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Monday, August 11, 2014

यह भी पर्सनल हाइजिन का ही हिस्सा है..


सैक्स ऐजुकेशन, किशोरावस्था के मुद्दे, स्वपनदोष, शिश्न की रोज़ाना सफ़ाई......शायद आप को लगे कि यह मैंने किन विषयों पर लिखना शुरू कर दिया है। लेकिन यही मुद्दे आज के बच्चों, किशोरों एवं युवाओं के लिए सब से अहम् हैं।

मुझे कईं बार लगता है कि मैं पिछले इतने वर्षों से सेहत के विषयों पर लिख रहा हूं और मैं इन विषयों पर लिखने से क्यों टालता रहा। याद है कि २००८ में एक लेख लिखा था......स्वपनदोष जब कोई दोष है ही नहीं तो.... लिखा क्या था, बस दिल से निकली चंद बातें थीं जो मैं युवाओं के साथ शेयर करना चाहता था.....बस हो गया।

मैंने वह लेख किसी तरह की वाहावाही के लिए नहीं लिखा था.....लेकिन वह लेख हज़ारों युवाओं ने पढ़ा है......मैंने अपने बेटों को भी उसे पढ़ने को कहा......और वह लेख पढ़ने के बाद मुझे बहुत सारी ई-मेल युवाओं से आती हैं कि हमें यह लेख पढ़ कर बड़ी राहत मिली।

मैं जानता हूं कि मैं कोई सैक्स रोग विशेषज्ञ तो हूं नहीं, लेकिन फिर भी जो हमारे पास किसी विषय का ज्ञान है, चाहे वह व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हो और जो कुछ चिकित्सा क्षेत्र में रहने के कारण उस में जुड़ता गया, अब अगर वह ज्ञान हम जैसी उम्र के लोग शेयर नहीं करेंगे तो कौन आयेगा इस काम के लिए आगे। अच्छा एक बात और भी है कि इंगलिश में तो यह सब जानकारी उपलब्ध है नेट पर लेकिन हिंदी में इस तरह के कंटैंट का बहुत अभाव है।

मैं जानता हूं कि कितना मुश्किल होता है अपने लेख में यह लिखना कि मुझे भी किशोरावस्था के उस दौर में स्वपनदोष (night fall)  होता था....लेकिन क्या करें युवा वर्ग की भलाई के लिए सब कुछ सच सच शेयर करना पड़ता है. वरना मैं हर समय यह लिखता रहूं कि यह एक नार्मल सी बात है उस उम्र के लिए.....तो भी कहीं न कहीं पाठक के मन में यह तो रहेगा कि लगता है कि इसे तो नहीं हुआ कभी स्वपनदोष........ वरना यह लिख देता। यही कारण है कि सब कुछ दिल खोल कर खुलेपन से लिखना पड़ता है। उद्देश्य सिर्फ़ इतना सा ही है कि जिस अज्ञानता में हमारी उम्र के लोग जिए--इस तरह की सामान्य सी बातों को भी बीमारी समझते रहे..... आज के युवा को इस तरह के विषयों के बारे में सटीक जानकारी होनी चाहिए।

आज ध्यान आ रहा था...... शिश्न की रोज़ाना सफ़ाई के मुद्दे का। यह एक ऐसा मुद्दा है कि जिस पर कभी बात की ही नहीं जाती क्योंकि वैसे ही बालावस्था में शिश्न को हाथ लगाने तक को पाप लगेगा कहा जाता है, ऐसे में इस की सफ़ाई की बात कौन करेगा।

अगर इस लेख के पाठक ऐसे हैं जिन के छोटे बच्चे हैं तो वे अपने बच्चे के शिशु रोग विशेषज्ञ से इस मुद्दे पर बात करें। यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है...मैं इस के ऊपर जान बूझ कर कोई सिफारिश नहीं करूंगा....लेकिन बस इतना कह कर अपने अनुभव शेयर करने लगा हूं कि इस की रोज़ाना सफाई शिश्न की आगे की चमड़ी आराम से पीछे कर के (जितनी हो उतनी ही, बिना ज़ोर लगाए... यह बहुत ज़रूरी है)...... उस पर थोड़ा साबुन लगा कर रोज़ाना धोना ज़रूरी है।

चाहे अपने बारे में लिखना कितना ही एम्बेरेसिंग लगे ... तो लगे, लेकिन लिखूंगा। हमें पता ही नहीं था कि शिश्न के अगल हिस्से की इस तरह से सफ़ाई करनी होती है, कभी किसी से भी चर्चा हुई नहीं, किसी ने बताया नहीं। इस के कारण १४-१५ वर्ष की उम्र में बड़ा लफड़ा सा होने लगा। जब भी पेशाब जाएं तो जलन होने लगे...... कुछ समय के बाद ठीक हो जाए...ठीक से याद नहीं कि पेशाब करने से पहले हुआ करती थी या बाद में, लेकिन होती तो थी, बीच बीच में अपने आप ही ठीक भी हो जाया करती थी। अपने आप ही थोड़ा पानी ज़्यादा पीने लगता था कि आराम मिलेगा, किसी से बात क्या करें, इसलिए झिझक की वजह से यह सब पांच-छः वर्ष ऐसे ही चलता रहा।

१९-२० की उम्र में एक दिन हिम्मत कर के मैं अपने आप पहुंच ही गया मैडीकल कालेज के मैडीसन विभाग की ओपीडी में .....उस डाक्टर ने अच्छे से बात की, और मेरे से पूछा कि क्या तुम रोज़ाना इस की सफ़ाई नहीं करते.....मैंने तो उस तरह की सफ़ाई के बारे में पहली बार सुना था। आगे की चमड़ी (prepuce) बिल्कुल अगले हिस्से के साथ (glans penis)  चिपकी पड़ी थी।

बहरहाल, सब टैस्ट वेस्ट करवाए गये, उस डाक्टर के समझाए मुताबिक आगे की चमड़ी पीछे करने के पश्चात मैंने उस दिन से ही साफ़ सफाई का ख्याल रखना शुरू किया..... और मैं अब यह लिखने के लिए बिल्कुल असमर्थ हूं कि मुझे वैसा करने से कितना सुकून मिला....होता यूं है कि शिश्न की आगे से सफ़ाई न करने से.....शिश्न के अगले हिस्से के आस पास वाली चमड़ी से निकलने वाला एक सिक्रेशन.... स्मैग्मा--- इक्ट्ठा होने से ---शिश्न की अगले हिस्से वाली चमड़ी अगले हिस्से से ( glans penis) से चिपक जाती है, उस से उस जगह पर इरीटेशन होने लगती है .. और फिर यूटीआई (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफैक्शन) भी हो जाती है..... यही हुआ मेरे साथ भी....... यूरिन की टैस्टिंग करवाई-- और उस के अनुसार सात दिन के लिए मुझे दवाई खाने के लिए दी गई........और बस मैं ठीक हो गया बिल्कुल।

पाठकों को यह भी बताना ज़रूरी समझता हूं कि उस अगले हिस्से में चमड़ी पीछे करने के पश्चात ज़्यादा साबुन भी रोज़ रोज़ लगाना ठीक नहीं है, बस केवल यही ध्यान रखना ज़रूरी है कि शरीर के हर हिस्से की सफ़ाई के साथ उस हिस्से की सफ़ाई भी रोज़ाना करनी नितांत आवश्यक है, वरना दिक्कतें हो ही जाती हैं।

 मेरे यह पोस्ट लिखने का उद्देश्य केवल आज के युवावर्ग तक यह संदेश पहुंचाना है, अब यह कैसे पहुंचेगा, मुझे पता नहीं। वैसे भी मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरे इस तरह के लेखों को आप मेरी डायरी के पन्नों की तरह पढ़ कर भूल जाएं या किसी विशेषज्ञ के साथ इस में लिखी बातों की चर्चा कर के ही कोई निर्णय लें, यह आप का अपना निर्णय है। मैं जो संदेश देना चाहता था, मैं आप तक पहुंचा कर हल्का हो जाता हूं। आप अपने चिकित्सक से परामर्श कर के ही कोई भी निर्णय लें, प्लीज़।
Parenting literacy -- Cleanliness. 

Friday, August 8, 2014

यौवन की दहलीज़ तो ठीक है लेकिन ...

कुछ दिन पहले मैं एक किताब का ज़िक्र कर रहा था ... यौवन की दहलीज़ पर जिसे यूनिसेफ के सहयोग से २००२ में प्रकाशित किया गया है।

इस के कवर पेज पर लिखा है...... मनुष्य के सेक्स जीवन, सेक्स के माध्यम से फैलने वाले गुप्त रोगों(एस टी डी) और एड्स के बारे में जो आप हमेशा से जानना चाहते थे, लेकिन यह नहीं जानते थे कि किससे पूछें।

मैंने इस किताब के बारे में क्या प्रतिक्रिया दी थी, मुझे याद नहीं ..लेकिन शायद सब कुछ अच्छा ही अच्छा लिखा होगा --शायद इसलिए कि मैं पिछले लगभग १५ वर्षों से हिंदी भाषा में मैडीकल लेखन कर रहा हूं और मुझे हिंदी के मुश्किल शब्दों का मतलब समझने में थोड़ी दिक्कत तो होती है लेकिन फिर भी मैं कईं बार अनुमान लगा कर ही काम चला लेता हूं।

यह किताब हमारे ड्राईंग रूम में पड़ी हुई थी, मेरे बेटे ने वह देखी होगी, उस के पन्ने उलटे पलटे होंगे। क्योंकि कल शाम को वह मेरे से पूछता है --डैड, यह किताब इंगलिश में नहीं छपी?..... मैंने कहा, नहीं, यह तो हिंदी में ही है।

वह हंस कर कहने लगा कि डैड, इसे पढ़ने-समझने के लिए तो पहले संस्कृत में पीएचडी करनी होगी। उस की बात सुन कर मैं भी हंसने लगा क्योंकि किताब के कुछ कुछ भागों को देख कर मुझे भी इस तरह का आभास हुआ तो था.....पीएचडी संस्कृत न ही सही, लेकिन हिंदी भाषा का भारी भरकम ज्ञान तो ज़रूरी होना ही चाहिए इस में लिखी कुछ कुछ बातों को जानने के लिए।

अच्छा एक बात तो मैं आप से शेयर करना भूल ही गया ... इस के पिछले कवर के अंदर लिखा है...यह पुस्तक बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। मुझे यह पढ़ कर बड़ा अजीब सा लगा ...कि यौवन की दहलीज पर लिखी गई किताब जिन के लिए लिखी गई है, वे इस के अंदर कैसे झांक पाएंगे अगर यह किताब बिकाऊ ही नहीं है।कहां से पाएंगे वे ऐसी किताबें.

मुझे जब इस में कुछ कुछ गूढ़ हिंदी में लिखी बातों का ध्यान आया तो मेरा ध्यान इस के पिछले कवर की तरफ़ चला गया जिस में लिखा था कि जिस ने इस पुस्तक में बतौर हिंदी अनुवादक का काम किया वह बीएससी एम ए (अर्थशास्त्र) एम ए (प्रयोजन मूलक हिंदी) अनुवाद पदविका (हिंदी) आदि योग्यताओं से लैस थीं.......उन की योग्यता पर कोई प्रश्न चिंह नहीं, हो ही नहीं सकता।

लेिकन फिर भी अकसर मैंने देखा है कि इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया जाता कि एक तो हम आम बोल चाल की हिंदी ही इस्तेमाल किया करें, सेहत से जुड़ी किताबों में जो किसी भी हिंदी जानने वाले को समझ में आ जाए। यह बहुत ज़रूरी है। किताबों में तो है ही बहुत ज़रूरी यह सब कुछ.... वेबसाइट पर तो इस के बारे में और भी सतर्क रहने की ज़रूरत है...किताबें तो लोग खरीद लेते हैं, अब एक बार खरीद ली तो समझने के लिए थोड़ी मेहनत-मशक्कत कर ही लेंगे, लेकिन नेट पर आज के युवा के पास कोई भी मजबूरी नहीं है......एक पल में वह इस वेबपेज से उस वेबपेज पर पहुंच जाता है, आखिर इस में बुराई भी क्या है, नहीं समझ आ रहा तो क्या करे, जहां से कुछ समझने वाली बात मिलेगी, वहीं से पकड़ लेता है।

ऐसे में हमें सेहत से जुड़ी सभी बातें बिल्कुल आम बोलचाल की भाषा ही में करनी होंगी...वरना वह एक सरकारी आदेश की तरह बड़ी भारी-भरकम हिंदी लगने लगती है। और उसी की वजह से देश में हम ने हिंदी का क्या हाल कर दिया है, आप देख ही रहे हैं......दावों के ऊपर मत जाइए। जो मीडिया आम आदमी की भाषा में बात करता है वह देखिए किस तरह से फल-फूल रहा है।

और दूसरी बात यह कि अनुवाद में भी बहुत एहतियात बरतने की ज़रूरत है। सेहत से संबंधित जानकारी को जितने रोचक अंदाज़ में अनुवादित किया जायेगा, उतना ही अच्छा है.. और इस में इंगलिश के कुछ शब्दों को देवनागरी लिपी में लिखे जाने से भला क्या आपत्ति हो सकती है।

बस यही बात इस पोस्ट के माध्यम से रखना चाह रहा था।

आप देखिए कि इंगलिश में कितनी बेबाकी से डा वत्स इन्हीं सैक्स संबंधी विषयों पर अपनी बात देश के लाखों-करोड़ों लोगों तक कितनी सहजता से पहुंचा रहे हैं........ आईए मिलते हैं ९० वर्ष के सैक्सपर्ट डा वत्स से।  (यहां क्लिक करें)

Sunday, May 4, 2014

स्वपनदोष का उपचार?

स्वपनदोष एवं वीर्य पतन से संबंधित पिछली पोस्ट से आगे पढ़िए....

क्या स्वपनदोष के लिए किसी उपचार की आवश्यकता होती है ?
स्वपनदोष पूर्णरूप से नैसर्गिक है। इसके लिए किसी भी उपचार या दवाईयों की जरूरत नहीं है। वयस्क अवस्था में स्वपनदोष बार-बार हो सकता है, क्योंकि इस आयु में शरीर में विभिन्न शारीरिक व मनोवैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं। कभी-कभी उत्तेजित करने वाले स्वपनों के दौरान किसी से लैंगिक संबंध रखने की कल्पना पुरूषों में आती है, जिसके परिणामस्वरूप स्वपनदोष होता है। स्वपनदोष से मन में अपराधभाव निर्मित होता है। यदि यह बार-बार हुआ तो अपराधभावना बढ़ती जाती है और मानसिक दुर्बलता की अवस्था आ जाती है। इस स्थिति से बचने के लिए योग्य मार्गदर्शन लेना आवश्यक होता है। किसी भी दवाई या इलाज की आवश्यकता नहीं होती है और ऐसी कोई दवा उपलब्ध भी नहीं है। 

स्वपनदोष को रोकने के लिए क्या कोई दवाईयां हैं ?
स्वपनदोष, कामभावना पूर्ण करने की एक नैसर्गिक क्रिया है। स्वपनदोष रोकने के लिए किसी भी तरह के इलाज या दवा की आवश्यकता नहीं है, और ये उपलब्ध भी नहीं हैं। 

क्या नियमित व्यायाम का स्वपनदोष पर कुछ प्रभाव पड़ता है ?
व्यायाम का स्वपनदोष से कोई सीधा संबंध नहीं है। ये दोनों भिन्न क्रियाएं हैं। व्यायाम के कारण स्वपनदोष अधिक होता है या कम होता है, ये सब गलतफहमी फैलाने वाली धारणाएं हैं। इस के विपरीत नियमित व्यायाम करने से युवकों में स्वपनदोष से ध्यान हटाने में मदद ही मिलती है और उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, साथ ही मानसिक तनाव भी कम होता है। अतः कभी-कभी, इन दो क्रियाओं के मध्य परस्पर सम्बंध प्रतीत होता है।

क्या स्वपनदोष का बौद्धिक क्षमता पर कोई असर होता है ?
स्वपनदोष एक नैसर्गिक क्रिया है। स्वपनदोष का बौद्धिक क्षमता पर कोई असर नहीं होता है। यद्यपि अपराध भाव के कारण, मानसिक एकाग्रता कम हो जाती है। बुद्धि कम हो गई है, ऐसा लगता है। यह मानसिक दुर्बलता भी योग्य मार्गदर्शन से ठीक की जा सकती है।

बार-बार स्वपनदोष होने से गुप्तरोग या एड्स हो सकता है क्या ?
नहीं। गुप्तरोग और एड्स, संभोग के द्वारा, एक ग्रसित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति मैं फैलने वाले रोग हैं, इनका स्वपनदोष से कोई संबंध नहीं है। बार-बार स्वपनदोष होने से, गुप्तरोग या एड्स जैसा कोई रोग नहीं होता है।

क्या बार-बार स्वपनदोष होने का प्रजनन क्षमता पर या नवजात शिशु पर कुछ बुरा असर पड़ता है?
नहीं। बार-बार स्वपनदोष होने से भविष्य में संतान पर या संतान उत्पन्न करने की क्षमता पर, किसी भी प्रकार का विपरीत परिणाम नहीं होता है। जहां तक शरीर से वीर्य के निकलने का प्रश्न है, बार-बार स्वपनदोष और बार-बार संभोग, इन दोनों ही क्रियाओं में वीर्यपतन होता है। अतः इस भ्रम के पीछे कोई तथ्य नहीं है।

स्वपनदोष होना अच्छा है या बुरा ?  
स्वपनदोष पूर्णतया एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। मन में उठने वाली लैंगिक भावनाओं को तृप्त करके मानसिक शान्ति देने का यह एक प्राकृतिक तरीका है। इसका शरीर पर कोई बुरा परिणाम नहीं होता है। स्वपनदोष होने पर किसी को अपराध भाव होने का कोई कारण नहीं है। स्वपनदोष अच्छा है या बुरा, यह नहीं सोचना चाहिए।

Source: पुस्तक "यौवन की दहलीज पर" .. unicef publication ...लेखक डा प्रकाश भातलवंडे डा रमण गंगाखेडकर 

स्वपनदोष एवं वीर्यपतन (Nightfall)....कुछ भ्रांतियां

लगभग छः वर्ष पहले एक लेख लिखा था.....जब स्वपनदोष कोई दोष ही नहीं  है तो ....

इस लेख को पढ़ने के बाद जब कोई परेशान युवक मुझे धन्यवाद के दो शब्द भेजता है तो अच्छा लगता है कि चलो, अपना लिखा किसी के काम तो आया, किसी की परेशानी तो कम हुई।

कुछ दिन पहले एक बुक प्रदर्शनी में मैंने एक किताब खरीदी .....यौवन की दहलीज़ पर....... इसे क्वालीफाईड डाक्टरों द्वारा लिखा गया है और यूनिसेफ (Unicef) द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस किताब के शीर्षक के साथ यह भी लिखा गया है.. मनुष्य के सेक्स जीवन, सेक्स के माध्यम से फैलने वाले गुप्तरोगों (एस.टी.डी) और एड्स के बारे में जो आप हमेशा से जानना चाहते थे, लेकिन यह नहीं जानते थे कि किससे पूछें...

उस किताब में एक भाग स्वपनदोष और वीर्यपतन विषय से संबंधित है......उस के कुछ अंश यहां लिख रहा हूं......

स्वपनदोष का अर्थ क्या है?
कुछ लोगों में नींद के समय वीर्यपतन हो जाता है, इसे स्वपनदोष कहते हैं। नींद में वासना संबंधी स्वपन आने से मस्तिष्क में कामेंन्द्रियां उत्तेजित होकर कालचक्र पूरा कर लेती हैं, इसी वजह से वीर्यपतन होता है। इस प्रक्रिया को स्वपनदोष कहते हैं। 

स्वपनदोष, आयु के कौन से वर्ष से शुरू होकर कब तक हो सकता है?
यह क्रिया युवावस्था में शुरू होती है और आमतौर पर शादी होने पर बंद हो जाती है। शादी के बाद मनुष्य की शारीरिक जरूरतों की पूर्ति संभोग से हो जाती है , इसलिए सामान्यतया स्वपनदोष नहीं होता है। स्वपनदोष वैसे तो किसी भी उम्र में हो सकता है, विशेषतौर पर जब जीवनसाथी दूर गया हो और बहुत दिनों से संभोग सुख नहीं मिला हो। स्वपनदोष से किसी प्रकार का कोई शारीरिक नुकसान नहीं होता है। 

बार-बार वीर्यपतन हो जाने से क्या वीर्य खत्म हो जाता है ?
नहीं, यह सिर्फ एक भ्रांति है। वयस्क होने के उपरान्त वीर्य तैयार होने की प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रहती है। वीर्यपतन में, वीर्यकोष में एकत्रित वीर्य शरीर से बाहर निकल जाता है। लेकिन बार-बार वीर्यपतन होने से वीर्य खत्म नहीं होता है। वीर्यपतन, संभोग से, हस्तमैथुन से या फिर स्वपनदोष से हो सकता है। थोड़े समय अन्तराल में वीर्यपतन से यदि बार बार हुआ, तो वीर्य की घनता कम होकर, वह पतला हो जाता है। इसका कारण सिर्फ इतना है कि वीर्यपतन की शुरूआत के समय कभी-कभी वीर्यकोष से पहले से इकट्ठा वीर्य बाहर निकल जाता है और उसके बाद, बार-बार वीर्यपतन के समय, वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या और लसदार पदार्थ की मात्रा कम हो जाती है, जिससे वह पतला दिखता है। वीर्य पतला दिखने के कारण, लोगों को वीर्य समाप्त होने का डर लगता है, लेकिन यह सिर्फ गलतफहमी है। यदि दो वीर्यपतन के बीच अंतर ज्यादा होता है, तब ऐसी स्थिति में बाहर निकलने वाले वीर्य की घनता अधिक होती है। 
इस किताब में स्वपनदोष से संबंधित कुछ ज़रूरी जानकारी और भी हैं, बाद में लिखता हूं। 

इस तरह की जानकारी मुझे तब मिली थी किसी किताब से जब मैं २० वर्ष का था और मैं जानता हूं उस किताब को पढ़ कर मुझे कितना सुकून मिला था। मुझे नहीं पता कि आप उम्र की किस अवस्था में इस लेख को पढ़ रहे हैं, लेकिन अच्छा यही होगा कि इस लेख में लिखी जानकारी को अपने दोस्तों के साथ शेयर अवश्य करें......अनगिनत भ्रंातियों के चलते कुछ युवा अपने इन बेशकीमती ज़िंदगी के वर्षों में अपनी पढ़ाई आदि की तरफ़ उतना ध्यान नहीं दे पाते....हर समय बस बीमारी की कल्पना करते रहते हैं। उन्हें इस लेख का लिंक भेज कर उन की भी चिंता को दूर करिए। 

२००८ में दिल से लिखा वह लेख......... जब स्वपनदोष कोई दोष है ही नहीं तो..
  इस के उपचार के बारे में कुछ जानने के लिए इस पोस्ट पर क्लिक करिए। 



Friday, February 21, 2014

बलात्कार केस में पोटैंसी टेस्ट बोलें तो...


अभी न्यूज़ देख रहा था …खबर आ रही है कि बलात्कार के कथित दोषी का पोटैंसी टेस्ट किया जायेगा। इस तरह के टेस्ट के बारे में जनता के बारे में कईं प्रश्न होंगे। डीएनए टैस्ट आदि के बारे में तो आपने एक वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ के केस में खूब सुना.. एक युवक ने जब यह क्लेम किया कि वह राजनीतिज्ञ उस का पिता है… खूब ड्रामेबाजी हुई … बहुत बार .. शायद कितने वर्ष तो उस नेता का ब्लड-सैंपल लेने में ही लग गये थे, कितनी बार कोर्ट ने आदेश दिया तब कहीं जा कर उस का सैंपल लिया जा सका। आगे की कहानी आप जानते ही हैं…….
आज जब टीवी पर देखा कि एक अन्य वयोवृद्ध जिस के ऊपर बलात्कार का आरोप लग रहा है, इस का पुलिस के द्वारा पोटैंसी टेस्ट करवाया जायेगा।
इस संक्षेप सी पोस्ट के माध्यम से मैं इस पोटैंसी टेस्ट के बारे में बताना चाहूंगा क्योंकि इस केस में शायद गूगल अंकल भी कम ही मदद कर पाएगा। आप स्वयं सर्च कर के देखिए ..अगर आप इंगलिश में मेल पोटैंसी टेस्ट लिखेंगे तो आप भी उस में दिये गए लिंक्स पर जा कर शायद यही समझने लगेंगे कि पोटैंसी का मतलब है कि उस व्यक्ति में कितने शुक्राणु हैं या फिर उन की गुणवत्ता कैसी है, लेकिन यह पोटैंसी टेस्ट नहीं है, इसे फरटिलिटी टैस्ट कहते हैं जिस के द्वारा यह पता चल पाता है कि टैस्ट करवाने वाले व्यक्ति के स्पर्मस् की संख्या और गुणवत्ता आदि कैसी है ..क्या इस के वीर्य से किसी शिशु का जन्म हो सकता है?
लेकिन पोटैंसी टेस्ट यह नहीं है, वह अलग है.. इम्पोटैंट शब्द तो आपने बहुत बार सुना ही होगा अर्थात् कोई बंदा जो संभोग न कर सके …देसी शब्दों में कहें तो जिस व्यक्ति को इरैक्शन होने में या इरैक्शन को सस्टेन करने में दिक्कत हो एवं इस से संबंधित अन्य कुछ बातें…. इसलिए पोटैंसी टेस्ट के माध्यम से इस बात का पता लगाया जाता है कि क्या यह व्यक्ति किसी के साथ संभोग करने के योग्य भी है या नहीं?
मैं विकिपीडिया का एक लिंक यहां दे रहा हूं (इस पर क्लिक करें) जिस में आप को पत चल जायेगा कि यह पोटैंसी टेस्ट किस तरह से होता है ….. विभिन्न प्रकार के टैस्ट हैं और जब केस किसी हाई-प्रोफाइल का हो तो पुलिस भी कोई चांस लेना नहीं चाहती।
Screen Shot 2013-09-01 at 8.08.03 PMहां, ध्यान आया अभी कुछ हफ्ते पहले ही की तो बात है जब मध्य प्रदेश के एक मंत्री द्वारा उस के नौकर के यौन उत्पीड़न के मामले में भी इस पोटैंसी टेस्ट करवाने की बात मीडिया में खूब चर्चा में रही थी।
ठीक है, with profound regards and sympathies to the person who have some problem with their erection, with all humility … मैं यही कहना चाहता हूं कि कईं बार ऐसे केस मीडिया में दिखते ही हैं जिन के बारे में एक प्रश्न सा मन में उठ ही जाता है कि क्या यह बंदा संभोग करने के काबिल होगा………लेकिन एक बात तो है कि अगर कोई  भी व्यक्ति संभोग के काबिल नहीं भी है, आरोप लगाने वाली किसी महिला से इंटरकोर्स न भी कर पाया तो फिर अगर कोई युवती इस तरह का आरोप लगाती है ….मैं यही सोच कर स्तब्ध हूं कि अगर कल को किसी आरोपी का पोटैंसी टैस्ट निगेटिव आ जाए (मान लीजिए) लेकिन अगर वह बंदा किसी नाबालिग बच्ची के साथ एक डेढ़-घंटा अपने ही ढंग से हवस ठंडी करता रहा हो तो क्या यह रेप नहीं है, यह एक बड़ा प्रश्न तो है ही………..जब उस निर्भया कांड के बारे एक सख्त कानून की ज़रूरत की बात चली थी तो इस तरह की चर्चा भी चली तो थी …क्या मेल पैनीट्रेशन को ही बलात्कार माना जाना चाहिए.  पता नहीं फिर फाईनली क्या निर्णय लिया गया होगा, लेकिन यह सब कुछ कितना अजीब लगता है ना … कुछ तो नॉन-पैनीट्रेशन की आड़ में बच जाएं और कुछ इस चक्कर में कि अभी वे तो बच्चे हैं, वे तो १८साल के कम हैं, इसलिए उन के साथ नर्मा बरती जाए…………..धत तेरे की, बच्चे काहे के बच्चे, कमबख्त शैतान की औलाद किसी युवती का शील भंग कर दें लेकिन फिर भी बच्चे … तो इन सालों को घर में ही जंज़ीर से बांध कर रखो……….
कानूनी मामले बहुत ही पेचीदा हैं ना.. हम शायद ही कल्पना भी कर पाते होंगे कि जो युवतियां एवं महिलाएं किसी की भी दरिंदगी का शिकार होती हैं, उन पर सारी उम्र क्या बीतती होगी।.

Thursday, June 3, 2010

दुर्बलता(?) के शिकार पुरूषों की सेहत से खिलवाड़

आज मैं एक रिपोर्ट देख रहा था जिस में इस बात का खुलासा किया गया था कि इंपोटैंस (दुर्बलता, नपुंसकता) के लिये लोग डाक्टर से बात करने की बजाए अपने आप ही नैट से इस तकलीफ़ को दुरूस्त करने के लिये दवाईयां खरीदने लगते हैं।
और नेट पर इस तरह से खरीदी दवाईयों की हानि यह है कि कईं बार तो इन में टॉक्सिंस(toxins) मिले रहते हैं, बहुत बार इन में साल्ट की बहुत ज़्यादा खुराक होती है और कईं बार बिल्कुल कम होती है। और तो और इस तरह की दवाईयां जो नेट पर आर्डर कर के खरीदी जाती हैं उन में नकली माल भी धडल्ले से ठेला जाता है क्योंकि ऐसे नकली माल का रैकेट चलाने वाले जानते हैं कि लोग अकसर इन केसों में नकली-वकली का मुद्दा नहीं उठाते। तो, बस इन की चांदी ही चांदी।
अपनी ही मरजी से अपनी ही च्वाईस अनुसार मार्केट से इस तरह की दवाईयां उठा के खाना खतरनाक तो है ही लेकिन उच्च रक्त चाप वाले पुरूषों एवं हृदय रोग से जूझ रहे लोगों के लिये तो ये और भी खतरनाक हैं।
आप यह रिपोर्ट - Dangers lurk in impotence drugs sold on web..देख कर इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि इस तरह की दवाईयों में भी नकलीपन का जबरदस्त कीड़ा लग चुका है।
शायद अपने यहां यह नेट पर इस तरह की दवाईयां लेने जैसा कोई बड़ा मुद्दा है नहीं, हो भी तो कह नहीं सकते क्योंकि यह तो flipkart से शॉपिंग करने जैसा हो गया। लेकिन आप को भी इस समय यही लग रहा होगा कि अगर विकसित देशों में यह सब गोलमाल चल रहा है तो अपने यहां तो हालात कितने खौफ़नाक होंगे।
मुझे तो आपत्ति है जिस तरह से रोज़ाना सुबह अखबारों में तरह तरह के विज्ञापन लोगों को ये "ताकत वाले कैप्सल" आदि लेने के लिये उकसाते हैं----बादशाही, खानदानी कोर्स करने के लिये भ्रमित करते हैं ----गोल्ड-सिल्वर पैकेज़, और भी पता नहीं क्या क्या इस्तेमाल करने के लिये अपने झांसे में लेने की कोशिश करते हैं।
और इन विज्ञापनों में इन के बारे में कुछ भी तो नहीं लिखा रहता कि इन में क्या है, और कितनी मात्रा में है। मुझे इतना विश्वास है कि इन में सब तरह के अनाप-शनाप कैमीकल्स तो होते ही होंगे.....और ये कुछ समय बाद किस तरह से शरीर को कितनी बीमारियां लगा देंगे, यह तो समय ही बताता है।
तो फिर कोई करे तो क्या करे ? ---सब से पहले तो इतना समझ के चलने के ज़रूरत है कि अधिकांश केसों में लिंग में पूरे तनाव का न हो पाना ....यह दिमाग की समस्या है...भ्रम है, और इसे भ्रम को ही ये नीम-हकीम भुना भूना कर बहुमंजिली इमारतें खड़ी कर लेते हैं। युवा वर्ग में तो अधिकांश तौर पर किसी तरह के इलाज की ज़रूरत होती नहीं ---केवल खाना पीना ठीक रखा जाए, नशों से दूर रहा जाए....और बस अपने आप में मस्त रहा जाए तो कैसे यह तकलीफ़ जवानी में किसी के पास भी फटक सकती है।
लेकिन अगर किसी व्यक्ति को यह तकलीफ़ है भी तो उसे तुरंत अपने फ़िज़िशियन से मिलना चाहिए ---वे इस बात का पता लगाते हैं कि शरीर में ऐसी कोई व्याधि तो नहीं है जिस की वजह से यह हो रहा है, या किसी शारीरिक तकलीफ़ में दी जाने वाली दवाईयों के प्रभाव के कारण तनाव पूरा नहीं हो पा रहा या फिर कोई ऐसी बात है जिस के लिये किसी छोटे से आप्रेशन की ज़रूरत पड़ सकती है। लेकिन यह आप्रेशन वाली बात तो बहुत ही कम केसों में होती है। और कईं बार तो डाक्टर से केवल बात कर लेने से ही मन में कोने में दुबका चोर भाग जाता है।
अब फि़जिशियन क्या करते हैं ? -सारी बात की गहराई में जा कर मरीज़ की हैल्प करते हैं और शायद कुछ केसों में इस तकलीफ़ के समाधान के लिये बाज़ार में उपलब्ध कुछ दवाई भी दे सकते हैं। और अगर फिजिशियन को लगता है कि सर्जन से भी चैक-अप करवाना ज़रूरी है तो वह मरीज़ को सर्जन से मिलने की सलाह देता है।
कहने का अभिप्रायः है कि बात छोटी सी होती है लेकिन अज्ञानता वश या फिर इन नीमहकीमों के लालच के कारण बड़ी हो जाती है। लेकिन जो है सो है, लकीर पीटने से क्या हासिल ---कोई चाहे कितने समय से ही इन चमत्कारी बाबाओं की भस्मों, जड़ी बूटियों के चक्कर में पड़ा हुआ हो लेकिन ठीक काम की शुरूआत तो आज से की ही जा सकती है। क्या है, अगर लिंग में तनाव नहीं हो रहा, तो नहीं हो रहा, यह भी एक शारीरिक समस्या है जिस का पूर्ण समाधान क्वालीफाईड डाक्टरों के पास है। और अगर वह इस के लिये कोई दवाई लेने का नुस्खा भी देता है तो कौन सी बड़ी बात है ----यह मैडीकल फील्ड की अच्छी खासी उपलब्धि है। लेकिन अपने आप ही अपनी मरजी से किसी के भी कहने पर कुछ भी खा लेना, कुछ भी पी लेना, कुछ भी स्प्रे कर लेना, किसी भी ऐरी-गैरी वस्तु से मालिश कर लेना तो भई खतरे से खाली नहीं है।
एक अंग्रेज़ी का बहुत बढ़िया कहावत है --- There is never a wrong time to do the right thing. इसलिये अगर किसी को इस तरह की तकलीफ़ है भी तो यह कौन सी इतनी बड़ी आफ़त है -----डाक्टर हैं, उन से दिल खोल कर बात करने की देर है---- उन के पास समाधानों का पिटारा है। शायद मरीज़ को लगे कि यार, यह सब डाक्टर को पता लगेगा तो वह क्या सोचेगा? ---उन के पास रोज़ाना ऐसे मरीज़ आते हैं और उन्हें कहां इतनी फुर्सत है कि मरीज़ के जाने के बाद भी ये सब सोच कर परेशान होते रहें। अच्छे डाक्टर का केवल एक लक्ष्य होता है कि कैसे उसे के चेहरे पर मुस्कान लौटाई जाए -----अब इतना पढ़ने के बाद भी कोई इधर उधर चक्करों में पड़ना चाहे तो कोई उसे क्या कहे।
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Sunday, April 25, 2010

यौन-रोग हरपीज़ के बारे में जानिए -- भाग 1.

मैं आज सुबह एक न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ रहा था कि 14 से 49 वर्ष के आयुवर्ग अमेरिकी लोगों का लगभग 16 प्रतिशत भाग जैनिटल हरपीज़ (genital herpes) से ग्रस्त हैं।

 यौन संबंध के द्वारा फैलने वाला एक ऐसा रोग है जो हरपीज़ सिम्पलैक्स वॉयरस (herpes simplex virus) टाइप1 (HSV-1) अथवा टाइप2 (HSV-2). अधिकतर जैनिटल हरपीज़ के केस टाइप2 हरपीज़ सिम्पलैक्स वॉयरस के द्वारा होते हैं। HSV-1 द्वारा भी जैनिटल हरपीज़ हो तो सकता है लेकिन ज़्यादातर यह मुंह, होठों की ही इंफैक्शन करती है जिन्हें ("फीवर ब्लिस्टर्ज़) कह दिया जाता है---अकसर लोगों में बुखार आदि होने पर या किसी भी तरह की शारीरिक अस्वस्थता के दौरान होठों आदि पर एक-दो छाले से निकल आते हैं जिन्हें अकसर लोग कहते हैं ---"यह तो बुखार फूटा है!"

ध्यान देने योग्य बात यह है कि अधिकांश लोगों में हरपीज़ इंफैक्शन से कोई लक्षण पैदा ही नहीं होते। लेकिन जब कभी इस के  लक्षण पैदा होते हैं, तो शुरू में यौन-अंगों के ऊपर अथवा आसपास या गुदा मार्ग में (they usually appear as 1 or more blisters on or around the genitals or rectum) एक अथवा ज़्यादा छाले से हो जाते हैं। इन छालों के फूटने से दर्दनाक घाव हो जाते हैं जिन्हें ठीक होने में चार हफ्ते तक का समय लग सकता है। एक बार ठीक होने के बाद कुछ हफ्तों अथवा महीनों के बाद ये छाले फिर से हो सकते हैं, लेकिन ये पहले वाले छालों/ ज़ख्मों से कम उग्र रूप में होते हैं और कम समय में ही ठीक हो जाते हैं।

एक बार संक्रमण (इंफैक्शन) होने के बाद ज़िंदगी भर के लिये यह शरीर में रहती तो है लेकिन समय बीतने के साथ साथ इस से होने वाले छालों/घावों की उग्रता में कमी आ जाती है। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि जिस समय किसी व्यक्ति को स्वयं तो इस के कोई भी लक्षण नहीं हैं, उस हालात में भी उस के द्वारा यह इंफैक्शन आगे फैलाई जा सकती है।

क्या जैनीटल हरपीज़ एक आम समस्या है ? ---  जी हां, यह समस्या आम है। हमारे देश के तो आंकड़े मुझे पता नहीं ---वैसे भी हम लोग कहां ये सब बातें किसी से शेयर करते हैं, स्वयं ही सरसों का तेल लगा कर समझ लेते हैं कि किसी कीड़े ने काट लिया होगा, अपने आप ठीक हो जायेगी।

अमेरिकी आंकड़े हैं --- अमेरिका के 12 साल एवं उस के ऊपर के साढ़े चार करोड़ लोग जैनीटल हरपीज़ से ग्रस्त हैं। जैनीटल HSV2 पुरूषों की तुलना में महिलाओं में अधिक पाई जाती है---चार में से एक महिला को और आठ में से एक पुरूष को यह तकलीफ़ है। इस के पीछे कारण यह भी है कि महिलाओं को जैनीटल हरपीज़ एवं अन्य यौन-संबंधों से होने वाले इंफैक्शन (sexually transmitted infections -- STIs) आसानी से अपनी पकड़ में ले लेते हैं।

यह हरपीज़ फैलती कैसे है ? ---किसी जैनीटल हरपीज़ से संक्रमित व्यक्ति के यौन-अंगों एवं गैर-संक्रमित व्यक्ति के यौन-अंगों के संपर्क में आने से, अथवा संक्रमित व्यक्ति के यौन-अंगों के साथ किसी का मुंह संपर्क में आए ....(one can get genital herpes through genital-genital contact or genital-oral contact with someone who has herpes infection). लेकिन अगर चमड़ी में किसी तरह का घाव नहीं है तो भी यह इंफैक्शन हो सकती है और यह भी ज़रूरी नहीं कि संक्रमित व्यक्ति से केवल संभोग द्वारा ही यह फैलती है।

हरपीज़ के लक्षण --- ये लक्षण विभिन्न लोगों में अलग अलग हो सकते हैं। जैनीटल हरपीज़ से ग्रस्त बहुत से लोगों को तो इस बात का आभास भी नहीं होता कि वे इस रोग से ग्रस्त हैं।

किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन-संबंध बनाने के  लगभग दो सप्ताह के भीतर इस के लक्षण आने लगते हैं जो कि अगले दो-तीन हफ्तों तक परेशान कर सकते हैं। शुरूआती दौर में इसके ये लक्षण होते हैं ...

----यौन-अंगों पर अथवा गुदा द्वार पर खुजली एवं जलन का होना।
----फ्लू जैसे लक्षण ( बुखार सहित)
----- ग्रंथियों का सूज जाना ( swollen glands)
-----टांगों, नितंबों एवं यौन-अंगों के एरिया में दर्द होना
---- योनि से डिस्चार्ज होना (vaginal discharge)
---- पेट के नीचे वाली जगह पर दवाब जैसा बने रहना

कुछ ही दिनों में उन जगहों पर छाले दिखने लगते हैं जिन स्थानों से वॉयरस ने शरीर में प्रवेश किया था ---जैसे कि मुंह, लिंग (शिश्न,penis) अथवा योनि(vagina). और ये छाले तो महिलाओं की बच्चेदानी (cervix) एवं पुरूषों के मू्त्र-मार्ग (urinary passage) को भी अपनी चपेट में ले सकते हैं। ये लाल रंग के छाले शुरू में तो बि्ल्कुल छोटे छोटे होते हैं जो कि फूट कर घाव का रूप ले लेते हैं। कुछ ही दिनों में इन घावों पर एक क्रस्ट सी बन जाती है और यह बिना किसी तरह का निशान छोडे़ ठीक हो जाते हैं। कुछ केसों में, जल्द ही फ्लू जैसे लक्षण और ये घाव फिर से होने लगते हैं।

होता यह है कि कुछ लोगों में कोई लक्षण नहीं होते। और वैसे भी छोटे मोटे घाव को वे किसी कीड़े का काटा समझ कर या फिर यूं ही समझ कर अनदेखा सा कर देते हैं। लेकिन सब से अहम् बात यह भी है कि बिना किसी तरह के लक्षण के भी संक्रमित व्यक्ति द्वारा दूसरों तक फैलाया जा सकता है। इसलिये, अगर किसी व्यक्ति में हरपीज़ के लक्षण हैं तो उसे अपने चिकित्स्क से मिल कर यह पता करना चाहिये कि क्या वह इंफैक्टेड है ?