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सोमवार, 17 मार्च 2008

मरने से पहले जीना ना छोड़ो, यारो !!

किसी बैंक में गये हुये हैं और कितनी भी जल्दी में हों तो क्या किसी के कहने पर कि फार्म भर दें ,तो क्या कोई बंदा मना कर सकता है ?......बिल्कुल भी नहीं.........मैंने भी कभी मना नहीं किया। जब हम लोग फिरोज़पुर में थे तो हम देखा करते थे कि कुछ रिटायर्ड लोग बैंक के बाहर एक छोटी सी मेज लगा कर बुजुर्ग एवं अनपढ़ लोगों के फार्म भरा करता थे। मेरे मन में ऐसे लोगों के लिये बेइंतहा इज्जत है और जो ऐसे लोग बिना किसी भी तरह के स्वार्थ के जन-जनार्धन की सेवा में रमे हुये हैं ....मैं तो इन्हें इश्वर से भी ऊपर मानता हूं......अब मानता हूं तो मानता हूं, यह मेरे वश में नहीं है और किसी धार्मिक स्थल की बजाये ऐसे लोगों को बार-बार नमन करना चाहूंगा।

पता है जब कोई किसी अनपढ़ को या बहुत ही बुजुर्ग को फार्म भरने के लिये मना भी नहीं करता और फार्म भरता भी नहीं ....तो उस खाली फार्म हाथ में पकड़े हुये इंसान को कितनी पीढ़ा होती है। अगर पता नहीं है तो अगली बार जब बैंक में जायें( नहीं, नहीं, विदेशी बैंक में नहीं...अपने ही किसी राष्ट्रीयकृत्त बैंक में !) ...तो कुछ ऐसे ही चेहरे ढूंढ कर पढ़ने की कोशिश कर लीजियेगा। यह बात अच्छी तरह से समझ में आ जायेगी। और हां, किसी को फार्म भर दें तो वह बंदा इतनी ज़्यादा दुयाओं की बौछार कर देता है कि मेरे जैसे बंदे को अपने ऊपर शर्म आने लगती है...कि यार, ऐसा कौन सा तीर मार दिया है हमने।

अच्छा तो मैं बात कर रहा था कि कुछ बुजुर्ग लोग किसी बैंक में जाकर अपने साथियों की थोड़ी मदद करने को अपना टाइम-पास बना लेते हैं........वैसे कितना सुपर-हिट आइडिया है। सारा दिन वही घिसे-पिटे चैनल देख कर क्या मिलना है........क्या कुछ बदल जायेगा.....तो फिर अगर लिमिट में यह सब देखा जाये तो ही ठीक है ना। अकसर देखता हूं कि रिटायर्ड लोग अनुभव का खजाना होते हैं तो फिर यह कहीं दो-तीन घंटे जा कर किसी कम खुशनसीब की मदद करने में कैसी झिझक..........किसी बैंक में जाया जा सकता है या किसी डाकखाने के बाहर बैठ कर लोगों की मदद की जा सकती है ...किसी कोर्ट कचहरी के बाहर बैठ कर लोगों को रास्ता दिखाया जा सकता है, किसी मरीज से जा कर बात की जा सकती है, कईं लोगों की ड्राफ्टिंग बहुत बढ़िया होती है , वे लोगों की चिट्ठी -पत्री में उन की मदद कर सकते हैं.....बहुत से लोग अपने अपने फन में खिलाड़ी होते हैं और रिटायर्ड होते ही बस अपनी खाट पर बेबसी, आलस की रजाई ओढ़ कर उस इडियट बॉक्स ( हां, वही टीवी और क्या ) ....के सामने डटे रह कर बस अपनी बीपी की अगली खुराक के समय का हिसाब लगाते रहते हैं या तो फिर अपने ब्याज का टोटल मार-मार कर परेशान होते रहते हैं कि यार, यह भी तो अनर्थ ही है ना कि पहले तो मिलते थे 750 रूपये महीने में लेकिन अब उसी पैसे पर 480रूपये मिलते हैं।

लेकिन अगर यही अनुभवी लोग अपने अपने महारत वाले फील्ड में किसी की उंगली थामना शुरू कर दें तो दुनिया की तसवीर ही बदल जायेगी.........दुनिया की तो छोड़ों....इन की लाइफ की तस्वीर ज़रूर बदल जायेगी...शायद धीरे धीरे इन की दवाईयां ही कम हो जायेंगी..........वैसे भी अगर ये सारा दिन बैठे बैठे अपने साथियों की दुआयें ही खातें रहेंगे तो दवाई खाने की इन्हें कहां फिक्र रहेगी।

ऐसे में मुझे अवतार फिल्म का वह गीत ध्यान में आ रहा है .......जिस में बुजुर्ग राजेश खन्ना अपने बुजुर्ग साथियों से कहता है कि यारो, उठो, चलो, भागो, दौड़ो..........मरने से पहले जीना ना छोड़ो, यारो। यू-टयूब पर इस गाने को ढूंढते ढूंढते मनोबल बढ़ाने के लिये इसी फिल्म की एक क्लिपिंग मिल गई .......सो, साथ ही चटका रहा हूं।