गुरुवार, 20 मार्च 2008

मेरी लेखन यात्रा.....


कल मैंने अपनी पोस्ट में उल्लेख किया था कि किस तरह से लेखक बनने की जब मेरे ऊपर धुन सवार हुई और किस तरह से मैंने इस के लिये दो दूरस्थ पाठ्यक्रमों में पूरे पैसे भेजे, किताबें भी आ गईं लेकिन कुछ कारणों के कारण( जिन का जिक्र कल मैंने किया था..) उन्हें कभी देखने की भी इच्छा नहीं हुई। मेरी श्रीमति जी अकसर मेरे से कभी कभार पूछ भी लेतीं कि हां, उस कोर्स का क्या बना जिस में तीस हज़ार रूपये भेजे थे......लेकिन मैं भी कहां कम था....बिलकुल एक स्कूली बच्चे की तरह हर बार टाल जाता....हां, हां, करना है, क्या करूं सारी दिक्कत टाइम की हो रही है। खैर, इतने सारी रकम एक टुच्चे से कोर्स के लिये भेज देने के लिये मैं अपने हाथ ज़ोर से अपने माथे पर मारने में मशगूल ही था कि एक हल्की सी आशा की किरण दिखी....यह वर्ष 2002 की बात है।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के बारे में तो आप में से काफी लोग जानते ही होंगे...यह संस्था तरह तरह के कार्यक्रम हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिये चलाती रहती है। उन में से एक यह भी है कि यह नवलेखकों के लिये भी नवलेखक शिविर लगा कर उन्हें उत्साहित करती है। ऐसा ही एक विज्ञापन एक बार मेरी नज़र में पड़ गया....इस में उन्होंने अहिंदी भाषी नवलेखकों से उन की एक रचना मांगी थी.......मैंने भी अपने आप को कहा कि यार, तू इतने वर्षों से कुछ न कुछ लिख रहा है, अनगिनत सरकारी निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में बार-बार पुरस्कृत होता रहता है ...इसलिये इस नवलेखक शिविर वाली ओखली में भी सिर घुसा ही दे। अपने आप को समझाने की कोशिश की कि देख, उन्होंने नव-लेखक ही मांगा है ....तू भी लिख कुछ भी ऐसे ही .....उस को भेज दे इस निदेशालय को और करवा ले अपने नाम को नव-लेखकों की सूची में दाखिल।
मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं कईं दिन सोचता रहा कि यार, अब मैं क्या लिखूं.....ठीक है, मैं चिकित्सा विषयों के ऊपर लिखता रहता हूं लेकिन अब इन को क्या लिख कर भेजूं। तभी मुझे एक ऐसी शख्सियत का ध्यान आया जिस से मैं बचपन से ही बहुत प्रभावित रहा हूं............यानि अपना डाकिया। बचपन से ही डाकिये के बारे में मेरे मन में बहुत विचार आते थे.....एक दिन मैंने इन सब विचारों को एक लेख में पिरो कर तैयार कर दिया एक लेख ......डाकिया डाक लाया। मुझे अपने आप को यह लेख बहुत पसंद आया ( किस लिखने वाले को यह खुशफ़हमी नहीं होती..!)…और मैंने इसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय को भेज दिया।
मुझे याद है कि इस लेख को लिखने के लिये मुझे अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ी थी...पहले शायद एक-दो बार रफ लिखा। उस की एक प्रति मैंने अब भी संभाल कर रखी हुई है...........जब भी उसे पढ़ता हूं तो अच्छा लगता है....चलो, ठीक है कल होली के उपलक्ष्य में अपने इस पहले लेख....डाकिया डाक लाया......को अपनी पोस्ट के माध्यम से प्रस्तुत करूंगा। मुझे याद है कि यह लिखने के बाद मैं अपने आप में बहुत हल्कापन महसूस कर रहा था।
और हां, मैं यहां पर यह भी बताना चाहूंगा कि वर्ष 2001 में मैंने इंगलिश टाइपिंग भी सीखी...क्योंकि अपनी चिट्ठीयां किसी से टाइप करवा के मेरी कभी तसल्ली नहीं होती थी। या तो टाइप करने वाले को बार-बार कोमा, साइऩ ऑफ एक्सक्लैमेशन....इत्यादि के लिये खुद याद दिलायो ...नहीं तो उस के द्वारा टंकित कागज़ को देख देख कर कुढ़ते रहो। और 2002 के शुरू शुरू में कंप्यूटर पर हिंदी किस तरह से टाइप करनी है...यह भी सीख लिया, लेकिन इंस्क्रिप्ट शैली में और तब से एक सॉफ्टवेयर...आईएसएम2000....की मदद से हिंदी में टाइप करना शुरू कर दिया।
अच्छा तो मैंने उस डाकिया डाक लाया वाले लेख के बारे में आप को बता दिया है कि मैंने उसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय को भेज दिया। और लगभग एक-डेढ़ महीने के पश्चात् मुझे चिट्ठी आई कि मेरी रचना का चयन कर लिया गया है और मुझे उन्होंने नव-लेखक शिविर में सम्मिलित होने का आमंत्रण भी दिया । यह शिविर जोरहाट( आसाम) में होना तय हुया था और यह आठ-दस दिन चलने वाला था। मुझे इस चयन की इतनी खुशी थी कि मैं वहां पहुंच गया।
उस नवलेखक शिविर में इस निदेशालय द्वारा हिंदी लेखन की विभिन्न विधाओं के मंजे हुये खिलाड़ीयों को नवलेखकों के साथ अपने अनुभव साझे करने के लिये बुलाया गया था....सो, वह अनुभव बहुत सार्थक सिद्ध हुया । यह कार्यशाला सुबह से शाम नौ दिन तक चली.........मैंने चिकित्सा क्षेत्र के बाहर आकर पहली बार यह अनुभव किया कि यह लेखन-वेखन वाली बात भी कितनी रोमांचाक है। वे हमें वहां से एक टापू ...मजौली...पर स्टडी-टूर पर भी एक दिन के लिये ले गये थे।
खैर , वहां पर जब भी कुछ लिखने को कहा जाता है, मैं भी उस में पूरी तरह से सम्मिलित होता.....लेकिन जब कभी कविता लिखने की बारी आती, मेरी सारी पोल खुल जाती। मुझ से कभी कविता की एक लाइन भी नहीं लिखी गई। मुझे यह दुनिया का सब से मुश्किल काम लगता है...और मैं उन सब कवियों को बहुत हैरानी से सुनता रहता, देखता रहता….और देख कर हैरान होता रहता कि यार, किसी का मन इतनी लंबी उड़ान भी भर सकता है ! खैर, जब वहां पर मैंने एक कहानी लिखी तो इस की बहुत प्रशंसा हुई ...और मुझे कहा गया कि आप सरिता के स्तर की कहानी तो लिख ही सकते हो।
और हां, उन दस दिनों में यह भी तो सीखा कि लेखन है क्या.....किस तरह से इस झिझक को दूर किया जाये। सब से अहम् बात जो मैंने वहां से सीखी कि लेखन का मतलब है बस लिखते जायो...........कुछ भी लिखो.....किसी भी विधा में ...जिस में भी आप अपने आप को सहज सा अनुभव करते हो..........लिखो..........और जब लिख रहो हो तो बिल्कुल एक अबोध बालक की तरह बेपरवाह हो कर लिखो.......जैसे वह पतंग के पेचे लगाते हुये सारी दुनिया भूला होता है, बस उस तन्मयता से लिखो...............और लिखते समय किसी बात की फिक्र न करो.............बस, अपनी कलम को कागज़ पर खुला छोड़ दो..............बाकी सब कुछ अपने आप हो जायेगा। ये विचार-वार तो अपने आप आयेंगे..............लेकिन आप तो बस पहला कदम उठायो और कलम लेकर बैठ जायो ..........एकांत में। और हां, उस शिविर में यह भी जाना कि किस तरह से हमारे आस-पास सैंकडों लेख बिखरे हुये हमारी कलम की इंतजार में हैं। बस, यही समझा कि अपने विचारों को बेलगाम छोड़ कर कागज पर लिख देना ही लेखन है। वहां पर एक विद्वान आये थे...तिवारी जी....उन्होंने बताया कि देखो, यह साहित्य रचना कोई दुर्गम काम तो है नहीं.....आप लोग अपने आस पास जो भी देखते हो, बस शुरूआत इसी बात से करो कि उन सब बातों को कागज़ पर उतारते जायो। उन्होंने यह भी कहा कि आप लोग कम से कम एक पन्ना रोज़ाना लिखा करें.........साल में लिखे उन 365 पन्नों में से चालीस-पचास पन्ने तो ऐसे होंगे ही जो प्रकाशित किये जा सकते हों। उन्होंने बतलाया कि उन के नाना जी सन् 1901( जी हां, सौ साल पहले...)....में एक कापी पर रोज़ाना सारे दिन का बस हिसाब-किताब ही लिख लेते थे कि घी इतने रूपये में इतने सेर आया, गुड़ इस रेट में मिला.........उन्होंने बताया कि अब वह वाली कॉपी भी किसी साहित्यिक कृत्ति से क्या कम है !!
उस लेखक-शिविर में हमें यह भी बताया गया कि हमें हिंदी भाषा में अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये कौन कौन से शब्द-कोष पढ़ने चाहिये.........कॉमिल बुरके का महान नाम भी इसी शिविर में ही पहली बार सुना, वहीं से अरविंद कुमार एवं कुसुम कुमार द्वारा रचित हिंदी समांतर कोष के बारे में सुना और वापिस आ कर तीन-चार शब्द-कोष और समांतर कोष खरीदे।
लेखन के तालाब में छलांग लगाने की इच्छा और भी दृढ़ हो गई। और लेखक शिविर से वापिस लौटते ही खूब लिखना शुरू किया....समाचार-पत्रों के लिये खूब लिखा....सामाजिक विषयों पर लिखा, व्यंग्य-बाण छोड़े और हां, चिकित्सा से संबंधित मुद्दों पर तो लिखा ही। बस, ऐसे ही हौंसला बढ़ता चला गया।
शायद एक-दो साल बाद एक अन्य नवलेखक शिविर में बुला लिया गया...यह शिविर डीएवी कॉलेज अमृतसर में होना तय हुया था......चूंकि यह मेरा पुराना कॉलेज भी था, इसलिये वहां भी मैंने इस शिविर में पूरा भाग लिया। यह शिविर भी केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा ही आयोजित किया गया था। वहां जा कर भी बहुत अच्छा लगा....बहुत कुछ सीखा...चोटी के हिंदी लेखक एवं अनुवादक आये हुये थे....वहां पर मैंने एक लेख लिया....एंटीबॉयोटिक दवाईया...कहीं आप की सेहत न बिगाड़ दें !!........इस लेख की बहुत सराहना हुई ....जब इतने इतने महान लेखकों ने इसे सराहा तो मुझे लगा कि मेरे लेखन में कुछ तो बात होगी .......अब इतने सारे लोग तो गल्त नहीं ना कह रहे होंगे। खास कर मेरी सहज, साधारण, आसानी से समझ में आ जाने वाली शैली की बहुत प्रशंसा हुई। सो, एक बार फिर हौंसला बुलंद हो गया। ( और हां, वह वाला लेख भी एक-दो दिन बाद पोस्ट में डालूंगा)....।
इन्हीं वर्षों में ही एनसीईआरटी के लिये उन के निमंत्रण पर हिंदी में एक किताब की मैन्यूस्क्रिप्ट लिख कर उन्हें सौंप दी......। बस, यह लेखन-यात्रा तो चल ही रही थी....लेकिन अब संपादकों को बार बार अपने लेख फैक्स करना और फिर फोन पर पूछना कि फैक्स ठीक ठाक पहुंच गया है ना .....यह सब पिछले कुछ अरसे से अखर रहा था....और वैसे भी कुछ संपादक कहने लगे थे कि आप फलां-फलां फांट में अपने लेख ई-मेल ही कर दिया करें.............लेकिन मुझे लगता था कि अब मैं कैसे यह लिख पायूंगा...क्योंकि मुझे तो केवल इंस्क्रिप्ट के द्वारा ही लिखना आता है।
लेकिन मेरा बेटा जो अकसर कंप्यूटर पर बैठा कुछ न कुछ पंगे लेता रहता है ....मेरी इसी हिंदी में ई-मेल न कर सकने की समस्या का तोड़ निकालने में लगा हुया था कि उसे इस हिंदी बलोगिंग के बारे में पता चला............उस ने पता नहीं कैसे रविरतलामी जी का हिंदी बलाग किसी सर्च इंजन से ढूंढ निकाला और मेरे को इस के बारे में बतलाया। दो-दिन बाद बताने लगा कि बापू, अब तुम हिंदी में भी ई-मेल भेज सकते हो ....और मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि कैफे-हिंदी नाम से कुछ नेट पर है.........ट्राई किया तो मेरी बांछे खिल गईं.......और अगले ही दिन ब्लागर पर अपनी बलाग बना कर पोस्टें डालनी शुरू कर दीं......यह सब चार-पांच महीने की ही बातें हैं..........लेकिन यह मुझे अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम प्रतीत हो रहा है।
बस, सफर अभी ज़ारी है...........मंज़िल बहुत दूर है........लेकिन बस इन्हीं पंक्तियों को अपने मन ही मन दोहराता रहता हूं और दूसरे लोगों को भी कुछ भी लिखने के लिये उकसाता रहता हूं............
इन परिंदों को भी मिलीगी मंज़िल एक दिन
ये हवा में खुले इन के पंख बोलते हैं।
अच्छा, तो साथियो, इस बेहद लंबी पोस्ट पढ़ने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.................भगवान आप की कलम भी सलामत रखे !!!


बुधवार, 19 मार्च 2008

अब इस कंबल के बारे में भी सोचना पड़ेगा क्या !



बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम अकसर जाने-अनजाने नज़रअंदाज़ कर ही देते हैं...आज कुछ ऐसी ही बातों की चर्चा करते हैं। मुझे किसी के भी यहां जाकर कंबल ओढ़ना कभी नहीं भाता। अब आप भी सोच रहे होंगे कि यह कौन सी नई सनक सवार हो गई भला !!....जी नहीं, यह कोई सनक-वनक नहीं है। आज कल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह एक अच्छा खासा मुद्दा है।

मुझे किसी के यहां जाकर और यहां तक अपने ही घर में कंबल ओढ़ने में बहुत संकोच होता है। आप इस का कारण समझ ही रहे होंगे !....इस का कारण केवल यही है कि अकसर हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले ये कंबल वगैरा विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं की खान होते हैं।

वह पल बहुत अजीब लगता है जब कभी घरों में इस तरह की बातें चलती हैं कि ये कंबल देख रहे हो, जब मुन्ने के पापा ने नई नई इंटर पास की थी...तब खरीदा था...और आज भी देख लो, वैसा का वैसा ही लगता है। लेकिन लगता ही है ना, लगने का क्या है........जो इस ने अरबों-खरबों कीटाणुओं को अपने अंदर छिपाया हुया है , उस का उल्लेख कौन करेगा ?.....जी हां, हमारे घरों में इस्तेमाल हो रहे कंबल कुछ इसी तरह के ही होते हैं। इन को ड्राई-क्लीन करवाने का कोई कल्चर न तो हमारे देश में कभी रहा और मेरे ख्याल में कभी हो ही नहीं पायेगा। वैसे बात वह भी तो है कि जब दो-साल में एक गर्म-सूट ड्राई-क्लीन करवाने में ही आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं, तो क्या अब हम कंबलों को ड्राई-क्लीन करवाने के सपने कैसे देखें ?....बात बिल्कुल सही भी है...वैसे हम लोगों के कपड़े खरीदते समय निर्णय भी तो कईं बार इस बार पर ही निर्भर करते हैं कि भई, कहीं इस को ड्राई-क्लीन करवाने की ज़रूरत तो नहीं ना पड़ेगी।


खैर बात कंबल की चल रही थी......और वैसे भी हम अपने घरों में देखते हैं कि इन कंबलों का तो बंटवारा कहां होता है कि यह पपू का है , यह टीटू वाला है....। और यहां तक मेहमान वगैरा भी वही कंबल इस्तेमाल करते हैं। और जब कभी किसी की तबीयत थोड़ी नासाज़ हो, कोई खांसी-जुकाम से बेज़ार हो ..... तो यही कंबल पसीने से लथ-पथ होते हैं। और फिर अगले दिन वही कंबल दूसरे सदस्य द्वारा ओढ़ा जाता है। संक्षेप में बात करें तो यही है कि इस प्रकार से कंबलों का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिये ठीक नहीं है।

तो क्या करें अब कंबल लेना भी बंद कर दें ?....नहीं, नहीं ,ऐसी बात नहीं है। लेकिन पहले लोग जो कंबल के ऊपर सूती कवर डाल कर रखते थे, यह बहुत ही बढ़िया आइडिया है क्योंकि इन्हें थोड़े थोड़े समय के बाद धो दिया जाता था ताकि अंदर कंबल काफी हद तक साफ़-स्वच्छ रह सके। और फिर कंबल को नियमित तौर पर धूप में सेंका भी जाता था ..ताकि उसे कीटाणुरहित किया जा सके। इसलिये हमें इन सूती कवरों को वापिस इन कंबलों पर लगाना चाहिये। नहीं तो इन महंगे ग्लैमरस कंबलों बिना किसी प्रकार के कवर के बीमारियों की खान बना डालें ...,यह फैसला हमारे अपने हाथ में ही है।

आज कल जो नये नये मैटीरियल के कंबल बाज़ारों में दिखने लग गये हैं ...कहने को तो कह देते हैं कि वे धोये जा सकते हैं । लेकिन हम लोग अकसर प्रैक्टिस में देखते हैं कि कौन इन्हें नियमित धोने के चक्कर में पड़ता है। वैसे मुझे याद आ रहा है कि एक बार एक ऐसे ही कंबल को धोने के बाद मैंने भी उसे बाहर बरामदे में सुखाने के लिये बाहर घसीटने में थोड़ी मदद की थी........यकीन मानिये , नानी याद आ गई थी। कहने से भाव है कि मान भी लिया जाये कि यह धोये जा सकते हैं लेकिन यह आइडिया कुछ ज़्यादा प्रैक्टीकल नहीं है....हां, अगर कहीं ये नियमित धुलते हैं तो बहुत बढ़िया बात है।

लेकिन जहां भी संभव हो, इन कंबलों को सूती कवह डले ही होने चाहियें क्योंकि इन में जमा धूल-मिट्टी-जीवाणु भी तरह तरह की एलर्जी बढ़ाने में पूरी भूमिका निभाते हैं। लेकिन लोग तो अकसर एलर्जी के लिये उत्तरदायी एलेर्जन ढूंढने की अकसर नाकामयाब कोशिश करते हैं लेकिन अपने आसपास ही इस तरह के एलर्जैन्ज़ की तरफ़ ज़्यादा ध्यान ही नहीं देते। तो, आगे से ध्यान दीजियेगा।

यह तो हुई कंबलों की बात, लेकिन परदों का भी कुछ ऐसा ही हाल होता है। अकसर इन्हें तब तक धोया नहीं जाता जब तक इन्हें देखते ही उल्टी करने जैसा न होने लगे। ये भी कईं कईं महीनों तक गंदगी समेटे रहते हैं...। वैसे तो हर घर में ही ..लेकिन जिन घरों में एलर्जी के केस हैं, सांस में तकलीफ़ के मरीज़ हैं, दमा के मरीज़ हैं....उन के लिये तो ये सावधानियां शायद दवाई से भी बढ़ कर हैं। लेकिन हमारी समस्या यही है कि हमें परदे तो चाहिये हीं, लेकिन साथ में हमारी सम्पन्नता का दिखावा भी तो होना चाहिये। इसी चक्कर में इतने भारी भारी परदे शो-पीस के तौर पर टांग दिये जाते हैं कि न तो उन्हें नियमित धोते बने और न ही उतारते बने। अकसर इन्हें धोने के नाम पर कईं बार तो बाई ही काम छोड़ कर भाग जाये !!...आखिर हमें सीधे-सादे हल्के फुल्के ऐसे परदे टांगने में दिक्कत क्या है जिन्हें हम नियमित धुलवा तो सकें।

लेकिन यह बात परदों तक ही तो सीमित नहीं है ना.....आज कल हम लोगों के घर में सोफे सैट देख लो। इन को भी देख कर उल्टी आती है। ये भी अपने अंदर इतनी गंदगी समेटे होते हैं कि क्या कहें !!.....कारण वही कि सब कुछ ..सीट कवर, कुशन वगैरा के ऊपर महंगे महंगे कपड़ों के कवर फिक्स हुया करते हैं..........और पता नहीं इन के ऊपर कितने लोगों का पसीना लगा रहता है, कितने छोटे छोटे बच्चों ने इन्हें कितनी ही बार पवित्र किया होता है( समझ गये ना आप!)…, कितनी बार इन के ऊपर खाने पीने की चीज़े गिर चुकी होती हैं, कितनी बार बच्चे गंदे पैरों से इन के ऊपर उछलते रहते हैं........लेकिन इन के कवर चेंज करने का झंझट भला कौन बार बार ले सकता है .....भई खूब पैसा लगता है.....ऐसे में सालों तक ये गंदगी से भरे रहते हैं। एक दूसरी समस्या इन सोफा-सेटों के साथ यह भी तो है ना कि ये सब इतने भीमकाय होते हैं कि इन के रहते ठीक तरह से कमरे की सामान्य सफाई भी तो नहीं हो पाती ।

अकसर मेरी आब्जर्वेशन है कि लोगों को इन बातों की खास फिक्र है नहीं, उन्हें तो बस अपनी बैठक को चकाचक रखने में ही मज़ा आता है। इसीलिये कईं घरों में तो बच्चों को डराया जाता है कि खबरदार, अगर तुम सोफे की तरफ भी गये, पता है जब कोई आ जाता है तो कितनी शर्म आ जाती है। मेरा इस के बारे में विचार एकदम क्रांतिकारी है ...............शायद बहुत से लोगों को न पच पाये............मेरा विचार है कि घर आप का है, आप के रहने के लिये, बच्चों के लिये ताकि वे पूरी मस्ती कर सकें..............मज़ा कर सकें ताकि बड़े हो कर उन के पास अनगिनत मीठी यादें हों...........इसलिये घरों में सीधे-सादे फ्रेम वाले सोफे हों, कुर्सियां हों जिन के ऊपर कपड़े के इस तरह के कवर हों कि उन्हें आसानी से धुलाया जा सके। इस से एक तो आपका ड्राइंग-रूम साफ-स्वच्छ दिखेगा....दिखेगा ही नहीं , होगा भी.....और बच्चे भी खुश रह कर बिना किसी रोक टोक के जहां मरजी मस्ती कर सकते हैं, ऊधम मचा सकते हैं। और रही बात मेहमानों की , वे ना ही तो महंगे परदे और न ही महंगे, भारी भरकम सोफे देखने आ रहे हैं और न ही एक काजू और दो किशमिश के दाने खाने के लिये......अतिथि के लिये हमारा सत्कार हमारी आंखों से झलकता है.....उसे चाहे हम चटाई पर बैठा कर सादा पानी ही पिला दें....वो हमारी आंखों को पढ़ता है कि उस का स्वागत हुया है या नहीं।

पता नहीं ...मैं भी कहां का कहां निकल जाता हूं...मेरा बेटा वैसे मुझे अकसर चेतावनी देता रहता है कि बापू, अगर तुम ने ब्लोगगिरी में कुछ करना है ना तो कुछ टैक्नीकल लिखा करो, यह फलसफा आज कल कोई पढ़ना नहीं चाहता । खैर, यह उस का अपना ओपिनियन है और उसे अपना ओपिनियन रखने का पूरा पूरा हक है। लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है , मैं तो भई लिख कर फारिग हो जाता हूं, और मुझे क्या चाहिये। लेकिन आज यह कंबल, परदों एवं सोफों वाली बात है बहुत ही ..बहुत ही ...बहुत ज़्यादा ही महत्त्वपूर्ण ............इसिलये इस के बारे में थोड़ा ध्यान करियेगा.....ताकि हम अपने इर्द-गिर्द इन कीटाणुओं, जीवाणुओं के अंबार तो न लगा लें।

अब इस कंबल के बारे में भी सोचना पड़ेगा क्या !




बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम अकसर जाने-अनजाने नज़रअंदाज़ कर ही देते हैं...आज कुछ ऐसी ही बातों की चर्चा करते हैं। मुझे किसी के भी यहां जाकर कंबल ओढ़ना कभी नहीं भाता। अब आप भी सोच रहे होंगे कि यह कौन सी नई सनक सवार हो गई भला !!....जी नहीं, यह कोई सनक-वनक नहीं है। आज कल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह एक अच्छा खासा मुद्दा है।
मुझे किसी के यहां जाकर और यहां तक अपने ही घर में कंबल ओढ़ने में बहुत संकोच होता है। आप इस का कारण समझ ही रहे होंगे !....इस का कारण केवल यही है कि अकसर हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले ये कंबल वगैरा विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं की खान होते हैं।
वह पल बहुत अजीब लगता है जब कभी घरों में इस तरह की बातें चलती हैं कि ये कंबल देख रहे हो, जब मुन्ने के पापा ने नई नई इंटर पास की थी...तब खरीदा था...और आज भी देख लो, वैसा का वैसा ही लगता है। लेकिन लगता ही है ना, लगने का क्या है........जो इस ने अरबों-खरबों कीटाणुओं को अपने अंदर छिपाया हुया है , उस का उल्लेख कौन करेगा ?.....जी हां, हमारे घरों में इस्तेमाल हो रहे कंबल कुछ इसी तरह के ही होते हैं। इन को ड्राई-क्लीन करवाने का कोई कल्चर न तो हमारे देश में कभी रहा और मेरे ख्याल में कभी हो ही नहीं पायेगा। वैसे बात वह भी तो है कि जब दो-साल में एक गर्म-सूट ड्राई-क्लीन करवाने में ही आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं, तो क्या अब हम कंबलों को ड्राई-क्लीन करवाने के सपने कैसे देखें ?....बात बिल्कुल सही भी है...वैसे हम लोगों के कपड़े खरीदते समय निर्णय भी तो कईं बार इस बार पर ही निर्भर करते हैं कि भई, कहीं इस को ड्राई-क्लीन करवाने की ज़रूरत तो नहीं ना पड़ेगी।

खैर बात कंबल की चल रही थी......और वैसे भी हम अपने घरों में देखते हैं कि इन कंबलों का तो बंटवारा कहां होता है कि यह पपू का है , यह टीटू वाला है....। और यहां तक मेहमान वगैरा भी वही कंबल इस्तेमाल करते हैं। और जब कभी किसी की तबीयत थोड़ी नासाज़ हो, कोई खांसी-जुकाम से बेज़ार हो ..... तो यही कंबल पसीने से लथ-पथ होते हैं। और फिर अगले दिन वही कंबल दूसरे सदस्य द्वारा ओढ़ा जाता है। संक्षेप में बात करें तो यही है कि इस प्रकार से कंबलों का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिये ठीक नहीं है।
तो क्या करें अब कंबल लेना भी बंद कर दें ?....नहीं, नहीं ,ऐसी बात नहीं है। लेकिन पहले लोग जो कंबल के ऊपर सूती कवर डाल कर रखते थे, यह बहुत ही बढ़िया आइडिया है क्योंकि इन्हें थोड़े थोड़े समय के बाद धो दिया जाता था ताकि अंदर कंबल काफी हद तक साफ़-स्वच्छ रह सके। और फिर कंबल को नियमित तौर पर धूप में सेंका भी जाता था ..ताकि उसे कीटाणुरहित किया जा सके। इसलिये हमें इन सूती कवरों को वापिस इन कंबलों पर लगाना चाहिये। नहीं तो इन महंगे ग्लैमरस कंबलों बिना किसी प्रकार के कवर के बीमारियों की खान बना डालें ...,यह फैसला हमारे अपने हाथ में ही है।
आज कल जो नये नये मैटीरियल के कंबल बाज़ारों में दिखने लग गये हैं ...कहने को तो कह देते हैं कि वे धोये जा सकते हैं । लेकिन हम लोग अकसर प्रैक्टिस में देखते हैं कि कौन इन्हें नियमित धोने के चक्कर में पड़ता है। वैसे मुझे याद आ रहा है कि एक बार एक ऐसे ही कंबल को धोने के बाद मैंने भी उसे बाहर बरामदे में सुखाने के लिये बाहर घसीटने में थोड़ी मदद की थी........यकीन मानिये , नानी याद आ गई थी। कहने से भाव है कि मान भी लिया जाये कि यह धोये जा सकते हैं लेकिन यह आइडिया कुछ ज़्यादा प्रैक्टीकल नहीं है....हां, अगर कहीं ये नियमित धुलते हैं तो बहुत बढ़िया बात है।
लेकिन जहां भी संभव हो, इन कंबलों को सूती कवह डले ही होने चाहियें क्योंकि इन में जमा धूल-मिट्टी-जीवाणु भी तरह तरह की एलर्जी बढ़ाने में पूरी भूमिका निभाते हैं। लेकिन लोग तो अकसर एलर्जी के लिये उत्तरदायी एलेर्जन ढूंढने की अकसर नाकामयाब कोशिश करते हैं लेकिन अपने आसपास ही इस तरह के एलर्जैन्ज़ की तरफ़ ज़्यादा ध्यान ही नहीं देते। तो, आगे से ध्यान दीजियेगा।
यह तो हुई कंबलों की बात, लेकिन परदों का भी कुछ ऐसा ही हाल होता है। अकसर इन्हें तब तक धोया नहीं जाता जब तक इन्हें देखते ही उल्टी करने जैसा न होने लगे। ये भी कईं कईं महीनों तक गंदगी समेटे रहते हैं...। वैसे तो हर घर में ही ..लेकिन जिन घरों में एलर्जी के केस हैं, सांस में तकलीफ़ के मरीज़ हैं, दमा के मरीज़ हैं....उन के लिये तो ये सावधानियां शायद दवाई से भी बढ़ कर हैं। लेकिन हमारी समस्या यही है कि हमें परदे तो चाहिये हीं, लेकिन साथ में हमारी सम्पन्नता का दिखावा भी तो होना चाहिये। इसी चक्कर में इतने भारी भारी परदे शो-पीस के तौर पर टांग दिये जाते हैं कि न तो उन्हें नियमित धोते बने और न ही उतारते बने। अकसर इन्हें धोने के नाम पर कईं बार तो बाई ही काम छोड़ कर भाग जाये !!...आखिर हमें सीधे-सादे हल्के फुल्के ऐसे परदे टांगने में दिक्कत क्या है जिन्हें हम नियमित धुलवा तो सकें।
लेकिन यह बात परदों तक ही तो सीमित नहीं है ना.....आज कल हम लोगों के घर में सोफे सैट देख लो। इन को भी देख कर उल्टी आती है। ये भी अपने अंदर इतनी गंदगी समेटे होते हैं कि क्या कहें !!.....कारण वही कि सब कुछ ..सीट कवर, कुशन वगैरा के ऊपर महंगे महंगे कपड़ों के कवर फिक्स हुया करते हैं..........और पता नहीं इन के ऊपर कितने लोगों का पसीना लगा रहता है, कितने छोटे छोटे बच्चों ने इन्हें कितनी ही बार पवित्र किया होता है( समझ गये ना आप!)…, कितनी बार इन के ऊपर खाने पीने की चीज़े गिर चुकी होती हैं, कितनी बार बच्चे गंदे पैरों से इन के ऊपर उछलते रहते हैं........लेकिन इन के कवर चेंज करने का झंझट भला कौन बार बार ले सकता है .....भई खूब पैसा लगता है.....ऐसे में सालों तक ये गंदगी से भरे रहते हैं। एक दूसरी समस्या इन सोफा-सेटों के साथ यह भी तो है ना कि ये सब इतने भीमकाय होते हैं कि इन के रहते ठीक तरह से कमरे की सामान्य सफाई भी तो नहीं हो पाती ।
अकसर मेरी आब्जर्वेशन है कि लोगों को इन बातों की खास फिक्र है नहीं, उन्हें तो बस अपनी बैठक को चकाचक रखने में ही मज़ा आता है। इसीलिये कईं घरों में तो बच्चों को डराया जाता है कि खबरदार, अगर तुम सोफे की तरफ भी गये, पता है जब कोई आ जाता है तो कितनी शर्म आ जाती है। मेरा इस के बारे में विचार एकदम क्रांतिकारी है ...............शायद बहुत से लोगों को न पच पाये............मेरा विचार है कि घर आप का है, आप के रहने के लिये, बच्चों के लिये ताकि वे पूरी मस्ती कर सकें..............मज़ा कर सकें ताकि बड़े हो कर उन के पास अनगिनत मीठी यादें हों...........इसलिये घरों में सीधे-सादे फ्रेम वाले सोफे हों, कुर्सियां हों जिन के ऊपर कपड़े के इस तरह के कवर हों कि उन्हें आसानी से धुलाया जा सके। इस से एक तो आपका ड्राइंग-रूम साफ-स्वच्छ दिखेगा....दिखेगा ही नहीं , होगा भी.....और बच्चे भी खुश रह कर बिना किसी रोक टोक के जहां मरजी मस्ती कर सकते हैं, ऊधम मचा सकते हैं। और रही बात मेहमानों की , वे ना ही तो महंगे परदे और न ही महंगे, भारी भरकम सोफे देखने आ रहे हैं और न ही एक काजू और दो किशमिश के दाने खाने के लिये......अतिथि के लिये हमारा सत्कार हमारी आंखों से झलकता है.....उसे चाहे हम चटाई पर बैठा कर सादा पानी ही पिला दें....वो हमारी आंखों को पढ़ता है कि उस का स्वागत हुया है या नहीं।
पता नहीं ...मैं भी कहां का कहां निकल जाता हूं...मेरा बेटा वैसे मुझे अकसर चेतावनी देता रहता है कि बापू, अगर तुम ने ब्लोगगिरी में कुछ करना है ना तो कुछ टैक्नीकल लिखा करो, यह फलसफा आज कल कोई पढ़ना नहीं चाहता । खैर, यह उस का अपना ओपिनियन है और उसे अपना ओपिनियन रखने का पूरा पूरा हक है। लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है , मैं तो भई लिख कर फारिग हो जाता हूं, और मुझे क्या चाहिये। लेकिन आज यह कंबल, परदों एवं सोफों वाली बात है बहुत ही ..बहुत ही ...बहुत ज़्यादा ही महत्त्वपूर्ण ............इसिलये इस के बारे में थोड़ा ध्यान करियेगा.....ताकि हम अपने इर्द-गिर्द इन कीटाणुओं, जीवाणुओं के अंबार तो न लगा लें।

6 comments:

राज भाटिय़ा said...
चोपडा जी आप ने लेख तो बहुत अच्छा लिखा हे बिजली के स्वीच, दरवाजे के हेडिल, जाली वाले दरवाजे , ओर बर्तनॊ पर लगे स्टीकर तो छोड ही दिये,ओर भी बहुत सी चीजे हे,हमारे नोट जिन्हे हाथ लगने को भी दिल नही करता कभी इन पर भी लिखऎ,बहुत उप्योगी बाते लिखी हे.
अनिल रघुराज said...
सफाई का नया संस्कार ही सिखा दिया आपने। वैसे मेरी पत्नीश्री कई साल से पूरे परिवार को इसकी ट्रेनिंग दे रही हैं। सब के तौलिये अलग, कंबल अलग, साबुन अलग। स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है यह सब।
गुस्ताखी माफ said...
बहुत काम का लेख लिखा है.
पत्नियां अक्सर सही ही होती हैं
Kaput Pratapgarhi said...
डा साहब आप मेरे भाई जैसे दिखते हैं।
एक डॉक्‍टर साहब को ब्‍लॉग पर देखकर अच्‍छा लगा।
Neeraj Rohilla said...
डाक्टर साहब,
हम तो आपके इसी फ़लसफ़े के मुरीद हैं । आपकी पालीथीन वाली पोस्ट ने सीधा असर किया था । कुछ दिन पहले मैं अपने रूममेट से बात कर रहा था कि यहाँ ह्यूस्टन में कितना कबाडा हर रोज पैदा होता है मेरे अपार्टमेंट में, हर चीज तो डिब्बाबंद है ।

खैर आप लिखते रहे, हम पढने और अमल में लाने का प्रयास करने के लिये तैयार हैं । एक बात का सुकून है कि हमारे घर पर सबकी अपनी रजाई/कंबल फ़िक्स है और सभी पर सफ़ेद सूती कवर चढे हुये हैं । अब याद आ रहा है कि सर्दी की शुरूआत में बडे सन्दूक से रजाई गद्दे निकालकर धूप लगाकर और कवर धो-सुखा कर प्रयोग में लाये जाते थे । ठीक यही उपक्रम सर्दी खत्म होने पर उनको सन्दूक में रखने से पहले किया जाता था ।
Gyandutt Pandey said...
सच में डाक्टर साहब - यात्रा में सरकारी कम्बल की बजाय मैं अपनी रजाई घर से ले कर चलता हूं। कभी फंस गये तो मजबूरी है। वैसी अवस्था मे एक बार स्किन एलर्जी भी हो चुकी है।

ये दूरवर्ती शिक्षण पाठ्यक्रम (correspondence courses)……..मेरे अनुभवों से कुछ सीखा चाहेंगे ?

छः सात साल पहले मुझे बस ऐसे ही अच्छे-भले बैठे बैठे फिर से पढ़ाई करने का जबरदस्त कीड़ा काट गया...पढ़ाई की यह थी कि लेखक कैसे बना जाये। अंग्रेज़ी के अखबार में अंग्रेज़ों का एक विज्ञापन नियमित तौर पर आता था कि आ जाओ, हम बनायेंगे तुम्हें लेखक.....और हमारा कोर्स करने के बाद तुम लोग इतनी इतनी कमाई करने लगोगे। आव देखा न ताव....मैंने भी मंगवा लिया प्रास्पैक्ट्स......जब उस लेखक बनने की सारी जानकारी आई तो पता चला कि इस की फीस तीस हज़ार के आसपास थी। लेकिन वह विज्ञापन इतना लुभावना था और मेरे ऊपर लेखक बनने का भूत सवार इस कद्र ठाठां मार रहा था कि मैंने उस कंपनी ( कंपनी ही कहूंगा....क्योंकि ये कंपनियों के इलावा कुछ हैं भी नहीं।)...को पैसे भेजने का प्रण कर ही लिय़ा ।

अब मसला यह था कि इंगलैंड में तीस हज़ार रूपये भेजने थे और मुझे इस के बारे में एक पैसे की भी जानकारी न थी। तब हम लोग फिरोज़पुर (पंजाब) में रहते थे......जान-पहचान ढूंढ कर किसी बैंक में गया जहां इस तरह के विदेशी ड्राफ्ट्स (शायद यही कहते थे !)..बनते थे....वहां जा कर पता चला कि यह काम फिरोज़पुर शहर में कहीं नहीं होता, आप को लुधियाना जाना होगा ..वहां फलां फलां ब्रांच में फारन एक्सचेंज का इस तरह का काम होता है...कुछ फारमैलिटिज़ भी बतला दी गईं।
मैंने सोचा कि लुधियाना जो 110किलोमीटर की दूरी पर था.....अगर वहां जा कर भी काम न हुया तो दिन खराब होगा। इसलिये दिल्ली ही चला गया...छुट्टी ले कर...वहां पर भी जान-पहचान की लाठी के सहारे आखिर उसी दिन इस तरह का लगभग तीस हज़ार रूपये खर्च कर के ड्राफ्ट बन गया।
ड्राफ्ट भेजने के कुछ दिनों बाद ही मुझे छोटी-छोटी किताबों का एक पुलंदा आ गया............एक बात बतला दूं...कि इन अंग्रेजों की अंग्रेज़ी चीज़ों का इतना ज़बरदस्त क्रेज़ रहा है कि उस पैकेट को देख कर मेरी तो बांछे ही खिल गईं कि अब बन के दिखायूंगा सारी दुनिया को एक चोटी का लेखक।
किताबों के साथ ही एक असाइनमैंट की एक लिस्ट भी थी कि ये ये होम-वर्क कर के हमें भेजते रहना । खैर, कुछ ही दिनों के बाद मैंने एक-दो असाइनमैंट भेज दीं और लगभग एक महीने के बाद जांची हुईं असाइनमैंट मेरे पास वापिस पहुंच गईं..............अब तो याद भी नहीं कि उस की ग्रेडिंग में उन्होंने क्या लिखा ,लेकिन जो भी था सब कुछ अच्छा अच्छा ही था..............लेकिन धीरे धीरे कुछ ही हफ्तों में मुझे यह समझ आते देर न लगी कि भैया, इस कोर्स वालों को अपने तीस हज़ार इक्ट्ठे करने तक ही मतलब था जो उन्होंने साध लिया है। अब तुम इन किताबों का आचार डालो..............क्योंकि बिना किसी तरह के पर्सनल इंटरएक्शन के कहां ये गूढ़-ज्ञान की बातें समझ में आती हैं। वैसे तो इंगलिश मेरी बचपन से ही ठीक-ठाक रही है( थैंक यू.....मास्टर शूर साहिब......जो आजकल डीएवी स्कूल अमृतसर के प्रिंसीपल हैं.....) ...लेकिन फिर भी इस के लेखन में हिंदी –पंजाबी जैसा धारा-प्रवाह कभी बना नहीं.....भला बनेगा भी कैसे, जो भी है...चाहे इंटरनैशनल भाषा है...है तो विदेशी ही ना.....तो इस इंगलिश में कुछ भी लिखने से पहले सोचो, फिर तोलो, उस के बाद बोलो या लिखो। यह वाली बात अपनी मातृ-भाषा या राष्ट्रीय भाषा के साथ कतई नहीं है.......इस में लिखना तो अपनी मां के साथ या किसी देशवासी के साथ बात करने जैसा आसान है।
मैं भी बात बहुत ज़्यादा खींचने लग गया हूं.........ब्रीफ में बताता हूं कि बिना किसी तरह की गाइडैंस के मेरे उस कोर्स में कभी इंट्रैस्ट बन ही नहीं पाया.................बस,किताबें ही धरी की धरी रह गईं। ना मैंने उन को कभी फिर कोई असाइनमैंट भेजी और न ही उन्होंने कभी पूछा कि हे उभरते लेखक, क्या कर रहा है तू आजकल...........क्या कुछ लिख रहा है.........किताबें पढ़ रहा है कि नहीं..................सीधी सी बात की उन का सरोकार तीस हज़ार रूपये पाने तक ही सीमित था। खैर, इस टापिक को तो मैं खत्म ही समझ बैठा।
कुछ दिनों बाद ही अपने ही देश की एक अच्छी खासी यूनिवर्सिटी का एक विज्ञापन दिखा जिस में हिंदी में सृजनात्मक लेखन करने-करवाने की बात कही गई थी। अभी उस पहले काटे कीड़े की खुजली शांत भी न हुई थी कि इस हिंदी लेखन सीखने वाले देशी कोर्स के ततैये ने डंग मार दिया.............सो, बड़े चाव से कर दिया कोर्स शुरू ....शायद 1700या 1800रूपये फीस थी।
इस कोर्स के लिये रिक्वायरमैंट तो थी केवल बारहवीं कक्षा में पास होन की। लेकिन जब किताबें आईं तो उन्हें देख कर सिर दुखता............नहीं,नहीं, कोई भारी-भरकम नहीं थीं..........बस, उन में विभिन्न पाठ बड़े बड़े लेखकों ने इतनी मुश्किल भाषा में लिखे हुये थे कि या तो उन की बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी और अगर एक-दो पैरे पढ़ने की हिम्मत जुटा भी पा लेता था तो आगे पढ़ना सिर-दर्द जैसा लगता था। इसलिये सारी उम्मीदे इस कोर्स के पर्सनल कंटैक्ट प्रोग्राम पर ही टिकी हुईं थीं....कि जब वहां जाऊंगा तो इन को पढ़ने का , समझने का टीका लगवा कर के ही आऊंगा......खैर, मैं सारी रात गाड़ी में खराब ( अब खराब ही कहूंगा.....कारण अभी बतलाता हूं...)....करने के पश्चात् सुबह पंजाब गया चंडीगढ़............लेकिन जहां पर स्टडी सैंटर बना था..वहां पर कोई हरकत ही नज़र नहीं आई। काफी समय के बाद एक सुस्त सी मैडम ( हां, विद्यार्थीयों से भी ज़्यादा सुस्त )....ने बड़े ही नीरस ढंग से कोर्स के बारे में बताया। वह रविवार का दिन था...और यह पर्सनल कोंटैक्ट कार्यक्रम आने वाले तीन-चार रविवारों को चलना था। लेकिन उस मैडम ने इतनी नीरसता से बात की कि वह नीरसता तो किताबों के रूखेपन को भी मात दे गई)....लेकिन वो मैडम चाहे जितनी भी जल्दी में थी ( उस महान आत्मा ने हमें आधे घंटे में ही फारिग भी कर दिया...........जै हो!!!!!)…..उस ने इतना बतलाने में कोई जल्दबाजी नहीं की कि इस पर्सनल कंटैक्ट प्रोग्राम में आप का आना अनिवार्य नहीं है.....सो ,उस प्रोफैसरनी की इस बात में कुछ इतना ज़्यादा जादू था कि मन ही मन जो अगले रविवार ना आने का विचार बन रहा था , वह फिरोज़पुर वापिस आते आते एक दम बरगद के पेड़ की जड़ों की तरह मज़बूत हो गया। और हम अकसर कहते हैं कि टीचर का क्या है, हम तो किताबों से, नेट से कुछ भी सीख सकते हैं...........ऐसा नहीं है दोस्तो....मेरे विचार में तो उस टीचर को अपनी टीचरी करने का कोई हक ही नहीं है जो छात्रों के मन में अपने विषय के प्रति रोमांच (रोमांच कहूं या रूचि कहूं !).. ही न पैदा कर सके। बस, आज उस प्रोफैसरनी का धन्यवाद ही करता हूं कि दोबारा उस कोर्स की कभी किताबें खोल कर देखने की इच्छा ही नहीं हुई। और हां, आज कल जब उस यूनिवर्सिटी का इश्तिहार देखता हूं तो पाता हूं कि उन की लिस्ट से वह वाला हिंदी लेखन सिखाने वाला कोर्स ही हटा दिया गया है।
लेखक बनने की बाकी यात्रा अगले किसी लेख में लिखूंगा..बात लंबी होती लग रही है। वैसे जाते जाते मेरे अपने का वह गीत अचानक याद आ गया जो यू-टयूब पर नहीं मिला , लेकिन उस के लीरिक्स कहीं दिख गये हैं जिन्हें यहां पर चेप रहा हूं........

मंगलवार, 18 मार्च 2008

यह जो पब्लिक है ...सब जानती है ...

अभी अभी आज की टाइम्स ऑफ इंडिया.(दिल्ली ) के लेट-एडिशन में छपी दो खबरें देख कर दंग रह गया हूं.....पहले पेज पर थी ...IIT-JEE cutoffs fell to single digits in 2007. और छठे पेज पर इसी से संबंधित दूसरी खबर थी ...IIT cutoffs may be low this year too. यकीन मानिये, ये दोनों न्यूज़-आइट्मस पढ़ कर मेरे पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई। दूसरी खबर के साथ छपे एक टेबल से यह भी समझते देर न लगी कि 2006 में क्यों एक छात्र जिस ने मैथ, फिजिक्स और कैमिस्ट्री में क्रमशः 80,118 और 52 अंक (टोटल 250) लिये वह तो इस के लिये क्वालीफाई नहीं कर पाया, लेकिन एक दूसरा छात्र जिस ने क्रमशः 37,48 और 69 नंबर ही लिये (टोटल 154) वह इस टैस्ट को क्वालीफाई कर गया। बात समझ में नहीं आ रही ना, मेरी भी समझ में कुछ ज़्यादा आ नहीं रहा था. पिछले कुछ दिनों से इस के बारे में अखबारों के बारे में पढ़ तो रहे थे लेकिन आज ये खबरें पढ़ कर बहुत अजीब सा लगा।

किसी कारण वश स्कैन कर नहीं पाया, नहीं तो आप को ओरिजनल खबर ही पढ़ा देता। फिर भी इस ऊपर दिये लिंक पर क्लिक कर के आप भी थोड़ा इस के बारे में ज़रूर पढ़े।

और पता है यह खुलासा कैसे संभव हो पाया.....सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत किसी ने अरजी लगाई थी। मन ही मन मैंने भी इस गजब के अधिकार को एक जबरदस्त सलाम ठोक दिया..........आप किस बात की इंतज़ार कर रहे हैं !

अगर यही विकास है तो.........


अभी सुबह के चार बजे हैं ...और मैं आधे घंटे तक मच्छरों से परेशान होकर.....परेशान क्या, हार कर उठ के बैठ गया हूं। हां, हां, पता है वो पचास रूपये वाली मशीन लगा लेनी थी.....लेकिन गर्मी भी तो अभी दो-तीन दिन से ही थोड़ी महसूस होने लगी है। आज पहली बार एक नंबर पर पंखा चला।

मैं एकदम निठल्ला बैठा हुया इस समय विकास की परिभाषा ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं..........मुझे नहीं याद कि बचपन में हम लोग कभी इन मच्छरों की वजह से उठे हों। अब इस तरह के घर में रहता हूं जिस में एक भी मक्खी नहीं है, ये कमबख्त मच्छर भी सुबह तो दिखते नहीं लेकिन शाम एवं रात के वक्त इन के द्वारा परेशान किया जाना बदस्तूर जारी है। घर के आसपास भी ...लगभग आधे किलोमीटर तक ...गंदगी कहीं भी नज़र नहीं आती।

हम लोग इतने दशकों से सुनते आ रहे हैं ना कि मच्छरों को रोकथाम के लिये फलां-फलां कदम हमें उठाने चाहियें ....और हर बंदा अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिशा में कुछ न कुछ कर के खुश होता भी रहता है। लेकिन फिर भी इन बीमारियों की खान.....मच्छरों को हम लोग मिलजुल कर कंट्रोल नहीं कर पाये.......और बातें हम लोग इतनी बड़ी बड़ी हांकेंगे कि जैसे पता नहीं .............यकीन नहीं हो तो ट्रेन के सामान्य डिब्बे में हो रही गर्मागर्म डिस्कशन में थोड़ा सम्मिलित हो कर देख लीजियेगा। किसी कंपार्टमैंट में तो एक ग्रुप के माडरेटर को यही चिंता सताये जा रही है कि पाकिस्तान का क्या बनेगा....तो दूसरा, यह सोच कर दुःखी है कि इस बार उस का मनपसंदीदा चैनल सब से तेज़ चैनल न बन पाया.........!!

और हां, पहले इन दिनों में ही आंगन में तो नहीं ,लेकिन बरामदे में सोने की तैयारियां शुरू हो जाया करती थीं। और अब बच्चों को तारों से भरे अंबर के तले सोना भी किसी परी-कथा जैसा लगता है...............कोई सो कर तो देखे...या तो मच्छर ही अगवा कर के ले जायेंगे ....और अगर कहीं अगवा होने से बच गया तो सुबह इन के द्वारा काटे हुये के निशान देख देख कर तुरंत मच्छर-मार या मच्छर भगाऊ मशीन को लेने दौड़ पड़ता है।

जो भी हो......जैसा कि सब जगह ही कहते हैं कि इन बदले हुये हालातों के लिये हम सब ज़िम्मेदार हैं.................मुझे सब से ज़्यादा दुःख इसी बात का है कि हम सारा दिन गंदगी को रोना रोते रहते हैं ...............साफ ढंग से नहीं हो पा रही है, सफाई वाले अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं.........लेकिन बात सोचने की तो यह भी है कि हम आखिर क्या कर रहे हैं !!---मुझे पूरा विश्वास है कि अगर हर घर के द्वार पर भी एक सफाईवाला खड़ा कर दिया जाये...तो भी हमारी हालत में सुधार नहीं हो सकता।

और इस तरह की गंदगी जो हमें जगह जगह दिखने लगी है उस का सब से अहम् कारण जो मुझे लगता है कि हमारा लाइफ-स्टाइल कुछ इस तरह का हो गया है कि हम बहुत ज़्यादा कूड़ा-कर्कट जनरेट करने लग गये हैं.............आप को भी याद होगा कि जब हम लोग बच्चे थे तो सारे घर की सफाई होने के बाद जो धूल-मिट्टी इक्ट्ठी हुया करती थी, उसे काम-वाली एक कागज़ पर डाल कर बाहर दरवाजे के बाहर फैंक आती थी और उन दिनों भी इस तरह के बिहेवियर पर बड़ी आपत्ति उठाई जाती थी कि यार, यह भी कोई बार हुई कि गंदगी को मुंह से उतार कर नाक पर लगा लिया.......घर की सफाई कर के सारी गंदगी बाहर डाल दी , यह भी कोई बात हुई !

लेकिन अब तो हम अपने आप को विकसित कह कर खुश होने वाले लोग...कुछ ज्यादा ही उच्चश्रृंखल से हो गये हैं। एक घर का कूड़ा-कर्कट देख कर डर लगता है................किसी के घर का ही क्यों ....मुझे तो अपने घर का ही दैनिक कूडा देख कर हैरानगी होती है कि यार, हम लोग एक दिन में इतना खा जाते हैं....दो-तीन थैलियां रोज़ाना कूड़ा। खैर, हमारे यहां तो नहीं , लेकिन आम तौर पर इस कूड़े में बच्चों के चिप्सों के पैकेट , उन की मनपसंद चीज़ों के पैकेट इत्यादि भी बहुत मात्रा में मिलते हैं....और दुःख की बात तो यही है कि ये उत्पाद हमारे बच्चों की सेहत बिगाड़ने के बाद भी हमारे पर्यावरण को भी विध्वंस करने में नहीं चूकते क्योंकि ये टोटली नान-बायो-डिग्रेडेबल होते हैं।

वैसे जिस तरह से मैं अपनी चारों तरफ़ रोज़ाना बड़े बड़े नाले इन प्लास्टिक की थैलियों की वजह से चोक हुये देखता हूं ना ...इस से मुझे तो लगता है कि आज की ताऱीख में ये थैलियां हमारी बहुत बड़ी शत्रु हैं.........कईं जगह इन पर बैन लगा है लेकिन फिर मैं और आप जब भी इसे मांगते हैं , हमें तुरंत एक थमा ही दी जाती है................यार, दही, दूध, दाल, सब्जी तक इन घटिया किस्म की थैलियों में मिलने लगी है। इन सस्ती थैलियों में लाई गई खाने पीने की वस्तुयें खा कर हम बीमारियों को तो खुला आमंत्रण दे ही रहे हैं ,उस के बाद ये हमारे नालीयां एवं नाले रोक कर सारे शहर में गंदगी फैलाती हैं। और कईं बार तो हमारे पशु-धन ( गऊ-माताओं वगैरह..) के पेट से इन के बंडल निकाले जा चुके हैं ..............हम सब के लिये कितनी शर्म की बात है कि हमें केवल एक कपड़े का थैला उठाने में इतनी झिझक हो रही है और पर्यावरण का जो मलिया-मेट हो रहा है , उसे हम देख नहीं पा रहे हैं या देख कर भी न देखने का ढोंग कर रहे हैं । और हर काम में सरकारी पहल की आस लगाये रहते हैं कि यार, काश हमारे शहर में भी इन चालू किस्म की पालिथिन की थैलियों पर बैन लग जाये........इस बैन में क्या है, आप आज से कपड़े का थैला उठा लीजिये , कसम खा लीजिये कि इन थैलियों को नहीं छूना..............तो बस हो गया बैन....................इस के लिये किसी कानून की ज़रूरत थोड़े ही है। लेकिन कुछ भी हो, अब तो यह सब करना ही होगा .....ऩहीं तो ये मच्छर हमें परेशान करते रहेंगे, गंदगी के अंबार हमारे आस-पास लगते रहेंगे.......और जैसा कि वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइज़ेशन कह रही है कि आज कल नईं नईं बीमारियों दिखने लगी हैं..................वे तो दिखेंगी ही क्योंकि हम लोगों ने निराले निराले शौक पाल रखे हैं ।

लेकिन जो भी हो, इन पालीथिन की थैलियों को बाय-बाय कह ही दिया जाये..............इसी में ही हम सब की बेहतरी है....बेहतरी को मारो गोली............अब तो वह स्टेज रही ही नहीं, अब तो भई इन को बहिष्कार करने के इलावा कोई चारा ही नहीं बचा। और अगर अभी भी मन को समझा न पायें हों तो जब कोई सफाई-कर्मचारी बिना दस्ताने डाले हुये किसी रुके हुये मेन-होल की सफाई कर रहा हो तो थोड़ा उस के पास खड़े होकर अगर हम उस में निकलते हुये तरह तरह के आधुनिकता के , विकास के प्रतीकों को ...और उस के द्वारा लगातार बाहर निकाल कर रखे जा रहे इन्हीं थैलियों के ढेर को देखेंगे तो सारा माजरा समझ में आ जायेगा। लेकिन कितने दिन यह सब ठीक रहेगा..............बस, चंद दिनों के लिये ही ।

चलिये......थोडा सोचें कि आखिर हम ने इस विकास से क्या पाया.......ठीक है फोन पर ढेर बतियाने लगे हैं, घर में ही रेल टिकट निकालने लगे हैं, हवाई जहाज में उड़ने के बारे में घर बैठे ही जानने लगे हैं , चंद मिनट पहले दूर- देश में क्या हुया है जानने लगे हैं, स्टिंग आप्रेशन भी करने लगे हैं..............लेकिन इस मच्छर का भी तो कुछ करो ना यारो। बहुत परेशानी होती है.....चिल्लाने की इच्छा होती है।

वही बात है ना कि जैसे जावेद अख्तर साहब लिखते हैं कि पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके, .......तुमने और मैंने क्या पाया इंसा होके !!................कितना उम्दा एक्सप्रेशन है...............वाह भई वाह!!..........लेकिन हम भी तो हम ही ठहरे, अपनी तरह के एक अदद अलग ही पीस, हम ये सब बातें सुन कर भी कहां सुधरने वाले हैं।.....मैं कोई झूठ बोल्या ?...........



अगर यही विकास है तो.........



अभी सुबह के चार बजे हैं ...और मैं आधे घंटे तक मच्छरों से परेशान होकर.....परेशान क्या, हार कर उठ के बैठ गया हूं। हां, हां, पता है वो पचास रूपये वाली मशीन लगा लेनी थी.....लेकिन गर्मी भी तो अभी दो-तीन दिन से ही थोड़ी महसूस होने लगी है। आज पहली बार एक नंबर पर पंखा चला।
मैं एकदम निठल्ला बैठा हुया इस समय विकास की परिभाषा ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं..........मुझे नहीं याद कि बचपन में हम लोग कभी इन मच्छरों की वजह से उठे हों। अब इस तरह के घर में रहता हूं जिस में एक भी मक्खी नहीं है, ये कमबख्त मच्छर भी सुबह तो दिखते नहीं लेकिन शाम एवं रात के वक्त इन के द्वारा परेशान किया जाना बदस्तूर जारी है। घर के आसपास भी ...लगभग आधे किलोमीटर तक ...गंदगी कहीं भी नज़र नहीं आती।
हम लोग इतने दशकों से सुनते आ रहे हैं ना कि मच्छरों को रोकथाम के लिये फलां-फलां कदम हमें उठाने चाहियें ....और हर बंदा अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिशा में कुछ न कुछ कर के खुश होता भी रहता है। लेकिन फिर भी इन बीमारियों की खान.....मच्छरों को हम लोग मिलजुल कर कंट्रोल नहीं कर पाये.......और बातें हम लोग इतनी बड़ी बड़ी हांकेंगे कि जैसे पता नहीं .............यकीन नहीं हो तो ट्रेन के सामान्य डिब्बे में हो रही गर्मागर्म डिस्कशन में थोड़ा सम्मिलित हो कर देख लीजियेगा। किसी कंपार्टमैंट में तो एक ग्रुप के माडरेटर को यही चिंता सताये जा रही है कि पाकिस्तान का क्या बनेगा....तो दूसरा, यह सोच कर दुःखी है कि इस बार उस का मनपसंदीदा चैनल सब से तेज़ चैनल न बन पाया.........!!
और हां, पहले इन दिनों में ही आंगन में तो नहीं ,लेकिन बरामदे में सोने की तैयारियां शुरू हो जाया करती थीं। और अब बच्चों को तारों से भरे अंबर के तले सोना भी किसी परी-कथा जैसा लगता है...............कोई सो कर तो देखे...या तो मच्छर ही अगवा कर के ले जायेंगे ....और अगर कहीं अगवा होने से बच गया तो सुबह इन के द्वारा काटे हुये के निशान देख देख कर तुरंत मच्छर-मार या मच्छर भगाऊ मशीन को लेने दौड़ पड़ता है।
जो भी हो......जैसा कि सब जगह ही कहते हैं कि इन बदले हुये हालातों के लिये हम सब ज़िम्मेदार हैं.................मुझे सब से ज़्यादा दुःख इसी बात का है कि हम सारा दिन गंदगी को रोना रोते रहते हैं ...............साफ ढंग से नहीं हो पा रही है, सफाई वाले अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं.........लेकिन बात सोचने की तो यह भी है कि हम आखिर क्या कर रहे हैं !!---मुझे पूरा विश्वास है कि अगर हर घर के द्वार पर भी एक सफाईवाला खड़ा कर दिया जाये...तो भी हमारी हालत में सुधार नहीं हो सकता।
और इस तरह की गंदगी जो हमें जगह जगह दिखने लगी है उस का सब से अहम् कारण जो मुझे लगता है कि हमारा लाइफ-स्टाइल कुछ इस तरह का हो गया है कि हम बहुत ज़्यादा कूड़ा-कर्कट जनरेट करने लग गये हैं.............आप को भी याद होगा कि जब हम लोग बच्चे थे तो सारे घर की सफाई होने के बाद जो धूल-मिट्टी इक्ट्ठी हुया करती थी, उसे काम-वाली एक कागज़ पर डाल कर बाहर दरवाजे के बाहर फैंक आती थी और उन दिनों भी इस तरह के बिहेवियर पर बड़ी आपत्ति उठाई जाती थी कि यार, यह भी कोई बार हुई कि गंदगी को मुंह से उतार कर नाक पर लगा लिया.......घर की सफाई कर के सारी गंदगी बाहर डाल दी , यह भी कोई बात हुई !
लेकिन अब तो हम अपने आप को विकसित कह कर खुश होने वाले लोग...कुछ ज्यादा ही उच्चश्रृंखल से हो गये हैं। एक घर का कूड़ा-कर्कट देख कर डर लगता है................किसी के घर का ही क्यों ....मुझे तो अपने घर का ही दैनिक कूडा देख कर हैरानगी होती है कि यार, हम लोग एक दिन में इतना खा जाते हैं....दो-तीन थैलियां रोज़ाना कूड़ा। खैर, हमारे यहां तो नहीं , लेकिन आम तौर पर इस कूड़े में बच्चों के चिप्सों के पैकेट , उन की मनपसंद चीज़ों के पैकेट इत्यादि भी बहुत मात्रा में मिलते हैं....और दुःख की बात तो यही है कि ये उत्पाद हमारे बच्चों की सेहत बिगाड़ने के बाद भी हमारे पर्यावरण को भी विध्वंस करने में नहीं चूकते क्योंकि ये टोटली नान-बायो-डिग्रेडेबल होते हैं।
वैसे जिस तरह से मैं अपनी चारों तरफ़ रोज़ाना बड़े बड़े नाले इन प्लास्टिक की थैलियों की वजह से चोक हुये देखता हूं ना ...इस से मुझे तो लगता है कि आज की ताऱीख में ये थैलियां हमारी बहुत बड़ी शत्रु हैं.........कईं जगह इन पर बैन लगा है लेकिन फिर मैं और आप जब भी इसे मांगते हैं , हमें तुरंत एक थमा ही दी जाती है................यार, दही, दूध, दाल, सब्जी तक इन घटिया किस्म की थैलियों में मिलने लगी है। इन सस्ती थैलियों में लाई गई खाने पीने की वस्तुयें खा कर हम बीमारियों को तो खुला आमंत्रण दे ही रहे हैं ,उस के बाद ये हमारे नालीयां एवं नाले रोक कर सारे शहर में गंदगी फैलाती हैं। और कईं बार तो हमारे पशु-धन ( गऊ-माताओं वगैरह..) के पेट से इन के बंडल निकाले जा चुके हैं ..............हम सब के लिये कितनी शर्म की बात है कि हमें केवल एक कपड़े का थैला उठाने में इतनी झिझक हो रही है और पर्यावरण का जो मलिया-मेट हो रहा है , उसे हम देख नहीं पा रहे हैं या देख कर भी न देखने का ढोंग कर रहे हैं । और हर काम में सरकारी पहल की आस लगाये रहते हैं कि यार, काश हमारे शहर में भी इन चालू किस्म की पालिथिन की थैलियों पर बैन लग जाये........इस बैन में क्या है, आप आज से कपड़े का थैला उठा लीजिये , कसम खा लीजिये कि इन थैलियों को नहीं छूना..............तो बस हो गया बैन....................इस के लिये किसी कानून की ज़रूरत थोड़े ही है। लेकिन कुछ भी हो, अब तो यह सब करना ही होगा .....ऩहीं तो ये मच्छर हमें परेशान करते रहेंगे, गंदगी के अंबार हमारे आस-पास लगते रहेंगे.......और जैसा कि वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइज़ेशन कह रही है कि आज कल नईं नईं बीमारियों दिखने लगी हैं..................वे तो दिखेंगी ही क्योंकि हम लोगों ने निराले निराले शौक पाल रखे हैं ।
लेकिन जो भी हो, इन पालीथिन की थैलियों को बाय-बाय कह ही दिया जाये..............इसी में ही हम सब की बेहतरी है....बेहतरी को मारो गोली............अब तो वह स्टेज रही ही नहीं, अब तो भई इन को बहिष्कार करने के इलावा कोई चारा ही नहीं बचा। और अगर अभी भी मन को समझा न पायें हों तो जब कोई सफाई-कर्मचारी बिना दस्ताने डाले हुये किसी रुके हुये मेन-होल की सफाई कर रहा हो तो थोड़ा उस के पास खड़े होकर अगर हम उस में निकलते हुये तरह तरह के आधुनिकता के , विकास के प्रतीकों को ...और उस के द्वारा लगातार बाहर निकाल कर रखे जा रहे इन्हीं थैलियों के ढेर को देखेंगे तो सारा माजरा समझ में आ जायेगा। लेकिन कितने दिन यह सब ठीक रहेगा..............बस, चंद दिनों के लिये ही ।
चलिये......थोडा सोचें कि आखिर हम ने इस विकास से क्या पाया.......ठीक है फोन पर ढेर बतियाने लगे हैं, घर में ही रेल टिकट निकालने लगे हैं, हवाई जहाज में उड़ने के बारे में घर बैठे ही जानने लगे हैं , चंद मिनट पहले दूर- देश में क्या हुया है जानने लगे हैं, स्टिंग आप्रेशन भी करने लगे हैं..............लेकिन इस मच्छर का भी तो कुछ करो ना यारो। बहुत परेशानी होती है.....चिल्लाने की इच्छा होती है।
वही बात है ना कि जैसे जावेद अख्तर साहब लिखते हैं कि पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके, .......तुमने और मैंने क्या पाया इंसा होके !!................कितना उम्दा एक्सप्रेशन है...............वाह भई वाह!!..........लेकिन हम भी तो हम ही ठहरे, अपनी तरह के एक अदद अलग ही पीस, हम ये सब बातें सुन कर भी कहां सुधरने वाले हैं।.....मैं कोई झूठ बोल्या ?...........



8 comments:

Gyandutt Pandey said...
पॉलीथीन तो बहुत बड़ा अभिशाप है। एक बड़ी खोज वह होगी जिसमें पॉलीथीन को बायोडिग्रेडेबल बनाया जा सकेगा। वह अनुसन्धान कर्ता या तो कुनैन/पेनिसिलीन के आविष्कारक की तरह मानवता का सेवक होगा, या बिल गेट्स की तरह सबसे धनी।
उस आविष्कारक की इन्तजार में है यह दुनियां।
दिनेशराय द्विवेदी said...
गंदगी लोगों को ग्राह्य होती जा रही है।
डॉ. अजीत कुमार said...
पता नहीं ब्लोग पढने वाले कितने लोग इस बात की चिंता करते होंगे? या कितने आदमी इस पर अमल करते होंगे...
mamta said...
गंदगी और पॉलीथीन की समस्या जटिल ही होती जा रही है।
गोवा मे सब्जी या फल वाले पॉलीथीन नही देते है क्यूंकि यहां पॉलीथीन मे सामान देने पर दुकानदार को जुर्माना देना पड़ता है।
हालांकि अभी ये पूरी तरह सफल नही है ।
परमजीत बाली said...
बहुत गंभीर मसला है...लेकिन अभी बचाव का कोई रास्ता नजर नही आता।

" मैं कोई झूठ बोल्या?"
कोई ना।
Mired Mirage said...
मैं तो बार बार पॉलीथीन की थेली लेने से मना करती हूँ । सब्जी आदि खरीदने जाती हूँ तो अपनी अलग अलग थैलियों में सब्जी डलवाती हूँ । सब्जी वाले व वालियाँ अवश्य मुझे किसी प्रकार का सनकी मानते हैं । एक रूपये में बिकते शैम्पू, पान मसाले आदि के पाऊच भी बहुत बड़ी समस्या हैं । परन्तु यदि इनके विरुद्ध बोलेंगे तो गरीब विरोधी कहलाएँगे ।
घुघूती बासूती
Padma Srivastava said...
डॉक्टर साहब, देश में गंदगी और पॉलीथीन की समस्या बढ़ती जा रही है।
नीरज गोस्वामी said...
आप सच कह रहे हैं, बचपन में हम लोग घर की लान में चारपाई की एक श्रृंखला बना कर गर्मियों में सोया करते थे और मच्छर का नमो निशान नहीं हुआ करता था अब तो लान क्या छत पर सोये कई दशक हो गए...हम ही अपने इस हाल के लिए जिम्मेदार हैं.
नीरज

सोमवार, 17 मार्च 2008

वो ट्रंक-काल वाले दिन..........मत याद दिलाओ !!


वो ट्रंक-कॉल करने वाले दिन भी क्या दिन थे....चलिए अपनी यादों को ज़्यादा तो नहीं....बस बीस-पच्चीस साल पहले तक ही रीवाइंड कीजिये.....। सबसे पहले चार-पांच किलोमीटर का सफर साईकिल पर तय कर के ज़िले के बड़े डाकखाने पर पहुंचना होता था।

तार-बाबू के काउंटर पर पहुंच कर पहले उस का मूड देखा जाता था। क्योंकि सब कुछ तो उस के हाथ में ही होता था....अगर उसे ग्राहक के आव-भाव कहीं पसंद नहीं आये और उस ने तपाक से कह दिया कि ......मैं कह रहा हूं ना कि जयपुर की लाइन मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं है इस समय..........तो आप उस का क्या लेते ?.....इसलिये सब काम बड़ी तहजीब से चलता था।

बस, आप का थोड़ा सा इंटरव्यू डयूटी पर बैठा बाबू पहले लेता था कि हां, बोलो, कहां करोगे बात........शायद आधे लोगों की स्क्रीनिंग तो इसी स्टेज पर ही हो जाया करती थी कि यूं ही समय बरबाद करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि सुबह से ही बम्बई की लाइनें मिल ही नहीं रही हैं। और मुझे याद है कि कईं बार तो एक फोन करने के लिये दो-तीन दिन उस जीपोओ के चक्कर लगाने पड़ते थे।

सब से पहले बाबू एक फार्म आप को थमा देता था...जिसे भरने के लिये कोई कौना ढूंढना पड़ता था ....लेकिन अभी अभी याद आ रहा है कि कभी कभी वह सिर्फ आप से पूछ लेता था कि आप ने कहां फोन करना है......और वह झट से अपने रजिस्टर में आपका बताया हुया नंबर लिख लेता था......और साथ में यह भी ज़रूर पूछ लिया करता था कि अर्जैंट करना है या आर्डिनरी................क्योंकि इन के चार्जेज़ में भी फर्क हुया करता था। इतनी फार्मैलिटि के बाद फिर वह आप से बीस या पचास रुपये ( दूरी के हिसाब से) ...लेकर अडवांस के रूप में जमा कर लिया करता था।

अब होती थी ....ग्राहकों की तपस्या शुरू......इंतजार की घड़ियां खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं। वह बाबू दन-दना-दन एक के बाद नंबर घुमाता जाता और कुछ कुछ अपने लोकल बस-अड्डे के बाथ-रूम के ठेकेदार वाले अंदाज़ में ग्राहकों को आवाज़ लगा दिया करता कि ....कौन है ग्वालियर वाला , कौन है नासिक वाला.............उस की आवाज़ आने का मतलब होता था कि भई...तेरा फोन लग गया है या घंटी बज रही है ...चल, भाग कर उस कैबिन में जल्दी से घुस जा जहां पर एक पुराने ज़माने का एक काला टैलीफोन सैट पड़ा होता था। और , फोन पर बतियाने वाले मेरे जैसे नये नये खिलाड़ी जो इतनी तेज़ी से बोलते थे कि शायद आस-पास के कस्बों तक आवाज़ वैसी ही पहुंच जाये। लेकिन अकसर सब की बातें खुली होती थीं.....सब को बाहर सुनती थी कि उस के परिवार में क्या क्या चल रहा है !! लेकिन तब हम लोग प्राइवेसी के इतने दीवाने भी नहीं हुया करते थे।

लेकिन यह क्या, यह वाले लाला जी तो आधे मिनट में ही फोन वाले कैबिन से बाहर आ गये और कह रहे हैं कि दूसरी तरफ से आवाज़ ही क्लियर नहीं सुन रही थी। खैर, किसे मंजे हुये अंपायर की तरह उस बाबू का फैसला अकसर फाइनल ही हुया करता था..........कि इस तरह की काल्स को चार्ज करना है या नहीं ....अकसर चार्ज कर ही लिया जाता था।

और यह बहस भी कभी कभी गर्मागर्म दिख जाती थी कि यार, बात तो इतनी छोटी की है और आप कह रहे हो कि तीस रूपये का बिल आ गया है । लेकिन वही बात कि बाबू के आगे सब की बोलती बंद हो जाया करती थी....जितनी मरजी कोई सब तरह के पलस जानने की शेखी बघारता, लेकिन बाबू के आगे उस की एक न चलती । क्योंकि बाबू ने अपने उस पुरानी सी मेज पर एक स्टाप-वाच भी रखी होती थी जिसे वह फोन लगते ही चालू कर दिया करता था...और दिन और रात के चार्जेज़ का भी अंतर हुया करता था। अब लगता है कि यार, हम लोगों में कुछ ज़्यादा ही पेसेंस थी.....एक फोन करने के लिये इतनी माथा-पच्ची.........इन की यादों की बारात में ही मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा हूं। लेकिन वे दिन भी बस कुछ अलग ही थे......।

जिन का फोन झट से लग जाया करता था और जो लोग अकसर वहां पर फोन करने आया करते थे , वे भी कहां बड़ी बड़ी छोड़ने से बाज आते थे.....सब अपना अपना ज्ञान फैंकने पर तुले होते थे......तू देख, अगर तेरे को दिल्ली करना है ना फोन तो शाम को छः बजे आया कर, देख पहली ट्राई में ही मिलता है। उस कमरे में पूरी जमघट लगा हुया करता था......क्योंकि औसतन जितने बंदे फोन करने वाले उतने ही उस को एस्कार्ट करने वाले हुया करते थे। वाह, क्या नज़ारा हुया करता था। लेकिन , यह क्या.....यह महिलाओं के साथ भेदभाव तब भी होता था...............बस जनानीयां ते टावीयां-टुक्कीयां हुंदीयां सन...( महिलाओं तो बस कभी कभार ही दिखती थीं...) ...

इतना सब कुछ लिखने का ध्यान इसलिये आया कि आज शाम को अपने एक फ्रैंड को अमृतसर मोबाइल पर दो बार फोन ट्राई किया....लेकिन काल नहीं लगी.....चूंकि वह दोस्त अमृतसर के बड़े डाकखाने के पास ही रहता था तो झट से पुराने ज़माने की सारी बातें एक फ्लैश-बैक की तरह याद आ गईं जिन्हें आप के साथ साझा कर लिया ।

बैठ के त्रिंजनां च सोहनीये.......( जब तुम दूसरी लड़कियों के साथ बैठ कर...)

इस सुपर-डुपर पंजाबी गीत....बैठ के त्रिंजनां च सोहनीये...........पंजाबी मुंडा अपनी सोहनी से पूछ रहा है कि तुम त्रिंजनां( जब मुटियारां इक्ट्ठी हो कर बैठती हैं तो उसे त्रिंजन कहते हैं) ...में बैठ कर जब चादर पर कढ़ाई कर के फूल निकाल रही होती हो तो किस को याद कर के अपने लाल-लाल होंठों को दुपट्टे में छिपा कर हंसती रहती हो। यह भी बताओ कि वह कौन है जिस के लिये तुम इतना श्रृंगार करती हो !...यह भी बताओ कि तुम अंधेरी बन कर किस गबरू के ऊपर फिदा हो गई हो। वह कौन है जिस के लिये तुम अपनी उंगलियों में छल्ले डालने लग गई हो और अमावस्या के मेले पर भी आने लग पड़ी हो।
मुझे तो यह पंजाबी गीत बेहद पसंद है ...आप भी सुनिये।

मरने से पहले जीना ना छोड़ो, यारो !!

किसी बैंक में गये हुये हैं और कितनी भी जल्दी में हों तो क्या किसी के कहने पर कि फार्म भर दें ,तो क्या कोई बंदा मना कर सकता है ?......बिल्कुल भी नहीं.........मैंने भी कभी मना नहीं किया। जब हम लोग फिरोज़पुर में थे तो हम देखा करते थे कि कुछ रिटायर्ड लोग बैंक के बाहर एक छोटी सी मेज लगा कर बुजुर्ग एवं अनपढ़ लोगों के फार्म भरा करता थे। मेरे मन में ऐसे लोगों के लिये बेइंतहा इज्जत है और जो ऐसे लोग बिना किसी भी तरह के स्वार्थ के जन-जनार्धन की सेवा में रमे हुये हैं ....मैं तो इन्हें इश्वर से भी ऊपर मानता हूं......अब मानता हूं तो मानता हूं, यह मेरे वश में नहीं है और किसी धार्मिक स्थल की बजाये ऐसे लोगों को बार-बार नमन करना चाहूंगा।

पता है जब कोई किसी अनपढ़ को या बहुत ही बुजुर्ग को फार्म भरने के लिये मना भी नहीं करता और फार्म भरता भी नहीं ....तो उस खाली फार्म हाथ में पकड़े हुये इंसान को कितनी पीढ़ा होती है। अगर पता नहीं है तो अगली बार जब बैंक में जायें( नहीं, नहीं, विदेशी बैंक में नहीं...अपने ही किसी राष्ट्रीयकृत्त बैंक में !) ...तो कुछ ऐसे ही चेहरे ढूंढ कर पढ़ने की कोशिश कर लीजियेगा। यह बात अच्छी तरह से समझ में आ जायेगी। और हां, किसी को फार्म भर दें तो वह बंदा इतनी ज़्यादा दुयाओं की बौछार कर देता है कि मेरे जैसे बंदे को अपने ऊपर शर्म आने लगती है...कि यार, ऐसा कौन सा तीर मार दिया है हमने।

अच्छा तो मैं बात कर रहा था कि कुछ बुजुर्ग लोग किसी बैंक में जाकर अपने साथियों की थोड़ी मदद करने को अपना टाइम-पास बना लेते हैं........वैसे कितना सुपर-हिट आइडिया है। सारा दिन वही घिसे-पिटे चैनल देख कर क्या मिलना है........क्या कुछ बदल जायेगा.....तो फिर अगर लिमिट में यह सब देखा जाये तो ही ठीक है ना। अकसर देखता हूं कि रिटायर्ड लोग अनुभव का खजाना होते हैं तो फिर यह कहीं दो-तीन घंटे जा कर किसी कम खुशनसीब की मदद करने में कैसी झिझक..........किसी बैंक में जाया जा सकता है या किसी डाकखाने के बाहर बैठ कर लोगों की मदद की जा सकती है ...किसी कोर्ट कचहरी के बाहर बैठ कर लोगों को रास्ता दिखाया जा सकता है, किसी मरीज से जा कर बात की जा सकती है, कईं लोगों की ड्राफ्टिंग बहुत बढ़िया होती है , वे लोगों की चिट्ठी -पत्री में उन की मदद कर सकते हैं.....बहुत से लोग अपने अपने फन में खिलाड़ी होते हैं और रिटायर्ड होते ही बस अपनी खाट पर बेबसी, आलस की रजाई ओढ़ कर उस इडियट बॉक्स ( हां, वही टीवी और क्या ) ....के सामने डटे रह कर बस अपनी बीपी की अगली खुराक के समय का हिसाब लगाते रहते हैं या तो फिर अपने ब्याज का टोटल मार-मार कर परेशान होते रहते हैं कि यार, यह भी तो अनर्थ ही है ना कि पहले तो मिलते थे 750 रूपये महीने में लेकिन अब उसी पैसे पर 480रूपये मिलते हैं।

लेकिन अगर यही अनुभवी लोग अपने अपने महारत वाले फील्ड में किसी की उंगली थामना शुरू कर दें तो दुनिया की तसवीर ही बदल जायेगी.........दुनिया की तो छोड़ों....इन की लाइफ की तस्वीर ज़रूर बदल जायेगी...शायद धीरे धीरे इन की दवाईयां ही कम हो जायेंगी..........वैसे भी अगर ये सारा दिन बैठे बैठे अपने साथियों की दुआयें ही खातें रहेंगे तो दवाई खाने की इन्हें कहां फिक्र रहेगी।

ऐसे में मुझे अवतार फिल्म का वह गीत ध्यान में आ रहा है .......जिस में बुजुर्ग राजेश खन्ना अपने बुजुर्ग साथियों से कहता है कि यारो, उठो, चलो, भागो, दौड़ो..........मरने से पहले जीना ना छोड़ो, यारो। यू-टयूब पर इस गाने को ढूंढते ढूंढते मनोबल बढ़ाने के लिये इसी फिल्म की एक क्लिपिंग मिल गई .......सो, साथ ही चटका रहा हूं।

रविवार, 16 मार्च 2008

यह हाई-ब्लड-प्रैशर का हौआ क्यों बना हुया है!

लगभग पंद्रह साल पहले जब मैंने सिद्ध समाधि योग प्रोग्राम के एक पेम्फलेट में यह पढ़ा कि डाक्टर लोग मरीज़ों को तो बड़ी आसानी से कह देते हैं कि चिंता मत किया करो। लेकिन वे खुद इतनी ज़्यादा चिंता से ग्रस्त रहते हैं। यह बात मुझे छू गई। वैसे सोचता हूं कि बात में सच्चाई तो है।

अकसर यह भी सोचता हूं कि हमारे शरीर में करोड़ों-अरबों सूक्ष्म रासायनिक प्रक्रियायें हर पल चल रही हैं..........और इन्हीं प्रक्रियाओं के फल-स्वरूप ही हमारे शरीर का इंटरनल-मिल्यू ( internal milieu) तय होता है.......जैसा भी हो......उदाहरण के तौर पर देखें तो अब किसी को ब्लड-प्रैशर है और किसी का बी.पी बिल्कुल परफैक्ट है। इसलिये मैं यह सोचने पर बहुत मज़बूर होता हूं कि रोज़ की एक टेबलेट या कुछ टेबलेट कैसे किसी का ब्लड-प्रैशर कंट्रोल कर सकती है। लेकिन हां, यह भी ठीक होगा की ब्लड-प्रैशर कंट्रोल तो हो जाता होगा लेकिन इस का क्यूर( इलाज) तो नहीं न हो पाता। मेरा व्यक्तिगत विचार तो यह भी है कि एक अंग्रेज़ी दवाई की गोली से हमारे शरीर रूपी इस बेहद अद्भुत संरंचना को कंट्रोल करना इस दैविक संरचना से पंगा लेने से क्या कम है..............?...इस के बारे में बहुत सोचता हूं !!!

इसीलिये सोचता हूं कि शायद इसीलिये इतने लोग दिखते हैं जो रोज़ाना टेबलेट्स लेते हैं लेकिन फिर भी कंपलेन करते हैं कि उन का ब्लड-प्रैशर कंट्रोल में नहीं है। सोचता हूं कि इस तरह की तकलीफ़ों के लिये और इन के स्थायी इलाज के लिये कभी भी मेरा इस टेबलेट कल्चर में विश्वास रहा ही नहीं।

यह तो हुई अंग्रेज़ी दवाईयों वाली बात................आयुर्वैदिक दवाईयों का या होम्योपैथिक दवाईयों का मुझे कोई खास ज्ञान है नहीं ......और ये ब्लड-प्रैशर को कंट्रोल करने के लिये भी जिन अंग्रेज़ी दवाईयों की बात मैंने की है...ये शत-प्रतिशत मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जो कि आज मैं अपनी खुद की डायरी पर ही लिख रहा हूं। मैं यह भी तो नहीं चाहता कि मेरी यह बात पढ़ कर ब्लड-प्रैशर के मरीज़ अपनी अंग्रेज़ी दवाईयां फैंक दें और फिर जब इस के परिणाम-स्वरूप कुछ और ही जटिलतायें पैदा हो जायें तो बीच-बाज़ार मेरा गिरेबान पकड़ कर मुझ से जवाब मांगें कि लिखता तो बहुत कुछ है, अब बोल.....अब जवाब दे हमें कि अंग्रेज़ी दवाईयां लेते रहें कि नहीं !!

जो भी हो मेरी जो भी बेबाक राय थी, मैंने आज डायरी में लिख दी है। इस में तो कोई शक है ही नहीं कि एमरजैंसी को टैकल करने के लिये एलोपैथिक दवाईयों का कोई जवाब नहीं है.........ऐसा मैं समझता हूं............जब कोई हार्ट-अटैक का मरीज़ आता है , जब किसी का ब्लड-प्रैशर बहुत ही ज़्यादा बढ़ जाता है तो किस तरह से अकसर एलोपैथिक दवाईयां उसे तुरंत ही लाइन पर ले आती हैं।

मेरी बात लगता है कि थोड़ी कंफ्यूज़िंग सी लग रही है....सो, सीधी सीधी बात करता हूं कि मैं किसी भी ब्लड-प्रैशर के मरीज़ को अपनी कोई भी दवाई बंद करने की सलाह कतई नहीं दे रहा हूं....लेकिन मैं इतना ज़रूर कह रहा हूं कि उन्हें अपनी जीवन-शैली में भी उचित परिवर्तन करने होंगे..................अपना वज़न कम करना होगा, नमक का इस्तेमाल कम करना होगा, रोज़ाना सैर और शारीरिक व्यायाम/ योग-प्राणायाम् करना होगा, खाने-पीने में एहतियात बरतनी होगी, और सब से ज़रूरी ....बेहद ज़रूरी है ..........कि रोज़ाना मैडीटेशन करनी ही होगी।

इन लाइफ-स्टाईल से संबंधित बीमारियों को दूर रखने के लिये मैडीटेशन का बहुत बड़ा रोल है.....और ध्यान रहे कि इस पुरातन विद्या को गुरू-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही किसी गुरू से ही ग्रहण किया जा सकता है। यह निहायत ही ज़रूरी है..................जैसे हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिये स्नान ज़रूरी है , उसी तरह से हमारे मन को साफ-स्वच्छ रखने के लिये भी मैडीटेशन बहुत---बहुत ----बहुत .....बहुत ही लाज़मी है। यह मेरा पिछले 14वर्ष का व्यक्तिगत अनुभव है .....और आज कल तो विश्व के चोटी के वैज्ञानिक इस की हामी भर रहे हैं। मेरे विचार में हमारी लाइफ़ में प्रतिदिन नियमित तौर पर मैडीटेशन करना ही सब से महत्वपूर्ण बात है।

और हां, मैं कह रहा था कि ब्लड-प्रैशर वाले मरीज़ अपनी दवाई तो न छोड़ें, लेकिन ऊपर बताये गये सब प्रकार के जीवन-शैली में बदलाव ज़रूर कर लें.....किसी तरह के तंबाकू, शराब या किसी भी नशे को पास न फटकने दें और एक बात और भी बहुत ज़रूरी है कि अपने ब्लड-प्रैशर को नियमित चैक भी करवाते रहें ......तो यकीन मानिये.....आप का इलाज कर रहे चिकित्सक धीरे धीरे आप की ब्लड-प्रैशर की दवाईयां कम करने या तो धीरे धीरे बंद करने पर ही बाध्य हो जायेंगे।

प्राब्लम तो बस यही है कि हम तो टस से मस होना नहीं चाहते....किसी तरह का बदलाव अपने जीवन में हमें गवारा है ही नहीं..............हम तो अपने कंफर्ट-ज़ोन के साथ इस तरह चिपके हुये हैं कि बस............लेकिन हां, ब्लड-प्रैशर कंट्रोल वाली गोली टाइम पर ज़रूर खा लेते हैं...............लेकिन अकेली यह एक अदद बेचारी गोली क्या कर लेगी ?

आयुर्वैदिक दवाईयों को मैं बहुत बढ़िया मानता हूं...........और उन से बढ़िया बाबा रामदेव जी की बातों को..............यह बाबा जी भी एक करिश्मा ही हैं.............करोड़ों लोगों को वे अपने जीवन से प्यार करना सिखा रहे हैं। मुझे स्वयं उन को सुनना बहुत भाता है। वैसे चिकित्सा क्षेत्र में अगर किसी को उस की महान उपलब्धियों के लिये नोबेल-पुरस्कार देना हो तो मेरे ज़हन में बाबा रामदेव का नाम सर्वोपरि आता है......सिम्पली ग्रेट !! लेकिन ये असली बाबा लोग कहां इन दुनियावी तगमों के पीछे भागते हैं !

पता नहीं बात अकसर लंबी हो जाती है...............लेकिन सब से महत्वपूर्ण बात वही है कि ज़्यादातर केसों में यह ब्लड-प्रैशर का हौवा हमारा खुद का ही तो पैदा किया होता है......हम ज़रा से सजग हो जायें....अपनी जीवन-शैली को थोड़ा टटोलने लगें तो इसे( हाई बीपी) भागने का रास्ता नहीं मिलता। लेकिन सब से अहम् बात हमें हमेशा याद रखनी होगी...............मैडीटेशन...मैडीटेशन ...मैडीटेशन.............जब तक हमारे मन पर विभिन्न प्रकार की कुंठाओं के परिणाम स्वरूप हर पल जम रही मैल की सफाई भी प्रतिदिन नहीं होगी तो कैसे हो पायेगा हमारा मन एकदम क्लियर....................मुझे अपने गुरू जी की बात इस समय याद आ रही है...................As a matter of fact all religions started with meditation….but somehow they all ended in giving prescriptions for actions !......कितनी सही बात है !

एक बात और भी है ना कि पुरानी बातों के बोझ को हम लोग जो हमेशा अपने दिल पर लादे रखते हैं ना ....यह भी हमें ढंग से जीने नहीं देता। इसलिये आज की बात आज ही भूल जानी चाहिये..............कल का नया दिन नईं उमंगे, नये सपने , ऩई अवसर ले कर आ रहा है..............तो चलिए बांहे पसार कर उस के स्वागत की तैयारी करें...............वैसे , इस गाने में अमिताभ बच्चन भी कुछ ऐसा ही संदेश दे रहे हैं .........सुनिये और कर डालिये अपने कुछ गम गलत ….अभी...इसी वक्त !!!!!

इक दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा है !!

रविवार की इस सुस्त सी सुबह में पुराने वाली दुश्मन फिल्म का यह राजेश खन्ना और मुमताज़ पर फिल्माया गया गीत रविवार की इस अल्साई, सुस्ताई को छू-मंतर करने के लिये काफी है ......................यह सुन कर आप एकदम चकाचक न हो जायें तो कहियेगा......................


शनिवार, 15 मार्च 2008

बच्चों पर विश्वास नहीं करेंगे तो बहुत मुश्किल हो जायेगी !


मैं सोच रहा हूं कि जिस तरह से इंटरनेट का यूज़ दिन प्रति दिन बढ़ रहा है ....यकीनन इस के बेइंतहा फायदे तो हैं ही......लेकिन इस के दुष्परिणामों से कैसे हम अपने बच्चों को कच्ची उम्र में बचा सकते हैं। मेरे को तो एक ही ...केवल एक ही उपाय सूझ रहा है कि हमें अपने बच्चों पर विश्वास करना सीखना होगा। ज़माना बहुत बदल गया है और हमें अपने बच्चों पर विश्वास कर के उन का विश्वास जीतना ही होगा।
हां, एक बात मैंने कुछ दिन पहले कही थी कि अपने घर में इंटरनैट कनैक्शन को किसी कॉमन सी जगह जैसे कि लॉबी वगैरह में रखना एक अच्छा आइडिया है।
बात एक और भी है ना कि हमें अपनी उदाहरण से लीड करना होगा.....अगर हम चाहते हैं कि जब हम नैट पर बैठे हों तो बच्चे पास तक न फटकें तो इस से बच्चे चाहे छोटे ही हों उन्हें एक गलत मैसेज जाता है। उन्हें लगता है कि यार, अगर बापू ऐसा कर सकता है, अलग बैठ सकता है ..तो मैं क्यों नहीं ? उन में भी विद्रोह करने की एक ज्वाला सी धधकने लगती है....वैसे बात है भी तो सही...कायदे-कानून सब के लिये एक जैसे ही हों तो ही बात ठीक लगती है।
आज भी जब मैं अपने बच्चों को नेट की हिस्ट्री उड़ाने के बारे में कभी कभार पूछता हूं तो मुझे बहुत अपराध बोध होता है...मैं पहले अपने आप से पूछता हूं कि क्या मैंने यह नेट-हिस्ट्री खुद कभी नहीं उड़ाई......चाहे कभी भी यह काम किया हो , लेकिन किया तो था ना तो फिर अपने इस तरह के डबल-स्टैंडर्ड्ज़ मुझे परेशान करते हैं। और आज तो बच्चों के पास इस तरह की सैटिंग्स को बार-बार बदलने के लिये अपने ही कुछ टैक्नोलॉजी से जुड़े हुये कारण भी तो होंगे ( और हैं !)..................सीधी सी बात है कि मुझे तो कभी इस तरह के प्रश्न पूछने उन से ठीक लगते नहीं हैं..........बाकी सब की अपनी अपनी राय हो सकती है। मुझे लगता है कि मैं इस तरह के पुलिसिया सवाल पूछ कर उन के मन में अविश्वास के बीज रोप रहा हूं।
लेकिन मुझे लगता है कि बच्चों को अगर ऐसा लगता है कि उन के पेरेन्ट्स उन के ऊपर इतना ज़्यादा विश्वास करते हैं तो वे कभी भी (कुछ अपवाद हो सकते हैं) उन के विश्वास को ठेस पहुंचाने के बारे में सोचेंगे भी नहीं।
मुझे याद है कि मुझे नेट से जुड़े लगभग 10 साल होने को हैं.....शुरू शुरू में मेरा बेटा मेरे साथ कभी कभी जाया करता था....उस ज़माने में मैं तो चैटिंग वैटिंग में मसरूफ रहता था और मैं बेटे को एक कंप्यूटर पर बिठा देता था ...............मुझे आज भी वो कहता है कि पापा, आप ने भी मेरा शुरू शुरू में बड़ा उल्लू बनाया, खुद तो बैठ जाते थे ...नेट पर और मुझे कंप्यूटर के सेवड़ पेजिज़ देखने में लगा देते थे। जी हां, वह 1999 का ज़माना भी तो वह था कि जब इंटरनेट पर चैटिंग को बड़ी अजीब सी बात माना जाता था। लेकिन शायद हम लोगों ने यह चैटिंग करते करते ही इंटरनेट के बेसिक्स सीखे।( और लोग समझते हैं कि इन हिंदी ब्लोगरों की सीधी एंट्री ही चिट्ठों पर ही हुई है) !!...
तब तो हमें यह भी नहीं पता होता था कि इन सर्च-वर्च इंजनों का क्या फंडा होता है.............बस चैटिंग का ही पता था। मुझे याद है कि एक बार मेरा बास अपने बच्चे की किसी बिमारी के बारे में बात कर रहा था और मैं यह पूछना चाह रहा था कि आप ने यह सब नेट पर देखा होगा...............लेकिन मेरे मुंह से ये शब्द निकले थे........सर, आप को यह नेट में चैटिंग से पता चला होगा...............उस ने मुझे कोई खास जवाब नहीं दिया था।
विश्वास के इलावा अब कोई चारा नहीं दिखता...........मैं सोच रहा हूं कि जब केबल टीवी आया तो लगभग 15 साल पहले कुछ चैनल बच्चों के लिये लॉक करने की बहुत बातें हुईं.....अब इंटरनेट पर कुछ तरह की साइट्स ब्लाक करने की बात हो रही है ....लेकिन टैक्नोलॉजी इतने ज़ोरों से बढ़ रही है कि इतना सब कुछ करना माथा-पच्ची के सिवाय कुछ नहीं लगता।
और इसी टैक्नोलॉजी के कारण ही बच्चे हमारे से बहुत आगे निकल चुके हैं....अब मुझे ही देखिये...केवल लिखने का काम मेरा है ...बाकी सब कुछ मुझे मेरे बेटे ने सिखाया ...यहां तक कि मंगल फांट के बारे में भी , इस ब्लोगवाणी को , चिट्ठाजगत को उसी ने कहीं ढूंढ निकाला......मेरे ब्लोग्स को ऐग्रिगेटर्ज़ पर डालने का आइडिया भी उसी का था जो उस ने बखूबी किया.............इन पोस्टों के फांट्स वगैरह के बारे में भी मुझे बताता रहता है और ये जो मेरी विभिन्न बलोग्स पर आप यू-टयूब से लिंक किये हुये तरह तरह के फड़कते हुये गीत सुनते हो ना ,इन सब को अपनी पोस्ट पर लगाने की विधि भी इस ने ही मेरे को बताई है। अभी सोच रहा हूं कि इस की नेट-अक्सेस पर अगर मैंने भी तरह तरह के अंकुश लगाये होते तो यह सब मेरे लिये भी कैसे संभव हो पाता। ऐसा है ना कि हम लोगों के पास टाइम नहीं होता और अपने बच्चों से कुछ भी सीखने में हमें कभी किसी तरह का कंप्लैक्स भी नहीं होता।
और हां, बात हो रही थी विश्वास करने की ..........सोच रहा हूं कि मेरे बीजी-पापा जी ने भी मुझ पर बेइंतहा विश्वास किया ....और मैंने भी कभी भी उन के इस विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाई ( एक नावल के इलावा !) ….हुया यूं कि जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था तो कहीं से एक नावल मेरे हाथ लग गया ....सारी ज़िंदगी में केवल वह एक ही नावल पढ़ा है.......उस के कुछ पन्ने पढ़ने मुझे बहुत अच्छे लगते थे( जितना बता रहा हूं उतने से ही इत्मीनान कर लीजिये.......!!)..और मैंने उन्हें फोल्ड कर के रख छोड़ा था...........और अकसर उस नावल को छिपा कर ही रखता था ...और जैसे ही मौका मिलता तो अपनी किसी बड़ी सी किताब के अंदर छिपा कर उस के वही पन्ने बार बार पढ़ कर अच्छा लगने लगा था। और मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब घर में कोई भी नहीं होता था तो मैं उस नावल को बहुत आराम से पढ़ता था। लेकिन मैं भी किधर का किधर निकल गया.............शायद यह सब याद करना भी ज़रूरी था ....और इस के साथ यह भी कि वो पुराने दिन वो थे जब मनोहर कहानियां, मायापुरी पढ़ना छोटे बच्चों के लिये ठीक नहीं समझा जाता था। लेकिन जो मज़ा उन दिनों ये मनोहर कहानियां ( खास कर एक दो विशेष कहानियां...) और वह भी बार-बार पढ़ कर आया करता था उस के क्या कहने ।
बात कुछ ज्यादा ही लंबी हो गई है ना तो मैंने सोचा कि इस विषय के अनुरूप मेरी बेहद पसंदीदा फिल्म रोटी का एक गीत आप की तऱफ़ फैंकू...............यार हमारी बात सुनो, ऐसा इक इंसान चुनो, जिस ने पाप ना किया हो , जो पापी न हो......लेकिन उस का लिंक कापी न हो सका किसी ने उस पर पहरा लगा रखा है , सो , अगर विचार बने तो यू-ट्यूब पर जा कर सर्च में केवल तीन शब्द ....यार हमारी बात ....ही लिख दीजियेगा वह गीत प्रकट हो जायेगा। इतना ज़बरदस्त गीत है कि सब कुछ इतने इफैक्टिव तरीके से कह देता है ...........ज़रूर सुनियेगा और बतलाईएगा कि कैसा लगा।