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Tuesday, August 12, 2014

पहले ९० दिनों में विकसित हो जाता है बच्चों का आधा दिमाग

बच्चों का मस्तिष्क बहुत तेज़ी से विकसित होता है लेकिन इसके विकास का स्तर ऐसा है कि यह जन्म के बाद पहले ९० दिनों में व्यस्क स्तर के आधे स्तर तक विकसित हो जाता है, यह पता चला है एक बहुत ही महत्वपूर्ण रिसर्च के द्वारा।

वैज्ञानिकों को इस अध्ययन से मस्तिष्क से जुड़ी कुछ बीमारियों की जड़ तक भी पहुंचने में मदद मिलेगी।

मस्तिष्क के इतने तेज़ी से विकास का समाचार सुनने के बाद मेरा ध्यान दो-तीन मुद्दों की तरफ़ जा रहा है। 

स्तनपान...... दुनिया के सारे चिकित्सक माताओं को जन्म के तीन महीने तक केवल अपना स्तनपान करवाने की ही सलाह देते हैं। यह दूध न हो कर एक अमृत है.....जो बढ़ते हुए बच्चे के लिए एक आदर्श खुराक तो है , यह उस बच्चे को कईं तरह की बीमारियों से भी बचा कर रखता है। 

जब बच्चा पहले तीन माह तक मां के दूध पर ही निर्भर रहता है तो वह बाहर से दिये जाने वाले दूध-पानी की वजह से होने वाली विभिन्न तकलीफ़ों से बचा रहता है। यह तो आप जानते ही हैं कि पहले तीन महीने तक तो चिकित्सक बच्चे को केवल मां के दूध के अलावा कुछ भी नहीं----यहां तक कि पानी भी न देने की सलाह देते हैं। 

अब विचार करने वाली बात यह है कि जिस मां के दूध पर बच्चा पहले तीन महीने आश्रित है और जिस के दौरान पहले तीन महीनों में ही उस का मस्तिष्क आधा विकसित होने वाला है, उस मां की खुराक का भी हर तरह से ध्यान रखा जाना चाहिए....यह बहुत ही, बहुत ही ज़्यादा ज़रूरी बात है। 

चूमा-चाटी से परहेज..   और मुझे ध्यान आ रहा था कि पहले हम देखा करते थे कि बच्चे जब पैदा होते थे तो कुछ दिन तक अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार आदि उस के ज़्यादा खुले दर्शन नहीं कर पाते थे.....हां, झलक वलक तो देख लेते थे, लेकिन यह चूमने-चाटने पर लगभग एक प्रतिबंध सा ही था......कोई कुछ नहीं कहता था, लेकिन हर एक को पता था कि नवजात शिशु पर पप्पियां वप्पियां बरसा कर उसे बीमार नहीं करना है। अब लगने लगा है कि लोग इस तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं देते......

लेिकन अब यह रिसर्च ध्यान में आने के बाद लगता है हम सब को और भी सजग रहने की ज़रूरत है.....

और एक बात, डाक्टर लोग जैसे बताते हैं कि जन्म के बाद बच्चे को चिकित्सक के पास डेढ़ माह, अढ़ाई माह और साढ़े तीन माह के होने पर लेकर जाना चाहिए, यह सब भी करना नितांत आवश्यक है क्योंकि इस के दौरान शिशुरोग विशेषज्ञ उस के विकास के मील पत्थर (Development mile-stones) चैक करता है, स्तनपान के बारे में चंद बातें करता है, उस के सिर के घेरे को टेप से माप कर उस के विकास का अंदाज़ा लगाता है। 

यह पोस्ट केवल यही याद दिलाने  के लिए कि पहले तीन माह तक बच्चे का विशेष ध्यान रखा जाना क्यों इतना ज़रूरी है, क्यों उसे केवल मां ही दूध ही दिया जाना इतना लाजमी है, इस का उद्देश्य केवल उसे दस्त रोग से ही बचाना नहीं है......

Monday, August 11, 2014

यह भी पर्सनल हाइजिन का ही हिस्सा है..


सैक्स ऐजुकेशन, किशोरावस्था के मुद्दे, स्वपनदोष, शिश्न की रोज़ाना सफ़ाई......शायद आप को लगे कि यह मैंने किन विषयों पर लिखना शुरू कर दिया है। लेकिन यही मुद्दे आज के बच्चों, किशोरों एवं युवाओं के लिए सब से अहम् हैं।

मुझे कईं बार लगता है कि मैं पिछले इतने वर्षों से सेहत के विषयों पर लिख रहा हूं और मैं इन विषयों पर लिखने से क्यों टालता रहा। याद है कि २००८ में एक लेख लिखा था......स्वपनदोष जब कोई दोष है ही नहीं तो.... लिखा क्या था, बस दिल से निकली चंद बातें थीं जो मैं युवाओं के साथ शेयर करना चाहता था.....बस हो गया।

मैंने वह लेख किसी तरह की वाहावाही के लिए नहीं लिखा था.....लेकिन वह लेख हज़ारों युवाओं ने पढ़ा है......मैंने अपने बेटों को भी उसे पढ़ने को कहा......और वह लेख पढ़ने के बाद मुझे बहुत सारी ई-मेल युवाओं से आती हैं कि हमें यह लेख पढ़ कर बड़ी राहत मिली।

मैं जानता हूं कि मैं कोई सैक्स रोग विशेषज्ञ तो हूं नहीं, लेकिन फिर भी जो हमारे पास किसी विषय का ज्ञान है, चाहे वह व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हो और जो कुछ चिकित्सा क्षेत्र में रहने के कारण उस में जुड़ता गया, अब अगर वह ज्ञान हम जैसी उम्र के लोग शेयर नहीं करेंगे तो कौन आयेगा इस काम के लिए आगे। अच्छा एक बात और भी है कि इंगलिश में तो यह सब जानकारी उपलब्ध है नेट पर लेकिन हिंदी में इस तरह के कंटैंट का बहुत अभाव है।

मैं जानता हूं कि कितना मुश्किल होता है अपने लेख में यह लिखना कि मुझे भी किशोरावस्था के उस दौर में स्वपनदोष (night fall)  होता था....लेकिन क्या करें युवा वर्ग की भलाई के लिए सब कुछ सच सच शेयर करना पड़ता है. वरना मैं हर समय यह लिखता रहूं कि यह एक नार्मल सी बात है उस उम्र के लिए.....तो भी कहीं न कहीं पाठक के मन में यह तो रहेगा कि लगता है कि इसे तो नहीं हुआ कभी स्वपनदोष........ वरना यह लिख देता। यही कारण है कि सब कुछ दिल खोल कर खुलेपन से लिखना पड़ता है। उद्देश्य सिर्फ़ इतना सा ही है कि जिस अज्ञानता में हमारी उम्र के लोग जिए--इस तरह की सामान्य सी बातों को भी बीमारी समझते रहे..... आज के युवा को इस तरह के विषयों के बारे में सटीक जानकारी होनी चाहिए।

आज ध्यान आ रहा था...... शिश्न की रोज़ाना सफ़ाई के मुद्दे का। यह एक ऐसा मुद्दा है कि जिस पर कभी बात की ही नहीं जाती क्योंकि वैसे ही बालावस्था में शिश्न को हाथ लगाने तक को पाप लगेगा कहा जाता है, ऐसे में इस की सफ़ाई की बात कौन करेगा।

अगर इस लेख के पाठक ऐसे हैं जिन के छोटे बच्चे हैं तो वे अपने बच्चे के शिशु रोग विशेषज्ञ से इस मुद्दे पर बात करें। यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है...मैं इस के ऊपर जान बूझ कर कोई सिफारिश नहीं करूंगा....लेकिन बस इतना कह कर अपने अनुभव शेयर करने लगा हूं कि इस की रोज़ाना सफाई शिश्न की आगे की चमड़ी आराम से पीछे कर के (जितनी हो उतनी ही, बिना ज़ोर लगाए... यह बहुत ज़रूरी है)...... उस पर थोड़ा साबुन लगा कर रोज़ाना धोना ज़रूरी है।

चाहे अपने बारे में लिखना कितना ही एम्बेरेसिंग लगे ... तो लगे, लेकिन लिखूंगा। हमें पता ही नहीं था कि शिश्न के अगल हिस्से की इस तरह से सफ़ाई करनी होती है, कभी किसी से भी चर्चा हुई नहीं, किसी ने बताया नहीं। इस के कारण १४-१५ वर्ष की उम्र में बड़ा लफड़ा सा होने लगा। जब भी पेशाब जाएं तो जलन होने लगे...... कुछ समय के बाद ठीक हो जाए...ठीक से याद नहीं कि पेशाब करने से पहले हुआ करती थी या बाद में, लेकिन होती तो थी, बीच बीच में अपने आप ही ठीक भी हो जाया करती थी। अपने आप ही थोड़ा पानी ज़्यादा पीने लगता था कि आराम मिलेगा, किसी से बात क्या करें, इसलिए झिझक की वजह से यह सब पांच-छः वर्ष ऐसे ही चलता रहा।

१९-२० की उम्र में एक दिन हिम्मत कर के मैं अपने आप पहुंच ही गया मैडीकल कालेज के मैडीसन विभाग की ओपीडी में .....उस डाक्टर ने अच्छे से बात की, और मेरे से पूछा कि क्या तुम रोज़ाना इस की सफ़ाई नहीं करते.....मैंने तो उस तरह की सफ़ाई के बारे में पहली बार सुना था। आगे की चमड़ी (prepuce) बिल्कुल अगले हिस्से के साथ (glans penis)  चिपकी पड़ी थी।

बहरहाल, सब टैस्ट वेस्ट करवाए गये, उस डाक्टर के समझाए मुताबिक आगे की चमड़ी पीछे करने के पश्चात मैंने उस दिन से ही साफ़ सफाई का ख्याल रखना शुरू किया..... और मैं अब यह लिखने के लिए बिल्कुल असमर्थ हूं कि मुझे वैसा करने से कितना सुकून मिला....होता यूं है कि शिश्न की आगे से सफ़ाई न करने से.....शिश्न के अगले हिस्से के आस पास वाली चमड़ी से निकलने वाला एक सिक्रेशन.... स्मैग्मा--- इक्ट्ठा होने से ---शिश्न की अगले हिस्से वाली चमड़ी अगले हिस्से से ( glans penis) से चिपक जाती है, उस से उस जगह पर इरीटेशन होने लगती है .. और फिर यूटीआई (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफैक्शन) भी हो जाती है..... यही हुआ मेरे साथ भी....... यूरिन की टैस्टिंग करवाई-- और उस के अनुसार सात दिन के लिए मुझे दवाई खाने के लिए दी गई........और बस मैं ठीक हो गया बिल्कुल।

पाठकों को यह भी बताना ज़रूरी समझता हूं कि उस अगले हिस्से में चमड़ी पीछे करने के पश्चात ज़्यादा साबुन भी रोज़ रोज़ लगाना ठीक नहीं है, बस केवल यही ध्यान रखना ज़रूरी है कि शरीर के हर हिस्से की सफ़ाई के साथ उस हिस्से की सफ़ाई भी रोज़ाना करनी नितांत आवश्यक है, वरना दिक्कतें हो ही जाती हैं।

 मेरे यह पोस्ट लिखने का उद्देश्य केवल आज के युवावर्ग तक यह संदेश पहुंचाना है, अब यह कैसे पहुंचेगा, मुझे पता नहीं। वैसे भी मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरे इस तरह के लेखों को आप मेरी डायरी के पन्नों की तरह पढ़ कर भूल जाएं या किसी विशेषज्ञ के साथ इस में लिखी बातों की चर्चा कर के ही कोई निर्णय लें, यह आप का अपना निर्णय है। मैं जो संदेश देना चाहता था, मैं आप तक पहुंचा कर हल्का हो जाता हूं। आप अपने चिकित्सक से परामर्श कर के ही कोई भी निर्णय लें, प्लीज़।
Parenting literacy -- Cleanliness. 

Saturday, August 9, 2014

दांत उखड़वाने के लिए हर सप्ताह ५०० बच्चे भर्ती

मुझे अभी तक किसी भी बच्चे का दांत उखड़वाने के लिए उसे अस्पताल में दाखिल करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। जब हम लोग डैंटिस्ट्री पढ़ रहे थे तब भी कभी नहीं सुना-देखा कि इस तरह से बच्चों के दांत उखड़वाने के लिए कभी हमारे प्रोफैसरों ने भी बच्चों के दांत उखाड़ने के लिए उन्हें पहली भर्ती किया हो।

हां, कभी कभी कुछ वर्षों बाद कोई ऐसा बच्चा आ जाता था जो बहुत ही डरा हुआ, भयभीत सा या फिर किसी ऐसी मानसिक अथवा शारीरिक बीमारी से ग्रस्त होता था कि उस के दांत बिना उस को भर्ती किए और बिना अलग तरह का अनेस्थिसिया दिए (जिस के पश्चात उसे कुछ समय के लिए नींद आ जाती है)... नहीं हो पाता था। यह भी मैंने अपनी प्रोफैसर को एक बार करते देखा था।

वैसे तो जो भी चिकित्सक यह इलाज करते होंगे वे सब कुछ जांच कर ही करते होंगे, लेकिन वर्ष में २०-२५ हज़ार बच्चे अगर अस्पतालों में दांत उखड़वाने के लिए दाखिल किए जा रहे हैं तो यह एक चिंताजनक आंकड़ा है।
इस मुद्दे पर अपने विचार लिखना चाहता हूं।

इंग्लैंड जैसे देशों में बच्चों के दांत यहां की अपेक्षा बहुत ज़्यादा खराब होते हैं.......इस के पीछे उन का खानपान बहुत ज़्यादा जिम्मेदार है। वे बच्चें कोला ड्रिंक्स, चाकलेट्स, बर्गर और दूसरे तरह के जंक फूड के किस कद्र दीवाने हैं, हम जानते हैं। दीवानापन इधर भी बढ़ रहा है लेकिन यहां बच्चे के मां बाप दाल-रोटी की जुगाड़बाजी में ही इतने उलझे हुए हैं कि अधिकतर पेरेन्ट्स बच्चों को यह सब कचरे जैसा खाना उपलब्ध नहीं करवा पाते, और यह बच्चों का सौभाग्य नहीं तो और क्या है कि अधिकांश को दाल-रोटी-सब्जी से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

मैं नहीं गया कभी इंगलैंड..लेकिन जो मीडिया से जाना वहां के बारे में कि वहां पर डाक्टरों और मरीज़ों के बीच कुछ ज़्यादा बढ़िया संवाद है नहीं, किसी के पास समय ही नहीं है इस तरह के संवाद में पड़ने का.......लेकिन यहां अभी भी डाक्टर और पेरेन्ट्स के बीच अच्छी बातचीत हो ही जाती है...... पता नहीं आप मेरे से कितना सहमत हों, लेकिन अभी यहां हालात उतने स्तर तक गिरे नहीं है, मुझे तो ऐसे लगता है।

इसी संवाद के अभाव में...शायद डाक्टर मरीज़ के संबंध में विश्वास का हनन भी हुआ है, ऊपर से इतने सारे कोर्ट-केस, मुआवजा ..और सब तरह की पेशियां, झंझट..ऐसे में लगता है कि बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर के उन के दांत निकालना ही इंगलैंड के दंत चिकित्सकों को एक सुरक्षित रास्ता जान पड़ता होगा।

वहां पर इंश्योरैंस का भी कुछ चक्कर है, अस्पतालों को भुगतान इंश्योरैंस द्वारा होता है, इसलिए अस्पताल में इस तरह की भर्तीयां करनी ज़रूरी भी होती होंगी।

यहां के बच्चे बात समझ लेते हैं, अकसर मां-बाप उन के साथ ही होते हैं, वहां पर मां-बाप बाहर रोक दिये जाते हैं.....बच्चे मां-बाप की उपस्थिति में बिंदास अनुभव करते हैं, है कि नहीं ?...और इलाज के लिए बच्चे हम जैसों की बातों में भी आसानी से आ जाते हैं कि दांत उखड़वाने के बाद पापा, दो आइसक्रीम दिलाएंगे, कुछ को उन के पापा दस रूपये का नोट थमा देते हैं.........यानि कि कुछ भी जुगाड़बाजी से आसानी से बिना किसी विशेष परेशानी के बच्चे अाराम से दांत उखडवा ही लेते हैं।

हां, कभी कभार दो एक साल में एक बच्चा आ जाता है जो बहुत डरता है, रोता है और डैंटल चेयर पर बैठने ही से मना करता है, अकसर वह भी दूसरी या तीसरी बार प्यार-मनुहार से काम करवा ही लेता है। कोई विशेष दिक्कत नहीं आती, कोई विशेष दवाईयां या विशेष टीके नहीं लगवाने पड़ते। थैंक गॉड--तुसीं ग्रेट हो।

मैं उस इंगलैंड वाली रिपोर्ट में पढ़ रहा था कि कईं बच्चों के सारे के सारे दांत ही उखड़वाने पड़त हैं। इस से पता चलता है कि वहां बच्चों के दांतों की स्थिति कितनी खराब है।

ऐसा मैंने कोई बच्चा नहीं देखा अभी तक यहां जिस के सारे दांत निकलवाने की ज़रूरत पड़ी हो........ वैसे भी हम जैसे लोगों ने अपने प्रोफैसरों की बात तीस साल पहले ही गांठ बांध ली थी कि बिना किसी विशेष कारण के बच्चों के दांतों को उखाडना नहीं चाहिए क्योंकि उन के गिरने का एक नियत समय है, जब वे गिरेंगे और उन की जगह पर पक्के दांत उन का स्थान लेंगे। अब अगर किसी दांत के गिरने वाले टाइम-टेबल से बहुत पहले उसे निकाल दिया जाए या निकालना पड़े तो फिर उस के नीचे विकसित हो रहे पक्के दांत के मुंह में निकलने में गड़बड़ी होने की आशंका बनी रहती है... ऊबड़-खाबड़ दांत होने का एक बहुत बड़ा कारण।

हमें यह सिखाया गया कि अगर बच्चे के दांत में कोई दांत पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है और उस की केवल जड़ या जड़ें ही बाकी रह गई हैं लेकिन बच्चे को इन जड़ों की वजह से कोई परेशानी नहीं है, तो भी इन जड़ों को बिना निकाले ही रहने दिया जाना चाहिए जब तक वे अपने नियत टाइम-टेबल अनुसार या तो स्वयं ही हिल कर न निकल जाएं या फिर जब तक उन में कोई दिक्कत न हो। ये बातें बच्चों के दांतों के बारे में लिख रहा हूं।

लेकिन यह निर्णय कि कौन से बच्चे में कौन से दांत बिना किसी चिंता-परेशानी के पड़े रहें और किन्हें निकालना ज़रूरी है, यह निर्णय दंत चिकित्सक का होता है, आप स्वयं यह निर्णय नहीं कर पाएंगे. मेरे निर्णय को यह बात अकसर प्रभावित करती है कि अगर तो किसी टूटे फूटे दूध के दांत में बार बार पस पड़ने लगी है, ऐब्सेस बन रहा है जिस के लिए बच्चे के बार बार कुछ कुछ समय के बाद ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां खिलानी पड़ रही हैं तो ऐसे टूटे फूटे दूध के दांतों को बाहर का रास्ता दिखाना ही ठीक रहता है।

मैं यह बात एक सामान्य दंत चिकित्सक की हैसियत से रख रहा हूं ..जो दंत रोग विशेषज्ञ बच्चों के स्पैशलिस्ट हैं, उन के अनुभव क्या हैं, जब वे लिखेंगे तो पता चलेगा। बाकी बातें तो सब की सब वही हैं जो मैंने लिखी हैं, लेकिन चूंकि उन के पास जटिल से जटिल केस भी आते होंगे जब वे किसी डैंटल कालेज में काम कर रहे हों, ऐसे में वे किस तरह के दांत उखाड़ते हैं.......क्या उन्हें बच्चे को रिलैक्स करने के लिए, उस का भय भगाने के लिए कोई टीका भी इस्तेमाल करना पड़ता है, यह तो वे ही बता सकते हैं। लेिकन मुझे कभी इस की ज़रूरत महसूस नहीं हुई या मैंने इस्तेमाल नहीं किया...इस का आप जो भी मतलब निकाल लें।

कईं बार किसी पोस्ट में इतनी विश्वसनीयता घुस आती है कि उस के नीचे डिजिटल सिग्नेटर करने की इच्छा होती है।
Warning Over Children's Dental Health 

Friday, August 8, 2014

यौवन की दहलीज़ तो ठीक है लेकिन ...

कुछ दिन पहले मैं एक किताब का ज़िक्र कर रहा था ... यौवन की दहलीज़ पर जिसे यूनिसेफ के सहयोग से २००२ में प्रकाशित किया गया है।

इस के कवर पेज पर लिखा है...... मनुष्य के सेक्स जीवन, सेक्स के माध्यम से फैलने वाले गुप्त रोगों(एस टी डी) और एड्स के बारे में जो आप हमेशा से जानना चाहते थे, लेकिन यह नहीं जानते थे कि किससे पूछें।

मैंने इस किताब के बारे में क्या प्रतिक्रिया दी थी, मुझे याद नहीं ..लेकिन शायद सब कुछ अच्छा ही अच्छा लिखा होगा --शायद इसलिए कि मैं पिछले लगभग १५ वर्षों से हिंदी भाषा में मैडीकल लेखन कर रहा हूं और मुझे हिंदी के मुश्किल शब्दों का मतलब समझने में थोड़ी दिक्कत तो होती है लेकिन फिर भी मैं कईं बार अनुमान लगा कर ही काम चला लेता हूं।

यह किताब हमारे ड्राईंग रूम में पड़ी हुई थी, मेरे बेटे ने वह देखी होगी, उस के पन्ने उलटे पलटे होंगे। क्योंकि कल शाम को वह मेरे से पूछता है --डैड, यह किताब इंगलिश में नहीं छपी?..... मैंने कहा, नहीं, यह तो हिंदी में ही है।

वह हंस कर कहने लगा कि डैड, इसे पढ़ने-समझने के लिए तो पहले संस्कृत में पीएचडी करनी होगी। उस की बात सुन कर मैं भी हंसने लगा क्योंकि किताब के कुछ कुछ भागों को देख कर मुझे भी इस तरह का आभास हुआ तो था.....पीएचडी संस्कृत न ही सही, लेकिन हिंदी भाषा का भारी भरकम ज्ञान तो ज़रूरी होना ही चाहिए इस में लिखी कुछ कुछ बातों को जानने के लिए।

अच्छा एक बात तो मैं आप से शेयर करना भूल ही गया ... इस के पिछले कवर के अंदर लिखा है...यह पुस्तक बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। मुझे यह पढ़ कर बड़ा अजीब सा लगा ...कि यौवन की दहलीज पर लिखी गई किताब जिन के लिए लिखी गई है, वे इस के अंदर कैसे झांक पाएंगे अगर यह किताब बिकाऊ ही नहीं है।कहां से पाएंगे वे ऐसी किताबें.

मुझे जब इस में कुछ कुछ गूढ़ हिंदी में लिखी बातों का ध्यान आया तो मेरा ध्यान इस के पिछले कवर की तरफ़ चला गया जिस में लिखा था कि जिस ने इस पुस्तक में बतौर हिंदी अनुवादक का काम किया वह बीएससी एम ए (अर्थशास्त्र) एम ए (प्रयोजन मूलक हिंदी) अनुवाद पदविका (हिंदी) आदि योग्यताओं से लैस थीं.......उन की योग्यता पर कोई प्रश्न चिंह नहीं, हो ही नहीं सकता।

लेिकन फिर भी अकसर मैंने देखा है कि इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया जाता कि एक तो हम आम बोल चाल की हिंदी ही इस्तेमाल किया करें, सेहत से जुड़ी किताबों में जो किसी भी हिंदी जानने वाले को समझ में आ जाए। यह बहुत ज़रूरी है। किताबों में तो है ही बहुत ज़रूरी यह सब कुछ.... वेबसाइट पर तो इस के बारे में और भी सतर्क रहने की ज़रूरत है...किताबें तो लोग खरीद लेते हैं, अब एक बार खरीद ली तो समझने के लिए थोड़ी मेहनत-मशक्कत कर ही लेंगे, लेकिन नेट पर आज के युवा के पास कोई भी मजबूरी नहीं है......एक पल में वह इस वेबपेज से उस वेबपेज पर पहुंच जाता है, आखिर इस में बुराई भी क्या है, नहीं समझ आ रहा तो क्या करे, जहां से कुछ समझने वाली बात मिलेगी, वहीं से पकड़ लेता है।

ऐसे में हमें सेहत से जुड़ी सभी बातें बिल्कुल आम बोलचाल की भाषा ही में करनी होंगी...वरना वह एक सरकारी आदेश की तरह बड़ी भारी-भरकम हिंदी लगने लगती है। और उसी की वजह से देश में हम ने हिंदी का क्या हाल कर दिया है, आप देख ही रहे हैं......दावों के ऊपर मत जाइए। जो मीडिया आम आदमी की भाषा में बात करता है वह देखिए किस तरह से फल-फूल रहा है।

और दूसरी बात यह कि अनुवाद में भी बहुत एहतियात बरतने की ज़रूरत है। सेहत से संबंधित जानकारी को जितने रोचक अंदाज़ में अनुवादित किया जायेगा, उतना ही अच्छा है.. और इस में इंगलिश के कुछ शब्दों को देवनागरी लिपी में लिखे जाने से भला क्या आपत्ति हो सकती है।

बस यही बात इस पोस्ट के माध्यम से रखना चाह रहा था।

आप देखिए कि इंगलिश में कितनी बेबाकी से डा वत्स इन्हीं सैक्स संबंधी विषयों पर अपनी बात देश के लाखों-करोड़ों लोगों तक कितनी सहजता से पहुंचा रहे हैं........ आईए मिलते हैं ९० वर्ष के सैक्सपर्ट डा वत्स से।  (यहां क्लिक करें)

Monday, August 4, 2014

एक इंसान जिस ने ५ करोड़ लोगों को दिया जीवन-दान

आज मैंने एक ऐसे इंसान के बारे में जाना जिस ने एक ऐसा काम कर दिखाया जिस से अब तक ५ करोड़ जानें बच गईं। हैरान करने वाली बात लगती है ना, लेकिन है यह बिल्कुल सच।

और यह करिश्मा हो पाया इस डाक्टर की रिसर्च से.. जिस ने जीवन रक्षक घोल का आविष्कार किया। जिसे इंगलिश में हम लोग ओ आर एस घोल भी कहते हैं और जिस के बारे में अकसर हम सब सरकारी सेहत विभागों के विज्ञापनों के बारे में सुनते रहते हैं।

इस घोल को तो मैं भी जानता हूं लेकिन कभी भी इस तरफ़ बिल्कुल भी ध्यान नहीं किया कि इस घोल का आविष्कार करना भी कितना जटिल काम रहा होगा। आप सब की तरह मैं भी ऐसा ही सोचा करता था कि ठीक है, पानी में नमक मिलाया, चीनी मिलाई...घोल तैयार और अगर नींबू आसानी से उस समय उपलब्ध है तो उस की चंद बूंदें भी उस घोल में डाल दी जाएं (स्वाद के अनुसार)... हां, इतना ज़रूर रहा कि जब भी मैंने इसे बनाना चाहा या बनाने में मदद की, मेरी डाक्टर बीवी ने इतना ज़रूर ध्यान रखा कि न तो नमक न ही चीनी ...न ही कम हो और न ही ज़्यादा हो.....जब भी मैंने ज्यादा चीनी डालनी चाहिए तो उन्होंने रोक लिया..यह कहते हुए कि इस का फ़ायदा नहीं, नुकसान होगा... दस्त रोग में।

जब हम छोटे छोटे थे तो --शायद सात आठ साल की अवस्था रही होगी,  रेडीमेड पाउच भी मिलना शुरू हो गये था.....जिन्हें पानी में मिला कर पिला दिया जाता था।

मैंने बीबीसी की साइट पर यह लेख पढ़ने के बाद डा आनंद की अद्भुत किताब को भी देखना चाहा---पहले भी कईं बार देख चुका हूं वैसे तो ... लेकिन फिर भी देखना ज़रूरी लगता है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि आज कर बाज़ार में रेडीमेड ओ आर एस -जीवन रक्षक घोल के रेडीमेड पाउच मिलने लगे हैं, जिन्हें पानी में घोलने के बाद तुंरत घोल तैयार हो जाता है, लेकिन वे कहते हैं कि वे मार्कीट में बिकने वाले इस तरह के उन पाउचों के पक्ष में नहीं हैं जिन में ग्लूकोज़ की मात्रा रिक्मैंडेड मात्रा से अधिक होती है, और इस से बात बनने की बजाए बिगड़ सकती है।

लिखते लिखते ध्यान आ जाता है पुरानी से पुरानी बातों का.......बचपन में हम देखा करते थे कि किसी को दस्त लग गए, एक तो रेडीमेड पाउच आदि पानी में घोल कर पिला दिया जाता था और उस की खटिया के पास स्टूल पर एक छोटा सा गत्ते का ग्लूकोज का डिब्बा भी रख दिया जाता था जो कुछ कुछ समय के अंतराल के बाद उसे घोल घोल कर पिला दिया जाता था।

एक तो पोस्ट इतनी लंबी होने लगी हैं कि मेरी मां भी मेरे लेखों की आलोचना में यही कहती हैं......लिखता तूं बढ़िया है, प्रेरणा मिलती है, जानकारी मिलती है तेरे लिखने से..... पर तू लिखता बड़ा लंबा है।

मेरी दिक्कत यह है कि मैं थोड़े शब्दों में अपनी बात कहना सीख ही नहीं पाया।

हां, तो बात चल रही थी, उस घोल में ज्यादा चीनी की, ज्यादा नमक की...... इस को जानने समझने के लिए कि यह क्या चक्कर है, आप को उस महान डाक्टर नार्बट हिर्स्चार्ण के काम के बारे में जानना होगा।

यह डाक्टर साहब १९६४में पूर्वी पाकिस्तान जिसे अब बंगला देश कहा जाता है में पोस्टेड थे.....वहां पर हैजे से मरने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी..... ऐसे मरीज़ों की दस्त की वजह से ही मौत हो जाया करती थी क्योंकि जितने लोगों को  इंट्राविनस फ्लयूड्स (जिसे ग्लूकोज या सेलाइन चढ़ाना कहते हैं ...बोतल जब चढ़ाई जाती है).. मिलने ज़रूरी थे उतने इंतज़ाम हो नहीं पा रहे थे।

इस महान डाक्टर ने बड़ी सावधानी से रिसर्च करनी शुरू की .....कईं बार साथी डाक्टरों ने विरोध भी किया लेकिन फिर फिर भी इन्होंने फूंक फूंक कर पैर रखा इस रिसर्च में और आखिर एक ऐसा आविष्कार कर के ही दम लिया जिस ने अब तक ५ करोड़ लोगों की जान तो बचा ही ली है, और अभी भी यह गिनती निरंतर बढ़ रही है।

समझने वाली बात केवल यही है कि अगर दस्त के मरीज को ऐसा घोल दिया जाए जिस में मौजूद घटकों की मात्रा और रक्त में मौजूद उन घटकों की मात्रा एक जैसी हो तो समझो बात बन गई........ यही आविष्कार सब से अहम् था और इसे बीसवीं सदी का सब से बड़ा मैडीकल आविष्कार भी कहा जा रहा है।

अगर ये घटक अधिक या कम मात्रा में होंगे तो इस का फायदा तो क्या होना है, बल्कि विपरीत असर ही होगा।
जीवन रक्षक घोल को घर बनाने की विधि......एक लिटर उबाला हुआ पानी जिसे ठंडा कर दिया गया हो, उस में एक टी-््स्पून नमक (लेवल किया हो, ऊपर तक न भरा हो), और ८ टी-स्पून शक्कर के डाल (लेवल किया हो).. इन्हें मिला कर घोल बना लें और फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे स्वाद अनुसार मिला दें। बना कर फ्रिज में रख दें और थोड़े थोड़े समय बाद दस्त के मरीज को दें और स्वयं देखिए की किस तरह से संजीवनी बूटी जैसे यह सस्ता सा, बिल्कुल घर ही में तैयार किया हुआ घोल सब को ठीक ठाक कर देता है.........जैसा कि आप उस बीबीसी रिपोर्ट में (जिस का लिंक मैं नीचे लगा दूंगा) एक स्लाईड शो में भी देखेंगे कि किस तरह के एक छोटा दस्त की वजह से बिल्कुल निढाल सा हुआ आता है.. लेिकन जीवन रक्षक घोल लेने के आधे एक घंटें में किस तरह से चुस्ती लौटने लगती है और तुरंत स्तनपान करने लगता है, जब वह आया तो उस में स्तनपान करने की भी शक्ति न थी।

वैसे तो एमरजैंसी में तो ऐसा भी कहा गया है कि अगह पानी उबालने वालने का कोई जुगाड़ न हो, तो भी एक गिलास पानी में एक चम्मच चीनी और एक चुटकी नमक मिला कर हिलाएं, चंद बूंदें नींबू के पानी की डाल दें और दस्त से ग्रस्त बच्चे या बड़े व्यक्ति को यह देना शुरू करें.......... रिजल्ट तुरंत मिल जायेगा।

सोचने वाली बात यह तो है कि क्या इस तरह के डाक्टर किसी फरिश्ते से कम हैं जिन्हें ईश्वर किसी खास मकसद के लिए धरती पर भेजता है.........इन की इंटरव्यू भी ज़रूर देखिए, नीचे दिए गये लिंक पर ही मिलेगी.......कितनी सहजता, कितना साधारण व्यक्तित्व और कितना ठहराव। इन को हमारा सब का कोटि कोटि नमन।

लिखना तो और भी चाहता हूं ---मां की नसीहत याद आ गई फिर से.......छोटे लेख लिखा कर।
Inspiration........ The man who helped saved 50 million lives (BBC Report) 

One of the outstanding useful videos i ever came across.........

Sunday, July 31, 2011

पोलियो की दो बूंदों से चूकना खिला सकता है जेल की हवा

नाईजीरिया में विभिन्न भ्रांतियों के चलते कुछ गरीब इलाकों में रहने वाले मुस्लिम समाज से संबंध रखने वाले लोग पोलियो कीLinkLink दो बूंदें अपने बच्चों को पिलाने के हक में नहीं है। इस के लिये वे अजीबोगरीब बहाने बनाते हैं... जो लोग पोलियो की खुराक पिलाने उन के घर में आते हैं, उन्हें कह देते हैं कि यहां कोई छोटा बच्चा रहता ही नहीं, और कुछ जगहों पर तो इन चिकित्सा कर्मियों को घर में घुसने ही नहीं देते..... कईं बार कह देते हैं कि वे रिश्तेदार के यहां किसी दूसरे शहर में गये हुये हैं। सोचने वाली बात यह है कि क्या यह सब केवल नाईज़ीरिया में ही हो रहा है ?

लेकिन दक्षिणी अफ्रीका ने भी इस का समाधान लगता है निकाल ही लिया है... अब जो मां-बाप अपने बच्चों को ज़िंदगी की ये दो बूंदे पिलाने से आना कानी करेंगे उन्हें हवालात की हवा भी खानी पड़ सकती है।

यह रिपोर्ट पढ़ते ध्यान आ रहा था कि देशों की सरकारें इस तरह के अभियानों पर करोडो-अरबों रूपये-डालर-पाउंड खर्च करती हैं लेकिन इतने वर्ष बीतने के बाद भी अभी तक लोगों के दिलों-दिमाग पर भ्रांतियां इतनी ज़्यादा हावी हैं जिन के चलते इस तरह के अभियानों को झटका तो लगता ही है।

अचानक ध्यान आ गया 1990 के दशक का ही ... जिन दिनों यह अभियान शुरू हुआ ... उन दिनों अखबारों में यह भी छपता था कि कुछ लोगों ने यह वहम पाल लिया था कि कहीं ये बूंदे बिना वजह बार बार पिला कर उन के बच्चों को खस्सी करने की तो साजिश नहीं चल रही ... खस्सी करने का मतलब तो समझते ही होंगे ... बस, इतना ही समझना काफ़ी है कि पंजाबी में खस्सी उसे कहते हैं जो अपनी प्रजनन-क्षमता खो दे ....और इसे अनेकों बार मजाक के दौरान इस्तेमाल भी किया जाता है। तो, इस मुहिम को शुरू शुरू में अपने यहां भी कुछ लोगों द्वारा एक तरह की नसबंदी के तौर पर ही देखा जाता था। सच में भ्रांतियों का कुचक्र तोड़ना कितना मुश्किल है!!


Full marks for this compaign

पल्स-पोलियो का यह अभियान 1990 के दशक में शुरू होने के बाद लगातार जारी है .... कितने वर्षों से रविवार के दिन कुछ कुछ महीनों बाद यह मुहिम चलाई जा रही है .....वर्ष 2002 के आसपास मेरे कुछ लेख इस समस्या पर समाचार पत्रों में छपे थे।

पोलियो को जड़ से खत्म करने के लिये यह हम सब का साझा दायित्व बनता है कि हम अपने स्तर पर इस अभियान को कामयाब बनाने हेतु बढ़ चढ़ कर सहयोग दें....यह सारे विश्व की भलाई के लिये है।

Wednesday, April 20, 2011

स्तनपान लोकप्रिय तो हो ही रहा है !

कभी कभी कोई समाचार पढ़ कर अच्छा लगता है ... कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर देख कर भी ऐसा ही हुआ। खबर यह थी कि इंडियन एकेडमी ऑफ पिडिएट्रिक्स ने अपने लगभग 1800 सदस्यों को बच्चों का पावडर दूध बनाने वाली कंपनियों द्वारा आयोजित सैमीनारों में जाकर लैक्चर अथवा डेलीगेट के तौर पर सम्मिलित होने से मना किया है....Doctors must shun baby food seminars: IAP


इंडयिन एकेडमी ऑफ पिडिएट्रिक्स (आई ए पी) शिशु-रोग विशेषज्ञों का संगठन है जिस ने स्तनपान को इतना लोकप्रिय बनाये जाने के लिये सराहनीय काम किया है। दरअसल होता यह है कि आजकल देश में बच्चों के लिये डिब्बे वाला दूध (infant milk substitute) की पब्लिसिटी से संबंधित कानून काफी कड़े हैं, लेकिन लगता है कि ऐसे उत्पाद बनाने वालों ने इस का भी कुछ तोड़ (जन्मजात जुगाड़ू तो हम हैं ही!) निकाल कर तरह तरह की रिसर्च इंस्टीच्यूट आदि खोल ली हैं जिन पर ये नामचीन शिशुरोग विशेषज्ञों को लैक्चर देने के लिये आमंत्रित करती हैं...और बहुत से विशेषज्ञ इन्हें सुनने के लिये उमड़ भी पड़ते हैं, इसलिये आईएपी को अपने सदस्यों को ये दिशा-निर्देश जारी करना पड़ा।

टाइम्स के जिस पन्ने पर यह अच्छी खबर थी उसी पन्ने पर एक और बढ़िया खबर दिख गई ....इस खबर से यह पता चल रहा था कि स्तन-पान काम-काजी पढ़ी लिखी महिलाओं में भी पापुलर हो रहा है। कुदरत के इस अनमोल वरदान के जब शिशुओं के लिये (और मां के लिये भी) इतने फायदे हैं तो फिर कैसे माताएं अपने शिशुओं को इस से वंचित रख सकती हैं....Stored Breast milk.

हां, तो मैं उस खबर की बात कर रहा था जिस में यह बताया गया है कि कामकाजी महिलाओं ने अपने शिशुओं को स्तनपान करवाने का अनूठा ढंग ढूंढ लिया है। वे काम पर जाने से पहले अपने स्तनों से या तो स्वयं ही दूध निकाल कर जाती हैं अथवा एक ब्रेस्ट-पंप की मदद से दूध निकाल कर रख जाती हैं ताकि उन की अनुपस्थिति में शिशु अपनी खुराक से वंचित न रहे। अच्छा लगा यह पढ़ कर .... आज समय की मांग है कि इस तरह की प्रैक्टिस को लोकप्रिय बनाने के जितने प्रयास किये जाएं कम हैं।

मुझे यह लेख लिखते हुये ध्यान आ रहा है बंबई के महान् शिशुरोग विशेषज्ञ .... डा आर के आनंद का .... इन का क्लीनिक बंबई के चर्नी रोड स्टेशन के बिल्कुल पास है और यह मैडीकल कालेज के एक रिटायर्ड प्रोफैसर हैं। मैं अभी तक केवल चार पांच डाक्टरों से बेहद प्रभावित हुआ हूं और इन में से एक यह शख्स हैं। लोग तो कहते हैं ना कि कुछ डाक्टरों से बात कर के आधा दुःख गायब हो जाता है, लेकिन यह शख्स ऐसे दिखे कि जिन के दर्शन मात्र से ही जैसे लोगों को राहत महसूस होने लगती थी. होता है कुछ कुछ लोगों में यह सब ........मुझे याद है कि 1997-98 के दौरान हम अपने छोटे बेटे को वहां रूटीन चैक-अप के लिये लेकर जाया करते थे ....और हमें उन दिनों पेपरों से पता चलता था कि इन्होंने ब्रेस्ट-मिल्क को अपनाने के लिये कितनी बड़ी मुहिम छेड़ रखी थी।

औपचारिक ब्रेस्ट मिल्क सप्ताह तो सब जगह मनाया ही जाता है .... लेकिन यह महान् शिशुरोग विशेषज्ञ उस सप्ताह जगह जगह पर सैमीनार आयोजित किया करते थे ...विशेषकर मुंबई में चर्चगेट पर एक यूनिवर्सिटी है ...SNDT Women’s University …. वहां पर एक सैमीनार ज़रूर हुआ करता था जिस में ये कामकाजी और घरेलू ऐसी महिलाओं को उन के शिशुओं के साथ आमंत्रित किया करते थे जो अपने शिशुओं को निरंतर स्तनपान करवा रही हैं। ऐसे ही एक सैमीनार में मेरी पत्नी को भी आमंत्रित किया गया था ...वहां पर इन्हें सब के साथ अपने अनुभव बांटने होते थे। A great inspiration for so-many would-be mothers! इन्होंने ब्रेस्ट-फीडिंग पर एक बहुत बढिया किताब भी लिखी थी ... मुझे याद है हम लोग जहां कहां भी किसी नवजात् शिशु को देखने जाते थे उस की मां को इस किताब की एक प्रति अवश्य देकर आया करते थे।

मैं सोच रहा हूं कि सरकार भी भरसक प्रयत्न कर रही है.... मैटरनिटी लीव और चाईल्ड-केयर लीव के बावजूद भी अगर स्तनपान में कहीं कमी रहती है तो फिर यह दोष किस पर मढ़ा जाए......

अब स्तनपान के फायदे गिनाने के दिन लद गये ...इस बात का इतना ज़्यादा प्रचार-प्रसार सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किया जा चुका है और लगातार जारी है कि अब तो इस प्रैक्टिस को अपनाने के नये नये ढंगों की बात होनी चाहिये। हां, तो मैं बात कर रहा था उन पावडर-दूध बनाने वाली कंपनियों की जो तरह तरह के आयोजन इस बारे में कर रही हैं ताकि समय से पहले जन्मे शिशुओं की सही खुराक (nutrition of pre-term babies) के बहाने ही अपने उत्पादों को बढ़ावा दे सकें ...लेकिन शिशुरोग विशेषज्ञों के संगठन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की बात हम पहले ही कर चुके हैं।

और जहां तक ऐसे प्री-टर्म पैदा हुये शिशुओं की खुराक की बात है या ऐसी माताएं जो किसी रोग की वजह से अथवा किसी भी अन्य कारण के रहते शिशुओं को स्तन-पान करवाने में असमर्थ हैं, उन के लिये एक विकल्प है.... स्तन-दूध बैंक (Breast milk bank). अभी कुछ अरसा पहले ही मैंने अपने टंब्लर ब्लॉग पर एक छोटी सी पोस्ट लिखी थी जिस में ब्राज़ील में चल रहे स्तन-दूध बैंकों की बात कही गई थी ... ऐसी माताएं जिन को अपने शिशु की ज़रूरत पूरी करने के बाद भी दूध ज़्यादा पड़ता है, वे उन ज़रूरतमंद शिशुओं के लिये अपने स्तन-दूध का दान करती हैं जिसे रैफ्रीज़रेट किया जाता है और फिर स्तन-पान से वंचित बच्चों को दिया जाता है।

बस आज के लिये इतना ही काफ़ी है, लेकिन जाते जाते स्तन-दूध से तैयार उस आइसक्रीम वाली खबर सुन कर कुछ अजीब  सा लगा था .... बहुत हल्की खबर लगी थी कि ब्रेस्ट मिल्क से तैयार की गई आइसक्रीम के पार्लर खुलने की बात की जा रही थी। स्तन-दूध जिस पर केवल नवजात् शिशुओं का जन्मसिद्ध अधिकार है ... फिर चाहे यह अपनी मां का हो या किसी दूसरी मां का जिस ने इस का दान देकर महादान की एक अनूठी उदाहरण पस्तुत की हो...... जी हां, यह दान भी रक्तदान की तरह महादान ही है जो कुछ देशों में चल रहा है।

Monday, March 21, 2011

जटरोफा खाने से बार बार बीमार होते बच्चे

आज सुबह तो मैं डा बशीर की डायरी ही पढने में मसरूफ रहा, सोचा आज के लिये इतनी ही काफी है...बाकी फिर कभी।

आज सुबह ही मैं दो दिन पुरानी अमर उजाला में एक खबर देख रहा था कि कैथल में जटरोफा खाने से 15 बच्चे बीमार हो गये। कुछ ही समय बाद मुझे मेरे चार साल पहले लिखे एक आर्टीकल की कापी दिख गई जो एक नेशनल न्यूज़-पेपर में छपा था, इसलिये आज जटरोफा के बारे में ही बात करते हैं।

जटरोफा कुरकास (जंगली अरंडी) सारे भारतवर्ष में पाया जाने वाला एक आम पौधा है—इस के बीजों में 40 प्रतिशत तक तेल होता है। भारत एवं अन्य विकासशील देशों में जटरोफा से प्राप्त तेल (बॉयोडीज़ल) पैदा करने हेतु सैंकड़ों प्रोजैक्ट चल रहे हैं।

दिल्ली से मुंबई जाने वाली रेल लाइन के दोनों तरफ़ जटरोफा के पेड़ लगाए गये हैं। कुछ गाड़ियां भी इसी जटरोफा से प्राप्त 15-20 प्रतिशत बॉयोडीज़ल पर चलती हैं। जटरोफा की एक हैक्टेयर की खेती से 1892 लिटर डीज़ल मिलता है।

जटरोफा के बीजों से प्राप्त होने वाला तेल मनुष्ट के खाने योग्य नहीं होता। बॉयो-डीज़ल पैदा करने के इलावा इसे मोमबत्तियां, साबुन इत्यादि बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में भी इस पौधे के विभिन्न भागों को तरह तरह की बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है।

जटरोफा के बीजों का उत्पात ...
जटरोफा के विषैले गुण इस में मौजूद कुरसिन एवं सायनिक एसिड नामक टॉक्स-एल्ब्यूमिन के कारण होते हैं। वैसे तो पौधे के सभी भाग विषैले होते हैं लेकिन उस के बीजों में उस की सर्वाधिक मात्रा रहती है। उन बीजों को खाने के बाद शरीर में होने वाले बुरे असर मूल रूप से पेट एवं आंतों की सूजन के कारण उत्पन्न होते हैं। गलती से जटरोफा के बीज खाने की वजह से बच्चों में इस तरह के हादसे आये दिन देखने सुनने को मिलते रहते हैं।

उन आकर्षक बीजों को देख कर बच्चे अनायास ही उन्हें खाने को आतुर हो जाते हैं। उस के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि इस पौधे के कितने बीज खाने पर विषैलेपन के लक्षण पैदा होते हैं। कुछ बच्चों की तो तीन बीज खा लेने से ही हालत पतली हो गई जब कि कुछ अन्य बच्चों में पचास बीज खा लेने पर भी बस छोटे मोटे लक्षण ही पैदा हुये।
आम धारणा यह भी है कि इन बीजों को भून लेने से विष खत्म हो जाता है लेकिन भुने हुये बीज खाने पर भी बड़े हादसे देखने में आये हैं।

उल्टियां आना एवं बिलकुल पानी जैसे पतले दस्त लग जाना इन बीजों से उत्पन्न विष के मुख्य लक्षण हैं.. पेट दर्द, सिर दर्द, बुखार एवं गले में जलन होना इस के अन्य लक्षण हैं। इस विष से प्रभावित होने पर अकसर बहुत ज़्यादा प्यास लगती है, इस के विष से मृत्यु की संभावना बहुत ही कम होती है।

क्या करें ?

बेशक जटरोफा बीज में मौजूद विष को काटने वाली कोई दवा (ऐंटीडोट) नहीं है, फिर भी अगर बच्चों ने इस बीजों को खा ही लिया है तो अभिभावक घबरायें नहीं.....बच्चों को किसी चिकित्सक के पास तुरंत लेकर जाएं ...अगर बच्चा सचेत है, पानी पी सकता है तो चिकित्सक के पास जाने तक भी उसे पेय पदार्थ (दूध या पानी) पिलाते रहें जिससे कि पेट में मौजूद विष हल्का पड़ जाए।

चिकित्सक के पास जाने के पश्चात् अगर वह ज़रूरी समझते हैं तो अन्य दवाईयों के साथ साथ वे नली द्वारा ( आई-व्ही ड्रिप – intra-venous fluids) कुछ दवाईयां शुरू कर देते हैं। छः घंटे के भीतर अकसर बच्चे सामान्य हो जाते हैं।

रोकथाम ....

बच्चों को इस पौधे के बीजों के बारे में पहले से बता कर रखें...उन्हें किसी भी पौधे को अथवा बीजों को ऐसे ही खेल खेल में खा लेने के लिये सचेत करें। स्कूल की किताबों में इन पौधों का विस्तृत्त वर्णन होना चाहिये व अध्यापकों को भी इस से संबंधित जानकारी देते रहना चाहिए।

Saturday, January 8, 2011

छुप छुप कर सिगरेट पीने वाले बच्चे को पकड़ना चाहेंगे ?

आज सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर पर मेरी नज़रें अटकी रह गईं... उस का शीर्षक ही कुछ ऐसा था .... Catch your children smoking with this kit... मुझे बहुत उत्सुकता हुई कि आगे पढ़ूं तो सही. हां, तो उस में बताया गया है कि जल्द ही इस देश में कुछ ऐसी किट्स आ जाएंगी जिस से आप अपने लाडले की चोरी चोरी चुपके चुपके सिगरेट का कश लगाने की चोरी पकड़ पाएंगे। इस के लिये   स्ट्रिप आती है और बच्चे के यूरिन से अथवा गाल के अंदरूनी हिस्से से एक स्वॉब (swab) सारे राज़ खोल देगा। और भी एक बात उस में लिखी है कि अगर कही किसी ने किसी अजनबी के साथ असुरक्षित संभोग कर लिया है और उसे एचआईव्ही संक्रमण का डर सताने लगा है तो भी ऐसे मिलन के दो दिन के बाद उस व्यक्ति का एचआईव्ही स्टेट्स बताने का भी जुगाड़ कर लिया गया है। 

कैसी लगी आप को खबर? मुझे तो बस यूं ही लगा यह सब कुछ। मुझे लग रहा है कि यह हमारे देश की ज़रूरत नहीं है। अपने बच्चों की चौकीदारी करते करते लोग थक चुके हैं – आज से 20 साल पहले लोग अपनी स्मार्टनैस दिखाते थे –चैनल लॉक की बातें कर के –और एक तरह से यह एक स्टेट्स सिंबल सा ही हो गया था कि हम ने तो अपने टीवी पर चैनल लॉक का जुगाड़ किया है। लेकिन क्या हुआ? – केवल कबूतर के आंखे बंद कर लेने से क्या हुआ? उस के बाद तकनीक ने इतनी तरक्की कर ली है कि टैक्नोलॉजी से जुड़े युवक आज की तारीख में सब कुछ कर पाने में सक्षम हैं। ऐसे में हम उन की नैतिक चौकीदारी (moral policing) कर के आखिर कर क्या लेंगे? मुझे तो यह बच्चों की सिगरेट पीने की आदत पकड़ कर तीसमार खां बनने की बात मे रती भर भी दम नहीं लगता. 

तो फिर क्या बच्चों को यू ही मनमानी करने दें ?  कोई भी काम ज़ोर-जबरदस्ती से होने से रहा – अगर हम लोग बच्चों का विश्वास ही जीत नहीं पाये तो हम ने क्या किया? वो कैसा घर जिसमें बच्चे बच्चे अपने माता पिता से दिल न खोलें .... सिगरेट की उस की आदत पकड़ कर कौन सा बड़ा पहाड़ उखाड़ लिया जाएगा –ऐसे तो अनेकों तरह की किटें और उपकरण चाहिये होंगे उन की चोरियां पकड़ने के लिये। लेकिन यह सब पश्चिमी तरीका है बच्चों को कंट्रोल करने का। क्योंकि यह देश तो चलता ही है कि उदाहरण के द्वारा –अब अगर मां-बाप तंबाकू का सेवन स्वयं नहीं करते तो बच्चे के सामने उस के मां बाप की उदाहरण है। सीधी सी बात है इस तरह की स्ट्रिप खरीदने की बजाए अगर बच्चे के संस्कारों पर ध्यान दिया जाए तो ही बात बन सकती है।

और दूसरी बात कि असुरक्षित संभोग के दो दिन बाद अगर किसी को अपना एचआईव्ही स्टेट्स जानने की उत्सुकता हो रही है और उसे अगर दो-तीन दिन बाद पता भी चल गया तो कौन सा किला फतह हो गया –अगर उस का टैस्ट नैगेटिव आया तो यकीनन् वह अगले एनकांउटर के लिये कुछ दिनों बाद अपने आप को रोक नहीं पाएगा --- और अगर कहीं पॉज़िटिव निकला तो भी बहुत गड़बड़ी ...क्योंकि वॉयरस को रोकने के लिये जो दवाईयां उसे एक्सपोज़र के 24 घंटे के अंदर शुरू कर लेनी चाहिए थीं, उन का असर 48-72 घंटे के बाद उतना यकीनी नहीं हो पाता--- अब इस केस में देखें तो अगर वह इंसान किसी अनजबी के साथ असुरक्षित संबंध ( एक तो मुझे यह असुरक्षित शब्द से बड़ी चिढ़ हैं, लिखने समय ऐसे लगता है जैसे कि यह कोई मैकेनिकल प्रक्रिया है जो अगर अजनबी के साथ सुरक्षित ढंग से की जाए तो ठीक है जैसे कि चिकित्सा शास्त्रियों ने इस की खुली छूट दे दी हो...... ) लेकिन ऐसा तो बिल्कुल नहीं है, हाई-रिस्क बिहेवियर तो हाई-रिस्क ही है, आग का खेल है, कितना कोई बच लेगा !!

यह खबर पढ़ते हुये मैं यही सोच रहा था कि इस देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें पता नहीं कि उन्हें उच्च रक्तचाप है, उन्हें पता नहीं कि उन्हें मधुमेह है ...ऐसे में उस तरह ध्यान देने की बजाए अब उन की बच्चों की चोरियां पकड़ने की तरफ उन को रूख करके उन की परेशानियां बढ़ाई जाएं। लेकिन होता यही है जब कोई प्रोड्कट यहां लांच हो जाता है तो फिर शातिर मार्केटिंग हथकंड़ों के द्वारा उस की डिमांड तो पैदा कर ही ली जाती है, मुझे इसी बात का डर है।

कोई बात नहीं, निकोटिन च्यूईंग गम भी आई --- मुझे बहुत से लोगों ने कहा कि आप भी लिखा करें – लेकिन मैंने भी कभी नहीं लिखीं ...क्यों? महंगी होने के कारण मेरे मरीज़ों की जेब इस की इज़ाजत नही देती और दूसरा यह कि मुझे कभी अपने किसी मरीज़ के लिये इस की ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई --- अच्छे ढंग से समझाने से कौन नहीं समझता? पच्चीस पच्चीस साल हो गये हम यही बातें कहते सुनते ....अगर फिर भी कोई हमारे अपनेपन की बातें सुन कर तंबाकू की चुनौतिया, गुटखा या बीड़ी के बंडल को आपके सामने ही कचरादान में न फैंक के जाए तो समझ लीजिए हमारी काउंसिलिंग में ही कहीं कमी रह गई।

हां, तो मैं अपनी बात को यहीं कह कर विराम देता हूं कि हर क्षेत्र में हमारा प्रबंधन पश्चिम के प्रबंधन के अच्छा खासा अलग है...... हम जुगाडू किस्म की मानसिकता रखते हैं, प्यार से पुचकार के शाबाशी से थोड़ी डांट डपट से  हल्की फटकार से किसी को भी वापिस सही लाइन पर लाने की कुव्वत रखते हैं .....हम कहां अपने सीधे-सादे लोगों को इन महंगे महंगे शौकों की तरफ़ धकेल सकते हैं!!

भाषणबाजी बहुत हो गई, इसलिये जाते जाते इस महान देश की महान जनता को समर्पित एक गीत सुनते जाइये ...


Catch your kid smoking with this kit

Wednesday, March 10, 2010

कद बढ़ाने वाला सिरिप

जिस तरह आजकल लोग बड़े बड़े डिपार्टमैंटल स्टोरों में जा कर सैंकड़ों तरह की अनाप-शनाप कंज्यूमर गुड्स को देख देख कर परेशान हो हो कर कुछ न कुछ खरीदने में लगे रहते हैं, कैमिस्टों की दुकानों के काउंटरों पर जिस तरह से तरह तरह के टॉनिक और ताकत के कैप्सूल बिखरे रहते हैं और दुकान के ठीक बाहर जिस तरह से इस तरह की चीज़ों के विज्ञापन टंगे रहते हैं किसी भी आदमी का धोखा खा जाना कोई मुश्किल काम नहीं है।

मैं कल एक कैमिस्ट से एक दवाई खरीद रहा था -- कैमिस्ट ठीक ठाक ही लगता है-- इतने में एक आदमी अपने लगभग 13साल के बेटे के साथ आया और सिरिप की दो बोतलों को कैमिस्ट को लौटाते हुये कहने लगा कि उस ने जब इस बोतलों के बारे में ठीक से पढ़ा है तो उसे पता चला कि ये कद को लंबा करने के लिये नहीं हैं।

चूंकि उस ने वे बोतलें काउंटर पर ही रखी थीं तो उत्सुकतावश मैंने भी उन्हें देखा --- मैंने देखा कि अढ़ाई सौ रूपये के करीब एक बोतल का दाम था। मैंने देखा कि कैमिस्ट ने उस ग्राहक से ज़रा भी बहस नहीं की। ये दुकानदार भी बड़े प्रैक्टीकल किस्म के लोग होते हैं---ये मार्केटिंग स्किलज़ में मंजे होते हैं। झट से उस ने उस तरह की एक दूसरी शीशी उसे थमा दी।

अब दोष किस का है, मैं चंद लम्हों के लिये यह सोच रहा था। सब से पहले तो इस तरह की बोतलें कैसे किसी को भ्रमित करने वाली घोषणाएं कर सकती हैं कि इस से कद बढ़ जायेगा। चलिये, यह मान भी लिया जाये कि इस तरह की बोतलें मार्कीट में आ ही गईं। अब क्या कैमिस्ट का दोष है कि वह इस तरह के प्रोडक्ट्स बेच रहा है ---लेकिन फिर सोचा कि उस एक के हरिश्चन्द्र बन जाने से क्या होगा----साथ वाले ये सब बेचते रहेंगे तो वह पीछे रह जाएगा। यह भी सोचा कि क्या यह हमारी स्वास्थ्य प्रणाली का दोष है कि एक 40 साल के आदमी को यह समझ नहीं कि कद कोई शीशी पी लेने से नहीं बढ़ता।

तो, फिर दोष सब से ज़्यादा किस का ? सब से ज़्यादा दोष उस ग्राहक का जो इस तरह की शीशी खरीद रहा है--- और शायद इस के लिये उस की आधी-अधूरी शिक्षा ही ज़िम्मेदार है।

यह रात 9 बजे के आसपास की बात है --मैंने उस ग्राहक को मोटरसाइकिल को किक मारते देखा ---मुझे लगा कि वह टल्ली है। मैंने देखा कि उस ग्राहक के परिचित एक सरदार ने थोड़े मज़ाकिया से लहज़े में उसे इतना भी कहा ----की यार, कद वधान लई टॉनिक. लेकिन उस ग्राहक ने पुरज़ोर आवाज़ में कहा कि क्या करें, इस का कद बढ़ ही नहीं रहा है।

लेकिन मेरी बेबसी देखिये मैं सब जानते हुये भी चुप था। मुझे पता है कि इस शीशी से कुछ नहीं होने वाला----और ऐसे ही राह चलते बिना मांगी गई सलाह देना और वह भी किसी अजनबी को और वह भी उसे जो टल्ली लग रहा था और वह भी किसी कैमिस्ट की दुकान पर ही, इन सब के कारण मैं चुपचाप मूक दर्शक बना रहा। इस तरह के मौके पर कुछ कह कर कौन आफ़त मोल ले--- दूसरी तरफ़ से कुछ अनाप-शनाप कोई कह दे तो पंगा-----इसलिये मैं तो इस तरह की परिस्थितियों में चुप ही रहता हूं---पता नहीं सही है या गलत-----लेकिन क्या करें?

यह केवल एक उदाहरण है --सुबह से शाम तक इस तरह की बीसियों बातें सुनते रहते हैं, देखते रहते हैं---किस किस का ज़िक्र करें। हर एक को अपना रास्ता खुद ही ढूंढना पड़ता है।

आज लगभग पूरे चार महीने बाद लिख रहा हूं ----अच्छा लगा कि हिंदी में लिखना भूला नहीं ---वरना पिछले चार महीनों में जिस तरह से मैं अपने फ़िज़ूल के कामों में उलझा रहा, मुझे यह लगने लगा था कि अब कैसे लिखूंगा। चलिये, इसी बहाने यह जान लिया कि यह राईटर्ज़-ब्लॉक नाम का कीड़ा क्या है।

फिज़ूल के काम तो मैंने कह दिया --ऐसे ही हंसी में --लेकिन हम सब लिखने वालों के भी अपने व्यक्तिगत एवं कामकाजी क्षेत्र से जुड़े बीसियों मुद्दे होते हैं जिन पर लिखना या इमानदारी से लिख पाना हर किसी के बस की बात होती भी नहीं और मेरे विचार में इस तरह के विषयों पर नेट पर लाना इतना लाज़मी भी कहां है ?

Friday, November 13, 2009

कुपोषित बच्चे --- मध्यप्रदेश हो या पंजाब, की फ़र्क पैंदा ए !!

कल सुबह मैं बीबीसी की एक रिपोर्ट पढ रहा था ---यह भारत में कुपोषण का शिकार बच्चों के ऊपर थी। बेशक एक विश्वसनीय रिपोर्ट थी---यह पढ़ते हुये मुझे यही लग रहा था कि जिन बड़े लोगों को लाखों-करोड़ों रूपये रिश्वत में लेने की कभी न शांत होने वाली खुजली होती है या जो लोग इतनी ही बड़ी रकम के घपले कर के दिल के दर्द की बात कह कर बड़े बड़े अस्पतालों में भर्ती हो जाते हैं, उन्हें इस तरह की रिपोर्टें दिखानी चाहियें ---- शायद वे चुल्लू भर पानी ढूंढने लगें ---- लेकिन इन दिल के दर्द के मरीज़ों के पास दिल कहां होता है ?

यह रिपोर्ट पढ़ते हुये मेरा ध्यान अपने फुरसतिया ब्लॉग के श्री अनूप शुक्ल जी की तरफ़ जा रहा था --एक बार उन्होंने मुझे इ-मेल की थी कि उन्होंने मेरी तंबाकू वाली सचित्र पोस्टों के प्रिंट आउट अपने ऑफिस में लगा रखे हैं और इस से उन के ऑफिस में काम कर रहे बहुत से वर्करों को तंबाखू, गुटखा, पानमसाला छोड़ने की प्रेरणा मिलती है।

लेकिन इस देश से रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार को उखाड़ने के लिये क्या करना चाहिये --- मुझे लगता है कि जो लोग इस तरह से पैसा इकट्ठा करने में लगे रहते हैं उन के दफ्तरों में बड़ी बड़ी हस्तियों की तस्वीरें टांगने से तो कुछ नहीं होता ----सीधी सी बात है कि इन्हें इन तस्वीरों के बावजूद भी शर्म नहीं आती ----लेकिन ये इन तस्वीरों की आंखों ज़रूर झुका देते होंगे। अगर इस तरह की रिपोर्टों के प्रिट आउट सामन रखने में ऐसे लोगों को कोई झिझक महसूस हो तो कम से कम भ्रष्टाचार की आंधी में अंधे हो चुके ये लोग गांधीजी के उस कथन का ही ध्यान कर लिया करें ----जिस में उन्होंने कहा कि मैं तुम्हें एक तैलिसमैन ( Touchstone) देता हूं --जब भी आप कोई काम करने लगो तो देश के सब से गरीब आदमी की तस्वीर अपनी आंखों के सामने रख कर यह सोचो कि मेरा यह फैसला क्या उस अभागे आदमी का कुछ भला कर के उस की तस्वीर बदल सकता है ?

ऐसे रिश्वतखोरों के दफ़्तर में बीबीसी की इस रिपोर्ट के प्रिंट आउट उन के ऑफिस के पिन-अप बोर्ड पर या फिर टेबल के कांच के नीचे रखे होने चाहिये जिस पर कागज़ रख कर वे किसी बात के लिये अपनी सहमति देते हैं ---शायद इन बच्चों की तस्वीरें देख कर उन का मन बदल जाए।

रिपोर्ट में बड़ा हृदय-विदारक दृश्य बताया गया है ---यह भी नहीं है कि यह सब हम लोग पहले ही से नहीं जानते ---लेकिन बीबीसी संवाददाता ने जिस तरह से पास से इसे कवर किया है वह इन तथ्यों को अत्यंत विश्वसनीय बना देता है।

रिपोर्ट में मध्यप्रदेश की बात की गई है --- वहां पर एक करोड़ बच्चे हैं और जिन में से 50से 60प्रतिशत भूखमरी एवं कपोषण का शिकार हैं। इस बीमारी का इलाज करवा रहे बच्चों के पास संवाददाता गया। इस तरह के बच्चों का वर्णऩ भी इस रिपोर्ट में है जो कि इतने कमज़ोर हैं कि वे खाना न खाने/चबाने की हद तक लाचार हैं।

रिपोर्ट में साफ़ कहा गया है इस सब के लिये बहुत सी बातें जिम्मेदार हैं ---- पिछले कुछ सालों से सूखा पड़ा हुया है, भ्रष्टाचार है ----विभिन्न स्तरों पर है, इन बच्चों के लिये आने वाले राशन को इधर-करने पर भी इन सफेदपोश लुटेरों का दिल नहीं पसीजता----केवल इस लिये कि कुछ एफ.डी और जमा हो जाएं, कुछ शेयर और खरीद लिये हैं या फिर छोटी उम्र में ही बहुत से प्लॉट खरीद लिये जाएं ------लेकिन स्वर्ग-नरक यहीं हैं ----- ऐसे लोगों को बड़ी बड़ी बीमारियों से कोई भी बचा नहीं सकता क्योंकि अकसर इस तरह के स्मार्ट लोग इतने स्ट्रैस में जीते हैं कि सारी सारी उम्र की कमाई बड़े बड़े कार्पोरेट अस्पतालों को थमा कर इन्हें अपने पापों का प्रायश्चित तो करना ही पड़ता है।

हां, तो कल शाम मैं और मेरी मां अंबाला छावनी से जगाधरी की लोकल ट्रेन में सफ़र कर रहे था --- सामने वाली सीट पर एक दादी अपने दो पोतों के साथ बैठी हुई थी --- 13-14 साल की उम्र के थे वे दोनों लाडले। 50-55 मिनट का सफ़र है---लेकिन जब हम लोग गाड़ी में चढ़े तो उन्होंने ने बिस्कुटों का एक एक पैकेट पकड़ा हुआ था ----उस के बाद प्यारी दादी ने उन्हें ब्रैड-पकोडे खरीद कर दिये ---- अभी वे खत्म ही नहीं हुये थे कि दादी अम्मा ने अपने पिटारे से मठरीयां निकाल लीं और साथ में भुजिये का पैकेट पड़ा था और तली हुई मूंगफली बेचने वाले को भी दादी ने यूं ही जाने नहीं दिया ----इस के बाद बारी आई घर में बने रोटियों की नींबू के आचार के साथ खाने की।

कमबख्त नींबू के आचार के महक इतनी बढ़िया कि मेरी जैसे पास बैठे बंदे का जो दिल मितला रहा था वह उस की रूहानी खुशबू से ही ठीक हो गया। लेकिन दादी के बार बार मिन्नतें करने के बाद भी उन लाडले पोपलू बच्चों ने रोटी नहीं खाई ---- आखिर हार कर दादी खुद ही खाने लगीं। दादी उन्हें बार बार यह कहे जा रही थी कि गाड़ी में खाने का बहुत मज़ा आता है ( जिस से आप भी सहमत होंगे) और उस बेचारी ने तो इतना भी कहा कि साथ में वह उन को चाय भी दिला देगी ---- लेकिन उन दुलारों के पेट में जगह भी तो होनी चाहिये थे -----और वैसे भी जब इतनी लाडली दादी साथ तो भला कौन पड़े घर की रोटियों के चक्कर में !!

कल ही सुबह मध्यप्रदेश के बच्चे में कुपोषण की बातें पढ़ीं थीं और शाम को गाड़ी में मैं पंजाब-हरियाणा में कुपोषित बच्चे तैयार होने की प्रक्रिया देख कर यही सोच रहा था कि काश, लोग समझ लें कि बच्चों का यह खान-पान भी उन्हें कुपोषण की तरफ़ ही धकेल रहा है। दादी जी, फूल कर कुप्पा हो रहे बबलू-पपलू की सेहत पर थोड़ा सा रहम करो।

क्या इस तरह बच्चों को खाय-पिया लग जायेगा ?

हनी, हम लोग बच्चों को मार रहे हैं !!

वैसे, इस गाने में भी ये लोग अपने हिंदोस्तान की ही बात कर रहे हैं ना ?

Monday, November 9, 2009

सेहत का फंडा ---भाग 2.......इन बच्चों का क्या होगा ?

निर्धन से निर्धन और रईस से रईस के बच्चों को मिल चुका हूं ---इन्हें बिस्कुट के पैकेट, चिप्स, और तरह तरह के जंक फूड के प्यार ने एकता की माला में पिरो कर रखा हुआ है।
यह भी मैंने देखा है कि कारण कोई भी हो मां बाप इस के लिये ज़्यादा टैंशन लेते नहीं हैं और मूर्खता की हद तब दिखती है जब बड़ी शेखी बघेरते हुये हम से ही यही कहते हैं कि इसे तो बस बिस्कुट ही पसंद हैं, जब भी खाता है पूरा पैकेट तुरंत खत्म कर देता है। यह क्या है ? ---- शर्तिया तौर पर मोटापा, ब्लड-प्रैशर, मधुमेह जैसी बीमारियों को आमंत्रण है और क्या है ?
एक बात और बहुत नोटिस की है कि अकसर लोग बिस्कुटों को जंक-फूड में शामिल नहीं करते, लेकिन ऐसी बात नहीं है --- दिन में एक दो बिस्कुट खाने की बात और है और पूरा पूरा पैकेट लपेट लेना कहां की अकलमंदी है ? अब अगर बच्चे पूरा पूरा पैकेट खाने लगेंगे तो खाने के लिये कहां से जगह बचेगी और हो भी यही सब कुछ ही रहा है ।
मुझे बड़ी खीझ होती है कि जब इन्हीं बच्चों के अभिभावक यही कहते हैं कि हमें तो यही लगता है कि बच्चा है ,इस के खाने के यही दिन हैं ---क्या फर्क पड़ता है। लेकिन बहुत फर्क पड़ता है क्योंकि खाने पीने की सारी अच्छी बुरी आदतों की शुरूआत ही इसी उम्र में ही होती हैं।
एक समस्या और भी है कि हमारे यहां दुकानदारों ने एक अच्छा ब्रॉंड तो शायद ही रखा हो लेकिन चालू किस्म के लोकल ब्रांड के बिस्कुटों के दर्जनों ब्रांड इन के यहां मिल जायेंगे।
बिस्कुटों की इतनी खिंचाई होते देख आप को लगता होगा कि क्या डाक्टर बिस्कुट नहीं खाता होगा ? --- ऐसा नहीं है कि मैं नहीं खाता, खूब खाये हैं, पहले इतना कहां लोग सोचा करते थे --खास कर बेकरी वाले बिस्कुट मुझे बहुत ही पसंद हैं। लेकिन वैसे 40 की उम्र पार करने पर बहुत कुछ सोचना ही पड़ता है ----मैं बेकरी वाले बिस्कुट नहीं खाता ---क्योंकि तरह तरह की मिलावटों के बारे में पढ़ कर मन इतना भर चुका है कि जब इन्हें खाने की तलब लगती है तो बेकरियों द्वारा इन के बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले घी के बारे में सोच लेता हूं तो अपने आप तलब शांत हो जाती है ।
कुछ लोग यह भी कह देते हैं कि उस में क्या है, हम लोग अपने सामने अपने मैटीरियल से बेकरी से बिस्कुट तैयार करवा लेते हैं ----शायद यह अच्छा विकल्प है लेकिन फिर भी 35-40 से ऊपर वाली उम्र के लोग इस तरह के पदार्थ जो घी, चीनी भरे होते हैं उऩ से थोड़ा सा बच कर रहा जाये तो ठीक ही लगता है, आप क्या सोच रहे हैं ?
अब तो मैं केवल ब्रिटॉनिया मैरी जैसे एक-दो बिस्कुट ही लेता हूं और मेरे बहुत से डाक्टर मित्र भी यही लेते हैं --- यह कोई पब्लिसिटी शटंट नहीं है --- यह बिस्कुट वैसे ही बहुत हल्का फुल्का है और ब्रिटॉनिया की क्वालिटी के बारे में तो आप जानते ही हैं !!
मुझे इस बात की भी बहुत फिक्र होती है कि जब लोग यह बताते हैं कि उन के बच्चे दालों, सब्जियों से दूर भागते हैं ---- यह अपने आप में एक बहुत ही ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण बात है --- यह एक ऐसी बात है कि जिस के लिये इन बच्चों के मां-बाप को शोक मनाना चाहिये क्योंकि ऐसे अधिकांश केसों में ऐसा होता है कि इस तरह के बच्चे बड़े होकर भी फिर पिज़्जा, बर्गर, हॉट-डॉग, हाका-नूडल्स पर ही पलते हैं और तरह तरह की शारीरिक व्याधियों के शिकार हुये रहते हैं।
हमारे सारे स्वाद बचपन में ही डिवेल्प होते हैं ----इसलिये यह बहुत ही ज़रूरी है कि हम बच्चों में सब दालों सब्जियों को स्वाद डिवेल्प करवायें। मुझे याद है कि मैं बचपन में केवल करेला खाने में थोड़ा नाटक किया करता था ----इतना बड़ा होने के बाद भी मुझे करेला कभी भी अच्छा नहीं लगा -----कभी कभी एक-दो खा तो लेता हूं लेकिन बस मजबूरी में।
बच्चे स्कूल की कैंटीन से जंक-फूड लेकर खाते रहते हैं ----कुछ अच्छे स्कूलों में तो अब कैंटीनें होती ही नहीं हैं लेकिन बच्चों को घर से भी दिया जाने वाला खाना सेहतमंद होना चाहिये ----लंच-बाक्स में बिस्कुट, चिप्स, भुजिये का क्या काम !!
सोच रहा हूं कि सेहत के फंडे में जितनी बातें पाठकों से शेयर करूंगा वे सभी मैं अपने आप से भी करूंगा, दोहराऊंगा और इंटरोस्पैक्शन करने का अवसर भी मिलता रहेगा कि कहीं दीपक के तले ही अंधेरा तो नहीं है।

Friday, September 18, 2009

ताकत की दवाईयां --कितनी ताकतवर ?

अगर ताकत की दवाईयों में ज़रा सी भी ताकत होती तो चिकित्सक सब से ज़्यादा ताकतवर होते -- लेकिन ऐसा नहीं लगता। जब दिन में कितने ही मरीज़ किसी डाक्टर से यह पूछें कि डाक्टर साहब, ताकत के लिये भी कुछ लिख दीजिये, तो खीज की बजाए दया आती है इस तरह के प्रश्न करने वाले पर।
क्योंकि सच्चाई तो यही है कि इन ताकत की दवाईयों में ताकत होती ही नहीं हैं ---- पहले तो हम लोग यह ही नहीं जानते कि आम आदमी की ताकत की परिभाषा क्या है और यह ताकत वाली दवाई आखिर किस बला का नाम है।

जहां तक मुझे याद है इस ताकत की दवाई का इश्तिहार हम लोग पांचवी-छठी कक्षा में दीवारों पर लिखा देखा करता थे --- क्या ? ताकत के लिये मिलें ---फलां फलां हकीम से।

यह कौन सी ताकत की बात होती होगी यह आप जानते ही हैं --वैसे भी हिंदी के कुछ अखबारों में आजकल इस तरह के विज्ञापन बिछे रहते हैं।

लेकिन यहां पर हम ताकत के इस मसले की बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि ये सब बातें पहले काफी हो चुकी हैं। तो फिर आज एक दो कुछ और बातें करते हैं।

इतनी सारी महिलायें कमज़ोरी की शिकायत करती हैं और दूसरी दवाई के साथ कुछ ताकत के लिये भी लिखने के लिये कहती हैं। लेकिन लिखने वाला ज़्यादातर केसों में जानता है कि ये सब ताकत के कैप्सूल, गोलियां दिखावा ही है ---इन से कुछ नही ं होने वाला। हां, अगर महिला में खून की कमी (अनीमिया ) है और उस की तरफ़ ध्यान दिया जाये, उस के शरीर में कैल्शीयम की कमी को पूरा करने की बात हो तो ठीक है, वरना ये तथाकथित ताकत के कैप्सलू, टीके, टैबलेट क्या कर लेंगी ---- केवल मन को दिलासा देने के लिये बस ये सब ठीक हैं।

कुछ मातायें बच्चों के लिये टॉनिक की फरमाईश करती हैं ---- और आप को देखने पर लगता है कि बच्चा तो ठीक ढंग से खाना भी न खाता होगा। ऐसे में क्या करेंगे टॉनिक ?

लेकिन समस्या कुछ हद तक अब यह है कि ये ताकत की दवाईयां अब लोगों के दिलो-दिमाग पर इस कद्र छा चुकी हैं कि इन के बारे में ज़्यादा सच्चाई भी इन्हें नहीं पचती। अगर उन्हें इतनी लंबी चौड़ी नसीहत पिलाने की कोशिश भी की जाती है तो डाक्टर के चैंबर के बाहर जाकर वे उस नसीहत को थूक देते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो लोगों में इन ताकत की शीशियों, इंजैक्शनों एवं कैप्सूलों के बारे में ऐसी राय न देखने को मिलती जैसी कि आज दिख रही है।

अगली पोस्ट में देखेंगे कि आखर ताकत की दवाईयों से भला ताकत ही क्यों गायब है और इस के साथ साथ यह भी जानना होगा कि आखिर ये ताकत की दवाईयां किस बला का नाम है !!

संबंधित पो्स्टें ......

Saturday, July 18, 2009

शॉपिंग माल में चोरी करते ये बच्चे

अभी अभी बाज़ार से लौट कर आया हूं --मूड बहुत खराब है। एक शॉपिंग माल के अंदर दाखिल होते ही देखा कि छः-सात साल के दो बच्चों ने एक दूसरे के कान पकड़े हुये थे और उस शॉपिंग माल के तीन-चार कर्मचारी उन को घेरे खड़े थे। शुरू शुरु में तो लगा कि शायद कोई हंसी मज़ाक चल रहा है, लेकिन जब बच्चों की रोने की आवाज़ सुनी तो मैंने अपनी पत्नी को कहा कि मैं देखता हूं।
मैंने जाते ही कहा --- बस करो भई, बहुत हो गया। तब उस माल का एक कर्मचारी कहने लगा कि इस तरह के बच्चे रोज़ चोरी करते हैं। इन दोनों ने अपनी जेबों में चाकलेटें ठूंस रखी थीं और हम ने कैमरे की मदद से इन का यह काम पकड़ लिया, इसलिये इन्हें यह सज़ा दे रहे हैं। वह कर्मचारी कहने लगा कि इसी तरह की चोरियों की वजह से हमारे सारे कर्मचारियों को हर महीने अपनी तनख्वाह से एक हज़ार रूपये कटवाने पड़ते हैं।
मैंने उन्हें कहा कि चलो, छोड़ो अब इन को --- छोटे हैं। मैंने सुरक्षा वाले को कहा कि इन के लिये कुछ पैसे वैसे भरने हैं तो मैं तैयार हूं। उसने कहा कि नहीं, सामान तो हम ने वापिस करवा लिया है, इन्हें अब छोड़ भी देंगे। फिर मेरी पत्नी ने भी उन से बात करी ---- उन में से एक लड़के ने बताया की बाहर एक लड़का खड़ा था जिस के कहने पर हम यह काम कर रहे थे।
मेरा मूड इतना खराब हुया कि मैं बता नहीं सकता --- मैं एक डिओडोरैंट की शीशी शापिंग-बास्कट में डालते हुये यही सोच रहा था कि मेरी डिओडोरैंट से कहीं ज़्यादा ज़रूरत बच्चों को चाकलेट की होती है। वैसे हो भी क्यों नहीं, जब मैं इस उम्र में चाकलेट के लिये मचल जाता हूं तो फिर बच्चों की तो बिसात ही क्या है !
मैं पिछले एक घंटे से यही सोच रहा हूं कि आखिर कसूरवार कौन ? --शॉपिंग माल में जो दो छोटे छोटे बच्चे ये काम कर रहे थे इस के लिये असली कसूरवार कौन है ? मैं तो इस का जवाब ढूंढ पाने में असमर्थ हूं --- मुझे लगता है कि मेरा दिल मेरे दिमाग से हमेशा ज़्यादा काम करता है।
जिस रोड़ से वापिस हम लोग घर लौट रहे थे उस की हालत देख कर यही सोच रहा था कि इस के जितने खड्ढे हैं ये भी चीख चीख कर किसी न किसी की इमानदारी के किस्से ब्यां कर रहे हैं, जो लोग एटीएम में नकली नोट डालते हैं उन्हें आप क्या कहेंगे, स्मार्ट या कुछ और----------- मैं देख रहा था कि उन दो मासूम बच्चों को पकड़ कर उस माल का सारा स्टाफ आपस में और दूसरे ग्राहकों को यह किस्सा इस तरह से सुना रहे थे जैसे कि उन्होंने 26नवंबर के बंबई के उग्रवादी हमले के दोषियों को पकड़ लिया हो।
पता नहीं मुझे यह सब देख कर बहुत ही ज़्यादा दुःख हुया। लेकिन फिर भी मैंने बाहर आते आते घर में सो रहे अपने बच्चों के लिये दो चाकलेट उस शापिंग बास्केट में डाल दीं।
चलो, मेरी पसंद का यह गाना सुनते हैं -----

Friday, March 13, 2009

बच्चों में पहली पक्की जाड़ क्यों इतनी जल्दी खराब हो जाती है ?

हम लोगों को अपने कालेज के दिनों से ही इस बारे में बहुत सचेत किया जाता था कि बच्चों की पहली पक्की जाड़ ( First permanent molar) को टूटने से कैसे भी बचा लिया करें। अकसर अपनी ओपीडी में बहुत से बच्चे दांतों की तरह तरह की बीमारी से ग्रस्त देखता हूं। लेकिन मुझे सब से ज़्यादा दुःख तब होता है जब मैं किसी ऐसे बच्चे को देखता हूं जिस की पहली पक्की जाड़े इतनी खराब हो चुकी होती हैं कि उन का उखाड़ने के इलावा कुछ नहीं हो सकता।

इस तस्वीर में भी आप देख रहे हैं कि इस 15 साल के बच्चे के बाकी सारे दांत तो लगभग दुरूस्त ही हैं लेकिन इस की नीचे वाली पहली पक्की जाड़ पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है जिस का निकलवाने के इलावा कुछ भी नहीं हो सकता। आप इस फोटो में यह भी देख रहे हैं कि इस की बाईं जाड़ में भी दंत-क्षय (dental caries) की शुरूआत हो चुकी है।

क्यों हो जाते हैं बच्चे के स्थायी दांत इतनी जल्दी खराब इस का कारण यह है कि बच्चों में ये स्थायी पहली पक्की जाड़ें ( First permament molar –total four in number, one in each oral quadrant) जिन की संख्या कुल चार ---ऊपर एवं नीचे के जबड़े के दोनों तरफ़ एक एक जाड़ होती है—यह जाड़ बच्चों में मुंह में लगभग छः साल की उम्र में आ जाती हैं।

क्योंकि इस छः साल की अवस्था तक बच्चे के मुंह में ज़्यादातर दांत एवं जाड़ें दूध (अस्थायी) की होती हैं --- इसलिये अकसर बच्चों की तो छोड़िये अभिभावक भी इस जाड़ को इतनी गंभीरता से लेते नहीं हैं ----वास्तव में उन्हें यह पता ही नहीं होता कि बच्चे के मुंह में पहली पक्की जाड़ आ चुकी है।

तो ऐसे में अकसर बच्चे के मुंह में यह जाड़ दूसरे अन्य दंत-क्षय़ दांतों के साथ पड़ी रहती है --- और जिन कारणों से दूध के दांत बच्चे के खराब हुये वही कारण अभी भी बच्चे के लिये मौजूद तो हैं ही –इसलिये अकसर बहुत बार इस पक्की जाड़ को भी दंत-क्षय लग जाता है जिसे आम भाषा में कह देते हैं कि दांत में कीड़ा लग गया है। वैसे तो मां-बाप को इस पक्की जाड़ के मुंह में आने के बारे में पता ही नहीं होता इसलिये जब बच्चे के मुंह में काले दाग-धब्बे से देखते हैं या बच्चा इस जाड़ में कैविटी ( सुराख) होने के कारण खाना फंसने की बात करता है तो इस तरफ़ इतना ध्यान नहीं दिया ----और यही सोच लिया जाता है कि अभी तो तेरे दूध के दांत हैं, ये तो गिरने ही हैं, और इस के बाद पक्के दांत जब आयेंगे तो दांतों का पूरा ध्यान रखा करो, वरना आने वाले पक्के दांत भी ऐसे ही हो जायेंगे। बस, ऐसा कह कर छुट्टी कर ली जाती है।

एक बहुत ही विशेष बात ध्यान देने योग्य है कि दंत-क्षय एक बार जिस दांत या जाड़ में हो जाता है वह तब तक उस दांत में आगे बढ़ता ही जाता है जब तक या तो किसी दंत-चिकित्सक के पास जा कर उचित इलाज नहीं करवा लिया जाता ---वरना इस दंत-क्षय की विनाश लीला उस दांत या जाड़ की नस तक पहुंच कर उस को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। अब इस अवस्था में या तो उस पक्की जाड़ का लंबा-चौड़ा रूट कनाल ट्रीटमैंट का इलाज किया जाये जो कि अधिकांश अभिभावक विभिन्न कारणों की वजह से करवा ही नहीं पाते ------और कुछ ही समय में इस दंत-क्षय की वजह से उस पहली पक्की जाड़ का हाल कुछ ऐसा हो जाता है जैसा कि आप इस बच्चे की मुंह की फोटो में देख रहे हैं ---यह बच्चा मेरे पास कल आया था ----इसे निकालने के इलावा कोई रास्ता रह ही नहीं जाता।
अगर आप ध्यान से इस तस्वीर की दूसरी तरफ़ भी देखें तो आप नोटिस करेंगे कि दूसरी तरफ़ की पहली जाड़ में भी दंत-क्षय जैसा कुछ लग चुका है ---इसलिये उस का भी उचित होना चाहिये ताकि वह पहली जाड़ भी दूसरी तरफ़ वाली पहली जाड़ की तरह अज्ञानता की बलि न चढ़ जाये।

वैसे , बच्चों को दांत दंत-क्षय से मुक्त रखने के लिये इतना करना होगा कि किसी भी अच्छी कंपनी की फ्लोराइड-युक्त टुथपेस्ट से रोज़ाना दो बार –सुबह एवं रात को सोने से पहले – दांत तो साफ़ करने ही होते हैं और जुबान साफ़ करने वाली पत्ती से ( tongue-cleaner)नित-प्रतिदिन जिव्हा को साफ़ किया जाना बहुत ही , अत्यंत ज़रूरी है । और एक बार और भी बहुत ही अहम् यह है कि हर छः महीने के बाद सभी बच्चों का किसी प्रशिक्षित दंत-चिकिस्तक द्वारा निरीक्षण किया जाना नितांत आवश्यक है।

दंत चिकिस्तक को नियमित दांत चैक करवाने से ही पता चल सकता है कि कौन से दांतों में थोड़ी बहुत खराब शुरू हो रही है ----और फिर तुरंत उस का जब इलाज कर दिया जाता है तो सब कुछ ठीक ठाक चलता रहता है -----वरना अगर आठ-दस की उम्र में ही पक्के दांत एवं जाड़े ( permanent teeth) उखड़नी शुरू हो जायेंगी तो बच्चा तो थोड़ा बहुत सारी उम्र के लिये दांतों के हिसाब से अपंग ही हो गया ना ----- ध्यान रहे कि हमारे मुंह में मौजूद एक एक मोती अनमोल है लेकिन यह पक्की पक्की जाड़ तो कोहेनूर से भी ज़्यादा कीमती है क्योंकि हमारे मुंह की बनावट में, मुंह में इस के द्वारा किये जाने वाले काम हैं ही इतने ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कि अन्य दांतों के साथ साथ इस की भी पूरी संभाल की जानी चाहिये।

एक बात का ध्यान और आ रहा है कि बच्चों के दांत एवं जाड़ें आप जब देखें तो इस तरह का अनुमान स्वयं न ही लगायें कि यह तो दूध की लगती है या यह पक्की लगती है ----अभिभावकों द्वारा लगाये ये अनुमान अकसर गलत ही होते हैं ----इसे केवल एक प्रशिक्षित दंत-चिकिस्तक ही बता सकता है कि कौन से दांत गिरने हैं और कौन से पक्के वाले हैं----इसलिये उस की शरण में चले जाने में ही बेहतरी है, आप के बच्चे की भलाई है।

Tuesday, March 3, 2009

बचपन में एक बार हुआ गला खराब बना सकता है दिल का रोगी ...



ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों के इस्तेमाल के बारे में बार बार लोगों को सचेत किया जाता है कि आम छोटी मोटी तकलीफ़ों के लिये इन्हें इस्तेमाल न किया करें लेकिन पांच से पंद्रह साल के बच्चे का अगर गला खराब हो तो तुरंत ऐंटिबॉयोटिक दवाईयों का कोर्स पूरा कर लेने में ही समझदारी है क्योंकि कईं बार एक बार यूं ही खराब हुआ गला सारी उम्र के लिये उस बच्चे को दिल का रोगी बना सकता है।

मैं जिस हास्पीटल में कुछ साल पहले काम किया करता था वहां पर रजिस्ट्रेशन काउंटर के पास ही एक बहुत बड़ा पोस्टर लगा हुआ था कि पांच से पंद्रह साल के बच्चे का अगर गला खराब हो तो उस का ठीक से इलाज करवायें वरना इस से दिल का रोग हो सकता है। दोस्तो, अगर किसी को देर उम्र में किसी अन्य कारण से दिल का रोग हो जाता है तो लोग शायद थोड़ा सब्र कर लेते हैं ---क्योंकि अकसर ऐसे केसों में थोड़ी बहुत जीवन-शैली में किसी चीज़ की कमी रह गई होती है । लेकिन अगर किसी व्यक्ति को बीस-तीस साल की उम्र में ही दिल का कोई गंभीर रोग हो जाये और उस के पीछे कारण केवल इतना सा हो कि बचपन में एक बार गला खराब हुआ था जिस का समुचित इलाज नहीं करवाया गया था ----तो उस मरीज़ को एवं उस के अभिभावकों को कितना बुरा लगता हो , शायद इस की हम लोग ठीक से कल्पना भी नहीं कर सकते।

मुझे याद है कि जिन दिनों मैडीकल कालेज के मैडीसन के प्रोफैसर साहब ने हमें 1982 में इस बीमारी के बारे में पढ़ाया था तो अगले कुछ दिनों के लिये मैंने भी एक चिंता पाले रखी थी ---क्योंकि मुझे याद था कि बचपन में मेरा भी दो-चार बार गला तो बहुत खराब हुआ था , गले में इतना दर्द कि थूक निगलना भी मुश्किल था---जबरदस्त दर्द !! मेरे से ज़्यादा परेशान मेरे स्वर्गीय पिता जी हो जाया करते थे --- थोड़ा थोड़ा डांट भी दिया करते थे कि स्कूल से टाटरी वाला चूर्ण खाना बंद करोगे तो ही ठीक रहोगे । साथ में किसी कैमिस्ट से दो-चार खुराक कैप्सूल –गोली की ले आते थे और उसे खाने पर एक-दो दिन में ठीक सा लगने लगता था- याद नहीं कभी पूरा कोर्स किया हो।

दोस्तो, जब हम लोग बच्चे थे तो कभी किसी तकलीफ़ के लिये किसी विशेष डाक्टर के पास जाने का इतना रिवाज कम ही था --- इस के बहुत से कारण हैं जो कि मेरे लिखे बिना ही समझ लिये जायें। पता ही नहीं तइतना डर क्यों था कि पता नहीं कितना खर्च हो जाये, कितने पैसे मांग ले ----- और दूसरी बात है कि लोगों इतने ज़्यादा सचेत नहीं थे । चलिये जो भी था, ठीक था, कभी कभी अज्ञानता वरदान ही होती है ----- कम से कम अपने आप से यह कह कर मन को समझाया तो जा ही सकता है।

एक बार तो मैं हिम्मत कर के अपने मैडीसन के प्रोफैसर साहब, डा तेजपाल सिहं जी के पास पहुंच ही गया कि सर, मेरे को भी बचपन में गला खराब तो हुआ था, दवा बस एक-दो दिन ही ली थी , अब जब मैं साइकिल को चलाता हुआ पुल पर चढ़ता हूं तो मेरी सांस फूलने लगती है। मुझे याद है उन्होंने मुझे अच्छे से चैक करने के बाद कहा कि सब ठीक है ---इसे सुन कर मुझे बहुत सुकून मिला था।

अच्छा तो अपनी बात हो रही थी कि पांच से पंद्रह साल के बच्चों का जब गला खराब हो उस का तुंरत इलाज किया जाना बहुत ही ज़रूरी है --- इस का कारण यह है कि कईं बार जिस स्ट्रैपटोकोकाई बैक्टीरिया ( streptococci bacteria) की एक किस्म के कारण की वजह से यह गला खराब होता है – हिमोलिटिक स्ट्रैपटोकोकाई ( haemolytic streptococci) --- उस का अगर तुंरत किसी प्रभावी ऐंटिबॉयोटिक से उपचार नहीं किया जाये तो मरीज़ को रयूमैटिक बुखार हो जाता है --- Rheumatic fever – हो जाता है। इस बुखार के दौरान जोड़ों में दर्द भी होता है ----लोग अकसर इस का थोड़ा बहुत इलाज करवा लेते हैं लेकिन शायद इस बात को भूल सा जाते हैं और इस का कभी ज़िक्र ही किसी से नहीं होता। लेकिन जब वही बच्चा बीस-तीस साल की उम्र में पहुंचता है तो जब उस की अचानक सांस फूलने लगती है ---हालत इतनी खराब हो जाती है कि वह थोड़ा भी चल नहीं पाता तो किसी फिजिशियन के द्वारा चैक-अप करने से पता चलता है कि उसे तो रयूमैटिक हार्ट डिसीज़ ( Rheumatic heart disease) हो गई ---- उसे के दिल के वाल्व क्षतिग्रस्त हो चुके हैं --- ( valvular heart disease) --- तो उस की दवाईयां आदि शुरू तो की जाती हैं ---- आप्रेशन भी करवाना होता है -----कहने का भाव उस की ज़िंदगी बहुत अंधकारमय हो जाती है – कहां सब लोग आप्रेशन का खर्चा उठा पाते हैं, इतनी इतनी दवाईयां खरीदने कहां सब के बस की बात है ----- बहुत दिक्कतें हो जाती हैं , आप्रेशन जितने समय तक मरीज को ठीक रख पायेगा उस की भी समय सीमा है। पचास साल की उम्र तक पहुंचते पहुंचते ये इसी दिल की बीमारी की वजह से अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं।

मैं अपने हास्पीटल के फिज़िशियन डा हरदीप भगत से इस तकलीफ़ के बारे में कल ही बात कर रहा था ----वह भी यही कह रहे थे कि बच्चों का हर स्ट्रैपटोकोकल सोर थ्रोट ( streptococcal sore throat) केस ही रयूमैटिक बुखार की तरफ़ रूख कर लेगा ---- यह बात नहीं है ---लगभग दो फीसदी स्ट्रैपटोकोकल सोर थ्रोट के केसों में ही यह रयूमैटिक बुखार वाली जटिलता उत्पन्न होती है लेकिन दोस्तो, सोचने वाली बात तो यही है कि जब मैडीकल फील्ड में इस की पूरी जानकारी है कि बच्चों के गले खराब होने के बाद यह कंपलीकेशन हो सकती है तो कोई भी डाक्टर इस तरह का जोखिम पांच से पंद्रह साल की उम्र के बच्चे के साथ लेता ही नहीं है। इसलिये तुरंत उस के लिये चार-पांच दिन के लिये एक ऐंटीबॉयोटिक कोर्स शुरू कर दिया जाता है ।

वैसे हम लोगों के लिये यह कह देना कितना आसान है कि बच्चों के इस आयुवर्ग में गले खराब के लगभग दो फीसदी केसों में यह समस्या उत्पन्न होती है -----क्या करें , आंकड़े अपनी जगह हैं , यह भी तो ज़रूरी हैं लेकिन बात यह भी तो अपनी जगह कायम है कि जिस किसी के बच्चे को यह रोग हो जाता है उस के लिये तो इस का आंकड़ा दो-प्रतिशत न रह कर पूरा शत-प्रतिशत ही हो जाता है।

अब प्रश्न यह पैदा होता है कि किसी पांच से पंद्रह साल के बच्चे का जब गला खराब हो तो पता कैसे चले कि इस के पीछे उस हिमोलिटिक स्ट्रैपटोकोकाई जीवाणुओं का ही हाथ है --- इस के लिये बच्चे के गले से एक स्वैब ले कर उस का कल्चर- टैस्ट करवाया जाता है। लेकिन अकसर ऐसा प्रैक्टिस में मैं कम ही देखता हूं कि लोगों को बच्चे के खराब गले के लिये इस टैस्ट को करवाने के लिये कहा जाता है -----अकसर डाक्टर लोग किसी बढ़िया से ब्रॉड-स्पैक्ट्रम ऐंटिबॉयोटिक का चार पांच दिन का कोर्स लिखने में ही बेहतरी समझते हैं और मेरे विचार में यह बात है भी बिल्कुल उचित है। फिज़िशियन अथवा शिशुरोग विशेषज्ञ अपने फील्ड में इतने मंजे हुये होते हैं कि उन्हें मरीज़ की हालत देख कर ही यह अनुमान हो जाता है कि इस केस में ऐंटीबॉयोटिक दवाई का पूरा कोर्स देने में ही भलाई है।

मुझे इस तरह के मरीज़ों के इलाज का कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है लेकिन मैं एक मैडीकल राइटर होने के नाते इतनी सिफारिश ज़रूर करूंगा कि पांच से पंद्रह साल के बच्चे का अगर गला खराब है, गले में दर्द है , और लार निगलने में दिक्तत हो रही है , साथ में बुखार है तो तुरंत अपने फैमिली डाक्टर से अथवा किसी शिशु-रोग से मिल कर खराब गले को ठीक करवाया जाये ----- दोस्तो, यह केवल खराब गले की ही बात नहीं है, यह उस बच्चे की सारी लाइफ की बात है ---- कितनी बार किसी बच्चे का इस तरह का गला खराब होता है -----शायद बहुत कम बार, लेकिन ज़रूरत है तुरंत उस के इलाज की । उस समय अपनी सूझबूझ लगाना कि यह तो जुकाम की वजह है या यह तो इस ने यह खा लिया या वह खा लिया इसलिये किसी डाक्टर के परामर्श करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है , यह बात बिल्कुल अनुचित है। क्योंकि वह दो-फीसदी वाली बात कब किसी के लिये शत-प्रतिशत बन जाये , यह कौन कह सकता है !!

यह बात बिलकुल सही है कि इस आयुवर्ग में अधिकतर गले खराब के मामले वायरसों की वजह से ही होते हैं जिन की वजह से रियूमैटिक बुखार का जोखिम भी नहीं होता और इन के इलाज के लिये ऐंटीब़ॉयोटिक दवाईयां कारगर भी नहीं होतीं लेकिन वही बात है कि जैसी स्थिति चिकित्सा क्षेत्र की है – न तो मरीज़ अपने गले से स्वैब का कल्चर करवाने का इच्छुक है, और न ही इस की इतनी ज़्यादा सुविधायें उपलब्ध हैं इसलिये बेहतर यही है कि तुरंत अपने डाक्टर से मिल कर उस की सलाह अनुसार किसी प्रभावी ऐंटिबॉयोटिक कोर्स शुरू कर लिया जाये।

वैसे ग्रुप-ए स्ट्रैप्टोकोकल फरंजाईटिस( pharyngitis--- वही आम भाषा में गला खराब) – के लक्षण इस प्रकार हैं ---- अचानक गले में दर्द शुरू हो जाना, लार निगलते वक्त भी दर्द होना, और 101 डिग्री से ऊपर बुखार। बच्चों में तो सिरदर्द, पेट दर्द, दिल कच्चा होना( मतली लगना) और उल्टी भी हो सकती है। अगर यह इंफैक्शन रयूमैटिक बुखार की तरफ़ बढ़ जाती है तो इस के लक्षण हो सकते हैं --- बुखार, दर्दनाक, सूजे हुये जोड़, जोड़ों में ऐसा दर्द जो एक जोड़ से दूसरे जोड़ की तरफ़ चलता है, दिल की धड़कन का बढ़ जाना( palpitations), छाती में दर्द, सांस फूलने लगती है , चमड़ी पर छपाकी सी निकल आना ।

यह मुझे बैठे बिठाये आज इस विषय का ध्यान कैसे आ गया ---- क्योंकि दो एक दिन पहले मैं एक न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ रहा ता कि हमारे जैसे देशों में तो यह रोग है लेकिन अब अमेरिका जैसे अमीर देशों में भी इन ने अपना सिर फिर से उठाना शुरू कर दिया है।

Sunday, January 25, 2009

हनी, हम बच्चों को तबाही की तरफ़ धकेल रहे हैं !


इस समय मेरे सामने बच्चों के एक जंक-फूड का रैपर पड़ा हुआ है जिस के ऊपरी लिखी सूचना पढ़ कर मुझे डिस्कवरी चैनल के उस बहुत ही लोकप्रिय प्रोग्राम का ध्यान आ रहा है --- Honey, we are killing the kids !!
Ingredients के आगे लिखा हुआ है ----Rice meal, Edible oil, Corn Meal, Gram Meal, Spices, Condiments and Salt.

और इस के आगे एक बहुत ही बड़ी स्टैंप लगी हुई है कि नो एमएसजी, ज़ीरो ट्रांसफैट्स एवं कोलेस्ट्रोल फ्री ( No Added MSG, Zero Trans Fats, Cholesterol free) ---- अब इन शातिर कंपनियों को पता है कि पब्लिक को कैसे उल्लू बनाना है – चलो मान भी लिया कि कंपनी ने इस पैकेट में MSG ( Monosodium glutamate ---जिसे आमतौर पर रेहड़ी वाले चीनी नमक कह कर बहुत फख्र महसूस कर लिया करते हैं ), लेकिन यह कोलैस्ट्रोल फ्री वाली बात तो मेरी समझ में कभी आई नहीं कि आखिर यह कैसे हो सकता है कि इस तीस ग्राम के पैकेट में अगर लगभग 12 ग्राम वसा है तो यह भला कौन सा जादू हो गया कि फिर भी यह कोलैस्ट्रोल फ्री है।

इस पांच रूपये के पैकेट पर लिखी बाकी जानकारी कुछ इस प्रकार की थी --- कुल वजन 30 ग्राम
प्रत्येक 16 ग्राम उत्पाद में निम्नलिखित इन्ग्रिडिऐंट्स हैं –
कैलीरीज़ – 92.6
टोटल फैट – 5.8 ग्राम
कोलैस्ट्रोल - ज़ीरो मिलिग्राम ( कंपनी के लिये ज़ोर ज़ोर से तालियां मारने की इच्छा हो रही है !!----इतना बहादुरी का काम कर दिया !!)
टोटल कार्बोहाइड्रेट – 8.48 ग्राम
प्रोटीन – 1ग्राम

तो, सीधा सीधा इस का मतलब यह हुआ कि जब किसी ने यह पांच रूपये का पैकेट खा लिया तो उस ने बिना वजह स्वाद स्वाद के चक्कर में या यूं कह लें कि अपने मां-बाप के लाड के चक्कर में बिल्कुल कोरी सी 200 कैलोरी अपने अंदर फैंक दीं।

और ध्यान दें कि लगभग आधी कैलोरीज़ इस तरह के पैकेट में फैट से ही आ रही हैं।

अब अगर कोई यह सोचे कि क्या डाक्टर आज इस मासूम से पांच रूपये के पैकेट के पीछे पड़ गया है। जो भी हो, यह पैकेट इतना मासूम है----इस का कारण यह है कि इस तरह के पैकेट खाने से एक तो बच्चों को इस का चस्का सा लग जाता है जिस तरह का बीड़ी का या गुटखे-पान मसाले का चस्का होता है उसी तरह से इन बेकार की चीज़ों का भी एक चस्का ही होता है।

आपने क्या कहा ---- हम कौन सा बच्चों को ये सब रोज़ ले कर देते हैं ? –चलिये मैं यह भी बात मान लूं कि आप बच्चों को ये कभी कभी ले कर देते हैं लेकिन फिर भी आप ने उस दिन के लिये उस का नुकसान कर ही दिया ना---- क्योंकि बच्चों की भी अपनी कैलीरोज़ की ज़रूरत है –अब दो-चार सौ कैलोरी अगर उस की इस तरह के एक-दो चालू उत्पादों से पूरी हो गई तो भला उसे दाल, सब्जी खाने की क्या पड़ी है ---- बस, इस तरह के एक दो पैकेट, साथ में एक चॉकलेट बार, और ऊपर से थोड़ी बहुत कोल्ड-ड्रिंक हो गई तो हो गया उस का रात का खाना ----कब सोफे पर टीवी देखता हुआ, किसी भूत-प्रेत वाला टीवी सीरियल देखते देखते खौफ से डर कर आंखे बंद कर के सोने का नाटक करते करते खर्राटे भरने लगता है किसी को पता ही नहीं चलता क्योंकि वे अभी दूसरी तरफ़ वारदात देखने में मसरूफ़ हैं --- तो, बात तो ठीक ही हुई ना कि हनी, हम लोग बच्चों को तबाह ( चलिये खुल कर ही लिख देते हैं ---तबाह नहीं मार रहे हैं !!) – कर रहे हैं ।

हां, इस प्रोग्राम में दिखाया जाता था कि एक खूब मोटा-ताज़ा विदेशी
परिवार कैसे अपने खाने पीने की आदतों, टीवी देखने की आदतों एवं एक्सरसाइज़ करने की आदतों में क्रांतिकारी बदलाव कर के अपनी फिटनैस को पुनः प्राप्त कर लेते हैं ---- यह प्रोग्राम मुझे बहुत बढ़िया लगता है इसे देखने के बाद मैंने भी बहुत बार खीर एवं हलवा खाने के लिये मना किया होगा।

यह जो जंक फूड है ना इन पर सारी सूचना होती भी तो अंग्रेज़ी में ही है ----वैसे अगर हिंदी में भी यह सब लिखा रहेगा तो इन शक्तिशाली कंपनियों का भला कोई क्या उखाड़ लेगा --- वैसे इंगलिश में यह सारी सूचना लिख कर इन का काम आसान भी तो हो जाता है ---जो मां-बाप इंगलिश नहीं भी जानते वो भी इन्हें यह सोच कर खरीदते हैं कि चलो, इंगलिश में सब कुछ लिखा है तो ठीक ही होगा। लेकिन जो भी हो, आज कल जब भी मैं किसी ऐसे बच्चे के हाथ में ये पैकेट देखता हूं जिसे मैं समझता हूं कि इस पैकेट से कहीं ज़्यादा रोटी-सब्जी की ज़रूरत है तो मन बहुत दुःखी होता है --- इच्छा होती है इस के हाथ से इसे कैसे भी छीन लूं --- बाद में जब भूख लगेगी तो चुपचाप मज़े से खिचड़ी खा ही लेगा।

आप का प्रश्न मैंने भांप लिया है --- कि डाक्टर तुम्हारे सामने इस तरह के जंक-फूड का पैकेट कहां से आया ?—आप के सामने तो लगता है आज पोल खुल गई ---कल शाम को बेटे को दिलाया था ---लेकिन ज़रा इस तरफ़ भी ध्यान दीजियेगा कि यह सब होता कितने समय के बाद ------निःसंदेह कुछ महीनों के बाद !!
लेकिन फिर भी यह गलत है ---आखिर क्यों मैं उसे यह चस्का लगाने में उस की मदद कर रहा हूं !!