शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मुंबई वेस्टर्न लाइन ए.सी लोकल सफरनामा....



लंबे अरसे से यह इच्छा रही है कि मैं मुंबई की एयरकंडीशंड लोकल ट्रेन के बारे में अपने तजुर्बे लिखूं…लेकिन टलता रहा …यूं ही …ऐसे ही लगा कि इस पर भी क्या लिखूं…लेकिन दिल है कि मानता नहीं …कह रहा है - लिख, दिल की दिल में न रखा कर, कह दिया कर, लिख कर फ़ारिग हो जाया कर….हल्कापन महसूस होगा…


ठीक है….हल्का ही रहता हूं …यही कोशिश करता हूं …कोई फ़िज़ूल के पंगे में नहीं पड़ता….आज दिल की ही मान कर लैपटाप खोल लिया है …(मैं लिखने का काम लैपटाप पर ही करता हूं…मोबाईल पर सिर्फ़ दूसरों की सोशल मीडिया पोस्टों पर पीठ थपथपाने और ई-मोजी ठेलने का काम ही हो पाता है ..। 


हां, तो मैं बात कर रहा था एयरकंडीशन्‍ड लोकल ट्रेन में सफर करने के बारे में ….मेरा क्या तजुर्बा क्या रहा। 


हां, तो बात ऐसी है कि मुंबई लोकल ट्रेनें कब से शुरु हुई..यह मुझे ठीक से याद नहीं…याद नहीं न ना सही, अब यह लिखने के लिए भी गूगल से पूछ कर सही तारीख लिखूं …यह बडा़ बोरिंग काम लगता है। 


मैंने पिछले दो बरसों में काफ़ी बार मुंबई की ए.सी लोकल ट्रेन में सफ़र किया है ….सफ़र मेरा १०-१५ मिनट का ही होता है ..लेकिन जो एक्सपीरियंस रहे, वह लिख रहा हूं…


बहुत से लोगों को शायद पता न हो कि मुंबई की ए.सी लोकल ट्रेन में सात सीटें मोटरमैन की तरफ़ वाले एक डिब्बे में और सात सीटें पीछे गार्ड वाले डिब्बे के पास वरिष्ठ नागरिकों के लिए रिज़र्व रहती हैं…


ज़ाहिर है कोई ज़्यादा संख्या तो नहीं है, इतने उम्रदराज़ लोग सफ़र करते हैं ….इसलिए मुझे कभी भी यह संख्या पर्याप्त नहीं लगी…लेकिन इस बात का सुकून है कि रेल विभाग ने एक अच्छी शुरुआत तो की …हम सब यह भी समझते हैं कि इस तरह की यात्री सुविधाएं अचानक एक दिन प्लेट में रख कर परोस नहीं दी जातीं…


इस के पीछे संघर्ष होता है …जो लंबे समय तक चलता है….फिर मामले कोर्ट कचहरी तक पहुंचते हैं ….कईं बार कोर्ट के आदेश अनुसार कुछ यात्री सुविधाएं देने पर रेल विभाग को बाध्य होना पड़ता है …जैसे कि आप जो मुंबई के स्टेशनों पर फर्स्ट-एड जैसी चिकित्सा सुविधाएं या स्टेशन के बाहर एम्बूलेंस खड़ी देखते हैं, यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ है ….। 


खैर, ये जो सीनियर सिटिजन वाली सात सीटें हैं, इन पर ही जवान लोगों की नज़र रहती है …कैसे इन पर कब्ज़ा किया जाए….



मैंने कुछ दिन तो देखा कि उन सात सीटों में से तीन चार पर या दो तीन पर तो जवान लोग (पुरूष और महिलाएं - अधिकतर पुरुष) बैठे हैं जो किसी भी नज़रिए से ६० के तो नहीं लग रहे ….


और सब से दुःखद बात यह कि उन के सामने ही वरिष्ठ नागरिक आडे़-टेढ़े होकर, कोई तो किसी दीवार का सहारा लेकर खड़े हैं …और इन जवान लोगों की सेहत पर कोई असर नहीं है …ये अपनी रीलों और ओटीटी का आनंद उठा रहे हैं …बिना ऊपर देखे कि कौन खड़ा है, कौन नहीं खड़ा है..


दो-तीन दिन तो मैंने देखा….और यह देख कर तो और भी दुःख हुआ कि उन को कोई उठने के लिए कह भी नहीं रहा ….हैल विद दिस टॉइप ऑफ शिष्टाचार…नहीं, मैं नहीं हूं इतना शिष्टाचारी ….और शायद इस उम्रदराज़ में लोगों में विभिन्न कारणों की वजह से इतना कांफिडेंस भी नहीं रहता या सामने वाला ही इतना ज़्यादा सूटेड-बूटेड है कि उसे उठने के लिए कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते …


लेकिन मैं इस बात के बहुत ख़िलाफ़ हूं…और मैंने तो जो भी सामने जवान दिखता …उसे उठने के लिए कहना शुरु कर दिया ..और वे सब एक सेकेंड में उठ भी जाते हैं…उन को पता सब रहता है कि ये सीटें किन के लिए आरक्षित हैं…


एक बार तो बंदा अपनी वेश-भूषा और हाव-भाव और ऐंठन से कोई सीईओ ही लग रहा था …मैंने उठने के लिए इशारा किया और वह उठ गया…


एक बार मेरे से गलती भी हुई …मैं भी नया नया था इस लाइन में …मैंने जिस स्लिम-ट्रिम एक ऐसी ही सीट पर बैठे बंदे को याद दिलाया की यह सीनियर-सिटीजन सीट है तो वह झट से हंसते हुए बोला कि वह भी सीनियर सिटीजन ही है …। 


बस, उस दिन के बाद से तो उस से दोस्ती हो गई …बताने लगा कि बहुत से लोग धोखा खा जाते हैं…मैंने कहा कि तुम लगते ही इतने छोटे हो …


इतने साल हो गए …ज़िंदगी की किताब के पन्ने उलटते-पलटते और लोगों के चेहरे, उन के हाव-भाव समझते, सारा दिन हर उम्र के बंदे से वास्ता पड़ता है ….ड्यूटी पर भी और बाहर भी …ऐसे में सामने वाले की उम्र का सही अंदाज़ा हो ही जाता है ….


बंदे जितनी मर्ज़ी बालों पर, मूछों पर कालिख, डाई या वह अजीबोगरीब लाल मेंहदी पोत ले ….उम्र तो अपने आप जाहिर हो ही जाती है ….वह बात अलग है कि कुछ मेरे जैसे लोग उम्र से पहले ही सीनियर सिटीजन लगने लगते हैं और उम्र से पहले ही सुपर-सीनियर सिटीज़न….कुछ किस्से सुनाता हूं आप को …


एक किस्सा तो यह कि अभी मुझे सीनियर सिटीजन होने में दो साल थे कि दिल्ली मेट्रो में सफर करते वक्त मैं ऐसे ही किसी सीनियर सिटीजन सीट के सामने खड़ा था, अचानक उस सीट पर बैठा एक जवान उठ खड़ा हुआ …मुझे सीनियर सिटीजन समझ कर। 


एक बार मुझे यह अहसास हो गया कि मैं सीनियर सिटीज़न लगने लगा हूं ….फिर तो दिल्ली की मेट्रो में सफ़र करना काफी आसान हो गया…जब तक मैं कानूनन सीनियर सिटीज़न न हो गया….तब तक भी …. 


और सीनियर सिटीजन होते हुए अगर आप की तुलना गुलज़ार से की जाए ..जो कि मेरे से ३० साल उम्र में बड़ा है …तो कैसा लगेगा? …हुआ यूं कि मैं किसी वेलनैस रेज़िडेंशियल प्रोग्राम में था …एक दिन किसी महिला ने क्लास के बाद कहा कि आप बिल्कुल गुलज़ार साहब जैसे लगते हैं, आप अभी कुछ लिख रहे थे तो भी वैसे ही लग रहे थे, और आप के बाल भी और ड्रेसिंग स्टाईल भी वैसा ही है …अब आप मेरी हालत देखिए, इस तरह का कंप्लीमेंट मिलने पर …न मैं हंस पाऊं न रो पाऊं….उम्र से पांच सात बडे़ किसी से तुलना की जाए तो समझ में आती है लेकिन यहां तो तीस साल बडे़ जैसे बंदे सा मैं लग रहा हूं ……यह जान कर, वहां से लौट कर पहले तो मैंने अपनी ड्रेस-सेंस ठीक की …….वही कर सकता था, बाकी सफेद बाल और चेहरे की झुर्रियों हैं तो हम हैं, वे तो वैसे ही रहेंगे…


चलिए, तीसरा किस्सा बताने को दिल मना कर रहा है …इतना ही काफ़ी है, जितना बता दिया है …। 


जवान बैठे हुए और बुज़ुर्ग खड़े हुए …


एक बार मैं जिस ऐ.सी डिब्बे में चढ़ा, उस में सात सीटों पर भले-चंगे हट्टे कट्टे जवान युवक बैठे थे हंसी मज़ाक कर रहे थे…और सीनियर सिटीज़न पास ही खड़े हुए थे. मैंने उस दिन उन के पास जा कर कहा कि ये सीनियर सिटीज़न सीट हैं, उन में से दो-तीन फौरन बोल पड़े …ठीक है, हम उठ जाएंगे लेकिन उन सीटों पर बैठेंगे तो सीनियर सिटीज़न ही (जो पहले से पास ही खड़े थे.)...मैंने कहा कि वह कोई बात नहीं, बैठे कोई भी, लेकिन सीनियर सिटीजन तो होगा…


लेकिन वही हुआ ….सीनियर सिटीजन मना करने लगे उन को कि आप लोग बैठे रहिए…


मुझे सारी बात समझ में आ गई …ये सब के सब बुज़ुर्ग इन सेठों के काम धंधे पर काम करने वाले बाबू, चपरासी हैं….जिन को ये सेठ लोग साथ ही इसीलिए लेकर आते हैं….ताकि सीनियर सिटीजन सीटों पर कब्ज़ा किया जा सके।

 

खैर, मैं फ़िज़ूल के झंझटों में नहीं पड़ता…एक बार बात समझ में आ गई तो मैं इस तरह के ग्रुप को देख कर चुप रहता हूं…। 


जिस ए.सी के डिब्बे में मैं सफ़र करता हूं….


उस का यह हाल है कि उसमें एक दो सीनियर सिटीज़न ऐसे हैं जो खुद खड़े रहते हैं और उन की जगह पर जवान लोग ..(जवान का मतलब ६० साल से कम)....बैठे रहते हैं…और इस डिब्बे में एक जवान तो ऐसा है जो हमेशा सीनियर सिटीज़न की सीट पर बैठा सफर करता है …अच्छा पढ़ा लिखा, किसी अच्छी भली नौकरी पर लगा दिखता है ….लेकिन दो तीन जब से मैंने उसे उठने को कहा है, वह मुझे देखते ही अपने आप उठ जाता है ….


अच्छी बात है, अपने आप उठ जाता है….लेकिन उस की सीट के सामने खड़े सीनियर सिटीज़न को यह बात अच्छी नहीं लगती। बातों बातों में मेरे से पूछ रहा था एक दिन कि आप क्या सप्ताह में एक बार ही आते हैं इस गाड़ी में ….। मेरी बिना वजह ज़्यादा वाकफियत बढ़ाने में कोई रुचि नहीं होती, पहले ही से नहीं थी यह आदत…..अब तो बिल्कुल ही नहीं ….किसी भी अनजान बंदे से कितनी बात करनी है, कैसी करनी है, कब करनी है….यह सब वक्त सिखा देता है ….किताबों में नहीं लिखा रहता यह सब कुछ। 


कल भी जब मैं ट्रेन में चढ़ा तो वह जवान बंदा बैठा था…वह बैठा रहा, उसने मेरी तरफ़ देखा नहीं था, मैंने उसे दूर से कहा कि एक्सक्यूज़ मी….वह उठने लगा तो उस के हमदर्द बुज़ुर्ग ने उसे कहा कि आप बैठे रहिए …उसने उस के साथ बैठे किसी दूसरे जवान को उठने के लिए कहा और मुझे वहां पर बैठने को कहा…मुझे सीट मिलने से मतलब था …




मैंने देखा जैसे ही मैं बैठा तो उस सूटेड-बूटेड बंदे ने पूरे ज़ोर से कोई पाठ पढ़ना शुरु कर दिया ….मैंने सोचा कि यार, तू कुछ भी कर, न कर ….तू चाहे रब को अपने वश में कर ले ….बस, सीनियर सिटीज़न की सीट पर कब्ज़ा न किया कर …..मैंने पहले भी लिखा है कि पास खड़े बुज़ुर्ग कुछ नहीं कहते ….चलिए, यह उन की समस्या है, मैं चुप नहीं रह सकता, मुझे अकसर कोई न कोई डिफाल्टर मिल ही जाता है और इसी चक्कर में सीट मिल जाती है …


अगर हमारे लिए सीट रिज़र्व की गई हैं तो क्यों खड़े हो कर चलें…


कईं बार तो यंगस्टर्ज़ अपने मोबाईल में नीचे नज़रें गड़ाए रखेंगे ….और उन को कहना पड़ता है …..कहना भी क्या, सिर्फ़ उन के कंधे पर हल्के से टैप करने से ही काम हो जाता है ….कईं बार कुछ को कहना भी पड़ता है कि यह सीट बुज़ुर्गौं के लिए है …फिर वे उठ जाते हैं…कईं बार सात नंबर सीट (जो दूसरी तऱफ होती है) वाला कहता है कि लिखा तो नहीं है, उसे कहना पड़ता है कि बाहर डिब्बे के बाहर लिखा है ..और तब तक दूसरे भी उसे कहने लगते हैं …हां, हां, यह सीनियर सिटीज़न की सीट है…। 


यह मैं जिस बंदे के बारे में बता रहा हूं कि वह खुद खड़ा रहता है और जवान लोगों को बुला बुला कर बैठाता है ..यह भी किसी सेठ का मुलाजिम टाइप ही लगता है, जिस की ड्यूटी ही है सीनियर सिटीजन सीट को हथियाना ……..और जिस बंदे के बारे में मैंने लिखा कि वह हमेशा मुझे इन्हीं सीटों पर बैठा या मंडराता दिखता है …मेरी कईं बार इच्छा होती है कि यार, तुम्हें सीनियर सिटीजन बनने की बहुत जल्दी है ….फिर यही सोच कर चुप रहता हूं कि ऐसे ही अनजान लोगों के साथ इतना क्या खुलना…..फिर वह मेरे से दो बातें पूछेगा …ऐसा बंबई का माहौल नहीं है …हर कोई मतलब की बात से काम रखता है …..मैं चिकित्सक हूं ….मरीज़ों के साथ बात करते वक्त इन सब बातों को दरकिनार करना पड़ता है …ताकि वे सहज अनुभव महसूस कर सकें …डाक्टर-मरीज़ का रिश्ता बहुत पवित्र रिश्ता है ….उस दौरान लोग हम से बहुत कुछ साझा कर जाते हैं और उन बातों को हम अपने अंदर दफन कर देते हैं….किसी दूसरे से चर्चा करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता ….


हां, तो बात लंबी हो गई ….बात सिर्फ इतनी है कि मुंबई की एसी लोकल ट्रेन में किसी सीनियर सिटीजन को सीट लेने के लिए अकसर कहना पड़ता है …नहीं कहते तो न कहें, संस्कारी बनिए, और खड़े रहिए पूरा रास्ता….मैं ऐसे संस्कारों से नफ़रत करता हूं ….हां, जब कोई ज़रूरत मंद बीमार महिला छोटी उम्र की, और कोई मां अपने बीमाार बच्चे के साथ इन सीटों पर बैठी हो, तो उसे उठाने को तो सवाल ही नहीं पैदा होता ….बीमारी, लाचारी छोटी उम्र में भी झलक जाती है, किसी को कहना नहीं पड़ता….


यह मैंने जो हाल लिखा है यह मैंने मुंबई की पश्चिम रेल की एसी लोकल का लिखा है …मध्य रेल पर मैंने एसी लोकल में ज़्यादा सफ़र किया नहीं है ….हां, बात सिर्फ इतनी है कि चिढ़ होती है जब ६५-७०-८० साल के लोग खड़े हों और २५-३० वाले युवक युवतियां ओटीटी के सीरियल निपटाने में मसरूफ हों….और हां, एक बात और भी लिखनी ज़रूरी है …जब इस तरह की सीट पर बैठी किसी युवती को उठना पड़ता है तो साथ की सीटों पर बैठे दो तीन लोग अकसर हमदर्दी करने लगते हैं उससे …आप यहां बैठ जाईए, मैं तो बस अगले स्टॉप पर उतर जाऊंगा…करो यार, हमदर्दी करो, अपनापन दिखाओ, कुछ भी करो, न करो, बस, बुड्डे-बुज़ुर्ग लोगों की सात सीटों को बचा के रखो….


इन एसी लोकल ट्रेनों में महिलाओं के अलग से दो डिब्बे होते हैं….इसलिए बहुत बार लोगों का इन सात सीटों पर ही नज़रें टिकाए रखना, मुझे बहुत खलता है ….मैं किसी भी जवान को टोकने से नहीं चूकता…………लेकिन लोग अकसर नहीं कहते …शायद उनके घुटनों में अभी पूरी जान होगी, मेरे वालों में नहीं है ….खड़ा रहने मेरे लिए एक यातना है ……..। 


PS....Yes, i forgot to add one thing - Benefit of doubt! There are occasions when I come across some defaulter about whose age I can't be sure. Perhaps they are borderline cases, so I give benefit of doubt to such persons. 😂😂😂😂😂😂😂 करना पड़ता है यह भी। Otherwise, to know if a person is senior citizen or not, it is not that difficult.