रविवार, 12 जुलाई 2026

प्लास्टिक से हुआ नाक में दम ...

जीना हम सब का दूभर हो चुका है …प्लास्टिक की वजह से …लेकिन हरेक को लगता है ..मैंनू की? (मुझे क्या?)....बस, यही सोच हमें खत्म कर देगी…



कल रात जुहू चौपाटी जाने का मौका मिला…लेकिन मज़ा बिल्कुल नहीं आया …मज़ा आना तो बहुत दूर की बात है, ऐसे लग रहा था कि कब यहां से वापिस लौट जाएं…कारण? …कारण यही कि रात के दस-ग्यारह बजे का वक्त था और गंदगी के ढेर लगे हुए थे …हर तरफ़ ….ढेर जो जगह जगह लगे हुए थे वे तो थे ही, इस के इलावा दूर तक जहां तक नज़र जा पा रही थी ..पॉलीथीन की थैलियां ही थैलियां बिखरी पड़ी थीं…और भी तरह तरह का कचरा….ज़्यादातर प्लास्टिक ही था …


बहुत ज़्यादा बुरा लगा ...वैसे तो यह पहली बार नहीं थी …हां, मेरी सब से पहली जुहू चौपाटी की यादें पचास-बावन वर्ष पुरानी हैं..हम लोग बंबई आते तो हमारी चाची जी हमें एक दिन जुहू , एक दिन गिरगांव चौपाटी, एक दिन बांद्रा के ओपन-एयर थियेटर में किसी फिल्म को दिखाने ले जाया करतीं…


तब जुहू चौपाटी पर जाना एक उत्सव, एक मेले में जाने जैसा होता था …सीधा उन की गाड़ी जुहू चौपाटी पर ही रुकती ….वहां पर टहलने वहलने का कोई रिवाज नहीं था..बस, वहां पहुंचते ही एक-आधा घंटा समंदर को खूब अच्छे से निहारना….समंदर को देखते देखते आंखें थक जाया करती थीं, दिल नहीं भरता था उन मस्त लहरों को देख कर…और उस के अंदर दूर तक पानी में जाना ….पैंट वैंट सब कुछ गीला हो जाता था …एक दूसरे के ऊपर पानी फैंकना …और उस ज़माने के फिल्मी गीतों का याद आ जाना और गुनगुनाना... हा हा हा हा हा ....जैसे कि ...आ मुलाक़ातों का मौसम आ गया ...



मुझे नहीं याद कभी कोई गंदगी हम ने वहां देखी हो ….पालीथीन तब था ही कहां।….यह बीमारी तो हमें बाद में लगी है …


फिर जब पानी में खेल कर थक जाते तो फिर वहां पर सेव-पूरी, भेल-पूरी, पानी-पूरी, चाट-पापड़ी, बर्फ के रंग बिरंगे मीठे गोले, पाव भाजी….जो भी मन करता, खाते रहते, थक जाते ….

फिर जब हमें बंबई में रहने लगे तो कोई भी हमारे पास आता तो हम भी उस को जूहू चौपाटी एक दिन शाम को ज़रूर ले कर जाते …यह आज से ३०-३५ साल पुरानी बातें होंगी ..लेकिन तब भी कभी कभी कोई प्लास्टिक की पन्नी आदि पानी के साथ बाहर आ जाती तो सब को बहुत बुरा लगता …लेकिन फिर भी गंदगी न के बराबर थी ….और इसी चक्कर में पानी में आगे तक जाना बंद हो गया …जाते भी तो अनमने से ..क्योंकि थोड़ा बहुत गंद तो दिखने लगा था …


ऐसे कईं ढेर प्लास्टिक के दिखाई दिए कल रात ....

लेकिन अभी कुछ सालों से तो पानी में जाने की हिम्मत नहीं होती …इतनी गंदगी …हर तरफ फैला कचरा ….फिर भी कुछ लोग जो शायद बाहर गांव से आए होते हैं, वे अंदर पानी में भीगने के लिए चले ही जाते …


लेकिन अब तो हर तऱफ़ इन प्लास्टिक की थैलियों के इतने बड़े बड़े पहाड़ देख कर तो यही कोशिश रहती है कि आए हैं तो थोड़ा टहल लेते हैं, लेकिन समंदर का पानी पैरों तक न ही पहुंचे तो ठीक है ….वैसे भी इतनी गंदगी है कि कौन इतना गंद लांघ कर अंदर पानी का तरफ़ उस में भीगने जाए….


कल कुछ महीनों बाद ही जुहू चौपाटी पर जाने का सबब हुआ था …सोचता कईं बार हूं कि चाहूं तो रोज़ सुबह …नहीं तो सप्ताह में एक दिन तो जा ही सकता हूं (पास ही हैं…दो तीन किलोमीटर की तो कोई दूरी नहीं होती ..क्या ख्याल है? ).....लेकिन बस इच्छा ही नहीं होती ….यह सब देख कर …। 



मैंने जुहू चौपाटी के ऊपर कईं पोस्टें लिखी हैं …सुबह सुबह कईं ट्रालीयां और दर्जनों सफाई सेवक वहां पर यह सब बीन रहे होते हैं …यह अंबार भी संभवतः इन्हीं सफाई कर्मियों द्वारा ही इकट्ठा कर के रखा हुआ होगा …सुबह ट्राली आयेगी और उठा ले जाएगी…और कल भी समंदर उसमें हमारा फैंका हुआ कचरा वापिस हमारे ऊपर फैंक कर चला जाएगा…समंदर अपने पास कुछ नहीं रखता….


जूहू पर फोटोग्राफर, चाय वाला और मालशी 


सोचने वाली बात है कि इतना कचरा, कचरे को इतने इतने बड़े पहाड़ रोज़ाना कहां जाते होंगे …धरती पर ही रहते होंगे ….जहां सी फैंके जाते होंगे …ज़मीन को हमेशा के लिए बरबाद कर देते हैं ….आज की अखबार में एक फोटो देख कर मन बहुत विचलित हुआ कि मुंबई में कचरे के इने ढेरों के बीचों बीच लोग रहने लगे हैं….


सरकारें कितना करें?...लगभग हर सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगाया….कितनी कितनी लंबी कानूनी प्रक्रिया चलने के बाद यह बैन लगा ….लेकिन इस का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है …..हम यही सोचते हैं कि मेरी चार पांच थैलियों से क्या हो जाएगा….


दो सप्ताह पहले की बात है कि मैं बंबई के जे जे अस्पताल से पांच मिनट की दूरी पर किसी गली से गुज़र रहा था …मैंने दो सफाई सेवकों को देखा ….वह गली से कचरा निकाले जा रहे थे ….आप देखिए इस अंबार को ….इन सफाई सेवकों के काम को सलाम है ….


सफाई सेवक ना हों तो...इसकी कल्पना ही कर के देखिए ....

मेरे पास जब कोई सफाई सेवक आता है तो मैं उसे गुटखा-पानमसाले के लिए ,या तंबाकू चबाने के लिए मना करता हूं तो लगभग हमेशा यही जवाब मिलता है …क्या करें, काम ही इतना गंदा है, बिना इस को चबाए कैसे जी पाएंगे, कैसे काम कर पाएंगे। फिर भी मैं इस के बावजूद भी थोड़ा ज्ञान ज़रूर बांट देता हूं लेकिन उन की बात के सामने मुझे मेरी ही बात, मेरा ज्ञान बिल्कुल थोथा और फोका सा दिखता है….।शायद हम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते …जिन हालात में हमारे ये साथी काम करते हैं….आए दिन गटर की सफाई के दौरान किसी न किसी युवा सफाई सेवक की जान चली जाती है …। कानून हैं, सब कुछ है, लेकिन असल में क्या है, किसी से छुपा नहीं है…। 


Waiting in queue for getting uploaded on  Clean-up Truck 

यात्री कितना भी कचरा फैंकें, गाड़ी में, स्टेशन पर ....रेलवे अपनी जिम्मेदारी तो बखूबी निभा ही रही है....रेलवे के करोड़े रुपए इस कचरा प्रबंधन में खर्च होता है ...अगर यह प्रणाली इतनी दक्ष न हो तो रेल-यूज़र्ज़ का एक दिन में जीना दूभर हो जाए...लेकिन रेल का इस्तेमाल करने वाले यह सब कहां सोचते हैं...यह तस्वीर तो एक स्टेशन की है ...

बंबई के एक स्टेशन के बाहर मैंने कचरा उठाने वाला एक ट्रक देखा ….बहुत बड़ा ट्रक…मैं पांच मिनट तक उस को देखता रहा , इस तरह के लगभग एक सौ के करीब बड़े बड़े बंडल उस में ठूंसे जा रहे थे …मैं देखते देखते थक गया….और वहां से निकल गया …यह एक स्टेशन की बात है ….और दिन में दो बार यह ट्रक आता है ….कचरा उठाने के लिए ….यह बाहर गांव से आने वाली गाड़ियों का कचरा है अधिकतर ….सारा प्लास्टिक, प्लास्टिक..प्लास्टिक …..जोमैटो, स्विगी से मंगवाए खाने के पैकेट, पानी की खाली बोतलें, जंक फूड के खाली पैकेट ….जिस भी प्लास्टिक की आप कल्पना कर सकते हैं, सब कुछ था ….


सोचने वाली बात है कि यह सब यहां से तो उठा लिया जाता है, लेेकिन जाता कहां होगा….


प्लास्टिक के ऊपर पिछले २०-२५ बरसों से इतना लिखा जा चुका है, सरकारों ने इतना काम किया है, इतना हमें समझाया है, इतना डराया है, लेकिन हम नहीं सुधरेंगे …क्योंकि हम ने खतरों से खेलने की ठान रखी है …हर तरफ प्लास्टिक, हर तरफ़ गंदगी….हर तऱफ़ कूड़े का जलाया जाना ….। 


प्लास्टिक पर इतना लिखने के बाद ही मुझे लग रहा है कि यह सब लिखना भी बेवकूफी है ….कोई असर नहीं होगा ….लेेकिन आज तो लिखने का मेरा एक मक़सद है …मेरा अपना एक स्वार्थ है …मैंने कल से यह प्रण किया है कि मैं अब बाज़ार में जाते वक्त हमेशा कपड़े का थैला या थैले ले कर जाया करूंगा ….अगर मेरे पास यह नहीं होगा तो नहीं लाऊंगा बाज़ार से ….। 


पता नहीं हम टमाटर, अंगूर, आलू-बुखारे, आम के दबने से इतने डरते क्यों हैं…..आज से पचास साल पहले हमारी मांएं कैसे लाती थीं सब्जी, एक हाथ में प्लास्टिक की बड़ी सी टोकरी (जिस में टमाटर, अंगूर, धनिये जैसी नाज़ुक चीजें…) और दूसरे हाथ में कपड़े का एक थैला….आलू, प्याज़, पेठा, बैंगन …सब कुछ हार्ड-कोर , रफ-टफ चीज़ें उस थैले में …(हमें मां के साथ बाज़ार जाने का एक ही क्रेज़ होता कि गन्ने का रस पिएंगे या आईसक्रीम दिलवाएगी मां…और वह ज़रूर दिलाती भीं …लेकिन मुझे नहीं याद कभी इतनी अकल भी थी कि मां के हाथ से टोकरी या थैला ही पकड़ लेते …..)....और मज़े की बात …मां को पता रहता था कि कौन सी सब्जी पहले लेनी है, कौन सी बाद में ..ताकि बाद में यह दबने-वबने वाली सिरदर्दी हो ही न। …..और हां, कईं बार अंगूर, या जामुन आदि कागज़ के लिफाफे में डाल कर दुकानदार दे देता था .। और घर पहुंच कर , सारी सब्जियां ज़मीन पर पलट कर फिर भिंडी को अरबी से अलग करना, टींडे को आलू से .....वक्त तो लगता था भई इस में।


सीधी सीधी बात है …जहां चाह वहां राह ….हम में से कोई भी इंसान हो कितना बेवकूफ लगता है सात सब्जियों को, तीन फलों को पालीथीन की थैलियों में डाल कर, अपने दोनों हाथों की उंगलियों की खूंटी पर टांगे, ढिलक रही पतलून को किसी तरह संभालते हुए घर तक पहुंचता है …अगर खुशकिस्मत हुआ तो ….वरना कभी नींबू वाली थैली ने जवाब दे दिया तो कभी पैंचो पपीता नीचे गिर जाता है, कभी एक आम, दो आलू बुखारे …..और कभी कभी ढीली पैंट भी गिरने की कगार पर होती है ...


चलिए, अपने ही से शुरुआत करते हैं….अब भी बहुत देर हो चुकी है…लेकिन फिर भी कहीं पढ़ा था …फिरोज़पुर के एक स्कूल में प्रिंसीपल के दफ्तर के बाहर ….There is never a wrong time to do the right thing!! 


And of course, journey of 3000 miles starts with the single step. What do say? I ban plastic from my life with immediate effect. कुछ दिनों बाद फिर एक पोस्ट लिखूंगा कि अपने इस प्रण पर कायम रहा या बस ऐसे ही यह भी मेरे लफ़ाफे़ेबाजी़ थी …..


सरकारों से जितना हो पा रहा है, कर रही हैं, लेकिन अगर जनता ही न सुधरे तो सरकारें क्या करें...देखिए, जूहू पर इस तरह के डस्टबिन रखे पड़े हैं कईं जगह, लेकिन देखिए, खाली पड़े हैं...इतना कचरा, इतना कबाड़ की इन विशाल कचरा पेटियों में भी यह समा न पाए....।  

एक बार फिर से प्रण दोहरा दूं....आज से मैंने इन पन्नियों आदि का त्याग किया ...न इन को इस्तेमाल करूंगा और दूसरों को भी इस के लिए प्रेरित करूंगा....हम लोगों की ज़िंदगी के लिए यह करना अब इतना ज़रुरी हो गया है कि पानी नाक तक आ गया है....। ऐसे ही ज्ञान पेलने से क्या हासिल, हम भी कुछ शुरूआत तो करें ....। 

हिंदी फिल्मों ने भी हर मौके के लिए गाने हैं....जैसे कचरे की बात चल रही थी तो मुझे महमूद का वह गीत याद आ गया जिसमें वह कबाड़ी का रोल कर रहा है ....इस में देखिए कि पहले कबाड़ भी किस तरह का होता था ...खाली डिब्बा, खाली बोतल .... 😂


आप भी देखिए आज की टाइम्स आफ इंडिया में छपी यह फोटो ....१२ जुलाई २०२६ 

शनिवार, 4 जुलाई 2026

सम्मान जीते जी होता है ...बाद में क्या !

मरणोपरांत तो माईं लफ़्ज़ ही इतना मायूसी से भरा है। जानता हूं जाना सब ने है, कोई बच के नहीं निकल पाएगा। फिर भी मरणोपरांत लफ्‍ज़ सुनते ही माईं उदासी घेर लेती है जैसे … अकसर बड़े बड़े सम्मान देते वक्त इस का इस्तेमाल होता है …अच्छा, एक बात है कि 'मरने के बाद' वाले शब्द से फिर भी बेहतर है मरणोपरांत …क्योंकि हिंदी भी अधिकतर आम आदमी ने इतनी अच्छी से भी नहीं पढ़ी होती कि वह सन्धि-सन्धि विच्छेद तक पहुंच पाए…और जो इस के लिए फिरंगी लफ़्ज़ है…पास्थूमसली …आप पढ़ने वाले ही अनुमान लगाएं कि इस लफ़्ज़ का अर्थ ही कितने लोग समझ पाते होंगे …

कुछ ख्याल लिख लूं ..पहले ….बहुत दिनों से इस विषय पर अपने उद्गार प्रगट करना चाह रहा था …६०० शब्द लिखे भी थे, लेकिन ब्लॉगर ड्राफ्ट में कहीं छिपे पड़े हुए थे…आज फिर से ख्याल आया कि उसे पूरा करना है …मुश्किल ही से मिला ….वरना पूरा लिखने की इस वक्त कोई मंशा नहीं थी …

हां, पंद्रह बीस बरस पहले की बात है …मैं अमृतसर के पुतलीघर इलाके में स्थित पिपली साहिब गुरुदारे के आगे से निकल रहा था …उस के बाहर किसी स्वयं-सेवी संस्था ने कोई सामाजिक संदेश देते हुए एक बड़ा सा बैनर लगा रखा था …मैंने पढ़ा …उन दिनों वाट्सएप नही था, इसलिए सब कुछ बड़े ध्यान से पढा करते थे …यहां तक कि मूंगफली खा कर कागज़ का खाली लिफाफा भी फैंकने से पहले थोड़ा देख लेते थे ….शायद कुछ काम की बात ही मिल जाए।

हां, तो उस पर जो भी लिखा था कि उस की चंद बातें मेरे दिलोदिमाग में घर कर गईं …एक तो था कि जीते जीते तो किसी ने रोटी नहीं पूछी …और मरने के बाद लाश के मुंह में खालिस देसी घी का डिब्बा उंडेल रहे हैं….जीते जीते मैं तरसता रहा कि कोई मेरे पास आ कर बैठे …लेकिन नहीं, किसी को वक्त ही न मिला ..अब बीसियों लोग मेरी लाश को घेर के बैठे हैं….मेरे जीते जी इन में से किसी के पास वक्त नहीं था, मैं अकेलेपन की वजह ही से धीरे धीरे मरता चला गया ..अब मैं क्या करूं इन के घडि़याली आंसूओं का …। 

यह सब हम लोग अपने आस पास देखते हैं, महसूस करते हैं…मध्यम वर्ग की, उच्च मध्यम वर्ग की ही बात नहीं है …अरबोंपति बुड्ढे मारे मारे फिरते हैं…कितनी की खबरें अखबार में आती रही हैं और अभी हाल फिलहाल में जब वे इस जहां से रुख्सत हुए तो वही परिवार वाले उस की चिरशांति और सद्गगति के लिए उसे आग देने आ पहुंचते हैं ..जैसे जीते जी सब कुछ सामान्य रहा हो ….

कुछ दिन पहले मैं किसी वरिष्ठ संपादक के यहां बैठा हुआ था ...उन की लाईब्रेरी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा ...उन में ६०-७० के दशक के धर्मयुग, इलस्ट्रेटेड वीकली ...और भी बहुत कुछ करीने से सजा रखा था ...अचानक मेरी नज़र जिस किताब पर पड़ी और वहीं टिकी रह गई ....वह थी काका हाथरसी की एक किताब...


पहले काका हाथरसी के बारे में...मेरी उन से पहचान कब हुई? ...पहले स्कूल-कालेज के जब वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह होते थे तो इनाम के रूप में किताबें दी जाती थीं ...और कईं बार तो किताबों का चुनाव करने का भी मौका मिलता था ...आप पहले से चुनाव कर सकते थे अपनी रुचि के मुताबिक ...

हां, तो मैं स्कूल में पढ़ता था और मेरी बड़ी बहन कालेज में थीं ...उन को ऐसे ही कॉलेज के एक समारोह में दो किताबें मिली थीं...एक तो गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि (इंगलिश में) और दूसरी थी काका हाथरसी की फुलझड़ियां ...पहली किताब तो मेरे लिए क्या, सारे घर के लिए काला अक्षर भैंस बराबर थी ...बस अकसर किसी न किसी के हाथ में नज़र आती और साथ में यह बात की टैगोर को इसी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था ...लेकिन काका हाथरसी की किताब अकसर कोई न कोई पढ़ता दिख जाता ...बिल्कुल पतली सी किताब थी ...लेकिन जो भी उस को पढ़ता वह हंसता और दूसरों को काका के हसगुल्ले सुना कर हंसा देता ....इस का मतलब यही हुआ कि मेरी वाकफ़ियत काका से ५० साल से भी पुरानी है ..है कि नहीं? सीधा सीधा हिसाब है ..। 

हंसने हंसाने वाले लेखक और फिल्मी कलाकार बहुत पसंद किए जाते थे ....क्योंकि खुश रहने का यही एक माध्यम था ...रेडियो में तो आते होंगे ये हास्यकवि ..लेकिन होली इत्यादि पर आते होंगे ...मुझे नहीं याद ऐसा कोई अवसर। 

हां, तो उन संपादक महोदय के घर जब मैंने काका हाथरसी पर लिखी किताब देखी तो मैं दंग रह गया ...मैं कुछ समझ नहीं पाया....मैं जल्दी से उस किताब के पन्ने पलटने लगा ...मेरी व्यग्रता देख कर उन्होंने कहा कि इसे आप ले जाइए ..आराम से पढ़िेए...लेकिन यह बात मुझे नापसंद है कि किसी के घरेलू पुस्तकालय से कोई किताब उठा लाओ...फिर उसे न पढ़ो और न लौटाओ....और बस कुछ वक्त के बाद जब वह ढूंढने पर भी न मिले तो उसे गुम घोषित कर दिया....मुझे इस बात से बहुत नफ़रत है ...

इसलिए मैं वह किताब वहां से पढ़ने के लिए उठा कर लाने की सोच भी नहीं सकता था ..हां, फोटो मैंने बहुत सी ली हैं...शेयर करूंगा ...और देखूंगा कहीं आनलाईन मिली तो ले लूंगा...

इस किताब का शीर्षक था ...काका हाथरसी ..अभिनंदन ग्रंथ ...इस का प्रकाशन वर्ष है ...१९७६ ...आज से पूरे पचास वर्ष पहले छपी थी ..काका जिन का जन्म १९०६ का है, उन्होंने उस वर्ष अपनी आयु के ७० वर्ष पूरे किए थे ...और डा गिरिराजशरण अग्रवाल ने इस ग्रंथ का संपादन किया था ...मैंने जब से यह किताब देखी है, मेरा खयाल है कि इस से बड़ा सम्मान जीते जी किसी का हो ही नहीं सकता...

आखिर क्या देख लिया मैंने इस ग्रंथ में ...पूछिए, क्या नहीं देखा इस में। सब से पहले तो उस ज़माने के समकालीन जाने-माने साहित्यकारों ने काका के बारे में अपने उद्गगार प्रकट किए हैं....पचास के करीब तो होंगे ज़रूर ....और इन में उस दौर के अन्य चोटि के व्यंग्यकार भी शामिल हैं...

तो यह था रुतबा उस दौर में हास्य-व्यंग्य का ..

यह तो जैसे एक ट्रेलर है ...इस ग्र में ४५० पन्ने हैं...

और इस ग्रंथ में है काका की विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के साथ तस्वीरें ..अलग अलग अवसरों पर ...जिन के नीचे लिखा है कि उन्होंने काका को प्रेरित किया कि ऐसे ही हास्य-व्यंग्य से आप देश समाज का मनोरंजन करते रहिए, जन मानस का मार्ग-दर्शन करते रहिेए…

४५० पन्नों के ग्रंथ में इस तरह के पन्नों को तो गिनती में लिया ही नहीं गया ....

इस तरह कि किताब किसी को उस के जीते जी भेंट किये जाना….इस से बड़ा सम्मान हो ही नहीं सकता….उन के बीसियों समकालीन साहित्यकारों ने उन के बारे में अपने विचार लिखे और काका की रचनाएं भी इस में पढ़ने को मिल गईं…जिन को सुन कर हम लोग बचपन में लोट-पोट हो जाया करते थे …वैसे वह हास्य-व्यंग्य का सुनहरा दौर था …फिल्में हों या साहित्य हो या स्टेज हो…आज कल तो हंसने के नाम पर क्या चल रहा है, आप भी तो सब जानते हैं …कोई कुछ ऐसा कह देता है कि जेल की सैर कर आता है, मुकद्मेबाजी शुरु हो जाती है …और वैसे भी टीवी पर जो मशहूर शो आते हैं वे भी कहां देखे जाते हैं…बात बात दूसरों का बेहूदा मज़ाक, फूहड़पना, द्वि-अर्थी संवाद ….कभी यह सब देखने-सुनने को मै आतुर नहीं हुआ ..हां, कभी कभी देख भी लेते हैं …लेकिन ये जो स्टैंड-अप कॉमेडी वाले शो हैं, इन का तो फ्री पास भी मिले तो भी न जा पाऊं….शायद वे अपनी जगह, अपनी उम्र के हिसाब से ठीक ही हैं, हमारे लिए ही उन का सिलेबस अब ऑउट ऑफ सिलेबस हो चुका है …। 

इतने इतने बड़े सम्मान मरने के बाद मिल पाते  हैं. …मुझे खुशी है कि काका का एक ऐसा ही सम्मान पदमश्री उन को १९८५ में मिल गया था …यानि कि इस किताब के छपने के दस बरस बाद और उन के इस दुनिया से जाने से १० साल पहले …(वे १९९५ में स्वर्गलोक सिधार गए)...। 

जीते जीते भी तो लोगों का काम नज़र आ ही जाता होगा….ढूंढ कर उन को तरह तरह के सम्मान मिलने चाहिए….क्योंकि फौजियों को छोड़ कर उन सब लोगों का काम तो जीते जी नज़र आ ही जाता है …ऐसे में उन के मरने के बाद मिलने वाले अवार्ड्स के बारे में मेरे खयाल बहुत अलग हैं…बस मैं इस से आगे कुछ नहीं लिखना चाहता। जीते जी किसी को मिले तो वह उस की गर्मी पा कर चंद बरस और सिर उठा कर जी ले …वरना उस के जाने के बाद ……वही मरणोपरांत वाली उदास कर देने वाली बात ……। लेकिन, हां, फौजियों के लिए …जो अपने देश की रक्षा के लिए या अन्य कारणों से अपने प्राणों की आहूति दे कर वीरगति को प्राप्त करते हैं, उन को तो मरणोपरांत जितना सम्मानित किया जा सके, कम है। वैसे भी जीते जी भी आर्मड-फोर्स के जवानों-अधिकारियों को समय समय पर वीरता पुरस्कारों, विशिष्ठ सेवा पुरस्कारों इत्यादि से नवाज़ा ही जाता है ….उन सब की हौसलाफ़ज़ाई के लिए यह सब क़ाबिलेतारीफ़ है। 

अवार्ड ही नहीं …सभी तरह के सम्मान जैसे किसी रोड़ का नामकरण किसी बडे़ नामे गिरामी कलाकार, नेता, साधु-संयासी  के नाम पर रखना भी उस के जीते जी ही जाना चाहिए …सारा हिसाब किताब एक दम सांसों के चलते चलते चुकता ….वह भी देखे, उसे भी अच्छा लगे……बाद में किस ने देखा …..वैसे भी आज कल तो पुरानी सड़कों के नाम, पुराने शहरों-कसबों तक के नाम बदलने वाला काम भी ट्रेंडिंग है …कम से कम कोई बंदा जीते जी तो फूल कर कुप्पा हो पाए…। 

बस, पोस्ट का यही आशय है कि सारा हिसाब किताब जीते जी हो जाना चाहिए ..वरना पीछे रह जाने वाले अवार्ड लेते हैं और बाद में बड़े अफ़सोस के साथ यह भी कहते हैं कि काश…यह उन के जीते जी उन को मिल गया होता। बहुत सी ऐसी उदाहरणें हैं जिन को जीते जी तो नज़रअंदाज़ किया गया लेकिन मरने के बरसों बाद उन पर तरह तरह के सम्मानों की बौछार की गई ….वैसे तो यह सब भी इतना सीधा सपाट नहीं होता ….क्योकि इस में तरह तरह की राजनीति भी घुस आती है ……

कुछ भी हो दोस्तो, माईं, हमें तो वही बात मुर्दे के मुंह में घी का डिब्बा जबरदस्ती ठूंसने वाली बात बार बार याद आती है …चलिेए, छोड़तेें हैं इस टॉपिक को यहीं पर , पानी को मथने वाली बात है ….काका हाथरसी की लिखी एक बात याद करते हैं…और उस के बाद मेरी एक प्रकाशित कविता……

धार्मिक शिकारी ..

बहुत सुन चुके काव्य अलौकिक, 

कुछ लौकिक आनंद लीजिए। 

छंद छंद कर ‘काका’ कवि से , 

कलियुग के छलछंद सीखिए। 

दलबंदी के पुष्प संजोकर, 

चाटुकारिता का घिस चंदन। 

दंभ-द्वेष का दीप दिखाकर, 

करते रहो प्रभु का बंदन। 

सदाचार की बानी बोलें, 

ऐसे त्यागी तोते पालो।

“रिश्वत लेना महापाप है”

फाटक के ऊपर लिखवा लो। 

(क्रमश:)





ऐसा होता था हास्य-व्यंग्य भी उस दौर की फिल्मों में ....आज भी बार बार देखते हैं, हर बार हंसते हैं....

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

गिरते पेड़, कुचलते लोग ...

अभी इस पोस्ट को समेटने से पांच मिनट पहले यह पेपर मेरे हाथ में आया ....

हमें यह नहीं याद कि आज से ४०-५० बरस पहले जब कोई पेड़ गिरता था तो साथ में किसी न किसी की जान भी ले लेता था…पहले हनेरी-झक्खड़ (अंधेरी-तूफ़ान) आने पर, मूसलाधार गर्ज के साथ बारिश होने से पेड़ों की टहनियां कभी कभी टूट जाया करती थीं …जब बारिश थमने के बाद हम बाहर निकलते और यह सब देखते तो बहुत ज़्यादा हैरानी भी होती और अजीब भी लगता…


कईं बार पेड़ की बड़ी शाखाएं सड़क के बीचों बीच गिर जाती जिसे बहुत से लोग उठा कर या घसीट कर वहां से हटा देते ताकि आने जाने वालों को कोई दिक्कत न हो…


यह अभी कुछ साल पहले की ही बात है कि जिन शहरों में हम रहे हैं, वहां हनेरी-झक्खड़ आने पर पेड़ों के गिरने की खबरें आने लगीं….और एक दो बड़े पेड़ गिर भी जाते तो अखबार में फोटो आ जाती…अकसर लोग वहां पर उसे देखने जाते …और ऐसे लगता था जैसे उस पेड़ के जाने पर वहां आने वाले सारे लोग शोक-संतृप्त हैं…भावुक से दिखा करते थे उसे गिरा हुआ देख कर …


कईं बार पेड़ जो सड़क के बीचोंबीच गिरता तो उसे सड़क से हटाने के लिए कईं लोग आरी, हथौड़ी लेकर पहुंचे होते …और खासी मशक्कत के बाद उसे वहां से हटाया जाता …


लेकिन अभी बिना किसी तूफ़ान के…सामान्य बारिश में भी आए दिन पेड़ गिरने लगे हैं…और बड़े बड़े पेड़ जिस आसानी से छोटी छोटी बात पर गिरने लगे हैं उतनी ही आसानी से हटाए जाने लगे हैं…देखते ही देखते उसे काट कर हटाने वाली मशीनें पहुंच जाती हैं….चंद मिनटों में काट कर उसे हटा दिया जाता है …क्योंकि अब सारा सिस्टम सैट है, यह सब को समझने की ज़रूरत है, बस पेड़ के गिरने का ही इंतज़ार हो रहा होता है जैसे…


इधर बंबई में बहुत पेड़ गिर रहे हैं….अखबार में तो बहुत से कारण लिखे होते हैं…लेकिन अधिकतर पेड़ों के गिराए जाने का कारण यही दिखता है कि हमने जब जब भी विकास किया, पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाई ….सैंकड़ों-हज़ारों पेड़ जो भी हमारे रास्ते में आए हमने उन को अपने रास्ते से हटाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी…आप भी अखबार पढ़ते होंगे, कोई ऐसा विकास-कार्य देखा आपने जो इसलिए रुक गया या टल गया या जिस का रास्ता बदल दिया गया क्योंकि उस के रास्ते में हज़ारों पेड़ आ रहे थे …मुझे ऐसा एक प्रोजैक्ट भी याद नहीं है ….एक बार जब फाईल पर फैसला ले लिया गया कि पेड़ हटने हैं तो वे हट के ही रहेंगे …किसी भी कीमत पर ….कोर्ट-कचहरी भी जाने से कुछ होता नहीं …ग्रीन ट्रिब्यूनल, पर्यावरण क्लियरैंस …सब कुछ मैनेज हो जाता है और हो ही रहा है …ज़्यादा से ज़्यादा ये संस्थान ऐसे कह देते हैं कि इतने पेड़ ट्रांसप्लांट कर के इधर से उधर लगवाने होंगे, या इतने हज़ार पेड़ या इतने लाख पेड़ किसी दूसरी जगह पर रोपने होंगे ….इस से आगे मैं कुछ नहीं लिख सकता, मैं भी मजबूर हूं…


कईं बार अखबार में आता है कि जो पेड़ अचानक इतनी संख्या में गिरने लगते हैं उस के पीछे यह कारण भी होता है कुछ स्वार्थी तत्व उस की जड़ों में एसिड या कुछ और कैमीकल डाल कर उसे कमज़ोर करते हैं ताकि वह आसानी से नेचुरल तरीके से गिर जाए और उसे नेचुरल डैथ की श्रेणी मेंं लिया जा सके….


जिस स्कूल बस में वह ११ साल का विहान घर लौट रहा था ...पहुंच कहीं और ही गया। 

और भी कारण तो हैं ही, लेकिन बंबई में तो आए दिन जो सड़क किनारे बड़े बड़े विशाल पेड़ गिर रहे हैं उन का कारण यही है कि यहां पर सड़कों का कंकरीटीकरण बड़ी संख्या में हो रहा है….और उस से पहले जो ज़मीन तैयार होती है, उस के अंतर्गत रास्ते में या किनारे पर खड़े बड़े बड़े पेडों की जड़ें भी अच्छी खासी कट जाती हैं….हमें तो इन की यह हालत देख कर ही डर लगता है …पता नहीं उद्यान विभाग के विशेषज्ञों को क्यों नहीं लगता ….फिर दो दिन बाद देखते हैं कि उस सारे रास्ते पर कंक्रीट बिछ गया है, बढ़िया मजबूत सड़क बन गई है …और वह पेड़ भी वहां पर खड़ा है…कमज़ोर जड़ों के एक बात, और दूसरी बात यह कि जितनी बची भी हैं, उस का भी कंकरीट गला दबा देती है…रिजल्ट क्या? …….रिजल्ट यही जो दो दिन पहले हुआ …एक स्कूल बस जा रही थी ..अचानक एक पीपल का पेड़ उस पर गिरा …एक ११ साल का बच्चा तो वहीं ढेर हो गया और कईं घायल हो गए ….


इस केस में बीएमसी के तीन चार कर्मचारी अधिकारी सुस्पेंड हो गए हैं ….क्या हो जाएगा इस से ……उन को नौकरी से हटाने से भी क्या हो जाएगा….वैसे तो ऐसा कुछ होगा नहीं ….ऐसे हटाए जाने लगे लोग नौकरियों से तो दफ्तर खाली हो जाएंगे ….रही बात राहत की …किसी बेचारी दंपति का इकलौता एक ११ साल का बच्चा जो जला गया, उसे तुम क्या ही राहत दे पाओगे …….। ऐसी बात करना भी बेहद असंवेदनशील लगता है ….। 


अभी मुंबई में बारिश शुरु हुए १-२ दिन ही हुए थे कि यह हादसा हो गया …एक नहीं पेड़ तो १५० के करीब गिरे हैं …लेकिन अब पेड़ों के गिरने की खबरें कोई खबरें नहीं लगतीं जब तक उन के नीचे कोई शख्स न दब जाए….और हां, आए दिन जो कमज़ोर पड़ रहे पेड़ों की टहनियां गिरने से जो मोटर-कारें क्षतिग्रस्त हो रही हैं, वे तो किसी गिनती में ही नहीं हैं….बस, अगर उस वक्त उनके अंदर कोई बैठा नहीं है या वे कहीं पार्क की हुई हैं तो बस लोग इस बात ही से खुश हो जाते हैं कि जान बची सो लाखों पाए….कुछ वर्ष पहली हमारी थार जीप जो यहीं पाली हिल की मेन रोड़ पर पार्क की हुई थी, एक बड़ी सी टहनी उस पर गिरने से सुबह उस की छत पूरी फटी हुई थी …..बड़ा माथा-पच्ची हुई थी उसे ठीक करवाने में ….। 




देवानंद के पड़ोस की बिल्डिंग 


उसी रोड पर थोड़ा आगे देवानंद रोड़ पर देवानंद के घर के साथ वाली बिल्ड़िंग में भी कल एक बहुत बड़ा पेड़ गिरा हुआ दिखा …शाम के वक्त मैं टहल रहा था तो मैंने पास खड़े एक भेल बेचने वाले से पूछा कि यह कैसे हुआ। उसने बताया कि पेड़ तो गिरा परसों लेकिन एक ड्राईवर और एक दंपति जो उस कार में थे, उन की जान बच गई…..गिरते हुए इतने बड़े पेड़ ने उन की कार के बोनट को बस छुआ और लमलेट हो गया….


देखिए, कितनी सफाई से तुरंत उस पेड़ को काट फाट के साफ कर दिया गया है …पेड़ गिरने के बाद लकड़ी समेटने वाले सक्रिय हो जाते हैं …क्योंकि आज कल लकड़ी भी एक तरह को सोना ही है …


मैंने ऊपर लिखा कि कईं जगहों पर ऐसा भी देखा गया कि बड़े पेड़ों की जड़ें कमज़ोर करने के लिए उस की जड़ों में एसिड या इसी तरह का कोई केमीकल डाल दिया जाता है ताकि वे जल्दी से जल्दी गिरें और इस तरह के गिरोह के लोगों का काम आसान हो …..लकड़ी बिके और काम निपटे ….। 


कुछ दिन पहले एक खबर टाइम्स में दिखी कि मुंबई के पाली हिल इलाके में सभी पुराने पेड़ों का चेक-अप चल रहा है …तीन चार दिन चलने वाला था…मेरा ख्याल भी था कि किसी दिन देख कर आऊंगा …एक वैन में कुछ मशीनें थीं, कुछ विशेषज्ञ टाइप लोग थे ऐसा कहा गया था उस खबर में जो पुराने पेड़ों का अल्ट्रासाऊंड कर के …यह पता करेंगे कि उन की जड़ें कितनी गहरी या मजबूत या कमज़ोर हैं और बिना उन को काटे यह भी पता करेंगे कि उन के तने कितने स्वस्थ या अस्वस्थ हैं, कहीं वे अंदर से खोखले तो नहीं हो चुके ….कहने का मतलब की पुराने पेड़ों की सेहत की पूरी जांच। मैं सोच रहा था कि ये हेल्थ-चैकअप इन पाली हिल के पेड़ों का ही क्यों, फिर पता चला कि यह चैक-अप बहुत महंगा होता है ……..मुझे नहीं पता कि पेड़ों के इस चैक-्अप को कोई स्पांसर्स मिला था या बीएमसी अपने खर्च कर यह करवा रही थी…कुछ नहीं पता मुझे ….लेेकिन उस जांच के बाद यह तय किया जाना था कि कौन सा पेड़ गिरा दिया जाए किसी छोड़ दिया जाए….पता नहीं जो दो दिन पहले पाली हिल वाला जो पेड़ गिरा है, उस का हैल्थ-कार्ड का क्या कह रहा था …गिरने के बाद तो वह अंदर से पूरा खोखला दिख रहा है …। 


कल ही मैं सुबह जब कहीं जा रहा था तो एक और बहुत बड़ा पेड़ गिरा हुआ था …किसी पुरानी खंड़हर बिल्डिंग के सामने …पता नहीं मुझे तो कहीं भी पेड़ का गिरना सामान्य नहीं लगता …कितने पेड़ होते होंगे जो अपनी मौत मरते होंगे, लेकिन बहुतेरों को तो हमारा लालच, भ्रष्टाचार, हमारी उपेक्षा….ये सब मिल कर गिरा के मार देते होंगे …



उम्रदराज़ पेड़ आम तौर पर मरते नहीं, बढ़ती उम्र के साथ और भी सुंदर दिखने लगते हैं जैसे यह हमारी कॉलोनी में खड़ा यह पेड़ ….जैसे जैसे बड़ा हो रहा है, इस की सुंदरता निखर रही है …किस्मत वाला है, सरकारी कालोनी के इतने बड़े इलाके में मस्ती से खड़ा है ……..और सब का चहेता है, आप इस फोटो मेें देख ही रहे हैं….वैसे इस के यहां होने से हम अपने आप को इस से ज़्यादा किस्मतवाला मानते हैं…….है कि नहीं?

मेरा एक लेख यह भी है, १० साल पुराना...मैंने भी कल फिर से देखा, आप भी देखिएगा कभी ...लोग दो तरह के होते हैं...


और एक बूढ़े, कमज़ोर की बात भी सुन लीजिए....वह इतना कमज़ोर होने पर भी क्यों नहीं गिरना चाहता ....किस के लिए फ्रिकमंद है ....पढ़िए....