ब्लॉग लेखक- डा.प्रवीण चोपड़ा.. 2007 से ब्लॉग लेखन एवं प्रशिक्षण में सक्रिय... drparveenchopra@gmail.com
शुक्रवार, 25 जुलाई 2008
विवाह से पूर्व चैक अप वाला विज्ञापन
लगभग तीन हफ्ते पहले मैंने एक सुप्रसिद्ध लैब का एक विज्ञापन एक अंग्रेज़ी के अखबार में देखा था। ऐसा विज्ञापन मैंने तो पहले बार ही देखा था.....शायद इस से पहले भी आया हो, लेकिन मेरी नज़र न उस पर पड़ी हो। आप भी जानने को उत्सुक हो रहे होंगे कि आखिर क्या था उस विज्ञापन में।
तो सुनिये, उस विज्ञापन में उस कंपनी द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे विभिन्न टैस्टों की जानकारी दी गई थी। उस में अलग अलग आयु वर्ग के लोगों के लिये विभिन्न स्कीमें थीं। एक स्कीम जिसे पहली बार किसी विज्ञापन में देख कर मुझे बेइंतहा खुशी हुई वह थी .......विवाह से पूर्व युवक-युवती की जांच ( Pre-marital health check-up for individuals and couples) ……Detects presence of chronic infectious diseases. Identifies and helps prevent transmission of abnormal Hb related disorders to progeny.
मुझे यह पढ़ कर बहुत ही खुशी हुई क्योंकि मैं इस बात की बहुत हिमायत करता हूं कि शादी से पहले लड़के और लड़की का चैक-अप होना चाहिये। मुझे पता है कि हिंदोस्तानी समाज में यह बात विभिन्न कारणों की वजह से अभी लोगों के गले नहीं उतरेगी। इस के कारण भी तो बहुत से हैं।
इस देश में किसी लड़के-लड़की की शादी की जब बात चल रही होगी तो अगर कोई लड़के या लड़की की चैक-अप की बात छेड़ कर तो देखे, अगले दिन ही बिचोलिये का फोन आ जायेगा कि अभी लड़के वाले सोच रहे हैं.....चैक-अप की तो बात छोड़िये, लोग इन मौकों पर सेहत की बात करना ही महांपाप समझते हैं......मुझे कभी समझ नहीं आई कि ये लोग इतना डरे, सहमे से क्यों होते हैं !!
लेकिन कुछ भी हो लोगों की भई अपनी मजबूरियां हैं....अब अगर किसी लड़की का ब्याह किसी अमेरिका में रह रहे लड़के से तय हो रहा है और वर-पक्ष की कोई मांग भी नहीं है तो भला कौन लड़के के चैक-अप की बात घुसा कर अच्छी भली बनती बात को बिगाड़ने का साहस कर पायेगा। तो, इस तरह की विवाह से पूर्व चैक-अप की बात न छिड़ने का एक कारण जो हमारे सामने आ रहा है वह यही है कि हमारे देश में जो रिश्ते अपनी हैसियत वालों की बजाए अपने से so-called (!!!) ऊंचे या नीचे तबके ( मैं अपनी रियल लाइफ में इस तरह शब्द इस्तेमाल करने का घोर-विरोधी हूं, लेकिन यहां लिखना पड़ रहा है ) ......के साथ होते हैं, इन रिश्तों में लड़के के बापू का बड़ा सा बंगला या लड़की के डैड की फैक्टरी का रोब दूसरे पक्ष के मुंह पर पट्टी बांध देता है। और जितनी ही यह हैसियत की खाई गहरी होगी, यह पट्टी उतनी ही टाईट होती जायेगी।
एक कारण यह भी तो है कि अकसर हिंदोस्तान में रिश्तों में ही रिश्ते हो जाते हैं और लड़की या लड़के का शादी से पूर्व चैक-अप की बात कहने की भला कौन हिम्मत करे.......पता चले कि यह रिश्ता तो हुया नहीं और पहले वाले रिश्तों पर भी इस बात का असर पड़ गया।
कहने का भाव यही है कि हमारे लोगों के लिये दो जमा दो हमेशा चार नहीं हैं.....इन की समस्यायों के बहुत आयाम हैं। ये बेचारे तरह तरह के रिश्तों के बोझ तले, सामाजिक धारणाओं, रूढ़िवादी विचारों तले बुरी तरह से दबे हुये हैं .....इसलिये मैं कभी भी इन्हें किसी भी बात का दोष नहीं देता हूं......इस भोली भाली जनता का क्या दोष है..............और एक बात तो और भी बहुत दुःखद यह है कि इन मां-बाप को ही इस तरह की अवेयरनैस नहीं है तो ये क्या किसी से कुछ कहेंगे ।।
तो, फिर इस बात का समाधान कहां है....समाधान धरा पड़ा है ....इस तरह के विज्ञापनों में जिन्होंने सीधी बात ही पढ़े-लिखे लड़के-लड़की तक ही पहुंचा दी। लैब भी बहुत प्रसिद्ध है......इस लिये इस की रिपोर्ट भी पूरी विश्वसनीय होगी...यह नहीं कि नुक्कड़ पर कल ही खुली किसी लैब से रिपोर्ट ला कर लड़की या लड़के वालों को दी जा रही है जिससे उन का बस मुंह ही बंद हो जायेगा।
तो, मेरे विचार में इस बात में पहले पड़े-लिखे लड़के लड़कियों को ही करनी होगी.....और यह पैकेज भी कितना बढ़िया है कि दोनों इक्ट्ठे ही जा कर अपने टैस्ट करवा सकते हैं। क्या आप को लगता है कि यह बात किसी तरह से भी यह कुंडली –वुंडली के मिलान से कम अहमियत वाली है। नहीं ना.....बल्कि उस से भी शायद कईं गुणा ज़्यादा ज़रूरी है।
चूंकि लड़का-लड़की साथ साथ जा रहे हैं इस लिये किसी को बुरा लगने का सवाल ही नहीं पैदा होता। मुझे ऐसा लगता है कि अभी से अगर ये पढ़े-लिखे लोग इस तरफ पहला कदम उठाना शुरू करेंगे तो धीरे धीरे लोगों की झिझक दूर हो जायेगी।
मेरा यह लिखने का कारण केवल इतना है कि आप सब को भी पता है कि लोग सदियों से इन रिश्तों के समय तरह तरह के झूठ बोलते आये हैं , बीमारियां छुपाते आये हैं.........लेकिन अब तो भई जीने-मरने की बात हो गई है, दोस्तो।
कितनी बार अखबारों में पढ़ चुके हैं कि किसी विवाहित युवक को जब एच-आई-व्ही संक्रमण का पता चला तो सारा दोष उस की बीवी पर मढ़ा गया और उस के चाल-चलन पर शक किया गया। वैसे यह तो एक लंबी डिबेट है....हां, बिलकुल उस जैसी कि मुर्गी पहले आई या अंडा........लेकिन इतनी लंबी-चौड़ी डिबेट में पड़ने की बजाए सीधी तरह से लड़के-लड़की अपने मां-बाप को बीच में डाले बिना ही अपने ही लैवल पर विवाह-पूर्व अपना टैस्ट ही करवा लें तो कितने झंझटों से बचा जा सकता है।
रही बात कि हर मां-बाप का यह सोचना कि मेरे बच्चों का तो मुझे पता है ...मैं उन की गारंटी लेता हूं....उन्हें टैस्ट/वैस्ट करवाने की कोई ज़रूरत नहीं है........इस तरह की सोच में ही गड़बड़ी है, आज कल कौन किस की गारंटी ले सकता है .....इसलिये बेहतर होगा कि हम लोग शादी के वक्त इस तरह की गारंटी देना या स्वीकार करना बंद करें। बच्चों की पूरी लाइफ का मामला तो है ही......लाइफ एंड डैथ का मसला है भई।
अभी अभी लिखते लिखते मुझे लगभग 10-12साल पुरानी बात याद आ रही है....उन दिनों मैं बंबई सर्विस करता था ...एक आफीसर का बेटा था जो स्वयं भी नौकरी कर रहा था। उस 23-24 साल के लड़के को एक्सीडैंट की वजह से काफी चोटें आईं थीं और मैंने उसे आप्रेट करना था.......उस के बहुत से टैस्ट हुये थे जिन में से एक एचआईव्ही टैस्ट भी था जो उस का पॉजिटिव आया था। दो टैस्टों से इस टैस्ट को कंफर्म भी कर लिया गया था। मेरी उस के पिता से बात हो रही थो तो उस ने दो बातें कीं.....जो मुझे आज भी एकदम स्पष्ट याद हैं.....and only such casual remarks by some people have over a period of time and my education cum training at Tata Institute of Social Sciences, Bombay has revolutionized my thinking on such sensitive issues !!………………उस ने कहा कि डाक्टर साहब, आप को बताता हूं कि यह जब नया नया नौकरी लगा तो बाहर रह रहा था तो उस के पड़ोस रहने वाली एक लड़की ने इसे खराब कर दिया। और दूसरी बात उस ने कही कि मैं तो बस अपने शहर जा कर तुरंत इस की शादी कर दूंगा ......क्योंकि यह शादी के बाद बिलकुल ठीक हो जायेगा। इन दो बातों ने मुझे बहुत लंबे अरसे तक हिला कर रखा।
इसलिये आज जब यह विवाह-पूर्व युवक-युवती के चैक-अप वाले विज्ञापन वाली अखबार को ढूंढा तो दो बातें लिखने की तमन्ना जाग उठी।
शुक्रवार, 18 जुलाई 2008
हिंदी लेखकों के लिये कमाई के साधन !!
मैं पिछले कईं सालों में शायद सैंकड़ों लेख लिख डाले....अपना खूब खर्च किया, फैक्स पर , फोन पर , कलर्ड प्रिंटर पर, डाक पर, स्पीड पोस्ट पर .........बहुत ही खर्च किया लेकिन कभी हिसाब नहीं रखा। शायद तब कुछ उम्र का दौर ही कुछ ऐसा था कि लगता था कि बस, यार अखबार में फोटो के साथ लेख छप गया है ना, तो बस ठीक है। लेकिन मुझे कभी भी अखबार वालों की तरफ़ से कुछ नहीं मिला।
मुझे कृपया इस पोस्ट की टिप्पणी में यह मत लिखियेगा कि लेखक का काम तो समाज सेवा ही होता है उसे पैसे वैसे से क्या लेना देना। मैं भी बहुत बार ऐसा ही सोचता हूं .....लेकिन दिल की गहराईयों में मैं बहुत कुछ और भी सोचता हूं .....वह यह कि आखिर लेखक की मेहनत की ही इस देश में कद्र क्यों नहीं है।
मैं तो अच्छी खासी नौकरी करता हूं .....ऊपर वाले की मेहरबानी है ....लेकिन फिर भी मुझे यह इच्छा तो हमेशा रही है कि यार लिखने के एवज़ में कुछ तो मिलना ही चाहिये । इसलिये जब मैं अपने उन लेखक भाईयों की तरफ़ देखता हूं कि जो अखबार में कम तनख्वाह वाली नौकरीयां कर रहे होते हैं या केवल अपने लेखन के भरोसे ही जीते हैं तो मुझे यकीन मानिये बेइंतहा दुख होता है और इसलिये ये जब धड़ाधड़ नौकरियां बदलते हैं तो मुझे लगता है कि क्या करें वे भी .....ठीक कर रहे हैं।
इमानदारी से बताऊं तो मेरा यह व्यक्तिगत विचार है कि चाहे ब्लागिंग ही हो, लेकिन जहां पर कुछ कमाई वाई नहीं दिखती तो दिल ऊब ही जाता है। मुझे तो लगता है कि यह ह्यूमन सायकालोजी है........ब्लागिंग में भी मेरे साथ यही हो रहा है।
बलागिंग में भी क्या है.......बस कमाई विज्ञापनों से ही संभव है और वह भी केवल इतनी कि किसी के ब्राड-बैंड का खर्च निकल जाता है....ऐसा मैंने पढ़ा था किसी ब्लाग पर ही । हां, हां ठीक है ब्लागिंग से मन को संतुष्टि मिलती है ......
यह बात भी बहुत अखरती है कि इंजीनियरिंग करने के तुरंत बाद ये लड़के 35-40 हजार रूपये महीना कमाना शुरू कर देते हैं ......कैंपस प्लेसमेंट हो जाती है और जर्नलिज़म करने के बाद इतने इतने तेजस्वी पत्रकार केवल तीन-चार हज़ार पर ही नौकरी हासिल कर पाते हैं.....लेकिन मैं भी पता नहीं काम की बातें पता नहीं अकसर क्यों भूल जाता हूं........ये पत्रकार-वत्रकार ( मैं भी एक क्वालीफाइड पत्रकार हूं) तो बस समाज सेवा के लिये हैं ......इन्हें क्या ज़रूरत है कि ये अपने जीवन में थोड़ी सुख-सुविधायें भोग लें.......अच्छा है अगर इन्हें घर पर एसी की आदत नहीं पड़ेगी, अच्छा घर खरीद कर भी क्या करेंगे.....इन की जाब में तो इतनी मोबिलिटी है, क्या करेंगे कोई अच्छी कार मेनटेन कर के .....विकास पत्रकारिता पर इस का बुरा प्रभाव पड़ेगा, ..........कितनी बातें और गिनाऊं ??......
बस , ब्लागिंग का यह फायदा तो उठा ही लिया....अपने मन की बात दुनिया के सामने रख कर अपने मन का बोझ हलका कर लिया । लेकिन एक उलाहना तो कुछ लेखकों के साथ रहेगा कि हम लोग दिल खोल कर अपनी ट्रेड सीक्रेट्स अपने दूसरे लेखक बंधुओं के साथ शेयर नहीं करते ।
सोमवार, 30 जून 2008
Yahoo Answers ने बना दिया टॉप-कंटरीब्यूटर
in.answers.yahoo.com/my/profile?show=AA10015966
हिंदी ब्लागिंग के पितामहों के लिये मेरा एक प्रश्न है कि याहू आंसर्ज़ विश्व की बहुत सी भाषाओं में उपलब्ध है....लेकिन आप को इसे हिंदी में भी लाने के लिये कुछ करना होगा.। वैसे एक रोचक बात बता रहा हूं कि पंद्रह दिन पहले जब मैंने इस पर हिंदी में लिख कर जवाब देने शुरू किये तो हिंदी बढ़िया इस पर आने लगी। मुझे लगा कि यार, यह तो बढ़िया है ...अपने देशवासियों से हिंदी के उत्तरों के माध्यम से जुड़ने का एक बढ़िया तरीकाहै यह. लेकिन यह क्या, अभी मैं आप लोगों के साथ यह सब शेयर करना ही चाह रहा था कि मुझे याहू, आंसर्ज़ से एक मेल आया कि हम आप का एक जवाब डिलीट कर रहे हैं जिस का कारण यह दिया गया कि आप की भाषा गलत है (यानि हिंदी है। )......सो, मुझे बहुत दुख हुया । सोचा, आप से यह सब तो बाद में शेयर करूंगा.....लेकिन मैं उस के बाद अंग्रेज़ी में ही जवाब देता गया । वैसे यह याहू आंसर्ज़ का अनुभव है बड़ा रोमांचक। आप सब भी इस में कूद पढ़िये।
लेकिन असली बात बतानी तो मैं भूल ही गया कि आज मैं बहुत खुश हूं .....कारण ? .......वैसे कारण कोई इतना महान भी नहीं है....बस इतना सा कारण है कि आज याहू, आंसर्ज़ वालों ने इस नाचीज़ के नाम पर टॉप-कंटरीब्यूटर ( top contributor) की मोहर लगा दी है।
गुरुवार, 26 जून 2008
नफ़रत है मुझे इस दादागिरी से....
पिछले कुछ दिनों से यह जो हम जगह जगह देख रहे हैं कि रेलें बीच रास्ते में ही रोकी जा रहूी हैं, क्या आप को नहीं लगता कि यह एक दादागिरी आखिर कब खत्म होगी। आज भी अखबार में देखा कि लोगों नें पत्थर लाईनों पर रखे हुये हैं और उन पर बैठ कर रेलें रोके हुये हैं।
जितनी मेरी समझ है...उस के अनुसार तो यही सोचता हूं कि इस तरह के प्रदर्शनकारियों की जब कोई मांग मान ली जाती है तो इस से सारे देश के लोगों को एक बिलकुल गलत सिगनल मिलता है। मैं नहीं जानता किसी भी मांग को .....वह कुछ भी हो, किसी भी जाति की हो, किसी भी संप्रदाय की हो, किसी भी स्टेटस वाले बंदे की हो.......यह जो रेलें रोक कर रखने वाला चक्कर है ना,......यह बेहद आपत्तिजनक है, इस से तो यही लगता है कि सारे देश ने इन आंदोलनकारियों के आगे अपने घुटने टेक दिये हैं। पंजाबी में कहूं तो यही लगता है कि असीं तां ऐन्नां अग्गे कोडे हो गये।
जब कोई भी समूह ये रेलें रोकते हैं तो वे यह क्यों भूल जाते हैं कि इसी रेल में कोई बालक अपनी परीक्षा देने जा रहा है जिस का वह बरसों से इंतज़ार कर रहा है, किसी की बच्ची अपनी नौकरी की इंटरव्यू के लिये जा रही है जिस में वह पहले छः बार फेल हो चुकी है, कोई आदमी अपनी बूढ़ी मां को इलाज के लिये शहर के बड़े हास्पीटल ले जा रहा है, कोई अपनी बाप के मरने पर उस के दर्शन के लिये दौड़ा जा रहा है....उस का दाह-संस्कार उस के आने की इंतज़ार कर रहा है कि किसी तरह वह सूर्यास्त होने से पहले अपने गांव पहुंच जाये।
लेकिन इन आंदोलनकारियों को इन से क्या मतलब........सोचता हूं कि यह तो बर्बरता है, कितनी कठोरता है, बस मेरे पास इस तरह के आंदोलनों के विरोध में बोलने के लिये शब्द नहीं मिल रहे हैं। मैं इस झमेले में तो बिलकुल पड़ ही नहीं रहा हूं कि डिमांड वाजिब है कि नहीं है.....एक प्रजातंत्र देश में इसे जांचना का एक बढ़िया सिस्टम है।
सोच रहा हूं कि अगर इन रेल रोको आँदोलनकारियों को तुरंत ही न रोका गया तो वह समझ दूर नहीं जब ये आंदोलनकारी किसी गांव में इन गाड़ियों को रोके रखेंगे और इसी दौरान चोर-डाकू इन पर डाके डालेंगे, इस देश की बहन-बेटियों की आबरू से खेलेंगे और फिर क्या पता आने वाले समय में इन खड़ी हुई गाड़ियों के स्थान पर धर्म,संप्रदाय, जाति, श्रेणी के नाम पर कत्लो-गैरत ही हो जाये .............इसलिेये कुछ भी हो इन आंदोलनकारियों को तुरंत रोकना ही होगा।
वैसे भी अभी तो हम गाड़ियों से धक्का देकर नीचे गिरा देने वाली घटनाओं को याद करते हैं तो कांप उठते हैं। आज़ाद भारत में इस तरह से किसी भी तरह से विद्रोह को प्रगट करने का यह ढंग बेहद बेहूदा है.......आम सीधी सादी निर्दोष जनता पर अत्याचार है.......आम आदमी कभी भी इस तरह के प्रदर्शनकारियों के साथ नहीं होता।
सोचिये कि अगर किसी बंदे के पास उतने ही पैसे थे जितने का उस ने रेल टिक्ट खरीद लिया( मेरे साथ ही बहुत बार ऐसा हो चुका है, आज नेट पर बैठ कर प्रवचन करने लग गया हूं तो क्या !!)......तो जब किसी सुनसान जगह पर उस की ट्रेन रोक दी जाती है तो वह किस की अम्मा को अपनी मौसी बोलेगा, किस पेड़ से अपनी सिर टकरायेगा कि उस की ही किस्मत ऐसी क्यों है या फिर कटोरा पकड कर भीख मांगने पर वह मजबूर हो जायेगा।
मंगलवार, 17 जून 2008
अब हो पायेगी डायबिटीज़ की और भी कारगर स्क्रीनिंग एवं डायग्नोसिस..
हम ने अपने बचपन के दौरान यह सुना कि मोहल्ले की तारा मौसी को शूगर हो गई है.....लेकिन इस का पता कैसे चला ?......हुया यूं कि जिस जगह भी तारा मौसी पेशाब करती थी, कुछ समय बाद उस जगह पर मकौड़े आ जाते थे। बस, काफी लोगों की शूगर की डॉयग्नोसिस कुछ इसी ढंग से ही हुआ करती थी.....यह पेशाब पर मकौड़ा टैस्ट तो एक किस्म का कन्फर्मेटरी टैस्ट ही माना जाता था।
लेकिन इस टैस्ट पर निर्भर करने की भी कितनी खतरनाक हानियां होती होंगी ....यह तो आप के सामने ही है। जब तक शूगर के रोगी को ढूंढने के लिये यह देसी टैस्ट अपना काम करता था, तब तक अकसर शूगर रोग के मरीज़ में यह बड़ी हुई शूगर की वजह से शरीर के कईं अंग( गुर्दे, हृदय, आंखें इत्यादि) क्षतिग्रस्त हो जाया करते थे। लेकिन जो भी हो कभी कभार अगर किसी सज्जन-मित्र के पेशाब पर मकौड़ा दिख जाता था तो उस की हालत पतली हो जाती थी।
एक बात और यहां होनी ज़रूरी है कि आज के समय में भी हम लोगों के पास ऐसे कईं मरीज आते हैं जिन से जब शूगर रोग की हिस्ट्री पूछी जाती है तो वे अकसर कह देते हैं कि शूगर है तो, लेकिन बिलकुल थोड़ी ही है और वह भी केवल रक्त में ही है.......इसलिये, वह आगे कहते हैं, कि मैंने कभी दवाई नहीं ली...बस परहेज ही कर रहे हैं। ऐसी सोच बेहद हानिकारक है....कि शूगर का स्तर अगर ब्लड ही में है तो कोई बात नहीं। यह समझ लेना कि जब तक शूगर पेशाब में नहीं आ जाती ...तब तक किसी डाक्टर के पास जाने की जरूरत ही नहीं है.......यह बिलकुल गलत धारणा है। अब प्रश्न पैदा होता है कि पेशाब में शूगर कब आने लगती है.....इस के लिये यह जानना ज़रूरी है कि शूगर के पेशाब में आने के लिये उस को Renal threshold (रीनल थ्रैशहोल्ड) को पार करना होता है...और यह लक्ष्मण-रेखा है 180मि.ग्राम परसेंट ....कहने का मतलब यह कि जब रक्त में शूगर का स्तर यहां तक पहुंच जाता है( 100ml में 180mg.शूगर) तो इस के ऊपर हमारे गुर्दे इस को नहीं झेल पाते हैं और शक्कर पेशाब के साथ शरीर से बाहर आने लगती है।
ऐसा तो आप जानते ही हैं कि उस जमाने में शूगर की स्क्रीनिंग वाली बात इतनी आम नहीं थी ( अब कौन सा यह सब कुछ इतना आम हो गया है!!)। अकसर मकौड़े दिखने पर ही लोग पेशाब में शक्कर की लैबोरेटरी जांच करवाया करते थे। फिर धीरे धीरे लोग शुगर की स्क्रीनिंग के लिये रक्त की जांच करवाने लगे....खाली पेट और फिर खाना खाने के बाद। अब मैडीकल कम्यूनिटी ने यह सिफारिश की है कि शूगर रोग की स्क्रीनिंग के लिये भी ग्लाइकोसेटेज हीमोग्लोबिन( glycosated haemoglobin...Haemoglobin A1c….HbA1c) टैस्ट करवाया जाए।
जर्नल ऑफ क्लीनिकल ऐंडोक्राईनॉलाजी एवं मैटाबॉलिज़म में छपने वाले एक लेख अनुसार चोटि के डाक्टरों के एक एक्सपर्ट पैनल ने यह रिक्मैंड किया है कि मरीज के रक्त से किया जाने वाला ग्लाईकोसेटेज हीमोग्लोबिन टैस्ट जिसे शूगर के मरीजों में इस लिये किया जाता है कि पिछले तीन महीने के दौरान उन के रक्त में शूगर के कंट्रोल का पूरा नक्शा इलाज करने वाले डाक्टर के पास उपलब्ध हो जाए, अब इसी टैस्ट को शूगर के मरीजों की स्क्रीनिंग एवं डॉयग्नोसिस के लिये भी इस्तेमाल किया जाना चाहिये।
शूगर की मौजूदा स्क्रीनिंग के द्वारा डाक्टरों को कईं बार शूगर की डायग्नोसिस में दिक्कत आती है और इस की टैस्टिंग के लिये मरीज़ों को खाली पेट भी रहना पड़ता है। मौजूदा हालात में कुछ हद तक तो डायग्नोसिस में दिक्कत आने की वजह से ही कईं मरीज़ों का बहुत कीमती समय नष्ट हो जाता है और उन के शरीर में शूगर से संबंधित जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं।
आप को जान कर बहुत हैरानी होगी कि जॉन हॉपकिंज़ इंस्टीच्यूट ऑफ मैडीसन के मैडीकल विशेषज्ञों के अनुमान अनुसार अभी भी अमेरिका में शूगर के 30प्रतिशत मरीज ( 62लाख लोग) ऐसे हैं जिन में शूगर रोग का डायग्नोसिस ही नहीं हो पाया है। मैं भी यह पढ़ कर इस लिये चौंक गया था कि अगर अमेरिका जैसे देश का यह हाल है तो अपने यहां की बात ही क्या करें !!
मैडीकल एक्सपर्ज़ के अनुसार इस टैस्ट ...ग्लाइकोसेटेड हिमोग्लोबिन...HbA1c...को शूगर रोग की स्क्रीनिंग के लिये इस्तेमाल किये जाने के फायदे ये हैं कि एक तो मरीज को टैस्ट करवाने के लिये खाली पेट रहने की ज़हमत नहीं उठानी पड़ती और दूसरा यह कि यह टैस्ट पूरी तरह स्टैंडर्डाइज़ हो चुका है। इसलिये डाक्टरों के इस ग्रुप ने सलाह दी है कि जब कोई व्यक्ति यह टैस्ट करवाये और अगर इस का स्तर रिपोर्ट में 6.5 प्रतिशत या उस से ज़्यादा आये तो फिर भी शूगर रोग की डायग्नोसिस को कंफर्म करने के लिये ब्लड-शूगर की जांच करवानी भी ज़रूरी है।
जाते जाते यह ध्यान आ रहा है कि कहां से चले थे....बाथ-रूम में किसी बंदे के यूरिन पर चलने वाले मकौड़े से और अब हम लोग पहुंच गये हैं ऐसे टैस्ट पर...glycosated haemoglobin…. जो शूगर रोग के डायग्नोसिस के साथ साथ इस बात का भी खुलासा कर देता है कि पिछले तीन महीनों के दौरान किसी शूगर के मरीज में ब्लड-शूगर का कंट्रोल कैसा रहा है। इसलिये भी चिकित्सक की सलाह अनुसार किसी भी शूगर के मरीज को इस टैस्ट ....Glycosated haemoglobin….HbA1c …को भी नियमित तौर पर करवा कर के अपने ब्लड-शूगर के कंट्रोल पर नज़र रखनी बहुत ज़रूरी है।
वैसे यह टैस्ट कोई खास महंगा भी नहीं है....मेरे ख्याल में दो-तीन सौ रूपये में हो जाता है और इस के लिये मरीज के रक्त का सैंपल चाहिये होता है।
शुक्रवार, 13 जून 2008
हरिद्वार में ककड़ी खाने से दो भाई मरे, अमेरिका ने लगाई टमाटर पर रोक..
कुछ दिन पहले हरिद्वार में दो भाईयों ने खेत से तोड़ कर ककड़ी क्या खाई, अपनी मौत को बुलावा दे दिया। उस के कुछ ही समय बाद उन की हालत इतनी बिगड़ गई कि एक भाई ने तो हस्पताल जाते जाते ही दम तोड़ दिया और कुछ समय बाद दूसरे की भी मृत्यु हो गई। कारण यह बताया जा रहा है कि जिन ककड़ीयों को इन भाईयों ने खेत से तोड़ कर खाया था उन पर कुछ समय पहले ही ज़हरीले कीटनाशक का स्प्रे किया गया था।
इस से एक बात फिर से उजागर हो गई है कि हम लोग खा क्या रहे हैं। यह तो अब हम सब लोग जान ही गये हैं कि हमारे यहां इन खतरनाक एवं प्रतिबंधित कीटनाशकों का भी जबरदस्त इस्तेमाल हो रहा है। रिपोर्टज़ यह भी हैं कि ये जो हमें सब्जियां-फल बड़े ताज़े ताज़े से रेहड़ीयों इत्यादि पर करीने से सजे हुये दिखते हैं इन पर भी कईं तरह के रासायनों का स्प्रे कर के इन्हें इतना फ्रेश दिखाया जाता है और ये रासायन बहुत हानिकारक होते हैं।
मैं जब भी खेतों में फसलों पर मजदूरों के द्वारा स्प्रे किया जाता देखता हूं तो अकसर उन के स्वास्थ्य के बारे में सोचता हूं कि वे किस तरह बिना किसी तरह की जानकारी के , बिना किसी तरह के सेफ्टी-गियर के...यहां तक कि बिना अपना मुंह एवं नाक ढके हुये.....इस तरह का काम करते रहते हैं। लेकिन कल ही मेरी नज़र एक रिपोर्ट पर पढ़ी है जिस में बताया गया है कि अमेरिका की शीर्ष हैल्थ एजेंसी ने यह बात कही है कि ऐसी लाईसैंसधारी पैस्टीसाइड स्प्रे करने वालों में जिन्होंने अपने जीवनकाल में एक-सौ दिन से ज़्यादा इन पैस्टीसाइडों को स्प्रे करना का काम किया है, उन में डायबिटीज़ रोग होने का खतरा 20 से 200 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
Licensed pesticide applicators who used chlorinated pesticides on more than 100 days in their lifetime were at greater risk of diabetes, according to researchers from the National Institutes of Health (NIH). The associations between specific pesticides and incident diabetes ranged from a 20 percent to a 200 percent increase in risk, said the scientists with the NIH's National Institute of Environmental Health Sciences (NIEHS) and the National Cancer Institute (NCI).
दो-चार दिन पहले पता चला कि अमेरिका के हैल्थ-विभाग की ओर से वहां के नागरिकों को कुछ तरह के टमाटरों का इस्तेमाल न करने की सलाह दी गई है। इस का कारण यह है कि उन के हैल्थ विभाग ने पता लगाया है कि कुछ इंफैक्टेड किस्म के टमाटरों की वजह से वहां कुछ लोगों को सालमोनैला इंफैक्शन ( salmonella infection) हो गई । यह इंफैक्शन एक बैक्टीरिया सालमोनैला की वजह से होती है जिस में दस्त लग जाते हैं जिन के साथ खून भी आने लगता है। वहां पर तो पब्लिक को इस बात के बारे में भी सचेत किया गया है कि वे जिन टमाटरों का इस्तेमाल कर रहे हैं उन के बारे में स्टोर से इस के बारे में भी पूरी जानकारी लें कि वे किस क्षेत्र की पैदावार हैं। फिर उन्होंने अपने नागरिकों को इस बारे में भी सचेत किया है कि टमाटर की कौन कौन सी किस्में इस साल्मोनैला इंफैक्शन से रहित हैं और इन का प्रयोग किया जा सकता है।
हम कहां खड़े हैं...........इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारे देश में हर समय इन दस्तों, पेचिशों, एवं खूनी दस्तों के मरीज़ तैयार मिलते हैं, लेकिन कभी किसी तरह का कारण पता करने की कोशिश ही कहां की जाती हैं। कितने लोग हैं जो मल का टैस्ट करवाते हैं या करवा पाते हैं......कोई समझता है यह किसी शादी बियाह में खाने से हो गया, कोई कहता है कि यह गर्मी के मिजाज की वजह से है, कोई सोचता है कि इस का कारण यह है कि उसे रात में दही पचता नहीं है, कोई सोचता है कि तरबूज, खरबूजा खाने के बाद पानी लेने से ये दस्त हो गये हैं............बस, किसी तरह के कारण की गहराई में जाने की न तो कोशिश ही की जाती है ...............वैसे, हमारे यहां की समस्यायें हैं भी तो कितनी कंपलैक्स कि किसी पेचिश के मरीज को साफ-स्वच्छ पानी पीने का मशविरा देते हुये भी लगता है कि उससे मज़ाक सा ही किया जा रहा है..........कितने दिन पी लेगा वो उबला हुया पानी !!
अब आते हैं इस बात की तरफ़ की इस से आखिर हमें सीख क्या मिलती है............सीख यही है कि दोस्तो कितना भी कह लें, खाना तो यही सब कुछ ही हम ने है....लेकिन अगर कुछ थोड़ी बहुत जन-जागरूकता कम से कम इस बारे में हो जाये कि बिना अच्छी तरह धोये हुये कोई सब्जी-फल का सेवन तो एक इंस्टैंट ज़हर है ............लेकिन फिर भी रोज़ाना कितनी सी कीटनाशकों से लैस सब्जियों वगैरह का सेवन हम लोग करते हैं.....चाहे कितनी भी अच्छी तरह से धुल चुकी हों लेकिन उस से भी वे स्लो-प्वाईज़न जैसा असर तो रखती ही हैं। लेकिन इन के खाये बिना कोई चारा भी तो नहीं है। और अगर आप कहते हैं कि ऑगैनिक हो जाएं, तो दोस्तो यह तो आप को भी पता है कि यह कितने लोगों के बस की बात है !!
इन्हीं कीटनाशकों की वजह से मैंने भी पिछले दो-वर्ष से आम को चूस कर खाना बिलकुल बंद कर दिया है। हुया यूं कि दो साल पहले कईं बार ऐसा हो गया कि जब मैं आम को चूसता और बाद में उस की गुठली को निकालने के लिये उस का छिलका छीलता तो हैरान हो जाता कि बाहर से इतना बढ़िया दिखने वाला आम अंदर से इतना सड़ा-गला और कीड़े लगा हुआ....... और ऐसा बहुत बार हुआ.............बस, तब से इतनी नफ़रत हो गई है कि अब तो आम की फाड़ी काट कर उसे चम्मच से ही खाना ठीक लगता है.....कोशिश यही रहती है कि जहां तक हो सके आम के छिलके को मुंह ना ही लगाना पड़े।
कहीं ऐसा तो नहीं कि इस समय आप आम खा रहे हों और मैंने आप का मजा किरकिरा कर दिया हो...........खाइये, खाइये....इस गर्मी के मौसम में आनंद लूटिये।
मंगलवार, 10 जून 2008
महिलाओं को इस तरह के विषयों पर आपस में बात करते रहना चाहिये...भाग2
सोमवार, 9 जून 2008
महिलायों को इन विषयों के बारे में आपस में बात करनी चाहिये....भाग..1.
इसलिये सोच रहा हूं कि आज दो-चार बातें अपनी जानकारी के आधार पर महिलायों के स्वास्थ्य के बारे में विशेषकर महिलायों में होने वाले कैंसर के बारे में ही करते हैं। अकसर विभिन्न कारणों की वजह से हमारे देश की महिलायें अपने शरीर की देखभाल पूरी तरह से कर नहीं पाती हैं। उन का तो किसी चिकित्सक के पास जाने का फैसला भी ज्यादातर उन के पति की इच्छा के मुताबिक ही होता है।
स्तन कैंसर के रोग के बारे में भी इतनी जागरूकता है नहीं। कोई प्रिवैंटिव प्रोटोकॉल फॉलो नहीं किया जाता। बाहर के देशों में तो महिलायें जैसे ही 35 वर्ष की होती हैं वे महिला-रोग विशेषज्ञ से मिल कर अपनी नियमित जांच करवाती रहती हैं......क्लीनिकल चैक-अप के साथ-साथ वे अपनी मैमोग्राफी भी नियमित तौर पर चिकित्सक की सलाह के अनुसार करवाती रहती हैं।
मैमोग्राफी एक तरह का एक्स-रे ही है जिस के करवाने से महिलाओं के स्तन में आने वाले बारीक से बारीक बदलाव को प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ा जा सकता है। वैसे तो बाहर के देशों में और अब तो हमारे देश में भी महिलायें इसे करवाने लगी हैं.....लेकिन फिर भी हमारे यहां तो अभी भी यह स्तन में कोई तकलीफ़ होने पर ही करवाया जाता है। तो, यहां ज़रूरत है इस मैमोग्राफी तकनीक को पापुलर करने की। यह लगभग सात-आठ सौ रूपये में हो जाता है....कीमत विभिन्न जगहों पर अलग हो सकती है। आम तौर पर जिन सैंटरों में सीटी-स्कैन आदि की मशीन होती है वहां इस की भी सुविधा होती ही है। बाहर के देशों में स्त्रियां इस के बारे में बेहद चेतन हैं। इसलिये हमारे देश की महिलायों को भी अपने चिकित्सक की सलाह से इसे अवश्य करवा लेना चाहिये।....करवा क्या लेना चाहिये बल्कि नियमित करवाना चाहिये...जहां तक मुझे ध्यान है एक तो बेस-लाइन मैमोग्राफी 35 साल की उम्र में होनी चाहिये और उस के पांच –पांच साल के बाद इसे रिपीट किया जाना जरूरी होता है। इस की विस्तृत जानकारी एवं शैड्यूल आप को अपनी महिला रोग विशेषज्ञ से मिल जायेगा। उस के बाद एक उम्र के बाद तो इस मैमोग्राफी को हर साल के बाद रिपीट करने की हिदायत दी जाती है। यह बेहद लाज़मी है....क्योंकि अकसर देखा गया है कि हमारे देश में जब तक स्तन में किसी तरह की गांठ वांठ के लिये अपने चिकित्सक से मिलती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिये इस मैमोग्राफी की मदद से छोटे से छोटे बदलाव को बहुत सी आसानी से पकड़ कर किसी तरफ भी फैलने से पहले ही उसे काबू कर लिया जाता है।
वैसे तो स्त्री –रोग चिकित्सक महिलायों को अपने वक्ष-स्थल की स्वयं-जांच के लिये भी बताती ही रहती हैं....महिलाओं को इस का पालन भी करना चाहिये....और कुछ दिन पहले से कहीं पर पढ़ा है कि इस स्वयं-जांच का एक चार्ट सा जो अपने चिकित्सक से मिले उसे उन्हें अपने कपड़ों की अलमारी में चिपका लेना चाहिये....ताकि एक तो उस के अनुसार ही वे अपने वक्ष-स्थल की स्वयं जांच करती रहें और दूसरा यह कि यह चार्ट उन को यह काम करने की याद भी दिलाता रहेगा।
एक बात और जो बहुत ही ज़रूरी है कि वैसे तो बिना किसी तकलीफ़ के भी अपनी मैमोग्राफी करवानी बहुत ज़रूरी है लेकिन एक बात तो बहुत बहुत ही ज़रूरी है कि जिन महिलायों के परिवार में किसी नज़दीकी रिश्तेदार को स्तन-कैंसर की बीमारी हो चुकी है जैसे कि किसी की मां,बहन, नानी, मौसी .....ऐसे में इन महिलायों को तो अपनी नियमित जांच करवानी और भी बहुत महत्वपूर्ण है।
इस जानकारी को हिंदी में ब्लाग पर डालने के बारे में मैंने बहुत सोचा....लेकिन मुझे यह पोस्ट लिखने के लिये मज़बूर होना ही पड़ा। उसका पहला कारण तो यह कि पोस्ट पढ़ने वाले काफी पुरूष भी हैं और देश में महिलाओं के स्वास्थ्य की विडंबना भी यही है कि उस के शरीर से संबंधित फैसले अभी भी पुरूषों के हाथ ही में हैं। और, दूसरा यह कि जो महिला ब्लागर हैं ....मैं समझता हूं ये सब बेहद प्रबुद्ध महिलायें हैं जो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं जिन्हें इस तरह की जानकारी पहले ही से होगी ....तो इन सभी बहनों से मेरी गुज़ारिश यही है कि अपने ग्रुप में .......अपनी घर काम करने वाली बाई से शुरू कर के , अपनी किट्टी पार्टी की सदस्याओं एवं अपने कार्य-क्षेत्र के इंफार्मल ग्रुप में इस तरह की चर्चायें किया जायें ....................क्योंकि यह आप के अपने स्वास्थ्य का प्रश्न है................आरक्षण बिल का तो हमें अभी पता नहीं क्या होगा, लेकिन बहनो, अभी अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी तो थामो।( यह सब कहना जितना आसान है , काश ! यह सब प्रैक्टीकल लाइफ में भी इतना ही आसान होता !!)…………फिर भी , .......Try to take control of your life from this moment onwards……….afterall it is the question of your well-being……….which is so very important for the well-being of your kids …..not only kids, but your whole family………even extended family !!
Wish all of you pink of health and spirits !!
कल दूसरे भाग में महिलायों के गर्भाशय के मुख के कैंसर के बारे में कुछ अहम् बातें करूंगा।
शुक्रवार, 6 जून 2008
जब दांतों में खाना फंसने से आप परेशान होने लगें...
दांतों में खाना फंसना एक बहुत ही आम समस्या है। लेकिन इस विषय पर कुछ विशेष बातें करने से पहले चलिये यह तो समझ लें कि प्रकृति ने हमारे दांतों, जिह्वा, गालों की संरचना एवं कार्य-प्रणाली ऐसी बनाई है कि दांतों के बीच सामान्यतः कुछ भी खाद्य पदार्थ फंस ही नहीं सकता। जिह्वा एवं गालों के लगातार दांतों पर होने वाले घर्षण से हमारे दांतों की सफाई होती रहती है। अगर कभी-कभार कुछ फंस भी जाता है तो वह कुल्ला करने मात्र से ही निकल जाता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति के किसी विशेष दांत अथवा दांतों में ही खाना फंस रहा है तो समझ लीजिये की कहीं न कहीं तो गड़बड़ है जिस के लिये आप को दंत-चिकित्सक से अवश्य परामर्श करना होगा।
आम तौर पर देखा गया है कि बहुत से लोग ऐसे ही टुथ-पिक या दिया-सिलाई की तीली से फंसे हुये पदार्थों को कुरेदते रहते हैं। यह तो भई समस्या का समाधान कदापि नहीं है। इस से तो कोमल मसूड़े बार बार आहत होते रहते हैं। इसलिये टुथ-पिक के इस्तेमाल की तो हम लोग कभी भी सलाह नहीं देते हैं.....इसे नोट किया जाए। कुछ लोग अपने आप ही इस समस्या से समाधान हेतु इंटर-डैंटल ब्रुश ( अर्थात् दो दांतों के बीच में इस्तेमाल किया जाने वाला ब्रुश) को यूज़ करना शुरू कर देते हैं । लेकिन एक बात विशेष तौर पर काबिले-गौर है कि दांतों में खाद्य-पदार्थों के फंसने की समस्या का अपने ही तरीके से समाधान ढूंढने का सीधा-सीधा मतलब है ......दंत-रोगों को बढ़ावा देना।
अब ज़रा हम दांतों में खाना फंसने के आम कारणों पर एक नज़र डालेंगे....
दंत-छिद्र ( दांतों में कैविटीज़)
मसूड़ों की सूजन ( पायरिया रोग)
मसूड़ों की सर्जरी के बाद
दंत-छिद्रों और पायरिया का समुचित उपचार होने के पश्चात् इस समस्या का समाधान संभव है। जहां तक मसूड़ों की सर्जरी के बाद दांतों में फंसने की बात है, यह आम तौर पर कुछ ही सप्ताह में ठीक हो जाता है क्योंकि थोड़े दिनों में मसूड़े एवं उस के साथ लगे उत्तक अपनी सही जगह ले लेते हैं।
कईं बार ऐसे मरीज़ मिलते हैं जिन के दांतों में स्वाभाविक तौर पर ही काफी जगह होती है और उन में कभी कभार थोड़ा खाना अटकता तो है....लेकिन केवल कुल्ला करने मात्र से ही सब फंसा हुया निकल जायेगा।
ध्यान में रखने लायक कुछ विशेष बातें.....
कुछ ऐसे लोग अकसर दिखते हैं जो एक छ्ल्ले-नुमा आकार में छोटे-छोटे तीन औज़ार हमेशा अपने पास ही रखते हैं...एक दांत खोदने के लिये, दूसरा कान खोदने के लिए और तीसरा नाखून कुरेदने के लिये। ऐसे शौकिया औज़ारों के परिणाम अकसर खतरनाक ही होते हैं।
कईं बार जब कोई मरीज़ दंत-चिकित्सक के पास जा कर किसी दांत में कुछ फंसने ( उदाहरण के तौर पर कोई रेशेदार सब्जी जैसे पालक, साग, बंद-गोभी, मेथी इत्यादि) मात्र से ही दंत-चिकित्सक को यह संकेत मिल जाता है कि इस दांत में या अमुक दो दांतों के बीच कुछ गड़बड़ है। चाहे मरीज को अपने दांत देखने में सब कुछ ठीक ठाक ही लगे, लेकिन उपर्युक्त दंत-चिकित्सा औजारों से उस स्थान पर दंत-छिद्र अथवा मसूड़ों की तकलीफ़ की पुष्टि की जाती है। आवश्यकतानुसार दांतों का एक्स-रे परीक्षण भी कर लिया जाता है।
जहां कहीं भी मुंह में दांतों के बीच या कहीं भी खाना फंसेगा, स्वाभाविक है कि यह वहां पर सड़ने के बाद बदबू तो पैदा करेगा ही और साथ ही साथ आस-पास के दांतों के दंत-क्षय (दांतों की सड़न) से ग्रस्त होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
इसलिये दांतों में खाना फंसने का इलाज स्वयं करने की बजाए दंत-चिकित्सक से समय पर परामर्श लेने में ही बेहतरी है।
गुरुवार, 5 जून 2008
जब भी मुझे यह कमीशन का चांटा लगता है...
यह जो अखबार वाले अपने लेखकों को उनके लेखों एवं फीचरों के लिये मानदेय भेजते हैं, मुझे यह सब बहुत हास्यास्पद सा लगता है। लेखकों की तकदीर पर बस करूणा आती है। अब मैं अपना ही किस्सा ब्यां करता हूं....मैंने शायद जनवरी 2006 में एक अखबार में मसूड़ों से खून आने के संबंध में एक लेख लिख भेजा था। लगभग पांच-छः महीने बाद उन्होंने मुझे 200 रूपये का एक चैक भेज दिया था( आउट-स्टेशन चैक)...पानीपत से जारी किया हुया।
मेरे पास भी वह चैक एक-डेढ़ महीने तक तो ज्यों का त्यों पड़ा रहा। फिर मैंने कुछ दिन पहले –लगभग 10-15 दिन पहले- अपने जगाधरी के खाते में जमा करवा दिया।
आज जब मैं पास-बुक में एन्ट्री करवाने के लिये गया तो बाबू कह रहा था कि आप का चैक भी पास हो गया है। मैंने कहा...ठीक है। जब मैंने पास-बुक में प्रविष्टियां देखीं तो 60रूपये( साठ रूपये) उन 200रूपयों में से कटे हुये थे। मैंने बाबू से पूछा कि यह 60 रूपये का तमाचा किस लिये ? ….तो वह कहने लगा कि 25 रूपये तो डाक-खर्च और बाकी बैंक की कमीशन !! मैं उस से पूछना चाह रहा था कि देख लो, भाई, कोई और भी कटौती रह गई हो तो हसरत पूरी कर डालो।
गुस्सा तो मुझे बहुत आया और बहुत अजीब सा भी लगा ...क्या,यार, लेखकों की यह हालत !! इन कमीशनों के चक्कर में उन के फाके करवाओगे क्या ? उन से ही काहे की ये....... ............( खेद है, ये शब्द मैं यहां लिखने में असमर्थ हूं क्योंकि उन्हें सैंसर करना पड़ रहा है....कभी मौका मिलेगा तो व्यक्तिगत रूप में इस शब्द का रहस्य उजागर कर दिया जायेगा) .....भई , किसी बंदे को आपने 200 रूपये भेजे हैं तो उस के हाथ में लगे केवल 140 रूपये।
अखबार वाले इस राशि का ड्राफ्ट नहीं भेज रहे क्योंकि शायद उन्हे यह झँझट लग रहा होगा, और शायद इसलिये भी नहीं कि ड्राफ्ट बनाने में पैसे लगते हैं...लेकिन आप एक काम तो कर ही सकते हैं कि उसे मनीआर्डर तो करवा ही सकते हैं । और मनीआर्डर का खर्चा आप उस की राशि से घटा लें, जैसे कि अगर आपने किसी मेरे जैसे स्ट्रगलर लेखक को 200 रूपये भेजने हैं , जिस के मनीआर्डर पर दस रूपये लगने हैं तो आप उसे 190 रूपये मनीआर्डर करवा कर छुट्टी करें, और क्या और ये पैसे उसे अगले दो-तीन दिन में पहुंच भी जायेंगे !! आउटस्टेशन चैक के भुगतान के लिये इतने दिन भी तो लग जाते हैं।
कोई पता नहीं किसी लेखक के द्वारा उस राशि की कितनी शिद्दत से इंतज़ार हो रही होगी !!.......लेकिन बात कहीं ना कहीं संवेदना की है....मानवीय मूल्यों की है...अब अखबार वालों को यह सब कौन समझाए ? कौन डाले बिल्ली के गले में घंटी !!.......इसलिये सब कुछ जस का तस चलता आ रहा है......खूब चल रहा है और माशा-अल्ला आने वाले समय में भी बखूबी चलता ही रहेगा।
बुधवार, 4 जून 2008
बच्चों के दांतों को क्यों लेते हैं इतना लाइटली !!
लेकिन मां-बाप यही समझ लेते हैं कि इन दूध के दांतों का क्या है, इन्होंने तो गिरना ही है और पक्के दांतों ने तो आना ही है। इसलिये बच्चों को डैंटिस्ट के पास ले जाने का काहे का झंझट लेना। लेकिन यह बहुत बड़ी गलतफहमी है।
और यह धारणा बच्चे के बिल्कुल छोटे होते ही शुरू हो जाती है। बच्चे के मुंह में दूध की बोतल लगी रहती है और वह सो जाता है जिस की वजह से उस के बहुत से दांतों में कीड़ा लग जाता है......( क्या यह वास्तव में कोई कीड़ा ही होता है , इस की चर्चा किसी दूसरी पोस्ट में करूंगा।) लेकिन फिर भी मां-बाप डैंटिस्ट के पास जाने से बचते रहते हैं।
जब बच्चों के दांत इतने ज़्यादा सड-गल जाते हैं कि वह दर्द की वजह से रात-रात भर मां-बाप को जागरण करने पर मजबूर करता है तो मां-बाप को मजबूरी में डैंटिस्ट के पास जाना ही पड़ता है। लेकिन अकसर बहुत से केसों में मैं रोज़ाना देखता हूं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.....दांत के नीचे फोड़ा( एबसैस) सा बना होता है......और बहुत बार तो इन दूध के दांतों को निकालना ही पड़ता है। अब शायद कईं लोग यह समझ रहे होंगे कि दूध के दांत ही तो हैं....इन्हें तो वैसे भी निकलना ही था....अब अगर डैंटिस्ट को इन्हें निकालना ही पड़ा तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा।
इस का जवाब देने की कोशिश कर रहा हूं ....ठीक है दूध के दांत गिरने हैं....लेकिन मुंह में मौजूद दूध के बीस दांतों के गिरने का अपना एक निश्चित समय है। वह समय कौन सा है ?........वह समय वह है जब उस के नीचे बन रहा पक्का दांत इतना तैयार हो जाता है कि उस के ऊपर आने के प्रैशर से दूध के दांत की जड़ धीरे धीरे घुलनी ( resorption of deciduous teeth) शुरू हो जाती है कि वह दूध का दांत धीरे धीरे इतना हिलना शुरू हो जाता है कि आम तौर पर बच्चा स्वयं ही उसे हिला हिला कर निकाल देता है.....( और हमारी और आप की तरह किसी मिट्टी वगैरा में फैंकने का टोटका कर लेता है !!!)...
यह तो हुया दूध के दांत के दांत का नार्मल गिरना......क्योंकि इस के गिरते ही कुछ दिनों में नीचे से आ रहा पर्मानैंट दांत इस की जगह ले लेता है और सब कुछ नार्मल हो जाता है। यह संतुलन कुदरत ने बेहद नाज़ुक सा बनाया हुया है....लेकिन यह संतुलन बिगड़ता है तब जब हमें बच्चों के दूध के दांतों को उन के नार्मल गिरने के समय से पहले ही निकलवाना पड़ जाता है...जैसा कि आज कल खूब हो रहा है क्योंकि बच्चे किसी के भी कहने में हैं नहीं....एक-एक, दो-दो हैं...इसलिये इन की पूरी दादागिरी है जनाब.......मॉम-डैड को टाइम है नहीं , बस जंक-फूड से, महंगी महंगी आइस-क्रीम से , विदेशी चाकलेटों के माध्यम से ही इन के सामान्य स्वास्थ्य के साथ साथ दांतों की सेहत का भी मलिया मेट किया जा रहा है। और फिर डैंटिस्टों के क्लीनिकों के चक्कर पे चक्कर................।
पच्चीस साल डैंटल प्रैक्टिस करते करते यही निष्कर्ष निकाला है इलाज से परहेज भला कहावत दंत-चिकित्सा विज्ञान में बहुत ही अच्छी तरह फिट होती है। क्योंकि ट्रीटमैंट माडल तो बाहर के अमीर मुल्क ही नहीं निभा पाये तो हम लोगों की क्या बिसात है । सरकारी हस्पतालों के डैंटिस्टों के पास वर्क-लोड इतना ज़्यादा है कि क्या कहूं.......सारा दिन अपने काम में गड़े रहने के बावजूद भी ......डैंटिस्ट के मन को ही पता है कि वह मरीज़ों के इलाज के पैरामीटर पर कहां स्टैंड कर रहा है। इस का जवाब केवल उस सरकारी डैंटिस्ट की अंतर-आत्मा ही दे सकती है। दूसरी तरफ देखिये तो प्राइवेट डैंटिस्ट का खर्च आम आदमी नहीं उठा सकता ....प्रोफैशन में पूरे पच्चीस साल पिलने के बाद अगर ऐसी स्टेटमैंट दे रहा हूं तो यह पूरी तरह ठोस ही है........प्राइवेट डैंटिस्ट के पास जाना आम आदमी के बस की बात है नहीं.......एक तरह से देखा जाये तो वह भी क्या करे......उस ने भी इतने साल बिताये हैं पढ़ाई में, डैंटल चिकिस्ता के लिये इस्तेमाल होने वाली दवाईयां इतना महंगी हो गई हैं, प्राइवेट क्लीनिकों के खर्च इतने हो गये हैं, ए.सी -वे.सी के बिना अब बहुत मुश्किल होती है..................इतने ज़्यादा फैक्टर्ज़ हैं कि क्या क्या लिखूं। कहना बस इतना ही चाह रहा हूं कि डैंटल ट्रीटमैंट महंगी है और इस के बहुत से कारण हैं।
अच्छा तो मैं बात कर रहा था बच्चों के दूध के दांत समय से पहले जब निकलवाने पड़ जाते हैं तो अकसर गड़बड़ होने के चांस बहुत बढ़ जाते हैं ....क्यों ? ....वह इसलिये कि इन दूध के दांतों ने एक तरह से पक्के दांतों की जगह घेर कर रखी होती है और जब ये ही समय से पहले निकल जाते हैं तो कईं बार इन पक्के दांतों को अपनी निश्चित जगह पर जगह न मिलने के कारण कहीं इधर-उधर निकलना पड़ता है...और कईं बार तो ये जगह के अभाव के कारण मुंह में निकल ही नहीं पाते और जबड़े की हड्डी में ही दबे रह जाते हैं। और बहुत बहुत टेढ़े-मेढ़े होने की वजह से फिर इन के ऊपर तारें /ब्रेसेज़ लगवाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं जिन में काफी पैसा भी खर्च होता है और समय भी बहुत लगता है।
तो, सलाह यही है कि छोटे बच्चों को एक साल की उम्र में डैंटिस्ट के पास पहली बार ले कर जाना बेहद लाजमी है। उस के बाद हर छःमहीने बाद हरेक बच्चे का डैंटिस्ट के द्वारा देखा जाना बहुत बहुत ज़रूरी है क्योंकि हम सब ने बहुत अच्छी तरह से पढ़ रखा है ना कि a stitch in time saves nine......तो फिर यहां भी यह बात बिल्कुल फिट बैठती है।
इसी तरह की बच्चों के दांतों की बातें मैं अपनी कुछ अगली पोस्टों में करूंगा और साथ में एक्स-रे के माध्यम से अपनी बात स्पष्ट करता रहूंगा। तो, दांतों और मसूड़ों के परफैक्ट स्वास्थय का सुपरहिट फार्मूला तो यहां लिख ही दूं........रोज़ाना दो-बार ब्रुश करें.....रात को सोन से पहले ब्रुश करना सुबह वाले ब्रुश से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है और इस के साथ ही साथ सुबह सवेरे रोज़ाना जुबान साफ करने वाली पत्ती ( टंग-क्लीनर ) से जीभ रोज़ साफ करनी भी निहायत ज़रूरी है।
बाकी बातें फिर करते हैं, आज पहली बात अपनी पोस्ट आन-लाइन लिख रहा हूं, इसलिये डर भी रहा हूं कि कहीं कोई गलत कुंजी न दब जाये और यह गायब ही ना जाये.......ऐसा एक-दो बार पहले हो चुका है। इसलिये अब मैं तुरंत पब्लिश का बटन दबाने में ही बेहतरी समझ रहा हूं।
मंगलवार, 3 जून 2008
वो मैला कुचैला रद्दी कागज़ !
सोमवार, 2 जून 2008
क्या आप ने कभी लट्टू चलाया है ?
मैं
अच्छा तो अब आप को याद आ रही है उन पांच-पांच पैसे में बिकने वाली मिट्टी के लट्टूयों की .....तो यह भी बता डालिये कि आप के इस के साथ क्या अनुभव रहे ? मुझे तो आज दोपहर में उन लट्टूयों के बारे में ही सोच कर इतना सुखद लग रहा था कि क्या कहूं !!
दोस्तो, मैं उस ज़माने की बात कर रहा हूं कि जब ये मिट्टे के बने लट्टूओं पर बहुत बढ़िया सा चमकीला काला-लाल पेंट भी किया गया होता था। उन्हें देखना ही कितना सुखद हुया करता था। और फिर जब हम खुराफाती लड़की की टोली में इन को चलाने का मुकाबला हुया करता था तो पूछो मत कि कितना मज़ा लूटा करते थे।
इमानदारी से कह रहा हूं कि दशकों पुरानी यह बात आज ही याद आई है कि दो लड़के अपने अपने लट्टू पर डोरी लपेट कर एक साथ ज़मीन पर छोड़ते थे, जिस का लट्टू ज़्यादा समय तक चल पाया, वही जीता ....वही सिकंदर। लेकिन हारने वाला भी अपनी हार इतनी आसानी से कैसे स्वीकार कर ले...... फिर वह बिल्कुल नाच ना जाने आंगन टेढ़ा कि तर्ज़ पर कह उठता कि देख, मेरे वाला इस बार तो ज़मीन पर पड़े हुये पत्थर से टकरा गया, ऐसा कर, तू अब देख......भूल गया, परसों मैंने तेरे को कितनी बार हराया था।
पेंट वाले लट्टूओं के साथ ही साथ ऐसे लट्टू भी तो आया करते थे जिन पर पेंट नहीं हुया होता था...बस, मिट्टी के लट्टू होते थे जिन के नीचे एक लोहे की पिन सी लगी होती थी।
लिखते लिखते मुझे आज खुशवंत सिंह जी की वह वाली बात बहुत याद आ रही है कि खुदा का शुक्र है कि किसी ने कलम के लिये कंडोम नहीं बनाया......दोस्तो, मैंने इस महान लेखक के अखबारों में छपे लेखों से लिखने की बहुत प्रेरणा ली है.......वे अकसर लिखा करते हैं कि पेन को बस कागज़ पर छोड़ना ही आप का काम है, बाकी काम धीरे धीरे अपने आप होने लगता है।
यह मैं इसलिये यहां लिखना ज़रूरी समझता हूं कि जब मैं यह लेख लिखने लगा तो बहुत सी बातें मेरे ध्यान में ही नहीं थीं, लेकिन अब लिखते लिखते याद आने लगा है। जैसे कि मुझे अभी ध्यान आ रहा है कि मिट्टी के लट्टूओं के बाद फिर लकड़ी के बने लट्टू बाज़ार में आने लग गये थे। लेकिन मैं उन मिट्टी के लट्टूओं के बारे में यह बताना तो भूल ही गया कि जिन लड़कों की गैंग में मैं शामिल था, उन में से कईं लड़कों को जेबों में कईं कईं मिट्टी के लट्टू ठूसे रहते थे ...क्योंकि जब एक लट्टू टूट जाता था तो बिना किसी शिकन के झट से जेब से दूसरा लट्टू तुरंत ना निकले तो यह एक प्रैस्टीज इश्यू हो जाया करता था और लड़कों में खिल्ली उड़ती भला कौन बर्दाश्त करे, भई .......मैं बार बार एक बात फिर से दोहरा रहा हूं कि मुझे इन लट्टूओं को देखने से ही बहुत अच्छा लगता था। जिन लकड़ी के लट्टूओं की मैं बात कर रहा हूं उन की भी बनावट भी बिल्कुल मिट्टी के लट्टूओं के जैसी ही हुया करती थी....जिन पर भी डोरी लपेट पर उन को ज़मीन पर छोड़ा जाता था।
ये लकड़ी के लट्टू मेरे बेटे ने बंबई रहते खूब चलाये हैं.....बंबई की यही तो खासियत है कि यहां सब कुछ मिल जाता है। और वह भी रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर या फुटपाथों पर.....यह सब कुछ बहुत आसानी से मिल जाता है ताकि कोई भी बच्चा इन छोटी मोटी चीज़ों के लिये कभी तरसे नहीं। इन लकड़ी के लट्टूओं को चलाने में मेरे बड़े बेटे ने इतनी महारत हासिल कर ली कि मुझे उस से ईर्ष्या होती कि यार, इसे भी तो किसी ने नहीं सिखाया,यह कैसे इतनी आसानी से इन को चला लेता है और वह इतना धुरंधर लट्टूबाज हो गया कि इन लट्टूओं को जमीन पर छोड़ कर ....उन्हें चलते चलते फिर से.....अपने हाथ में पकड़ी डोरी की मदद से ज़मीन पर चलते चलते लट्टू को अपने हाथों पर ट्रांस्फर कर लेता ( बिल्कुल उसी तरह जिस तरह मेरी बचपन की टोली के लोग खासकर दोस्त दारा किया करता था !)..... मुझे यह सब देखना बहुत रोमांचक लगता।
यह नब्बे के दशक का वह दौर था जब उन 5-5, 10-10 रूपये के जंक-फूड के पैकेटों के साथ एक बिल्कुल छोटा सा प्लास्टिक का लट्टू आने लगा था.....जिस की उम्र एक-दो दिन की ही हुया करती थी, क्योंकि अकसर ये इधर उधर पड़े किसी के पैरों तले आ ही जाते थे।
अब आते हैं नये मिलिनियम में.....अर्थात् चार-पांच साल पहले मेरा बेटा क्लब से खबर लेकर आया कि शर्मा अंकल अपने बेटे के लिये दिल्ली से बे-ब्लेड लाये हैं.......यकीनन उस ने कुछ वर्णऩ इस तरह का किया कि हमें भी उत्सुकता हो उठी कि यार, देखना ही होगा, यह कौन सा करिश्मा है। मुझे याद है मैं और मेरी पत्नी उसे लेकर फिरोज़पुर की एक स्थानीय खिलौनों की दुकान पर पहुंच गये........दाम पता किया तो अढ़ाई सौ –तीन सौ रूपये। और साथ में दुकानदार की शर्त की ना ही पैकिंग खोल कर चैक ही करवायेगा और ना ही कोई गारंटी होगी......कहने लगा कि हमें तो कंपनी से जाते आते हैं वैसे ही हम आगे बेच देते हैं, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं। फिर उस ने बताया कि जो बच्चे ठीक से हैंडल नहीं कर पाते, उन के बे-ब्लेड झट से खराब हो जाते हैं......और ये फिर रिपेयर नहीं हो पाते...उस ने इतना कहते हुये पास ही पड़े खराब बे-ब्लेड़ो का ढेर दिखा दिया। लेकिन फिर भी रिस्क लेते हुये हम एक बे-ब्लेड खरीद ही लाये।
अभी दो-तीन दिन हुये थे कि कोई और डिजाइन बेटे के दोस्तों के पास आ गया.....तो फिर वैसा ही डिजाइन लुधियाना से मंगवाना पड़ा। बस, देखते ही देखते घर में कईं तरह के बे-ब्लेड दिखने लग गये। इन बे-ब्लेड़ों की शुरूआत हुई एक टीवी प्रोग्राम से ही थी, लेकिन हमें ही इतनी बार सिर मुंडवा कर पता चला कि यार, यह भी एक लट्टू ही तो है.......बस, उसे ज़मीन पर छोड़ने का मकैनिज़्म ही तो अलग है......पहले डोरी से यह काम हो जाता है और यहां से काम एक प्लास्टिक की लंबी सी पत्ती से हुया करता था। लेकिन यकीन मानिये जो रोमांच बचपन में दिखने वाले उस लट्टू का था, वह तो भई अलग ही था।
हम हिंदोस्तानियों के इतनी सफाई से नकल करने के हुनर को सलाम......कुछ ही महीनों में ये बे-ब्लेड पहले पचास-साठ रूपये में और फिर कुछ ही समय के बाद बीस-बीस, तीस तीस रूपये में बिकने लग गये। घर में जगह जगह बे-ब्लेड दिखने लग गये.....बच्चों में क्लबों, पार्टियों में इन के बारे में चर्चा होने लगी कि यार, तेरे पास कितने हैं, तेरे पास क्या वह लाइट-वाला है या नहीं !!
बस, पता नहीं कुछ ही महीनों में फिर से इन बच्चों को कभी बे-ब्लेड़ों का नाम लेते देखा नहीं..........अब तो पता नहीं कि ये धीरे धीरे मार्कीट से ही गायब हो गये हैं या अपने बच्चे ही बड़े हो गये हैं।
लेकिन मेरे छोटे बेटे के पास बहुत साल पुराना एक लकड़ी का लट्टू पड़ा हुया है जिस को मैंने भी खूब चलाया है...........नहीं, साहब, नहीं, यह डोरी वाला नहीं है.......डोरी वाला तो कईं वर्षों से दिखा ही नहीं है और डोरी वाला लट्टू इस जन्म में तो मेरे से चलने से रहा। यह लकड़ी का खूबसूरत-सा लट्टू तो हाथ से घुमा कर चलाने वाला है जिसे मैं कईं साल पहले घुमा कर उस के नर्म-नर्म पेट पर छोड़ दिया करता था जिससे उसे बहुत मज़ा आता था। और उस की किलकारियां सुन कर मुझे उस से भी ज़्यादा मज़ा आता था...................सचमुच, अपनी बड़ी बड़ी खुशियां भी कितनी छोटी छोटी बातों में छिपी बैठी हैं !!.....क्या आप को ऐसा नहीं लगता, दोस्तो !!