कल इतवार का लगभग आधा दिन मेरा एक हेयर-ड्रेसर की दुकान पर बरबाद हो गया…मुझे तीन-चार हफ्तों में एक बार बाल ट्रिम करवाने ही पड़ते हैं…वरना मेरा सिर दर्द होने लगता है …इसलिए मुझे बालों की लंबाई का ख्याल करना ही पड़ता है ….
बाल कटवाने के मेरे कुछ कायदे-कानून हैं…एक तो यह है कि मैं जिस शहर में रहने लगता हूं…चाहे वहां दस साल रहूं या पांच साल…हेयर-ड्रेसर कभी नहीं बदलता और उस दुकान में जो कारीगर होता है उसे भी नहीं बदलता…अगर कभी जाऊं और वह न दिखे, तो लौट आता हूं ..वरना, हर बार एक एक बात समझानी नये कारीगर को बहुत मुश्किल काम होता है …। अभी भी जहां पर मैं बाल कटवाने जाता हूं…(हमारे बचपन के दिनों में कहते थे कि हजामत करवा लो अब, बाल इतने बढ़ गए हैं)...वह दुकान मेेरे घर से लगभग आधा घंटे की दूरी पर है …४-५ किलोमीटर की दूरी पर है।
ये जो मैंने इतनी तरह के नाई ऊपर लिख दिए हैं, ज़रा इन के बारे में बात करें…
नाई…यह आज से ५०-६० बरस पहले हुआ करते थे …हैं तो अब भी हैं, लेकिन अब हम लोग इन के खोखों से बाहर हो गये हैं…बचपन में नाई के पास जाने का मतलब, बालों पर मशीन चलने से होने वाला दर्द, उस्तरे के एक दो कट, और ऊपर से फिटकड़ी की रगड़ाई से जलन ….लेकिन बाहर आते ही जैसे ही पिता जी एक छोटे से लिफाफे में (यही कोई ५०-१०० ग्राम होती होगी)...बर्फी दिला देते, मैं सब कुछ भूल कर उन की साईकिल के अगले डंडे पर बैठ कर खुशी से खिला हुआ घर लौट आता…। नाई की दुकान की एक खासियत थी …एक तो उसने उस्तरा तेज़ करने के लिए एक चमड़े की बेल्ट टंगी होती थी, एक पुरानी सी मशीन जो बाल नोंचते नोंचते बीच बीच में अटक जाती थी और दीवारों पर अखबारों से काट कर आटे की लई से चिपकी हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, राजेेश खन्ना, मुमताज की अलग अलग मुद्राओं में फोटो …और लकड़े की बैंच पर पड़ी एक दो मायापुरी ….और हां, इन दुकानों पर लोग कमीज़ उतार कर हाथ ऊपर कर के बगलें साफ़ करवाने से भी गुरेज नहीं करते थे …देख कर ही बड़ा अजीब सा लगता था…
हेयर-ड्रैसर …कॉलेज तक पहुंचे तो हेयर-ड्रेसर …यह थोड़ी साफ सुथरी दुकानें थीं …कांच वांच के दरवाज़े लगे हुए ..शायद कूलर वूलर का भी कुछ जुगाड़ होता था …और अंदर टीवी पर कुछ न कुछ चल रहा होता …अभी तक अधिकतर इन पर ही जा कर बाल कटवाए हैं…पैसे कम लगते हैं, इसलिए नहीं …बस, इसलिए क्योंकि मेरा तजुर्बा ऐसा रहा है कि इन में काम करने वाले कारीगर अपने काम में बहुत माहिर होते हैं…सारा वर्क-लोड का गणित है …।
आज से तीस साल पहले जब यह बगलें वगलें कटवाने का काम भी हेयर-ड्रैसर के पास ही होते देखा तो क्या करें, बस, एक आईडिया आया कि तब से हमेशा हेयर-ड्रेसर के पास अपनी ही किट ले कर जाता हूं ..कुछ ज़्यादा नहीं, एक महंगी से डेढ़-दो हज़ार की कैंची है, दो कंघे हैं और एक ट्रिमर है …पहले ट्रिमर नहीं था तो अपना उस्तरा अलग से ले कर जाना पड़ता था…। और हां, हेयर-ड्रैसर की दुकानों में भी ए.सी लग गये थे …लेकिन चलाते उसे सोच-समझ कर …बेतहाशा कभी नहीं….
हेयर-सैलून …या यूनिसेक्स हेयर स्टूडियो ….ये बहुत हाई-फाई हेयर-केयर सेंटर….पैसे तो बहुत ज़्यादा लगते ही हैं, उस की भी कोई बात नहीं …लेकिन इन का माहौल ऐसा होता है कि कस्टमर किसी कारीगर को कुछ बता नहीं सकता…और जाते ही अकसर वे बाल धोने लगते हैं…बस, मैं एक बार बेटे के साथ गया था इस तरह की एक जगह में …और दोबारा वहां न जाने की ठान ली…। कहने का मतलब यह है कि ये ठिकाने अपने सिलेबस में नहीं हैं।
नौआ….अच्छा, आप सोच रहे होंगे की नाई, हेयर ड्रेसर, हेयर सैलून तो चलो देखा है, यह नौआ क्या हुआ। इस के बारे में मेरी जितनी जानकारी है, उसे लिख देता हूं। स्कूल में पढ़ते थे तो कॉलोनी में एक बंदा था, जो रेल महकमे में काम करता था और अपनी आमदनी को थोड़ा बढ़ाने के लिए साईकिल के कैरियर पर एक छोटी सी लोहे की ट्रंकी रख कर बाल काटने जाता था …मैंने कईं बार देखा उस को ..मुझे नहीं पता उन की कोई दुकान थी, या किसी के बुलाने पर जाता था …। लेेकिन मुझे इतना अच्छे से याद है कि जो उन का बड़ा बेटा था…उस को जब कॉलोनी के लड़के नौआ-नौआ के नाम से पुकारते तो वह आग-बबूला हो जाता….पहले तो गालियों की बौछार, उस से मामला अंडर-कंट्रोल हुआ तो ठीक, वरना वह तमाचे जड़ने लगता था ….पता नहीं उसे क्यों इतना बुरा लगता था …मुझे यह समझ न तब ही आया ..और न ही आज आया…नाई को नौआ कहते ही हैं…उसमें कौन सी गलत बात है …हां, वह चिढ़ता था, तो लोग उसे बार बार नौआ नौआ कहा करते थे…।
एक ऐसे ही होम-विज़िट करने वाले नाई से हमारा भी वास्ता पड़ा ….
यह आज से बीस-बाईस साल पहले की बात है…हम लोग हरियाणा के यमुनानगर में पहुंचे ही थे कि वहां पर एक मरीज़ आया मेरे पास….कहने लगा कि बाल काटने का काम भी करता हूं …मैं आप के यहां आऊंगा..मैंने हां कर दी।
वह अगले दिन अपनी स्टील की ट्रंकी लेकर पहुंच गया…जिसमें उस की मशीन थी …और दूसरे औज़ार भी …तब तक मैं अपनी किट से बाल कटवाने लगा था…मैंने उसे साफ बता दिया कि मेरे बालों में और वह हाथ से चलने वाली मशीन नहीं लगानी….(जो हम लोग बचपन में देखा करते थे)...सर्दी के दिन थे…छत पर हम बैठ गए ..हम सब ..मैं और बेटे …लेकिन उसने ऐसे बाल काटे जैसे घास काटते हैं….बेटों ने तो तौबा कर ली उसी दिन फिर कभी उस की पकड़ में न आने की …मैंने एक मौका और दिया…सर्दी के दिनों में छत के ऊपर चारपाई मैं बैठा और वह भी वहीं पर कहीं …इतनी फुर्ती और अपने काम की इतनी तारीफ़ कि मैं फलां फलां अफसर की कटिंग करता हूं और फलां फलां बड़ा अफसर तो दिल्ली जा कर भी मुझे ही बुलवाता है …। खैर, मैंने भी दो बार उस से कटवाने के बाद तौबा कर ली…। दरअसल, यह नाई नहीं नौआ था …।
फुटपाथ पर भी नाई ….बंबई में जो काम लोग हज़ारों में करवाते हैं, उसे दस-बीस में भी करवाने के सभी जुगाड़ हैं…जब मेैं फुटपाथ पर लोगों को दाढ़ी बनवाते या बाल कटवाते हुए देखता हूं …तो उन कारीगरों की मन ही मन तारीफ़ किए बिना रह पाता। मेरी नज़र में ये अपने काम में सब से ज़्यादा माहिर होते हैं …क्योंकि जो कुछ हो रहा है, लाइव हो रहा है, फुटपाथ पर बैठ कर दाढ़ी बनवाना और दाढ़ी बनाना, बाल काटना अपने आप में एक फ़न है ….मैं अकसर इन को देख कर बहुत हैरान होता हूं….हैरान से भी ज़्यादा, इन के टेलेंट से बहुत ज़्यादा प्रभावित होता हूं …।
कल बाल कटवाने वाली बात तो कहीं पीछे छूट गई …..
कस बाल कटवाने वाली बात तो कहीं गुम ही हो गई…उस के बारे में लिख कर बंद करूं इस पोस्ट को …
हां, तो मैं सुबह दस बजे के करीब अपने हेयर-ड्रेसर के पास पहुंच गया..लेकिन तीनों कुर्सियों पर लोग बैठे हुए थे …
अकसर मुझे १०-१५ मिनट से ज़्यादा का इंतज़ार नहीं करना पड़ता …लेकिन कल तो काम लंबे ही चल रहे थे ….
एक 30-35 का जवान लड़का किसी माटुंगा वर्कशाप में काम करता है (वह कारीगर को बता रहा था)...पहले उसने शेव करवाई, फिर बहुत फेशियल…और फिर स्टीमिंग …..और फिर पता नहीं फेशियल मसाज ….एक डेढ़ घंटे की पूरी स्कीम थी ….। उस के चेहरे की मालिश के लिए एक वॉयब्रेटिंग मशीन का इस्तेमाल किया गया…वैसे तो वह जिम में वर्क-आउट करने वाला लगता था …पता नहीं अलग से उसे अपने चेहरे का इतना वर्क-आउट करवाने की क्या ज़रुरत आन पड़ी।
दूसरी कुर्सी पर….एक बुर्जु्ग थे …यही कोई ६०-६५ की उम्र थी….पहले उन्होंने अपनी मूछों पर काला कलर लगवाया….बड़ी बारीकी से काम किया गया उन का ….फिर उन को छोड़ दिया गया….कुछ वक्त बाद उन की मूछों पर शैंपू किया गया….फिर उन की शेव हुई और फिर चेहरे की मसाज हुई।
वक्त ज्यादा लग रहा था, मैंने अपने बैग से एक मैगज़ीन निकाली …और पढ़ने लगा ..मोबाईल पर गाने सुनने लगा….दुकान मालिक कहने लगा कि आवाज़ थोड़ी बढ़ा दें, आप जो गाने सुनते हैं, हमें भी बहुत पसंद हैं…
हां, तीसरी कुर्सी पर जो अधेड़ उम्र (५०-५५ बरस के) सज्जन बैठे थे उन की शेविंग होनी थी …अच्छे से शेविंग हुई ….और फिर कारीगर ने पूछा …और बताओ?
कोई जवाब नहीं आया …तो कारीगर ने कहा …हां, बताओ फेशियल या मसाज भी ..
हां, हा, करो दोनों करो …जवाब मिला…
बस, फिर उस बंदे का काम ऐसे शुरु हुआ कि खत्म होने को ही नहीं आ रहा था …
पहले उस के चेहरे की फेशियल की गई …वही पैक लगाया गया, फिर स्टीमिंग …फिर कारीगर ने हाथ में एक मशीन पहन ली और उस से उन के चेहरे की रगड़ाई की …
और उस के बाद उस के सिर की चंपी की गई ..उसी मशीन से ..
फिर उस बंदे की पीठ पर मसाज की गई …एक गोल से दिखने वाले मसाजर के साथ ..जो भी बहुत ज़्यादा वॉयब्रेट कर रहा था ….
इतना होने के बाद …उस ने खड़े होकर अपने बाजू ऊपर उठा दिए …कि करो, बगलें भी साफ़ करो ….
सच में …यह बंदा तो पूरा चमक चुका था…पूरा कायाकल्प ….
अब मेरी बारी थी …१०-१२ मिनट में मेरे बाल काटे गए ….जैसे वह हर बार पूछता है कि और कुछ। मैंने कहा ..नहीं, यार, कुछ नहीं और। दरअसल कुछ साल पहले मैंने भी देखा देखी एक बार सिर की मसाज किसी हेयर-ड्रैसर की दुकान से करवाई थी …एक मशीन वह सिर पर फिराता रहा ..दस-पंद्रह मिनट….बाद में मेरी ऐसी आफ़त आई कि मेरा तो सिर ही घूमने लगा ..पूरा दिन चक्कर आते रहे ….बस, उस दिन से तौबा कर ली..।
ये तो नाई, नौआ से जुड़ी अपनी यादों बातों का एक ट्रेलर ही है, कभी लिखने लगें तो दस-बीस कागज़ काले कर दें….चलिए, अभी के लिए इतना ही ….।
और हां, अभी मैं बाहर आ ही रहा था कि एक बुजुर्ग आए ….करवाने तो दाढ़ी ही आए थे …लेकिन पता नहीं कैसे एक नये कारीगर ने पूछ लिया…कि बाल भी कटवाएंगे। उन्होंने कहा ..जब हैं ही नहीं, तो काटोगे क्या। मेरे वाला कारीगर हंसने लगा …मैंने पूछा तो कहने लगा कि अभी पिछले हफते ही तो कटवा के गए हैं, इस उम्र में इतने बाल भी नहीं है उनके और इतनी जल्दी बढ़ते भी नहीं है, इसलिए कह रहे हैं कि जब हैं ही नहीं, को काटोगे क्या।😂