बुधवार, 13 जुलाई 2011

दारू पर भी चेतावनी आने की चर्चा गर्म है


अभी दो दिन पहले ही मैं एक जगह पढ़ रहा था कि मुंबई में एक कैंसर गोष्ठी में विशेषज्ञों द्वारा यह अपील की गई कि शराब पर भी कैंसर से संबंधित चेतावनी होनी चाहिए.... उन की बात बिल्कुल उचित लगी क्योंकि अब यह सिद्ध हो चुका है कि तंबाकू और अल्कोहल एक किल्लर कंबीनेशन है---बेखौफ़ हत्यारा हो जाता है पैदा जब तंबाकू और दारू मिल जाते हैं। चलिए अभी तो उस ग्रुप ने अपना मत रखा है ---अब इस पर कम से कम अगले दस-बीस सालों तक कमेटियां बनेंगी, शायद अधिसूचनाएं भी जारी हों, फिर कोर्ट में केस होंगे ...दारू बेचने वाले करेंगे कि हम तो मर गये, लुट गये .....फिर यह सब कुछ टाला जाएगा--- तो इस टालमटोल में असल में क्या सामने आयेगा, यह तो दस-बीस बाद ही पता चलेगा।
लेकिन जो खबर मैंने आज देखी मुझे पढ़ कर अच्छा लगा ....आस्ट्रेलिया में यह निर्णय लिया गया है कि अब से वहां पर बिकने वाली शराब पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी लिखी रहा करेगी। आस्ट्रेलिया में यह दारू-वारू पीने की समस्या बहुत ही जटिल है। बच्चे छोटी आयु से ही इस के चक्कर में पड़ जाते हैं --- औसतन पंद्रह-साढ़े पंद्रह साल की उम्र तक तो ये लोग दारू पीना शुरू कर ही देते हैं। महिलाएं भी इस में कहां पीछे हैं।
इसलिये वहां पर यह निर्णय लिया गया है कि निम्नलिखित चेतावनियां शराब पर लिखी जाने लगेंगी ...
Kids & Alcohol don’t mix
It is safest not to drink while pregnant
Is your drinking harming yourself or others
मैं जो खबर पढ़ रहा था –एसोसिएटेड प्रैस की साइट पर उस में एक जगह यह भी लिखा था कि क्रिकेटर डेविड बून ने 1989 ने सिडनी से लंदन की हवाई यात्रा के दौराना 52 बियर की बोतलें पी थीं। और मुझे आज से पहले यह भी नहीं पता था कि अमेरिका सहित 14 देश ऐसे हैं जहां पर शराब की बोतलों पर चेतावनी लिखी जाती है।
यह बातें हो गईं अमीर देशों के अमीर लोगों की ....लेकिन यहां पर तो ज़्यादातर देशी, ठर्रा, नकली, मिलावटी, नारंगी , सतरंगी, पाउच में, थैली में ......पता नहीं क्या क्या बिक रहा है। सैंकड़ों लोग जो इन ज़हरीली दारू की वजह से बेमौत मर जाते हैं उन का मीडिया में कभी कभी ज़िक्र आ ही जाता है ...रोती, विर्लाप करती महिलाएं व छोटे छोटे बच्चे..... लेकिन हज़ारों लाखों जो दारू की वजह से तिल तिल मरते रहते हैं उन की फिकर कौन कर रहा है। सुबह सवेरे जब कभी किसी ठेके के सामने से गुज़रने का अवसर मिलता और लोगों को प्लास्टिक की छोटी छोटी बोतलों से मदिरापान करते देखता हूं तो इन पीने वाले लोगों के अलावा मुझे हर इंसान पर गुस्सा आता है ...चलिये, वो तो अलग बात है।
काश, हमारे यहां भी यह चेतावनी का प्रावधान हो जाए ---पहले तो उस में बीसियों साल लग जाएंगे, फिर सोचता हूं उस से हो भी क्या जाएगा ....ये जो चेतावनी आस्ट्रेलिया में शुरू की जा रही हैं, इतने से आम हिंदोस्तानी का क्या बनेगा.... यह चेतावनियां हमारे लिये नहीं हैं ...हमारे लिये तो हैं ...तरह तरह की डरावनी तस्वीरें उन लोगों की जिन का लिवर खराब हो गया ... पेट फूल गया .... खून की उल्टीयां हो रही हैं, शौच में रक्त आने लगा है ..... और यह सब इस देश में दारू की वजह से होने वाले रोगों के आम से लक्षण हैं।
मुझे ध्यान आ रहा है इस देश की विभिन्न आध्यात्मिक लहरों का ---अनेकों लोगों के अनुभव सुनता हूं...उन की ज़िंदगी को नज़दीक से देखता हूं जिन्होंने ऐसी ही किसी आध्यात्मिक लहर के प्रभाव में आने के बाद दारू पीनी छोड़ दी, और अब वे दूसरों को भी इस ज़हर से दूर रहने के लिये प्रेरित कर रहे हैं। इन के बच्चे भी इन के प्रभाव में आने की वजह से दारू से दूर ही रहते हैं। मुझे यह चमत्कार बहुत अचंभित करता है...दारू तो दारू, विभिन्न प्रकार के अन्य नशों से भी दूर ही रहते हैं.... great Indians! मैं इन आध्यात्मकि लहरों के दूसरे पहलुओं में घुसना नहीं चाहता क्योंकि यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है......लेकिन कुछ आध्यात्मिक पहलू अगर करोडों लोगों के इसी लोक को खुशग़वार बनाने में जुटे हैं तो आखिर बुराई क्या है। मैं निरंकारी सत्संग में जाता हूं और वहां पर अनेकों लोगों के अनुभव सुनता हूं कि आत्मज्ञान बोध के बाद कैसे उन्होंने नशा को त्याग दिया ..... क्योंकि गुरू की तरफ़ से सभी तरह के नशों को इस्तेमाल करने पर मनाही लगाई है, बस अनुयायी के लिये इस आदेश से बढ़ कर क्या है!..... this is incredible India.
और अब करते हैं डंडे की बात ---जैसा कि हरियाणा में कईं बार अपने पतियों की दारू से परेशान बेचारी महिलाएं कर चुकी हैं ...धरना, विरोध, दारू की दुकान के आगे लफड़ा—ये सब बातें कितनी कारगर होती होंगी इस सामाजिक बुराई को उखाड़ने में, इस के बारे में कुछ कह नहीं सकता। लेकिन बात तो तब ही बनती है जब सोच बदलती है.....दूसरे रास्ते, ये चेतावनियां, ये डरावनी फोटू-वोटू वाले रास्ते बडे कठिन से हैं, दुर्गम हैं...परिणाम क्या निकलेंगे, कौन कहे............
PS…. Without malice towards anybody --- no moral policing here!
जाते जाते इस गीत का ध्यान आ गया ---पता नहीं पिछले पचास वर्षों में इस गीत ने कितने लोगों को पीने के लिये उकसाया होगा ....

यौन-रोग सूज़ाक की बेअसर होती दवाईयां

क्या सूज़ाक का नाम नहीं सुना? – ये जो लोग पहले सिनेमाघरों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के बाहर हर किसी को एक इश्तिहार सा थमाते दिखते थे – जिस में किसी खानदानी नीम हकीम द्वारा हर प्रकार के गुप्त-रोग का शर्तिया इलाज का झांसा दिया जाता था, उस लिस्ट में कितनी बार लिखा तो होता था – आतशक-सूज़ाक जैसे रोग भी ठीक कर दिये जाते हैं। खैर वे कैसे ठीक करते हैं, अब सारा जग जानता है, केवल मरीज़ को उलझा के रखना और उन से पैसे ऐंठना ही अगर झोलाछापों का ध्येय हो तो इन से बच के रहने के अलावा कोई क्या करे।

हां, तो इस योन रोग सूज़ाक को इंगलिश में ग्नोरिया रोग (Gonorrhoea) कहते हैं – समाचार जो कल दिखा है वह यह कि इस रोग के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली दवाईयां बेअसर हो रही हैं और आने वाले समय में इस का इलाज करना मुश्किल हो जायेगा--- जब दवाईयां ही काम नहीं करेंगी तो इलाज क्या होगा!!

थोड़ा सा इस रोग के बारे में – यह रोग किसी संक्रमित व्यक्ति से संभोग से फैलता है और यह केवल vaginal sex से ही नहीं बल्कि ओरल-सैक्स एवं एनल सैक्स (मुथमैथुन एवं गुदा-मैथुन) से भी फैलता है। तो इस के लक्षण क्या हैं? –इस के लक्षणों के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि लगभग 50फीसदी महिलाओं में तो इस के कोई लक्षण होते ही नहीं हैं, लेकिन 2 से 5 प्रतिशत पुरूषों में इस के कोई लक्षण नहीं होते।

इस के ऊपर भारतीयों की एक और विषम समस्या --- वे अकसर इन रोगों को छोटे मोटे समझ कर या झिझक की वजह से किसी क्वालीफाइड डाक्टर से मिल कर न तो इस का आसान सा टैस्ट ही करवाते हैं और न ही इस के लिये कुछ दिन दवाईयां लेकर इस से मुक्ति ही हासिल कर पाते हैं। नतीजतन यह रोग बढ़ता ही रहता है ... और महिलाओं में तो बांझपन तक की नौबत आ जाती है ...और भी बहुत सी परेशानियां – जैसे पैल्विक इंफेमेटरी डिसीज़(pelvic inflammatory disease), पेशाब में जलन आदि हो जाती हैं।

पुरूषों में भी इस रोग की वजह से पेशाब में जलन (पेशाब की जलन के बहुत से अन्य कारण है, केवल पेशाब की जांच से ही कारण का पता चल सकता है), अंडकोष में सूजन और गुप्तांग से डिस्चार्ज हो सकता है। लेकिन इन नीम हकीमों के चक्कर में सही इलाज से दूर ही रहा जाता है।

विश्व भर के हैल्थ विशेषज्ञों की यही राय है कि ऐसे यौन-जनित रोग जिन का इलाज नहीं करवाया जाता ये रोग एचआईव्ही संक्रमण को बढ़ावा देने में भी मदद करते हैं—क्योंकि इन की वजह से यौन अंगों पर जो छोटे मोटे घाव, फोड़े, फुंसियां होते हैं वे एचआईव्ही वॉयरस को शरीर में प्रवेश करने का एक अनुकूल वातावरण उपलब्ध करवाते हैं।

तो इस खबर पढ़ कर हरेक का यह कर्तव्य बनता है कि इस के बारे में जितनी भी हो सके जनजागरूकता बढ़ाए ताकि अगर किसी को इस तरह की कोई तकलीफ है भी तो वह उस से जल्द से जल्द निजात पा सके....फिर धीरे धीरे इस के जीवाणु इतने ढीठ (drug resistance) होने वाले हैं कि पछताना पड़ सकता है।

इस तरह के रोग अमीर देशों में बहुत हैं यह हम लोग अकसर देखते पढ़ते हैं ...बेपरवाह उन्मुकता जैसे बहुत से अन्य कारणों (जिन्हें आप जानते ही हैं) में से एक कारण यह भी है कि वहां लोग इस तरह के टैस्ट करवा लेते हैं ...लेकिन भारत में पहले तो ढंग के डाक्टर (मतलब क्वालीफाइड) के पास जाता ही नहीं और अगर वहां चला भी गया तो बहुत बात टैस्ट और दवाईयां करवाने लेने के लिये टालमटोल करता है, चलो थोड़ा दिन और देशी दवाई खा कर देख लेते हैं ...इन हालातों में वह आगे से आगे यह रोग तो संचारित करता ही है, अपना तो ऩुकसान करता ही है।
Further reading
Drug resistant STD now a global threat
स्वस्थ लोगों को बीमार करने की सनक या कुछ और

सोमवार, 11 जुलाई 2011

ताकत के कैप्सूल की पाठशाला ...

कल हिंदी की एक अखबार में मुझे "ताकत के कैप्सूल" का एक विज्ञापन दिख गया ... उसे ध्यान से पढ़ते-देखते हुये मैं यही सोच रहा था कि जितनी मेहनत ये कंपनियों वाले इस तरह के कैप्सूल आम जन को बिना सोचे-समझे गटकने के लिये विवश करने के लिये करते हैं .....इन के विज्ञापनों की साज सज्जा, शैली, भाषा ...एकदम परफैक्ट। अगर मरीज़ों को अपने स्तर पर कुछ निर्णय लेने के लिये प्रेरित करने की बात है तो हमारी चिकित्सा व्यवस्था को भी इन के तौर-तरीकों से कुछ सीखने की ज़रूरत है। यह रंगीन विज्ञापन था जिसे एक कॉमिकस की तरह पेश किया गया था।

उस विज्ञापन में जो कुछ लिखा था, यहां बताना चाहूंगा .... उस की स्कैन्ड कॉपी अपरिहार्य कारणों से यहां चिपकाने में असमर्थ हूं। एक बंदा बाज़ार में घूम रहा है ..तो अचानक उसे एक केन्द्र का बोर्ड दिख जाता है....यह केन्द्र कोई और केन्द्र-वेन्द्र नहीं है, बस उस कैप्सूल के नाम के आगे केन्द्र लिख दिया गया है..... और आगे सुनिये ...
---अरे, .....केन्द्र। इस के बारे में थोड़ी जानकारी ले लेता हूं।
-- वह बंदा अदंर जाता है और एक सफेद कोट धारण हुये बंदे से उस कैप्सूल का नाम लेकर पूछता है .... यह क्या है?
कंपनी वाला -- यह भारत का नंबर 1 दैनिक स्वास्थ्य पूरक है जिसमें 11 विटामिन, 9 मिनरल और जिनसेंग का संतुलित मिश्रण है।
जिज्ञासु - अरे वाह! इसके क्या फ़ायदे हैं?इसे दैनिक स्वास्थ्य पूरक क्यों कहते हैं?
कंपनी वाला- यह शरीर में ऐसे पौष्टिक तत्वों की भरपाई करता है जिनकी कमी के कारण थकान, कमज़ोरी और शरीर टूटने लगता है। इस तरह से यह आपको सारा दिन चुस्त और तन्दरूस्त रखता है। इस का सेवन रोज़ करना चाहिए, इसलिेए इसे दैनिक स्वास्थ्य पूरक कहते हैं।
जिज्ञासु - अच्छा!
कंपनी वाला - यही नहीं, यह मानसिक चेतना और एकाग्रता भी बढ़ाता है। इस से रोगरोधी क्षमता मज़बूत होती है। यह विटामिन और मिनरल की भरपाई करता है और अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने में मदद करता है।
जिज्ञासु - मैं घर का बना नियमित आहार लेता हूं, क्या तब भी यह कैप्सूल लेना चाहिए ?
कंपनी वाला - यह कैप्सूल कुछ ऐसे ज़रूरी विटामिन और मिनरल की पूर्ति करता है जो नियमित आहार लेने के बाद भी हमारे शरीर को नहीं मिल पाते।
जिज्ञासु - यह कैप्सूल कौन ले सकता है?
कंपनी वाला -- 12 वर्ष से अधिक आयु के पुरूष इस का सेवन कर सकते हैं। यही नहीं अब तो महिलाओं के लिए खास कैप्सूल वुमन और 50 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लिए ...सीनियर भी उपलब्ध है। यह कैप्सूल अत्यंत व्यस्त जीवनशैली और शारीरिक अथवा मानसिक तौर पर थका देने वाले हालात में काम करने वालों के लिए अति उत्तम है।
जिज्ञासु - धन्यवाद.. ..कैप्सूल एक्सपर्ट, मैं आज से ही इस कैप्सूल का नियमित सेवन करूंगा।

और इस बढ़िया से विज्ञापन से नीचे लिखा है -- तो आप यह कैप्सूल लेना कब से शुरू कर रहे हैं? और इस कैप्सूल विशेषज्ञ के लिये टॉल फ्री नं ......या एसटीडी नंबर ..... पर कॉल करें या ......इस नंबर ....पर SMSकेरं या e-mailकरें इस पते पर ....और तो और साथ ही net-savvy ग्राहकों के लिए इस कैप्सूल के फेसबुक पेज़ का पता भी दिया गया है। और सब से नीचे लिखा गया है कि इस कैप्सूल से संबंधित ज्ञान को अगले तीन हफ़तों तक रविवारीय संस्करण के माध्यम से बटोरें और फिर 31 जुलाई के अंक में इस कैप्सूल पर आधारित सवालों का जवाब भेजें और जीतें ढेर सारे आकर्षक इनाम।

साइड में एक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी की फोटू भी लगी है जिस ने इन कैप्सूलों को पकड़ा हुआ है --- मुझे लगता है कि वह तो इन्हें खाता नहीं होगा, और असल में उसे इतनी युवावस्था में इन्हें लेने की ज़रूरत पड़ती है तो किसी चिकित्सक से मिल लेना उस के लिये हितकारी होगा। हां, तो बताइए, इस तरह का विज्ञापन देख कर है कोई जो इन के चक्कर में पड़ने से बच पाए।

और जिज्ञासु की बात सुनी आपने - वह बेचारा इसी गम में दुबला हुआ जा रहा है कि वह घर का खाना खाता है ----और क्या खाएगा, भाई। और किस तरह से कंपनी वाले द्वारा उस का ब्रेन-वॉश किया जा रहा है कि घर में तो तुम कुछ भी खा लो, तुम्हें कुछ न कुछ कमी तो रह ही जाएगी, थकान भी होगी और कमज़ोरी भी लगेगी।

लेकिन इस तरह के कैप्सूलों के बारे में सच्चाई यह है कि बिना किसी शारीरिक बीमारी के और बिना किसी डाक्टरी परामर्श के इस तरह के कैप्सूल स्वयं भी लेने शुरू कर देना बिल्कुल बेकार सी बात है। हां, चिकित्सक कुछ अवधि तक किसी पुरानी बीमारी आदि में विटामन आदि के कैप्सूल लेने की सलाह दे सकते हैं.... वो अलग बात है। एक बात पढ़ कर तो और भी अजीब लगा कि इसे 12 वर्ष से अधिक आयु के पुरूष ले सकते हैं ...... यह पढ़ते हुये यही लग रहा था कि कंपनी को क्या फ़र्क पड़ेगा --- चाहे तो कोई नवजात् शिशु को दलिेये, खिचड़ी के साथ मिला के ही देने की हिमाकत कर दे।

कंपनी का सीधा सीधा फंडा है कि उस के कैप्सूल बिकने चाहिएं ...और खूब बिकने चाहिएं। काश, चिकित्सा व्यवस्था इन कंपनियों की अपनी दवाईयां बेचने की शिद्धत से कुछ पाठ सीख सकें ....ताकि वे भी अपने सेहत से जुड़े बेशकीमती संदेश करोड़ों लोगों तक और भी प्रभावपूर्ण ढंग से बेच पाएं।

रविवार, 10 जुलाई 2011

डोपिंग के कुछ अनछुए पहलू

कुछ दिनों से खूब सुन रहे हैं किस तरह से कुछ खिलाड़ीयों का डोप टैस्ट पॉजीटिव आया है। अफरातफरी में राष्ट्रीय खेल संस्थान के बाहर कैमिस्टों पर छापे मारे गये, प्रतिबंधित दवाईयां पकड़ी गईं ...रिकार्डों में भी गड़बड़ थी, और प्रिंट मीडिया में इस बात का भी खुलासा किया गया कि वहां से बिना डाक्टरी नुस्खा के ही कोई भी दवाई खरीदी जा सकती है।
चलिये थोड़े दिनों की बात है..धूल नीचे बैठ जायेगी...और हमारी यादाश्त वैसी भी कोई विशेष तेज़ तो है नहीं ---अब इस देश का आमजन किस किस तरह के आंकड़े याद रखे ... थोड़ी ही दिनों में वह किसी और घोटाले के चटखारे लेने लगेगा, ऐसे में कहां यह डोपिंग वोपिंग वाली बात किसी को याद ही रहने वाली है।
लेकिन असल मुद्दा यह है कि क्या इस तरह की दवाईयां केवल पटियाला के इस संस्थान के बाहर कैमिस्टों की दुकानों से ही मिलती हैं.... इस बात पर लगता है कि कोई यकीन करेगा ? --- इस देश में कहीं से भी कुछ भी खरीद लो...बस तमाशा देखने के लिये पैसा फैंकने की ज़रूरत है।
दो एक दिन पहले मुझे सायना नेहवाल की एक बात जो मैंने पेपर में देखी, वह मुझे बिल्कुल ठीक लगी। वह कह रही थी कि कुछ खिलाड़ी इतने पढ़े लिखे हैं नहीं ...इस वजह से वे इस सारी बात को अच्छी तरह से समझ ही नहीं पाते। उन्हें इस बात का आभास तक भी शायद नहीं होता होगा कि वे जिन सप्लीमैंट्स को ले रहे हैं उन में किस तरह के प्रतिबंधित साल्ट मिले हुये हैं।
जो भी हो, खिलाडि़यों को इन सब बातों का पूर्ण ज्ञान तो दिया ही जाना चाहिये.... लेकिन डोपिंग के ये कुछ किस्से तो सारे देश के सामने आ जाते हैं लेकिन जो डोपिंग इस देश के हर शहर में, हर गांव में हो रही है उस का कोई क्या करे।
आज का युवा एवं युवतियां सुडौल शरीर के लिये जो तरह तरह के सप्लीमैंट्स कैमिस्टों से खरीद लाते हैं उन में ये सब लफड़े वाली दवाईयां मिली रहती हैं ---और यह धंधा करने वाले इतने बेखौफ़ हैं (यह हर कोई जानता है कि इस बेखौफ़ी के पीछे क्या राज़ है !!) कि अधिकतर सप्लीमैंट फूड्स पर इन साल्टों के बारे में कुछ भी लिखा ही नहीं होता। इसलिये युवा वर्ग अंधेरे में ही ये सब खाता रहता है।
इस सब प्रतिबंधित पदार्थों के बहुत नुकसान हैं ---- कुछ ही दिनों में मांसपेशियां सुडौल हो जाएं केवल यही न देखा जाए... ये दवाईयां ऐसी होती हैं जिन्हें किसी प्रशिक्षित चिकित्सक के नुस्खे के बिना खाना खतरा मोल लेने जैसा है।
ये जिम वाले भी जो पावडर- वाउडर एक्सरसाईज़ करने वालों को थमा देते हैं इन में भी इन्हीं ऐनाबॉलिक स्टीरायड्स की मिलावट तो रहती ही है। मैं इतनी बार अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट पर इस तरह की चेतावनियां पढ़ चुका हूं कि मुझे यही लगने लगा है कि अगर अमेरिका जैसे देश में यह सब बार बार सामने आता रहता है तो हम लोग तो इस के बारे में चुप ही रहें तो बेहतर होगा-- यहां तो कुछ भी बिकता है, बस थोड़ी बहुत इधर-उधर सैटिंग करने की बात है !!
इस पोस्ट के माध्यम से जो बात रेखांकित की जा रही है कि डोपिंग के मामले केवल वही नहीं हैं जो मीडिया हमारे सामने ले आता है -- शायद हज़ारों-लाखों किस्से इन सप्लीमैंट्स के कारण देश में हो रहे होंगे --- शायद कोई मैडल वैडल जीतने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि खिलाड़ियों की सेहत ठीक रहे ... क्योंकि बार बार अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन भी चेता दिया करती है कि प्रतिबंधित दवाईयों का बेरोकटोक इस्तेमाल ख़तरों से खाली नहीं है। और झोलाछाप डाक्टर भी इस तरह के धंधों में तबीयत से चांदी कूटे जा रहे हैं !!

शनिवार, 2 जुलाई 2011

अमेरिकी लोगों की एचआईव्ही टैस्टिंग के परिणाम

अमेरिका में सितंबर 2007 से सितंबर 2010 तक 27 लाख लोगों की एचआईव्ही जांच की गई – जिन में से एक प्रतिशत से थोड़ा ऊपर लगभग 29503 लोगों को एचआईव्ही से ग्रस्त पाया गया। इन में से 18000 लोग तो ऐसे थे जिन्हें अपने एचआईव्ही पॉज़िटिव होने का पता ही नहीं था। और इन 29000 लोगों में से लगभग 72प्रतिशत पुरूष थे।

अमेरिका में लगभग 12 लाख लोग एचआईव्ही से ग्रस्त हैं जिन में लगभग 20 प्रतिशत लोगों को यह भी नहीं पता कि उन्हें यह रोग है। और अहम् बात यह है कि वहां पर हर वर्ष जो एचआईव्ही के संक्रमण के नये केस, लगभग 56000 प्रतिवर्ष, पाये जाते हैं उन में से ज़्यादातर उन लोगों के कारण ही होते हैं जिन्हें अपने एचआईव्ही स्टेट्स का पता ही नहीं होता।

आंकड़े –आंकड़े –आंकड़े ---- चलिये, उन के पास आंकड़े तो हैं, यहां तो तुक्के ही तुक्के हैं। होता तो यहां पर भी बहुत प्रचार है कि अपनी इच्छा से अपना एचआईव्ही टैस्ट करवाने के लिये सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन कभी इस तरह के आंकड़े मीडिया में दिखे नहीं कि इस वर्ष इतने लोगों ने ऐच्छिक तौर पर यह टैस्ट करवाया और इतने प्रतिशत लोगों को पॉज़िटिव पाया गया।

अपनी इच्छा से यह टैस्ट करवाने के अपने फायदे हैं – एक तो यह कि अगर कोई हाई-रिस्क बिहेवियर से है तो उसे एचआईव्ही निगेटिव होने पर एक तरह की निश्चिंता सी हो जायेगी ताकि उसे आगे से अपना बिहेवियर दुरूस्त करने के लिये एक प्रेरणा सी मिल जाएगी।

और अगर कोई पाज़िटिव निकलता है तो उसे एक रास्ता दिख जाएगा --- ART –Anti-retroviral therapy—जल्दी शुरू करने का एक अवसर मिल जायेगा ताकि उस के शरीर में वॉयरस के फैलने पर नियंत्रण किया जा सके --- इन सब का यह प्रभाव होता है कि उस व्यक्ति की आयु काफ़ी बढ़ जाती है। और अब तो बार बार मैडीकल विशेषज्ञ एवं अनुसंधानकर्त्ता एचआईव्ही ग्रसित व्यक्ति को एचआरटी जल्दी शीघ्र करने के लिये प्रेरित करते रहते हैं।

मैं सोच रहा था कि हमारे देश में इस तरह का अभियान चलना चाहिये जिस के अंतर्गत लाखों-करोड़ों लोगों की जांच की जाए ताकि समस्या का सही आंकलन हो सके। लेकिन इस के साथ यह भी लगता है कि इस देश की एचआईव्ही संक्रमण के साथ साथ अपनी और भी बहुत सी सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं हैं --- आज ही के अखबार में देख रहा था कि अब सरकार लाखों लोगों की शूगर की जांच करेगी ताकि उन को इस महामारी के मुंह से बचाया जा सके। लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि क्या सारा काम सरकार ही करेगी, समस्याएं इस देश की इतनी विकराल हैं कि सब के हल सरकार से ही खोजना मुनासिब नहीं लगता।
Source : Awareness- HIV compaign finds 18000 new cases

तुम भी चलो, हम भी चलें.....चलती रहे ज़िंदगी .......

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

डाक्टरी नुस्खे की दो कापियां करेंगी जादू ?

जी हां, आज की टाइम्स ऑफ इंडिया में यही खबर छपी है .. Now, two prescriptions to buy medicines. दरअसल, मैंने जब यह समाचार देखा कि यह तो इंदौर से संबंधित है तो मुझे लगा कि इस का भी संबंध उस लड़कियों को लड़के बनाने वाले लफड़े से ही होगा, लेकिन नहीं, यहां कुछ दूसरा मसला था।

इंदौर की पुलिस के मुताबिक आज कल के मुजरिम कोई भी बड़ी वारदात अंजाम देने से पहले कैमिस्ट के यहां से आसानी से मिल जाने वाली दवाईयों को इस्तेमाल कर के बेखौफ़ हो जाते हैं। दवाईयों की जिस लिस्ट को अखबार में छपा गया, वह यह थी –Alprazolam, Diazepam, Oxazepam, Nitrazepam, Clobazepam, Flurarepam, Pentozocine, Clobazam, Chlordiazepoxide, Midazolam, Lorazepam.

यह दवाईयां अवसाद (anti-depressant), मूड को दुरूस्त रखने के लिये (mood elevators), मन को शांत रखने के लिये ( sedatives) इस्तेमाल की जाती हैं.. इन में से दौरों के लिये इस्तेमाल की जाने वाली दवाई भी है।
इन में से कुछ दवाईयां ऐसी हैं जिन्हें अगर शराब के साथ ले लिया जाए तो नशा कईं गुणा बढ़ जाता है। दरअसल ये दवाईयां उस लिस्ट में आती हैं जिन्हें डाक्टरी नुस्खे के बिना कैमिस्ट के यहां से खरीदा ही नहीं जा सकता।

अब इंदौर में ऐसा प्रबंध सुनने में आया है जो कि पुलिस ने इंडियन मैडीकल एसोशिएशन की सहमति से एक व्यवस्था शुरू की है जिस के अंतर्गत अब इन दवाईयों को लेने के लिये चिकित्सक नुस्खे की दो कापियां बनाया करेंगे, एक कापी मरीज़ के पास रहेगी, दूसरी कैमिस्ट के द्वारा जमा कर ली जाया करेगी।

और 1 अगस्त 2011 से पुलिस इन कैमिस्टों का औचक निरीक्षण किया करेगी ---अगर इन नियमों का पालन नहीं किया जायेगा तो केस रजिस्टर किये जाएंगे।

आप को कैसे लगा यह खबर पढ़ कर –पता नहीं टाइम्स की साइट से यह खबर क्यों गायब है, चलिये इस व्यवस्था पर टिप्पणी करने से पहले इंदौर को अपनी शुभकामनाएं तो भेंट कर दें कि काश, वह शहर कुछ ऐसी उदाहरण पेश कर सके जिसका देश भर में अनुसरण किया जा सके।

लेकिन मुझे हमेशा से यही लगता रहा है कि कैसे डाक्टरी नुस्खे से ही दवाई हासिल की जाती होगी ---वैसे हकीकत क्या है, किस तरह से कोई भी दवाई कोई भी कहीं से कैसे भी हासिल कर सकता है।

मुझे हमेशा से यही लगता है कि अगर किसी के पास एक नुस्खा है भी तो कैमिस्ट के पास क्या प्रूफ़ है कि उस ने डाक्टरी नुस्खे के आधार पर वो दवाईयां दी हैं, लेकिन वह भी इतनी माथापच्ची क्यों करे क्योंकि यहां पर दवाईयों की कैश-मीमो तक लेने का रिवाज ही नहीं है।

एक नुस्खे को बीसियों कैमिस्टों को बीसियों जगह से कोई भी दवा हासिल की जा सकती है, कोई शक ? हम लोग अकसर यह भी देखते सुनते और पढ़ते रहते हैं कि कुछ लोगों की लापरवाही से किस तरह यह नशों का धंधा किस तरह से फल-फूल रहा है।

मुझे यह खबर पढ़ कर यह भी हैरानी हुई कि क्या पुलिस वाले भी कैमिस्ट की दुकानों पर जा कर चैकिंग कर सकते हैं, जैसा कि इस खबर में बताया गया है। जहां तक मुझे जानकारी है यह काम तो ड्रग –इंस्पैक्टर करते हैं, लेकिन पता नहीं अब क्या नये नये नियम बन रहे हैं।

कितना सही हो , अगर सब लोग अपना अपना काम सही ढंग से करें – न ही बिना ज़रूरत के इस तरह के खतरनाक नुस्खे लिखे ही जाएं, न ही ये नशे बेचे जाएं , न ही इन्हें बिना वजह खाया जाए ... वही बात है ..wishful thinking .... लेकिन अगर नशे करने वाला ही यही समझ ले कि सब से ज़्यादा तो वही अपना नुकसान किये जा रहा है, मौत को बुलावा दे रहा है, नियमों का क्या है, बनते रहेंगे, टूटते रहेंगे..............काश, इस व्यवस्था को सुचारू किया जा सके। लेकिन मुझे लगता है कि इस कोढ़ का इलाज इतना आसान नहीं है कि दो नुस्खे बनने से और पुलिस के सरप्राइज़ चैक से ही सब लोग अच्छे बच्चे बन जाएंगे ..... इस समस्या के अनेकों पहलू हैं जो बुरी तरह से गुथे हुये हैं... जिन को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

नसबंदी करवाओ, नैनो पाओ....

आज की टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर देख कर – Get Sterilised in Raj, drive home a Nano- ( पता नहीं यह खबर टाइम्स आफ इंडिया की साइट से कैसे गायब हो गई है, मेरे सामने प्रिंट एडिशन में तो यह बरकरार है....thank God, otherwise my credibility would have been at stake!!) एक बार तो लगा कि यार, यह क्या हो रहा है, जो मामला दो-चार-पांच सौ रूपये के इनाम से सुलट जाया करता था उस के लिये अब नैनो कार देने की नौबत आ गई... यही लगा कि अगर इस तरह से नैनो बांटी जाने लगेंगी तो खजाने खाली हो जाएंगे। लेकिन हमेशा की तरह खबर के शीर्षक की वजह से मैं एक बार फिर से बेवकूफ़ बन गया।

खबर पढ़ी तो माजरा समझ में आया कि यह तो भाई कूपन वूपन वाला मामला है। जैसे आयकर से छूट के लिये हम लोग राष्ट्रीय बचत पत्र खरीदते थे – उस के साथ इस तरह की गाड़ियों आदि के कूपन मिलते थे --- बहुत वर्षों बाद एक ऐसी ही लाटरी में अपनी भी एक चादर निकल गई थी। हां, तो नसबंदी वाली बात पर लौटते हैं ....खबर तफ़सील से पढ़ने पर पता चला कि जो लोग 1जुलाई से 30 सितंबर 2011 तक नसबंदी करवाएंगे, उन्हें एक कूपन दिया जाएगा। और बाद में इनामों के लिये लाटरी निकाली जाएगी ... और इनामों की लिस्ट यह है ...
  • एक नैनो कार
  • पांच मोटरसाइकिल
  • 21इंच के पांच कलर टीवी
  • सात मिक्सर ग्राईंडर
हां, खबर तो सुबह पढ़ी ही थी ...लेकिन आज शाम को जैसे ही बीबीसी की साइट पर आया तो वहां पर भी यही हैड-लाइन देख कर हैरान रह गया India- Rajasthan in 'Cars for sterilisation' drive - यही सोच रहा हूं कि हिंदोस्तान भी किन किन कारणों से अंतर्राष्ट्रीय पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा है।
इस के बारे में आप की क्या राय है?
PS... समझ नहीं पा रहा कि टाइम्स की साइट से इसे क्यों हटा दिया गया है जब कि हैडलाइन्स कायम है।


मंगलवार, 28 जून 2011

बेटीयों को बेटों में बदलने का गोरखधंधा

सैक्स चेंज करवाने संबंधी मेरा ज्ञान केवल उन एक-आध न्यूज़-स्टोरीयों तक ही सीमित है जो यदा कदा मीडिया में दिख जाती थीं... और अकसर विदेशों से इस तरह की बड़ी खबर आया करती थीं कि फलां फलां ने अपना सैक्स चेंज करवा --- पुरूष से महिला बन गया अथवा कोई महिला अपना सैक्स चेंज करवा के पुरूष बन गई।

कल की The Hindu  में मैंने एक समाचार का यह कैप्शन देखा—NCPCR seeks report on genitoplasty in Indore . समाचार का शीर्षक पढ़ कर मुझे कुछ कुछ यही लगा कि होगी यह खबर उस कुप्रथा के बारे में जिस के अंतर्गत छोटी बच्चीयों एवं युवतियों के यौन अंगों को विकृत किया जाता है ...Genital mutilation of females. और एक पल के लिये मुझे लगा कि आज कल कुछ देशों में इन अंगों की पलास्टिक सर्जरी की सनक जो लोगों में सवार है, शायद उस के बारे में कुछ लिखा हो। लेकिन इस खबर को मैंने जैसे ही पूरा देखा तो मेरे पैरों के तले से ज़मीन खिसक गई।

तो सुनिये ... इस देश में बेटे की चाहत में हज़ारों-लाखों बच्चियों को गर्भ में ही कत्ल कर दिया जाता है...इस बात के लिये कोई सरकारी आंकड़ें शायद ही दिखेंगे। अभी कुछ अरसा पहले से यह भी सुनने में आने लगा है कि क्योंकि गर्भवती महिला का अल्ट्रासाउंड कर के उस के गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में बताना कि वह लड़की है या लड़का --- चूंकि अब यह काम जोखिम से भर रहा है (Is it really so? ….i doubt!) इसलिये कुछ अन्य तरीकों से –शायद क्रोमोसोमल स्टडीज़ नाम से कोई टैस्ट है जिस के द्वारा भी गर्भ में पल रहे शिशु का सैक्स पता किया जा सकता है। फिर यह आफ़त आई कि अब इस तरह की टैस्ट किट इंटरनेट पर उपलब्ध होने की वजह से भ्रूण-हत्या के लिये इस का गल्त प्रयोग किया जायेगा। लेकिन मैं जिस खबर की बात कर रहा हूं उस से तो हद ही हो गई....।

शायद मैंने कल यह पहली बार पढ़ा था कि बेटे को पाने की चाहत का सिरफिरापन इस कद्र बढ़ गया कि इस देश में इंदोर में सैंकड़ों छोटी छोटी बच्चियों का सैक्स परिवर्तन कर के उन्हें लड़का बना दिया गया ... अगर आप का ट्विटर एकाउंट है तो हैश genitoplasty ( #genitoplasty) कर के ट्विटर सर्च करिये और देखिए इंदोर की इस भयानक खबर के बहुत से लिंक।


उस समाचार में यह खुलासा किया गया है कि पांच साल की छोटी छोटी बच्चियों का भी यह आप्रेशन किया जा रहा है ---इस पर लगभग डेढ़ लाख के करीब खर्च आता है और ज़्यादातर लोग बड़े शहरों से आकर ये आप्रेशन करवाते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इंदौर के नामचीन सर्जन –प्राइव्हेट एवं सरकारी अस्पतालों से ये आप्रेशन कर रहे हैं, पढ़ कर बेहद दुःख हुआ। बस यही पढ़ना सुनना बाकी रह गया था।

इसलिये नैशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल् राइट्स (National Commission for protection of Child Rights)  ने इस तरह के केसों के बारे में मध्यप्रदेश सरकार से पूरी छानबीन कर के रिपोर्ट भेजने को कहा है।
दरअसल जैनिटोप्लास्टी आप्रेशन की मैडीकल कारणों से कुछ केसों में ज़रूरत पड़ सकती है जब किसी के अंदरूनी सैक्स अंग (internal sex organs) तो पुरूष के हों और बाहरी (external genitals) उस के साथ मैच न करते हों, उन में कोई कमी हो, कोई विकृति हो ताकि जैनिटोप्लास्टी आप्रेशन की मदद से उसे दुरूस्त किया जा सके। मैडीकल कारणों की वजह से यह आप्रेशन महिला में किया जा रहा है या पुरूष में --- Masculanizing Genitoplasty or Feminising Genitoplasty… कहलाता है।

लेकिन बिना किसी मैडीकल सिफारिश के किसी लड़की को लड़का बनाने का यह धंधा अमानवीय है, घोर निंदनीय है ..... कल जब मैं इस के बारे में नेट पर कुछ रिपोर्ट देख रहा था तो मैं यह देख कर भी अचंभित हुआ कि जो मां-बाप अपनी बच्चियों को इस तरह के आप्रेशन करवाने के लाते हैं उन्हें स्पष्टता से यह बता दिया जाता है कि इस तरह से बेटे आगे संतान सुख प्राप्त नहीं कर पाएंगे .....लेकिन फिर भी वे इस तरह के आप्रेशन के लिये सहमत हो जाते हैं.....छोटी छोटी बच्चियों की तो सहमति का प्रश्न ही कहां उठता है। और तो और, इस तरह के अनऐथिकल (unethical) आप्रेशन करने के बाद उन “ बेटों ’ को तरह तरह की हारमोनल दवाईयां भी दी जाती हैं.........................आप का इस समाचार के बारे में क्या ख्याल है, सिर दुःखता है न यह सब पढ़ कर, कल मेरा सिर भी भारी हो गया यह सब जान कर कि इतने इतने अमानवीय धंधे पनप रहे हैं और इंदौर जैसे व्यवसायिक शहर में।

लेकिन इंदौर की हो क्यों बात करें, रिपोर्ट इंदौर से आई है, पता नहीं और कहां कहां ये सब गोरखधंधे चल रहे होंगे। और नैशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल् राइट्स ने तो यह भी कहा है कि यह वह मामला नहीं कि किसी आप्रेशन के लिये मां बाप राजी हैं, सर्जन राजी है तो इस तरह के आप्रेशन कर दिये जाएं .....लेकिन इस तरह के आप्रेशनों के लिये डाक्टरों की एक कमेटी यह तय करती है कि क्या उस लड़की अथवा लड़के में मैडीकल कारणों की वजह से वह केस ज़रूरी है या नहीं।

देखते हैं कब इस तरह के धंधों पर रोक लगती है ...... अभी तो ये सब रहस्य अतीत के या आने वाले समय के गर्भ में ही है।

सोमवार, 27 जून 2011

आम के आम .... रोगों के दाम !

यह तो लगभग अब सारी जनता जानती है कि फलों को पकाने के लिये तरह तरह के हानिकारक मसालों का इस्तेमाल होता है....लेकिन हरेक यही सोच कर आम चूसने में लगा है कि क्या फर्क पड़ता है, सारी दुनिया के साथ ही है, जो सब का होगा, अपना भी हो जाएगा, कौन अब इन मसालों-वालों के पचड़े में पड़े।

कुछ समय तक मेरी भी सोच कुछ ऐसी ही हुआ करती थी ...पिछले आठ-दस वर्षों से ही सुनते आ रहे हैं कि फलों को जल्दी पकाने के लिये कैल्शीयम कार्बाइड (calcium carbide) नामक साल्ट इस्तेमाल किया जाता है। और कईं बार आप सब ने भी नोटिस तो किया ही होगा कि फलों पर राख जैसे पावडर के कुछ अंश दिखते हैं, यही यह कैल्शीयम कार्बाइड होता है।

कुछ साल पहले जब यह मसालों वालों का पता चला तो कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने फलों की धुलाई अच्छे से करनी शुरू कर दी ....तीन-चार साल हो गये हैं मेरे पास इस मौसम में कुछ मरीज़ ऐसे आने लगे जिन के मुंह में अजीब सी सूजन, छाले, घाव .....जिन का कारण ढूंढना मेरे लिये मुश्किल हो रहा था.... बिल्कुल कैमीकल से जलने जैसी स्थिति (chemical burn) ....और लगभग सभी केसों में आम चूसने की बात का पता चलता। मैं अपने मरीज़ों को तो आम के छिलके को मुंह लगाने से मना करता ही रहा हूं ....और मैंने भी दो-तीन साल से चम्मच से ही आम खाना शुरू कर दिया। लेकिन अब चार-पांच दिन से आम खाने की इच्छा नहीं हो रही --- कारण अभी बताऊंगा।

लगभग एक सप्ताह पहले की बात है ... इंगलिश की अखबार में --- The Hindu/ The Times of India में एक खबर दिखी की दिल्ली शासन ने आम को पकाने के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले कैल्शीयम कार्बाइड पर प्रतिबंध लगा दिया है। प्रिंट मीडिया अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है ---बार बार अहम् बातें दोहरा कर हमें चेता रहा है। वह खबर ही ऐसी थी कि पढ़ कर बहुत अजीब सा लगा कि अगर देश की राजधानी में बिक रहे फलों के साथ यह सब हो रहा है तो हमारे शहर में कौन सा रत्नागिरी से फार्म-फ्रैश आम बिक रहे हैं।

पिछले कुछ दिनों से फलों को नकली ढंग से पकाने के तरीकों के लिये गूगल-सर्च कर रहा था। फिर calcium carbide लिख कर गूगल किया --- आप भी करिये- ज़्यादातर परिणाम अपने देश के ही पाएंगे की फलां जगह पर इस पर बैन हो गया है, फलां पर इस से पकाये इतने टन फलों को नष्ट कर दिया गया है। वैसे तो मैंने भारत की सरकारी संस्थाओं Indian Council of Medical Research एवं Health and family welfare ministry की वेबसाइट पर इस विषय के बारे में जानकारी ढूंढनी चाही लेकिन कुछ नहीं मिला।

जो जानकारी मुझे नेट पर मिली, उस में जितनी इस समय मुझे याद है, वह मैं आप सब से सांझी करना चाहता हूं। हां, तो जिस कैमीकल—कैल्शीयम कार्बाइड से पकाये आम या अन्य फल हम इतनी बेफिक्री से इस्तेमाल किये जा रहे हैं--- वह एक भयंकर कैमीकल है जिसे वैल्डिंग के वक्त इस्तेमाल किया जाता है। और बहुत सी जगहों पर इस को फलों को पकाने के लिये इस्तेमाल किये जाने पर प्रतिबंध है।

अगर आपने कभी देखा हो तो फलों के विक्रेता इस कैमीकल की पुड़िया फलों के बक्सों में रख देते हैं। यह कैमीकल सस्ते में मिल जाता है –50-60रूपये किलो में आसानी से इसे हासिल किया जा सकता है और एक किलो 50-60 किलो आम पकाने के लिये काफी होता है, ऐसा भी मैंने नेट पर ही पिछले दिनों पढ़ा है।

कैल्शीयम कार्बाइड जब नमी (जो कि कच्चे फलों में तो होती ही है) के संपर्क में आता है तो इथीलीन गैस (Ethylene gas) निकलती है, जो फलों को पकाने का काम करती है। और इस क्रिया के दौरान आरसैनिक एवं फॉसफोरस जैसे कैमीकल भी निकलते हैं जो कि हमारे शरीर के प्रमुख अंगों पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं। यहां तक की गुरदे फेल, कैंसर, पेट के अल्सर, सिरदर्द, दस्त आदि तक के खतरे गिनाये गये हैं।

मुझे यही लगता है कि कोई मीटर तो लगा नहीं हुआ हमारे शरीर में यह दर्शाता रहे कि इस ने इतने आम खाये हैं और इतना आरसैनिक या फॉसफोरस इस के शरीर में प्रवेश कर चुका है ....या कोई ऐसा मीटर जो यह बता सके कि इस ने गलत विधि से तैयार किये गये इतने फल खाए इसलिये इस के गुर्दे बैठ गये हैं......डाक्टर लोग भी क्या सकें....उन को भी निश्चिता से कहां चल पाता है कि कैंसर का, गुर्दे फेल होने का या अन्य तरह तरह के भयंकर रोगों की किसी व्यक्ति में जड़ आखिर है कहां ?

बस इसी अज्ञानता की वजह से इस तरह का गोरख-धंधा करने वाले का काम चलता रहता है। किसी जगह पर शायद मैंने यह भी पढ़ा है कि Prevention of Food Adulteration Act (PFA Act) के अंतर्गत भी कैल्शीयम कार्बाइड के इस्तेमाल पर पाबंदी है लेकिन फिर भी हो क्या रहा है, हम चैनलों पर देखते हैं, प्रिंट मीडिया में पढ़ते रहते हैं। पता नहीं क्यों इस तरह का धंधा करने वालों को आम आदमी की सेहत के साथ इतना बड़ा खिलवाड़ करने में ज़रा भी तरस नहीं आता !

मैं कहीं यह पढ़ रहा था कि प्राकृतिक ढंग से तैयार हुये आम  तो जून के अंत से पहले  मार्कीट में आ ही नहीं सकते ..लेकिन इतने बढ़िया कलर के रंगों वाले आम  मई में इन कैमीकल्स की कृपा से ही आने लगते हैं। और एक जगह पढ़ा कि जो आम बिल्कुल एक जैसे पके, बढ़िया कलर के चमकते हुये दिखें वे तो शर्तिया तौर पर इस मसाले से ही पकाये होते हैं। अकसर आपने नोटिस किया होगा कि बाहर से कुछ आम इतने खूबसूरत और अंदर से सड़ा निकलता है या तो स्वाद बिलकुल बकबका सा मिलता है।नेट पर सर्च करने पर आप पाएंगे कि इस तरह से पके आमों की निशानियां भी बताई गई हैं।

स्वाद बकबका निकले या एक-दो आम खराब निकलें बात उस की भी नहीं है, असली मुद्दा है कि हम इन फलों के नाम पर किस तरह से हानिकारक तत्व अपने अंदर इक्ट्ठा किये जा रहे हैं..... और पपीता, केले आदि को भी इन्हीं ढंगों से पकाने की बातें पढ़ने को मिलीं। एक जगह यह भी पढ़ा कि कैल्शीयम कार्बाइड का घोल तैयार किया जाता है और किसी जगह पर यह दिखा कि फलों में इस का इंजैक्शन तक लगाया जाता है – लेकिन इस बात की कोई पुष्टि हुई नहीं .... न ही यह बात मुझे ही हजम हुई .... अब पता नहीं वास्तविकता क्या है, वैसे अगर इस तरह की कैमीकल की पुड़िया के जुगाड़ से ही फल-विक्रेताओं का काम चल रहा है तो वे क्यों इन टीकों-वीकों के चक्कर में पड़ते होंगे। लेकिन इन के गोदामों में क्या क्या चल रहा है, ये तो यही जानें या मीडिया वाले ही हम तक पहुंचा सकते हैं।

जो भी हो, इतना तो तय है कि इस कैमीकल के इस्तेमाल से आरसैनिक एवं फॉसफोरस जैसे हानिकारक पदार्ध निकलते हैं....अब कोई यह समझे की हमने फल धो लिये, छिलके को मुंह नहीं लगाया, काट के चम्मच से खाया .....इस से क्या फल के अंदर जो इन कैमीकल्स से प्रभाव हुआ वह खत्म हो जाएगा, आप को भी लगता है ना कि यह नहीं हो सकता, कुछ न कुछ तत्व तो अंदर धंसे रह ही जाते होंगे।

केला का ध्यान आ रहा है, आज से बीस-तीस साल पहले प्राकृतिक तौर पर पके हुये केले का स्वाद, उस की मिठास ही अलग हुआ करती थी ...और आज केला छील लेने पर जब उसे चखा जाता है तो लगता है कोई गलती कर दी, उसे फैंकने की इच्छा होती है लेकिन उस का रेट ध्यान में आते ही जैसे तैसे निगल लिया जाता है।

अभी अभी एक मित्र ने लिखा कि आखिर करें क्या, जो मिल रहा है बाज़ार में वही तो खाएंगे......मुझे लगता है कि अब हालात इतने खराब हो गये हैं कि या तो पब्लिक फल व्यापारियों पर दबाव बनाए, सरकार दबाव बनाए, पीएफए एक्ट (Prevention of Food Adulteration Act ) के अंतर्गत कड़ी कार्यवाही हो ताकि हम तक सही वस्तुएं पहुंचे।

लेकिन दिल्ली दूर ही लगती है अभी तो....इसलिये मैंने तो पिछले चार पांच दिनों से आम खाना बंद कर दिया है, फिलहाल तो मुझे यही करना आसान लगा , वैसे भी पता नहीं पहले से कितने कैमीकल खा चुके हैं.........पता नहीं कितने दिन आमों से दूर रह पाऊंगा लेकिन अभी तो बंद ही हैं, लेकिन आप  मेरे लिखे ऊपर मत जाइये, स्वयं calcium carbide लिख कर गूगल करिये, फिर सोच विचार कर कोई निर्णय लीजिए।

शनिवार, 25 जून 2011

अस्पतालों के वेटिंग एरिया का वातावरण

अस्पतालों के वेटिंग एरिया की तरफ़ शायद इतना ध्यान दिया नहीं जाता। मैंने अपने एक लेख में लिखा था कि अकसर अस्पतालों में आप्रेशन के द्वारा निकाली गई रसौलीयां या ट्यूमर आदि का प्रदर्शन वेटिंग एरिया में किया जाता है।

एक बार एक महिला रोग विशेषज्ञ के यहां बहुत से कांच के मर्तबान देख कर बहुत अचंभा हुआ ---और इनमें सब तरह के स्पैसीमैंस भरे हुये थे.... हम स्वयं से अनुमान लगा सकते हैं कि वहां जाने वाला एक मरीज़ इन सब को देख कर कितनी सहजता अनुभव कर पाता होगा।

आज से 15-20 साल पहले मुझे लगता था कि हैल्थ-ऐजुकेशन के लिये अस्पतालों के वेटिंग एरिया एक अच्छा स्थान है। लेकिन अब मेरी यह राय बदलने लगी है।

एक अस्पताल में देखा – एक विदेशी परिवेश में एक महिला की तस्वीर लगी हुई थी और साथ में मीनूपाज़ के ऊपर बहुत लंबा चौडा लिखा हुआ था –बिलकुल छोटा छोटा प्रिंट और भारी भरकम अंग्रेज़ी –अब कौन पढ़े इस सब को नज़र का चश्मा गढ़ा के। मैंने तो कभी इन पोस्टरों को किसी को पढ़ते देखा नहीं।

और भी कईं तरह के पोस्टर लगे थे ...सब के सब अंग्रेज़ी में.. एक तो ओसटियोपोरोसिस का पोस्टर ज़रूर हर जगह लगा दिखता है ---कि सब लोग इसके लिये ज़ूरूर अपनी जांच करवाएं। और साथ में एक बड़ा सा पोस्टर की हृदय की नाड़ीयों का बहाव कैसे रूकता है और कैसे हार्ट अटैक होता है। सब कुछ इतनी जटिल अंग्रेज़ी भाषा में दिखता है कि पहले तो कोई इन सब को पढ़ने के लिये उठे ही नहीं और और अगर उठ भी जाए तो दो मिनट में सिर दुखने लगे।

एक बात और भी है कि इन विज्ञापनों के पीछे मार्कीट शक्तियों का भी बहुत हाथ रहता है। अकसर इन पोस्टरों पर तरह तरह की दवाईयों अथवा सप्लीमैंट्स के विज्ञापन भी छपे रहते हैं। ओवरआल कुछ मज़ा सा नहीं आता यह सब देख कर।

हां, कईं जगह पर टीवी पर वही घिसी पिटी हिंदी मसाला मूवी ऊंची आवाज़ में लगी होती हैं..... वेटिंग रूम में इंतज़ार करने वालों की दशा एक सी कहां होती है ---किसी के मरीज़ के हालत की बिगड़ रही होती है, किसी की ठीक हो रही होती है, किसी के परिजन को डाक्टर ने जवाब दे दिया है .....ऐसे में कहां किसी को गोबिंदा या जलेबीबाई का नृत्य भाएगा।

मेरे विचार में अकसर जो थोड़ी बहुत जानकारी हम लोग जनता तक पहुंचाना चाहते हैं वह या तो हिंदी भाषी में होनी चाहिये ----बिल्कुल हल्की भाषा में – और क्षेत्रीय भाषा का भी सहारा लिया जा सकता है। बड़े शहरों में इस के साथ साथ अंग्रेज़ी का सहारा भी लिया जा सकता है। इस के अलावा कुछ भी केवल डराने का काम करता है।

मैंने अपने एक पुराने लेख में लिखा था कि बंबई के एक चिकित्सक के यहां मैंने एक बार यह पोस्टर देखा था ...
Seek the will of God
Nothing More
Nothing less
Nothing else


इस तरह के पोस्टर देख कर अच्छा लगता है। और अगर इन जगहों पर सुंदर पोस्टर लगाये जा सकें जो सहजता कायम रखने में मदद करें। ध्यान आ रहा है नन्हे मुन्ने बच्चों के हंसते-किलकारियां मारते हुये पोस्टरों का – एक पोस्टर और भी दिखता है कि जिन में एक नंग-धडंग शिशु ने अपने मुंह पर अंगुली रखी हुई है, साथ में लिखा है ...silence. और तरह तरह की प्राकृतिक दृश्यों को वेटिंग रूम में लगाया जा सकता है –बर्फ से ढके पर्वत, झरने, घने जंगल, समुंद्र का नज़ारा------कितने नज़ारे हैं इस संसार में....इन सब से इंतज़ार करने वाले लोगों का ध्यान बंटता है ....वे थोडा रिलैक्स कर पाते हैं।

और देवी देवताओं की तस्वीरें --- मुझे इस में थोड़ी आपत्ति है--- 36 करोड़ देवी देवताओं को मानने वाले इस देश में किस किस को दीवारों पर सजाएंगे, जिस किसी के भी इष्ट-देव उस प्रतीक्षालय में लगे नहीं दिखेंगे, वह बेचारा यूं ही किसी अनिष्ट की संभावना से परेशान होता रहेगा। इस संसार में सभी डाक्टरों का कोई धर्म नहीं होता, यह बहुत सुखद बात है.....उस के मरीज़ केवल एक मरीज़ है .....लेकिन यह उस के वेटिंग रूम में दिखना भी चाहिये। हम जिस धर्म को, धर्म-गुरू, साधु-संत-फकीर, देवी देवता को मानते हैं, यह हमारा पर्सनल मामला है.................इस का प्रदर्शन कहां ज़रूरी है। अथवा हमें अपने ऊपर धार्मिक का लेबल चिपका कर क्या हासिल हो जाएगा।

मैं एक चिकित्सक को जानता हूं उस ने अपनी सभी अंगलियों में तरह तरह की अंगुठियां, नग आदि पहने हुये हैं......हम लोग कईं बार उस के बारे में सोच कर बहुत हंसते हैं ...और तो और देवी देवताओं की अनेकों अनेकों तस्वीरें भी उस ने अपने कमरे में टांग रखी हैं ...लेकिन फिर भी ............चलिये, इस बात को इधर ही छोड़ते हैं।

डाक्टर अगर स्वयं ही इस तरह की अंध-श्रद्धा में विश्वास रखता दिखाई देगा तो जादू, टोनो, तांत्रिकों, झाड़-फूंक, भूत-प्रेतों जैसे अंधविश्वासों से जकड़े हुये आम आदमी का क्या होगा......कुछ चीज़ें हमें जान बूझ कर इस आम आदमी के हितों को ध्यान में रख कर करनी होती हैं और कुछ इन्हीं कारणों से नहीं करनी होतीं......ताकि लोगों तक संदेश ठीक पहुंचे।

सोमवार, 9 मई 2011

गुप्त रोगों के लिये नेट पर बिकने वाली दवाईयां

बचपन में स्कूल आते जाते देखा करते थे कि दीवारों पर अजीबो-गरीब विज्ञापन लिखे रहते थे....गुप्त-रोगों का शर्तिया इलाज, गुप्त रोग जड़ से खत्म, बचपन की गल्तियों की वजह से खोई ताकत हासिल करने के लिये आज ही मिलें, और फिर कुछ अरसे बाद समाचार-पत्रों में विज्ञापन दिखने शुरू हो गये इन ताकत के बादशाहों के जो ताकत बेचने का व्यापार करते हैं।

इस में तो कोई शक नहीं कि ये सब नीम हकीम भोली भाली कम पढ़-लिखी जनता को कईं दशकों से बेवकूफ बनाए जा रहे हैं....बात केवल बेवकूफ बनाए जाने तक ही सीमित रहती तो बात थी लेकिन ये लालची इंसान जिन का मैडीकल साईंस से कुछ भी लेना देना नहीं है, ये आज के युवाओं को गुमराह किये जा रहे हैं, अपनी सेहत के बारे में बिना वजह तरह तरह के भ्रमों में उलझे युवाओं को भ्रमजाल की दलदल में धकेल रहे हैं...... और इन का धंधा दिनप्रतिदिन बढ़ता जा रहा है ...अब इन नीमहकीमों ने बड़े बड़े शहरों में होटलों के कमरे किराये पर ले रखे हैं जहां पर जाकर ये किसी निश्चित दिन मरीज़ों को देखते हैं।

यह जो कुछ भी ऊपर लिखा है, इस से आप सब पाठक भली भांति परिचित हैं, है कि नहीं ? ठीक है, आप यह सब पहले ही से जानते हैं और अकसर जब हम यह सब देखते, पढ़ते, सुनते हैं तो यही सोचते हैं कि अनपढ़ किस्म के लोग ही इन तरह के नीमहकीमों के शिकार होते होंगें.....लेकिन ऐसा नहीं है।

हर जगह की, हर दौर की अपनी अलग तरह की समस्याएं हैं..... अमेरिकी साइट है –फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (Food and Drug Administration) ..कल जब मैं उस साइट को देख रहा था तो अचानक मेरी नज़र एक आर्टिकल पर रूक गई। एफडीआई द्वारा इस लेख के द्वारा लोगों को कुछ पंद्रह तरह के ऐसे उत्पादों के बारे में चेतावनी दी गई है जो गल्त क्लेम करती हैं कि वे यौन-संक्रमित रोगों (sexually-transmitted diseases –STDs--- हिंदोस्तानी भाषा में कहें तो गुप्त रोग) से बचाव करती हैं एवं इन का इलाज करने में सक्षम हैं। इस के साथ ही एक विशेषज्ञ का साक्षात्कार भी था।

आम जनता को चेतावनी दी गई है कि ऐसी कोई भी दवाई नहीं बनी जिसे कोई व्यक्ति अपने आप ही किसी दवाई से दुकान से खरीद ले (over-the-counter pills) अथवा इंटरनेट से खरीद ले और यौन-संक्रमित से बचा रह सके और इन रोगों का इलाज भी अपने आप कर सके। ये जिन दवाईयों अथवा फूड-सप्लीमैंट्स के बारे में यह चेतावनी जारी की गई है, उन के बारे में भी यही कहा गया है कि इन दवाईयों के किसी भी दावे को एफडीआई द्वारा जांचा नहीं गया है।

यौन-संक्रमित रोग होने की हालत में किसी सुशिक्षित विशेषज्ञ से परामर्श लेना ही होगा और अकसर उस की सलाह अनुसार दवा लेने से सब कुछ ठीक ठाक हो जाता है लेकिन ये देसी ठग या इंटरनेट पर बैठे ठग बीमारी को ठीक होना तो दूर उस को और बढ़ाने से नहीं चूकते, साथ ही साथ चूंकि दवाई खाने वाले को लगता है कि वह तो अब दवाई खा ही रहा है (चाहे इलाज से इस तरह की दवाईयों को कोई लेना देना नहीं होता) इसलिये इस तरह की यौन-संक्रमित रोग उसके सैक्सुयल पार्टनर में भी फैल जाते हैं।

आज की युवा पीढ़ी पढ़ी लिखी है, सब कुछ जानती है, अपने शरीर के बारे में सचेत हैं लेकिन इंटरनेट पर बैठे ठग भी बड़े शातिर किस्म के हैं, इन्हें हर आयुवर्ग की कमज़ोरियों को अच्छे से जानते हैं ....अकसर नेट पर कुछ प्रॉप-अप विज्ञापन आते रहते हैं –दो दिन पहले ही कुछ ऐसा विज्ञापन दिखा कि आप अपने घर की प्राइवेसी से ही पर्सनल वस्तुएं जैसे की कंडोम आदि आर्डर कर सकते हैं ताकि आप को मार्कीट में जाकर कोई झिझक महसूस न हो। चलिए, यह तो एक अलग बात थी लेकिन अगर तरह तरह की बीमारियों के लिये (शायद इन में से बहुत सी काल्पनिक ही हों) स्वयं ही नेट पर दवाई खरीदने का ट्रेंड चल पड़ेगा तो इंटरनेट ठगों की तो बांछें खिल जाएंगी ........ध्यान रहे कि इन के जाल में कभी न फंसा जाए क्योंकि आज हरेक को प्राईव्हेसी चाहिए और यह बात ये इंटरनेट ठग अच्छी तरह से जानते हैं।

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बुधवार, 4 मई 2011

यह कैसा स्मोकिंग बैन हुआ!

आज पता चला कि चीन में जितने स्मोकर हैं उतने किसी देश में भी नहीं.... थोड़ा सा इत्मीनान हुआ कि चलो इस काम में तो हम अभी पीछे हैं। हां, तो खबर थी कि चीन में स्मोकिंग पर बैन तो लग गया है लेकिन स्मोकिंग करने वाले को किसी दंड की बात नहीं कही गई है।

और एक बात, स्मोकिंग को रेस्टरां, होटलों, पब्लिक जगहों पर तो बैन किया गया है (वह भी बिना किसी दंड के!!) लेकिन दफ्तरों में ऐसा कोई बैन नहीं लगाया गया है। बड़ी हैरानी सी हुई यह पढ़ कर ...और अगर बीबीसी साइट पर यह लिखा है तो खबर विश्वसनीय तो है ही।
  
The new rules prohibit smoking in places like restaurants, hotels, railway stations or theatres, but not at the office.    ......BBC Story... China Ban on Smoking in Public Places
यह खबर पढ़ कर इत्मीनान तो आप को भी होगा कि चलिये कुछ भी हो, कुछ स्मोकिंग करने वाले लोग ढीठ किस्म के हों, हट्ठी हों, अड़ियल हो, गुस्सैल हों, और चाहे अक्खड़ ही क्यों न हों, जिन्हें आप अपनी जान की सलामती की परवाह किये बिना स्मोकिंग न करने का मशविरा देने की हिम्मत न जुटा पाते हों, लेकिन एक बढ़िया सा कानून तो है जिस के अंतर्गत ज़ुर्माने आदि का प्रावधान तो है, इस से ज़्यादा जानकारी इस कानून के नुकीले दांतों के बारे में मुझे भी नहीं है।

बीबीसी की इस स्टोरी में यह भी लिखा है कि किस तरह चीन के लोग स्मोकिंग के दुष्परिणामों से अनभिज्ञ हैं, वैसे यह बड़ी ताजुब्ब की बात है कि रेस्टरां, होटल में कोई खाना खा रहा है तो साथ वाले टेबल पर कोई सिगरेट फूंके जा रहा है जिस का धूंआ आप को परेशान कर रहा है। कम से कम मुझे यह सब भारत में तो देखने को नहीं मिलता। और वहां चीन में रेस्टरां वालों का कहना है कि वे किसी को सिगरेट सुलगाने के लिये मना भी नहीं कर सकते क्योंकि लोग बुरा मान जाते हैं।

और एक मजबूरी चीन में यह है कि वहां पर सिगरेटों का सारा धंधा एक सरकारी कंपनी के ही पास है जिससे सरकार को बेशुमार फायदा होता है .....अब समझ में बात आई कि स्मोकिंग का कानून तो बन गया है लेकिन दंड का प्रावधान नहीं है।

लेकिन सोच रहा हूं कि इस खबर से मैं क्यों इतना इतरा रहा हूं ...अगर हमारे यहां पर पब्लिक जगहों पर स्मोकिंग करने पर बैन है और इस के लिये जुर्माने आदि का भी प्रावधान है और शायद कुछ दंड का भी ...देखिये मेरा जी.के कितना खराब है, कि कानून का ठीक से पता ही नहीं है, कुछ लिखा तो होता है अकसर इन सार्वजनिक जगहों पर जहां कुछ बीड़ीबाजों के सिर के ऊपर एक तख्ती सी टंगी तो रहती है कि यहां धूम्रपान करने पर इतने रूपये का जुर्माना लगाया जायेगा और ,...........कुछ ध्यान में आ नहीं रहा। लेकिन इन लोगों को स्मोकिंग करने से रोकने के कुछ अपने अनुभव मैं अपने पुराने लेखों में लिख चुका हूं।

अब मैंने तो स्मोकिंग के विरूद्ध जंग का एक नया रास्ता अपना लिया है, अपने मरीज़ों को तो बीडी-सिगरेट-तंबाकू के खिलाफ़ बताता ही हूं लेकिन उस के मन में यह भी अच्छी तरह से डाल देता हूं कि काम करने वाली जगह पर जो तुम्हारा साथी बीड़ी फूंकता रहता है वह भी तुम्हारे लिये बड़ी नुकसानदायाक है, नुकसान केवल कश खींचने वाले तक ही महदूद नहीं है, यह धुआं जिधर भी जायेगा बीमारी ही पैदा करेगा।

इस लेख को समाप्त करते वक्त उस गीत का ध्यान आ गया .......अल्ला करम करना......



हुक्का पार्लर का नशा .... दम मारो दम !

आज एक युवक ने मेरे से पूछा कि यह जो शहर में हुक्का-ज्वाईंट खुला है, उसके बारे में मेरा क्या ख्याल है। मैं बड़ा हैरान हुआ यह सुन कर कि हमारे जैसे छोटे शहर में भी यह खुल गया है, विदेशों में और महानगरों में तो सुना था कि इस तरह के पार्लर खुल गये हैं, लेकिन छोटे छोटे शहरों में भी अब यह सब !!

वह युवक मुझे बता रहा था कि यह ज्वाईंट आजकल कालेज के छात्र-छात्राओं में पापुलर होने लगे हैं। उस ने यह भी बताया कि अकसर ऐसी जगहों पर जाने वालों का कहना है कि इस तरह का “मीठा हुक्का” गुड़गड़ाने से कुछ नहीं होता, इस का कोई नुकसान नहीं है।

कालेज की उम्र होती ही नई नई चीज़ों को ट्राई करने के लिये है ...ऐसे में इस तरह के हुक्का पार्लर खुलना अपने आप में खतरे का संकेत है। और जहां तक हुक्का पीने की बात है, तंबाकू तो है ही जिसे पिये जा रहा है, तो फिर ज़हर तो ज़हर है ही ....इस में कोई दो राय हो ही नहीं सकती।

Planning to bunk classes to gang up at a hookah parlour?

मुझे तो यकीन है कि ऐसे पार्लर खोलने के पीछे युवकों को तंबाकू की लत लगाने की साज़िश है, जिन युवकों की ज़िंदगी तंबाकू के बिना सीधी लाइन पर चल रही है, क्यों उन की ज़िंदगी में ज़हर घोलने का षड़यंत्र रचा जा रहा है। कुछ ही दिन ये हुक्का-वुक्का गुड़गुड़ाने के बाद ऐसा हो ही नहीं सकता कि उन्हीं युवकों के हाथ में सिगरेट न हों, जब कि हमें पता ही है कि सिगरेट की लत लगाने के लिये मज़ाक मज़ाक में केवल एक सिगरेट पिया जाना ही काफ़ी है।

उस युवक ने कहा कि यह जो हुक्का पीने के लिये सभी लोग एक ही पाइप का इस्तेमाल करते हैं, यह भी सेहत के लिये ठीक नहीं होगा, बिल्कुल यह भी सेहत के लिये खतरा है क्योंकि कितनी ही ऐसी बीमारियां हैं जिन के कीटाणु/विषाणु लार में मौजूद रहते हैं।

और इस तरह के पार्लरों को युवकों में लोकप्रिय करना कोई मुश्किल काम थोड़े ही है, इस तरह का धंधा करने वाले सभी तरह के हथकंडे अपनाने से कहां चूकने वाले हैं। इसलिये युवकों को ही इन सब से बच कर रहना होगा।

जब हम लोग पांचवी छठी कक्षा में पढ़ा करते थे तो हमारे स्कूल के पास एक दुकान हुआ करती थी जिस के आगे से निकलना बहुत मुश्किल सा लगा करता था ... भयानक बदबू निकला करती थी उस दुकान से.....धीरे धीरे पता चला कि उस दुकान पर तंबाकू बिका करता था, उन दिनों इतना यह सब पता नहीं होता था कि इस का लोग क्या करते हैं, लेकिन अब ध्यान आता है कि वह सूखे तथा गीले तंबाकू (Tobacco leaves, Moist tobacco) की दुकान थी जहां पत्थरों जैसे दिखने वाले काले जैसे रंग के गीले तंबाकू के बड़े बड़े ढेले पड़े रहते थे। इन्हें हुक्के में इस्तेमाल किया जाता होगा और सूखे तंबाकू की पत्तियों को चूने के साथ रगड़ के चबाया जाता होगा।


इन हुक्का पार्लरों से मन जब जल्दी ही युवकों का मन ऊब सा जाएगा तो शायद इस के आगे की स्टेज यह गीत दिखा रहा है .....


रविवार, 1 मई 2011

पतला करने वाले हर्बल जुगाड़..सावधान !

काफी समय से यह खबरें तो सुनने में आ ही रही हैं कि कुछ हर्बल दवाईयों में, या कुछ देसी दवाईयों में एलोपैथिक दवाईयों को डाल दिया जाता है जिस के बारे में पब्लिक को कुछ बताया नहीं जाता। इस का परिणाम यह होता है कि उस दवाई से कुछ अप्रत्याशित परिणाम निकलने से लोगों को नुकसान हो जाता है। इस पर मैंने पहले भी बहुत से लेख लिखे हैं।

अभी मैं बीबीसी की साइट पर यह न्यूज़-स्टोरी देख रहा था कि किस तरह से यूरोपीयन देशों में हर्बल दवाईयों पर शिकंजा कसा जा रहा है। अनेकों दवाईयां ऐसी बिक रही हैं जिन की प्रामाणिकता, जिन की सेफ्टी प्रोफाइल के बारे में कुछ पता ही नहीं ...इसलिये वहां पर कानून बहुत कड़े हो गये हैं।
New EU regulations on herbal medicines come into force....(BBC Health)

लेकिन भारत में क्या है, देसी दवाईयों की तो वैसे ही भरमार है, लेकिन जगह जगह पर मोटापा कम करने वाले कैप्सूल, हर्बल दवाईयों के इश्तिहार चटका कर भोली भाली जनता को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है।

आज सुबह मैं टीवी पर देख रहा था कि एक हर्बल चाय का विज्ञापन दिखाया जा रहा था ... दो महीने के लिये 2000 रूपये  का कोर्स –मोटापा घटाने के लिये इसे रोज़ाना कईं बार पीने की सलाह दी जा रही थी। और विज्ञापन इतना लुभावना की मोटापे से परेशान कोई भी शख्स कर्ज़ लेकर भी इस खरीदने के लिये तैयार हो जाये।

मैं उस विज्ञापन को देखता रहा –बाद में जब उस में मौजूद पदार्थों की बात आई तो बहुत बढ़िया बढ़िया नाम गिना दिये गये ..जिन्हें सुन कर कोई भी प्रभावित हो जाए... और साथ में इस चाय में चीनी हर्बल औषधियों के डाले जाने की भी बात कही गई।

इस तरह के हर्बल प्रोडक्ट्स से अगर विकसित देशों के पढ़े लिखे लोग बच नही पाये तो इस देश में किसी को कुछ भी बेचना क्या मुश्किल काम है?
वजन कम करने वाली दवाईयों के बारे में चेतावनी 

बात केवल इतनी सोचने वाली है कि ऐसा क्या फार्मूला कंपनियों के हाथ लग गया कि इन्होंने एक चाय ही ऐसा बना डाली जिस से इतना वज़न कम हो जाता हो......मेरी खोजी पत्रकार जैसी सोच तो यही कहती है कि कुछ न कुछ तो लफड़ा तो होता ही होगा.....अगर सब कुछ हर्बल-वर्बल ही है तो इस देश में इतने महान् आयुर्वैदिक विशेषज्ञ हैं, वे क्यों इन के बारे में नहीं बोलते ....क्यों यह फार्मूला अभी तक रहस्य ही बना हुआ है?

पीछे भी कुछ रिपोर्टें आईं थीं कि मोटापे कम करने वाले कुछ उत्पादों में कुछ ऐसी एलोपैथिक दवाईयों की मिलावट पाई गई जिस से भयंकर शारीरिक परेशानियां इन्हें खाने वालों में हो गईं........तो फिर इस से सीख यही लें कि ऐसे ही हर्बल वर्बल का लेबल देख कर किसी तरह के झांसे में आने से पहले कम से कम किसी की सलाह ले लें, और अगर हो सके तो ऐसी हर्बल दवाई की लैब में जांच करवा लें, लेकिन क्या ऐसी जांच वांच करवाना सब के वश की बात है!!

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

स्तनपान लोकप्रिय तो हो ही रहा है !

कभी कभी कोई समाचार पढ़ कर अच्छा लगता है ... कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर देख कर भी ऐसा ही हुआ। खबर यह थी कि इंडियन एकेडमी ऑफ पिडिएट्रिक्स ने अपने लगभग 1800 सदस्यों को बच्चों का पावडर दूध बनाने वाली कंपनियों द्वारा आयोजित सैमीनारों में जाकर लैक्चर अथवा डेलीगेट के तौर पर सम्मिलित होने से मना किया है....Doctors must shun baby food seminars: IAP


इंडयिन एकेडमी ऑफ पिडिएट्रिक्स (आई ए पी) शिशु-रोग विशेषज्ञों का संगठन है जिस ने स्तनपान को इतना लोकप्रिय बनाये जाने के लिये सराहनीय काम किया है। दरअसल होता यह है कि आजकल देश में बच्चों के लिये डिब्बे वाला दूध (infant milk substitute) की पब्लिसिटी से संबंधित कानून काफी कड़े हैं, लेकिन लगता है कि ऐसे उत्पाद बनाने वालों ने इस का भी कुछ तोड़ (जन्मजात जुगाड़ू तो हम हैं ही!) निकाल कर तरह तरह की रिसर्च इंस्टीच्यूट आदि खोल ली हैं जिन पर ये नामचीन शिशुरोग विशेषज्ञों को लैक्चर देने के लिये आमंत्रित करती हैं...और बहुत से विशेषज्ञ इन्हें सुनने के लिये उमड़ भी पड़ते हैं, इसलिये आईएपी को अपने सदस्यों को ये दिशा-निर्देश जारी करना पड़ा।

टाइम्स के जिस पन्ने पर यह अच्छी खबर थी उसी पन्ने पर एक और बढ़िया खबर दिख गई ....इस खबर से यह पता चल रहा था कि स्तन-पान काम-काजी पढ़ी लिखी महिलाओं में भी पापुलर हो रहा है। कुदरत के इस अनमोल वरदान के जब शिशुओं के लिये (और मां के लिये भी) इतने फायदे हैं तो फिर कैसे माताएं अपने शिशुओं को इस से वंचित रख सकती हैं....Stored Breast milk.

हां, तो मैं उस खबर की बात कर रहा था जिस में यह बताया गया है कि कामकाजी महिलाओं ने अपने शिशुओं को स्तनपान करवाने का अनूठा ढंग ढूंढ लिया है। वे काम पर जाने से पहले अपने स्तनों से या तो स्वयं ही दूध निकाल कर जाती हैं अथवा एक ब्रेस्ट-पंप की मदद से दूध निकाल कर रख जाती हैं ताकि उन की अनुपस्थिति में शिशु अपनी खुराक से वंचित न रहे। अच्छा लगा यह पढ़ कर .... आज समय की मांग है कि इस तरह की प्रैक्टिस को लोकप्रिय बनाने के जितने प्रयास किये जाएं कम हैं।

मुझे यह लेख लिखते हुये ध्यान आ रहा है बंबई के महान् शिशुरोग विशेषज्ञ .... डा आर के आनंद का .... इन का क्लीनिक बंबई के चर्नी रोड स्टेशन के बिल्कुल पास है और यह मैडीकल कालेज के एक रिटायर्ड प्रोफैसर हैं। मैं अभी तक केवल चार पांच डाक्टरों से बेहद प्रभावित हुआ हूं और इन में से एक यह शख्स हैं। लोग तो कहते हैं ना कि कुछ डाक्टरों से बात कर के आधा दुःख गायब हो जाता है, लेकिन यह शख्स ऐसे दिखे कि जिन के दर्शन मात्र से ही जैसे लोगों को राहत महसूस होने लगती थी. होता है कुछ कुछ लोगों में यह सब ........मुझे याद है कि 1997-98 के दौरान हम अपने छोटे बेटे को वहां रूटीन चैक-अप के लिये लेकर जाया करते थे ....और हमें उन दिनों पेपरों से पता चलता था कि इन्होंने ब्रेस्ट-मिल्क को अपनाने के लिये कितनी बड़ी मुहिम छेड़ रखी थी।

औपचारिक ब्रेस्ट मिल्क सप्ताह तो सब जगह मनाया ही जाता है .... लेकिन यह महान् शिशुरोग विशेषज्ञ उस सप्ताह जगह जगह पर सैमीनार आयोजित किया करते थे ...विशेषकर मुंबई में चर्चगेट पर एक यूनिवर्सिटी है ...SNDT Women’s University …. वहां पर एक सैमीनार ज़रूर हुआ करता था जिस में ये कामकाजी और घरेलू ऐसी महिलाओं को उन के शिशुओं के साथ आमंत्रित किया करते थे जो अपने शिशुओं को निरंतर स्तनपान करवा रही हैं। ऐसे ही एक सैमीनार में मेरी पत्नी को भी आमंत्रित किया गया था ...वहां पर इन्हें सब के साथ अपने अनुभव बांटने होते थे। A great inspiration for so-many would-be mothers! इन्होंने ब्रेस्ट-फीडिंग पर एक बहुत बढिया किताब भी लिखी थी ... मुझे याद है हम लोग जहां कहां भी किसी नवजात् शिशु को देखने जाते थे उस की मां को इस किताब की एक प्रति अवश्य देकर आया करते थे।

मैं सोच रहा हूं कि सरकार भी भरसक प्रयत्न कर रही है.... मैटरनिटी लीव और चाईल्ड-केयर लीव के बावजूद भी अगर स्तनपान में कहीं कमी रहती है तो फिर यह दोष किस पर मढ़ा जाए......

अब स्तनपान के फायदे गिनाने के दिन लद गये ...इस बात का इतना ज़्यादा प्रचार-प्रसार सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किया जा चुका है और लगातार जारी है कि अब तो इस प्रैक्टिस को अपनाने के नये नये ढंगों की बात होनी चाहिये। हां, तो मैं बात कर रहा था उन पावडर-दूध बनाने वाली कंपनियों की जो तरह तरह के आयोजन इस बारे में कर रही हैं ताकि समय से पहले जन्मे शिशुओं की सही खुराक (nutrition of pre-term babies) के बहाने ही अपने उत्पादों को बढ़ावा दे सकें ...लेकिन शिशुरोग विशेषज्ञों के संगठन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की बात हम पहले ही कर चुके हैं।

और जहां तक ऐसे प्री-टर्म पैदा हुये शिशुओं की खुराक की बात है या ऐसी माताएं जो किसी रोग की वजह से अथवा किसी भी अन्य कारण के रहते शिशुओं को स्तन-पान करवाने में असमर्थ हैं, उन के लिये एक विकल्प है.... स्तन-दूध बैंक (Breast milk bank). अभी कुछ अरसा पहले ही मैंने अपने टंब्लर ब्लॉग पर एक छोटी सी पोस्ट लिखी थी जिस में ब्राज़ील में चल रहे स्तन-दूध बैंकों की बात कही गई थी ... ऐसी माताएं जिन को अपने शिशु की ज़रूरत पूरी करने के बाद भी दूध ज़्यादा पड़ता है, वे उन ज़रूरतमंद शिशुओं के लिये अपने स्तन-दूध का दान करती हैं जिसे रैफ्रीज़रेट किया जाता है और फिर स्तन-पान से वंचित बच्चों को दिया जाता है।

बस आज के लिये इतना ही काफ़ी है, लेकिन जाते जाते स्तन-दूध से तैयार उस आइसक्रीम वाली खबर सुन कर कुछ अजीब  सा लगा था .... बहुत हल्की खबर लगी थी कि ब्रेस्ट मिल्क से तैयार की गई आइसक्रीम के पार्लर खुलने की बात की जा रही थी। स्तन-दूध जिस पर केवल नवजात् शिशुओं का जन्मसिद्ध अधिकार है ... फिर चाहे यह अपनी मां का हो या किसी दूसरी मां का जिस ने इस का दान देकर महादान की एक अनूठी उदाहरण पस्तुत की हो...... जी हां, यह दान भी रक्तदान की तरह महादान ही है जो कुछ देशों में चल रहा है।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

औरतों के बिना वजह आप्रेशन ...लेकिन कहे कौन ?

आज से पच्चीस-तीस पहले लोगों ने दबी-सी मंद आवाज़ में यह चर्चा शुरू करनी कर दी थी कि आज कल इतने ज़्यादा बच्चे बड़े आप्रेशन से ही क्यों पैदा होने लगे हैं। जब यह सिलसिला आने वाले समय में थमा नहीं, तो लोगों ने इस के बारे में खुल कर कहना शुरू कर दिया। मीडिया में इस विषय को कवर किया जाने लगा कि पहले तो इतने कम केसों में इस बड़े आप्रेशन की ज़रूरत पड़ा करती थी लेकिन अब क्यों यह सब इतना आम हो गया है?

मैं न तो स्त्री रोग विशेषज्ञ ही हूं और न ही इस संबंध में किसी विशेषज्ञ का साक्षात्कार कर के ही आया हूं लेकिन यह तो है कि जब मीडिया में यह बात उछलने लगी तो कहीं न कहीं उंगलियां मैडीकल प्रोफैशन की तरफ़ भी उठने लगीं, यह सब जग-ज़ाहिर है। दौर वह भी देखा कि लोग डिलिवरी के नाम से डरने लगे कि इस पर इतना ज़्यादा खर्च हो जायेगा।

लेकिन आप को क्या लगता है कि मीडिया में इतना हो-हल्ला उठने के बाद कुछ फर्क पड़ा? ....उन दिनों यह भी बात सामने आई कि कुछ उच्च-वर्ग संभ्रांत श्रेणी से संबंध रखने वाले लोग डिलिवरी नार्मल करवाने की बजाए बड़ा आप्रेशन इसलिये करवा लिया करते थे या करवा लेते हैं ताकि सब कुछ “पहले जैसा” बना रहे......यह भी एक तरह की भ्रांति ही है क्योंकि साईंस यही कहती है कि सब कुछ पहले जैसा ही “मेनटेन” रहता है, सब कुछ पहले जैसे आकार एवं स्थिति में शीघ्र ही आ जाता है।

मैं अकसर सोचता हूं कि जिस तरह से जबरदस्त हो-हल्ला मचने के बाद दूध में मिलावट बंद नहीं हुई, रिश्वतखोरी बंद नहीं हुई, जबरदस्ती ट्यूशनों पर बुलाना बंद नहीं हुआ, एक कड़े कानून के बावजूद कन्या भ्रूण हत्या बंद नहीं हुई, पब्लिक जगहों पर बीड़ी-सिगरेट पीने से लोग नहीं हटे, दहेज के कारण नवविवाहितें जलाई जानी कम नहीं हुई, कुछ प्राव्हेट स्कूलों का लालच नहीं थमा......और भी अनेकों उदाहरणें हैं जो नहीं हुआ.....ऐसे में यह बड़े आप्रेशन द्वारा (सिज़ेरियन सैक्शन) द्वारा बच्चे पैदा होने का सिलसिला कैसा थम सकता है, सुना है अब लोग इस के भी अभ्यस्त से हो गये हैं, क्या करें जब जान का सवाल हो तो चिकित्सा कर्मी की बात मानने के अलावा चारा भी क्या रह जाता है!


चलिए, इस बात को यहीं विराम देते हैं .... जिस बात का कोई हल ही नहीं, उस के बारे में जुबानी जमा-घटा करने से क्या हासिल। लेकिन एक नया मुद्दा कल की टाइम्स ऑफ इंडिया में दिख गया .... राजस्थान के दौसा जिले में पिछले छः महीने में 226 महिलाओं का गर्भाशय आप्रेशन के द्वारा निकाल दिया गया। न्यूज़-रिपोर्ट में तो यह कहा गया है कि यह सब कुछ पैसे के लिये किया गया है..... चलिए मान भी लें कि मीडिया वाले थोड़ा मिर्च-मसाला लगाने में एक्सपर्ट तो होते ही हैं लेकिन बात सोचने वाली यह भी तो है अगर धुआं निकला है तो कहीं न कहीं कुछ तो होगा !!

इस खबर में यह बताया गया है कि तीन प्राइवेट अस्पताल जो राज्य सरकार की जननी सुरक्षा योजना के लिये काम कर रहे हैं इन में ये आप्रेशन किये गये हैं। बांदीकुई में काम कर रहे एक गैर-सरकारी संगठन – अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत ने इन सब बातों का पता सूचना के अधिकार अधिनियम का इस्तेमाल कर के लगाया। और यह संस्था यह आरोप लगा रही है कि चिकित्सकों ने बारह हज़ार से चौदह हज़ार रूपये कमाने के चक्कर में महिलाओं का यूट्रस (गर्भाशय, बच्चेदानी) आप्रेशन कर के निकाल दिया। रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि महिलाओं को यहां तक डराया गया कि अगर वे बच्चेदानी नहीं निकलवाएंगी तो वे मर जाएंगी। 90 प्रतिशत महिलाएं ओबीसी, शैड्यूल्ड कॉस्ट, शैड्यूल्ड ट्राईब से संबंध रखती थीं जिन की उम्र 20 से 35 वर्ष थीं। जैसा कि अकसर ऐसे बातें बाहर आने पर होता है, मामले की जांच के लिये एक कमेटी का गठन हो चुका है जिस की रिपोर्ट 15 दिन में आ जायेगी।

चलिये, रिपोर्ट की इंतज़ार करते रहिए...........मैं यह न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ते यही सोच रहा था कि पता नहीं राजस्थान की महिलायें पर ही सारा कहर क्यों बरप रहा है, अभी हम लोग उदयपुर में गर्भवती महिलाओं को प्रदूषित ग्लूकोज़ चढ़ाए जाने से 14-15 महिलाओं की दुर्भाग्यपूर्ण को भूल ही नहीं पाये हैं कि यह बिना वजह आप्रेशन वाली बात सामने आ गई है।

तो क्या आपको लगता है कि इस तरह के आप्रेशन केवल राजस्थान के दौसा ज़िले में ही हो गये होंगे --- नहीं, ये इस देश के हर ज़िले में होते होंगे, देश ही क्यों विदेशों में भी यह समस्या तो है ही.... लेकिन इतनी ज़्यादा नहीं है ---यहां पर गरीबी, अनपढ़ता और शोषण हमारी मुश्किलों को और भी जटिल बना देती है।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि कुछ अरसा पहले मैं अंबाला से दिल्ली शताब्दी में यात्रा कर रहा था... मेरी पिछली सीट पर दो महिला रोग विशेषज्ञ बैठे हुए थे ..चंडीगढ़ से आ रहे थे ....अपने किसी साथी की बात कर रहे थे कि वह कैसे बिना किसी इंडीकेशन के भी हिस्ट्रैक्टमी ( Hysterectomy, गर्भाशय को आप्रेशन द्वारा निकाल जाना) कर देता है, वे लंबे समय पर इस मुद्दे पर चर्चा करते रहे।

गर्भाशय या बच्चेदानी को आप्रेशन के द्वारा कुछ परिस्थितियों में निकाला जाना ज़रूरी हो जाता है.... अगर किसी महिला को फॉयबरायड है, रसौली है, और इन की वजह से बहुत रक्त बहता है अथवा विभिन्न टैस्टों के द्वारा जब विशेषज्ञों को लगता है कि गर्भाशय के शरीर में पड़े रहने से कैंसर होने का अंदेशा है तो भी इसे आप्रेशन द्वारा निकाल दिया जाता है।

और रही बात कमेटियां बना कर इस तरह के केसों की जांच करने की, इस के बारे में क्या कहें, क्या न कहें..........आप सब समझदार हैं, मुझे नहीं पता इन सब केसों में से कितने केस जैन्यून होंगे कितने ऐसे ही हो गये !! मुझे तो बस यही पता है कि इस का पता तो केवल और केवल आप्रेशन करने वाले चिकित्सक के दिल को ही है, वरना कोई कुछ भी कर ले, सच्चाई कैसे सामने आ सकती है, ऐसा मुझे लगता है, मैं गलत भी हो सकता हूं..........लेकिन मुझे पता नहीं ऐसा क्यों लगता है कि ऐसे केसों में कागज़ों का पेट भी अच्छी तरह से ठूस ठूस कर तो भरा ही जाता होगा.................................लेकिन कुछ भी हो, सब कुछ सर्जन के दिल में ही कैद होता है।

हां, तो मैं जिन दो महिला रोग विशेषज्ञों की बात कर रहा था जिनकी बातें मैं गाड़ी में बैठा सुन रहा था ..उन्होंने अपने साथी के बारे में यह भी कहा था .. वैसे सर्जरी उस की परफैक्ट है, सरकारी अस्पताल में टिका ही इसलिये हुआ है कि कहता है कि वहां इन आप्रेशनों पर हाथ अच्छा खुल जाता है............शायद उन की बात थी बिल्कुल सीधी लेकिन मैं इस के सभी अर्थ समझने के चक्कर में पता नहीं कहां खो गया कि मुझे दिल्ली स्टेशन आने का पता ही नहीं चला !
Source : Uterus of 226 women removed in Dausa Hospitals

रविवार, 17 अप्रैल 2011

रामचंद पाकिस्तानी का जादू

आज शाम लगभग साढ़े सात बजे जब टीवी के चैनल बदल बदल कर देख रहा था तो अचानक डीडी भारती पर एक प्रोग्राम चल रहा था –कल्याणी ....यह प्रोग्राम इस चैनल पर हर रविवार साढ़े सात से आठ बजे आता है। दूरदर्शन के अन्य चैनलों की तरह इस चैनल का यह प्रोग्राम भी बिल्कुल जमीन से जुड़ा हुआ...बिल्कुल भी फुकरापंथी नहीं..यह प्रोग्राम थी जिस में किशोर-किशोरीयों के शरीर में होने वाले बदलावों की जानकारी दी जा रही थी ...किशोर, किशोरीयां, अध्यापक एवं अभिभावक आमंत्रित विशेषज्ञ से प्रश्न कर रहे थे। 

पंद्रह बीस मिनट पर स्क्रीन पर एक कैप्शन सा जो आ जाता है उस से पता चला कि आठ बजे रामचंद पाकिस्तानी फिल्म इसी चैनल पर आयेगी। रामचंद पाकिस्तानी फिल्म मुझे बहुत पसंद है। 
मुझे अभी ध्यान आ रहा था कि अखबार में मुझे कौन सी खबर देख कर सब से ज़्यादा खुशी होती है ...कोई अनुमान ? …. जब इंडिया कोई मैच जीतता है ? जब एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल टैली बहुत बढ़ जाती है?......आप का कोई भी अनुमान ठिकाने पर नहीं लगेगा .....क्योंकि मुझे सब से ज़्यादा खुशी तब होती है जब पाकिस्तान या हिंदोस्तान द्वारा जेलों में भरे एक दूसरे के देश के कैदी छोड़े जाते हैं। Those are my happiest moments !

यह रामचंद पाकिस्तानी भी एक लगभग 10 साल के बच्चे एवं उस के परिवार की कहानी है ... यह बच्चा पाकिस्तान में एक बार्डर गांव में रहता है ... एक दिन अपनी मां से सुबह सुबह इस बात से खफ़ा हो जाता है कि वह उस के बापू को भी चाय का प्याला भर कर देती है लेकिन उसे आधा ही क्यों। बस, घर से चलता चलता अचानक बार्डर क्रॉस कर जाता है ..पकड़ा जाता है ..बापू ढूंढने जाता है उसे भी पकड़ लिया जाता है .... बस मुसीबतें शुरू। 
उस की मां की भूमिका नंदिता दास ने की है ...इसलिए उस किरदार में भी उस महान नायिका ने जान फूंक दी है। उसे देख कर तो कभी भी लगा ही नहीं कि वह अभिनय कर रही है ...किरदार में इतना गुम हो जाती हैं वह। 
चाहे इधर की जेलों में हों या उधर की जेलों में जो लोग यहां वहां सड़ रहे होते हैं ....वे सब रिश्तों के ताने-बाने से बुने होते हैं ...उन के लिये और उन के अपनों के लिये एक एक दिन कैसे बीतता है, इसे तो हम लोग ब्यां ही कैसे कर सकते हैं, बस केवल नंदिता दास या उस के पति या बेटे रामचंद के बुरे हालातों से थोड़ा समझ ही सकते हैं। 
वैसे तो मैंने यह फिल्म एक डेढ़ साल पहले देखी थी लेकिन ऐसी फिल्म को फिर से देखने का मैं अवसर खोना नहीं चाहता था। इस डी डी भारती चैनल पर इन विज्ञापनों की भी सिरदर्दी नहीं होती....। 
जो लोग तीस तीस वर्षों के बाद यहां से वहां के लिये या वहां से यहां के लिये छोड़े जाते हैं उन के मन में क्या चल रहा होता है, इस की हम कैसे कल्पना कर सकते हैं ? अकसर हम लोग यही सुनते हैं कि इन में अधिकांश लोग निर्दोष होते हैं –मछुआरे, या किसी बार्डर गांव के रहने वाले लोग .....और मुझे यह भी लगता है कि जो शातिर किस्म के खिलाड़ी होते हैं, उपद्रवी होते हैं.... वे तो इन में बहुत कम होते होंगे..............कुछ ऐसा होना चाहिये कि दोनों देशों में व्यवस्था ऐसी हो कि ऐसे केसों को कुछ दिनों में निपटा के लोगों को उन के घरों की तरफ़ रवाना किया जाए .................आप भी यह फिल्म देखिये, आप भी यही बात कहने लगेंगे।

बुधवार, 23 मार्च 2011

व्यंग्य .....हिंदी अखबारों का संपादकीय पन्ना

हर बंदे की अपनी दुनिया होती है ...मेरी भी है .....लेकिन पारिवारिक, कामकाजी, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पालिटिक्स के बारे में मैं बिल्कुल ही ज़ीरो हूं ....इस में कभी रूचि ली ही नहीं .....पारिवारिक एवं कामकाजी पालिटिक्स के लिये कभी टाइम ही नहीं मिला और शायद प्रवृत्ति भी बिल्कुल ऐसी है नहीं ......राष्ट्रीय एवं इंटरनैशनल मसले समझने के लिये पहले इतिहास भूगोल का ज्ञान होना तो ज़रूरी है ही।

और यह इतिहास भूगोल का ज्ञान भी न के ही बराबर है ... बिल्कुल न के बराबर ..... केवल उतना ही है जितना अमिताभ बच्चन या शारहरूख कौन बनेगा करोड़पति में सिखा गये हैं। इस में मैं अपने मास्टर लोगों को दोष मानता हूं ... स्कूल में इस विषय के जितने भी मास्टर मिले वे कभी भी इन विषयों में रूचि पैदा ही नहीं कर पाये।

बस जैसे तैसे ऐसे ही कुछ मास्टरों की छत्र छाया में रहते रहते यह तो लड़कपन में ही समझ लिया था कि हिस्ट्री-ज्योग्राफी के पेपर कोई पड़ता नहीं, बस उत्तरों की लंबाई देख कर अंक लुटाये जाते हैं...... तो फिर हम क्या कम थे, हम ने भी गप्पे हांकनी बचपन में ही सीख लीं (इस में तो आप को भी कोई शक नहीं होगा!) .... हर क्लास में इन पेपरों में वहीं गप्पें हांक हांक के थक गये .... लेकिन यह सब सुलेख लिखना कभी नहीं भूले ..... न ही कभी कोई कांट छांट की ....अगर पेपर चैक करने वाले ने देख लिया तो हो गई छुट्टी .....

बस, दनादन ऐसे ही क्लासें पास की जा रही थीं ... इतने में आ गई मैट्रिक की परीक्षा ...अब अगर कुछ भी बेसिक ज्ञान हो तो लिखें, तो ही नक्शे में बताएं कि पटसन कहां होती है और कोयले की खाने कहां पर हैं.......बहुत ही पीढ़ा के साथ जैसे तैसे नक्शों में भी तुक्के मार मार के, और डिस्क्रिप्टवि उत्तरों में भी पता नहीं कितनी कहानियां लिख लिख कर ..पेपर तो लिख दिया..... वो एक राजा था न जो बहुत खाता था, बस उस का डाइट चार्ट लिखने की नौबत आ जाया करती थी, और कुछ पता हो तो लिखें।.

मुझे याद है मैट्रिक के पेपर देने के बाद अगले दो-तीन महीने तक मेरा दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी रही थी कि बाकी विषयों में तो आ जायेगी डिस्टिंकशन और हिस्ट्री-ज्योग्राफी में हो जाऊंगा फेल. ....लेकिन जब रिजल्ट आया तो 150 में से 94 अंक पाकर जितनी खुशी हुई उस का आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.....मन ही मन उस रूह का धन्यवाद किया जिस ने बचा लिया।

लेकिन ऐसे पास होने से क्या हुआ ? ...कुछ नहीं .....बस अभी तक इन विषयों में फिसड्डीपन बरकरार है, बहुत बार सोचा कि थोड़ा तो पढ़ लूं इन के बारे में लेकिन अगर मास्टर चौहान के थप्पड़ हमें कुछ पढ़ने पर मजबूर न कर सके तो अब कैसे पढ़ लें !!(कुछ मास्टर ऐसे थे जिन्होंने समझा कि क्लास में हमारी बेइज्जती कर के, चपेड़ें मार मार के, हाथ की उंगलियों में पैंसिल फसा फसा कर कुछ सिखा देंगे .....लेकिन हम भी ठहरे ढीठ प्राणी ........!!)

हां, तो यह सारी भूमिका मुझे इसलिये बांधनी पड़ी कि मैंने यह कहना था कि अगर मुझे किसी इंटरनैशनल मसले के बारे में कुछ सीखना होता है, तो मैं हिंदी अखबार के संपादकीय पन्ने का रूख कर लेता हूं .....ऐसी बातें मुझे केवल उसी पन्ने से ही समझ आती हैं...क्योंकि उस पन्ने पर कोई दिग्गज मुझे मेरी ही भाषा में मेरे स्तर पर आकर सब कुछ सिखा रहा होता है, बिल्कुल स्कूल के मास्टर की तरह ......... और काफी कुछ समझ में आ ही जाता है।

हिंदी अखबार के संपादकीय पन्ने को रोज़ाना देखने का श्रेय मै अपनी 80 वर्षीय मां को देता हूं .... वे प्रतिदिन इसे देखती हैं और मुझ से पूछती हैं कि आज तूने तवलीन सिहं का लेख देखा, विष्णु नागर को पढ़ा .....और भी बहुत से लेखकों के नाम लेती हैं .......और यह मुझे ग्वारा नहीं होता कि मेरी मां के सामने भी मेरे फिसड्डीपन की पोल खुल जाए .....इसलिए हिंदी अखबार के संपादकीय पन्नों से मैं सीखने लायक बहुत सी बातें सीखता हूं, समझता हूं .............

नोट ......अगर कोई मेरा मैट्रिक का हिस्ट्री-ज्योग्राफी का पेपर निकलवा के देख ले, तो सारी पोल खुल जाएगी.. लेकिन रोल नंबर किसी को पता चलेगा तब न .......और मेरी प्रोफाइल पर जो स्कूल के ज़माने के दोस्त हैं, वे इतने पक्के हैं कि किसी भी तरह से यह राज़ खोलेंगे नहीं ...... पता नहीं, स्कूल के दोस्तों से इतना लगाव कैसे होता है कि हम इतने सालों बाद भी अपनी ज़िंदगी की पूरी की पूरी किताब खुली रख सकते हैं .................कारण ? ....हमें ये अपने परिवार के सदस्यों की तरह ही प्रिय होते हैं, हमें आपसी भरोसा होता है, इन से कोई डर नहीं होता .....और फिर जैसे जैसे हम जि़ंदगी में तीसमार बनते जाते हैं और दोस्त जुड़ते जाते हैं.........कहीं न कहीं खुलेपन से सारी बातें उन दोस्तों के साथ शेयर करने में संकोच बढ़ता जाता है ................है कि नहीं ??