शनिवार, 4 जुलाई 2026

सम्मान जीते जी होता है ...बाद में क्या !

मरणोपरांत तो माईं लफ़्ज़ ही इतना मायूसी से भरा है। जानता हूं जाना सब ने है, कोई बच के नहीं निकल पाएगा। फिर भी मरणोपरांत लफ्‍ज़ सुनते ही माईं उदासी घेर लेती है जैसे … अकसर बड़े बड़े सम्मान देते वक्त इस का इस्तेमाल होता है …अच्छा, एक बात है कि 'मरने के बाद' वाले शब्द से फिर भी बेहतर है मरणोपरांत …क्योंकि हिंदी भी अधिकतर आम आदमी ने इतनी अच्छी से भी नहीं पढ़ी होती कि वह सन्धि-सन्धि विच्छेद तक पहुंच पाए…और जो इस के लिए फिरंगी लफ़्ज़ है…पास्थूमसली …आप पढ़ने वाले ही अनुमान लगाएं कि इस लफ़्ज़ का अर्थ ही कितने लोग समझ पाते होंगे …

कुछ ख्याल लिख लूं ..पहले ….बहुत दिनों से इस विषय पर अपने उद्गार प्रगट करना चाह रहा था …६०० शब्द लिखे भी थे, लेकिन ब्लॉगर ड्राफ्ट में कहीं छिपे पड़े हुए थे…आज फिर से ख्याल आया कि उसे पूरा करना है …मुश्किल ही से मिला ….वरना पूरा लिखने की इस वक्त कोई मंशा नहीं थी …

हां, पंद्रह बीस बरस पहले की बात है …मैं अमृतसर के पुतलीघर इलाके में स्थित पिपली साहिब गुरुदारे के आगे से निकल रहा था …उस के बाहर किसी स्वयं-सेवी संस्था ने कोई सामाजिक संदेश देते हुए एक बड़ा सा बैनर लगा रखा था …मैंने पढ़ा …उन दिनों वाट्सएप नही था, इसलिए सब कुछ बड़े ध्यान से पढा करते थे …यहां तक कि मूंगफली खा कर कागज़ का खाली लिफाफा भी फैंकने से पहले थोड़ा देख लेते थे ….शायद कुछ काम की बात ही मिल जाए।

हां, तो उस पर जो भी लिखा था कि उस की चंद बातें मेरे दिलोदिमाग में घर कर गईं …एक तो था कि जीते जीते तो किसी ने रोटी नहीं पूछी …और मरने के बाद लाश के मुंह में खालिस देसी घी का डिब्बा उंडेल रहे हैं….जीते जीते मैं तरसता रहा कि कोई मेरे पास आ कर बैठे …लेकिन नहीं, किसी को वक्त ही न मिला ..अब बीसियों लोग मेरी लाश को घेर के बैठे हैं….मेरे जीते जी इन में से किसी के पास वक्त नहीं था, मैं अकेलेपन की वजह ही से धीरे धीरे मरता चला गया ..अब मैं क्या करूं इन के घडि़याली आंसूओं का …। 

यह सब हम लोग अपने आस पास देखते हैं, महसूस करते हैं…मध्यम वर्ग की, उच्च मध्यम वर्ग की ही बात नहीं है …अरबोंपति बुड्ढे मारे मारे फिरते हैं…कितनी की खबरें अखबार में आती रही हैं और अभी हाल फिलहाल में जब वे इस जहां से रुख्सत हुए तो वही परिवार वाले उस की चिरशांति और सद्गगति के लिए उसे आग देने आ पहुंचते हैं ..जैसे जीते जी सब कुछ सामान्य रहा हो ….

कुछ दिन पहले मैं किसी वरिष्ठ संपादक के यहां बैठा हुआ था ...उन की लाईब्रेरी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा ...उन में ६०-७० के दशक के धर्मयुग, इलस्ट्रेटेड वीकली ...और भी बहुत कुछ करीने से सजा रखा था ...अचानक मेरी नज़र जिस किताब पर पड़ी और वहीं टिकी रह गई ....वह थी काका हाथरसी की एक किताब...


पहले काका हाथरसी के बारे में...मेरी उन से पहचान कब हुई? ...पहले स्कूल-कालेज के जब वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह होते थे तो इनाम के रूप में किताबें दी जाती थीं ...और कईं बार तो किताबों का चुनाव करने का भी मौका मिलता था ...आप पहले से चुनाव कर सकते थे अपनी रुचि के मुताबिक ...

हां, तो मैं स्कूल में पढ़ता था और मेरी बड़ी बहन कालेज में थीं ...उन को ऐसे ही कॉलेज के एक समारोह में दो किताबें मिली थीं...एक तो गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि (इंगलिश में) और दूसरी थी काका हाथरसी की फुलझड़ियां ...पहली किताब तो मेरे लिए क्या, सारे घर के लिए काला अक्षर भैंस बराबर थी ...बस अकसर किसी न किसी के हाथ में नज़र आती और साथ में यह बात की टैगोर को इसी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था ...लेकिन काका हाथरसी की किताब अकसर कोई न कोई पढ़ता दिख जाता ...बिल्कुल पतली सी किताब थी ...लेकिन जो भी उस को पढ़ता वह हंसता और दूसरों को काका के हसगुल्ले सुना कर हंसा देता ....इस का मतलब यही हुआ कि मेरी वाकफ़ियत काका से ५० साल से भी पुरानी है ..है कि नहीं? सीधा सीधा हिसाब है ..। 

हंसने हंसाने वाले लेखक और फिल्मी कलाकार बहुत पसंद किए जाते थे ....क्योंकि खुश रहने का यही एक माध्यम था ...रेडियो में तो आते होंगे ये हास्यकवि ..लेकिन होली इत्यादि पर आते होंगे ...मुझे नहीं याद ऐसा कोई अवसर। 

हां, तो उन संपादक महोदय के घर जब मैंने काका हाथरसी पर लिखी किताब देखी तो मैं दंग रह गया ...मैं कुछ समझ नहीं पाया....मैं जल्दी से उस किताब के पन्ने पलटने लगा ...मेरी व्यग्रता देख कर उन्होंने कहा कि इसे आप ले जाइए ..आराम से पढ़िेए...लेकिन यह बात मुझे नापसंद है कि किसी के घरेलू पुस्तकालय से कोई किताब उठा लाओ...फिर उसे न पढ़ो और न लौटाओ....और बस कुछ वक्त के बाद जब वह ढूंढने पर भी न मिले तो उसे गुम घोषित कर दिया....मुझे इस बात से बहुत नफ़रत है ...

इसलिए मैं वह किताब वहां से पढ़ने के लिए उठा कर लाने की सोच भी नहीं सकता था ..हां, फोटो मैंने बहुत सी ली हैं...शेयर करूंगा ...और देखूंगा कहीं आनलाईन मिली तो ले लूंगा...

इस किताब का शीर्षक था ...काका हाथरसी ..अभिनंदन ग्रंथ ...इस का प्रकाशन वर्ष है ...१९७६ ...आज से पूरे पचास वर्ष पहले छपी थी ..काका जिन का जन्म १९०६ का है, उन्होंने उस वर्ष अपनी आयु के ७० वर्ष पूरे किए थे ...और डा गिरिराजशरण अग्रवाल ने इस ग्रंथ का संपादन किया था ...मैंने जब से यह किताब देखी है, मेरा खयाल है कि इस से बड़ा सम्मान जीते जी किसी का हो ही नहीं सकता...

आखिर क्या देख लिया मैंने इस ग्रंथ में ...पूछिए, क्या नहीं देखा इस में। सब से पहले तो उस ज़माने के समकालीन जाने-माने साहित्यकारों ने काका के बारे में अपने उद्गगार प्रकट किए हैं....पचास के करीब तो होंगे ज़रूर ....और इन में उस दौर के अन्य चोटि के व्यंग्यकार भी शामिल हैं...

तो यह था रुतबा उस दौर में हास्य-व्यंग्य का ..

यह तो जैसे एक ट्रेलर है ...इस ग्र में ४५० पन्ने हैं...

और इस ग्रंथ में है काका की विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के साथ तस्वीरें ..अलग अलग अवसरों पर ...जिन के नीचे लिखा है कि उन्होंने काका को प्रेरित किया कि ऐसे ही हास्य-व्यंग्य से आप देश समाज का मनोरंजन करते रहिए, जन मानस का मार्ग-दर्शन करते रहिेए…

४५० पन्नों के ग्रंथ में इस तरह के पन्नों को तो गिनती में लिया ही नहीं गया ....

इस तरह कि किताब किसी को उस के जीते जी भेंट किये जाना….इस से बड़ा सम्मान हो ही नहीं सकता….उन के बीसियों समकालीन साहित्यकारों ने उन के बारे में अपने विचार लिखे और काका की रचनाएं भी इस में पढ़ने को मिल गईं…जिन को सुन कर हम लोग बचपन में लोट-पोट हो जाया करते थे …वैसे वह हास्य-व्यंग्य का सुनहरा दौर था …फिल्में हों या साहित्य हो या स्टेज हो…आज कल तो हंसने के नाम पर क्या चल रहा है, आप भी तो सब जानते हैं …कोई कुछ ऐसा कह देता है कि जेल की सैर कर आता है, मुकद्मेबाजी शुरु हो जाती है …और वैसे भी टीवी पर जो मशहूर शो आते हैं वे भी कहां देखे जाते हैं…बात बात दूसरों का बेहूदा मज़ाक, फूहड़पना, द्वि-अर्थी संवाद ….कभी यह सब देखने-सुनने को मै आतुर नहीं हुआ ..हां, कभी कभी देख भी लेते हैं …लेकिन ये जो स्टैंड-अप कॉमेडी वाले शो हैं, इन का तो फ्री पास भी मिले तो भी न जा पाऊं….शायद वे अपनी जगह, अपनी उम्र के हिसाब से ठीक ही हैं, हमारे लिए ही उन का सिलेबस अब ऑउट ऑफ सिलेबस हो चुका है …। 

इतने इतने बड़े सम्मान मरने के बाद मिल पाते  हैं. …मुझे खुशी है कि काका का एक ऐसा ही सम्मान पदमश्री उन को १९८५ में मिल गया था …यानि कि इस किताब के छपने के दस बरस बाद और उन के इस दुनिया से जाने से १० साल पहले …(वे १९९५ में स्वर्गलोक सिधार गए)...। 

जीते जीते भी तो लोगों का काम नज़र आ ही जाता होगा….ढूंढ कर उन को तरह तरह के सम्मान मिलने चाहिए….क्योंकि फौजियों को छोड़ कर उन सब लोगों का काम तो जीते जी नज़र आ ही जाता है …ऐसे में उन के मरने के बाद मिलने वाले अवार्ड्स के बारे में मेरे खयाल बहुत अलग हैं…बस मैं इस से आगे कुछ नहीं लिखना चाहता। जीते जी किसी को मिले तो वह उस की गर्मी पा कर चंद बरस और सिर उठा कर जी ले …वरना उस के जाने के बाद ……वही मरणोपरांत वाली उदास कर देने वाली बात ……। लेकिन, हां, फौजियों के लिए …जो अपने देश की रक्षा के लिए या अन्य कारणों से अपने प्राणों की आहूति दे कर वीरगति को प्राप्त करते हैं, उन को तो मरणोपरांत जितना सम्मानित किया जा सके, कम है। वैसे भी जीते जी भी आर्मड-फोर्स के जवानों-अधिकारियों को समय समय पर वीरता पुरस्कारों, विशिष्ठ सेवा पुरस्कारों इत्यादि से नवाज़ा ही जाता है ….उन सब की हौसलाफ़ज़ाई के लिए यह सब क़ाबिलेतारीफ़ है। 

अवार्ड ही नहीं …सभी तरह के सम्मान जैसे किसी रोड़ का नामकरण किसी बडे़ नामे गिरामी कलाकार, नेता, साधु-संयासी  के नाम पर रखना भी उस के जीते जी ही जाना चाहिए …सारा हिसाब किताब एक दम सांसों के चलते चलते चुकता ….वह भी देखे, उसे भी अच्छा लगे……बाद में किस ने देखा …..वैसे भी आज कल तो पुरानी सड़कों के नाम, पुराने शहरों-कसबों तक के नाम बदलने वाला काम भी ट्रेंडिंग है …कम से कम कोई बंदा जीते जी तो फूल कर कुप्पा हो पाए…। 

बस, पोस्ट का यही आशय है कि सारा हिसाब किताब जीते जी हो जाना चाहिए ..वरना पीछे रह जाने वाले अवार्ड लेते हैं और बाद में बड़े अफ़सोस के साथ यह भी कहते हैं कि काश…यह उन के जीते जी उन को मिल गया होता। बहुत सी ऐसी उदाहरणें हैं जिन को जीते जी तो नज़रअंदाज़ किया गया लेकिन मरने के बरसों बाद उन पर तरह तरह के सम्मानों की बौछार की गई ….वैसे तो यह सब भी इतना सीधा सपाट नहीं होता ….क्योकि इस में तरह तरह की राजनीति भी घुस आती है ……

कुछ भी हो दोस्तो, माईं, हमें तो वही बात मुर्दे के मुंह में घी का डिब्बा जबरदस्ती ठूंसने वाली बात बार बार याद आती है …चलिेए, छोड़तेें हैं इस टॉपिक को यहीं पर , पानी को मथने वाली बात है ….काका हाथरसी की लिखी एक बात याद करते हैं…और उस के बाद मेरी एक प्रकाशित कविता……

धार्मिक शिकारी ..

बहुत सुन चुके काव्य अलौकिक, 

कुछ लौकिक आनंद लीजिए। 

छंद छंद कर ‘काका’ कवि से , 

कलियुग के छलछंद सीखिए। 

दलबंदी के पुष्प संजोकर, 

चाटुकारिता का घिस चंदन। 

दंभ-द्वेष का दीप दिखाकर, 

करते रहो प्रभु का बंदन। 

सदाचार की बानी बोलें, 

ऐसे त्यागी तोते पालो।

“रिश्वत लेना महापाप है”

फाटक के ऊपर लिखवा लो। 

(क्रमश:)





ऐसा होता था हास्य-व्यंग्य भी उस दौर की फिल्मों में ....आज भी बार बार देखते हैं, हर बार हंसते हैं....