गुरुवार, 6 अगस्त 2026

“तुम टी सी लगे हो क्या? दिखाओ, अपना वो …आईडी.!!”

 “तुम टी सी लगे हो क्या? दिखाओ, अपना वो …आईडी.!!”

परसों जैसे ही अंधेरी स्टेशन से चर्चगेट फॉस्ट लोकल ट्रेन चली तो एक लगभग २५-३० साल के नवयुवक के मुंह से जब यह डिमांड निकली तो लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे का माहौल थोड़ा गर्मा गया …


१८-२० साल पुरानी मेरी फोटो जिस के बारे में आप आगे पढ़ेंगे ....

होता है …आज कल कुछ पता चलता नहीं..हम लोग पंगे तो ले लेते हैं ..लेकिन सामने वाले का कुछ पता नहीं….याद होगा कुछ सप्ताह पहले फर्स्ट क्लास डिब्बे के दरवाज़े को बंद करने की ताकीद करने वाले एक २५ साल के जवान लड़के को उस शख्स ने चाकू से गोद दिया…चल बसा बेचारा। महिलाएं भी अब एग्रेसिव होने लगी हैं…कुछ दिन पहले खबर पढ़ी कि सीट के चक्कर में एक महिला ने दूसरी महिलाओं पर पेपर-स्प्रे छोड़ दिया….


हां, तो मैं जिस युवक की बात कर रहा था जो एक शख्स से उस की टी.सी की आई.डी पूछने लगा, वह बात यूं हुई कि जब यह युवक गाड़ी के उस डिब्बे में बांद्रा स्टेशन से सवार हुआ तो ट्रेन खचाखच भरी हुई थी …बहुत से लोग खड़े हुए थे ..। 


मैं जहां पर खड़ा था …वहां पास की एक थ्री-सीटर सीट पर बैठे तीन लोगों की तरफ़ एक हल्का सा इशारा करते हुए उसने उन को थोड़ा थोड़ा सा सरकने के लिए कहा …

सरकना-वरकना तो मुंबईकरों ने क्या होता है, बल्कि उस युवक को ही कह दिया गया ….यह फर्स्ट क्लास है, इसमें एक सीट पर तीन ही बैठते हैं …। (मुझे यह बात किसी को कहना ही बिल्कुल बेवकूफी लगती है…हां, कुछ सिचुएशन हैं जहां मैं अपनी इस जजमैंट का इस्तेमाल करता हूं …उस के बारे में बाद में लिखता हूं …पहले यह बात पूरी कर लूं..)...


यह जो बात कही गई ..कि यह फर्स्ट क्लास है…यह चाहे कही एक बंदे ने ही थी, लेकिन साथ बैठे-खड़े कुछ लोगों का समर्थन था, ऐसा माहौल था…

उसी वक्त वह युवक थोड़ा गुस्से में आ गया …और उस बंदे की से मुख़ातिब होते हुए यही कहने लगा ….क्या तुम टी.सी लगे हो? दिखाओ…अपना वो..आई.डी…

मामला थोड़ा सा गड़बड़ाने ही वाला था….

खामखां टी.सी बना वह बंदा कह उठा ….पहले तुम दिखाओ, अपनी फर्स्ट क्लास की टिकट…

यह देखो, अगले ही पल उस युवक ने अपनी टिकट उस के सामने रख दी….

बस, फिर क्या था, सन्नाटा छा गया….


फिर से किसी इंसान को कम आंकने की गल्ती …जो हम सब लोग रोज़ करते हैं, और दूसरों को भी करते देखते हैं….


हम किसी के चेहरे-मोहरे, उस के रूप-रंग से, कपड़ों से किसी की भी ब्रॉंडिंग करने में खुद को एक्सपर्ट मानते हैं …यही हमारी सब से बड़ी बेवकूफ़ी है …


हमें कबीर जी जैसे महांपुरुष अपनी वाणी के ज़रिए अच्छे से समझाते रहते हैं …..

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान…

मोल करो तलवार का, पड़ी रहने दो म्यान….

अब अगर इतनी सी बात भी हमारे पल्ले नहीं पड़ी तो फिर हम लोग कैसे समझेंगे….


हां, गाड़ी आगे चल रही है…हम भी आगे बढ़ें …


हां, दादर स्टेशन आने वाला था तो उस से पहले ही एक बंदा उठने वाला था, वह सीनियर सिटिज़न था..उसने मुझे इशारा किया कि मैं उस खाली सीट पर बैठ जाऊं…मैंने इशारा किया कि उस युवक को बैठने को कहते हैं…
खैर, जब वह बंदा उठा तो उस युवक ने मुझे कहा …अंकल, आप बैठिए…

मैंने उस का हाथ पकड़ कर कहा …नहीं, नहीं, यार, तुम बैठो, हम तो पास वाले हैं, तुम ने यार टिकट ली है…

लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ कर कहा ..नहीं,नहीं, आप …बैठो…

(बिल्कुल लखनवी बात लगी ..पहले आप ..पहले आप…) 

खैर, उसने जितनी आत्मीयता और दिल से मुझे दो तीन बार बैठने को कहा, मैं बैठ गया …

जैसे ही दादर स्टेशन आया …दो तीन लोग और उतर गए…और उसे भी बैठने की सीट मिल गई …

और वह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर अपना गंतव्य स्टेशन आने पर उतर भी गया....


जब कोई फर्स्ट क्लास में चढ़ जाता है …


जब कोई फर्स्ट क्लास में ऐसा इंसान या समूह चढ़ जाता है जिसे फर्स्ट क्लास के ज्ञानी लोग समझते हैं कि वह तो दूसरे दर्जे की सवारी है, गल्ती से फर्स्ट क्लास में गलती से चढ़ गई है …तो झट से उसे चेतावनी के अंदाज़ में कह देते हैं….यह फर्स्ट क्लास है। ….

अब यहां से बात आगे चलती है ….


मुंबई लोकल के पहले दर्जे में जो लोग भूलवश या अनाधिकृत्त तरीके से चढ़ जाते हैं …वे तीन तरह के होते हैं….


जिनकी गलती सच में मासूम गलती होती है


ऐसे लोगों के बारे में झट से पता चल जाता है …जो मुंबई लोकल में पहली बार चढा़ है …अभी अभी बाराबंकी, गोंढा  की गाड़ी से उतर कर लोकल में चढ़ा है, उस को लोग थोड़ा आगाह कर देते हैं …यह बहुत अच्छी बात है …


यह काम मैं भी अकसर करता हूं लेकिन बहुत सावधानी से ….एहतियात से …एक बाप-बेटा कुछ महीने पहले चढ़े…शायद पहली बार लोकल ट्रेन में चढ़े थे …मैंने उन को आहिस्ता से कहा कि यह फर्स्ट क्लास है …। इसमें चढ़ने से जुर्माना लग जाता है….। मेरी बात सुनते ही वह अधेड़ उम्र का बंदा तो बिल्कुल परेशान हो गया…मैंने उसे समझाया …शांत रहो, आराम से अगले स्टेशन पर उतर कर दूसरे डिब्बे में चढ़ जाना …और उसे महिला डिब्बे में न चढ़ने के बारे में भी बता दिया ….। उसे मेरी बात सुन कर सुकून सा मिल गया ..और वह अगले स्टेशन पर उतर गया ।..


मैंने ऊपर लिखा न कि जो इस तरह के फर्स्ट-टाइम ओफेंडर होते हैं ….उन के बारे में पता चल ही जाता है …और अगर हम जैसे लोगों को पता चल जाता है तो टी.सी- टीटीई को भी तो ज़रूर पता चल ही जाता होगा…अब अगर फर्स्ट क्लास डिब्बे से उतरते वक्त उन के हत्थे चढ़ जाएं तो फिर उन का क्या होता होगा …माफ़ी या जुर्माना…..इस के बारे में मैं ज़्यादा नहीं जानता….


कुछ  यंगस्टर्स मस्ती के मूड में होते हैं …


बहुत बार ऐसे युवकों के झुंड भी फर्स्ट क्लास में चढ़ जाते हैं जिन के पास दूसरे दर्जे का टिकट होता है …अकसर यह त्योहारों के दिनों में तो बहुत बार होता ही है …और छुट्टी के दिन भी और नॉन-पीक ऑवर में भी यह अकसर दिख जाता है ..। इन से कौन पंगा ले, लेकिन हां, अगर ये ट्रेन में टीटाई या स्टेशन पर टीसी के सामने आ जाते हैं तो फिर वह इन को अकसर छोड़ता नहीं है …लेकिन फिर भी मुंबई लोकल में यह समस्या बहुत ज़्यादा है ….कुछ तो चढ़ते ही इस अंदाज़ में कि देखेंगे, अगर पकड़े जाएंगे तो दे देंगे पैनल्टी….


कुछ लोगों को पूरी छूट होती है …


इस श्रेणी में वे सब जो पर्स, मोबाईल कवर बेचने हैं, और महिलाओं के डिब्बे में उन के मेक-्अप समान बेचती हैं, इमीटेशन चेन-झुमके बेचती हैं, हेयर क्लिप बेचती हैं….वे बिना किसी रोकटोक के नॉन-पीक ऑवर में पहले दर्जे में चढ़ते-उतरते रहते हैं ..इन में सूरदास भिक्षक, गवैये, ट्रासजैंडर भी शामिल हैं….जो सिर पर हाथ फेर कर आर्शीवाद देने की फीस वसूलते हैं …उन को पता रहता है कि कहां पर लोहा ज़्यादा गर्म है …उसी हिसाब से अपनी फीस वसूलते हैं….कल ही वह किसी प्रेमी-युगल को आशीर्वाद देकर कह रहा था …चेंज नहीं है तो ऑन-लाइन कर दो …इस बात पर वे दोनों हंसने लगे ….


संदेह के घेरे में ….


हमें पता है कि कोर्ट-कचहरी भी बेनेफिट का डॉउट देती हैं…हम तो कोर्ट-कचहरी भी नहीं है, न ही टीसी, टीटाई हैं…फिर हमें भी थोडी़ ब्रेक तो लगा के रखनी चाहिए….जैेसे हम लोग उन मनचलों को फर्स्ट क्लास में तफ़रीह के लिए, मस्ती करने चढ़ गये हैं, उस वक्त हम खामोश रहते हैं, उसी तरह हमें बाकी सभी डाउटफुल केसों में भी चुप रहने की आदत डालनी चाहिए….


लेकिन हम अकसर कपड़े, बॉडी लेंग्वेज और रुप-रंग देख कर बहुत बड़ी गलती कर ही देते हैं…जिस का नतीजे में मारपीट की नौबत आ सकती है …। 


विडम्बना है कि मुंबई हो या कोई दूसरे बड़े शहर ……बड़े ही क्यों, छोटे शहरों में भी जिस अंदाज़ में लोग फटी से फटी जीन-पतलून पहन कर निकलते हैं, जिस तरह की चीथड़े हो चुकी टी-शर्ट पहनते हैं,….छोटी छोटी निक्करें पहन कर निकलते हैं …और समाज में सम्मान की नज़र से देखे जाते हैं …ऐसे में ठीक ठाक कपड़े पहने इंसान को हम कईं तरह से कम आंक लेते हैं…बेवकूफी न हुई तो क्या हुआ यह…। 


उसे भी सीट मिल गई तो मुझे बहुत अच्छा लगा ...

मैंने ऊपर जिस २५-३० साल के युवक की बात लिखी है …आप इस तस्वीर में देखिए…वह ठीक ठाक कपड़े पहना हुआ है ….लेेकिन मैं बैठा उस दिन ट्रेन में यह सोचता रहा कि क्यों इस युवक को ऐसे बोलने की हिमाकत की गई कि यह फर्स्ट क्लास है ….फिर मुझे यही लगा कि शायद इस के कपड़े जिस रंग के हैं वह बीएमसी की ड्रैस है …लेकिन यह भी कहीं नहीं लिखा कि बीएमसी वाली ड्रैस पहन कर कोई फर्स्ट क्लास का टिकट लेकर उसमें नहीं चढ़ सकता ….


और वह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतर गया ....

मैंने उस दिन जिन लोगों के साथ इस बात की चर्चा की और उन को यह फोटो दिखाई तो उन को भी यही लगा कि लोगों ने उसे बीएमसी का स्टॉफ, या बीएसटी का ड्राईवर या कंडक्टर या कोई सिक्योरिटी गार्ड समझ लिया होगा …..लेकिन अगर ऐसी बात है तो यह बात बहुत गलत है….यह तो हमारे स्टीरियो टाइप हो गए कि फर्स्ट क्लास में कौन सी वर्दी पहन कर आदमी सफर कर सकता है। बीच बीच में मुझे अफ्रीका में जो महात्मा गांधी के साथ एक ट्रेन में हुआ वह याद आता रहा ….बस, बात इतनी सी है कि हम फैसले सुनाने में इतनी जल्दबाजी न किया करें ….कबीर जी वाली बात ऊपर पढ़ ली है …उस फर्स्ट क्लास के डिब्बे में दूसरे लोगों के कपड़े  जैसे दिख रहे थे उस की फोटो मैं यहां लगा रहा हूं….। 



ऊपर चिपकाई मेरी फोटो का राज़ ….


अच्छा, आप सोच रहे होंगे कि इतना सब कुछ तो लिख दिया मैंने ..लेकिन यह समझ में नहीं आया कि मैंने ऊपर क्यों अपनी फोटो लगा दी है …उस फोटो को लगाने का भी एक मक़सद है ..मेरी यह फोटो १८-२० साल पुरानी है …२००७-०८ के पास के दिन थे …जब मैं पंजाब-हरियाणा का माल खा-पी कर (नॉन-वेज और दारू छोड़ कर)...फूल कर कुप्पा हो चुका था…१०० किलो से भी ऊपर। आप भी यही सोच रहे हैं न कि पंजाब हरियाणा में सूफी लोगों के लिए है ही क्या ..है, बहुत कुछ है…ढेरों मिठाईयां, समोसे, गुलाब जामुन, जलेबियां, भटूरे-छोले …..यह सब कुछ आठ-दस बरस ठूंस ठूंस कर मैं इतना भारी भरकम हो चुका था …और ऊपर से मेरी कपड़ों की पसंद …मुझे इसी तरह के कोट और इन के साथ नीचे रेमंड की काली या नेवी ब्लू पतलून बहुत पसद थी …या काली पैंट और सफेद शर्ट ….टीसी-टीटाई वाली ड्रेस ….इसी चक्कर में पंजाब-हरियाणा के जिन भी शहरों में रहा, यहां तक जब भी दिल्ली जाना हुआ और प्लेटफार्म पर खड़ा होता तो एक-दो लोग मुझे टीटीई समझ कर सीट के बारे में, गा़ड़ी के बारे में पूछते या सीट की कोई गुंजाईश है तो भी पूछ लेते …..खैर, अब अगर यह कपड़े पहनूं भी तो कोई न पूछेगा …यह सोच कर कि यह तो कोई रिटायर्ड 

टीटी ई होगा …


जब मैं यह टीटीई.टीसी लगने वाली बात बच्चों को सुनाता तो वे हंसी से लोटपोट हो जाते और कईं बार कह भी देते कि पापा …कह दिया करो ……हां, हां, जहां मर्जी बैठ जाओ। लेकिन, मुझे पता है कि इतना फ्रेंडली टीटीई-टीसी अगर पब्लिक को मिल जाए जो इतनी आसानी से कहीं भी बैठने के लिए कह दे ….तो उन को भी यह बात पचेगी नहीं….

हां, अभी पोस्ट को बंद करने का समय आ गया है …कुछ बातें रह गई हैं जिन में मैं लिखूंगा उन किस्सों के बारे में जब मुझ से किसी को पहचानने में गलती हुई और जो बोझ आज तक मेरे दिल पर है …शायद जब उन सब के बारे में लिखूंगा तो कुछ हल्कापन महसूस हो जाए….


हां, अगर कबीर जी की वाणी भी मुश्किल लग रही हो तो काका जी की बात ही सुन लीजिए….मक़सद वही है …बात हमारे पल्ले पड़नी चाहिए….वह भी हमें पचास बरस पहले आम आदमी की ज़बान में कितने प्यार से, दिलफरेब अंदाज़ में समझा गए हैं…..दिल को देखो, चेहरा न देखो…चेहरों ने लाखों को लूटा….दिल सच्चा और चेहरा झूटा….(उस गीत का लिंक)...


तो फिर आज के पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है? ....अपनी जजमेंट संभाल के रखिए अपने खीसे में.....लोग बहुत आगे निकल चुके हैं...। 😂😎😀



बुधवार, 5 अगस्त 2026

अगर भोर सुहानी है तो गीत भी उसी मूड वाले हों ..



दो दिन पहले पनवेल के एक बाग में ....सुबह सुहानी कुछ ऐसी दिखी...

आज सुबह हमेशा की तरह मैं उठने में थोड़ा लेट हो गया …विविध भारती के राष्ट्रीय चेनल पर अपने रेडियो पर उन के बढ़िया प्रोग्राम सुन रहा था …जैसे गीत वे बजाते हैं, ये केवल विविध भारती के बस की ही बात है …कईं कईं गीत तो ऐसे होते हैं जिन्हें हम बीस-तीस साल बाद सुनते हैं तो झट से याद आ जाता है वह गीत ….


आज भी सुबह जो गीत बज रहा था …मुझे अच्छा लगता है …लेकिन बहुत लंबे अरसे के बाद रेडियो पर सुना था …उस के बोल बहुत बढ़िया हैं…


बीती हुई रात की सुनाती है कहानी….

यह सुबह सुहानी हो …


कलियों का बचपन…

फूलों की जवानी…

यह सुबह सुहानी हो …


गाने के बोल तो हैं ही,… यशुदास ने गाया है और …और संगीत भी बहुत बढ़िया है …मन को छूने वाला …किल्लर कंबीनेशन ही देखिए….आनंद बक्शी की कलम, रवींद्र जैन का संगीत, यशुदास ने गाया..फिल्म अय्याश (१९८२) का यह गीत …अगर ऐसे गीत दिल को न छुएंगे तो फिर दिल में ही गड़बड़ी है, समझ लीजिए….

इस गीत को आप इस लिंक पर क्लिक कर के सुन सकते हैं ....यह सुबह सुहानी हो ....

रेडियो पर बंद हुआ तो मैंने यह गीत यू-ट्यूब पर मोबाईल पर लगा लिया….अच्छा लगता है जब सुबह सुबह आप को कोई सुकून देने वाला गीत इस तरह से रेडियो पर सुनने को मिलता है ….

अच्छा, अगर मैं बहुत सुबह उठ जाऊं तो सब से पहले मैं कोशिश करता हूं कि आलइंडिया रेडियो की एप पर दिल्ली एफएम गोल्ड लगा लूं…क्योंकि उन का एक प्रोग्राम आता है ..शायद पांच बजे के आस पास इसी नाम से …भोर सुहानी ….उस में कईं बार इसी तरह के गीत सुनने को मिलते हैं …जिनको हम बिसार चुके होते हैं…

अच्छा, मैंने आज विविध भारती पर सुबह सुबह गीत सुन रहा था …यह प्रोग्राम भी कुछ शायद त्रिवेणी नाम से जाना जाता है …एक तो गीत यह बजा जो मैंने ऊपर लिखा, और दो गीत और भी सुंदर बजाए गए उसमें ….

भोर भए पंछी धुन यह सुनाएं …जागो रे गई रुत फिर नहीं आए….(बहुत खूबसूरत गीत..)

और एक बावर्ची फिल्म का वह सुपर डुपर गीत ….

भोर आई…गया अंधियारा …

सारे जग में हुआ उजियारा …

नाचे झूमे यह मन मतवारा ….मतवारा।

….

धरती भी झूमें, बगिया भी झूमे ..

नन्ही किरण मुस्काए…

लागे नीला सागर बड़ा प्यारा, बड़ा न्यारा …

भोर आई …गया अंधियारा ….

तो इस तरह से अपने दिन की शुरुआत हुई आज …इतनी सुंदर शुरूआत ….फिल्म टाईम्स ऑफ इंडिया आया , दस मिनट को उस को देखने लगा …

तभी मेरे एक कज़िन ने वाट्सएप पर एक गीत मुझे भेजा ….

गीत के साथ उसने लिखा कि बहुत बढ़िया गीत …मन प्रफुल्लित हो जाएगा…और यह गीत बहुत बार फार्वाडेड हो चुका था ….आठ मिनट का वीडियो था …मैंने सोचा कि चलो मन को और प्रफुल्लित करने का अगर सुनहरा मौका मिला है तो, इस का भी फायदा उठा लिया जाए….

मैंने उसे बजाना शुरु किया ….

उस गीत के बोल सुनिए…..

यह दुनिया भीड़ का मेला ..

पर अंदर से इंसान अकेला…

हंसता चेहरा..रोती रुह..

किस से कहे मन का झमेला….

चेहरों पर मुस्कान सजी है ..

भीतर से हर दिल टूटा पड़ा है ..


रात अंधेरी जब घिर आती …

मन मंदिर में गूंजे सन्नाटा…

सांस सांस लगे इक झमेला…

कबीर कहे सुन रे बंदे …

झूठा जग का हर इक मेला …

इस गीत को सुनते वक्त मुझे यह देख कर यह बात बहुत अजीब लगी कि इस गीत को रिकार्ड इतने सुदंर मनमोहक दृश्यों की मदद से किया गया है (शायद कृत्रिम बुद्धि से..) …झील के किनारे, पुरातन बट-वृक्ष के नीचे, किसी धार्मिक स्थल में बैठ कर …इतने इतने सुदंर संगीत के यंत्र लेकिन चेहरे सभी रोते हुए ..उदास से… दुनिया के झमेले को सजीव कर रहे हों जैसे…।

(मैंने इस गीत का लिंक यू-ट्यूब पर ढूंढा है और यहां लगा रहा हूं ….हां, यह भी मैने सर्च किया कि यह कबीर जी को इस में क्यों इंवाल्व किया जा रहा है …तो मुझे पता चला कि इस गीत से कबीर जी का कुछ लेना-देना नहीं है, उन का नाम यूं ही लिखा जा रहा  है…)... यह रहा इस गीत का लिंक ....झमेला झमेला झमेला ...

लेकिन प्रफुल्लित तो क्या होना …मेरी तो जितनी बैटरी चार्ज थी, यह सब झमेला, झमेला सुन कर तो मैं तो भई उदास हो गया …सोचने लगा कि क्या सच ज़िंदगी ही इतना बडा़ झमेला है ….?

जी हां, है तो एक झमेला ही …कोई इंसान अंबानी-अडाणी, ट्रम्प …कोई ऐसा नहीं जिसे बीसियों परेशानियां, दुश्वारियां न हों, तो फिर हम आप तो किस खेत की मूली हैं…तो क्या इस का मतलब है कि हम लोग दिन की शुरुआत ही इस तरह के उदास करने वाले गीतों से करें ….

नहीं, मैंने यह कभी नहीं किया…इस से दिन की शुरुआत ही ऐसी की तैसी हो जाती है ….नाश्ता करते वक्त भी पांचो वही झमेला, लफड़ा ….सब कुछ वही चेते आने लगता है ….यह भी सच है कि घर से निकलते ही दुनिया के झमेलों को पार करते, उन का मुकाबला करते, उन को लांघते-फांदते, उन को नज़रअंदाज़ करते आप दिन भर कुछ कर पाते हैं…..लेकिन अगर सुबह सुबह घर से निकलने से पहले शुरूआत भी इस तरह के उदासी भरे गीतों से हो तो फिर इस का क्या नतीजा होगा, इस की आप कल्पना कर सकते हैं….

मैं पहले सुबह के वक्त भी कुछ सत्संगों में जाया करता था …वहां पर भी वही बातें, स्वर्ग-नरक, ८४ लाख योनियां भुगतनी पड़ेगीं, मोक्ष नहीं मिलेगा, अगर ऐसा नहीं करोगेे ..अगर वैसे नहीं करोगे….यह करो, वह करो….सत्संगों के इंचार्ज खुद रेंज-रोवर में, सिक्योरिटी गार्डों के झुंड के साथ निकलते हैं….यह सब देख कर बहुत सालों बाद अपने आप ही समझ से परदा हटा कि ये तो खुद ९९ के गेड़ में उलझे पड़े हैं. ….ये कौन होते हैं मुक्ति दिलाने वाले…और मुक्ति की ऐसी की तैसी…किसे मिली, किसे नहीं, किस ने आ कर बताया….ये सब पब्लिक को पीछे लगाने वाले लोग हैं ….हर बार इन सत्संगों में यह सुन सुन कर कान पक गये वही स्वर्ग-नरक, मोक्ष, चौरासी का चक्कर. …..बस, मैं फिर पीछे हट गया…वैसे भी बहुत से बाबा लोगों ने जो कुछ किया और जो कुछ बाद में उन के साथ हुआ…वह सारी दुनिया के सामने है ….मुझे नहीं पता कि कितने बाबे जेन्यून हैं या नहीं है, लेकिन मेरा मन नहीं मानता ……।

खैर, यह तो ब्लॉग का विषय है भी नहीं ….

हां, मैं अपने दिन की शुरुआत कैसे करता हूं ..ऊपर लिख ही दिया है ..रेडियो सुनते हुए, अखबार पढ़ते हुए ….ज़रूरी नहीं कि भजन ही सुनता हूं..जो रेडियो पर बज रहा हो, मुझे बढ़िया ही लगता है …वैसे भी कुछ फिल्मी गीत ऐसे बन चुके हैं जो भजनों से कम न

नहीं है, कुछ तो पूरे भजन ही हैं….ज़िंदगी के पूरे फ़लसफ़े के उसमें दर्शन होते हैं…

अनेकों अनेक ऐसे फिल्म गीत हैं जिन्हें मैं उच्चकोटि के आध्यात्मिक गीत ही मानता हूं जो किसी गिरते हुए को उठने के लिए बाध्य करने वाले हैं, कुछ मायूस चेहरों पर मुस्कान ले कर आते हैं….लिखने के लिए मुझे अल्फ़ाज़ कम पड़ रहे हैं, लेकिन बहुत कुछ है इन फिल्मी गीतों में …इन का अपना जादू ही अनूठा है …

ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना …यहां कल क्या हो किसने जाना ….

जीवन चलने का नाम….चलते रहो सुबहो शाम …..

आ बता दें तुझे कैसे जिया जाता है ….

तक़दीर से क़लम से कोई बच न पाएगा….पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आएगा..(पेशानी-माथा)
 

सोचते जाएं तो इस लिस्ट को जितना भी चाहें लंबा कर दें ….

शिक्षा ….तो इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है कि सुबह सवेरे या दिन में भी कभी किसी को भी उदासी भरे गीत न भेजें….वह पता नहीं अपनी धुन में मस्त कौन से सुनहरी ख़्वाब बुन रहा है, हम उसे वह गीत भेज दें कि ज़िंदगी एक झमेला..एक एक सांस झमेला ..

ठीक है,यार , झमेला तो झमेला सही …..लेकिन इस झमेले को और कंप्लीकेट न करिए…….

वैसे भी मैं एक झमेले वाले गाने के बोल इस में जोड़ ही दूं…..

दुनिया में अगर आए हैं तो जीना ही पड़ेगा ..

यह जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा….

सोचिए, अगर इस तरह के गीत से दिन की शुरुआत होगी तो वह दिन ही कैसा होगा…!!
 
PS...उदासी भरे गीतों या ऐसी शेरोशायरी से मुझे इतनी तकलीफ़ है कि मैं इन्हें अगर कहीं पढ़ भी लूं तो कोशिश यही रहती है कि ये फिर से मेरी नज़रों में न पड़ें। बाकी, पसंद अपनी अपनी है ...फिर भी किसी दूसरे के साथ शेयर करते वक्त हमें थोड़ा सचेत रहने की ज़रूरत है ...





सोमवार, 3 अगस्त 2026

जब फिल्मों का जादू कुछ ऐसा हुआ करता था ...


गुज़रे दौर की फिल्मों के जादू को मैं बड़ा मिस करता हूं…बहाना ढूंढता हूं उन के बारे में बात करने की …उस दिन मेरा एक मरीज़ आया जिस का नाम था ..फ़िरोज़ खां…मैंने पूछा धर्मात्मा वाला …

नहीं, सर, वह तो चला गया…


और हम दोनों हंसने लगे …और उस जानदार हीरो को याद करने लगे …मैंने पूछा वह सुपरहिट गीत तो याद ही होगा….हेमा मालिनी के साथ …उसने फ़ौरन बता दिया ..हां हां, वह कोई कैसे भूल सकता है …तेरे चेहरे में वो जादू है ….


बिल्कुल यही जादू है ..!!!


शायद पचास से ज़्यादा बरस हो गए हैं फिल्म को आए…अभी भी उस को याद को संजो कर रखा हुआ है …और सुपरहिट गीतों की इतनी रिपीट-वेल्यू…. 


आज मैं सुबह सोच रहा था किसी भी फिल्म का जादू उन दिनों (४०-५० साल पहले) उस के थियेटर में लगने से हफ्तों पहले शुरु हो जाता था ..जब हमें स्कूल-कालेज आते जाते रास्ते में हाथी गेट या हाल गेट पर या दीवारों पर चिपके हुए पोस्टरों से पता चलता था कि अगले महीने यह फिल्म आने वाली है …बस, इतने हफ्ते पहले ही प्लानिंग शुरु हो जाती कि हां, यार, यह तो देखनी ही है ….क्या धांसू पोस्टर है इसका…


हर रोज दिन में दो बार स्कूल जाते वक्त और लौटते वक्त उस पोस्टर को अच्छे से निहारना …उस पर लिखी हर नाम को पढ़ना …और थियेटर का नाम भी पढ़ना …कितने शो वाली होगी यह फिल्म और क्या टाईम होगा …बस, यह सब कुछ पढ़ कर ही मज़ा आ जाता था…


अब किसी को इस तरह के थियेटर के बाहर पोस्टर इस तरह से निहारते देखता हूं तो बहुत मज़ा आता है ...अपने अमृतसर के पुराने दिन याद आ जाते हैं....यह पिछले हफ्ते की ही मेरी खींची एक फोटो है ...

चलिए, फिल्म लग गई ..सिनेमा घर में …लेकिन पहले कुछ दिन इतना भीड़-भड़क्का, टिकटों की इतनी काला-बाज़ारी, इतनी धक्का-मुक्की कि उन पहले कुछ दिनों में देखना अपने बस की बात न थी …एक दो फिल्में बड़े भाई के साथ देखीं, जब नौकरी करने लगा तो वह परवाह नहीं करता था…जितनी भी महंगी टिकट मिलती, वह हमें ज़रूर दिखा कर ही मानता ….

पुरानी फिल्मों का जादू ही है कि आज से ४०-५०-५५ साल पुरानी फिल्म की कहानी चाहे याद से थोड़ी इधर उधर सरक गई हो ..लेकिन जब गाना बजता है रेडियो पर तो उस से जुड़ी बहुत सी बातें याद आने लगती हैं….जैसे ….


किस थियेटर में, किस शहर में, कौन सा शो (मैटिनी या ईवनिंग या नाईट शो), अकेला देखा था या किसी के साथ देखा था और हम लोग उस थियेटर तक कैसे गए थे, साल के कौन से दिन थे (गर्मी या सर्दी), उस दिन थियेटर के बाहर कैसा माहौल था, बाहर गीतों की किताबें बिक रही थीं या नहीं….सब कुछ याद है …और अगर यह लिखूं कि हर फिल्म के इंटर्वल के दौरान हर खाई हुई सभी चीज़ें भी याद हैं , यह तो गप्प हांकने जैसा हो जाएगा..लेकिन हमारे पास ऑप्शन लिमेटड ही होते थे …भटूरे-छोले, समोसे, फ्राईड मूंगफली, गोल्ड-स्पॉट की बोतल, और चने की फ्राईड दाल भी …नींबू, शिंबू निचोड़ के ….इस वक्त तो इतना ही याद है …और हां, फ्राईड पापड़ भी होते थे लेकिन वहां पर ये खाने में क्या मज़ा, हां, कैसे भूल गया…मूंगफली, रेवड़ी भी तो मिलती थी ….जब, सारे हाल के अंदर मूंगफली के छिलकों से गंद पड़ जाता था…


कितने मज़ेदार दिन थे ….!!


जब फिल्म देख के घर लौट आते तो भी कम से कम एक हफ्ते तक हमारे सिर से उस फिल्म का नशा नहीं उतरता था …यहां तक कि जो उन दिनों चिट्ठियां भी आती जाती थीं उन में भी लिखा जाता था कि हमने यह फिल्म देखी है , आप भी देखिए…ऐसी बहुत सी चिट्ठियां याद हैं मौसी की कि घरौंदा देखी है, मासूम देखी है ….खिलौना देखी है …और कभी कभी भी देख ली है …


और स्कूल में भी जो छात्र किसी फिल्म को देख लेते तो अगले कुछ दिन उस के बारे में आधी छु्ट्टी के वक्त या किसी पीरियड के पहले दो चार मिनट जब तक मास्टर साहब न पहुंच जाते, उन की स्टोरी-टैलिंग चलती रही ….


और जब रेडियो पर उस फिल्म के गाने बजते तो और भी मज़ा आता कि यह गाना तो अब अपना ही है …गाना सुनते ही फिल्म के वे सभी दृश्य आंखों के सामने आ जाते ….अभी भी मैं यह पोस्ट लिखने इसलिए बैठ गया कि मेरे रेडियो पर विविध भारती पर पुराने गीत बज रहे थे …कल उस महान गायक किशोर कुमार का ९७ वां जन्मदिवस है ..देश के बहुत से शहरों में इस मौके पर प्रोग्राम होते हैं …मुंबई में भी रवींद्र नाट्य मंदिर में भी एक प्रोग्राम है …नेट पर ढूंढ कर टिकट बुक कीजिए….हां, अभी इस वक्त मेरे रेडियो पर जो गीत बज रहा था, वह भी सुनिए….



गुज़रे दौर की फिल्मों का, जिन थियेटरों में वो लगती थीं उन का अपना ही जादू होता था…२५ हफ्ते तक, ५० हफ्तों तक किसी फिल्म का थिेयेटर पर लगे रहना …इस दौर में तो सोच कर ही हैरानी होती है …अब तो फिल्मों के पोस्टर हर छठे दिन ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग …(कहावत ठीक है न ?...पता नहीं, चलिए, अब लिख दी सो लिख दी…स्वीकार करिए… हा हा हा हा )....कईं बार उस फिल्म के बारे में पता ही तब चलता है जब उस का पोस्टर थियेटर के बाहर लगता है …


पहले इस मामले में हमारा सूचना-तंत्र बड़ा मज़बूत था …अखबारों में भी सूचना छपती थी ….कौन सी फिल्म किस थियेटर में कितने शो कब से शुरु हो रही है ….एक पेज़ पर यही सब कुछ होता था ..हिंदी और इंगलिश दोनों अखबारों में ….और शहर की दीवारों पर पेंटर बाबू भी इस के बारे में लिख कर सूचना पेंट कर दिया करते थे …। 


अब फिल्में देखने का कुछ मज़ा नहीं रहा….अपने दौर वाली फिल्में कईं कईं बार देख चुके हैं…कुछ तो थियेटर में दो दो बार, फिर टीवी-दूरदर्श के दिनों में कईं बार, फिर केबल टीवी के दिनों में या सीडी-डीवीडी के दिनों में भी कईं बार, फिर ये जो ज़ी-टीवी, स्टार गोल्ड …इन सब पर भी बहुत बार देख लिया है अपनी मनपसंद १९६५ से १९९०-९५ तक आई फिल्मों को …ओटीटी पर भी फिल्में देखना न के बराबर है …..। 


अब तो यूट्यूब पर गीत देख कर और अपने रेडियो पर वे गीत सुन कर ही उन लम्हों को फिर से जी लेते हैं …आप का क्या अनुभव है, लिखना चाहें तो लिख दीजिएि…..


अभी अभी याद आया कि ६-७ साल पहले ऐसे ही एक दिन अमृतसर के सभी थियेटरों से जु़डी अपनी यादों को मैंने एक पोस्ट रूपी पोटली में सहेज दिया था ..अभी यहां शेयर कर रहा हूं , अगर देखना चाहें तो ...मुझे नहीं याद उस दिन क्या लिख दिया था...लेकिन अब नहीं पढूंगा ..क्योंकि अगर पढ़ लूंगा तो फिर शेयर नहीं कर पाऊंगा ....(यह रहा उस का लिंक)...


अमृतसर में नहीं बचा अब कोई भी पुराना सिनेमा घर ...


बचपन के दिनों में कानों में बार बार पडे़ कुछ गीत हमें बार बार याद आते हैं...रास्ता दिखाते हैं....और हां, कभी कभी हमारे फैसलों को भी प्रभावित करते हैं ....यह भी ऐसे गीतकारों की कलम का जादू ही है ..