शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

केक-लैस बर्थ-डे की शुरुआत …..

 


मैं उस ज़माने से हूं जब जन्मदिन का मतलब होता था …सुबह सुबह ढेर सारा हलवा….यह अनुभव वह है जो मैंने देखा ..और जिया….बरसों बरस तक ….यही कुछ २५ बरसों तक …फिर तो केक मिलने आम हो गए….आम तो पहले भी होंगे, लेकिन हमें ही ज़रूरी न लगे होंगे…


खैर, अपने दो जन्मदिन हैं ..एक असली और एक सरकारी …असली जन्मदिन मां ने उस साल के उस महीने में अलग अलग घटनाक्रमों को जोड़ कर बहुत बाद में तैयार की थी ….जैसे कि चीन ने हिंदोस्तान पर उन्हीं दिनों हमला किया था (इस ने साल तय कर दिया)...और नवरात्रोत्सव था उन दिनों …और दूसरा नवरात्र था…इस से महीना तय होगा और दिन और तारीख भी ….इस सब पर मोहर लगा दी हमारे ताऊ जी के पोस्टकार्ड ने जिसमें उन्होंने हमारे आने की बधाई एक कार्ड में लिख भेजी थी …वह कार्ड किसी कारणों से हमारे पिता जी के सरकारी कागज़ों की संदूकची में पड़ा दिख जाता था …हमारी बेवकूफ़ी ने उसे गुम कर दिया है अभी …। 


खैर, यह कोई नईं बात न थी…पहले जन्मदिन ..साल और दिन-महीने को ऐसे ही रि-कंस्ट्रक्ट किया जाता था …


लेकिन अमृतसर के इस्लामाबाद एरिया के जिस स्कूल में जाता था एक दिन उन्होंने कहा कि घर से लेकर आओ किसी को ….मेरी बड़ी बहन १० साल बड़ी है, वह मेरे साथ गई ….मामला यह था कि उन्होंने अपने रिकार्ड में मेरी पक्की जन्म तारीख लिखनी थी ..जहां तक याद है, घर में उस की ब्रिफिंग की गई …उस ज़माने के युवक-युवतियों की तरह वह बड़ी कांफिडेंट थी ….सारी बातचीत उन्होंने की …हां, घर से ब्रिफिंग जो उन की हुई उस में यह भी शामिल था कि एक साल ज़्यादा ही लिखवाना….उन दिनों हमारे मोहल्ले में एक-दो केस ऐसे हो गए थे जिनमें १७ साल की उम्र से कम होने पर किसी का कहीं कालेज में दाखिला न हो सका था …इसलिए हमारे माता-पिता भी अभी से कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहते थे…

खैर, वैसा ही हुआ ..साल तो बहन ने तुरंत बता दिया ….अब मामला महीने और तारीख पर अटक गया…इतना तो लगभग पक्का ही था कि हमने अवतार तो सितंबर ही में लिया है …लेकिन दो चार मिनट सोच विचार कर के, मेरी तरफ़ देख कर (मुझे खाक समझ में कुछ आ रहा था…) उन्होंने २ अक्टूबर पर मोहर लगा दी ..और बस हिंदोस्तान सरकार के रिकार्ड में हमारी जन्म तारीख २ अक्टूबर ही दर्ज हो गई ….


बर्थ-डे केक से बहुत दूर से हम लोग उन दिनों ….


मैं १९६० के दशक के जिस युग की बात कर रहा हूं, यह युग केक-युग से बहुत पहले का युग था …केक तो हमारे ख़्वाबो-ख्याल में भी न था तब…हां, पेस्ट्री महीने में एक-दो बार पिता जी ज़रुर लाते थे ….मल्होत्रा बेकरी से ….लेकिन उस के लिए किसी का जन्मदिन होना ज़रूरी न था….ज़िंदगी में जितनी शुद्ध और बेहतरीन पेस्ट्री खाई …वही थी जिसे स्कूल-कॉलेज के दिनों में खाते रहे …। 


हां, जन्मदिन का मतलब हमारे लिए होता था कि उस दिन मां सुबह पूजा-पाठ कर के बहुत बडी़ पीतल की कडा़ही में ढेर सारा हल्वा (नारियल डाल के) तैयार कर देती …जिसे हम बडे़ चाव से खाते …और अपने जन्मदिन का भरपूर मज़ा लेते …। उन दिनों ज़्यादा खाने वाने के ज़ोमेटो-स्विगी के इतने लफड़े नहीं थे, इसलिए हलवा तो वैसे भी बनता ही रहता था …लेकिन जन्मदिन वाले दिन सुबह सुबह वाले हलवे की बात कुछ तो अलग होती थी ….जहां तक मैं सोच पा रहा हूं …बनता वह भी डालडा घी में ही था…..बाद में शुद्ध घी में हलवा जब बनने लगा तब वह तो स्पेशल इवेंट होता था … 


और हां, शाम के वक्त एक छोटी सी पार्टी होती थी …घर ही में ….समोसे, जलेबी और बर्फी में से कोई १-२ चीज़ें लाई जाती थीं …कईं बार मोतीचूर के लड्‍डू ….मोतीचूर तो मैंने लिख दिया…लेकिन उन दिनों यह मोती-वोती चूर कुछ न थी, बस लड़्डू होते थे …(एक बात याद आ गई ….कईं बार ये इतने सख्त होते थे कि उन्हें बेलन से तोड़ना पड़ा था ….अकसर अडोस पड़ोस में शादी-ब्याह के अवसर पर यही कुछ दिया जाता था …एक बार हमारे एक पड़ोस में शादी थी …हमें भी कुछ ११-२१ इसी तरह के कमबख्त सख्त लड़्डू मिल गए ..लेकिन यह क्या, उन को तो खाने से पहले चकले पर रख कर बेलन से तोड़ना पड़ता था….यह काम करते हुए मेरा बड़ा भाई गालियां निकालता और हमारा यह सब देख कर हंस हंस कर पेट में बल पड़ जाता ….) ….


स्कूल-कॉलेज में किसी को न पता होता …..


स्कूल-कॉलेज में किसी को न ही पता होता कि आज किस का जन्मदिन है ..कभी भी न इस के बारे में किसी ने चर्चा की …। इसलिए घऱ से टॉफियां, चाकलेट ले कर जाने का कोई रिवाज़ ही न था….जब किसी को कुछ पता ही नहीं, तो जन्मदिन की बधाईयां लेने देने का भी कोई चलन न था….कितनी सीधी-सपाट ज़िंदगी होती थी न तब भी..। 


जन्मदिन के कार्ड आने जाने शुरु हो गए फिर ….


यही कोई ४०-५० बरस पहले जन्मदिन के कार्डों का दौर चल पड़ा ….जब किसी रिश्तेदार को, किसी दोस्त को जन्मदिन के कार्ड भिजवाए जाते …


और यह काम अकसर उस के जन्मदिन के बहुत दिन पहले शुरु हो जाता …


अमृतसर हो या बंबई …आर्चीज़ के कार्ड ही खरीदे जाते …क्योंकि जिसे कार्ड भेजा जाता वह बधाई संदेश पढ़ने के बाद फ़ौरन यह चेक करता कि यह किस ब्रांड का कार्ड है, अगर आर्चीज़ का होता तो भिजवाने वाले की साख बढ़ जाती ….


और कईं बार जब आठ-दस कार्ड किसी के यहां आ जाते (वैसे ऐसा होता कम ही था)....तो उन को एक दूसरे के साथ जोड़ कर किसी दीवार पर लटका दिया जाता ….अभी लिखते लिखते ख्याल आया कि यह प्रक्रिया अकसर दीवाली, और नये साल पर मिलने वाले कार्डों को एक साथ जोड़ कर तो ज़रूर की जाती …। एक बात और लिखनी ज़रूरी है ….पहले इन कार्डों की दुकानें भी खूब चलती थीं ….खास कर के आशिकी पट्ठों के दम पर …..अब तो इक्का-दुक्का ही दिखती हैं…कुछ महीने पहले मुझे मुंबई के चर्चगेट इलाके में एक ऐसी ही दुकान अभी भी दिखी तो खुशी भी हुई और हैरानी भी ….


हां, एक बात और …ये ४०-५० साल पहले वाले ख़तो-किताबत के दिन थे …कईं बार नज़दीकी रिश्तेदारों की जन्मदिन की बधाईयां चिट्ठी में भी मिल जाती थीं …और यह भी किसी बर्थ-डे-ग्रिटिंग कार्ड में कम न होती…

मेरी उम्र के नौजवानों को यह भी ज़रूर याद होगा कि उस दौर में कोई ग्रीटिंग्स कार्ड मिलने पर थैंक-यू कार्ड भिजवाने का भी रिवाज़ था ..जो काम व्हाट्सएप दौर में एक 🙏 स्माईली निपटा देती है ...

टेलीग्राम में आने वाली बधाईयां ….


यहां इस ब्लॉग में यह भी दर्ज करना लाजिम है कि हम जिस ६०-७० के दशक के ज़माने से हैं, उन दिनों घर में किसी नए आगमन की सूचना भी टेलीग्राम से दी जाती थी …


फलां फलां के बेटी हुई या बेटा हुआ है …मां-बेटी ठीक हैं….


ठीक तो हैं …ठीक है, लेकिन जब तार वाला तार देने आता तो घर वालों की जान पर बन आती थी जब तक वह तार खोल के पढ़ न लेते ….


यह दौर ही ऐसा था कि तार आने का मतलब होता था कि बुरी खबर ही है …कोई ख़लास ही हो गया है …ऐसे में किसी शुभ आगमन से खुशी भी होती थी और शायद कभी कभी थोड़ा झुंझलाहट भी होती होगी कि यार, यह चिट्ठी में भी तो लिख कर भेेज सकते थे …खैर, हर दौर की अपनी बातें…अपनी यादें…


बर्थ-डे वाली ग्रीटिंग्स की तार ….


यह १९७०-८० के दिनों की बातें हैं ..तार महकमें में २५-३० तारों के मसौदे (क्या लिखूं…मैटर तैयार होते थे) …आपने बस नंबर ही बताना होता था …कि शादी-ब्याह की, सालगिरह की, बधाई भेजनी है या अफसोस करना है किसी चीज़ का ….और ये सस्ते रेट पर उपलब्ध रहती थीं …मुझे नहीं याद कि कभी सालगिरह की बधाई वाली ऐसी ग्रीटिंग्स टेलीग्राम हम ने किसी को भेजी हो या हमें कहीं से आई हो …हां, किसी के परलोकसिधार जाने की तारें जब आती थीं तो सारे घर की जैसे जान ही निकल जाती थी….। सब कुछ याद है बिल्कुल अच्छे से ….कैसे पैरों तले से ज़मीन निकल जाया करती थी…।।


अब कहां दिखते हैं ऐसे ये बर्थ-ेडे ग्रीटिंग्स कार्ड या इस तरह की टेलीग्राम्स भी …मैं विंटेज क्यूटर हूं …एंटीक शॉप के चक्कर लगाता हूं जब तो वहां किसी कोने में ये सब पड़े दिख जाते हैं …मैंने एक बार हंसते हंसते पूछा कि यह कहां से ले आते हो…..तो जवाब मिला …लोग जब रद्दी या कबाड़ बेचते हैं तो फोटोफ्रेम के साथ जब फोटो, बाप-दादा की फ्रेम मे लगी डिग्रीयां, अवार्ड, पुरानी फोटो एल्बम, डॉयरीयां फिंकवाते हैं तो साथ में सभी पुराने ख़त और इस तरह के कार्ड-वार्ड सब रद्दी में दे देते हैं….। 


आज से कोई ४० साल पहले केक का दौर शुरु हुआ …


हां, यही कोई ४० साल पहले ही यह केक-वेक का दौर शुरु हुआ होगा …या यह हमारे लिए, हमारे आस पास के लोगों के लिए यह तब शुरु हुआ होगा ….उस के बाद तो बर्थ-डे को मनाने के कितने नये नये ढंग आ गए …उन के बारे में तो क्या ही लिखें, सारी दुनिया जानती है ….


केक के साथ घर में पार्टीयां होने लगीं …आस पास के दस-बीस बच्चे, आठ-दस रिश्तेदार, जान पहचान वाले भी होते …और वही पुराने कैमरे से एक-दो फोटी खींचनी, केक काटते हुए एक, खाते हुए दूसरी और बच्चे नाच रहे हों तब एक और …बस, फोटो वाला का काम हो गया। कुछ लोग तो उस दौर में भी इस काम के लिए फोटोग्राफऱ को ही बुला लिया करते थे ….। 


फिर कुछ साल पहले बच्चों ने अपने बर्थ-डे का जश्न अलग से मनाना शुरु किया ….अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ, मौज-मस्ती …पार्टी, फिल्में ….खाना-पीना….और अभी कुछ दिन पहले मुझे किसी से पता चला कि उस के आठ-दस साल के बेटे का जन्मदिन था तो उसने अपने दोस्तों को एक रेस्टरां में बुलाया….फिर वहां से वे सारे बच्चे जय हनुमान नाम की फिल्म देखने गए….कुछ बच्चों के मां-बाप भी साथ आए थे ..वक्त बहुत बदल गया है ..हर वक्त की अपनी कहानियां हैं, और यह सब स्वभाविक भी है ….बदलना कुदरत की नियती है ….बदलाव नियम है । जन्मदिन के दिन चेहरों पर केक पोतना शुरु हुआ ... और बर्थ-डे बम्पस वाला चलन भी शुरु हो गया ...।


लेकिन मैंने कैसे केक-लैस बर्थ-डे का फैसला किया ….


इस बार से मैंने केक-लैस बर्थ-डे का फ़ैसला इस लिया कि मैं तो लंबे अरसे से दूध और दूध से बनी चीज़ों का सेवन नहीं करता ….चाय में बस जो कभी दो चार चम्मच दूध जाता है, वही मजबूरी है …वरना, कुछ नहीं। जब से यह सब छोड़ा है, आसान हो गया है …खाना पीना….अब सोचना नहीं पड़ता कि कौन सा पनीर एनॉलॉग है, कौन सा घी शुद्ध है, कौन सी मिठाई मिलावटी है, कौन सा मावा नकली है …….मेरे लिए मिल्क एवं मिल्क प्राडक्टस का अस्तित्व ही खत्म है ….हड्डीयों का जो होगा देखा जाएगा….अभी तो मन की शांति के लिए यह सब छोड़ रखा है और वापिस यह सब खाने-पीने का कुछ इरादा नहीं है ….इतना ज़्यादा मिलावटी सामान के बारे में देख-सुन और पढ़ लिया है कि अब देख कर मक्खी नहीं निगली जाती ….बाकी, दूध और दूध से बने प्राडक्ट्स से मुझे कोई परहेज नहीं है, लेकिन अगर वे खालिस हों और यह मैं तय करूंगा कि क्या ख़ालिस है और क्या मिलावटी क्योंकि ज़िंदगी के पहले २५ बरस तक पंजाब के अमृतसर में इतना खालिस सब कुछ खाया है कि अब सब कुछ देखते-चखते ही समझ में आ जाता है …। 


मैंने अपना ही बर्थ-डे केक-लैस नहीं किया इस बार से …अब मैं जिन को बर्थ-डे केक भिजवाता भी था, उन को भी भिजवाना बंद कर दिया है ….क्योंकि अगर कोई चीज़ मेरे लिए ठीक नहीं तो दूसरे के लिए कैसे ठीक हो सकती है …महंगे से महंगे केक का एक टुकड़ा भी खाना मुझे आफ़त लगता है, इसीलिए मैं हमेशा केक-वेक कटिंग के दौरान गायब ही हो जाता हूं ….। 


बर्थ-डे में मिलने वाला कैश…..


जब मैं ४०-५० साल का हुआ तो बहुत सालों तक मां हर जन्मदिन के मौके पर एक हज़ार, दो हज़ार, पांच हज़ार एक लिफाफे में डाल कर देती सुबह सुबह ….उस के ऊपर अपने हाथों से जन्मदिन की बधाईयां लिख कर ….और कहतीं कि मुझे समझ नहीं आता कि तेरे लिए क्या खरीदूं..तू अपने आप ही कुछ खरीद लेना….मैं खरीद भी लेता अकसर उन पैसों से कुछ न कुछ ….अभी भी कुछ लिफाफे तो मेरे पास पड़े हुए हैं…


मां को मैं अकसर कहता कि ऐसा क्यूं ..क्या ज़रूरत है …मां का हमेशा ज़िंदा रहने तक यही मलाल रहा कि बचपन में बहुत इच्छा होते हुए भी हम तुम्हें बढ़िया बढ़िया महंगे खिलौने नहीं दिला सके …अब मैं चाहती हूं कि तुम अपनी मर्जी से कुछ खरीदो ….मैं मां को कहता कि हे माते, आप लोगों ने जिस प्यार-मोहब्बत से हमें पाल-पोस कर बड़ा किया ….किसी से अच्छे से बात करने की सीख दी, हर तरह के भेद-भाव को न मानने का सबक पढ़ाया…….इन सब के आगे खिलौनों की क्या बिसात है …। 


हाथ से लिखा कोई नोट …..


मैं अभी भी समझता हूं कि अगर ग्रीटिंग्स कार्ड नहीं भी हैं तो भी पोस्टकार्ड पर ही सही किसी नज़दीकी को, किसी दोस्त को, किसी सहयोगी को, किसी सहकर्मी को हाथ से लिख कर कुछ संदेश देते हैं तो देने और लेने वाले को बहुत अच्छा लगता है ….बात वही है कि जन्मदिन के दिन हर बंदे को स्पैशल फील करवाने की ज़रूरत होती है….स्पैशल दिन होता है ….हां, कभी कभी किसी को चिट्ठी भी डाल देता हूं ….लेकिन हाल-फिलहाल कभी मेरी भेजी कोई सामान्य चिट्ठी मिली नहीं ….पहले मिल जाती थीं सब चिट्ठीयां, अब पता नहीं क्यों नहीं मिलती …शायद फर्क यही था कि पहले भिजवाते वक्त पक्का यकीं होता था कि यह फलां फलां दिन मिल जाएगी..अब डाकपेटी में डालते वक्त ही लगता है कि यह कहां अपने ठिकाने पर पहुंचेगी …और वह पहुंचती भी नहीं …..क्योंकि उसे पता होता है कि इसने मुझे पोस्ट करने से पहले जो फोटो खींची है, कुछ दिन बाद वही वाट्सएप पर भिजवा दे तो ठीक है ………..और यही होता है …। 


जाते जाते पेट खराब होने की दवाई की बात …….


हां, उस का ख्याल यूं आया कि अब इस वक्त रात के ११ बज रहे हैं और मेरा दवाई खाने का समय हो गया है ….हां, कुछ दिन पहले असली जन्मदिन वाले दिन रात में बाहर खाना खाया, पांच हज़ार रुपए लगा कर बीमारी मोल ले आए….दो तीन दिन तो ऐसे ही थोड़ा बदन-दर्द और सुस्ती सी बनी रही, जब तीन चार दिन बाद पटाके पड़ने लगे तो बात समझ में आ गई …तीन-चार दिन का पेट खराब को ठीक करने की दवाई चल रही है ….बस, आज की यही हकीकत है ….अभी वहां न कोई पनीर खाया, न शुद्ध घी से बना कुछ और न ही कोई अन्य मिल्क-प्राडक्ट …। 



हम भी अगर बच्चे होते …नाम हमारा होता बबलू-गबलू …..यह गीत था जो लगभग हर बच्चों की पार्टी में बजता था …बहुत बढ़िया बर्थ-डे गीत है …लेकिन मेरा पसंदीदा गीत है ….मुझे यह भी बहुत ज़्यादा पसंद है ….तेरी उम्र की फुलवाड़ी में खिला नया इक फूल..मुबारक साल गिरह …मुबारक साल गिरह …