ब्लॉग लेखक- डा.प्रवीण चोपड़ा.. 2007 से ब्लॉग लेखन एवं प्रशिक्षण में सक्रिय... drparveenchopra@gmail.com
गुरुवार, 20 मार्च 2008
मेरी लेखन यात्रा.....
बुधवार, 19 मार्च 2008
अब इस कंबल के बारे में भी सोचना पड़ेगा क्या !

बहुत ही छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम अकसर जाने-अनजाने नज़रअंदाज़ कर ही देते हैं...आज कुछ ऐसी ही बातों की चर्चा करते हैं। मुझे किसी के भी यहां जाकर कंबल ओढ़ना कभी नहीं भाता। अब आप भी सोच रहे होंगे कि यह कौन सी नई सनक सवार हो गई भला !!....जी नहीं, यह कोई सनक-वनक नहीं है। आज कल के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह एक अच्छा खासा मुद्दा है।
मुझे किसी के यहां जाकर और यहां तक अपने ही घर में कंबल ओढ़ने में बहुत संकोच होता है। आप इस का कारण समझ ही रहे होंगे !....इस का कारण केवल यही है कि अकसर हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले ये कंबल वगैरा विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं की खान होते हैं।
वह पल बहुत अजीब लगता है जब कभी घरों में इस तरह की बातें चलती हैं कि ये कंबल देख रहे हो, जब मुन्ने के पापा ने नई नई इंटर पास की थी...तब खरीदा था...और आज भी देख लो, वैसा का वैसा ही लगता है। लेकिन लगता ही है ना, लगने का क्या है........जो इस ने अरबों-खरबों कीटाणुओं को अपने अंदर छिपाया हुया है , उस का उल्लेख कौन करेगा ?.....जी हां, हमारे घरों में इस्तेमाल हो रहे कंबल कुछ इसी तरह के ही होते हैं। इन को ड्राई-क्लीन करवाने का कोई कल्चर न तो हमारे देश में कभी रहा और मेरे ख्याल में कभी हो ही नहीं पायेगा। वैसे बात वह भी तो है कि जब दो-साल में एक गर्म-सूट ड्राई-क्लीन करवाने में ही आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं, तो क्या अब हम कंबलों को ड्राई-क्लीन करवाने के सपने कैसे देखें ?....बात बिल्कुल सही भी है...वैसे हम लोगों के कपड़े खरीदते समय निर्णय भी तो कईं बार इस बार पर ही निर्भर करते हैं कि भई, कहीं इस को ड्राई-क्लीन करवाने की ज़रूरत तो नहीं ना पड़ेगी।
खैर बात कंबल की चल रही थी......और वैसे भी हम अपने घरों में देखते हैं कि इन कंबलों का तो बंटवारा कहां होता है कि यह पपू का है , यह टीटू वाला है....। और यहां तक मेहमान वगैरा भी वही कंबल इस्तेमाल करते हैं। और जब कभी किसी की तबीयत थोड़ी नासाज़ हो, कोई खांसी-जुकाम से बेज़ार हो ..... तो यही कंबल पसीने से लथ-पथ होते हैं। और फिर अगले दिन वही कंबल दूसरे सदस्य द्वारा ओढ़ा जाता है। संक्षेप में बात करें तो यही है कि इस प्रकार से कंबलों का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिये ठीक नहीं है।
तो क्या करें अब कंबल लेना भी बंद कर दें ?....नहीं, नहीं ,ऐसी बात नहीं है। लेकिन पहले लोग जो कंबल के ऊपर सूती कवर डाल कर रखते थे, यह बहुत ही बढ़िया आइडिया है क्योंकि इन्हें थोड़े थोड़े समय के बाद धो दिया जाता था ताकि अंदर कंबल काफी हद तक साफ़-स्वच्छ रह सके। और फिर कंबल को नियमित तौर पर धूप में सेंका भी जाता था ..ताकि उसे कीटाणुरहित किया जा सके। इसलिये हमें इन सूती कवरों को वापिस इन कंबलों पर लगाना चाहिये। नहीं तो इन महंगे ग्लैमरस कंबलों बिना किसी प्रकार के कवर के बीमारियों की खान बना डालें ...,यह फैसला हमारे अपने हाथ में ही है।
आज कल जो नये नये मैटीरियल के कंबल बाज़ारों में दिखने लग गये हैं ...कहने को तो कह देते हैं कि वे धोये जा सकते हैं । लेकिन हम लोग अकसर प्रैक्टिस में देखते हैं कि कौन इन्हें नियमित धोने के चक्कर में पड़ता है। वैसे मुझे याद आ रहा है कि एक बार एक ऐसे ही कंबल को धोने के बाद मैंने भी उसे बाहर बरामदे में सुखाने के लिये बाहर घसीटने में थोड़ी मदद की थी........यकीन मानिये , नानी याद आ गई थी। कहने से भाव है कि मान भी लिया जाये कि यह धोये जा सकते हैं लेकिन यह आइडिया कुछ ज़्यादा प्रैक्टीकल नहीं है....हां, अगर कहीं ये नियमित धुलते हैं तो बहुत बढ़िया बात है।
लेकिन जहां भी संभव हो, इन कंबलों को सूती कवह डले ही होने चाहियें क्योंकि इन में जमा धूल-मिट्टी-जीवाणु भी तरह तरह की एलर्जी बढ़ाने में पूरी भूमिका निभाते हैं। लेकिन लोग तो अकसर एलर्जी के लिये उत्तरदायी एलेर्जन ढूंढने की अकसर नाकामयाब कोशिश करते हैं लेकिन अपने आसपास ही इस तरह के एलर्जैन्ज़ की तरफ़ ज़्यादा ध्यान ही नहीं देते। तो, आगे से ध्यान दीजियेगा।
यह तो हुई कंबलों की बात, लेकिन परदों का भी कुछ ऐसा ही हाल होता है। अकसर इन्हें तब तक धोया नहीं जाता जब तक इन्हें देखते ही उल्टी करने जैसा न होने लगे। ये भी कईं कईं महीनों तक गंदगी समेटे रहते हैं...। वैसे तो हर घर में ही ..लेकिन जिन घरों में एलर्जी के केस हैं, सांस में तकलीफ़ के मरीज़ हैं, दमा के मरीज़ हैं....उन के लिये तो ये सावधानियां शायद दवाई से भी बढ़ कर हैं। लेकिन हमारी समस्या यही है कि हमें परदे तो चाहिये हीं, लेकिन साथ में हमारी सम्पन्नता का दिखावा भी तो होना चाहिये। इसी चक्कर में इतने भारी भारी परदे शो-पीस के तौर पर टांग दिये जाते हैं कि न तो उन्हें नियमित धोते बने और न ही उतारते बने। अकसर इन्हें धोने के नाम पर कईं बार तो बाई ही काम छोड़ कर भाग जाये !!...आखिर हमें सीधे-सादे हल्के फुल्के ऐसे परदे टांगने में दिक्कत क्या है जिन्हें हम नियमित धुलवा तो सकें।
लेकिन यह बात परदों तक ही तो सीमित नहीं है ना.....आज कल हम लोगों के घर में सोफे सैट देख लो। इन को भी देख कर उल्टी आती है। ये भी अपने अंदर इतनी गंदगी समेटे होते हैं कि क्या कहें !!.....कारण वही कि सब कुछ ..सीट कवर, कुशन वगैरा के ऊपर महंगे महंगे कपड़ों के कवर फिक्स हुया करते हैं..........और पता नहीं इन के ऊपर कितने लोगों का पसीना लगा रहता है, कितने छोटे छोटे बच्चों ने इन्हें कितनी ही बार पवित्र किया होता है( समझ गये ना आप!)…, कितनी बार इन के ऊपर खाने पीने की चीज़े गिर चुकी होती हैं, कितनी बार बच्चे गंदे पैरों से इन के ऊपर उछलते रहते हैं........लेकिन इन के कवर चेंज करने का झंझट भला कौन बार बार ले सकता है .....भई खूब पैसा लगता है.....ऐसे में सालों तक ये गंदगी से भरे रहते हैं। एक दूसरी समस्या इन सोफा-सेटों के साथ यह भी तो है ना कि ये सब इतने भीमकाय होते हैं कि इन के रहते ठीक तरह से कमरे की सामान्य सफाई भी तो नहीं हो पाती ।
अकसर मेरी आब्जर्वेशन है कि लोगों को इन बातों की खास फिक्र है नहीं, उन्हें तो बस अपनी बैठक को चकाचक रखने में ही मज़ा आता है। इसीलिये कईं घरों में तो बच्चों को डराया जाता है कि खबरदार, अगर तुम सोफे की तरफ भी गये, पता है जब कोई आ जाता है तो कितनी शर्म आ जाती है। मेरा इस के बारे में विचार एकदम क्रांतिकारी है ...............शायद बहुत से लोगों को न पच पाये............मेरा विचार है कि घर आप का है, आप के रहने के लिये, बच्चों के लिये ताकि वे पूरी मस्ती कर सकें..............मज़ा कर सकें ताकि बड़े हो कर उन के पास अनगिनत मीठी यादें हों...........इसलिये घरों में सीधे-सादे फ्रेम वाले सोफे हों, कुर्सियां हों जिन के ऊपर कपड़े के इस तरह के कवर हों कि उन्हें आसानी से धुलाया जा सके। इस से एक तो आपका ड्राइंग-रूम साफ-स्वच्छ दिखेगा....दिखेगा ही नहीं , होगा भी.....और बच्चे भी खुश रह कर बिना किसी रोक टोक के जहां मरजी मस्ती कर सकते हैं, ऊधम मचा सकते हैं। और रही बात मेहमानों की , वे ना ही तो महंगे परदे और न ही महंगे, भारी भरकम सोफे देखने आ रहे हैं और न ही एक काजू और दो किशमिश के दाने खाने के लिये......अतिथि के लिये हमारा सत्कार हमारी आंखों से झलकता है.....उसे चाहे हम चटाई पर बैठा कर सादा पानी ही पिला दें....वो हमारी आंखों को पढ़ता है कि उस का स्वागत हुया है या नहीं।
पता नहीं ...मैं भी कहां का कहां निकल जाता हूं...मेरा बेटा वैसे मुझे अकसर चेतावनी देता रहता है कि बापू, अगर तुम ने ब्लोगगिरी में कुछ करना है ना तो कुछ टैक्नीकल लिखा करो, यह फलसफा आज कल कोई पढ़ना नहीं चाहता । खैर, यह उस का अपना ओपिनियन है और उसे अपना ओपिनियन रखने का पूरा पूरा हक है। लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है , मैं तो भई लिख कर फारिग हो जाता हूं, और मुझे क्या चाहिये। लेकिन आज यह कंबल, परदों एवं सोफों वाली बात है बहुत ही ..बहुत ही ...बहुत ज़्यादा ही महत्त्वपूर्ण ............इसिलये इस के बारे में थोड़ा ध्यान करियेगा.....ताकि हम अपने इर्द-गिर्द इन कीटाणुओं, जीवाणुओं के अंबार तो न लगा लें।
अब इस कंबल के बारे में भी सोचना पड़ेगा क्या !

Edited on 14.3.2016 ( आठ साल बाद..)...आज सुबह मैंने इस पोस्ट का लिंक किसी नई पोस्ट में लगाया तो मैंने सोचा कि आज के समय में हम लोग जो सोफ़ा इस्तेमाल कर रहे हैं, उस की एक तस्वीर ज़रूर लगानी चाहिए.. वैसे तो मैं अपनी पोस्टों को कभी नहीं पढ़ता...मुझे अजीब सा लगता है, पता नहीं उस समय इतने वर्षों पहले मन की क्या मौज में कुछ लिखा गया होगा.. ९९प्रतिशत पोस्टों को मैं एक बार पब्लिश करने के बाद देखता ही नहीं....इस में भी नहीं पता कि क्या लिखा है, बस आज कल घर में इस्तेमाल होने वाले सोफे की फोटो डाल कर निकल रहा हूं...Ok.. take care....
ये दूरवर्ती शिक्षण पाठ्यक्रम (correspondence courses)……..मेरे अनुभवों से कुछ सीखा चाहेंगे ?
अब मसला यह था कि इंगलैंड में तीस हज़ार रूपये भेजने थे और मुझे इस के बारे में एक पैसे की भी जानकारी न थी। तब हम लोग फिरोज़पुर (पंजाब) में रहते थे......जान-पहचान ढूंढ कर किसी बैंक में गया जहां इस तरह के विदेशी ड्राफ्ट्स (शायद यही कहते थे !)..बनते थे....वहां जा कर पता चला कि यह काम फिरोज़पुर शहर में कहीं नहीं होता, आप को लुधियाना जाना होगा ..वहां फलां फलां ब्रांच में फारन एक्सचेंज का इस तरह का काम होता है...कुछ फारमैलिटिज़ भी बतला दी गईं।
मैंने सोचा कि लुधियाना जो 110किलोमीटर की दूरी पर था.....अगर वहां जा कर भी काम न हुया तो दिन खराब होगा। इसलिये दिल्ली ही चला गया...छुट्टी ले कर...वहां पर भी जान-पहचान की लाठी के सहारे आखिर उसी दिन इस तरह का लगभग तीस हज़ार रूपये खर्च कर के ड्राफ्ट बन गया।
ड्राफ्ट भेजने के कुछ दिनों बाद ही मुझे छोटी-छोटी किताबों का एक पुलंदा आ गया............एक बात बतला दूं...कि इन अंग्रेजों की अंग्रेज़ी चीज़ों का इतना ज़बरदस्त क्रेज़ रहा है कि उस पैकेट को देख कर मेरी तो बांछे ही खिल गईं कि अब बन के दिखायूंगा सारी दुनिया को एक चोटी का लेखक।
किताबों के साथ ही एक असाइनमैंट की एक लिस्ट भी थी कि ये ये होम-वर्क कर के हमें भेजते रहना । खैर, कुछ ही दिनों के बाद मैंने एक-दो असाइनमैंट भेज दीं और लगभग एक महीने के बाद जांची हुईं असाइनमैंट मेरे पास वापिस पहुंच गईं..............अब तो याद भी नहीं कि उस की ग्रेडिंग में उन्होंने क्या लिखा ,लेकिन जो भी था सब कुछ अच्छा अच्छा ही था..............लेकिन धीरे धीरे कुछ ही हफ्तों में मुझे यह समझ आते देर न लगी कि भैया, इस कोर्स वालों को अपने तीस हज़ार इक्ट्ठे करने तक ही मतलब था जो उन्होंने साध लिया है। अब तुम इन किताबों का आचार डालो..............क्योंकि बिना किसी तरह के पर्सनल इंटरएक्शन के कहां ये गूढ़-ज्ञान की बातें समझ में आती हैं। वैसे तो इंगलिश मेरी बचपन से ही ठीक-ठाक रही है( थैंक यू.....मास्टर शूर साहिब......जो आजकल डीएवी स्कूल अमृतसर के प्रिंसीपल हैं.....) ...लेकिन फिर भी इस के लेखन में हिंदी –पंजाबी जैसा धारा-प्रवाह कभी बना नहीं.....भला बनेगा भी कैसे, जो भी है...चाहे इंटरनैशनल भाषा है...है तो विदेशी ही ना.....तो इस इंगलिश में कुछ भी लिखने से पहले सोचो, फिर तोलो, उस के बाद बोलो या लिखो। यह वाली बात अपनी मातृ-भाषा या राष्ट्रीय भाषा के साथ कतई नहीं है.......इस में लिखना तो अपनी मां के साथ या किसी देशवासी के साथ बात करने जैसा आसान है।
मैं भी बात बहुत ज़्यादा खींचने लग गया हूं.........ब्रीफ में बताता हूं कि बिना किसी तरह की गाइडैंस के मेरे उस कोर्स में कभी इंट्रैस्ट बन ही नहीं पाया.................बस,किताबें ही धरी की धरी रह गईं। ना मैंने उन को कभी फिर कोई असाइनमैंट भेजी और न ही उन्होंने कभी पूछा कि हे उभरते लेखक, क्या कर रहा है तू आजकल...........क्या कुछ लिख रहा है.........किताबें पढ़ रहा है कि नहीं..................सीधी सी बात की उन का सरोकार तीस हज़ार रूपये पाने तक ही सीमित था। खैर, इस टापिक को तो मैं खत्म ही समझ बैठा।
कुछ दिनों बाद ही अपने ही देश की एक अच्छी खासी यूनिवर्सिटी का एक विज्ञापन दिखा जिस में हिंदी में सृजनात्मक लेखन करने-करवाने की बात कही गई थी। अभी उस पहले काटे कीड़े की खुजली शांत भी न हुई थी कि इस हिंदी लेखन सीखने वाले देशी कोर्स के ततैये ने डंग मार दिया.............सो, बड़े चाव से कर दिया कोर्स शुरू ....शायद 1700या 1800रूपये फीस थी।
इस कोर्स के लिये रिक्वायरमैंट तो थी केवल बारहवीं कक्षा में पास होन की। लेकिन जब किताबें आईं तो उन्हें देख कर सिर दुखता............नहीं,नहीं, कोई भारी-भरकम नहीं थीं..........बस, उन में विभिन्न पाठ बड़े बड़े लेखकों ने इतनी मुश्किल भाषा में लिखे हुये थे कि या तो उन की बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी और अगर एक-दो पैरे पढ़ने की हिम्मत जुटा भी पा लेता था तो आगे पढ़ना सिर-दर्द जैसा लगता था। इसलिये सारी उम्मीदे इस कोर्स के पर्सनल कंटैक्ट प्रोग्राम पर ही टिकी हुईं थीं....कि जब वहां जाऊंगा तो इन को पढ़ने का , समझने का टीका लगवा कर के ही आऊंगा......खैर, मैं सारी रात गाड़ी में खराब ( अब खराब ही कहूंगा.....कारण अभी बतलाता हूं...)....करने के पश्चात् सुबह पंजाब गया चंडीगढ़............लेकिन जहां पर स्टडी सैंटर बना था..वहां पर कोई हरकत ही नज़र नहीं आई। काफी समय के बाद एक सुस्त सी मैडम ( हां, विद्यार्थीयों से भी ज़्यादा सुस्त )....ने बड़े ही नीरस ढंग से कोर्स के बारे में बताया। वह रविवार का दिन था...और यह पर्सनल कोंटैक्ट कार्यक्रम आने वाले तीन-चार रविवारों को चलना था। लेकिन उस मैडम ने इतनी नीरसता से बात की कि वह नीरसता तो किताबों के रूखेपन को भी मात दे गई)....लेकिन वो मैडम चाहे जितनी भी जल्दी में थी ( उस महान आत्मा ने हमें आधे घंटे में ही फारिग भी कर दिया...........जै हो!!!!!)…..उस ने इतना बतलाने में कोई जल्दबाजी नहीं की कि इस पर्सनल कंटैक्ट प्रोग्राम में आप का आना अनिवार्य नहीं है.....सो ,उस प्रोफैसरनी की इस बात में कुछ इतना ज़्यादा जादू था कि मन ही मन जो अगले रविवार ना आने का विचार बन रहा था , वह फिरोज़पुर वापिस आते आते एक दम बरगद के पेड़ की जड़ों की तरह मज़बूत हो गया। और हम अकसर कहते हैं कि टीचर का क्या है, हम तो किताबों से, नेट से कुछ भी सीख सकते हैं...........ऐसा नहीं है दोस्तो....मेरे विचार में तो उस टीचर को अपनी टीचरी करने का कोई हक ही नहीं है जो छात्रों के मन में अपने विषय के प्रति रोमांच (रोमांच कहूं या रूचि कहूं !).. ही न पैदा कर सके। बस, आज उस प्रोफैसरनी का धन्यवाद ही करता हूं कि दोबारा उस कोर्स की कभी किताबें खोल कर देखने की इच्छा ही नहीं हुई। और हां, आज कल जब उस यूनिवर्सिटी का इश्तिहार देखता हूं तो पाता हूं कि उन की लिस्ट से वह वाला हिंदी लेखन सिखाने वाला कोर्स ही हटा दिया गया है।
लेखक बनने की बाकी यात्रा अगले किसी लेख में लिखूंगा..बात लंबी होती लग रही है। वैसे जाते जाते मेरे अपने का वह गीत अचानक याद आ गया जो यू-टयूब पर नहीं मिला , लेकिन उस के लीरिक्स कहीं दिख गये हैं जिन्हें यहां पर चेप रहा हूं........

मंगलवार, 18 मार्च 2008
यह जो पब्लिक है ...सब जानती है ...
किसी कारण वश स्कैन कर नहीं पाया, नहीं तो आप को ओरिजनल खबर ही पढ़ा देता। फिर भी इस ऊपर दिये लिंक पर क्लिक कर के आप भी थोड़ा इस के बारे में ज़रूर पढ़े।
और पता है यह खुलासा कैसे संभव हो पाया.....सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत किसी ने अरजी लगाई थी। मन ही मन मैंने भी इस गजब के अधिकार को एक जबरदस्त सलाम ठोक दिया..........आप किस बात की इंतज़ार कर रहे हैं !
अगर यही विकास है तो.........
अभी सुबह के चार बजे हैं ...और मैं आधे घंटे तक मच्छरों से परेशान होकर.....परेशान क्या, हार कर उठ के बैठ गया हूं। हां, हां, पता है वो पचास रूपये वाली मशीन लगा लेनी थी.....लेकिन गर्मी भी तो अभी दो-तीन दिन से ही थोड़ी महसूस होने लगी है। आज पहली बार एक नंबर पर पंखा चला।
मैं एकदम निठल्ला बैठा हुया इस समय विकास की परिभाषा ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं..........मुझे नहीं याद कि बचपन में हम लोग कभी इन मच्छरों की वजह से उठे हों। अब इस तरह के घर में रहता हूं जिस में एक भी मक्खी नहीं है, ये कमबख्त मच्छर भी सुबह तो दिखते नहीं लेकिन शाम एवं रात के वक्त इन के द्वारा परेशान किया जाना बदस्तूर जारी है। घर के आसपास भी ...लगभग आधे किलोमीटर तक ...गंदगी कहीं भी नज़र नहीं आती।
हम लोग इतने दशकों से सुनते आ रहे हैं ना कि मच्छरों को रोकथाम के लिये फलां-फलां कदम हमें उठाने चाहियें ....और हर बंदा अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिशा में कुछ न कुछ कर के खुश होता भी रहता है। लेकिन फिर भी इन बीमारियों की खान.....मच्छरों को हम लोग मिलजुल कर कंट्रोल नहीं कर पाये.......और बातें हम लोग इतनी बड़ी बड़ी हांकेंगे कि जैसे पता नहीं .............यकीन नहीं हो तो ट्रेन के सामान्य डिब्बे में हो रही गर्मागर्म डिस्कशन में थोड़ा सम्मिलित हो कर देख लीजियेगा। किसी कंपार्टमैंट में तो एक ग्रुप के माडरेटर को यही चिंता सताये जा रही है कि पाकिस्तान का क्या बनेगा....तो दूसरा, यह सोच कर दुःखी है कि इस बार उस का मनपसंदीदा चैनल सब से तेज़ चैनल न बन पाया.........!!
और हां, पहले इन दिनों में ही आंगन में तो नहीं ,लेकिन बरामदे में सोने की तैयारियां शुरू हो जाया करती थीं। और अब बच्चों को तारों से भरे अंबर के तले सोना भी किसी परी-कथा जैसा लगता है...............कोई सो कर तो देखे...या तो मच्छर ही अगवा कर के ले जायेंगे ....और अगर कहीं अगवा होने से बच गया तो सुबह इन के द्वारा काटे हुये के निशान देख देख कर तुरंत मच्छर-मार या मच्छर भगाऊ मशीन को लेने दौड़ पड़ता है।
जो भी हो......जैसा कि सब जगह ही कहते हैं कि इन बदले हुये हालातों के लिये हम सब ज़िम्मेदार हैं.................मुझे सब से ज़्यादा दुःख इसी बात का है कि हम सारा दिन गंदगी को रोना रोते रहते हैं ...............साफ ढंग से नहीं हो पा रही है, सफाई वाले अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर रहे हैं.........लेकिन बात सोचने की तो यह भी है कि हम आखिर क्या कर रहे हैं !!---मुझे पूरा विश्वास है कि अगर हर घर के द्वार पर भी एक सफाईवाला खड़ा कर दिया जाये...तो भी हमारी हालत में सुधार नहीं हो सकता।
और इस तरह की गंदगी जो हमें जगह जगह दिखने लगी है उस का सब से अहम् कारण जो मुझे लगता है कि हमारा लाइफ-स्टाइल कुछ इस तरह का हो गया है कि हम बहुत ज़्यादा कूड़ा-कर्कट जनरेट करने लग गये हैं.............आप को भी याद होगा कि जब हम लोग बच्चे थे तो सारे घर की सफाई होने के बाद जो धूल-मिट्टी इक्ट्ठी हुया करती थी, उसे काम-वाली एक कागज़ पर डाल कर बाहर दरवाजे के बाहर फैंक आती थी और उन दिनों भी इस तरह के बिहेवियर पर बड़ी आपत्ति उठाई जाती थी कि यार, यह भी कोई बार हुई कि गंदगी को मुंह से उतार कर नाक पर लगा लिया.......घर की सफाई कर के सारी गंदगी बाहर डाल दी , यह भी कोई बात हुई !
लेकिन अब तो हम अपने आप को विकसित कह कर खुश होने वाले लोग...कुछ ज्यादा ही उच्चश्रृंखल से हो गये हैं। एक घर का कूड़ा-कर्कट देख कर डर लगता है................किसी के घर का ही क्यों ....मुझे तो अपने घर का ही दैनिक कूडा देख कर हैरानगी होती है कि यार, हम लोग एक दिन में इतना खा जाते हैं....दो-तीन थैलियां रोज़ाना कूड़ा। खैर, हमारे यहां तो नहीं , लेकिन आम तौर पर इस कूड़े में बच्चों के चिप्सों के पैकेट , उन की मनपसंद चीज़ों के पैकेट इत्यादि भी बहुत मात्रा में मिलते हैं....और दुःख की बात तो यही है कि ये उत्पाद हमारे बच्चों की सेहत बिगाड़ने के बाद भी हमारे पर्यावरण को भी विध्वंस करने में नहीं चूकते क्योंकि ये टोटली नान-बायो-डिग्रेडेबल होते हैं।
वैसे जिस तरह से मैं अपनी चारों तरफ़ रोज़ाना बड़े बड़े नाले इन प्लास्टिक की थैलियों की वजह से चोक हुये देखता हूं ना ...इस से मुझे तो लगता है कि आज की ताऱीख में ये थैलियां हमारी बहुत बड़ी शत्रु हैं.........कईं जगह इन पर बैन लगा है लेकिन फिर मैं और आप जब भी इसे मांगते हैं , हमें तुरंत एक थमा ही दी जाती है................यार, दही, दूध, दाल, सब्जी तक इन घटिया किस्म की थैलियों में मिलने लगी है। इन सस्ती थैलियों में लाई गई खाने पीने की वस्तुयें खा कर हम बीमारियों को तो खुला आमंत्रण दे ही रहे हैं ,उस के बाद ये हमारे नालीयां एवं नाले रोक कर सारे शहर में गंदगी फैलाती हैं। और कईं बार तो हमारे पशु-धन ( गऊ-माताओं वगैरह..) के पेट से इन के बंडल निकाले जा चुके हैं ..............हम सब के लिये कितनी शर्म की बात है कि हमें केवल एक कपड़े का थैला उठाने में इतनी झिझक हो रही है और पर्यावरण का जो मलिया-मेट हो रहा है , उसे हम देख नहीं पा रहे हैं या देख कर भी न देखने का ढोंग कर रहे हैं । और हर काम में सरकारी पहल की आस लगाये रहते हैं कि यार, काश हमारे शहर में भी इन चालू किस्म की पालिथिन की थैलियों पर बैन लग जाये........इस बैन में क्या है, आप आज से कपड़े का थैला उठा लीजिये , कसम खा लीजिये कि इन थैलियों को नहीं छूना..............तो बस हो गया बैन....................इस के लिये किसी कानून की ज़रूरत थोड़े ही है। लेकिन कुछ भी हो, अब तो यह सब करना ही होगा .....ऩहीं तो ये मच्छर हमें परेशान करते रहेंगे, गंदगी के अंबार हमारे आस-पास लगते रहेंगे.......और जैसा कि वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइज़ेशन कह रही है कि आज कल नईं नईं बीमारियों दिखने लगी हैं..................वे तो दिखेंगी ही क्योंकि हम लोगों ने निराले निराले शौक पाल रखे हैं ।
लेकिन जो भी हो, इन पालीथिन की थैलियों को बाय-बाय कह ही दिया जाये..............इसी में ही हम सब की बेहतरी है....बेहतरी को मारो गोली............अब तो वह स्टेज रही ही नहीं, अब तो भई इन को बहिष्कार करने के इलावा कोई चारा ही नहीं बचा। और अगर अभी भी मन को समझा न पायें हों तो जब कोई सफाई-कर्मचारी बिना दस्ताने डाले हुये किसी रुके हुये मेन-होल की सफाई कर रहा हो तो थोड़ा उस के पास खड़े होकर अगर हम उस में निकलते हुये तरह तरह के आधुनिकता के , विकास के प्रतीकों को ...और उस के द्वारा लगातार बाहर निकाल कर रखे जा रहे इन्हीं थैलियों के ढेर को देखेंगे तो सारा माजरा समझ में आ जायेगा। लेकिन कितने दिन यह सब ठीक रहेगा..............बस, चंद दिनों के लिये ही ।
चलिये......थोडा सोचें कि आखिर हम ने इस विकास से क्या पाया.......ठीक है फोन पर ढेर बतियाने लगे हैं, घर में ही रेल टिकट निकालने लगे हैं, हवाई जहाज में उड़ने के बारे में घर बैठे ही जानने लगे हैं , चंद मिनट पहले दूर- देश में क्या हुया है जानने लगे हैं, स्टिंग आप्रेशन भी करने लगे हैं..............लेकिन इस मच्छर का भी तो कुछ करो ना यारो। बहुत परेशानी होती है.....चिल्लाने की इच्छा होती है।
वही बात है ना कि जैसे जावेद अख्तर साहब लिखते हैं कि पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके, .......तुमने और मैंने क्या पाया इंसा होके !!................कितना उम्दा एक्सप्रेशन है...............वाह भई वाह!!..........लेकिन हम भी तो हम ही ठहरे, अपनी तरह के एक अदद अलग ही पीस, हम ये सब बातें सुन कर भी कहां सुधरने वाले हैं।.....मैं कोई झूठ बोल्या ?...........
अगर यही विकास है तो.........
8 comments:
- Gyandutt Pandey said...
- पॉलीथीन तो बहुत बड़ा अभिशाप है। एक बड़ी खोज वह होगी जिसमें पॉलीथीन को बायोडिग्रेडेबल बनाया जा सकेगा। वह अनुसन्धान कर्ता या तो कुनैन/पेनिसिलीन के आविष्कारक की तरह मानवता का सेवक होगा, या बिल गेट्स की तरह सबसे धनी।
उस आविष्कारक की इन्तजार में है यह दुनियां। - March 18, 2008 6:45 AM
- दिनेशराय द्विवेदी said...
- गंदगी लोगों को ग्राह्य होती जा रही है।
- March 18, 2008 6:57 AM
- डॉ. अजीत कुमार said...
- पता नहीं ब्लोग पढने वाले कितने लोग इस बात की चिंता करते होंगे? या कितने आदमी इस पर अमल करते होंगे...
- March 18, 2008 7:20 AM
- mamta said...
- गंदगी और पॉलीथीन की समस्या जटिल ही होती जा रही है।
गोवा मे सब्जी या फल वाले पॉलीथीन नही देते है क्यूंकि यहां पॉलीथीन मे सामान देने पर दुकानदार को जुर्माना देना पड़ता है।
हालांकि अभी ये पूरी तरह सफल नही है । - March 18, 2008 12:41 PM
- परमजीत बाली said...
- बहुत गंभीर मसला है...लेकिन अभी बचाव का कोई रास्ता नजर नही आता।
" मैं कोई झूठ बोल्या?"
कोई ना। - March 18, 2008 12:47 PM
- Mired Mirage said...
- मैं तो बार बार पॉलीथीन की थेली लेने से मना करती हूँ । सब्जी आदि खरीदने जाती हूँ तो अपनी अलग अलग थैलियों में सब्जी डलवाती हूँ । सब्जी वाले व वालियाँ अवश्य मुझे किसी प्रकार का सनकी मानते हैं । एक रूपये में बिकते शैम्पू, पान मसाले आदि के पाऊच भी बहुत बड़ी समस्या हैं । परन्तु यदि इनके विरुद्ध बोलेंगे तो गरीब विरोधी कहलाएँगे ।
घुघूती बासूती - March 18, 2008 2:07 PM
- Padma Srivastava said...
- डॉक्टर साहब, देश में गंदगी और पॉलीथीन की समस्या बढ़ती जा रही है।
- March 18, 2008 4:04 PM
- नीरज गोस्वामी said...
- आप सच कह रहे हैं, बचपन में हम लोग घर की लान में चारपाई की एक श्रृंखला बना कर गर्मियों में सोया करते थे और मच्छर का नमो निशान नहीं हुआ करता था अब तो लान क्या छत पर सोये कई दशक हो गए...हम ही अपने इस हाल के लिए जिम्मेदार हैं.
नीरज - March 18, 2008 6:16 PM
सोमवार, 17 मार्च 2008
वो ट्रंक-काल वाले दिन..........मत याद दिलाओ !!
वो ट्रंक-कॉल करने वाले दिन भी क्या दिन थे....चलिए अपनी यादों को ज़्यादा तो नहीं....बस बीस-पच्चीस साल पहले तक ही रीवाइंड कीजिये.....। सबसे पहले चार-पांच किलोमीटर का सफर साईकिल पर तय कर के ज़िले के बड़े डाकखाने पर पहुंचना होता था।
तार-बाबू के काउंटर पर पहुंच कर पहले उस का मूड देखा जाता था। क्योंकि सब कुछ तो उस के हाथ में ही होता था....अगर उसे ग्राहक के आव-भाव कहीं पसंद नहीं आये और उस ने तपाक से कह दिया कि ......मैं कह रहा हूं ना कि जयपुर की लाइन मिलने का तो कोई सवाल ही नहीं है इस समय..........तो आप उस का क्या लेते ?.....इसलिये सब काम बड़ी तहजीब से चलता था।
बस, आप का थोड़ा सा इंटरव्यू डयूटी पर बैठा बाबू पहले लेता था कि हां, बोलो, कहां करोगे बात........शायद आधे लोगों की स्क्रीनिंग तो इसी स्टेज पर ही हो जाया करती थी कि यूं ही समय बरबाद करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि सुबह से ही बम्बई की लाइनें मिल ही नहीं रही हैं। और मुझे याद है कि कईं बार तो एक फोन करने के लिये दो-तीन दिन उस जीपोओ के चक्कर लगाने पड़ते थे।
सब से पहले बाबू एक फार्म आप को थमा देता था...जिसे भरने के लिये कोई कौना ढूंढना पड़ता था ....लेकिन अभी अभी याद आ रहा है कि कभी कभी वह सिर्फ आप से पूछ लेता था कि आप ने कहां फोन करना है......और वह झट से अपने रजिस्टर में आपका बताया हुया नंबर लिख लेता था......और साथ में यह भी ज़रूर पूछ लिया करता था कि अर्जैंट करना है या आर्डिनरी................क्योंकि इन के चार्जेज़ में भी फर्क हुया करता था। इतनी फार्मैलिटि के बाद फिर वह आप से बीस या पचास रुपये ( दूरी के हिसाब से) ...लेकर अडवांस के रूप में जमा कर लिया करता था।
अब होती थी ....ग्राहकों की तपस्या शुरू......इंतजार की घड़ियां खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं। वह बाबू दन-दना-दन एक के बाद नंबर घुमाता जाता और कुछ कुछ अपने लोकल बस-अड्डे के बाथ-रूम के ठेकेदार वाले अंदाज़ में ग्राहकों को आवाज़ लगा दिया करता कि ....कौन है ग्वालियर वाला , कौन है नासिक वाला.............उस की आवाज़ आने का मतलब होता था कि भई...तेरा फोन लग गया है या घंटी बज रही है ...चल, भाग कर उस कैबिन में जल्दी से घुस जा जहां पर एक पुराने ज़माने का एक काला टैलीफोन सैट पड़ा होता था। और , फोन पर बतियाने वाले मेरे जैसे नये नये खिलाड़ी जो इतनी तेज़ी से बोलते थे कि शायद आस-पास के कस्बों तक आवाज़ वैसी ही पहुंच जाये। लेकिन अकसर सब की बातें खुली होती थीं.....सब को बाहर सुनती थी कि उस के परिवार में क्या क्या चल रहा है !! लेकिन तब हम लोग प्राइवेसी के इतने दीवाने भी नहीं हुया करते थे।
लेकिन यह क्या, यह वाले लाला जी तो आधे मिनट में ही फोन वाले कैबिन से बाहर आ गये और कह रहे हैं कि दूसरी तरफ से आवाज़ ही क्लियर नहीं सुन रही थी। खैर, किसे मंजे हुये अंपायर की तरह उस बाबू का फैसला अकसर फाइनल ही हुया करता था..........कि इस तरह की काल्स को चार्ज करना है या नहीं ....अकसर चार्ज कर ही लिया जाता था।
और यह बहस भी कभी कभी गर्मागर्म दिख जाती थी कि यार, बात तो इतनी छोटी की है और आप कह रहे हो कि तीस रूपये का बिल आ गया है । लेकिन वही बात कि बाबू के आगे सब की बोलती बंद हो जाया करती थी....जितनी मरजी कोई सब तरह के पलस जानने की शेखी बघारता, लेकिन बाबू के आगे उस की एक न चलती । क्योंकि बाबू ने अपने उस पुरानी सी मेज पर एक स्टाप-वाच भी रखी होती थी जिसे वह फोन लगते ही चालू कर दिया करता था...और दिन और रात के चार्जेज़ का भी अंतर हुया करता था। अब लगता है कि यार, हम लोगों में कुछ ज़्यादा ही पेसेंस थी.....एक फोन करने के लिये इतनी माथा-पच्ची.........इन की यादों की बारात में ही मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा हूं। लेकिन वे दिन भी बस कुछ अलग ही थे......।
जिन का फोन झट से लग जाया करता था और जो लोग अकसर वहां पर फोन करने आया करते थे , वे भी कहां बड़ी बड़ी छोड़ने से बाज आते थे.....सब अपना अपना ज्ञान फैंकने पर तुले होते थे......तू देख, अगर तेरे को दिल्ली करना है ना फोन तो शाम को छः बजे आया कर, देख पहली ट्राई में ही मिलता है। उस कमरे में पूरी जमघट लगा हुया करता था......क्योंकि औसतन जितने बंदे फोन करने वाले उतने ही उस को एस्कार्ट करने वाले हुया करते थे। वाह, क्या नज़ारा हुया करता था। लेकिन , यह क्या.....यह महिलाओं के साथ भेदभाव तब भी होता था...............बस जनानीयां ते टावीयां-टुक्कीयां हुंदीयां सन...( महिलाओं तो बस कभी कभार ही दिखती थीं...) ...
इतना सब कुछ लिखने का ध्यान इसलिये आया कि आज शाम को अपने एक फ्रैंड को अमृतसर मोबाइल पर दो बार फोन ट्राई किया....लेकिन काल नहीं लगी.....चूंकि वह दोस्त अमृतसर के बड़े डाकखाने के पास ही रहता था तो झट से पुराने ज़माने की सारी बातें एक फ्लैश-बैक की तरह याद आ गईं जिन्हें आप के साथ साझा कर लिया ।
बैठ के त्रिंजनां च सोहनीये.......( जब तुम दूसरी लड़कियों के साथ बैठ कर...)
मुझे तो यह पंजाबी गीत बेहद पसंद है ...आप भी सुनिये।
मरने से पहले जीना ना छोड़ो, यारो !!
पता है जब कोई किसी अनपढ़ को या बहुत ही बुजुर्ग को फार्म भरने के लिये मना भी नहीं करता और फार्म भरता भी नहीं ....तो उस खाली फार्म हाथ में पकड़े हुये इंसान को कितनी पीढ़ा होती है। अगर पता नहीं है तो अगली बार जब बैंक में जायें( नहीं, नहीं, विदेशी बैंक में नहीं...अपने ही किसी राष्ट्रीयकृत्त बैंक में !) ...तो कुछ ऐसे ही चेहरे ढूंढ कर पढ़ने की कोशिश कर लीजियेगा। यह बात अच्छी तरह से समझ में आ जायेगी। और हां, किसी को फार्म भर दें तो वह बंदा इतनी ज़्यादा दुयाओं की बौछार कर देता है कि मेरे जैसे बंदे को अपने ऊपर शर्म आने लगती है...कि यार, ऐसा कौन सा तीर मार दिया है हमने।
अच्छा तो मैं बात कर रहा था कि कुछ बुजुर्ग लोग किसी बैंक में जाकर अपने साथियों की थोड़ी मदद करने को अपना टाइम-पास बना लेते हैं........वैसे कितना सुपर-हिट आइडिया है। सारा दिन वही घिसे-पिटे चैनल देख कर क्या मिलना है........क्या कुछ बदल जायेगा.....तो फिर अगर लिमिट में यह सब देखा जाये तो ही ठीक है ना। अकसर देखता हूं कि रिटायर्ड लोग अनुभव का खजाना होते हैं तो फिर यह कहीं दो-तीन घंटे जा कर किसी कम खुशनसीब की मदद करने में कैसी झिझक..........किसी बैंक में जाया जा सकता है या किसी डाकखाने के बाहर बैठ कर लोगों की मदद की जा सकती है ...किसी कोर्ट कचहरी के बाहर बैठ कर लोगों को रास्ता दिखाया जा सकता है, किसी मरीज से जा कर बात की जा सकती है, कईं लोगों की ड्राफ्टिंग बहुत बढ़िया होती है , वे लोगों की चिट्ठी -पत्री में उन की मदद कर सकते हैं.....बहुत से लोग अपने अपने फन में खिलाड़ी होते हैं और रिटायर्ड होते ही बस अपनी खाट पर बेबसी, आलस की रजाई ओढ़ कर उस इडियट बॉक्स ( हां, वही टीवी और क्या ) ....के सामने डटे रह कर बस अपनी बीपी की अगली खुराक के समय का हिसाब लगाते रहते हैं या तो फिर अपने ब्याज का टोटल मार-मार कर परेशान होते रहते हैं कि यार, यह भी तो अनर्थ ही है ना कि पहले तो मिलते थे 750 रूपये महीने में लेकिन अब उसी पैसे पर 480रूपये मिलते हैं।
लेकिन अगर यही अनुभवी लोग अपने अपने महारत वाले फील्ड में किसी की उंगली थामना शुरू कर दें तो दुनिया की तसवीर ही बदल जायेगी.........दुनिया की तो छोड़ों....इन की लाइफ की तस्वीर ज़रूर बदल जायेगी...शायद धीरे धीरे इन की दवाईयां ही कम हो जायेंगी..........वैसे भी अगर ये सारा दिन बैठे बैठे अपने साथियों की दुआयें ही खातें रहेंगे तो दवाई खाने की इन्हें कहां फिक्र रहेगी।
ऐसे में मुझे अवतार फिल्म का वह गीत ध्यान में आ रहा है .......जिस में बुजुर्ग राजेश खन्ना अपने बुजुर्ग साथियों से कहता है कि यारो, उठो, चलो, भागो, दौड़ो..........मरने से पहले जीना ना छोड़ो, यारो। यू-टयूब पर इस गाने को ढूंढते ढूंढते मनोबल बढ़ाने के लिये इसी फिल्म की एक क्लिपिंग मिल गई .......सो, साथ ही चटका रहा हूं।
रविवार, 16 मार्च 2008
यह हाई-ब्लड-प्रैशर का हौआ क्यों बना हुया है!
अकसर यह भी सोचता हूं कि हमारे शरीर में करोड़ों-अरबों सूक्ष्म रासायनिक प्रक्रियायें हर पल चल रही हैं..........और इन्हीं प्रक्रियाओं के फल-स्वरूप ही हमारे शरीर का इंटरनल-मिल्यू ( internal milieu) तय होता है.......जैसा भी हो......उदाहरण के तौर पर देखें तो अब किसी को ब्लड-प्रैशर है और किसी का बी.पी बिल्कुल परफैक्ट है। इसलिये मैं यह सोचने पर बहुत मज़बूर होता हूं कि रोज़ की एक टेबलेट या कुछ टेबलेट कैसे किसी का ब्लड-प्रैशर कंट्रोल कर सकती है। लेकिन हां, यह भी ठीक होगा की ब्लड-प्रैशर कंट्रोल तो हो जाता होगा लेकिन इस का क्यूर( इलाज) तो नहीं न हो पाता। मेरा व्यक्तिगत विचार तो यह भी है कि एक अंग्रेज़ी दवाई की गोली से हमारे शरीर रूपी इस बेहद अद्भुत संरंचना को कंट्रोल करना इस दैविक संरचना से पंगा लेने से क्या कम है..............?...इस के बारे में बहुत सोचता हूं !!!
इसीलिये सोचता हूं कि शायद इसीलिये इतने लोग दिखते हैं जो रोज़ाना टेबलेट्स लेते हैं लेकिन फिर भी कंपलेन करते हैं कि उन का ब्लड-प्रैशर कंट्रोल में नहीं है। सोचता हूं कि इस तरह की तकलीफ़ों के लिये और इन के स्थायी इलाज के लिये कभी भी मेरा इस टेबलेट कल्चर में विश्वास रहा ही नहीं।
यह तो हुई अंग्रेज़ी दवाईयों वाली बात................आयुर्वैदिक दवाईयों का या होम्योपैथिक दवाईयों का मुझे कोई खास ज्ञान है नहीं ......और ये ब्लड-प्रैशर को कंट्रोल करने के लिये भी जिन अंग्रेज़ी दवाईयों की बात मैंने की है...ये शत-प्रतिशत मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जो कि आज मैं अपनी खुद की डायरी पर ही लिख रहा हूं। मैं यह भी तो नहीं चाहता कि मेरी यह बात पढ़ कर ब्लड-प्रैशर के मरीज़ अपनी अंग्रेज़ी दवाईयां फैंक दें और फिर जब इस के परिणाम-स्वरूप कुछ और ही जटिलतायें पैदा हो जायें तो बीच-बाज़ार मेरा गिरेबान पकड़ कर मुझ से जवाब मांगें कि लिखता तो बहुत कुछ है, अब बोल.....अब जवाब दे हमें कि अंग्रेज़ी दवाईयां लेते रहें कि नहीं !!
जो भी हो मेरी जो भी बेबाक राय थी, मैंने आज डायरी में लिख दी है। इस में तो कोई शक है ही नहीं कि एमरजैंसी को टैकल करने के लिये एलोपैथिक दवाईयों का कोई जवाब नहीं है.........ऐसा मैं समझता हूं............जब कोई हार्ट-अटैक का मरीज़ आता है , जब किसी का ब्लड-प्रैशर बहुत ही ज़्यादा बढ़ जाता है तो किस तरह से अकसर एलोपैथिक दवाईयां उसे तुरंत ही लाइन पर ले आती हैं।
मेरी बात लगता है कि थोड़ी कंफ्यूज़िंग सी लग रही है....सो, सीधी सीधी बात करता हूं कि मैं किसी भी ब्लड-प्रैशर के मरीज़ को अपनी कोई भी दवाई बंद करने की सलाह कतई नहीं दे रहा हूं....लेकिन मैं इतना ज़रूर कह रहा हूं कि उन्हें अपनी जीवन-शैली में भी उचित परिवर्तन करने होंगे..................अपना वज़न कम करना होगा, नमक का इस्तेमाल कम करना होगा, रोज़ाना सैर और शारीरिक व्यायाम/ योग-प्राणायाम् करना होगा, खाने-पीने में एहतियात बरतनी होगी, और सब से ज़रूरी ....बेहद ज़रूरी है ..........कि रोज़ाना मैडीटेशन करनी ही होगी।
इन लाइफ-स्टाईल से संबंधित बीमारियों को दूर रखने के लिये मैडीटेशन का बहुत बड़ा रोल है.....और ध्यान रहे कि इस पुरातन विद्या को गुरू-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही किसी गुरू से ही ग्रहण किया जा सकता है। यह निहायत ही ज़रूरी है..................जैसे हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिये स्नान ज़रूरी है , उसी तरह से हमारे मन को साफ-स्वच्छ रखने के लिये भी मैडीटेशन बहुत---बहुत ----बहुत .....बहुत ही लाज़मी है। यह मेरा पिछले 14वर्ष का व्यक्तिगत अनुभव है .....और आज कल तो विश्व के चोटी के वैज्ञानिक इस की हामी भर रहे हैं। मेरे विचार में हमारी लाइफ़ में प्रतिदिन नियमित तौर पर मैडीटेशन करना ही सब से महत्वपूर्ण बात है।
और हां, मैं कह रहा था कि ब्लड-प्रैशर वाले मरीज़ अपनी दवाई तो न छोड़ें, लेकिन ऊपर बताये गये सब प्रकार के जीवन-शैली में बदलाव ज़रूर कर लें.....किसी तरह के तंबाकू, शराब या किसी भी नशे को पास न फटकने दें और एक बात और भी बहुत ज़रूरी है कि अपने ब्लड-प्रैशर को नियमित चैक भी करवाते रहें ......तो यकीन मानिये.....आप का इलाज कर रहे चिकित्सक धीरे धीरे आप की ब्लड-प्रैशर की दवाईयां कम करने या तो धीरे धीरे बंद करने पर ही बाध्य हो जायेंगे।
प्राब्लम तो बस यही है कि हम तो टस से मस होना नहीं चाहते....किसी तरह का बदलाव अपने जीवन में हमें गवारा है ही नहीं..............हम तो अपने कंफर्ट-ज़ोन के साथ इस तरह चिपके हुये हैं कि बस............लेकिन हां, ब्लड-प्रैशर कंट्रोल वाली गोली टाइम पर ज़रूर खा लेते हैं...............लेकिन अकेली यह एक अदद बेचारी गोली क्या कर लेगी ?
आयुर्वैदिक दवाईयों को मैं बहुत बढ़िया मानता हूं...........और उन से बढ़िया बाबा रामदेव जी की बातों को..............यह बाबा जी भी एक करिश्मा ही हैं.............करोड़ों लोगों को वे अपने जीवन से प्यार करना सिखा रहे हैं। मुझे स्वयं उन को सुनना बहुत भाता है। वैसे चिकित्सा क्षेत्र में अगर किसी को उस की महान उपलब्धियों के लिये नोबेल-पुरस्कार देना हो तो मेरे ज़हन में बाबा रामदेव का नाम सर्वोपरि आता है......सिम्पली ग्रेट !! लेकिन ये असली बाबा लोग कहां इन दुनियावी तगमों के पीछे भागते हैं !
पता नहीं बात अकसर लंबी हो जाती है...............लेकिन सब से महत्वपूर्ण बात वही है कि ज़्यादातर केसों में यह ब्लड-प्रैशर का हौवा हमारा खुद का ही तो पैदा किया होता है......हम ज़रा से सजग हो जायें....अपनी जीवन-शैली को थोड़ा टटोलने लगें तो इसे( हाई बीपी) भागने का रास्ता नहीं मिलता। लेकिन सब से अहम् बात हमें हमेशा याद रखनी होगी...............मैडीटेशन...मैडीटेशन ...मैडीटेशन.............जब तक हमारे मन पर विभिन्न प्रकार की कुंठाओं के परिणाम स्वरूप हर पल जम रही मैल की सफाई भी प्रतिदिन नहीं होगी तो कैसे हो पायेगा हमारा मन एकदम क्लियर....................मुझे अपने गुरू जी की बात इस समय याद आ रही है...................As a matter of fact all religions started with meditation….but somehow they all ended in giving prescriptions for actions !......कितनी सही बात है !
एक बात और भी है ना कि पुरानी बातों के बोझ को हम लोग जो हमेशा अपने दिल पर लादे रखते हैं ना ....यह भी हमें ढंग से जीने नहीं देता। इसलिये आज की बात आज ही भूल जानी चाहिये..............कल का नया दिन नईं उमंगे, नये सपने , ऩई अवसर ले कर आ रहा है..............तो चलिए बांहे पसार कर उस के स्वागत की तैयारी करें...............वैसे , इस गाने में अमिताभ बच्चन भी कुछ ऐसा ही संदेश दे रहे हैं .........सुनिये और कर डालिये अपने कुछ गम गलत ….अभी...इसी वक्त !!!!!

6 comments:
पत्नियां अक्सर सही ही होती हैं
एक डॉक्टर साहब को ब्लॉग पर देखकर अच्छा लगा।
हम तो आपके इसी फ़लसफ़े के मुरीद हैं । आपकी पालीथीन वाली पोस्ट ने सीधा असर किया था । कुछ दिन पहले मैं अपने रूममेट से बात कर रहा था कि यहाँ ह्यूस्टन में कितना कबाडा हर रोज पैदा होता है मेरे अपार्टमेंट में, हर चीज तो डिब्बाबंद है ।
खैर आप लिखते रहे, हम पढने और अमल में लाने का प्रयास करने के लिये तैयार हैं । एक बात का सुकून है कि हमारे घर पर सबकी अपनी रजाई/कंबल फ़िक्स है और सभी पर सफ़ेद सूती कवर चढे हुये हैं । अब याद आ रहा है कि सर्दी की शुरूआत में बडे सन्दूक से रजाई गद्दे निकालकर धूप लगाकर और कवर धो-सुखा कर प्रयोग में लाये जाते थे । ठीक यही उपक्रम सर्दी खत्म होने पर उनको सन्दूक में रखने से पहले किया जाता था ।