप्त होता है ये चक्की वाले इसे अलग से बेचते हैं......मजे की बात यह है कि लोग इसे जानवरों के लिये खरीद कर ले जाते हैं...यह गेहूं का एक पौष्टिक हिस्सा होता है। मुझे इस का भरा हुया पीपा एक चक्की वाले ने दिखाया भी था।
मैंने स्वयं कईं बार लोगों को चक्की वाले को यह कहते सुना है कि रूला ज़रूर कर लेना..पीसने से पहले। क्योंकि उन्हें भूरा आटा पसंद नहीं है.....और हां, बाज़ार में जो आटा बिकता है उस में से चोकर भी निकला होता है .....सो , हमारे सामने एक तरह से मैदा ही तो रह जाता है जिस को सफेद रोटियां देख कर आज कल लोग ज्यादा खुश होने लगे हैं। लेकिन यह ही है हमारी सब की ज़्यादातर तकलीफों की जड़.......विशेषकर ऐसा आटा खाने वाले के पेट ठीक से साफ होते नहीं है, जिस की वजह से सारा दिन सिर भारी-भारी सा रहता है और मन में बेचैनी सी रहती है।
कुछ साल पहले पंजाब के भोले-भाले किसानों के बारे में एक चुटकुला खूब चलता था......जब शुरू शुरू में भाखड़ा नंगल डैम के द्वारा बिजली का उत्पादन शुरू हुया था तो भोले भाले किसान यह कहते थे.....लै हुन , पानी चों बिजली ही कढ़ लई तां बचिया की ( ले अब अगर पानी से बिजली ही निकाल ली गई तो बचा क्या !)........लेकिन अफसोस आज हम लोग बाज़ार से ले लेकर जिस तरह का आटा खा रहे हैं उसके बारे में हम ज़रा भी नहीं सोचते कि यार, जिस गेहूं का रूला हो गया, जिस में से चोकर निकाल लिया गया......उस से हमें तकलीफें ही तो मिलने वाली हैं। क्या है ना कि गेहूं में मौजूद फाईबर तो उस की इस बाहर वाली कवरिंग (जिसे रूला के द्वारा हटा दिया जाता है) ...और चोकर में पड़ा होता है जो कि हमारे शरीर के लिये निहायत ही ज़रूरी है क्योंकि इस तरह के अपाच्य तत्व हमारी आंतड़ियों में जाकर पानी सोख कर फूल जाते हैं और मल के निष्कासन में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।
इसलिये जिन का भी पेट साफ नहीं होता उन को हमेशा मोटा आटा .....जिस में से कुछ भी निकाला न गया हो.....खाने की ही सलाह दी जाती है। इसके साथ ही साथ अगर दालों सब्जियों का प्रचुर मात्रामें सेवन किया जायेगा तो क्यों नहीं होगा यह पेट साफ। ऐसे ही टीवी पर अखबारों मे पेट साफ करने वाले चूरनों की हिमायत करने वालों की बातों पर ज़्यादा ध्यान मत दिया करें।
......हां, तो मैं इसी बारीक आटे की वजह से बिगड़ी अपनी तबीयत की बात सुना रहा था....तो शाम के समय पर तबीयत थोड़ी सुधरी थी कि थोड़े से अंगूर और कीनू का जूस पी लिया.....लेकिन हास्पीटल जाते ही उल्टी हो गई । बस , इंजैक्शन लगवाने की सोच ही रहा था कि मन में सैर करने का विचार आ गया......आधे घंटे की सैर के बाद कुछ अच्छा लगने लगा और घर आकर थोडा टीवी पर टिक गया ......खाना खाने की इच्छा हुई, तो मोटे वाले आटे की ही रोटियां खाईं ......तो जान में जान आई। आप भी हंस रहे होंगे कि यह तो डाक्टर ने नावल के कुछ पन्ने ही लिख दिये हैं।
इस सारी बात का सारांश यही है कि हमें केवल....केवल....केवल......मोटे आटे का और सिर्फ मोटे आटे का ही सेवन करना चाहिये। जिन पार्टियों में सफेद सफेद दिखने वाली तंदूर की रोटियां, नान आदि दिखें.....इन्हें खा कर अपनी सेहत मत बिगाड़ा करिये...............वैसे मेरे पास बैठा मेरा बेटा भी इस बात पर अपनी मुंडी हिला कर अपना समर्थन प्रकट कर रहा है। लेकिन आप ने क्या सोचा है ?
चलते चलते सायरा बानो और अपने धर्म भा जी भी सावन-भादों फिल्म में कुछ फरमा रहे हैं .....अगर टाईम बचा हो तो मार दो एस पर भी एक क्लिक..........

4 comments:

Padma Srivastava said...

डॉ.साहब आपने बहुत ही अच्छी जानकारी दी है।

डॉ. अजीत कुमार said...

सही कहा सर जी, हमारे यहां भी तो मोटे आटे की रोटियां ही बनती हैं. हां ये बात अब अलग है कि जब से पटना में अकेला रह रहा हूं तो बाहर के आटे की भी आदत लग गयी है.

राज भाटिय़ा said...

चोपडा जी कहो तो यहां से भिजवा दु आप को आप कि मनंपसद का आटा,हम यहां वेसा ही आता लाते हे जेसा आप ने बताया,ओर आटा गलत आ जाये तो कोई रोटी ही नही खाता.

Dr.Parveen Chopra said...

@राज जी, बहुत बहुत शुक्रिया.....बस एह तकलीफ़ थोडे़ दिनां दी ही सी.....हुन आ गिया ऐ ओही वाला मोटा आटा !!

Wednesday, January 30, 2008

अब इन बेकरी वालों को समझाने की बारी आप की है!



मैं तो दोस्तो इन बेकरी वालों को यह छोटी सी बात समझाते समझाते थक सा गया हूं...लेकिन मुझे आप से बहुत उम्मीदें हैं। शायद आप की ही बात उन के मन को लग जाए।

चलिए मैं अपनी बात रखने से पहले एक बेकरी की अच्छी बात भी आप के सामने रख रहा हूं। कुछ दिन पहले पास ही के एक शहर की किसी मशहूर बेकरी पर पेस्ट्री खाने का मौका मिला। साफ़-सफ़ाई बहुत बढ़िया थी। और मज़े की बात तो यह थी कि पेस्ट्री को भी एक पेस्ट्री से थोडसे बड़े साइज़ के एक कप मेपरोसा जा रहा था। इस कप को आप इस तसवीर में देख रहे हैं। ये छोटी छोटी बातें ही होती हैं जो कुछ जगहों का नाम काफी ऊपर उठा देती हैं।


हां, तो अब मैं अपनी बात पर आता हूं। मैंने देखा है कि अच्छी अच्छी बेकरियां भी जो केक बना कर बेचती हैं , वे जिस डिब्बे में केक डाल कर ग्राहक के हाथ में देती हैं वे तो बहुत बढ़िया होते हैं, लेकिन कभी आप ने ध्यान किया है कि जिस वस्तु के ऊपर यह केक पड़ा होता है, वह एक थर्ड-क्लास किस्म का गत्ता (cardboard) ही होता है, जो सरे-आम बीमारियों को खुला निमंत्रण दे रहा होता है। हां, कुछ चालाक किस्म के दुकानदारों ने इसे एक बिलकुल पतले से कागज़ से ( वही कागज जो गिफ्ट रैपिंग के लिए इस्तेमाल होता है) कवर रखा होता है, कुछ तो इस काम के लिए किसी अखबार का ही इस्तेमाल कर लेते हैं। क्या हम यह नहीं जानते कि ये सब हमारी सेहत के लिए कितना हानिकारक हैं....शायद आप ने भी नोटिस किया होगा कि घर तक लाते-लाते यह कागज़ गल चुका होता है और केक के साथ शायद आप के शरीर में ज़रूर जाता होगा।

मैंने कईं बार इन बेकरी वालों को टोका है कि क्या एक-दो रूपये बचाने के पीछे लोगों को बीमार कर रहे हो। इस गत्ते के ऊपर कम से कम ढंग का एल्यूमीनियम फॉयल तो लगाया करो(जिस में हम लोग आज कल चपातियां रैप करते हैं)। लेकिन आप को भी यह तो पता ही है कि दुकानदार के पास हर बात का जवाब पहले से तैयार होता है कि क्या करें...ग्राहक इतने पैसे कहां खर्च करता है। लेकिन मैं उन के इस तर्क से कभी भी न तो सहमत हुआ हूं और न ही कभी होऊंगा। अब जो ग्राहक किसी केक के लिए 165 रूपये खर्च रहा है तो उसे मेरे ख्याल में एक साफ़-सुथरी पैकिंग में दिए गये केक के लिए 170रूपये खर्च करने में भी कहां चुभन होती है।

लेकिन मैं देखता हूं कि मेरे बार बार कहने पर भी इन बेकरी वालों के सिर पर जूं तक नहीं रेंगी...अब उम्मीद की डोर आप के हाथ में थमा रहा हूं कि आप भी अपने अपने शहर में एवं अपने परिवारजनों में इस छोटी सी ( लेकिन स्वस्थ रहने के लिए बहुत बड़ी) बात की अवेयरनैसे बढायेंगे। और मैं कर भी क्या सकता हूं?

Wednesday, January 23, 2008

गन्ने के रस का लुत्फ तो आप भी ज़रूर उठाते होंगे !




मैं जब भी बम्बई में होता हूं न तो दोस्तो वहां पर बार बार गन्ने के रस पीने से कभी नहीं चूकता.. लेकिन अपने यहां पंजाब -हरियाणा में मेरी पिछले कुछ सालों से कभी गन्ने का रस पीने की इच्छा ही नहीं हुई। पिछले कुछ सालों से इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि पहले खराब गन्ने का रस पीने के नुकसानों से वाकिफ न था। वैसे तो मैं बचपन से ही इस का शौकीन रहा हूं - जब भी मां की उंगली पकड़ कर बाज़ार जाता तो आते वक्त मेरा एक गन्ने का गिलास पक्का था।

दोस्तो, 1980 में मुझे पीलिया हो गया तो मेरी मां बहुत दूर से जाकर छःसात गिलास गन्ने का रस ले कर आती थी, क्योंकि उस अमृतसर के दुर्ग्याणा मंदिर के बाहर स्थित गन्ने के रस की दुकान की खासियत ही यह थी कि वह खूब सारा धूप वगैरह जला कर एक भी मक्खी आस पास नहीं फटकने देता था। और पीलिया रोग में तो यह एहतियात और भी कहीं ज्यादा जरूरी थी।
और बचपन में याद है कि हम लोग स्कूल से आते हुए एक ऐसी जगह से यह जूस पीते थे जहां पर बैल की आंखों पर पट्टी बांध कर उसे गोल-गोल दायरे में घुमा कर गन्नों को पीस कर जूस निकाल जाता था, तब किस कमबख्त को इस की फिकर थी कि क्या मिल रहा है। बस यही शुक्र था कि जूस के पीने का आनंद लूट रहे थे। इस के बाद , अगला स्टाप होता था , साथ में बैठी एक छल्ली वाली ....वही जिसे भुट्टा कहते हैं-- उस से पांच-दस पैसे में कोई छल्ली ले कर आपनी यात्रा आगे बढ़ा करती थी।

सारी, फ्रैंडज़, यह जब से ब्लागिरी शुरु की है न , मुझे अपनी सारी पुरानी बातें बहुत याद आने लगी हैं...क्या आप को के साथ भी ऐसा हो रहा है। कमैंटस में जवाब देना, थोड़ी तसल्ली सी हो जाएगी

हां, तो मैं बात कर रहा था कि बम्बई में जाकर वहां पर गन्ने के रस का भरपूर आनंद लूटना चाहता हूं। इस का कारण पता है क्या है ...वहां पर गन्ने के रस के स्टालों पर एकदम परफैक्ट सफाई होती है, उन का सारा ताम-झाम एक दम चमक मार रहा होता है और सब से बड़ी बात तो यह कि उन्होंने सभी गन्नों को सलीके से छील कर अपने यहां रखा होता है ....इसलिए किसी भी गन्ने का ज़मीन को छूने का तो कोई सवाल ही नहीं।
इधर इस एरिया में इतनी मेहनत किसी को करते देखा नहीं, ज्यादा से ज्यादा अगर किसी को कहें तो वह गन्नों को कपड़ों से थोड़ा साफ जरूर कर लेते हैं ,लेकिन जिसे एक बार बम्बई के गन्ने के रस का चस्का लग जाता है तो फिर उसे ऐसी वैसी जगह से यह जूस पसंद नहीं आता। बम्बई ही क्यों , दोस्तो, कुछ समय पहले जब मुझे हैदराबाद जाने का मौका मिला तो वहां पर भी इस गन्ने के रस को कुछ इतनी सी सफाई से परोसा जा रहा था। यह क्या है न दोस्तो कि कुछ कुछ जगहों का कुछ कल्चर ही बन जाता है।

और जगहों का तो मुझे इतना पता नहीं, लेकिन दोस्तो, पंजाब हरियाणा में क्योंकि कुछ जूस वाले सफाई का पूरा ध्यान नहीं रखते इसलिए गर्मी के दिनों में लोकल प्रशासन द्वारा इस की बिक्री पर कुछ समय के लिए रोक ही लगा दी जाती है ...क्योंकि इस प्रकार से निकाला जूस तो बस बीमारियों को खुला बुलावा ही होता है।

तो,आप भी सोच रहे हैं कि इस में कोई हैल्थ-टिप दिख नहीं रही-तो ,दोस्तो, बस आज तो बस इतनी सी ही बात करनी है कि गन्ने का रस पीते समय ज़रा साफ-सफाई का ध्यान कर लिया करें।

वैसे जाते जाते बम्बई वासियों के दिलदारी की एक बात बताता हूं ...कुछ दिन पहले ही चर्चगेट स्टेशनके बाहर हम लोग गन्ने का जूस पी रहे थे कि एक भिखारी उस दुकान पर आया और उसे देखते ही दुकानदार ने उसे गन्ने के रस का एक गिलास थमा दिया.....उसने बीच में पीते हुए दुकानदार से इतना कहने की ज़ुर्रत कैसे कर ली....नींबू भी डाल दो। और दुकानदार ने भी उसी वक्त कह दिया कि सब कुछ डाला हुया है , तू बस साइड में हो कर पी ले। मैं यह समझ नहीं पाया कि क्या उस भिखारी ने नींबू मांग कर ठीक किया कि नहीं.....खैर जो भी , We liked this small noble gesture of that shopkeeper. May he always keep it up !!

4 comments:

Let The World Wait said...

Dr. Saab,
im really impressed with u.
and u just keep writting..
and providing such a impt. informations too.
My self..Amit Sharma
From Kuwait
amteeshr@gmail.com

Gyandutt Pandey said...

डाक्टर साहब; ये कुवैत से लिखने वाले सज्जन बिल्कुल सही कह रहे हैं। और यह बहुत अच्छा है कि आप जानदार पोस्ट लिख रहे हैं - डाक्टरी प्रेस्क्रिप्शन नहीं घसीट रहे।
बहुत बहुत साधुवाद - एक ध्येय पूर्ण ब्लॉगिंग के लिये।

अनुनाद सिंह said...

हिन्दीभाषा में स्वास्थ्य-साक्षरता को बढ़ावा देने वाली जानकारी का बहुत अभाव है। आपको हिन्दी-ब्लागजगत में पाकर बहुत सन्तोष हो रहा है। ऐसे ही स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी लेखनी चलाते रहें; हिन्दी और हिन्दी-जगत का बहुत भला होगा। स्वास्थ्य साक्षरता और रोग-शिक्षा (पैशेंट एडुकेशन) का किसी भी समाज को निरोग रखने में बहुत महत्व है। आशा है आपका ब्लाग इस दिशा में पहल करके समाज का हित साधने के साथ ही यश का भाक़्गी होगा।

PD said...

अजी हम तो यही कहेंगे की हम ब्लौग तो इसीलिये शुरू किये थे क्योंकि मैं अपनी यादों को सजोना चाहता था.. उसे दुनिया तक पहूंचाना चाहता था.. :)

Friday, January 18, 2008

क्या ये बीमारियां परोसने वाले दोने हैं?




दोस्तो, आप भी सोच तो जरूर होंगे कि यह इस बलागिये ने तो जब से चिट्ठों की दुनिया में पांव रखा है न, बस हर वक्त डराता ही रहता है कि यह न खायो, वो न खायो, उस में यह है,उसमें वह है......बोर हो लिए यार इस की डराने वाली बातो से....हम तो जो दिल करेगा... करेंगे, खाएंगे पीएंगे, मजा करेंगे......वही कुछ कुछ ठीक उस पंजाबी गाने की तरह....
खाओ, पियो ,ऐश करो मितरो,
दिल पर किसी दा दुखायो न.....
लेकिन जब खाने वाली चीज़े जिस दोने में परोसी जा रही हैं, अगर वह ही आप की सेहत से खिलवाड़ करने लगे तो .....वो कहते हैं न कि बाड़ ही खेत को खाने लगे तो फिर कोई क्या करे....चुपचाप बैठा रहे, या शोर डाल कर लोगों को चेताया जाए। बस,दोस्तो, कुछ वैसा ही काम करने की एक बिलकुल छोटी सी कोशिश करता रहता हूं।
कल रात की ही बात है दोस्तो हम सब घूमने बाज़ार गये हुए थे। वहां पर एक अच्छी खासी मशहूर दुकान से मेरा बेटा एक दोने में गाजर का हलवा खा रहा था, अचानक उस ने शिकायत की यह हलवे के ऊपर क्या लगा है, अकसर हम उसे ऐसे ही कह देते हैं कि यार, तू न ज्यादा वहम न किया कर , बस खा लिया कर, कुछ नहीं है। अकसर हम इसलिए कहते हैं क्योंकि वह हर चीज़ को बड़ी अच्छी तरह से चैक कर के ही खाता है...शायद मां-बाप दोनों डाक्टर होने का ही कुछ असर है। कल भी ऐसा ही हुया, हम ने उसे मज़ाक में फिर कह दिया कि यार तेरी ही खाने की चीज़ में कुछ न कुछ लफड़ा होता है, लेकिन दोस्तो जब उस ने उस गाजर के हलवे से भरा चम्मच हमारे सामने किया तो हम दंग रह गए। बात क्या थी, दोस्तो, कि जिस दोने में वह गाजर का हलवा खा रहा था, वह वही आज कल कईं जगह पर मिलने वाले कुछकुछ ट्रेडी फैशुनेबल से डोने से ही खा रहा था, जो होता तो किसी पेड़ के पत्ते का ही है, लेकिन अंदर उस के एक चमकीली सी परत लगी होती है।
चूंकि वह उस तरह के ही दोने से खा रहा था तो यह समझते देर न लगी कि यहउस दोने की चमकीली ही उस हलवे के साथ उतर कर पेट में जा रही है।
दोस्तो, आप को भी शाकिंग लगा न, तुरंत वेटर ने वह दोना तो बदल दिया, लेकिन जिन करोड़ों बंदों को इस बात का ज्ञान नहीं है, बात उन के दोने बदलने की है, उन तक भी यह दोने न पहुंचे, बात तो तब बने.....
दोस्तो, मैं भी कल तक यही समझ रहा था कि इन बड़े आकर्षक दिखने वाले दोनों में कुछ उसी तरह का मैटिरियल लगा होता होगा जिस फायल में आजकल चपातियां लपेटने का चलन है। लेकिन आते वक्त उत्सुकता वश मैं वहां से एक खाली दोना मांग कर ले आया......दोस्तो, आप हैरान होंगे जब घर आकर मैंने उस दोने के ऊपर लगी परत को उतारा तो दंग रह गया ...यह कोई फायल-वायल नहीं था, ये तो एक पतला सा मोमी कागज था, पालीथीन जैसा जो अकसर दशहरे के दिनों में बच्चों के तीर कमान बनाने वाले, बच्चों के मुकुट बनाने वाले इस्तेमाल करतेहैं। यह सब देख कर बड़ा ही दुःख हुया कि आमजन की सेहत से कितना खिलवाड़ हो रहा है, यह सब चीज़ें हमारे शरीर में जाकरइतना ज्यादा नुकसान करती हैं कि अब क्या क्या लिखूं क्या छोडूं...फिर आप ही कहें कि बलोग की पोस्टिंग बड़ी हो गई है। तो , दोस्तो, आगे से आप भी इन बातों की तरफ जरूर ध्यान दीजिएगा। वही दशकों पुराने पत्ते के दोने में ही यह खाने-पीने की चीज़े खानी ठीक हैं, उस में यह बिना वजह की आधुनिक का मुलम्मा चढ़ाने का क्या फायदा ...और वह भी जब यह हमारे शरीर में ही इक्टठा हो रहा है। गाजर के हलवे में तो हम ने उसे पकड़ लिया, लेकिन क्याइस तरह के ही माड्रऩदोने में परोसी जा रहीं जलेबियों, गर्मागर्म टिक्कीयों,एवं पानी-पूरी इत्यादि के रास्ते हमारे शरीर के अंदर जा कर यह बीमारियों को खुला नियंत्रण नहीं देता होगा .....आप भी मेरी ही तरह यही सोच रहे हैं न। तो ,फिर अगली बार ज़रा दोने का ध्यान रखिएगा .......
पता नहीं , आप मेरी बात पर अमल कर पाएंगे या नहीं, लेकिन इस पूरे ऐपिसोड का मेरे बेटे को जरूर फायदा हो गया ......He got a cash reward of fifty rupees for his keen sense of observation…..दोस्तो, बस एक और भी है न अब बलोगरी में पांव रख ही लिया है , तो उन्हें जमाने के लिए ऐसे stingers को भी समय समय पर प्रोत्साहित तो करते ही रहने पड़ेगा, दोस्तो।

Tuesday, January 8, 2008

जटरोफा के बीजों से सावधान रहिए !

जटरोफा कुरकास(जंगली अरंडी) सारे भारतवर्ष में पाया जाने वाला एक आम पौधा है। जटरोफा के बीजों में 40प्रतिशत तक तेल होता है। इससे बायोडीज़ल प्राप्त करने हेतु सैंकड़ों प्रोजेक्ट चल रहे हैं। जटरोपा के बीजों से प्राप्त तेल मनुष्य के खाने योग्य नही होता।

जटरोपा के विषैले गुण इस में मौजूद कुरसिन एवं सायनिक एसिड नामक टाक्स-एल्ब्यूमिन के कारण होते हैं। वैसे तो पौधे के सभी भाग विषैले होते हैं लेकिन इन के बीजों में इस की सर्वाधिक मात्रा होती है। इन बीजों को खा लेने के पश्चात शरीर में होने वाले दुःप्रभाव मूल रूप से पेट एवं आंतों की सूजन के कारण उत्पन्न होते हैं।

गलती से जटरोफा के बीज खा लेने की वजह से बच्चों में इस तरह के हादसे आए दिन देखने-सुनने को मिलते रहते हैं। इन आकर्षक बीजों को देख कर बच्चे अनायास ही इन्हें खाने को उतावले हो उठते हैं।

इस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि इस पौधे के कितने बीज खाने पर विषैलेपन के लक्षण पैदा होते हैं। कुछ बच्चों की तो सिर्फ तीन बीज खा लेने ही से हालत पतली हो जाती है, जब कि कुछ अन्य केसों में पचास बीज खा लेने पर भी बस छोटे-मोटे लक्षण ही पैदा हुए। धारणा यह भी है कि इन बीजों को भून लेने से विष खत्म हो जाता है, लेकिन भुने हुए बीज खाने पर भी बड़े हादसे देखने में आये हैं।

उल्टियां आना एवं बिल्कुल पानी जैसे पतले दस्त लग जाना इन बीजों से उत्पन्न विष के मुख्य लक्षण हैं। पेट-दर्द, सिर-दर्द, बुखार एवं गले में जलन होना इस के अन्य लक्षण हैं। इस विष से प्रभावित होने पर अकसर बहुत ज्यादा प्यास लगती है। इस के विष से मृत्यु की संभावना बहुत ही कम होती है।

क्या करें ..........
बेशक जटरोफा बीज में मौजूद विष को काटने वाली कोई दवा (एंटीडोट) नहीं है, फिर भी अगर बच्चे ने इन बीजों को खा ही लिया है तो आप घबराएं नहीं।
बच्चे को किसी चिकित्सक के पास तुरंत ले कर जाएं। अगर बच्चा सचेत है, पानी निगल सकता है तो चिकित्सक के पास जाने तक भी उसे पेय पदार्थ (दूध या पानी) पिलाते रहें जिस से कि पेट में मौजूद विष हल्का पड़ जाए। चिकित्सक के पास जाने के पश्चात् अगर वह जरूरी समझते हैं तो अन्य दवाईयों के साथ-साथ वे नली द्वारा (IV fluids)कुछ दवाईयां शुरू कर देते हैं। इस अवस्था का इलाज सामान्यतयः बहुत सरल है। 6घंटे के भीतर अकसर बच्चे सामान्य हो जाते हैं।

रोकथाम---------------बच्चों को इन बीजों के बारे में पहले से बता कर रखें। उन्हें किसी भी पौधे को अथवा बीजों को ऐसे ही खेल-खेल में खा लेने के प्रति सचेत करें। स्कूल की किताबों में इन पौधों का विस्तृत वर्णन होना चाहिए। अध्यापकों को भी कक्षाओं में बच्चों को इन बीजों से संबंधित जानकारी देते रहना चाहिए।

Wednesday, January 2, 2008

क्या आप बाज़ार जूस पीने जा रहे हैं ?- इसे भी पढ़िए !!


दोस्तो, कुछ न कुछ बात हम डाक्टरों की जिंदगी में रोज़ाना ऐसी घट जाती है कि वह हमें अपनी कलम उठाने के लिए उकसा ही देती है। वैसे तो कईं बार ही ऐसा हो चुका है कि लेकिन आज भी सुबह ऐसा ही हुया---एक मरीज जिसमें खून की बहुत कमी थी, मैं उसे इस के इलाज के बारे में बता रहा था, जैसे ही मैं उसे खाने-पीने में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताने लगा तो उस ने झट से कहा कि मैं तो बस रोज़ अनार का जूस पी लिया करूंगा। फिर उस को यह भी बताना पड़ा कि उस अकेले अनार के जूस के साथ-साथ उसे और भी क्या क्या खाना है....क्योंकि बाज़ार में बिकते हुए अनार के जूस के ऊपर कैसे भरोसा कर लूं.....मौसंबी एवं संतरे का जूस तो बाज़ार में ढंग से लोगों को मिलता नहीं, अनार के जूस का सपना देखना तो भई मुझे बहुत बड़ी बात लगती है।
दोस्तो, आप कभी जूस की दुकान को ध्यान से देखिए, उस ने जूस निकालने की सारी प्रक्रिया आप की नज़रों से दूर ही रखी होती है। कारण यह है कि उस ने उस गिलास में बर्फ के साथ ही साथ, चीनी की चासनी, थोडा़ बहुत रंग भी डालना होता है और यह सब कुछ जितना आप की नज़रों से दूर रहेगा, उतनी ही उसको आज़ादी रहेगी। मैं भी अकसर बाजार में मिलते जूस का रंग देख कर बड़ा हैरान सा हो जाया करता था ---फिर किसी ने इस पर प्रकाश डाल ही दिया कि कुछ दुकानदार इस में रंग मिला देते हैं--नहीं तो जूस में 10अनार के दानों का जूस मिला होने से भला जूस कैसे एक दम लाल दिख सकता है। दोस्तो, अब बारी है चासनी की, अगर हम ने बाजारी जूस के साथ साथ इतनी चीनी ही खानी है तो क्या फायदा। अब , रही बात बर्फ की...तो साहब आप लोग बाज़ारी बर्फ के कारनामे तो जानते ही हैं, लेकिन इस जूस वाले का मुनाफा बर्फ की मात्रा पर भी निर्भर करता है। तो फिर क्या करें...आप यही सोच रहे हैं न..क्या अब जूस पीना भी छोड़ दें....जरूर पीजिए, लेकिन इन बातों की तरफ ध्यान भी जरूर दीजिए.....वैसे अगर आप स्वस्थ हैं तो आप किसी फळ को अगर खाते हैं तो उस से हमें उस का जूस तो मिलता ही है, साथ ही साथ उस में मौजूद रेशे भी हमारे शरीर में जाते हैं,और इस के इलावा कुछ ऐसे अद्भुत तत्व भी हमें इन फलों को खाने से मिलते हैं जिन को अभी तक हम डाक्टर लोग भी समझ नहीं पाए हैं। हां, गाजर वगैरा का जूस ठीक है, क्योंकि आदमी वैसे कच्ची गाजरें कितनी खा सकता है। हां, अगर कोई बीमार चल रहा है तो उस के लिए तो जूस ही उत्तम है और अगर वह भी साथ साथ फलों को भी खाना चालू रखे तो बढ़िया है।
जूस का क्या है....कहने को तो बंबई के स्टेशनों के बाहर 2 रूपये में बिकने वाला संतरे का जूस भी जूस ही है---जिस में केवल संतरी रंग एवं खटाई का ही प्रयोग होता है। जितने बड़े बड़े टबों में वे ये जूस बेच रहे होते हैं अगर वे संतरे लेकर उस का जूस निकालना शुरू करें तो शायद एक पूरी घोड़ा-गाडी़ (संतरों से लदी हुई ) भी कम ही होगी।
आप क्या सोचने लग गए ??

1 comments:

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

प्रिय डॉक्टर इस चिट्ठे के लिये एवं इस लेख के लिये शत शत आभार. लिखते रहें बहुत लोगों को फायदा होगा.