गुज़रे दौर की फिल्मों के जादू को मैं बड़ा मिस करता हूं…बहाना ढूंढता हूं उन के बारे में बात करने की …उस दिन मेरा एक मरीज़ आया जिस का नाम था ..फ़िरोज़ खां…मैंने पूछा धर्मात्मा वाला …
नहीं, सर, वह तो चला गया…
और हम दोनों हंसने लगे …और उस जानदार हीरो को याद करने लगे …मैंने पूछा वह सुपरहिट गीत तो याद ही होगा….हेमा मालिनी के साथ …उसने फ़ौरन बता दिया ..हां हां, वह कोई कैसे भूल सकता है …तेरे चेहरे में वो जादू है ….
बिल्कुल यही जादू है ..!!!
शायद पचास से ज़्यादा बरस हो गए हैं फिल्म को आए…अभी भी उस को याद को संजो कर रखा हुआ है …और सुपरहिट गीतों की इतनी रिपीट-वेल्यू….
आज मैं सुबह सोच रहा था किसी भी फिल्म का जादू उन दिनों (४०-५० साल पहले) उस के थियेटर में लगने से हफ्तों पहले शुरु हो जाता था ..जब हमें स्कूल-कालेज आते जाते रास्ते में हाथी गेट या हाल गेट पर या दीवारों पर चिपके हुए पोस्टरों से पता चलता था कि अगले महीने यह फिल्म आने वाली है …बस, इतने हफ्ते पहले ही प्लानिंग शुरु हो जाती कि हां, यार, यह तो देखनी ही है ….क्या धांसू पोस्टर है इसका…
हर रोज दिन में दो बार स्कूल जाते वक्त और लौटते वक्त उस पोस्टर को अच्छे से निहारना …उस पर लिखी हर नाम को पढ़ना …और थियेटर का नाम भी पढ़ना …कितने शो वाली होगी यह फिल्म और क्या टाईम होगा …बस, यह सब कुछ पढ़ कर ही मज़ा आ जाता था…
| अब किसी को इस तरह के थियेटर के बाहर पोस्टर इस तरह से निहारते देखता हूं तो बहुत मज़ा आता है ...अपने अमृतसर के पुराने दिन याद आ जाते हैं....यह पिछले हफ्ते की ही मेरी खींची एक फोटो है ... |
चलिए, फिल्म लग गई ..सिनेमा घर में …लेकिन पहले कुछ दिन इतना भीड़-भड़क्का, टिकटों की इतनी काला-बाज़ारी, इतनी धक्का-मुक्की कि उन पहले कुछ दिनों में देखना अपने बस की बात न थी …एक दो फिल्में बड़े भाई के साथ देखीं, जब नौकरी करने लगा तो वह परवाह नहीं करता था…जितनी भी महंगी टिकट मिलती, वह हमें ज़रूर दिखा कर ही मानता ….
पुरानी फिल्मों का जादू ही है कि आज से ४०-५०-५५ साल पुरानी फिल्म की कहानी चाहे याद से थोड़ी इधर उधर सरक गई हो ..लेकिन जब गाना बजता है रेडियो पर तो उस से जुड़ी बहुत सी बातें याद आने लगती हैं….जैसे ….
किस थियेटर में, किस शहर में, कौन सा शो (मैटिनी या ईवनिंग या नाईट शो), अकेला देखा था या किसी के साथ देखा था और हम लोग उस थियेटर तक कैसे गए थे, साल के कौन से दिन थे (गर्मी या सर्दी), उस दिन थियेटर के बाहर कैसा माहौल था, बाहर गीतों की किताबें बिक रही थीं या नहीं….सब कुछ याद है …और अगर यह लिखूं कि हर फिल्म के इंटर्वल के दौरान हर खाई हुई सभी चीज़ें भी याद हैं , यह तो गप्प हांकने जैसा हो जाएगा..लेकिन हमारे पास ऑप्शन लिमेटड ही होते थे …भटूरे-छोले, समोसे, फ्राईड मूंगफली, गोल्ड-स्पॉट की बोतल, और चने की फ्राईड दाल भी …नींबू, शिंबू निचोड़ के ….इस वक्त तो इतना ही याद है …और हां, फ्राईड पापड़ भी होते थे लेकिन वहां पर ये खाने में क्या मज़ा, हां, कैसे भूल गया…मूंगफली, रेवड़ी भी तो मिलती थी ….जब, सारे हाल के अंदर मूंगफली के छिलकों से गंद पड़ जाता था…
कितने मज़ेदार दिन थे ….!!
जब फिल्म देख के घर लौट आते तो भी कम से कम एक हफ्ते तक हमारे सिर से उस फिल्म का नशा नहीं उतरता था …यहां तक कि जो उन दिनों चिट्ठियां भी आती जाती थीं उन में भी लिखा जाता था कि हमने यह फिल्म देखी है , आप भी देखिए…ऐसी बहुत सी चिट्ठियां याद हैं मौसी की कि घरौंदा देखी है, मासूम देखी है ….खिलौना देखी है …और कभी कभी भी देख ली है …
और स्कूल में भी जो छात्र किसी फिल्म को देख लेते तो अगले कुछ दिन उस के बारे में आधी छु्ट्टी के वक्त या किसी पीरियड के पहले दो चार मिनट जब तक मास्टर साहब न पहुंच जाते, उन की स्टोरी-टैलिंग चलती रही ….
और जब रेडियो पर उस फिल्म के गाने बजते तो और भी मज़ा आता कि यह गाना तो अब अपना ही है …गाना सुनते ही फिल्म के वे सभी दृश्य आंखों के सामने आ जाते ….अभी भी मैं यह पोस्ट लिखने इसलिए बैठ गया कि मेरे रेडियो पर विविध भारती पर पुराने गीत बज रहे थे …कल उस महान गायक किशोर कुमार का ९७ वां जन्मदिवस है ..देश के बहुत से शहरों में इस मौके पर प्रोग्राम होते हैं …मुंबई में भी रवींद्र नाट्य मंदिर में भी एक प्रोग्राम है …नेट पर ढूंढ कर टिकट बुक कीजिए….हां, अभी इस वक्त मेरे रेडियो पर जो गीत बज रहा था, वह भी सुनिए….
गुज़रे दौर की फिल्मों का, जिन थियेटरों में वो लगती थीं उन का अपना ही जादू होता था…२५ हफ्ते तक, ५० हफ्तों तक किसी फिल्म का थिेयेटर पर लगे रहना …इस दौर में तो सोच कर ही हैरानी होती है …अब तो फिल्मों के पोस्टर हर छठे दिन ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग …(कहावत ठीक है न ?...पता नहीं, चलिए, अब लिख दी सो लिख दी…स्वीकार करिए… हा हा हा हा )....कईं बार उस फिल्म के बारे में पता ही तब चलता है जब उस का पोस्टर थियेटर के बाहर लगता है …
पहले इस मामले में हमारा सूचना-तंत्र बड़ा मज़बूत था …अखबारों में भी सूचना छपती थी ….कौन सी फिल्म किस थियेटर में कितने शो कब से शुरु हो रही है ….एक पेज़ पर यही सब कुछ होता था ..हिंदी और इंगलिश दोनों अखबारों में ….और शहर की दीवारों पर पेंटर बाबू भी इस के बारे में लिख कर सूचना पेंट कर दिया करते थे …।
अब फिल्में देखने का कुछ मज़ा नहीं रहा….अपने दौर वाली फिल्में कईं कईं बार देख चुके हैं…कुछ तो थियेटर में दो दो बार, फिर टीवी-दूरदर्श के दिनों में कईं बार, फिर केबल टीवी के दिनों में या सीडी-डीवीडी के दिनों में भी कईं बार, फिर ये जो ज़ी-टीवी, स्टार गोल्ड …इन सब पर भी बहुत बार देख लिया है अपनी मनपसंद १९६५ से १९९०-९५ तक आई फिल्मों को …ओटीटी पर भी फिल्में देखना न के बराबर है …..।
अब तो यूट्यूब पर गीत देख कर और अपने रेडियो पर वे गीत सुन कर ही उन लम्हों को फिर से जी लेते हैं …आप का क्या अनुभव है, लिखना चाहें तो लिख दीजिएि…..
अभी अभी याद आया कि ६-७ साल पहले ऐसे ही एक दिन अमृतसर के सभी थियेटरों से जु़डी अपनी यादों को मैंने एक पोस्ट रूपी पोटली में सहेज दिया था ..अभी यहां शेयर कर रहा हूं , अगर देखना चाहें तो ...मुझे नहीं याद उस दिन क्या लिख दिया था...लेकिन अब नहीं पढूंगा ..क्योंकि अगर पढ़ लूंगा तो फिर शेयर नहीं कर पाऊंगा ....(यह रहा उस का लिंक)...
अमृतसर में नहीं बचा अब कोई भी पुराना सिनेमा घर ...
बचपन के दिनों में कानों में बार बार पडे़ कुछ गीत हमें बार बार याद आते हैं...रास्ता दिखाते हैं....और हां, कभी कभी हमारे फैसलों को भी प्रभावित करते हैं ....यह भी ऐसे गीतकारों की कलम का जादू ही है ..