शनिवार, 26 सितंबर 2026

किसी मंदिर से कम नहीं मराठा-मंदिर....



मराठा मंदिर सिनेमा की आज की तस्वीर ...

मेरे लिए सच में किसी मंदिर से कम नहीं है …मराठा मंदिर ….मराठा मंदिर सिनेमा मुंबई सेंट्रल स्टेशन के लगभग सामने ही है ….आज से ३५ बरस पहले इस के पहली बार दर्शन किए थे …और जब भी उधर से निकलना होता है, कितनी भी जल्दी में रहूं…लेकिन उस के पोस्टरों पर निगाह डाले बगैर आगे बढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता …और अब तो मोबाईल हाथ में होता है…एक दो फोटो भी खींच ली जाती हैं….अब तो मराठा मंदिर सिनेमा के गेट के ठीक बाहर मुंबई मेट्रो एक्वा लाईन का स्टेशन भी चालू हो गया है जहां से आप कफ-परेड तक एक तरफ और दूसरी तरफ़ एयरपोर्ट टर्मिनल एक और दो से होते हुए आगे आर.रे...(जवीएलआर) - (आर.रे मानी आर.रे मिल्क कॉलोनी) ..तक जाती है...

आज के ए.आई के दौर में अब ब्लॉगिंग में मन नहीं लगता …लेकिन फिर कुछ दिनों बाद की-पैड पर उंगलियां खुद-ब-खुद थिरकने लगती हैं …यही सोच कर कि अपनी डॉयरी में ही तो लिख रहा हूं और उस से ज़रुरी बात यह कि अगर मेरी उम्र के लोग ही जो थोड़ा बहुत लिखने पाने में सक्षम हैं, वे ही पुराने दिनों के बारे में न लिखेंगे तो फिर और कौन लिखेगा…कौन सहेज कर रखेगा उन सब खट्टी-मीठी यादों को ..। 


कल मेरा एक सहयोगी इंस्टाग्राम पर एक रील देख रहा था …जिस में मराठा मंदिर सिनेमा का नाम आया, १९९२ में रिलीज़ हुई फ़िल्म खुदा-गवाह का ज़िक्र आया…मुझे भी ३४-३५ साल बाद वे मई-जून १९९२ के दिन याद आ गए ..जब एक दोपहर में हम भी यह फिल्म देखने मराठा-मंदिर सिनेमा में यह फिल्म देखने गये थे…पीछे झांकने पर कल ही की बात लगी ….



इस फ़िल्म का गज़ब का करिश्मा था …फ़िल्म तो बेहतरीन थी ही, और नगमें भी एक से बढ़ कर एक …। 


मराठा मंदिर सिनेमा के आगे से जब भी निकलते हैं तो यह अपने आप में एक अच्छा अनुभव रहता है … मैं १९९२ के दिनों की बात कर रहा था …उन दिनों एक हफ्ते पहले तक की फिल्म की टिकट हम लोग खरीद सकते थे …सुबह यही कोई आठ-साढ़े आठ बजे टिकट की बुकिंग शुरु हो जाती थी….मैंने भी खुदा-गवाह की टिकटें कोई तीन-चार दिन पहले ही ली थीं..


यह वह दौर था जब किसी भी सिनेमा थियेटर के बाहर और अंदर ट्रेलर लगे रहते थे ….


ट्रेलर ऐसे होते थे ...४०-५० ऐसे कार्ड सिनेमा हाल में लगाए होते थे और फिल्म के लिए अंदर जाने से पहले और इंटरवल में इन को अच्छे से देखा जाता था...इंटरवल में इसलिए कि कौन सा सीन हो गया, कौन सा अभी आएगा..कभी कोई भूल हो जाती तो पास में खड़ा साथी याद दिला देता ....नहीं, नहीं, यह तो अभी आएगा...



उस दिन शनिवार के दिन भी मेरी इच्छा हुई कि रूटीन में कुछ तो बदलाव किया जाए…कभी तो रास्ता बदल के देखें, थोड़ा लीक से हटें ….(पाश की वह मशहूर कविता अकसर याद आ जाती है ....खतरनाक होता है सपनों का मर जाना...) इसी मंशा के साथ मैंने पहले तो पास ही एक रेस्टरां में लंच किया ..और तब तक मराठा मंदिर में दोपहर के शो का वक्त हो गया….


बुकिंग विंडो लगभग खाली थीं….दो तरह की टिकटें …ड्रेस सर्कल १०० रुपए में और बॉलकनी १५० रुपए में ….ड्रेस सर्कल ही में लोग नहीं दिखते तो बॉलकनी में अकेले बैठने का मन नहीं हुआ….ड्रेस-सर्कल का टिकट लिया …फिल्म थी …दायरा ….अंदर जा कर देखा ..वहां पर १५-२० लोगों से ज़्यादा लोग न थे ….


फिल्म देखते हुए इस बात का रह रह कर ख्याल आ रहा था कि ऐसे हालात में इस तरह के सिनेमा हाल चल कैसे रहे हैं…इनका चलाने ही में इतना खर्च आता है ….फिल्म देखने का अनुभव भी बदल गया है ….फिल्मों का वह करिश्मा नहीं रहा …हर हफ्ते में थियेटर के बाहर लगा फिल्मी पोस्टर बदल जाता है …यही है किसी फिल्म की थियेटर में उम्र। 


इंटरवल के दौरान जब मैं बाहर आया तो कैंटीन में लगे तरह तरह के स्नैक्स ….समोसे, ब्रेड-पकोड़े और चाय की थर्मस दिखीं….लेकिन उन को खरीदने वाला कोई नहीं था…दो चार मिनट ही में इंटरवल खत्म हो गया….इस दौरान मैं थियेटर की लॉबी में उस जगह को देखने लगा जहां पर गुज़रे दौर में ट्रेलर लगे रहते थे ….लेकिन अब वहां पर ट्रेलर नहीं लगते …क्या लगाएं ट्रेलर, देखने वाले ही नहीं रहे …और चार दिनों बाद ट्रेलर कौन बनवाए, कौन लगवाए….


खैर, उन खिड़कियों में (शो-केस) में पुराने ज़माने की ट्राफीयां एवं शील्डें लगी हुई थीं…इस से पहले मैंने यह सब कहीं नहीं देखा था….इंटरवल खत्म होने की घंटी बजने पर भी मैं अंदर नहीं गया….क्योंकि मुझे ऐसा कुछ लगा न था फिल्म में जो मिस हो जाएगा….जहां से भी आगे देख लेंगे, उतना ही काफ़ी है …खैर, मैं उन ट्राफीयों को देखने में लग गया…सभी देख लीं, तो गेटकीपर से पूछा कि ऊपर भी लगी हैं ये ट्राफीयां…उस ने कहा कि हां…..बस, मैंने जल्द ही एक फिल्म और देखने का मन बना लिया….। 


आज के दौर में यह कल्पना करना कि कोई फिल्म किसी थियेटर में २५ सप्ताह तक, ५० सप्ताह तक चली….कितना अचंभित करने वाली बात है ..लेकिन हमने यह सब देखा है, वह रोमांच अनुभव किया है…जब किसी फिल्म के १०० दिन हो जाते थे तो एक साईकिल रिक्शा पर उस फिल्म का पोस्टर लगा कर शहर के बाज़ारों में लाउड-स्पीकर पर यह सूचना दी जाती थी…वे दिन भी क्या दिन थे!!


अच्छा, मैं १९९२ में मराठा मंदिर में रिलीज़ हुई खुदा गवाह फिल्म की बात कर रहा था….जब मैंने देर शाम उन सभी ट्राफीयों की तस्वीरें देख रहा था तो मेरे बार बार ढूंढने पर भी खुदा गवाह की कोई ट्राफी नहीं मिली…बाद में गूगल ने बताया कि यह फिल्म वहां पर १८ सप्ताह तक ही चली…इस फिल्म ने सिल्वर जुबली तो पूरी कर ली थी लेकिन अगले कुछ हफ्तों के लिए यह दूसरे सिनेमा घरों में चलती रही थी…


५० हफ्ते तक किसी फिल्म का चल जाना .....उन दिनों ऐसी फिल्मों का क्या करिश्मा होता होगा...

खैर, मुझे गोल्डन जुबली की ट्राफीयां दो ….एक तो फिल्म शागिर्द और दूसरी फिल्म दाता की दिखीं….हैरानी हुई …५० हफ्ते चलती रही फिल्म …लगभग पूरा एक बरस…दाद देनी पड़ेगी, फिल्म बनाने वालों की भी और उसे जाकर देखने वालों की भी । बहुत बड़ी बात है…शायद हमारी पीढ़ी के लिए कम और आज की जेन-ज़ी के लिए बहुत ज्यादा बड़ी बात। बात वही है कि उस दौर में जनता के पास रेडियो-ट्रांजिस्टर के अलावा सिनेमा हाल में जा कर फिल्म देखना ही मनोरंजन का एक ज़रिया हुआ करता था…। 

मैंने पहले भी किसी ब्लॉग में लिखा था कि पुराने ज़माने में किसी भी सिनेमा घर के बाहर उस फिल्म की १०-२० पैसे की फिल्मी गीतों की छोटी छोटी किताबें मिलती थीं, जिन में उस फिल्म के गीत प्रिंट किये होते थे…और कईं बार उन में फिल्म की संक्षिप्त स्टोरी भी हुआ करती थी …गीतों की यह किताब उन गीतों को गुनगुनाने के लिए बहुत हैंडी साबित होती थी ..खास कर के जब रेडियो पर भी वह गीत बज रहा होता था … मेरे पास इस तरह की किताबों की भी एक क्लेक्शन है …कुछ तो लखनऊ में मिल गई थीं ….और कुछ इधर मुंबई में मिल गई थीं ..। 


मुझे मराठा मंदिर पर यह लिखने का ख्याल कहां से आ गया…मेरे पिछले ब्लॉग पर एक टिप्पणी आई थी, मुझे यही लगा कि उस बंधु की यादों में आज के मराठा मंदिर की यादें भी शामिल कर दी जाएं, इस लिए यह लिखने बैठ गया..वह बंधु भी लखनऊ में रहते हैं….। हां, उन की टिप्पणी का एक अंश यहां लिख रहा हूं…


"डॉ साहब मैं पहली बार अपने पापा के साथ 1958 में गया था तब लोकल ट्रेन और ट्रॉम भी छाती थी। फ़िर दोबारा 1960 में पापा के साथ गया तब मराठा मन्दिर सिनेमा हॉल बना था और इसमें पहली फिल्म मुगल ऐ आज़म लगी थी। पापा के दोस्त जो बॉम्बे के थे j j hospital में सर्विस करते थे। उन्होंने ने टिकट बुक करवा लिये थे। हमने वोह मूवी मराठा मन्दिर में देखी थी। क्या सिनेमा हॉल बना था पुश बैक सीट बिल्कुल एयरोप्लेन वाली फ़्लोर पर क़ीमती सॉफ्ट कार्पेट पैरों के नीचे। पूरे हिंदुस्तान में ऐसा दूसरा सिनेमा हॉल नहीं था। बॉम्बे बहुत बार गया हूँ तब इतनी आबादी नहीं थी और सपोर्ट में ट्रॉम और बस सर्विस भी थी …"


अच्छा एक बात और लिखनी है …शायद आप को यह पहले से पता हो ….यहां मराठा मंदिर में फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को लगे ३० बरस हो चुके हैं….सुबह का शो इसी का होता है ..हाल की टिकट ३० रुपए में और बॉलकनी की ५० रुपए में….लेकिन इस तरह के आंकड़े मुझे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करते …मैं तो बस अपने दौर की सिल्वर और गोल्डन जुबली वाली फिल्मों से ही मुतासिर होता हूं …फिर भी दो चार दिन पहले इसी फिल्म के बारे में जो मराठा मंदिर के बाहर लिखा था, उसे यहां आप के लिए पेस्ट कर रहा हूं…देखिए….।

दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे ...तीसवां साल ...१५४५ वां हफ्ता ....लेकिन मैं इंप्रैस्ड नहीं हूं ....मेरी सूई अभी भी मेरे ज़माने की सिल्वर-गोल्डन जुबली फिल्मों पर टिकी है....वे हमेशा इन "आंकड़ों" पर भारी रहेंगी, यह मेरा ख्याल है ...


अब मराठा मंदिर का यह हाल है….मराठा मंदिर का ही नहीं, सभी थियेटरों का ही, मल्टीप्लेक्स का भी यही हाल है …हर हफ्ते फिल्में बदल जाती हैं …पता ही नहीं लगता कब फिल्म लगी और कब बदल गई ….हिसाब रखना मुश्किल होता है ….यह आज सुबह की फोटो है जो मैंने ऊपर लगाई है….कईं बार तो किसी फिल्म के बारे में पहली बार पता ही इन का नाम इस तरह के पोस्टरों को देख कर चलता है …


मराठा मंदिर सिनेमा को मिला इंटरनेशनल सम्मान...फिल्म उद्योग को ज़िदा रखने के लिए ...

मैं अकसर सोचता हूं कि इस तरह के पुराने सिनेमा घर इस दौर में चल कैसे रहे हैं…यह मेरी समझ से परे की बात है …मुंबई की इतनी प्राईम लोकेशन पर इतनी जगह में यह सिनेमा खड़ा है …यह चल कैसे रहा है, मैं इसी बात पर हैरान हूं ..लेकिन जब मैंने उस दिन इस के शो-रूम में एक अवॉर्ड पड़ा देखा जिस में लिखा था कि मराठा मंदिर को यह अवॉर्ड उन को फिल्म उद्योग को ज़िंदा रखने के लिए दिया जाता है ….वाह, बहुत खूब….। 


अब चलते हैं फिल्म शागिर्द जिसके लिए मराठा मंदिर सिनेमा को गोल्डन जुबली ट्राफी दी गई …यह फिल्म तो सुपरहिट थी ही और इस फिल्म के गीत भी सुपर-डुपर हिट…हम छोटे छोटे थे तो रेडियो पर बजते रहते थे …..एक गीत याद आ रहा है ….- दिल विल प्यार व्यार मैं क्या जानूं रे ....



गुज़रे दौर की फिल्मों की बात करें तो याद आता है कि उस ज़माने में फिल्मी स्टोरी की किताबें भी मिलती थीं...मेरे पास हैं कुछ...मुझे ऐसे लगा जैसे खुदा-गवाह की भी किताब मेरे पास है ...लेकिन नहीं, वह किसी और फिल्म की किताब थी, जिसके पिछले-कवर पर ख़ुदा-गवाह फिल्म की आने वाली किताब का विज्ञापन था ..ये किताबें यही कोई दस रुपए की बिकती थीं....आज कल ऐंटीक-शॉप में कभी कोई दिख जाती है ....पूरी कॉमिक्स की तरह तैयार की गई पूरी फिल्मी स्टोरी...फिल्मी अंदाज़ में ...और उस केे पीछे गीत भी लिखे होते थे ..अभी लगाता हूं यहां किसी किताब का कोई पन्ना ...।


मैं जिस फिल्मी किताब की बात कर रहा था, यह उसी का एक पन्ना है, फिल्म कोई और है...अब देखिए, अगर इतनी बढ़िया तरीके से ४०-५० पन्नों में फिल्म की पूरी कहानी उस दौर में पाठकों तक पहुंच जाती थी तो कमाल ही है ....लेकिन हां, दस रुपए भी उस ज़माने में कम नहीं थे ... 😀 

बात जहां से शुरु की थी ..वही पर वापिस आता हूं …मैं मराठा मंदिर को किसी मंदिर से कम नहीं समझता…दो-तीन पुश्तों का मनोरंजन कर चुके और अभी भी इस विषम दौर में भी डटे हुए हैं, थके-मांदे परेशान लोगों को सुकून मिलता है, अपनी परेशानियां भूल जाते हैं कुछ वक्त के लिए., … बहुत खूब, इन सब के लिए ही तो हम मंदिर में भी जाते हैं, है कि नहीं?…और एक बात….मुझे बहुत से फिल्मी गीत ..जिन में बहुत से रूमानी गीत भी शामिल हैं, वे मुझे बहुत से भजनों से भी बेहतर लगते हैं …प्रेरणा देते हैं, सुकून देते हैं, और रास्ता दिखाने का काम भी करते हैं…सुबह सुबह जो प्रवचन आते हैं टीवी-केबल पर जहां पर बाबा लोग परलोक सुधारने की बात करते हैं, स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी लेते हैं, ८४ लाख योनियों से मुक्ति दिलाने की गारंटी लेते हैं…..मेरी इन में कभी कोई रूचि नहीं रही, सिर ज़रूर दुःखने लगता है ….इसलिए पुराने फिल्मी गीत ..कुछ फिल्मी भजन, दोहे सुनने ज़्यादा भाता हैं…..परलोक का क्या है, देख लेंगे उस से बाद में.. एक बार जाने के बाद कौन बताने के लिए लौटा है कि वह कहां पहुंचा, कहां नहीं….


हिंद पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित अमिताभ की जीवनी 

उस दौर में फिल्मी सितारों पर कॉमिक्स की तरह उन की जीवन डॉयमैंड कॉमिक्स और हिंद पाकेट बुक्स प्रकाशित किया करती थीं...




उस दिन हाल से बाहर आते वक्त मैंने ये तस्वीरें खींच लीं..



लिखते लिखते कईं बातें याद आ जाती हैं...१९९० के दशक में हम लोग जिस बिल्डिंग में रहते थे,  उस फ्लैट के एक कमरे से मराठा मंदिर बिल्कुल साफ दिखता था ..और बहुत सी फिल्मों के प्रीमियर की गहमा-गहमी उसी खिड़की से देख लिया करते थे ...शहनाई, नगाड़ों की मन-भावन ध्वनि के बीच  आसमां से प्रीमियर की शाम फिल्मी सितारों का मराठा मंदिर पर उतरना ...इतना सब तो खिड़की से नहीं दिख पाता था ...बढ़िया सी इंपोर्टेड दूरबीन खरीदने का आइडिया 😎 नहीं आया उन दिनों ....!!

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह... वाह...एक समय मुंबई की शान रहे मराठा मंदिर का सुंदर वर्णन मनभावन लगा।
    मुझे याद आ रहा है जब मुगले आजम के प्रीमियर शो में फिल्म जगत के तत्कालीन सुप्रसिद्ध फिल्मी सितारों की भीड़ दिखी थी।
    क्या शान थी। चमक थी।
    आजकल मनोरंजन के इतने माध्यम हो गये हैं कि सिनेमाहाल अपना रखरखाव करने में भी असमर्थ हो रहे हैं।
    उसी क्षेत्र में राजकपूर का अप्सरा और प्रकाश मेहरा का मिनर्वा कालकवलित हो गये। अब वहाँ बहुमंजिला भवन बन गये हैं।
    देश विकास कर रहा है।
    डा. वीरेंद्र मिश्र, मीरा रोड, मुंबई।

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  2. डॉ साहब मैं पहली बार अपने पापा के साथ 1958 में गया था तब लोकल ट्रेन और ट्रॉम भी छाती थी। फ़िर दोबारा 1960 में पापा के साथ गया तब मराठा मन्दिर सिनेमा हॉल बना था और इसमें पहली फिल्म मुगल ऐ आज़म लगी थी। पापा के दोस्त जो बॉम्बे के थे j j hospital
    में सर्विस करते थे। उन्होंने ने टिकट बुक करवा लिये थे। हमने वोह मूवी मराठा मन्दिर में देखी थी। क्या सिनेमा हॉल बना था पुश बैक सीट बिल्कुल एयरोप्लेन वाली फ़्लोर पर क़ीमती सॉफ्ट कार्पेट पैरों के नीचे। पूरे हिंदुस्तान में ऐसा दूसरा सिनेमा हॉल नहीं था। बॉम्बे बहुत बार गया हूँ तब इतनी आबादी नहीं थी और सपोर्ट में ट्रॉम और बस सर्विस भी थी।

    शिशिर...
    लखनऊ

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  3. Good Evening Sir
    excellently written as usual
    I liked whole blog
    Specially first paragraph in which you wrote that we post 60 year person has to write so that next generation will come to know.
    Sir You have many memories and experience so do write.
    Marathi Mandir cinema hall is one of iconic theatre is one of iconic theatre in Mumbai
    There are many movies of 60/70/80 which runs continuously for 25 week.
    I have seen Sholay movie 70 mm some 25 year back at Maratha Mandir theatre.
    Where ever sholay movie rerelases I used to see it.
    Twenty year back there were many single screen cinema hall at Grant Road Mumbai Central such as Apsara Novelty Minerva Roxy imperial Naaz Opera House ,Ganga Jamuna, and many more.

    Marathi Mandir cinema hall at Mumbai Central and Gaiety Galaxy Gemini is owned by same owner Shri Manoj Desai

    Few months back I read that one cinema hall in Jaipur is very nice.

    I saw Khuda Gawah in 1992 at Manmad.
    In those days in 70 and 80 viewing movie in single screen theatre was an experience
    Our generation had experience those days
    Those were Golden days.
    There was a Minerva movies at Grand road where Sholay Movie run continuously for five years from 1975 to 1980
    In 80s once upon time there was Era of Mr Amitabh Bacchan
    so from Grant Road to Marine Drive there were 9 different movies of Amitabh Bacchan were running

    Again excellent blog
    Do keep writing Sir

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