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Monday, August 4, 2014

एक इंसान जिस ने ५ करोड़ लोगों को दिया जीवन-दान

आज मैंने एक ऐसे इंसान के बारे में जाना जिस ने एक ऐसा काम कर दिखाया जिस से अब तक ५ करोड़ जानें बच गईं। हैरान करने वाली बात लगती है ना, लेकिन है यह बिल्कुल सच।

और यह करिश्मा हो पाया इस डाक्टर की रिसर्च से.. जिस ने जीवन रक्षक घोल का आविष्कार किया। जिसे इंगलिश में हम लोग ओ आर एस घोल भी कहते हैं और जिस के बारे में अकसर हम सब सरकारी सेहत विभागों के विज्ञापनों के बारे में सुनते रहते हैं।

इस घोल को तो मैं भी जानता हूं लेकिन कभी भी इस तरफ़ बिल्कुल भी ध्यान नहीं किया कि इस घोल का आविष्कार करना भी कितना जटिल काम रहा होगा। आप सब की तरह मैं भी ऐसा ही सोचा करता था कि ठीक है, पानी में नमक मिलाया, चीनी मिलाई...घोल तैयार और अगर नींबू आसानी से उस समय उपलब्ध है तो उस की चंद बूंदें भी उस घोल में डाल दी जाएं (स्वाद के अनुसार)... हां, इतना ज़रूर रहा कि जब भी मैंने इसे बनाना चाहा या बनाने में मदद की, मेरी डाक्टर बीवी ने इतना ज़रूर ध्यान रखा कि न तो नमक न ही चीनी ...न ही कम हो और न ही ज़्यादा हो.....जब भी मैंने ज्यादा चीनी डालनी चाहिए तो उन्होंने रोक लिया..यह कहते हुए कि इस का फ़ायदा नहीं, नुकसान होगा... दस्त रोग में।

जब हम छोटे छोटे थे तो --शायद सात आठ साल की अवस्था रही होगी,  रेडीमेड पाउच भी मिलना शुरू हो गये था.....जिन्हें पानी में मिला कर पिला दिया जाता था।

मैंने बीबीसी की साइट पर यह लेख पढ़ने के बाद डा आनंद की अद्भुत किताब को भी देखना चाहा---पहले भी कईं बार देख चुका हूं वैसे तो ... लेकिन फिर भी देखना ज़रूरी लगता है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि आज कर बाज़ार में रेडीमेड ओ आर एस -जीवन रक्षक घोल के रेडीमेड पाउच मिलने लगे हैं, जिन्हें पानी में घोलने के बाद तुंरत घोल तैयार हो जाता है, लेकिन वे कहते हैं कि वे मार्कीट में बिकने वाले इस तरह के उन पाउचों के पक्ष में नहीं हैं जिन में ग्लूकोज़ की मात्रा रिक्मैंडेड मात्रा से अधिक होती है, और इस से बात बनने की बजाए बिगड़ सकती है।

लिखते लिखते ध्यान आ जाता है पुरानी से पुरानी बातों का.......बचपन में हम देखा करते थे कि किसी को दस्त लग गए, एक तो रेडीमेड पाउच आदि पानी में घोल कर पिला दिया जाता था और उस की खटिया के पास स्टूल पर एक छोटा सा गत्ते का ग्लूकोज का डिब्बा भी रख दिया जाता था जो कुछ कुछ समय के अंतराल के बाद उसे घोल घोल कर पिला दिया जाता था।

एक तो पोस्ट इतनी लंबी होने लगी हैं कि मेरी मां भी मेरे लेखों की आलोचना में यही कहती हैं......लिखता तूं बढ़िया है, प्रेरणा मिलती है, जानकारी मिलती है तेरे लिखने से..... पर तू लिखता बड़ा लंबा है।

मेरी दिक्कत यह है कि मैं थोड़े शब्दों में अपनी बात कहना सीख ही नहीं पाया।

हां, तो बात चल रही थी, उस घोल में ज्यादा चीनी की, ज्यादा नमक की...... इस को जानने समझने के लिए कि यह क्या चक्कर है, आप को उस महान डाक्टर नार्बट हिर्स्चार्ण के काम के बारे में जानना होगा।

यह डाक्टर साहब १९६४में पूर्वी पाकिस्तान जिसे अब बंगला देश कहा जाता है में पोस्टेड थे.....वहां पर हैजे से मरने वालों की संख्या बहुत ज्यादा थी..... ऐसे मरीज़ों की दस्त की वजह से ही मौत हो जाया करती थी क्योंकि जितने लोगों को  इंट्राविनस फ्लयूड्स (जिसे ग्लूकोज या सेलाइन चढ़ाना कहते हैं ...बोतल जब चढ़ाई जाती है).. मिलने ज़रूरी थे उतने इंतज़ाम हो नहीं पा रहे थे।

इस महान डाक्टर ने बड़ी सावधानी से रिसर्च करनी शुरू की .....कईं बार साथी डाक्टरों ने विरोध भी किया लेकिन फिर फिर भी इन्होंने फूंक फूंक कर पैर रखा इस रिसर्च में और आखिर एक ऐसा आविष्कार कर के ही दम लिया जिस ने अब तक ५ करोड़ लोगों की जान तो बचा ही ली है, और अभी भी यह गिनती निरंतर बढ़ रही है।

समझने वाली बात केवल यही है कि अगर दस्त के मरीज को ऐसा घोल दिया जाए जिस में मौजूद घटकों की मात्रा और रक्त में मौजूद उन घटकों की मात्रा एक जैसी हो तो समझो बात बन गई........ यही आविष्कार सब से अहम् था और इसे बीसवीं सदी का सब से बड़ा मैडीकल आविष्कार भी कहा जा रहा है।

अगर ये घटक अधिक या कम मात्रा में होंगे तो इस का फायदा तो क्या होना है, बल्कि विपरीत असर ही होगा।
जीवन रक्षक घोल को घर बनाने की विधि......एक लिटर उबाला हुआ पानी जिसे ठंडा कर दिया गया हो, उस में एक टी-््स्पून नमक (लेवल किया हो, ऊपर तक न भरा हो), और ८ टी-स्पून शक्कर के डाल (लेवल किया हो).. इन्हें मिला कर घोल बना लें और फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे स्वाद अनुसार मिला दें। बना कर फ्रिज में रख दें और थोड़े थोड़े समय बाद दस्त के मरीज को दें और स्वयं देखिए की किस तरह से संजीवनी बूटी जैसे यह सस्ता सा, बिल्कुल घर ही में तैयार किया हुआ घोल सब को ठीक ठाक कर देता है.........जैसा कि आप उस बीबीसी रिपोर्ट में (जिस का लिंक मैं नीचे लगा दूंगा) एक स्लाईड शो में भी देखेंगे कि किस तरह के एक छोटा दस्त की वजह से बिल्कुल निढाल सा हुआ आता है.. लेिकन जीवन रक्षक घोल लेने के आधे एक घंटें में किस तरह से चुस्ती लौटने लगती है और तुरंत स्तनपान करने लगता है, जब वह आया तो उस में स्तनपान करने की भी शक्ति न थी।

वैसे तो एमरजैंसी में तो ऐसा भी कहा गया है कि अगह पानी उबालने वालने का कोई जुगाड़ न हो, तो भी एक गिलास पानी में एक चम्मच चीनी और एक चुटकी नमक मिला कर हिलाएं, चंद बूंदें नींबू के पानी की डाल दें और दस्त से ग्रस्त बच्चे या बड़े व्यक्ति को यह देना शुरू करें.......... रिजल्ट तुरंत मिल जायेगा।

सोचने वाली बात यह तो है कि क्या इस तरह के डाक्टर किसी फरिश्ते से कम हैं जिन्हें ईश्वर किसी खास मकसद के लिए धरती पर भेजता है.........इन की इंटरव्यू भी ज़रूर देखिए, नीचे दिए गये लिंक पर ही मिलेगी.......कितनी सहजता, कितना साधारण व्यक्तित्व और कितना ठहराव। इन को हमारा सब का कोटि कोटि नमन।

लिखना तो और भी चाहता हूं ---मां की नसीहत याद आ गई फिर से.......छोटे लेख लिखा कर।
Inspiration........ The man who helped saved 50 million lives (BBC Report) 

One of the outstanding useful videos i ever came across.........

Wednesday, April 28, 2010

बेमौसमी महंगे फल और सब्जियां ----आखिर क्यों?

आज कल बाज़ार में बे-मौसमी महंगी सब्जियों एवं फलों की भरमार है। लेकिन पता नहीं क्यों इन का स्वाद ठीक सा नहीं लगता। अकसर देखता हूं, सुनता भी हूं कि लोगों में यह एक धारणा सी है कि सब्जियां-फल चाहे बेमौसमी हैं, लेकिन अगर मंहगे भाव में मिल भी रही हैं तो वे स्वास्थ्यवर्द्धक ही होंगी।

लेकिन यह सच नहीं है। मैं कहीं पढ़ रहा था कि जिस मौसम में जो सब्जियां एवं फल हमारे शरीर के लिये लाभदायक हैं और जिन की हमारे शूरीर को मौसम के अनुसार ज़रूरत होती है, प्रकृति हमारे लिये उस मौसम में वही सब्जियां एवं फल ही प्राकृतिक तौर पर उपलब्ध करवाती है।

ठीक है, बिना मौसम के भी फुल गोभी, मटर, पालक .....और भी पता नहीं क्या क्या...सब कुछ ....मिल तो रहा है लेकिन इन सब्जियों को तैयार करने में और फसल की पैदावार बढ़ाने के लिये एक तो ज़्यादा उर्वरक (फर्टिलाइज़र्स) इस्तेमाल किये जाते हैं और दूसरा इन को इन के लिये अजनबी कीटों आदि से बचाने के लिये कीटनाशकों का प्रयोग भी ज़्यादा ही करना पड़ता है। सीधी सी बात है कि ये सब हमारी सेहत के लिये ठीक नहीं है।

जब से मैंने यह तथ्य पढ़ा है तब से मैं बेमौसमी फलों एवं सब्जियों से दूर ही भागता हूं। बिना मौसम के फल भी कहां से आ रहे हैं---सब कोल्ड-स्टोरों की कृपा है। ऐसे में बड़े बड़े डिपार्टमैंटल स्टोरों से महंगे महंगे बेमौसमी फल खरीदने की क्या तुक है? हां, आज वैसे ज़माना कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही हाई-टैक हो गया है---- अकसर इन हाई-फाई जगहों पर हाई-क्लास के फलों पर नज़र पड़ जाती है ---सेब के एक एक नग को बड़े करीने से सजाया हुआ, हरेक पर एक स्टिकर भी लगा हुआ है और दाम ----चौंकिये नहीं ---केवल 190 रूपये किलो। और भी तरह तरह के " विलायती फल" जिन्हें मैं कईं बार पहली बात देखता तो हू लेकिन खरीदता कभी नहीं।

और तरह तरह की अपने यहां बिकने वाली सब्जियों-फलों की बात हो रही थी-- इन के जो भिन्न भिन्न रंग है वे भी हमें नाना प्रकार के तत्व उपलब्ध करवाती हैं--इसलिये हर तरह की सब्जी और फल बदल बदल कर खानी चाहिये क्योंकि जो तत्व एक सब्जी में अथवा फल में मिलते हैं, वे दूसरे में नहीं मिलते।

मैं लगभग सभी तरह की सब्जियां खा लेता हूं --विशेषकर जो यहां उत्तर भारत में मिलती हैं, लेकिन एक बात का मलाल है कि मुझे करेला खाना कभी अच्छा नहीं लगता। इस का कारण यह है कि मैं बचपन में भी करेले को हमेशा नापसंद ही करता था। यह मैंने इसलिये लिखा है कि बचपन में बच्चों को सभी तरह की सब्जियां एवं फल खाने की आदत डालना कितना ज़रूरी है, वरना वे सारी उम्र चाहते हुये भी बड़े होने पर उन सब्जियों को खाने की आदत डाल ही नहीं पाते।

वैसे भी अगर कुछ सब्जियां ही खाईं जाएं तो शरीर में कईं तत्वों की कमी भी हो सकती है क्योंकि संतुलित आहार के लिये तो भिन्न भिन्न दालें, सब्जियां एवं फल खाने होंगे।

आज सुबह मैं बीबीसी न्यूज़ की वेबसाइट पर एक अच्छी रिपोर्ट पढ़ रहा था जिस का निष्कर्ष भी यही निकलता है कि ज़रूरी नहीं कि महंगी या स्टीरियोटाइप्ड् वस्तुओं में ,ही स्वास्थ्यवर्धक तत्व हैं ----इस लेख में बहुत सी उदाहरणें दी गई हैं ---जैसे कि शकरमंदी में गाजर की तुलना में 15 गुणा और कुछ अन्य पपीते में संतरे की तुलना में बहुत ज़्यादा होते हैं।

बीबीसी न्यूज़ की साइट पर छपे इस लेख में भी इसी बात को रेखांकित किया गया है कि संतुलित आहार के लिये सभी तत्व एक तरह का ही खाना खाने से नहीं मिल पाते ----बदल बदल कर खाने की और सोच समझ कर खाने की सलाह हमें हर जगह दी जाती है।

सारे विश्व में इस बात की चर्चा है कि अगर हमें बहुत सी बीमारियों से अपना बचाव करना है तो हमें दिन में पांच बार तो सब्जियों-फलों की "खुराक" लेनी ही होगी। पांच बार कैसे --- उदाहरण के तौर पर नाश्ते के साथ अगर एक केला लिया, दोपहर में दाल-सब्जी के साथ सलाद (विशेषकर खीरा, ककड़ी, टमाटर, पत्ता गोभी, चकुंदर आदि ), कोई फल ले लिया और शाम को भी खाने के साथ कोई सलाद, फल ले लिया तो बस हो गया लेकिन इतना अवश्य अब हमारे ध्यान में रहना चाहिये कि अकाल मृत्यु के चार कारणों में कम सब्जियों-फलों का सेवन करना भी शामिल है ---अन्य तीन कारण हैं --धूम्रपान, मदिरापान एवं शारिरिक श्रम से कतराना।

Monday, November 9, 2009

सेहत का फंडा ---भाग 1.

मैं इस विषय पर बहुत सोचता हूं कि आखिर अच्छी सेहत का फंडा है क्या। सोच विचार करने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुंचता हूं कि सेहत के लिये कुछ बातें करने की ज़रूरत है और कुछ न करने की।
न करने वाली बातों में सब से अहम् है कि तंबाकू,गुटखे के किसी भी तरह के उपयोग से दूर रहा जाये। शराब -चाहे कितनी भी महंगी क्यों न हो और चाहे कितने ही डाक्टर कहें कि थोड़ी पीने से कुछ नहीं होता --- से पूरी तरह से दूर रहा जाए।
यह लिखते लिखते ध्यान आ रहा है कि सेहत की फंडे की जब बात करते हैं तो यह भी नहीं है कि हम लोग इन बातों से पहले से वाकिफ़ नहीं हैं -- अधिकांश बातें हम लोग पहले से जानते हैं लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि हमें इन बातों को आपस में बार बार दोहराने की ज़रूरत होती है।
कुछ दिनों पहले मैं एक इंटरव्यू लेने गया हुआ था ---वहां नॉन-मैडीकल मैंबर भी थे लेकिन वे सब बिना शक्कर वाली चाय पी रहे थे । कुछ समय बाद मेरे एक सीनियर से बात हो रही थी -बता रहे थे कि उन्होंने कभी भी दूध में चीनी नहीं डाली। शक्कर आदि की ढ़ेरों बुराईयां गिना रहे थे और मेरा बढ़ता वजन देख कर मुझे भी कह रहे थे कि तुम्हें भी मीठे पर कंट्रोल करना चाहिये।
अगर हम लोग इस तरह की छोटी छोटी बातों पर बार बार बात करते हैं तो पता नहीं किस समय किस के मन में कौन सी बात बैठ जाती है।
इसी तरह नमक के इस्तेमाल में भी बहुत ही ज़्यादा एहतियात रखने की ज़रूरत है। वरना कौन सा रोग किसी की कब धर दबोचे यह सब बिना किसी दस्तक के ही हो जाता है।
कुछ भी हो सेहत के लिये परहेज़ तो करना ही होगा, कुछ भी मुंह में डालने से पहले पूरी तरह से सचेत रहते हुये यह निर्णय करना होगा कि इस खाध्य पदार्थ में क्या क्या मिला हुआ है और इन में से किन किन इंग्रिडिऐंट्स के मिलावटी होने की पूरी पूरी आशंका है, क्या यह मेरी सेहत के लिये ज़रूरी है और क्या मैं इस के बिना रह सकता हूं ?
मुझे लगता है कि अगर हम लोग कुछ भी खाने से पहले यह सोच लें तो काफ़ी हद तक हम बहुत सा कचरा खाने से बच सकते हैं ----वैसे मैंने भी यह अप्रोच रखी हूई है और इसी कारण मैं बाज़ार की बहुत सी वस्तुओं से बचने की कोशिश कर लेता हूं।

Saturday, October 10, 2009

अंकुरित करने की प्रक्रिया बहुत आसान


( credit: jessicareeder/flickr)


उस दिन जब अंकुरित बीजों आदि की बात हो रही थी तो एक प्रश्नन किया गया था कि अंकुरित करने की प्रक्रिया का खुलासा करें। मैं जिस किताब Raw Energy का उल्लेख कर रहा था उस इंगलिश की किताब से मैंने इस पोस्ट की सामग्री ली है जिसका अनुवाद मैंने हिंदी में करने की कोशिश की है।

अंकुरित करने की प्रक्रिया बहुत आसान है। उत्तम किस्म के बीजों को इस्तेमाल करें। बीजों को पानी में अच्छी तरह धो लें ताकि बीजों पर लगे हुए विषैले रसायन अच्छी तरह से उतर जाएं। फिर इन बीजों एवं खाद्यान्नों को किसी पानी के बर्तन में भिगो दिया जाता है।

बर्तन को इस प्रकार से ढक दें कि उस में पर्याप्त आक्सीजन जा सके और बर्तन को किसी थोड़े सी गर्म जगह पर रख दें। 8 से 12 घंटे के बाद पानी फेंक दें। यह सुनिश्चित कर लें कि बर्तन इतना बड़ा हो कि अंकुरित होने वाले बीजों एवं खाद्यान्नों के लिये स्थान हो।

बीजों को दिन में दो से तीन बार धो लें और पूरा पानी बर्तन से निकाल दें। इस बात का ध्यान रखें कि अंकुरित बीजो को कभी भी पानी में मत रख छोड़ें , अन्यथा वे सड़ना शूरू हो जायेंगे।

बीज जब कम से कम आधा इंच अंकुरित हो जाएं, तब उन्हें कच्चा खाएं। आम तौर पर बीजों को अंकुरित होने में 2 से 3 दिन का समय लग जाता है और यह अवधि विभिन्न तरह के बीजों पर, तापमान पर एवं हवा में नमी की मात्रा पर निर्भर करती है।

अंकुरित करने के लिये आप खुले मुंह वाले कांच की बोतलें भी इ्स्तेमाल कर सकती हैं। बस यह ध्यान रखें कि उस में थोड़ी जगह हवा के लिये रहे। आप बोतल के ऊपर कोई बिल्कुल बारीक कपड़ा भी बांध सकते हैं ताकि हवा के आने जाने के लिये जगह रहे।

कईं लोग 8-10 घंटे पानी में भिगोने के बाद बीजों एवं खाद्यान्नों को पानी से निकालने के बाद एक बारीक कपड़े की थैली में डाल देते हैं और रसोई घर की खिड़की पर टांग देते हैं। सुबह-शाम उस थैली को गीला कर देते हैं। आप को जो भी ज़्यादा सुविधाजनक लगे, उसे अपना लें।

अंकुरित खाद्यान्नों , दालों एवं बीजों का ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठाने के लिये आप इन्हें कच्चा ही खाएं। वैसे अंकुरित खाद्य पदार्थों को अंकुरित हो जाने के बाद किसी भी डिब्बे ( जिस मे हवा न जा सके ---एयरटाइट कंटेनर) में डाल कर रैफ्रीजरेटर में कईं दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

PS.. अगर यह लेख मेरी बीवी के हाथ पड़ जाए और उन्हें पता चल जाये कि मैं इस तरह से खाना-खज़ाना जैसा शो प्रेज़ैंट कर रहा हूं तो फिर मुझे मिल गया नाश्ता !! पहली बात मुझे जो सुनने को मिलेगी कि कभी रसोईघर के दर्शन भी किये हैं ?

Saturday, September 26, 2009

एक ग्राम कम नमक से हो सकती है अरबों ड़ॉलर की बचत !

अमेरिकी लोग अगर रोज़ाना लगभग साढ़े तीन ग्राम नमक की बजाये लगभग अढ़ाई ग्राम नमक लेना शुरू कर दें तो वहां पर 18 बिलियन डॉलरों की बचत हो सकती है।
केवल बस इतना सा नमक कम कर देने से ही वहां पर हाई-ब्लड-प्रैशर के मामलों में ही एक सौ दस लाख मामलों की कमी आ जायेगी। यह न्यू-यॉर्क टाइम्स की न्यूज़ रिपोर्ट मैंने आज ही देखी।
ऐसा कुछ नहीं है कि वहां अमेरिका में यह सिफारिश की जा रही है और भारत में कुछ और सिफारिशें हैं। हमारे जैसे देश में जहां वैसे ही विशेषकर आम आदमी के लिये स्वास्थ्य संसाधनों की जबरदस्त कमी है ---ऐसे में हमें भी अपनी खाने-पीने की आदतों को बदलना होगा।
जबरदस्त समस्या यही है कि हम केवल नमक को ही नमकीन मानते हैं। यह पोस्ट लिखते हुये सोच रहा हूं कि नमक पर तो पहले ही से मैंने कईं लेख ठेल रखे हैं ---फिर वापिस बात क्यों दोहरा रहा हूं ?
इस सबक को दोहराने का कारण यह है कि इस तरह की पोस्ट लिखना मेरे खुद के लिये भी एक जबरदस्त रिमांइडर होगा क्योंकि मैं आचार के नमक-कंटैंट को जानते हुये भी रोज़़ इसे खाने लगा हूं और नमक एवं ट्रांस-फैट्स से लैस बाकी जंक फूड तो न के ही बराबर लेता हूं ( शायद साल में एक बार !!) लेकिन यह पैकेट में आने वाला भुजिया फिर से अच्छा लगने लगा है जिस में खूब नमक ठूंसा होता है।
और एक बार और भी तो बार बार सत्संगों में जाकर भी तो हम वही बातें बार बार सुनते हैं लेकिन इस साधारण सी बातों को मानना ही आफ़त मालूम होता है, ज़्यादा नमक खाने की आदत भी कुछ वैसी ही नहीं हैं क्या ?
इसलिये इस पर तो जितना भी जितनी बार भी लिखा जाये कम है ---एक छोटी सी आदत अगर छूट जाये तो हमें इस ब्लड-प्रैशर के हौअे से बचा के रख सकती है।

Wednesday, September 24, 2008

आज इन दो दवाईयों की दो बातें करते हैं ....

परसों लखनऊ में था – टाइम पास करने के लिये स्टेशन के सामने से एक बुक-शाप से सिम्स की किताब खरीद ली ......सिम्स यानि CIMS- Current Index of Medical Specialities. यह किताब तीन महीने में एक बार छपती है और हम लोग तो अपने कालेज के दिनों से इसे नियमित देखते रहते हैं। CIMS में बाज़ार में उपलब्ध दवाईयों के बारे में जानकारी दी गई होती है। सभी डाक्टरों के लिये यह बहुत उपयोगी प्रकाशन है। इस का दाम 120रूपये है। वैसे पब्लिक को तो इसे खरीदने की कोई ज़रूरत होती नहीं......क्यों कि उन के लिये इस की बहुत लिमिटेड उपयोगिता है ---काफी सारी बातें तो ले-मैन को समझ में आ ही नहीं सकती । और अगर ले-मैन इस के अनुसार स्वयं दवाई लेना शुरू करने की कोशिश भी करेगा तो अच्छा खासा जोखिम से भरा रास्ता है। वैसे अगर आप को किसी दवाई के बारे में कोई विशेष जानकारी चाहिये तो आप उस दवाई का नाम ( प्रैफरेबली उस के साल्ट का नाम) लिख कर गूगल सर्च कीजिये या विकिपीडिया पर सर्च कीजिये, आप को सटीक सी जानकारी मिल जायेगी।
अच्छा चलिये इस पोस्ट के शीर्षक के अनुसार दो दवाईयों के बारे में दो बातें करें। ऐसा है कि यह जो सिम्स मैंने खरीदी उस के पिछले कवर पर दो दवाईयों का विज्ञापन दिखा – एक तो थी stemetil- MD और Omez Insta. ये दोनों दवाईयां लोगों में अच्छी खासी पापुलर हैं, इसलिये इन के बारे में सोचा कि आप से भी दो बातें करते हैं।

Stemetil के नाम से तो आप में से बहुत से लोग परिचित ही होंगे....यहां पर यह बताना चाहूंगा कि यह स्टैमेटिल की टेबलेट ज्यादातर उल्टी के लिये इस्तेमाल की जाती है। इस में Prochloroperazine ( प्रोक्लोरोपेराज़ीन) नाम का साल्ट होता है उस एक टेबलेट में इस की मात्रा 5 मिलीग्राम रहती है। मुझे जिस बात ने यहां पर इस के बारे में लिखने पर मजबूर किया वह यह है कि मुझे यह कल ही पता चला कि अब यह Stemetil –MD के रूप में भी उपलब्ध है.........MD का मतलब कि mouth-dissolving tablet ………यानि कि इसे आप मुंह में रखेंगे और यह कुछ ही क्षणों में अपने आप घुल जायेगी और फिर इसे आप पानी के बिना भी अंदर ले जा सकते हैं। हां, अगर हालत ऐसी हो कि पानी पच रहा हो तो थोड़ा सा पानी पी लें, वरना कोई ज़रूरत नहीं।

इस मुंह में घुलने वाली गोली की ज़रूरत दोस्तो विशेषकर उन मौकों पर पड़ती है जब मरीज़ कुछ भी पचा नहीं रहा----उल्टिय़ों पर उल्टियां किये जा रहा है----दो-घूंट पानी भी पीता है तो उल्टी कर के बाहर निकाल देता है। ऐसे मौकों के लिये यह दवाई बहुत उपयुक्त है। और मेरे विचार में इस की एक स्ट्रिप आप के घरेलू मैडीसन-बॉक्स में होनी ही चाहिये। सीधी सी बात है कि अगर बंदा पानी भी नहीं पचा रहा तो उसे ऐसी टेबलेट मिल गई जिसे लेने के लिये उसे पानी की ज़रूरत ही नहीं रही।

ठीक है, ऐसी स्थिति से निपटने के लिये टीके वगैरा भी लगाये जाते हैं लेकिन घर पर कुछ समय के लिये इस तरह की टेबलेट को आजमाने में क्या हर्ज है ??

दूसरी दवाई है ........Omez Insta ….इस में Omeprazole powder होता है......Omeprazole powder for suspension ….इस पाउच में छः ग्राम के लगभग पावडर होता है जिसे पानी में घोल कर पी लिया जाता है जिस से गैस्ट्राइटिस में तुरंत राहत मिल जाती है। यहां पर यह बताना चाहूंगा कि Omeprazole के कैप्सूल तो डाक्टरों के द्वारा एसिडिटी एवं पैप्टिक-अल्सर डिसीज़ में अकसर प्रैसक्राइब किये जाते हैं.....लेकिन इस तरह एक पावडर के रूप में यह दवाई पहली बार आई है....ऐसा विज्ञापन में दावा किया गया है।

मेरा विचार तो यही है कि इस तरह की दवाई के भ दो-तीन पाउच तो आप को अपने मैडीसन-बाक्स में रखने ही चाहिये। अकसर आप ने देखा है कि हम लोग किसी पार्टी वगैरह में बदपरहेज़ी करने के बाद जब वापिस लौटते हैं तो हालत एक दम खराब हुई होती है.....फ्रिज में रखा ठंडा दूध भी ले लिया , ऐंटासिड की गोली भी ले ली, लेकिन कोई असर पड़ता नहीं दिखता ----ऐसे में आप को याद होगा हम लोग ENO के एक चम्मच को एक गिलास में घोल कर पी लिया करते थे। लेकिन कईं बार गैस्ट्राइटिस के सिंप्टम इतने ज़्यादा होते हैं कि पेट का एसिड बार बार मुंह तक आता है, बहुत ही अजीब सी खट्टी डकारें रूकने का नाम ही नहीं लेती और छाती की जलन परेशान कर देती है ....ऐसे में एक एमरजैंसी तरीके के तौर पर इस OMEZ- Insta को ट्राई किया जा सकता है। लेकिन यह ध्यान रहे कि इस का रैगुलर इस्तेमाल आप केवल अपने चिकित्सक की सलाह से ही कर सकते हैं क्योंकि जिन मरीज़ों को इस दवाई को रैगुलरी लेना होता है उन की अलग से इंडीकेशन्ज़ हैं, उन की अलग से डोज़ है। इसलिये बिना डाक्टरी सलाह के तो इसे आप एक एमरजैंसी हथियार के तौर पर ही इस्तेमाल कर सकते हैं। इतना ध्यान अवश्य रहे।

मुझे जो भी नई बात पता चलती है ...चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो, बस यही इच्छा होती है कि झट से नेट पर डाल दूं क्योंकि लगता है अगर दो बातें मेरी लिये ही नईं हैं तो शायद बहुत से और लोगों के लिये भी नईं ही होंगी ....और खासकर अगर वे बातें चिकित्सा के क्षेत्र से हों तो उन्हें सब से साझा करना तो और भी ज़रूरी हो जाता है।

Thursday, April 10, 2008

राजू अजीब सी मुसीबत में है !!


राजू इस समय बहुत मुसीबत में है...किसी मित्र के रेफरेंस के साथ मेरे से बातचीत कर के मार्ग-दर्शन के लिये कुछ दिन पहले आया था। वह 30-35 साल का एक स्वस्थ नौजवान है....शादीशुदा है, बाल-बच्चे हैं। उसे चार वर्ष से एक ही समस्या है कि पेशाब करने के बाद भी कुछ कुछ पेशाब की बूंदे टपकने की वजह से उस की पैंट गीली हो जाती है। चार वर्ष पहले उस ने इस के लिये किसी डाक्टर के कहने पर एक अल्ट्रा-साऊंड करवाया था.....उस में बाकी सब कुछ तो नार्मल था, लेकिन प्रोस्टेट ग्लैंड ( इस एरिया में तो इसे गदूद ही कहते हैं) में सूजन आई थी। तब, उसे इस के लिये कुछ दवाईयां किसी डाक्टर ने दे दी। उस डाक्टर ने उसे यह भी समझा दिया कि ज़्यादा मिर्च-मसाले मत खाया करो, सादा आहार लिया करो........खैर, इन चार सालों में वह कईं तरह तरह के डाक्टरों के पास चक्कर काट काट कर परेशान हो चुका है.....इन सब पर खूब खर्चा कर चुका है। जिस दिन वह मेरे से बात करने आया था तो उस से पहले भी वह किसी डाक्टर से मिल कर ही आ रहा था, सो उस के हाथ में केवल एक दवाईयों का नुस्खा और वही चार साल पुरानी अल्ट्रा-साउंड की रिपोर्ट थी।

मैंने उस की पूरी पर्सनल हिस्ट्री लेने के बाद जब यह जानना चाहा कि तकलीफ़ जो चार साल से चल रही है, उस में इन दिनों क्या कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। तब उस ने मन खोल कर बात की कि उसे शायद पेशाब करने के बाद भी बूंद-बूंद टपकने से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन पिछले चार-महीनों से उसे सैक्स में थोड़ी कठिनाई होने लगी है। उस समय मेरा उस से यह पूछना ज़रूरी था कि किस किस्म की कठिनाई.....मैं जानना चाह रहा था कि किसी तरह का डिस्चार्ज तो नहीं होता, कहीं से कोई रक्त तो नहीं बहता...........लेकिन उस ने झट से बतला ही दिया कि मुझे यह सब कुछ नहीं है ....लेकिन उसे अपनी पत्नी के पास जाने में हिचकिचाहट सी होने लगी है.....और वह भी इरैक्शन में तकलीफ़ की वजह से !....मैंने उस से यह पूछा कि तुम अभी जिस डाक्टर से दवा लेकर आ रहे हो,उसे इस के बारे में बताया था.....तो उसने कहा कि उन के पास उस समय बहुत से मरीज़ खड़े थे और उन्होंने उस बूंद-बूंद वाली शिकायत सुनने के बाद आगे कोई सवाल पूछा ही नहीं था।

राजू नाम के शख्स को मिलने के बाद मैं काफी समय यही सोचता रहा कि जिन मरीज़ों को सही समय पर सही विशेषज्ञ के पास रैफर कर दिया जाता है ...वे बहुत भाग्यवान होते हैं....नहीं तो अकसर देखते हैं कि छोटे छोटे रोग यूं ही विकराल रूप धारण कर लेते हैं जिन की वजह से सेहत की , रूपये-पैसे की बर्बादी तो होती ही है और साथ ही साथ जो परेशानी होती है उस का तो कोई हिसाब ही नहीं । राजू यह भी बता रहा था कि जिस डाक्टर को भी मिला है उन सब ने यही कहा है कि कुछ नहीं है....बस, तुम खाना-पीना हल्का खाया करो। लेकिन राजू की आदतें जानने से नहीं लगता कि इस तरह की बातों में कोई गड़बड़ है...उसे न तो कोई व्यसन है और न ही वह दूसरी औरतों वगैरा के चक्कर में है। मैं भी यही सोच रहा था कि जिन जिन चिकित्सकों को यह बंदा मिला है उन्होंने बस दवाईयां देकर ही उसका इलाज करना चाहा....अभी जो उसकी मौजूदा शिकायत है( इरैक्टाइल डिस्फंक्शन वाली ) उस के लिये भी उसे यही कहा गया कि देखो, ऐसा कुछ नहीं हो सकता, यह तो तुम्हारे मन की ही उपज है। लेकिन मरीज कितना इंटैलीजैंट है ...उस से बात कर के पता चल जाता है.....राजू को अपनी नौकरी के सिलसिले में दो-तीन महीने किसी दूर जगह पर तैनात रहना पड़ता है....उसे इस दौरान कभी कभार स्वपन-दोष( night-fall) भी होता है जिसकी उसे कोई टैंशन नहीं है क्योंकि किसी चिकित्सक ने उसे यह बतला दिया हुया है कि वह सब नार्मल है। जागरूकता के इतने स्तर के बारे में जान कर तसल्ली भी हुई ।

बात सोचने की है कि एक 30-35 साल का स्वस्थ नौजवान दिन में कईं बार रैज़िडूयल यूरीन की वजह से पैंट गीली होने की बात कर रहा है और अब चार महीने से उस की सैक्सुयल लाइफ भी डिस्टर्ब हो रही है............ऐसे में क्या कुछ कैप्सूल-गोलियां थमा देने से सब कुछ ठीक ठाक हो जायेगा। बिना किसी तरह की प्रोस्टैट की ढंग से जांच किये बगैर कैसे आप किसी को यह कह सकते हो कि सब कुछ तुम्हारे मन में ही है....हां, अगर किसी विशेषज्ञ ने सारे टैस्ट कर लिये होते, सब कुछ दुरूस्त मिलता तो बहुत माइल्डली समझाया जा सकता है कि सब कुछ ठीक हो जायेगा.....तुम इस की बिल्कुल भी चिंता न किया करो।

तो, मैंने तो उसे यही सलाह दी कि उसे किसी अच्छे यूरोलॉजिस्ट से मिल लेना चाहिये.......वह प्रोस्ट्रेट-ग्लैंड को क्लीनिकली चैक करेगा, उस का नया अल्ट्रा-साउंड करवायेगा, शायद कुछ ब्लड-यूरिन टैस्ट वगैरा भी होंगे........यह सब कुछ करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि आखिर प्रोस्ट्रेट ग्लैंड इतने सालों से क्यों प्राबल्म कर रहा है, क्यों हो रही है इस तरह की सैक्सुयल समस्या ....क्या इस का प्रोस्ट्रेट की सूजन से कोई संबंध है, इस पुरानी प्रोस्ट्रेट की तकलीफ के कारण किसी तरह की इंफैक्शन किसी दूसरी तरफ तो नहीं फैल चुकी, क्या इस तकलीफ का समाधान आप्रेशन से होगा.....क्या वह लैपरोस्कोपी(दूरबीन) से संभव है......इसी तरह के ढ़ेरों सवालों के जवाब उस विशेषज्ञ के पास ही हैं......बाकी लोग तो तुक्के मारते रहेंगे, टोटके बताते रहेंगे।

उम्मीद है कि मेरी इस पोस्ट के पीछे छिपी स्पिरिट को आप समझ गये होंगे कि आज कल हमें अगर सही समय पर सही सलाह मिल जाती है तो वह अनमोल है.........इसलिये कभी भी सैकेंड ओपिनियन लेने में भी नहीं झिझकना चाहिये। मानव की शरीर, उस की फिज़ियॉलॉजी, साईकॉलॉजी .....बहुत ही कंप्लैक्स बात है..........इसे हम लोग विशेषकर जब कोई किसी अंग की ऑरगैनिक व्याधि ( organic disease) से ग्रस्त हो तो ऐसे ही नीम-हकीमों के चक्कर में न पड़ते हुये किसी विशेषज्ञ चिकित्सक का रूख करने में ही बेहतरी है।

मैंने तो पूरी कोशिश की है कि अपनी बात प्रभावपूर्ण तरीके से आप के सामने रख सकूं,.....वैसे जाते जाते यह ज़रूर बतलाना चाहूंगा कि यह राजू वाला किस्सा शत-प्रतिशत सच्चाई पर आधारित है लेकिन उस का नाम मैंने ज़रूर बदला है-- Simply because of the fact there can never ever be any compromise with the confidentiality clause of doctor-patient relationship.


Sunday, April 6, 2008

इन ढाबे वालों से ऐसी उम्मीद न थी !




वैसे तो इस समय सुबह के पांच भी नहीं बजे और किसी भी लिहाज से खाने का समय नहीं है। लेकिन यह ढाबे वाली खबर देख कर मुझे पूरा विश्वास है कि आप की तो भूख ही छू-मंतर हो जायेगी। ले-देकर इन देश की जनता जनार्दन के पास पेट में दो-रोटी डालने के लिये एक ही तो ताज़ा, सस्ता और साफ़-सुथरा विकल्प था.....ढाबे का खाना।


अकसर हम लोग जब भी कहीं बाहर हुया करते हैं तो कहते ही हैं ना कि चलो, ढाबे में ही चलते हैं क्योंकि यह बात हम लोगों के मन में विश्वास कर चुकी है कि इन ढाबों पर तो सब कुछ विशेषकर वहां मिलने वाली बढ़िया सी दाल( तड़का मार के !)….तो ताज़ी मिल ही जायेगी............लेकिन इस रिपोर्ट ने तो उस दाल का ज़ायका ही खराब कर दिया है ...........आप ने भी कभी सोचा न होगा कि इस तरह के रासायन ढाबों में भी इस्तेमाल होते हैं ताकि शोरबा स्वादिष्ट बन जाये।


वो अलग बात है कि मुझे यह पढ़ कर बेहद दुःख हुया क्योंकि मेरे विश्वास को ठेस लगी है.....मुझे ही क्या, सोच रहा हूं कि इस देश की आम जनता की पीठ में किसी ने छुरा घोंपा है.......लेकिन इस हैल्थ-रिपोर्ट को देख कर खुशी इसलिये हुई कि इस में सब कुछ बहुत बैलेंस्ड तरीके से कवर किया गया है। बात सीधे सादे ढंग से कहने के कारण सीधी दिल में उतरती है। शायद इसीलिये मैंने भी आज से एक फैसला किया है....आज से ढाबे से लाई गई सब्जी/भाजी जहां तक हो सके नहीं खाऊंगा....हां, कहीं बाहर गये हुये एमरजैंसी हुई तो बात और है, लेकिन वो ढाबे के खाने का शौकिया लुत्फ लूटना आज से बंद, वैसे मैं तो पहले ही से इन की मैदे की बनी कच्ची-कच्ची रोटियां खा-खा कर अपनी तबीयत खराब होने से परेशान रहता था, लेकिन इन के द्वारा तैयार इस दाल-सब्जी के बारे में छपी खबर ने तो मुंह का सारा स्वाद ही खराब कर दिया है.....सोचता हूं कि उठ कर ब्रुश कर ही लूं !

6 comments:

Gyandutt Pandey said...

खाना तो घर का ही अच्छा जी। सूडान पढ़ कर लगता है - कहां जा रहे या क्या खा रहे हैं।

दिनेशराय द्विवेदी said...

जब जब भी बाहर खाया पछताया, लौट कर बुद्धू घर को आया।

DR.ANURAG ARYA said...

डाक्टर साहेब ,आपके यमुनानगर तक पहुँचते पहुँचते G. T रोड पे इतने ढाबे है ...पर आपकी बात पढ़के यकीनन उस तड़का दाल को भूलना पड़ेगा.......

अमिताभ फौजदार said...

ghar ke kahne se behatar kuch nahi hota ....yahi param satya hai !!

राज भाटिय़ा said...

चोपडा जी हम तो वेसे ही नही खाते बाहर का खाना मां ओर पिता जी ने शुरु से ऎसी आदते डाल रखी हे,वही आदते मेने बच्चो मे भी डाली हे,जी कभी छुट्टियो पर हो तो मज्बुरी मे जाना पडता हे, बाकी तो घर की दाल ही मुर्गी बराबर हे,

Dr Prabhat Tandon said...

घर का खाना सबसे अच्छा , जब-२ बाहर खाये तब झेले ।


Friday, March 21, 2008

रंगों का त्योहार.......न लाये रोगों की बौछार !


कहते हैं कि भगवान कृष्ण टेसू के फूलों से होली खेला करते थे जो कि होली का एक पारंपरिक रंग है। ये फूल तो वैसे औषधीय गुणों से भी लैस होते हैं। इन्हें एक रात के लिये पानी में भिगो दिया जाता है, खुशबूदार संतरी पीले रंग के लिये इन्हें उबाला भी जा सकता है। प्रकृति में तो सभी रंगों का भंडार है और इन्हीं से प्राकृतिक रंग बनाये जाते हैं। कुछ रंग तो हम आसानी से घर पर ही बना सकते हैं।


जैसे जैसे समय बदलता गया.....अन्य चीज़ों के साथ-साथ होली का स्वरूप भी अच्छा खासा बदला हुया दिख रहा है। होली के दिन हम चमकीले रंग वाले पेंट से लोगों के चेहरों को पुते हुये देखते हैं। और कुछ नहीं तो पानी से भरी बाल्टीयां, पानी से भरे गुब्बारे राहगीरों पर फैंक कर ही उन्हें परेशान करने का एक सिलसिला कईँ सालों से शुरू है।


होली रंगों और खुशियों का त्योहार है...लेकिन बाज़ार में बिकने वाले रंग कोरे कैमिकल्स हैं....इन में ऐसे अनेक पदार्थ मौजूद रहते हैं जो हम सब की सेहत तो खराब करते ही हैं, इस के साथ ही साथ ये कैमिकल्स पानी में रहने वाले जीवों के लिये भी विषैले होते हैं। इन्हीं कैमिकल्स की वजह से चमड़ी एवं आंखों के रोगों के साथ-साथ दमा एवं एलर्जी भी अकसर हो जाती है। एक अनुमान के अनुसार यदि दिल्ली की आधी जनसंख्या भी करीब 100ग्राम कैमिकल्स युक्त रंग प्रति व्यक्ति इस्तेमाल करे तो इससे लगभग 70टन कैमिकल्स यमुना में मिलने की संभावना रहती है।


विभिन्न तरह के पेंटस जिन में कारखानों में इस्तेमाल होने वाले रंग, इंजन आयल, कापर सल्फेट, क्रोमियम आयोडाइड, एल्यूमीनियम ब्रोमाइड, लैड ऑक्साइड एवं कूटा हुया कांच .........ये सब कैमिकल्स को निःसंदेह चमकीला तो बना देते हैं, लेकिन हमारे शरीर को इनसे होने वाले नुकसान के रूप में बहुत बड़ा मोल चुकाना पड़ता है। इन के दुष्प्रभावों से हमारा शरीर, मन और मस्तिष्क कईं बार स्थायी तौर पर प्रभावित हो सकता है। बाज़ार में उपलब्ध कुछ रासायनिक रंगों की थोड़ी चर्चा करते हैं.....

काला रंग (लैड ऑक्साइड

)...यह रंग गुर्दे व मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है।

हरा रंग( कॉपर सल्फेट)...इसे आम भाषा में नीला थोथा कहते हैं। इस को लगाने से आँखों की एलर्जी व अस्थायी अंधापन हो सकता है, वैसे तो इस कैमिकल से होने वाले भयंकर घातक प्रभावों के बारे में तो आप सब भली-भांति परिचित ही हैं।

बैंगनी रंग( क्रोमियम ऑयोडाइड)...इस के इस्तेमाल से दमा ओर एलर्जी होती है।

सिल्वर रंग( एल्यूमीनियम ब्रोमाइड)...यह रंग कैंसर पैदा कर सकता है।

लाल रंग ( मरक्यूरिक सल्फाइट)...इस के इस्तेमाल से चमड़ी का कैंसर, दिमागी कमज़ोरी, लकवा हो सकता है और दृष्टि पर असर पड़ सकता है।


तो फिर क्या सोचा है आपने ?.....सुरक्षित होली खेलने के लिये हमें प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करना चाहिये जो कि कईं जगहों पर उपलब्ध होते हैं लेकिन विभिन्न प्रकार के फूलों से इन्हें घर में ही प्राप्त कर लेते हैं। कईं लोग लाल चंदन पावडर से होली खेलते हैं। एक बात है ना....होली कैसे भी खेलें...लेकिन प्रेम से....होली को गंदे तरीके से खेल कर ना तो हमें अपना और ना ही किसी और का मज़ा किरकिरा करना है। जहां तक हो सके...अपने मित्रों, रिश्तेदारों एवं परिचितों के साथ ही होली खेलें....ऐसे ही हर राहगीर पर पानी फैंकना तो होली ना हुई!


वैसे मुझे इस समय ध्यान आ रहा है कि होली के त्योहार पर फिल्माए गये फिल्मों के सुप्रसिद्ध गीत जो सुबह से ही रेडियो, केबल और लाउड-स्पीकरों पर उस दिन बजते रहते हैं, वे लोगों के उत्साह में चार चांद लगाने का काम करते हैं। लेकिन मेरी पसंद में सब से ऊपर शोले फिल्म का यह वाली गीत है........जिसे मैं होली के बिना भी बार-बार सुन लेता हूं और इस में ऊधम मचा रहे हर बंदे के फन की दाद दिये बिना नहीं रह सकता। आप को इन सब हुड़दंगियों के साथ यह उत्सव मनाने से कौन रोक रहा है ............तो मारिये एक क्लिक और हो जाइए शुरू !!


PS…..पंकज अवधिया जी , आप तो वनस्पति विज्ञान के बहुत बड़े शोधकर्त्ता हो, मेरी एक समस्या का समाधान कीजिये। मैं इन मच्छरों से बहुत परेशान हूं......सुबह सुबह ढंग से पोस्ट भी नहीं लिखने देते। इसलिये हम सब लोगों को आप यह बतलायें कि क्या कोई ऐसा घास,कोई ऐसा पौधा नहीं बना ...या कोई ऐसी चीज़ जो इन पौधों से प्राप्त होती हो जिस की धूनि जला कर इन मच्छरों को दूर भगाया जा सके। मुझे आशा है कि आप के पास इस का भी ज़रूर कोई फार्मूला होगा......तो शेयर कीजियेगा। दरअसल बात यह भी है ना कि इन कैमिकल युक्त मच्छर-भगाऊ या मच्छर-मारू टिकियों एवं कॉयलों के ज़्यादा इस्तेमाल से भी डर ही लगता है....रात को तो चलिये मज़बूरी होती है लेकिन सुबह उठ कर इन्हें इस्तेमाल करने की इच्छा नहीं होती। अवधिया जी, आप ही इस परेशानी का हल निकाल सकते हैं। एडवांस में धन्यवाद और होली की मुबारकबाद....।

रूकावट के लिये खेद है............अब आप होली के रंग में रंगे इन हुड़दंगियों के जश्न में शामिल हो सकते हैं।


5 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

आपको होली की कोटिश: बधाईयाँ !

राज भाटिय़ा said...

आपको भी होली की शुभकामनाएं !!

परमजीत बाली said...

एक अच्छी पोस्ट के सा्थ ,होली के अच्छे रंग बिखेरे हैं। होली मुबारक।

Gyandutt Pandey said...

सही में रसायनिक होली नहीं होनी चाहिये। मैं तो एलर्जी के कारण न सूखे न गीले रंगों का प्रयोग करता हूं।
हां होली का मन होना चाहिये - जरूर। होली मुबारक जी।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

क्षमा करे आने मे देरी हो गयी। आप कहाँ पर है यह तो मुझे पता नही पर अभी पूरे देश मे ब्लूमिया लेसेरा नामक खरपतवार उग रहा है। इसे कुकरौन्दा भी कहा जाता है। इसे सुखाकर जलाने से अच्छी सुगन्ध भी आयेगी और मच्छर भी भागेंगे। आयुर्वेद मे दमा के लिये इस धुँए को लाभकारी माना गया है खासकर अटैक के समय। यहाँ होली मे इसी पौधे को जलाने की सलाह मै देता हूँ ताकि पूरे शहर को मच्छरो से मुक्ति मिल सके। ब्लूमिया के चित्रो और इस पर मेरे आलेखो की कडी नीचे दी गयी है। फिर भी पहचान मे दिक्कत हो तो निसंकोच लिखे।


http://ecoport.org/ep?Plant=3744&entityType=PL****&entityDisplayCategory=eArticles

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&Subject=blumea&Author=oudhia&SubjectWild=CO&Thumbnails=Only&AuthorWild=CO

सत्तर से अधिक शोध आलेख और 400 से अधिक चित्र है इन कडियो मे।

Monday, February 4, 2008

संडे हो या मंडे--रोज़ खाओ अंडे.....लेकिन इसे पढ़ने के बाद !



मुझे पता है कि आप ने वह संडे हो या मंडे- रोज़ खाओ अंडे वाला विज्ञापन बहुत बार देखा है, लेकिन आज कल चूंकि देश के कुछ हिस्सों में बर्ड-फ्लू के नाम से थोड़े भयभीत से हैं, इसलिए कुछ बातों की तरफ ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।

· विशेषज्ञों ने कच्चे एवं हॉफ-ब्वायलड ( raw and soft boiled eggs) अंडो से परहेज़ करने की सलाह दी है। जिन अंड़ों को उच्च तापमान पर पकाया नहीं जाता, उन के खाने से बर्ड-फ्लू के जीवाणु के इलावा टॉयफाड एवं अन्य जीवाणुओं से होने वाली बीमारियों का खतरा मंडराता रहता है।

· बर्ड-फ्लू से बचने के लिए केवल पूरी तरह उबले अंडों (full boiled eggs) का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

· दूध में कच्चे अंडे डाल कर नहीं पीना चाहिए । आधे उबले अंडों ( half- boiled eggs) एवं ऐसे अंडे जिन का योक- अर्थात् वही पीला भाग- तरल सी अवस्था में बह रहा हो ( runny yolk) ,इन का भी सेवन नहीं करना चाहिए।

· जो लोग बाहर खाते हैं उन्हें भी इस बात को सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि अंडे से बनी सभी पकवानों को उच्च तापमान पर ही तैयार किया गया है। सामान्यतः एक हॉफ-ब्वायलड अंडे को तैयार होने में तीन मिनट, मीडियम ब्वायलड को पांच मिनट और फुल-ब्वायलड अंडे को तैयार होने में दस मिनट का समय लगता है।

· विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि केक खाना सुरक्षित है ...चूंकि उस में अंडा पड़ा होता है, लेकिन केक की बेकिंग के लिए 200डिग्री सैल्सियस का तापमान चाहिए होता है, जिस के परिणामस्वरूप अंडे में मौजूद बैक्टीरिया एवं अन्य जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। यह ध्यान रहे कि हॉफ-ब्वायलड अंडे आम तौर पर रशियन सलाद जैसी प्रैपरेशन्स में डलते हैं।

· एक बात जो बहुत ही ज़रूरी है लेकिन कभी कोई इस तरफ कम ही ध्यान देता है ..वह यह है कि अंडों को इस्तेमाल करने से पहले धो लेना निहायत ही ज़रूरी है क्योंकि जीवाणु केवल अंडे के शैल ( shell of egg) के अंदर ही नहीं होते, ये शैल के बाहर भी मौजूद हो सकते हैं। और एक बात और भी इतनी ही ज़रूरी है कि कच्चे अंडों को हाथ लगाने के बाद भी हाथ धोना ज़रूरी है।

So, take care !!

2 comments:

Gyandutt Pandey said...

डाक्टर साहब, मैं तो अण्डा नहीं खाता पर पोस्ट में निहित खाद्य सामग्री को उच्च ताप पर जीवाणु रहित करना समझ में आया।
कुछ लोग बर्ड फ्लू के कारण सस्ते चिकन का इस आधार पर अधिक सेवन कर रहे हैं कि उसे कस कर कूकर में कुक कर लेते हैं। कितना उचित है उनका यह करना?

Dr.Parveen Chopra said...

लेकिन यह जानकारी तो केवल अंडो तक ही सीमित है। सस्ते चिकन से तो मेरी समझ से बच कर रहने में ही समझदारी है।

Friday, January 25, 2008

अब पैरों के तलवों का तापमान देखने के लिए भी थर्मामीटर....


मुंह के अंदर थर्मामीटर रख कर या जांघों के अंदर थर्मामीटर रख कर किसी रोगी के टैम्परेचर का पता करने से तो हम सब लोग परिचित ही हैं, लेकिन आप भी इस पैरों के तलवों का तापमान देखने के लिए निकाले नये थर्मामीटर के बारे में सुन कर हैरान से तो हो ही गये होंगे। कुछ दिन पहले एक मैडीकल न्यूज़ दिखी कि अब शुगर के रोगियों के पैरों को घाव से बचाने आ गया है यह विशेष थर्मामीटर जिस से वे नियमित अपने पैरों के तलवों का तापमान देख सकेंगे। अगर तलवे में किसी भी जगह तापमान बढ़ा हुया पाया जाएगा तो उसे तापमान को कम करने की सलाह दी जायेगी.....यह सब इसलिए कि किसी तरह से डायबिटीज़ के रोगियों को अकसर उन के पांव में होने वाले घाव से बचाया जा सके।
शायद आप को यह मालूम हो कि ...Sometimes diabetics lose the gift of pain…….इस से मतलब यह है कि शुगर के कुछ मरीज़ों में पैर सुन्न हो जाते हैं....पैरों में नंबनैस(numbness) होने की वजह से उन्हें उन में किसी तरह का दर्द महसूस नहीं होता जिस की वजह से उन के पांवों में घाव बनने की संभावना बढ़ जाती है। और होता यह भी है कि शूगर के रोगियों में इस तरह के घाव ठीक होने में काफ़ी समय ले लेते हैं और कईं बार तो इन मामूली से दिखने वाले घावों में इंफैक्शन भी हो जाती है, जो कईं बार इतनी बढ़ जाती है कि पैर का कुछ हिस्सा सर्जरी के द्वारा काटना (amputation) भी पड़ता है, अन्यथा कईं बार गैंगरीन( gangrene) होने से पूरी टांग को ही खतरा हो जाता है और यहां तक कि जान पर भी आन पड़ती है।
अमेरिका में तो एक वर्ष में 80,000 शुगर-रोगियों को अपने पैर के अंगूठे, पैर अथवा टांग के निचले हिस्से की ऐँपूटेशन के आप्रेशन से गुज़रना पड़ता है।
दोस्तो, बात मैंने शुरू की थी, उस थर्मामीटर से जो पैर के तलवों का तापमान जांचा करेगा---चूंकि अब अमेरिका में यह चल निकला है तो यहां पहुंचते भी देर न लगेगी ( Thanks to the wonders of globalization!!)……लेकिन क्या इस देश के बाशिंदे इस थर्मामीटर को खरीदने से पहले कुछ बिल्कुल सीधी-सादी सी दिखने वाली ( लेकिन बेहद महत्वपूर्ण) बातों पर भी प्लीज़ ध्यान देने की ज़हमत उठाएंगे।
तो सुनिए, दोस्तो, डायबीटीज़ एक ऐसी बीमारी है जिसे मैंने अपने आस-पास बहुत बुरी तरह से मैनेज होता देखा है। जैसा कि आप जानते हैं कि इस देश में हम सब की प्राबल्मस कुछ ज्यादा ही कम्पलैक्स हैं...इसलिए किसी तरफ़ भी दोष की उंगली करना इतना आसान नहीं है।
शुगर के मरीज़ महीनों तक बिना ब्लड-शुगर की जांच करवाए दवाई खाते रहते हैं.....कुछ बीच में ही छोड़ देते हैं कि अब उन्हें ठीक लग रहा है. लेकिन बात ठीक लगने की नहीं है न, ठीक तो उन्हें लग रहा होगा, ठीक है, लेकिन वे विभिन्न प्रकार की जांच से चिकित्सक को भी तो ठीक लगने चाहिए। अच्छा, एक बात और कि एलोपैथिक दवा लेते हैं, बीच में आयुर्वैदिक दवा साथ में शुरू कर देते हैं, कुछ समय बाद कुछ पुडियां जो कोई नीम-हकीम थमा देता है वे खानी शुरू कर देते हैं, फिर कोई देसी दवा किसी ने बताई वह खानी शुरू कर दी......दोस्तो, मेरी इन मरीज़ों से पूरी सहानुभूति है....किसी भी बीमारी को भुगत रहा बंदा कोई भी जगह नहीं छोड़ता................लेकिन दोस्तो, ऐसे तो नहीं हो पाएगी शुगर कंट्रोल।
एक बार विशेष और यह भी है कि वे न तो नियमित छःमहीने बाद आंख की जांच ही करवाने जाते हैं , और न ही अपने गुर्दों एवं हृदय की जांच ही नियमित करवाते हैं .....अनियंत्रित शुगर रोग शरीर के इन टारगेट अंगों पर अपनी मार करता रहता है, इसलिए इन की नियमित जांच भी जरूरी है। वैसे तो अब इस तरह के टैस्ट भी मौजूद हैं( glycosated haemoglobin) – ग्लाईकोसेटिड हिमोग्लोबिन इत्यादि) जिन के करवाने से आप के पिछले कुछ महीने के डायबीटीज़ के कंट्रोल की एकदम सही जानकारी फिज़िशियन को मिल जाती है।
एक बात और भी बहुत ज़रूरी है कि किसी अच्छी क्वालीफाईड एवं विश्वसनीय लैब से ही रक्त-जांच करवाया करें ...यह बहुत ज़रूरी है। वैसे तो आजकल हर मोहल्ले की नुक्कड़ पर ये लैब्स खुल गईं हैं, लेकिन ज़रा देख लिया करें।
मेरे ख्याल में शुगर रोगी कोई भी चिकित्सा पद्धति अपनाए, लेकिन परहेज का भी पूरा ध्यान रखे, शारीरिक कसरत करे, प्राणायाम् एवं योग भी जरूरी है, और फिज़िशियन द्वारा नियमित जांच भी जरूरी है, यह सब कुछ करने पर शायद आप की शुगर इतनी कंट्रोल रहने लगे कि आप के चिकित्सक को आप की दवाईंयां या तो कम करनी पड़े या कभी कभी बंद ही करनी पड़ें। लेकिन इस मेँ अपनी मरजी की कोई गुंजाइश है ही नहीं, जो भी हो चिकित्सक की सलाह से।
और हां, अभी वह थर्मामीटर अपने यहां आने तो दीजिए, लेकिन पहले यह बताएं कि क्या आप अपने फिजिशियन द्वारा पैरों पर घाव से बचने के लिए बताई गई सारी सावधानियां बरत रहे हैं......Because they are probably much…much …much more important than keeping that thermometer by your bed-side…..
Good luck, friends !!

Tuesday, January 22, 2008

थोड़ी थोड़ी पिया करो...?


तंग आ गया हूं, दोस्तो, मैं मरीजों की इस बात का जवाब दे देकर जब वे यह कहते हैं कि यह बात तो आजकल आप डाक्टर लोग ही कहते हो कि थोड़ी थोड़ी पीने में कोई खराबी नहीं है। इस का जो जवाब मैं उन्हें देता हूं—उस पर तो मैं बाद में आता हूं, पहले ब्रिटेन में हुई एक स्टडी के बारे में आप को बताना चाहूंगा।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्चकर्त्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि जिन लोगों की जीवन-शैली में चार स्वस्थ आदतें शामिल हैं----धूम्रपान न करना, शीरीरिक कसरत करना, थोड़ी-थोड़ी दारू पीना,और दिन में पांच बार किसी फल अथवा सब्जी का सेवन करना ---- ये लोग उऩ लोगों की बजाय 14वर्ष ज्यादा जीतें हैं जिन लोगों में इन चारों में से कोई एक बिहेव्यिर भी नहीं होता। इस रिसर्च को 45 से 79 वर्ष के बीस हज़ार पुरूषों एवं औरतों पर किया गया।

यह तो हुई इस रिसर्च की बात....अब आती है मेरी बात...अर्थात् बाल की खाल उतारने की बारी। एक बार ऐसा अध्ययन लोगों की नज़र में आ गया ,तो बस वे समझते हैं कि उन्हें तो मिल गया है एक परमिट पूरी मैडीकल कम्यूनिटी की तरफ से कि पियो, पियो, डोंट वरी, पियो ...अगर जीना है तो पियो......बस कुछ कुछ ठीक उस गाने की तरह ही ....पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए।

अब मेरी व्यक्तिगत राय सुनिए। जब कोई मरीज मेरे से ऐसी बात पूछता है तो मैं उस से पूछता हूं कि पहले तो यह बताओ कि तुम्हारा स्टैंडर्ड आफ लिविंग उन विदेशियों जैसा है.... जिस तरह का जीवन वे लोग जी रहे हैं....क्या आपने तंबाकू का सेवन छोड़ दिया है, रिसर्च ने तो कह दिया धूम्रपान...लेकिन हमें तो चबाने वाले एवं मुंह में रखे जाने तंबाकू से भी उतना ही डरना है। दूसरी बात है शारीरिक कसरत की ---तो क्या वह करते हो। अकसर जवाब मिलता है ...क्या करें, इच्छा तो होती है, लेकिन टाइम ही नहीं मिलता। आगे पूछता हूं कि दिन में पांच बार कोई फल अथवा सब्जी लेते हो.....उस का जवाब मिलता है कि अब इस महंगाई में यह फ्रूट वूट रोज़ाना कहां से ले पाते हैं, दाल रोटी चल जाए – तब भी गनीमत जानिए। तो, फिर मेरी बारी होती है बोलने की ---जब पहली तीन शर्तें तो पूरी की नहीं, और जो सब से आसान बात लगी जिस से अपनी बीसियों साल पुरानी आदत पर एक पर्दा डालने का बहाना मिल रहा है, वह अपनाने में आप को बड़ी सुविधा महसूस हो रही है।

इसलिए मैं तो व्यक्तिगत तौर पर भी ऐसी किसी भी स्टेटमैंट का घोर विरोधी हूं जिस में थोड़ी-थोडी़ पीने की बात कही जाती है। इस के कारणों की चर्चा थोडी़ विस्तार से करते हैं। दोस्तो, हम ने न तो खाने में परहेज किया...घी, तेल दबा के खाए जा रहे हैं, ट्रांस-फैट्स से लैस जंक फूड्स में हमारी रूचि दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, उस के ऊपर यह दारू को भी अपने जीवन में शामिल कर लेंगे तो क्या हम अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का काम नहीं करेंगे। शत-प्रतिशत करेंगे, क्यों नहीं करेंगे !

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि सेहत को ठीक रखने के लिए आखिर दारू का क्या काम है....This is just an escape route…... अब अगर हम यह कहें कि मन को थोड़ा रिलैक्स करने के लिए 1-2 छोटे छोटे पैग मारने में क्या हर्ज है, यह तो बात बिलकुल अनुचित जान पड़ती है, वो वैस्टर्न वर्ड तो इस तनाव को दूर भगाने के लिए अपने यहां की ओरियंटल बातों जैसे कि योग, मैडीटेशन को अपना रहा है और हम वही उन के घिसे-पिटे रास्ते पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

एक बात और भी है न कि अगर छोटे-छोटे पैग मारने की किसी डाक्टर ने सलाह दे भी दी, तो क्या गारंटी है कि वे छोटे पैग पटियाला पैग में नहीं बदलेंगे। क्योंकि मुझे पता है न कि हमारे लोग इस सुरा के मामले में इतने मैच्योर नहीं है। यह जानना भी बेहद जरूरी है कि अच्छी क्वालिटी की शराब कुछ कम खराब असर करती है और वह भी तब जब साथ में खाने का पूरा ध्यान रखा जाए..यानि प्रोटीन का भी पीने वालों की डाइट में पूरा समावेश हो। अमीर देशों में तो वे ड्राइ-फ्रूट को भी पीते समय साथ रखते हैं............लेकिन हमारे अधिकांश लोग न तो ढंग की दारू ही खरीदने में समर्थ हैं, न ही कुछ ढंग का खाने को ही रखते हैं.....अब कटे हुए प्याज को आम के आचार के साथ चाटते हुए जो बंदा दारू पी रहा है, वह अपना लिवर ही जला रहा है, और क्या ! इस का अभिप्रायः कृपया यह मत लीजिए कि महंगी शराब जिसे काजू के साथ खाया जाए उस की कोई बात नहीं ----बात है, दोस्तो, बिल्कुल बात है। नुकसान तो वह भी करती ही है -----There is absolutely no doubt about that.

एक बात और भी है न कि जब आदमी शराब पीनी शुरू करता है न, तो पहले तो वह उस को पीता है, बाद में मैंने तो अपनी प्रैक्टिस में यही देखा है कि उस की ज़रूरत बढ़ती ही जाती है......जैसे लोग कहते हैं न कि फिर शराब बंदे को पीना शुरू कर देती है,और धीरे धीरे उस को पूरा चट कर जाती है।

क्या मैं नहीं पीता ?---आप की उत्सुकता भी शांत किए देता हूं। दोस्तो, मैं गीता के ऊपर हाथ रख कर सौगंध खा कर कहता हूं कि दारू तो दूर मैंने आज तक बीयर को भी नहीं चखा। इस के लिए मैं ज्यादातर श्रेय गौरमिंट मैडीकल कालेज , अमृतसर की पैथालोजी विभाग की अपनी प्रोफैसर मिसिज वडेरा को देता हूं जिस ने 18-19 साल की उम्र में हमें अल्कोहल के हमारे शरीर पर विशेषकर लिवर पर होने वाले खतरनाक प्रभावों को इतने बेहतरीन ढंग से पढ़ाया कि मैंने मन ही मन कसम खा ली कि कुछ भी हो, इस ज़हर को कभी नहीं छूना। सोचता हूं कि यार, ये टीचर लोग भी क्या ग्रेट चीज़ होते हैं न, क्यों कुछ टीचर्ज़ की बातों में इतनी कशिश होती है, इतना मर्म होता है कि उन की एक एक बात मन में घर जाती है..................क्योंकि वे सब अपना काम दिल से, शत-प्रतिशत समर्पण भाव से कर रहे होते हैं। आप इस के बारे में क्या कहते हैं, दोस्तो, कमैंट्स में लिखना।

सो, Lesson of the story is…….Please, please, please…..please stay away from alcohol…………..यह हमारी सीधी सादी मासूम ज़िंदगी में केवल ज़हर घोलती है। क्या हमारे आसपास वैसे ही तरह तरह का ज़हर कम फैला हुया है कि ऊपर से हमें इस के लेने की भी ज़रूरत महसूस हो रही है।

अच्छा, तो दोस्तो, अब उंगलियों को विराम दे रहा हूं क्योंकि खाने का समय हो गया है।

22.1.08 (9pm)

Thursday, January 17, 2008

छाती में जलन --------आधुनिकता की अंधी दौड़ की देन !


कल ऐसे ही बैठे-बैठे मैंने अपने साथ काम करने वाले एक अन्य डाक्टर से मैंने यह पूछा कि उस ने कितनी बार यह एसिडिटि ( छाती में जलन) खत्म करने वाली गोलियां अथवा कैप्सूल खाए हैं। कभी भी नहीं”- उस का यह जवाब सुन के मुझे कोई ज्यादा हैरानी हुई क्योंकि मुझे भी अभी तक शायद 3-4 बार ही ऐसा कैप्सूल खाने की ज़रूरत पडी होगी। सोचने की बात तो बस यही है कि रोज़ाना ऐसे बीसियों मरीज़ फिर क्यों मिलते हैं जिन्हें छाती में जलन पर काबू पाने के लिए यह कैप्सूल एवं गोलियां सुबह-सुबह ही चाहिए होती हैं।

अकसर इन मरीज़ों को यही सलाह दी जाती है कि उन को इस जलन को ठंडा करने के साथ ही साथ इस की जड़, इस की उत्पति की तरफ भी तो देखने की ज़रूरत है ताकि इस समस्या को जड़ ही से खत्म किया जा सके। इन गोलियों, कैप्सूलों एवं पीने वाली दवाईयों ने तो बस छाती में उस दिन दहक रही आग को ही शांत करना है यह तो बिल्कुल एक टैम्परेरी सा ही काम हुया। लेकिन अपने लोगों की इस टैम्परेरी काम चलाने की आदत ने ही इन दवाईयों को बनाने वाली कंपनियों के सितारों बुलंद किए हुए हैं। इन दवाईयों का तो दोस्तो इस्तेमाल कुछ इतना ज्यादा है कि ऐसे लगता कि जैसे कुछ लोगों ने तो इन को अपने आहार का हिस्सा ही बना लिया है भय तो बस यही है कि कहीं आने वाले समय में इन का इस्तेमाल भी इस माडर्न सोसायटी का एक स्टेटस-सिंबल ही बन कर रह जाए।

ऐसे सभी मरीज़ों को जब मिर्ची खाने से रोका जाता है तो वे अकसर यही कर देते हैं कि दाल-सब्जी के स्वाद के लिए थोड़ी मिर्ची तो खानी ही पड़ती है न।---इसी लिए ये छाती में जलन से निजात पाने के लिए आप को कैपसूल-गोलियां भी रोज़ाना खानी ही पड़ती हैं। जी हां, इस मिर्ची का छाती में होने वाली जलन से बहुत गहरा रिश्ता है। कईं लोग तो ऐसा सोचते हैं कि हरी मिर्ची तो छाती में जलन से परेशान रहने वाले मरीज भी खा ही सकते हैं --- बिल्कुल नहीं, अगर कभी-कभार आप ने हरी मिर्च खानी भी है तो वही खाएं जो बिल्कुल भी तीखी हो.....लेकिन, हां, आप काली मिर्च को इस्तेमाल कर सकते हैं।

आप सब ने यह तो नोटिस किया ही होगा कि इस छाती में जलन के लिए पहले लोग अकसर मीठे सोडे ( बेकिंग सोडा) के एक चम्मच को पानी में घोल कर पी लिया करते थे। है तो वह भी एक बिल्कुल डंग-टपाऊ ( temporary relief) फार्मूला बिल्कुल जलती आग बुझाने जैसे। फिर आईं इस एसिड को खत्म करने वाली गोलियां और पीने वाली शीशीयां जिन का इस्तेमाल पूरे जोरों शोरों से हुया। अब तो दोस्तो इस काम के लिए मिलने वाले तरह-तरह के कैप्सूल लोगों को इतने प्यारे हो गये हैं कि अनपढ़ बंदे को भी इन के अंग्रेज़ी नाम अच्छी तरह से याद हैं।

इन दवाईयों ती तरफ मुंह करने से पहले हमें कुछ बातों की तरफ़ ज़रूर ध्यान देना चाहिए। मिर्ची के इस्तेमाल की बात तो हम ने पहले ही कर ली है, लेकिन दिन में बार-बार चाय पीने वालों में, मद्यपान करने वालों में, मैदे (refined flour) का ज्यादा इस्तेमाल करने वालों में, ज्यादा चिकनाई (fats) , जंक-फूड खाने वालों में, ज्यादा मिठाईयां खाने वालों में, रात को ठूस ठूस कर खाना खाने वालों में तथा सारा दिन बैठे रहने वालों में यह छाती में जलन की तकलीफ बहुत ही आम बात है। एक तरह से देखा जाए तो यह हमारी खुद की ही मोल ली बीमारी है। दोस्तो, इस से बचने के लिए मैदे-जैसे सफेद आटे से बनी हुईं रबड़ जैसी चपातियों से भी बचने की जरूरत है।

जो लोग अकसर ज्यादा तनावग्रस्त हैं, उन में भी यह एसिडिटी की समस्या तो अकसर रहती ही है। तनाव को दूर रखने का तो सब से बढ़िया तरीका तो यही है कि रोज सवेरे 30-40मिनट तेज-तेज सैर की जाए। यह तो सारे शरीर को तंदरूस्त रखने के साथ-साथ हमारे मन को भी प्रसन्नचित रखती है। तनाव को दूर रखने के लिए मैडीटेशन का भी बहुत ही ज्यादा रोल है। रात में सोने से पहले कम से कम दो-तीन घंटे पहले खाना खा लेना ज़रूरी है और रात में खाने के बाद भी थोड़ा टहलना ज़रूरी है।

दोस्तो, विवाह-शादियों, पार्टियों में भी अकसर देखा जाता है कि खाने-पीने के सभी स्टालों पर दौड़ सी लगी होती है। बारात के आने से पहले ही भूख को अच्छी तरह से चमकाने के लिए गोल-गप्पे, चाट-पापड़ियां, टिक्कीयां, नूडल, पाव-भाजी, फ्रूट-चाट और फिर कोफते, शाही पनीर, दही-भल्लों एवं दाल-मक्खनी के साथ तीन-चार नान का जश्न मनाने की ललक और इस सब के बाद गुलाब-जामुन, गाजर के हलवे, मूंग के दाल के हलवे और साथ ही साथ एक ही प्लेट में एक साथ डाली गईं आईसक्रीम-जलेबियों की शामत सी जाती है---- आखिर कैसे रह जाए कोई भी स्टाल हमारी नज़र से बच कर ??--- लेकिन बस उस दिन रात में छाती में जलन की तो क्या, शायद उल्टियों की तैयारी पूरी हो गई।

दोस्तो, कभी कभार अगर थोड़ी बहुत बदपरहेज़ी करने की वजह से छाती में जो जलन सी महसूस होती है उस को तुरंत ठीक करने का एक सुपरहिट घरेलू नुस्खा यही है कि फ्रिज में रखे ठंडे दूध के दो-चार घूंट पी लें---उसी समय आराम मिल जाता है। अपने आप ही छाती में जलन के लिए गोलियां-कैप्सूल खाते रहना बिल्कुल उचित नहीं है। अगर आप बार-बार होने वाली छाती की जलन से परेशान हैं तो अपने क्वालीफाइड डाक्टर से मिलें--- अगर वह कोई दवाईयां लेने की सलाह देता है तो वह आप ज़रूर लें और इससे शायद कहीं ज्यादा जरूरी है कि जो भी परहेज बताया गया है, वह भी बात पूरी तरह से मान लें।

डाक्टर के पास इस छाती में जलन वाली तकलीफ के लिए जाने से पहले आप एक बार यह जरूर देख लें कि क्या आप का खाना-पीना ठीक है, जीवन-शैली ठीक है, क्या आप पूरी नींद लेते हैं.....अगर यह सब कुछ ठीक होने के बावजूद भी आप को अकसर छाती में जलन रहती है तो फिर आप को अपने डाक्टर से मिलना ज़रूरी है। वह फिर आप का पूरा निरीक्षण करेगा, क्या पता किसी बंदे के पेट में छोटा-मोटा ज़ख्म (peptic ulcer) ही हो जो जीवन-शैली में किसी भी तरह का परिवर्तन किए बिना इन कैप्सूल-टेबलैट्स से थोड़ा बहुत दब तो जाता हो लेकिन पता नहीं सही सलाह के बिना वह कब फूट पड़े, क्या पता किसी महिला को पित्ते की पथरीयों की वजह से यह शिकायत रहती हो, या फिर क्या पता किसी बंदे में उस के शरीर में शराब से होने वाले दुष्परिणामों का घड़ा ही भर चुका हो जिस की वजह से वह छाती की जलन से परेशान हो। इस सब की एक विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच होनी जरूरी है।

दोस्तो, बहुत सारे लोगों में केवल अपनी जुबान के ऊपर थोड़ा कंट्रोल कर लेने मात्र से ही यह छाती की जलन उड़न-छू हो जाती है। वैसे बात यह है भी सोचने वाली की केवल अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए हम इतनी तकलीफ़ सहते रहें....क्या यह ठीक है !!

इस ब्लाग की अगली पोस्टों को किन विषयों को देखना चाहेंगे, अगर हो सके तो बताने का कष्ट करें। धन्यवाद !