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Saturday, August 16, 2014

सी टी स्कैन का दिन प्रतिदिन बढ़ता धंधा

बीबीसी की यह न्यूज़-रिपोर्ट पढ़ कर कुछ ज़्यादा अचंभा नहीं हुआ कि वहां पर २०१२ में बच्चों में किए जाने वाले सी टी स्कैनों की संख्या दोगुनी हो कर एक लाख तक पहुंच गई।

रिपोर्ट पढ़ कर और तो कुछ ज़्यादा आम बंदे को समझ नहीं आयेगा लेकिन वह इतना तो ज़रूर समझ ही जायेगा कि कुछ न कुछ तो लफड़ा है ही।

Sharp rise in CT scans in children and adults

समझ न आने का कारण है कि रिपोर्ट में कुछ कह रहे हैं कि यह ठीक नहीं है, कुछ कह रहे हैं कि नहीं जिन बच्चों को ज़रूरत थी उन्हीं का ही सी टी स्कैन करवाया गया है, खिचड़ी सी बनी हुई है।

लेिकन एक बात जो सब को अच्छे से समझने की ज़रूरत है कि बिना वजह से करवाए गये सी टी स्कैन का वैसे तो हर एक को ही नुकसान होता है, लेकिन बच्चों को इस से होने वाले नुकसान का सब से ज़्यादा अंदेशा रहता है क्योंकि उन का जीवन काल अभी बहुत लंबा पड़ा होता है।

इस रिपोर्ट में एक २०१२ की स्टडी का भी उल्लेख है जिसमें यह पाया गया कि अगर बच्चों के सी टी स्कैन बार बार किए जाएं (१० या उस से अधिक) तो उन में रक्त  एवं  दिमाग का कैंसर होने का रिस्क तिगुना हो जाता है।

अब सोचने वाली बात यह है कि यह पढ़ कर सभी मां बाप कहेंगे कि हमें पता कैसे चले कि डाक्टर जो सी टी स्कैन के लिए लिख रहा है, उस जांच की मांग उचित है या नहीं। वैसे भी बच्चा बीमार होने पर मां-बाप अपनी सुध बुध सी खोए रहते हैं और ऐसे में यह कहां से पता चले कि सीटी स्कैन करवाना उचित है कि नहीं, इस की ज़रूरत है भी कि नहीं।

बिल्कुल सही बात है यह निर्णय मां-बाप के लिए लेना मुमकिन बिल्कुल भी नहीं है।

लेकिन एक बात तो मां-बाप कर ही सकते हैं कि छोटी मोटी तकलीफ़ों के लिए बच्चे को बड़े से बड़े विशेषज्ञ के पास या बड़े कार्पोरेट अस्पतालों में लेकर ही न जाएं, सब से पहले अपने पड़ोस के क्वालीफाइड फैमली डाक्टर पर ही भरोसा रखें, यकीनन वह अधिकतर बीमारियों को ठीक करने में सक्षम है। अगर किसी बड़े टेस्ट की ज़रूरत होगी तो वह बता ही देगा।

और मुझे ऐसा लगता है कि यह मंहगे महंगे टेस्ट अगर किसी ने लिखे भी हैं, तो भी अगर समय की कोई दिक्कत नहीं है तो भी किसी दूसरे डाक्टर से परामर्श कर ही लेना चाहिए।

वैसे यह सब कुछ कर पाना क्या उतना ही आसान है जितनी आसानी से मैं लिख पा रहा हूं। बहुत मुश्किल है मां -बाप के लिए डाक्टर के कहे पर प्रश्नचिंह लगाना.......बहुत ही कठिन काम है।

यू के की बात तो हमने कर ली, लेकिन अपने यहां क्या हो रहा है, रोज़ हम लोग अखबारों में देखते हैं, टीवी पर सुनते हैं। कुछ कुछ गोरखधंधे तो चल ही रहे हैं।

एक बात जो मैंने नोटिस की है कि भारत में लोग पहले किसी गांव के नीम-हकीम झोला छाप के पास जाते हैं जिसने सीटी स्कैन या एमआरआई का बस नाम सुना हुआ है, बस वह हर सिरदर्द के मरीज़ को सीटी स्कैन और हर पीठ दर्द के मरीज़ को एमआरआई करवाने की सलाह दे देता है। इन नीम हकीमों तक ने भी सैटिंग कर रखी होती है...... और यह सैटिंग ज़्यादा पुख्ता किस्म की होती है। समझ गये ना आप?

अब अगर तो यह मरीज़ किसी सही डाक्टर के हाथ पड़ जाता है तो वह उसे समझा-बुझा कर उस की सेहत और पैसा बरबाद होने से बचा लेता है, वरना तो......।

बीबीसी की इसी रिपोर्ट में आप पाएंगे कि यह मांग की जा रही है वहां यूके में किस सीटीस्कैन सैंटर ने वर्ष में कितने सीटीस्कैन किए और मरीज़ों की एक्सरे किरणों की कितनी डोज़ दे कर ये सीटीस्कैन किए जा रहे हैं, इस की पूर्ण जानकारी सरकार को उपलब्ध करवाई जाए। इस तरह के उपाय क्या भारत में भी शुरू नहीं किये जा सकते है या अगर शुरू हो भी गये तो इन का बेवजह किए जाने वाले सीटी स्कैनों की निरंतर बढ़ रही संख्या पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भी एक प्रश्न ही है।

अंत में बस यही बात समझ में आ रही है कि अपने फैमिली फ़िज़िशियन पर भी हम लोग भरोसा करें......... और महंगे टैस्ट करवाने के लिए कहे जाने पर.....जिन के बार बार करवाने से नुकसान भी हो सकता है----ऐसे केस में हमें दूसरे चिकित्सक से ओपिनियन लेने में नहीं झिझकना चाहिए। यह नहीं कि दूसरे डाक्टर की फीस २०० रूपये है और यह टैस्ट तो ८०० रूपये में हो जायेगा, बात पैसे की नहीं है, बात सेहत की सुरक्षा की है कि बिना वजह एक्सरे किरणें शरीर में जा कर इक्ट्ठी न हो पाएं, किसी तरह की जटिलता न पैदा कर दें।

कुछ अरसा पहले भी मैंने इस विषय पर कुछ लिखा था, ये पड़े हैं वे लिंक्स........

सी.टी स्कैन से भी होता है ओवर-एक्सपोज़र
मीडिया डाक्टर: ओव्हर-डॉयग्नोसिस से ओव्हर ...

Saturday, August 9, 2014

सदियों से होता आ रहा कीटाणुओं का जंग में इस्तेमाल

जब कभी कैमीकल वारफेयर के बारे में या फिर बॉयोलाजीकल वॉरफेयर के बारे में मैं कभी भी पढ़ता था तो यही सोचता था कि यह तो एक आधुनिक जुनून है। लेकिन आज ही पता चला कि लड़ाईयों में कीटाणुओं को इस्तेमाल पिछली कईं सदियों से चला आ रहा है।

बीबीसी इस रिपोर्ट पर जब मैंने इस विषय पर लिखा पढ़ा तो मुझे बड़ा शॉक सा लगा कि किस तरह से चेचक का वैसे तो उन्मूलन बीसवीं सदी में ही हो गया था और अगर आज चेचक कहीं फैल गया तो दुनिया किस तरह से फनां हो जायेगी। यह बात भी इस रिपोर्ट में लिखी है कि अमेरिका और सोवियत संघ ने किसी गोपनीय लैब में स्माल-पॉक्स के कीटाणु सहेज कर रख छोड़े हैं। सोच कर ही डर लगता है ना।

एक और देश के बारे में लिखा है कि उसने ३५०० वर्ष पूर्व एक दुश्मन देश के बार्डर पर छः भेड़े छोड़ दीं.....और जब उस देशवासियों ने उन्हें अंदर कर लिया तो उन भेड़ों के शरीर पर विद्यमान टिक्स (ticks) ने ऐसी एक बीमारी फैला दी जिस से देश की आधी जनसंख्या खत्म हो गई होगी।

How long mankind has been waging warfare?

मुझे यह सब पढ़ कर यही लग रहा है कि सुबह सवेरे उठ कर फेसबुक पर निरंतर धुआंधार स्टेट्स छोड़ने की बजाए सारे संसार की सद्बुद्धि की प्रार्थना निरंतर करते रहना चाहिए, पता नहीं किस के पास क्या धरा-पड़ा है और कब किस की बुद्धि थोड़ी सी भी सटक जाए।

एटमबम-वम के बारे में तो हम सुनते ही हैं, हीरोशीमा-नागासाकी अभी तक सत्तर वर्ष बाद भी उस एक धमाके का दंश सह रहे हैं, लेकिन क्या ये कीटाणु और कैमीकल्स भी किसी एटमबम से कम हैं।

चलिए सब के कल्याण की कामना करते हैं........

Friday, February 21, 2014

हिस्ट्रैक्टमी पर चर्चा गर्म है...


हिस्ट्रैक्टमी के बारे में तो आप सब जानते ही हैं ..महिलाओं में किया जाने वाला आप्रेशन जिस में उन का युटर्स (uterus) –आम बोलचाल की भाषा में जिसे बच्चेदानी कहते हैं—पूरी तरह या कुछ भाग निकाल दिया जाता है और कईं बार इस के साथ महिला के अन्य प्रजनन अंग जैसे कि ओवरी, सर्विक्स, एवं फैलोपियन ट्यूब्स भी निकाल दी जाती हैं।
मैंने बहुत बार इस तरह की चर्चाएं होती सुनी हैं जिस में इस बात का उल्लेख आता है कि फलां फलां महिला चिकित्सक तो किसी अस्पताल में सर्जरी में हाथ साफ़ करने आती है—कहने का मतलब यही होता है कि सिज़ेरियन आप्रेशन (डिलीवरी हेतु किया जाने वाला बड़ा आप्रेशन) और हिस्ट्रैक्टमी आदि के लिए। कोई माने या ना माने सरकारी अस्पतालों में यह सब करने की एक तरह से खुली छूट सी होती है। कोई पूछ के देखे तो इस मरीज़ में फलां फलां आप्रेशन करने की इंडिकेशन क्या थीं? …..तेरी यह मजाल कि अब तूने डाक्टरों के निर्णय को चुनौती देनी शुरू कर दी।
जो भी हो, पब्लिक भी बेवकूफ़ नहीं है, वह भी अखबार पढ़ती है, इलैक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़ी रहती है, सब समझती है लेकिन फिर भी जब कोई बीमारी आ घेरती है तो कमबख्त उस की कहां चलती है। ना कुछ समझ, ना कुछ निर्णय लेने की ताकत, ना ही ऐसा सामाजिक वातावरण, विशेषकर महिलाओं के मामले में तो स्थिति और भी चिंताजनक है।
महिलाओं में कुछ आप्रेशन होने हैं तो इस का निर्णय ‘दूसरे’ करेंगे, अगर कुछ नहीं करवाने हैं तो भी वह स्वयं नहीं लेती यह निर्णय, यहां तक किसी महिला तकलीफ़ के लिए डाक्टर के परामर्श लेना है कि नहीं, यह फैसला भी उस के हाथ में नहीं।
इन सब बातों का ध्यान मुझे दो चार दिन पहले तब भी आया जब मैंने एक खबर देखी कि नैशनल फैमली हैल्थ सर्वे में हिस्ट्रैक्टमी से संबंधित डैटा इक्ट्ठा करने की मांग की जा रही है। पाठक स्वयं इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि स्थिति कितनी विकट होगी कि सेहत से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ताओं को इस तरह की मांग उठानी पड़ी।
हैल्थ एक्टिविस्टों की मांग इसलिए है कि एक बार आंकड़े पता तो लगें ताकि इस सूचना को इस आप्रेशन के लिए तैयार किए जाने वाले दिशा-निर्देशों (guidelines) के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
“The demand comes following concern over rising cases of hysterectomies reported from across the country, particularly among younger women, and by some unscrupulous doctors for monetary gains”
अधिकतर फैमली प्लानिंग आप्रेशन तो होते हैं सरकारी संस्थाओं में लेकिन 89प्रतिशत के लगभग हिस्ट्रेक्टमी आप्रेशन प्राईव्हेट अस्पतालों में होते हैं… इस का मतलब तो यही हुआ कि सरकारी सेहत तंत्र केवल राष्ट्रीय सेहत कार्यक्रमों तक ही सीमित है और अन्य सेहत से संबंधित मुद्दे में इस की रूचि नहीं है……………यह मैं नहीं कह रहा हूं, पेपर में ऐसा साफ़ लिखा है..
Majority of tubectomies are performed in public health system, where as 89 per cent of hysterectomies were conducted in private.  This indicates that public health system is meant only for national programme and less interested in other health programme. This also raises questions whether hysterectomies are justified and whether the higher percentage of hysterectomies in the private sector reflect economic and commercial interest of some groups.”
आंध्रप्रदेश में एक स्टडी की गई थी जिस के अनुसार जिन महिलाओं का हिस्ट्रेक्टमी आप्रेशन किया गया उन में से 31.2 प्रतिशत महिलाएं ऐसी थीं जिन की उम्र 30 साल से कम थी, 52 प्रतिशत महिलाएं 30-39 वर्ष की ब्रेकेट में थीं, जब कि 83प्रतिशत महिलाओं में यह आप्रेशन रजोनिवृति से पहले (pre-menopausal) ..उन की चालीस वर्ष की अवस्था से पहले किया जा चुका था।
यह खबर जिस दिन देखी, उस के अगले ही दिन –20 अगस्त 2013 की अखबार में यह खबर दिख गई कि अब हिस्ट्रेक्टमी आप्रेशन से संबंधित जानकारी को नेशनल फैमली हैल्थ सर्वे में शामलि कर लिया गया है. अच्छा है, इस से संबंधित आंकड़े मिलेंगे तो इस से संबंधित गाईड-लाइन तैयार करने में मदद मिलेगी। इस रिपोर्ट में यह भी लिखा है..
“ It was pointed out that unscrupulous doctors were performing hysterectomies on pre-menopausal and even women younger than 30 years for monetary gains”.
महिलाओं के प्रजनन अंगों से जुड़ी समस्याओं का केवल बच्चेदानी निकाल देना ही समाधान नहीं है, इस के लिए विभिन्न मैडीकल उपचार भी उपलब्ध हैं, और हैल्थ ग्रुप्स द्वारा यह मांग भी अब आने लगी है कि इस तरह के आप्रेशन का मशविरा महिलाओं को तभी दिया जाए जब इलाज के बाकी सभी विकल्प कामयाब नहीं हो सके।
औरतें की सेहत के बारे में सोचे तो भी यह एक छोटा मोटा फैसला नहीं है, कम उम्र की महिलाओं में बिना ज़रूरत के केवल कमर्शियल इंटरेस्ट के लिए हिस्ट्रैक्टमी आप्रेशन करने से उन महिलाओं में अन्य शारीरिक बीमारियां जैसे की दिल से संबंधित रोग आदि होने का रिस्क बढ़ जाता है।
लिखते लिखते दो किताबों का ध्यान आ गया …
Whose health is it anyway?
Taking health in your hands
एक्टिविस्ट कर रहे हैं अपना काम लेकिन क्या ही अच्छा हो कि देश में महिलाओं की साक्षरता दर भी खूब बढ़े – साक्षरता रियल वाली …जो नरेगा के लिए अपना नाम लिखने तक ही सीमित न हो, ताकि महिलाओं अपने फैसले स्वयं लेने में सक्षम हो पाएं और प्रश्न पूछने की ज़ुर्रत तो कर सकें…. आमीन!!
Source ..

एक भयानक किस्म की दलाली...


आज सुबह मैंने कुछ समय पहले मेल खोली तो एक मेल दिखी किसी पापुलर पोर्टल से कि आप बच्चों की इम्यूनिटी के बारे में लिखो और बहुत से इनाम आप का इंतज़ार कर रहे हैं।
मैंने आज तक कभी इस तरह के आमंत्रण पर कुछ भी नहीं लिखा, क्योंकि ऐसे हरेक केस में एक लोचा तो होता ही है…और सब से बड़ी बात यह कि इस तरह से कोई कहे कि इस पर लिखो …इस पर यह कहो….यह मुझ से बिल्कुल भी नहीं होता और एक तरह से अच्छा ही है। सिरदर्द होता है कि कोई कमर्शियल इंटरेस्ट वाली साइट तरह तरह के इनामों का प्रलोभन देकर कहे कि यह लिखो, वो लिखो………सब बेकार की बातें हैं।
अपने लेखन में पूरी इमानदारी बरती है इसलिए अपने बच्चों को भी उन्हें पढ़ने को कह देता हूं… वे भी ज़रूरत पढ़ने पर मेरे लेखों को खंगालने लगते हैं, ऐसे में कैसे इस तरह के प्रायोजित लेखन के लिए हामी भर दूं।
अच्छा तो जब पढ़ा कि यह लेख बच्चों की इम्यूनिटी के बारे में है कि उन की इम्यूनिटी कैसे बढ़ाई जाए….तो ध्यान आया कि चलो यार इस पर लेख ज़रूर लिखेंगे, इनामों की तो वैसे ही कौन परवाह करता है, मैकबुक प्रो पर काम कर रहा हूं …और वहां तो मैकबुक एयर ही पहला ईनाम है।
मेरी मेल पर एक लिंक था कि लेख लिख कर इस लिंक पर जा कर सब्मिट करें। जिज्ञासा वश मैंने उस लिंक पर क्लिक किया … तो सारा माजरा समझ में आ गया.. जो वेबपेज खुला उस पर इस प्रतियोगिता से संबंधित कुछ नियम लिखे थे …लेकिन एक सब से अहम् नियम यह था कि जो भी लेख भेजा जाये उस में फलां फलां टॉनिक का लिंक होना ज़रूरी है।
बात समझते देर न लगी कि यह भी पब्लिक को गुमराह करने का एक गौरखधंधा ही है, जो भी बच्चों की इम्यूनिटी पर लेख पढ़ेगा और उस के अंदर ही एक विशेष किस्म के टॉनिक का लिंक देखेगा तो वह कैसे उसे खरीदे बिना रह पायेगा।
हो सकता है कि साइट चलाने वालों की अपनी अलग तरह की मजबूरी हो, हो तो हो, मुझे क्या, लेकिन अगर हम लोग किसी भी विषय के जानकार इस तरह की दल्लागिरी में पड़ने लगें तो आम आदमी का क्या होगा, यह सोच कर डर लगता है। इस तरह का प्रायोजित लेखन भी एक भयानक दल्लागिरी से क्या कम है………. जब मैंने अपने बच्चों को ही वह टॉनिक कभी नहीं दिया, उस को अफोर्ड भी कर सकते थे, मैं इस तरह के सप्लीमैंट्स का हिमायती ही नहीं हूं ….तो फिर औरों को क्यों इन चक्करों में डाला जाए। वैसे भी देश के बच्चों को टॉनिक नहीं, रोटी चाहिए…….!
यह तो नेट था, लेकिन आज कल कोई भी मीडिया देख लें, हर तरफ़ बाज़ार से ही सजे दिख रहे हैं, समाचार पत्रों में चिकित्सा से जुड़े रोज़ाना बीसियों विज्ञापन यही दुआ मांग रहे दिखते हैं कि कब कोई खाता-पीता बंदा बीमार पड़े और कब हम उन्हें अस्पताल के बिस्तर पर धर दबोचें……….सब तरह के कमबख्त गोरखधंधे चल रहे हैं, बच के रहना भाई….
दुआ करता हूं कि आप हमेशा सेहतमंद रहें। इम्यूनिटी की चिंता न करें, अगर पेट ठीक ठाक खाने से भरने लगेगा….जंक फूड को निकाल कर…तो इम्यूनिटी भी अपने आप आ ही जायेगी। मस्त रहो,खुश रहो…

Wednesday, February 19, 2014

पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों का दुरूपयोग

कल के पेपर में यह खबर देख कर चिंता हुई कि हरियाणा में पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों का किस तरह से दुरूपयोग हो रहा है और किस तरह से दोषियों की धर-पकड़ जारी है... Haryana drive against female foeticide. 

इन मशीनों के बारे में जानने के लिए चार वर्ष पुराने मेरे इस लेख के लिंक पर क्लिक करिए... आ गया है..पाकेट साइजड अल्ट्रासाउंड। और फिर उस के बाद जब महाराष्ट्र ने इन मशीनों पर प्रतिबंध लगा दिया तो भी यही ध्यान में आ रहा था कि इस तरह की मशीनों के दुरूपयोग का अंदेशा तो बना ही रहेगा।

 अब हरियाणा में जन्म से पूर्व शिशु के सैक्स का पता करने हेतु इस तरह की मशीनों के अंधाधुंध प्रयोग से प्रदेश में सैक्स अनुपात पर कितना बुरा असर पड़ेगा, यह चिंता का विषय तो है ही।

खबर में आप देख सकते हैं कि इस तरह की मशीनें चीन से लाई जा रही हैं और फिर इन का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। बात यह भी है कि क्या इस तरह के गोरखधंधे हरियाणा में ही हो रहे हैं या फिर वहां इस का गंभीरता से संज्ञान लिया गया है और कार्यवाही की जा रही है। ऐसा कैसे हो सकता है कि देश के अन्य क्षेत्र इस के दुरूपयोग से बच पाए हों?

वैसे यह कोई नई बात नहीं है, जब इस तरह की मशीनें चार वर्ष पहले बाज़ार में आईं तो ही लग रहा था कि इन का दुरूपयोग भी ज़रूर होगा।

बड़ी दुःखद बात है कि कुछ तत्व बढ़िया से बढ़िया आविष्कार को भी अपने निजी स्वार्थ के लिए बदनाम कर देते हैं.....जो उपकरण बनते हैं मानवता के कल्याण के लिए उन्हें की मानवता के ह्ास के लिए इस्तेमाल किया जाने लगता है।

सोचने वाली बात यह भी है कि अब हर बात का दोष सरकार के माथे थोप देने से भी नहीं चलने वाला.......सरकारी कर तो रही है अल्ट्रासाउंड सैंटरों पर सख्ती, मीडिया में खबरें दिखती ही रहती हैं कि किस तरह से विभिन्न सैंटरों पर छापेमारी की जाती है, इन सैंटरों को सील किया जाता है, और दोषी डाक्टरों तक के ऊपर केस चलाए जाते हैं।

लेिकन अब सब से चिंता का विषय यह है कि सैंटरों की भी ज़रूरत नहीं, इस तरह की पोर्टेबल मशीनें जेब में डाल कर इन का कितनी आसानी से दुरूपयोग किया जा रहा है। अब सरकारें किस किस की जेब में घुसें....सच में बड़ी सिरदर्दी है। यही दुआ की जाए कि लोगों को ही ईश्वर सद्बुद्धि प्रदान करे ताकि वे इस तरह के कुकृत्यों से बच सकें। आमीन !!



Sunday, February 16, 2014

नकली दवाई के धंधे वालों को फांसी क्यों नहीं?

यह प्रश्न मुझे पिछले कईं वर्षों से परेशान किये हुए है।

हम लोग लगभग एक वर्ष पहले लखनऊ में आए...कुछ दिनों बाद हमें शुभचिन्तकों ने बताना शुरू कर दिया कि कार में पैट्रोल कहां से डलवाना है ..उन्होंने व्ही आई पी एरिया में दो एक पैट्रोल पंपों के बारे में बता दिया कि वहां पर पैट्रोल ठीक तरह से डालते हैं, मतलब आप समझते हैं कि ठीक तरह से डालने का क्या अभिप्राय है। 

कारण यह बताया गया कि ये पैट्रोल पंप जिस एरिया में हैं वहां से सभी मंत्रियों और विधायकों की गाड़ियों में तेल डलवाया जाता है। सुन कर अजीब सा लगा था, लेकिन जो भी हो, अनुभव के आधार पर इतना तो कह ही सकता हूं कि जो हमें बताया गया था बिल्कुल ठीक था। 

यह तो हो गई पैट्रोल की बात, अब आते हैं दवाईयों पर। नकली, घटिया किस्म की दवाईयों का बाज़ार बिल्कुल गर्म है। समस्या यही है कि हरेक बंदा समझता है कि नकली दवाईयां तो बाहर कहीं किसी और गांव कसबे में बिकती होंगी, हमें तो ठीक ही मिल जाती हैं, अपना कैमिस्ट तो ठीक है, पुराना है, इसलिए हम बिल मांगने से भी बहुत बार झिझक जाते हैं, है कि नहीं ?

 आज की टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर दिखी ..  India-made drugs trigger safety concerns in US.
 हमेशा की तरह दुःख हुआ यह सब देख कर...विशेषकर जो उस न्यूज़-स्टोरी के टैक्स्ट बॉक में लिखा पाया वह नोट करें......

कश्मीर के एक बच्चों के अस्पताल में पिछले कुछ वर्षों में सैंकड़ों बच्चों की मौत का कारण नकली दवाईयों को बताया जा रहा है। एक आम प्रचलित ऐंटीबॉयोटिक में दवा नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं............

इस तरह के गोरख-धंधे जहां चल रहे हों...बच्चों की दवाईयां नकली, घटिया और यहां तक कि विभिन्न प्रकार की दवाईयों के घटिया-नकली होने के किस्से हम लोग अकसर पढ़ते, देखते, सुनते ही रहते हैं। 

लिखना तो शुरू कर दिया लेकिन समझ में आ नहीं रहा कि लिखूं तो क्या िलखूं, सारा जहान जानता है कि ये मौत के सौदागर किस तरह से बच्चों से, टीबी के मरीज़ों तक की सेहत से खिलवाड़ किए जा रहे हैं। ईश्वर इन को सद्बुद्धि दे ...नहीं मानें तो फिर कोई सबक ही सिखा दे। 

आप कैसे इन नकली, घटिया किस्म की दवाईयों से बच सकते हैं ?.........मुझे नहीं लगता कि आप का अपना कोई विशेष रोल है कि आप यह करें और आप नकली, घटिया किस्म की दवाई से बच गये। ऐसा मुझे कभी भी लगा नहीं ..इतनी इतनी नामचीन कंपनियाों की दवाईयां......इसी टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में यह भी लिखा हुआ है.....
"A Kampala cancer institute stopped buying drugs from India in 2011 after receiving countefeit medicines with forged Cipla labels"

बस आप एक ग्राहक के रूप में इतना ही कर सकते हैं कि जब भी कोई दवा खऱीदें उस का बिल अवश्य लें......इस में बिल्कुल झिझक न करें कि दवा दस बीस रूपये की तो है, बिल लेकर क्या करेंगे ?.....  नहीं, केवल यही एक उपाय है जिस से शायद आप इन नकली, घटिया किस्म की दवाईयों से बच पाएं, कम से कम इस पर तो अमल करें।  शेष सब कुछ राम-भरोसे तो है ही। 

बड़े बडे़ अस्पताल कुछ दवाईयों की टैस्टिंग तो करवाते हैं लेिकन जब तक दवाई के घटिया (Substandard) रिपोर्ट आती है, तब तक यह काफ़ी हद तक मरीज़ों में बांटी जा चुकी होती है, कभी इस की किसी ने जांच की ?.... दवाईयों की जांच मरीज़ों को बांटने से पहले होनी चाहिए या फिर सांप के गुज़र जाने पर लकीर को पीटते रहना चाहिए। 

मैं कईं बार सोचता हूं ये जो लोग इस तरह की दवाईयों का कारोबार करते हैं, अस्पतालों में भी ये दवाईयां तो पहुंचती ही होंगी, जो जो लोग भी इन काले धंधों में लिप्त हैं, वे आखिर इस तरह के पैसे से क्या कर लेंगे....ज़्यादा से ज़्यादा, एक दो तीन चार महंगे फ्लैट, बढ़िया लंबी दो एक गाड़ियां, विदेशी टूर, महंगे दारू, या फिर रंगीन मिज़ाज अपने दूसरे शौक पूरे कर लेते होंगे.....लेकिन इन सभी लोगों का इंसाफ़ इधर ही होते देखा-सुना है। कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है जो इन दलालों और इन चोरों के परिवारों को हिलाने के लिए काफ़ी होता है। क्या ईमानदारों की ज़िंदगी फूलों की सेज ही होती है, यह एक अलग मुद्दा है...यह चर्चा का विषय़ नहीं है। 

लेकिन फिर भी समझता कोई नहीं है, मैंने अकसर देखा-सुना है कि लोग इस तरह के सब धंधे-वंधे करने के बाद, बंगले -वंगले बांध के, दुनिया के सामने देवता का चोला धारण कर लेते हैं। 

अभी तक खबरें आती रहती हैं किस तरह से यूपी में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में लिप्त लोगों ने लूट मचाई और इन का क्या हुआ यह भी बताने की ज़रूरत नहीं। 

दो चार िदन पहले मैं लखनऊ में हिन्दुस्तान अखबार देख रहा था.....शायद पहले ही पन्ने पर यह खबर थी कि एक मिलावटी कारोबारी को ऐसे मटर बेचने पर १० वर्ष की कैद हुई है जो सूखे मटरों को हरे पेन्ट से (जिस से दीवारों को पेन्ट करते हैं) रंग दिया करता था। अगर सूखे मिलावटी मटरों के लिए दस वर्ष तो मिलावटी, घटिया दवाईयों का गोरखधंधे वालों को और इन की मदद करने वालों के लिए फांसी या फिर उम्र कैद कोई ज़्यादा लगती है? नहीं ना....बिल्कुल नहीं. ....आप का क्या ख्याल है? आम आदमी वैसे ही महंगाई से बुरी तरह त्रस्त है, पता नहीं वह कैसे बीमारी का इलाज करवाने का जुगाड़ कर पाता है, ऊपर से नकली दवाई उसे थमा दी जाएगी तो उसे कौन बचाएगा?

इन बेईमानों, मिलावटखोर, बेईमान धंधों में लिप्त सभी लोगों को इन पर फिट होता एक गीत तो डैडीकेट करना बनता है........

Tuesday, June 28, 2011

बेटीयों को बेटों में बदलने का गोरखधंधा

सैक्स चेंज करवाने संबंधी मेरा ज्ञान केवल उन एक-आध न्यूज़-स्टोरीयों तक ही सीमित है जो यदा कदा मीडिया में दिख जाती थीं... और अकसर विदेशों से इस तरह की बड़ी खबर आया करती थीं कि फलां फलां ने अपना सैक्स चेंज करवा --- पुरूष से महिला बन गया अथवा कोई महिला अपना सैक्स चेंज करवा के पुरूष बन गई।

कल की The Hindu  में मैंने एक समाचार का यह कैप्शन देखा—NCPCR seeks report on genitoplasty in Indore . समाचार का शीर्षक पढ़ कर मुझे कुछ कुछ यही लगा कि होगी यह खबर उस कुप्रथा के बारे में जिस के अंतर्गत छोटी बच्चीयों एवं युवतियों के यौन अंगों को विकृत किया जाता है ...Genital mutilation of females. और एक पल के लिये मुझे लगा कि आज कल कुछ देशों में इन अंगों की पलास्टिक सर्जरी की सनक जो लोगों में सवार है, शायद उस के बारे में कुछ लिखा हो। लेकिन इस खबर को मैंने जैसे ही पूरा देखा तो मेरे पैरों के तले से ज़मीन खिसक गई।

तो सुनिये ... इस देश में बेटे की चाहत में हज़ारों-लाखों बच्चियों को गर्भ में ही कत्ल कर दिया जाता है...इस बात के लिये कोई सरकारी आंकड़ें शायद ही दिखेंगे। अभी कुछ अरसा पहले से यह भी सुनने में आने लगा है कि क्योंकि गर्भवती महिला का अल्ट्रासाउंड कर के उस के गर्भ में पल रहे बच्चे के बारे में बताना कि वह लड़की है या लड़का --- चूंकि अब यह काम जोखिम से भर रहा है (Is it really so? ….i doubt!) इसलिये कुछ अन्य तरीकों से –शायद क्रोमोसोमल स्टडीज़ नाम से कोई टैस्ट है जिस के द्वारा भी गर्भ में पल रहे शिशु का सैक्स पता किया जा सकता है। फिर यह आफ़त आई कि अब इस तरह की टैस्ट किट इंटरनेट पर उपलब्ध होने की वजह से भ्रूण-हत्या के लिये इस का गल्त प्रयोग किया जायेगा। लेकिन मैं जिस खबर की बात कर रहा हूं उस से तो हद ही हो गई....।

शायद मैंने कल यह पहली बार पढ़ा था कि बेटे को पाने की चाहत का सिरफिरापन इस कद्र बढ़ गया कि इस देश में इंदोर में सैंकड़ों छोटी छोटी बच्चियों का सैक्स परिवर्तन कर के उन्हें लड़का बना दिया गया ... अगर आप का ट्विटर एकाउंट है तो हैश genitoplasty ( #genitoplasty) कर के ट्विटर सर्च करिये और देखिए इंदोर की इस भयानक खबर के बहुत से लिंक।


उस समाचार में यह खुलासा किया गया है कि पांच साल की छोटी छोटी बच्चियों का भी यह आप्रेशन किया जा रहा है ---इस पर लगभग डेढ़ लाख के करीब खर्च आता है और ज़्यादातर लोग बड़े शहरों से आकर ये आप्रेशन करवाते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इंदौर के नामचीन सर्जन –प्राइव्हेट एवं सरकारी अस्पतालों से ये आप्रेशन कर रहे हैं, पढ़ कर बेहद दुःख हुआ। बस यही पढ़ना सुनना बाकी रह गया था।

इसलिये नैशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल् राइट्स (National Commission for protection of Child Rights)  ने इस तरह के केसों के बारे में मध्यप्रदेश सरकार से पूरी छानबीन कर के रिपोर्ट भेजने को कहा है।
दरअसल जैनिटोप्लास्टी आप्रेशन की मैडीकल कारणों से कुछ केसों में ज़रूरत पड़ सकती है जब किसी के अंदरूनी सैक्स अंग (internal sex organs) तो पुरूष के हों और बाहरी (external genitals) उस के साथ मैच न करते हों, उन में कोई कमी हो, कोई विकृति हो ताकि जैनिटोप्लास्टी आप्रेशन की मदद से उसे दुरूस्त किया जा सके। मैडीकल कारणों की वजह से यह आप्रेशन महिला में किया जा रहा है या पुरूष में --- Masculanizing Genitoplasty or Feminising Genitoplasty… कहलाता है।

लेकिन बिना किसी मैडीकल सिफारिश के किसी लड़की को लड़का बनाने का यह धंधा अमानवीय है, घोर निंदनीय है ..... कल जब मैं इस के बारे में नेट पर कुछ रिपोर्ट देख रहा था तो मैं यह देख कर भी अचंभित हुआ कि जो मां-बाप अपनी बच्चियों को इस तरह के आप्रेशन करवाने के लाते हैं उन्हें स्पष्टता से यह बता दिया जाता है कि इस तरह से बेटे आगे संतान सुख प्राप्त नहीं कर पाएंगे .....लेकिन फिर भी वे इस तरह के आप्रेशन के लिये सहमत हो जाते हैं.....छोटी छोटी बच्चियों की तो सहमति का प्रश्न ही कहां उठता है। और तो और, इस तरह के अनऐथिकल (unethical) आप्रेशन करने के बाद उन “ बेटों ’ को तरह तरह की हारमोनल दवाईयां भी दी जाती हैं.........................आप का इस समाचार के बारे में क्या ख्याल है, सिर दुःखता है न यह सब पढ़ कर, कल मेरा सिर भी भारी हो गया यह सब जान कर कि इतने इतने अमानवीय धंधे पनप रहे हैं और इंदौर जैसे व्यवसायिक शहर में।

लेकिन इंदौर की हो क्यों बात करें, रिपोर्ट इंदौर से आई है, पता नहीं और कहां कहां ये सब गोरखधंधे चल रहे होंगे। और नैशनल कमीशन फॉर प्रोटैक्शन ऑफ चाइल् राइट्स ने तो यह भी कहा है कि यह वह मामला नहीं कि किसी आप्रेशन के लिये मां बाप राजी हैं, सर्जन राजी है तो इस तरह के आप्रेशन कर दिये जाएं .....लेकिन इस तरह के आप्रेशनों के लिये डाक्टरों की एक कमेटी यह तय करती है कि क्या उस लड़की अथवा लड़के में मैडीकल कारणों की वजह से वह केस ज़रूरी है या नहीं।

देखते हैं कब इस तरह के धंधों पर रोक लगती है ...... अभी तो ये सब रहस्य अतीत के या आने वाले समय के गर्भ में ही है।

Friday, March 4, 2011

स्वस्थ लोगों को बीमार करने की सनक या कुछ और !

msnbc.com पर दो दिन पहले एक रिपोर्ट दिखी थी .. America’s past of US human experiments uncovered. इसे आप अवश्य पढ़िये क्योंकि तभी आप शायद समझ पाएंगे कि जब विदेशी कंपनियां अपनी दवाईयों, अपने इंजैक्शनों की टैस्टिंग के लिये भारत के लोगों को गिनि-पिग (guinea pigs) की तरह इस्तेमाल करते हैं तो क्यों मीडिया में इतना हो-हल्ला खड़ा हो जाता है। इसे जानने के लिये आप आगे पढ़िये।

अमेरिका में 1940 से 1960 के बीच कुछ ऐसे प्रयोग किये गये जिन में स्वस्थ लोगों को बीमार बना कर मैडीकल रिसर्च की गई। ये प्रयोग अपंग लोगों, कैदीयों, मानसिक रोगियों एवं गरीब अश्वेत लोगों पर किये गये।

मेरी तरह आप की यह सुन कर मत चौंकिये कि मानसिक रोगियों को हैपेटाइटिस बीमारी से बीमार किया गया। कैदियों को पैनडैमिक फ्लू नामक बीमारी के कीटाणु सूंघने के लिये दिये गये।

जैसे कि यह सब काफ़ी न था ---लंबे अरसे से बीमार लोगों को कैंसर कोशिकाओं का टीका लगा दिया गया।

आज से 65 साल पहले गिटेमाला में मानसिक रोगियों को सिफ़लिस (आतशक, एक यौन रोग) का रोगी बना दिया गया ... कुछ लोगों को सूज़ाक (gonorrhea, यौन रोग) की बीमारी से ग्रस्त करने के लिये उन के गुप्तांग पर सूज़ाक के जीवाणुओं के टीके लगाये गये।

और रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे दर्जनों प्रयोग किये गये जिन्हें उस समय के मीडिया द्वारा कभी कवर भी नहीं किया जाता था। एक और रिसर्च के बारे में सुनिए – 600 अश्वेत मरीज़ों को जो सिफिलिस (आतशक) से ग्रस्त थे, उन्हें दवाई ही नहीं दी गई।

जिस msnbc.com की रिपोर्ट का मैंने ऊपर लिंक दिया है, उस में एक डाक्टर को दिखाया गया है कि किस तरह से 1945 में वार्ड में एक मरीज़ में मलेरिया रोग उत्पन्न करने के लिये प्रयत्नशील है।  यह सब मैंने आज पहली बार देखा है...

अब मेरे से और नहीं लिखा जा रहा, बाकी रिपोर्ट आप स्वयं ही पढ़ लीजिएगा ..... और इस तरह के कामों को सही ठहराने के लिये कुछ तर्क भी इस रिपोर्ट में दिये गये हैं जिन के साथ मैं तो व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं.... आप का क्या ख्याल है ?

जब मैं डैंटिस्ट्री पढ़ रहा था तो हमारे प्रोफैसर साहब हमें एक Vipeholm Study (1945-55) के बारे में सुनाया करते थे किस तरह एक मानसिक रोग केंद्र में मानसिक रोगों में दंत-क्षय पैदा करने के लिये जम कर मिठाईयां आदि खिलाई जाती थीं और ये सुन कर ही हमारे चेहरे लाल हो जाया करते थे लेकिन अब वक्त के साथ लगता है सच में खून ठंड़ा पड़ चुका है, क्योंकि इतना सब कुछ पढ़ लेने के बाद भी कुछ भी नहीं हुआ। कहीं आप का सिर तो चकराने नहीं लग गया ?





Tuesday, February 15, 2011

ओव्हर-डॉयग्नोसिस से ओव्हर-ट्रीटमैंट का कुचक्र.. 2.

हां तो बात चल रही थी बिना वजह होने वाले सी.टी स्कैन एवं एम आर आई की .. यह सब जो हो रहा है हम पब्लिक को जागरूक कर के इसे केवल कुछ हद तक ही कम कर सकते हैं। मार्कीट शक्तियां कितनी प्रबल हैं यह आप मेरे से ज़्यादा अच्छी तरह से जानते हैं।

नितप्रतिदिन नये नये टैस्ट आ रहे हैं, महंगे से महंगे, फेशुनेबल से फेशुनेबल ... अभी दो दिन पहले ही अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने एक थ्री-डी मैमोग्राफी को हरी झंडी दिखाई है। वैसे तो अब मैमोग्राफी की सिफारिशें भी संशोधित की जा रही हैं ... वैसे भारत में तो यह समस्या (बार बार मैमोग्राफी करवाने वाली ) भारत में देखने को बहुत कम मिलती है ... क्योंकि विभिन्न कारणों की वजह से यहां महिलायें ये टैस्ट करवा ही नहीं पातीं... और विशेषकर वह महिलायें जिन्हें इन की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है..... इन दिनों विदेशों में इस टैस्ट के बारे में भी गर्म चर्चा हो रही है ...और जिस उम्र में यह टैस्ट किया जाना शुरू किया जाना चाहिए अब उसे आगे बढ़ा दिया गया है ...

भारत में तो महिलायें अगर वक्ष-स्थल के नियमित स्वतः निरीक्षण (regular self-examination of breasts) के लिये भी जागरूक हो जाएं तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी ...ताकि समय रहते वे किसी भी गांठ को अपनी डाक्टर को दिखा कर शंका का निवारण कर सकें।

अब थोड़ी बात करते हैं ..पौरूष-ग्रंथी (prostate gland) के लिये किये जाने वाले टैस्टों के बारे में ...एक उम्र के बाद पुरूषों के नियमित चैक-अप में प्रोस्टेट ग्लैंड की सेहत पता करने के लिये भी एक टैस्ट होता है .. Prostate specific antigen. यह एक तरह की रक्त की जांच है और इस की वेल्यू नार्मल से बढ़ी होने पर कईं बार अन्य टैस्टों को साथ रख कर देखते हुये प्रोस्टेट ग्रंथी के कैंसर से ग्रस्त होने की आशंका हो जाती है और पिछले कुछ महीनों में यह इसलिये चर्चा में है क्योंकि इस टैस्ट के अबनार्मल होने की वजह से प्रोस्टेट के इतने ज़्यादा आप्रेशन कर दिये गये और बहुत से लोगों को तो कैंसर का इलाज भी दे दिया गया  ...लेकिन चिकित्सा वैज्ञानिकों ने बाद में यह निष्कर्ष निकाला कि केवल इस टैस्ट की वेल्यू बढ़ी होने से ही इस ग्रंथी के इलाज के बारे में कुछ भी निर्णय लेना उचित नहीं है। इसलिये अब प्रोस्टेट ग्लैंड की बीमारी जानने के लिेये दूसरे पैरामीटर्ज़ पर भी ज़ोरों-शोरों से काम चल रहा है।

अमेरिका में हर साल 10 लाख बच्चों के टोंसिल का आप्रेशन कर के उन के टौंसिल निकाल दिये जाते हैं...और इन की उम्र 15 वर्ष से कम की होती है...लेकिन अब ताज़ा-तरीन सिफारिश कह रही है कि नहीं, नहीं, मॉडरेट केसों के लिये यह टौंसिल निकालने का आप्रेशन बंद किया जाए ....

तो, ये तो थी केवल कुछ उदाहरणें ... बातें केवल यही रेखांकित करती हैं कि हम लोग कभी भी शैल्फ-डॉयग्नोसिस के चक्कर में न ही पड़ें तो ठीक है, वरना तो रिस्क ही रिस्क है। और आप देखिये कि मैडीकल साईंस में रोज़ाना बदलाव हो रहे हैं.... विभिन्न तरह के टैस्टों की, दवाईयों की, आप्रेशनों की सिफारिशें नये शोध के मद्देनज़र अकसर बदलती रहती हैं, ऐसे में अगर कोई समझ ले कि नेट पर सेहत के बारे में दो बातें पढ़ कर वह स्वयं कोई टैस्ट करवा लेगा और स्वयं भी अपनी तकलीफ़ का निदान और शायद चिकित्सीय उपचार भी ढूंढ ही लेगा, तो ऐसा सोचना एकदम फ़िजूल की बात है.... इस जटिल शरीर-प्रणाली को समझते जब डाक्टरों की उम्र बीत जाती है तो फिर आम जन कहां ....!! लेकिन इस का मतलब यह भी नहीं कि सामान्य बीमारियों, जीवनशैली से संबंधित रोगों के बारे में अपना ज्ञान ही न बढ़ाया जाए .....यह बहुत ज़रूरी है, इस से हमें होलिस्टिक जीवनशैली (holistic lifestyle) अपनाने के बारे में सोचने का कम से कम अवसर तो मिलता ही है।
शेष ...अगली पोस्ट में..



ओव्हर-डॉयग्नोसिस से ओव्हर-ट्रीटमैंट का कुचक्र.. 1.

अभी पिछले कुछ दिनों में ओव्हर-डॉयग्नोसिस और उस के बाद बिना वजह इलाज के बारे में बहुत कुछ देखने को मिला। कुछ ही दिन पहले की बात है कि एक स्टडी का यह परिणाम सामने आया कि अमेरिका में हज़ारों लोगों के हृदय के ऐसे आप्रेशन ( heart devices) कर दिये गये जिन की उन्हें ज़रूरत ही नहीं थी।

एक अंग्रेज़ी की कहावत है...little knowledge is a dangerous thing! लोगबाग भी बस टीवी पर एक कार्यक्रम देख कर या अखबार में एक "एड्वर्टोरियल"(जिस विज्ञापन को एक खबर का रूप दे कर आप के सामने पेश किया जाता है) पढ़ कर तय कर लेते हैं कि हो न हो, यह जो सिरदर्द कईं दिनों से हो रहा है, यह किसी ब्रेन-ट्यूमर की वजह से हो सकता है।

डाक्टर के पास जाकर सीधा यह कहने वालों की गिनती में कोई कमी नहीं है कि वे सी.टी स्कैन अथवा एम.आर.आई करवाना चाहते हैं...डाक्टर लोग अपनी जगह अलग परेशान हो जाते हैं कि यह क्या माजरा है। और अगर कोई ऐसा न करवाने का मशविरा देता है तो क्या फर्क पड़ता है, कोई दूसरा तो लिख देगा। और शायद जिस मरीज़ ने पैसे स्वयं भरने हैं उन का वैसे ही स्वागत है ...किसी भी सेंटर में जाकर कुछ भी करवा के आ जाएं। और जिन संस्थाओं में यह खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है, वहां पर भी विभिन्न कारणों की वजह से इस तरह के टैस्ट खूब हो ही रहे हैं। कईं बार सोचता हूं कि इस तरह की एक स्टड़ी होनी चाहिये जिस से यह पता चल सके कि जितने भी ये सीटी स्कैन, एम आर आई टैस्ट हुये इन में से कितनों की रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ी आई .... और कितने केसों का आगे इलाज इन की रिपोर्ट के आधार पर हो पाया।

अब खूब लिटरेचर आ चुका है कि बिना वजह किये गये सी टी स्कैन आदि से किरणें हमारे शरीर में कितना नुकसान पहुंचा सकती हैं.... वैसे मैं यह भी सोचता हूं कि मरीज़ के स्वयं डाक्टर को सीटी स्कैन के लिये न कहने ही से क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा......इस का जवाब तो आप जानते ही हैं। लेकिन मरीज़ों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कभी भी डाक्टर को स्वयं इस तरह के टैस्टों के बारे में न कहें.... they are the best judge ...they know inside out of our systems!

चौंकने वाली बात तो यह है कि एमआरआई जैसे महंगे टैस्ट हो तो गये और बहुत बार इन में कोई unrelated changes (अनरिलेटेड बदलाव) दिख जाते हैं जिन का न तो वैसे पता ही चलता, और न ही इन की वजह से कभी तकलीफ़ ही होती और इसलिये इन का न ही कोई इलाज ही किया जाता ....लेकिन देख कर तो मक्खी कैसे निगली जाए...अब जब रिपोर्ट में आ जाए कि यह यह बदलाव अनयुयुल हैं तो फिर उन के इलाज के चक्कर में अकसर लोग पड़ जाते हैं या यूं भी कह लें कि इस तरह के चक्कर में डाल दिये जाते हैं। कल ही एक स्टडी देख रहा था कि यह जो लो-बैक के दर्द (low back pain) के लिये भी इतने एमआरआई हो रहे हैं इन की ज़रूरत ही नहीं होती।
बाकी अगली पोस्ट में ....




Monday, February 14, 2011

दवा की पुड़िया लेना खतरनाक तो है ही !

हर रोज़ मेरी मुलाकात ऐसे मरीज़ों से होती है जो पुरानी बीमारियों से जूझ रहे होते हैं और देसी दवाईयां ले रहे होते हैं.. और देसी दवाईयां कौन सी ? जो कोई भी नीम हकीम पुड़िया बना कर इन लोगों को थमा देता है और यह लेना भी शुरू कर देते हैं।

मैं किसी भी मरीज़ द्वारा इन पुडि़यों के इस्तेमाल किये जाने के विरूद्ध हूं। उस के कारण हैं ...मैं सोचता हूं कि नामी गिरामी कंपनियों की दवाईयां तो कईं बार क्वालिटी कंट्रोल टैस्ट पास कर नहीं पाती, ऐसे में इन देसी दवाईयों का क्या भरोसा? आज कल तो अमेरिका जैसे देशों में भी कुछ तरह की ये देसी दवाईयां खूब चर्चा में हैं .... यहां जैसा तो है नहीं वहां पर, टैस्टिंग होती है और फिर पोल खुल जाती है।

दूसरा कारण यह भी है कि अकसर सुनने में आता है कि नीम-हकीमों को यह पता लग चुका है कि ये जो स्टीरॉयड नाम की दवाईयां हैं, ये राम बाण का काम कर सकती हैं ....बस इन लालची किस्म के लोगों ने इन दवाईयों को पीस कर इन पुड़ियों में मिला कर आमजन की सेहत से खिलवाड़ करना शुरू किया हुआ है। यह आज की बात नहीं है, यह सब कईं दशकों से चल रहा है।

दो दिन पहले एक महिला आईं ... उस का पति बताने लगा कि यह गठिया से ग्रस्त है ..मैंने कहा कि कोई दवाई आदि ? ...उस ने बताया कि इसे तो केवल एक देसी दवाई से ही आराम आता है ...उस से यह झट खड़ी हो जाती है .. मेरे पूछने पर उस ने बताया कि यह दवाई पुड़िया में मिलती है। मैंने उसे समझाया तो बहुत कि इस तरह की दवाई खाने के नुकसान ही नुकसान है , इस तो कईं गुणा बेहतर यही है कि आप इस के लिये कोई इलाज न ही करवाएं ...कम से कम बाकी के अंग तो बचे रहेंगे (कृपया इसे अन्यथा न लें)..

उस महिला का पति बता रहा था कि इसे न ही तो ऐलीपैथिक और न ही होमोपैथिक, आयुर्वैदिक दवा ही काम करती है .. और यह पुड़िया पिछले कईं सालों से खा रही है। अब जिस पुड़िया में स्टीरॉयड मिले हों, उस के आगे दूसरी दवाईयां क्या काम करेंगी .... लेकिन ये देसी दवाईयां स्टीरॉयड युक्त सारे शरीर को तहस-नहस कर देती हैं ... जोड़ों का दर्द तो दूर इन से कुछ भी ठीक नहीं होता, ये तो केवल क्वालीफाइड डाक्टरों के द्वारा इस्तेमाल करने वाली दवाईयां हैं।

और प्रशिक्षित डाक्टर भी इन दवाईयों को मरीज़ों को देते समय बहुत सावधानी बरतते हैं। इन दवाईयों को लेने की एक विशेष विधि होती है ...जो केवल प्रशिक्षित एवं अनुभवी डाक्टर ही जानते हैं।

मैं अकसर मरीज़ों को कहता हूं कि अगर आप को देसी इलाज ही करवाना है तो करवाएं लेकिन उस के लिये प्रशिक्षित डाक्टर हैं --होम्योपैथी में , आयुर्वेद प्रणाली के चिकित्सक हैं , वे आप को ब्रांडेड दवाईयां लिखते हैं ...अच्छी कंपनियों की दवाई लें और अपनी सेहत को दुरूस्त करें।

नीम हकीमों द्वारा पुड़िया में स्टीरायड नामक दवाईयां मिलाने की बात के इलावा मैंने बहुत बार ऐसा देखा है कि कुछ कैमिस्ट मरीज़ को तीन-चार तरह की जो खुली दवाईयां थमाते हैं उन में भी एक छोटी सी टेबलेट स्टीरायड की ही होती है ...मरीज़ का बुखार जाते ही टूट गया और कैमिस्ट हो गया सुपरहिट ....चाहे वह उसे स्टीरायड खिला खिला कर बिल्कुल खोखला ही क्यों न कर दे।

कुछ चिकित्सक अपने मरीज़ों को खुली टेबलेट्स, खुले कैप्सूल देते हैं, मुझे इस में भी आपत्ति है, जब स्ट्रिप में, बोतल में बिकने वाली दवाईयां नकली आ रही हैं, रोज़ाना मीडिया में देखते पढ़ते हैं न, तो फिर इस तरह से खुले में बिकने वाली दवाईयों की गुणवत्ता पर सवालिया निशान क्यों नहीं लगता ?

बस ध्यान केवल इतना रहे कि पुड़िया थमाने वालों से और इस तरह की पुड़िया से दूर ही रहने में समझदारी है ... वरना तो बस गोलमाल ही है। लेकिन क्या मेरे लिखने से आज से पुड़िया खानी बंद कर देंगे .. देश की अपनी समस्याएं हैं ..गरीबी, अनपढ़ता, जनसंख्या का सुनामी.....अनगिनत समस्याएं हैं, मैंने भी यह लिखते समय  एक ऐसे कमरे में जहां घुप अंधेरा है, वहां पर एक सीली हुई दियासिलाई सुलगाने का जुगाड़ कर रहा हूं.... कभी तो इस गीली तीली में भी आग लगेगी.. जागरूकता का अलख जग के रहेगा , कोई बात नहीं, मैं इंतज़ार करूंगा।


Thursday, June 3, 2010

दुर्बलता(?) के शिकार पुरूषों की सेहत से खिलवाड़

आज मैं एक रिपोर्ट देख रहा था जिस में इस बात का खुलासा किया गया था कि इंपोटैंस (दुर्बलता, नपुंसकता) के लिये लोग डाक्टर से बात करने की बजाए अपने आप ही नैट से इस तकलीफ़ को दुरूस्त करने के लिये दवाईयां खरीदने लगते हैं।
और नेट पर इस तरह से खरीदी दवाईयों की हानि यह है कि कईं बार तो इन में टॉक्सिंस(toxins) मिले रहते हैं, बहुत बार इन में साल्ट की बहुत ज़्यादा खुराक होती है और कईं बार बिल्कुल कम होती है। और तो और इस तरह की दवाईयां जो नेट पर आर्डर कर के खरीदी जाती हैं उन में नकली माल भी धडल्ले से ठेला जाता है क्योंकि ऐसे नकली माल का रैकेट चलाने वाले जानते हैं कि लोग अकसर इन केसों में नकली-वकली का मुद्दा नहीं उठाते। तो, बस इन की चांदी ही चांदी।
अपनी ही मरजी से अपनी ही च्वाईस अनुसार मार्केट से इस तरह की दवाईयां उठा के खाना खतरनाक तो है ही लेकिन उच्च रक्त चाप वाले पुरूषों एवं हृदय रोग से जूझ रहे लोगों के लिये तो ये और भी खतरनाक हैं।
आप यह रिपोर्ट - Dangers lurk in impotence drugs sold on web..देख कर इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि इस तरह की दवाईयों में भी नकलीपन का जबरदस्त कीड़ा लग चुका है।
शायद अपने यहां यह नेट पर इस तरह की दवाईयां लेने जैसा कोई बड़ा मुद्दा है नहीं, हो भी तो कह नहीं सकते क्योंकि यह तो flipkart से शॉपिंग करने जैसा हो गया। लेकिन आप को भी इस समय यही लग रहा होगा कि अगर विकसित देशों में यह सब गोलमाल चल रहा है तो अपने यहां तो हालात कितने खौफ़नाक होंगे।
मुझे तो आपत्ति है जिस तरह से रोज़ाना सुबह अखबारों में तरह तरह के विज्ञापन लोगों को ये "ताकत वाले कैप्सल" आदि लेने के लिये उकसाते हैं----बादशाही, खानदानी कोर्स करने के लिये भ्रमित करते हैं ----गोल्ड-सिल्वर पैकेज़, और भी पता नहीं क्या क्या इस्तेमाल करने के लिये अपने झांसे में लेने की कोशिश करते हैं।
और इन विज्ञापनों में इन के बारे में कुछ भी तो नहीं लिखा रहता कि इन में क्या है, और कितनी मात्रा में है। मुझे इतना विश्वास है कि इन में सब तरह के अनाप-शनाप कैमीकल्स तो होते ही होंगे.....और ये कुछ समय बाद किस तरह से शरीर को कितनी बीमारियां लगा देंगे, यह तो समय ही बताता है।
तो फिर कोई करे तो क्या करे ? ---सब से पहले तो इतना समझ के चलने के ज़रूरत है कि अधिकांश केसों में लिंग में पूरे तनाव का न हो पाना ....यह दिमाग की समस्या है...भ्रम है, और इसे भ्रम को ही ये नीम-हकीम भुना भूना कर बहुमंजिली इमारतें खड़ी कर लेते हैं। युवा वर्ग में तो अधिकांश तौर पर किसी तरह के इलाज की ज़रूरत होती नहीं ---केवल खाना पीना ठीक रखा जाए, नशों से दूर रहा जाए....और बस अपने आप में मस्त रहा जाए तो कैसे यह तकलीफ़ जवानी में किसी के पास भी फटक सकती है।
लेकिन अगर किसी व्यक्ति को यह तकलीफ़ है भी तो उसे तुरंत अपने फ़िज़िशियन से मिलना चाहिए ---वे इस बात का पता लगाते हैं कि शरीर में ऐसी कोई व्याधि तो नहीं है जिस की वजह से यह हो रहा है, या किसी शारीरिक तकलीफ़ में दी जाने वाली दवाईयों के प्रभाव के कारण तनाव पूरा नहीं हो पा रहा या फिर कोई ऐसी बात है जिस के लिये किसी छोटे से आप्रेशन की ज़रूरत पड़ सकती है। लेकिन यह आप्रेशन वाली बात तो बहुत ही कम केसों में होती है। और कईं बार तो डाक्टर से केवल बात कर लेने से ही मन में कोने में दुबका चोर भाग जाता है।
अब फि़जिशियन क्या करते हैं ? -सारी बात की गहराई में जा कर मरीज़ की हैल्प करते हैं और शायद कुछ केसों में इस तकलीफ़ के समाधान के लिये बाज़ार में उपलब्ध कुछ दवाई भी दे सकते हैं। और अगर फिजिशियन को लगता है कि सर्जन से भी चैक-अप करवाना ज़रूरी है तो वह मरीज़ को सर्जन से मिलने की सलाह देता है।
कहने का अभिप्रायः है कि बात छोटी सी होती है लेकिन अज्ञानता वश या फिर इन नीमहकीमों के लालच के कारण बड़ी हो जाती है। लेकिन जो है सो है, लकीर पीटने से क्या हासिल ---कोई चाहे कितने समय से ही इन चमत्कारी बाबाओं की भस्मों, जड़ी बूटियों के चक्कर में पड़ा हुआ हो लेकिन ठीक काम की शुरूआत तो आज से की ही जा सकती है। क्या है, अगर लिंग में तनाव नहीं हो रहा, तो नहीं हो रहा, यह भी एक शारीरिक समस्या है जिस का पूर्ण समाधान क्वालीफाईड डाक्टरों के पास है। और अगर वह इस के लिये कोई दवाई लेने का नुस्खा भी देता है तो कौन सी बड़ी बात है ----यह मैडीकल फील्ड की अच्छी खासी उपलब्धि है। लेकिन अपने आप ही अपनी मरजी से किसी के भी कहने पर कुछ भी खा लेना, कुछ भी पी लेना, कुछ भी स्प्रे कर लेना, किसी भी ऐरी-गैरी वस्तु से मालिश कर लेना तो भई खतरे से खाली नहीं है।
एक अंग्रेज़ी का बहुत बढ़िया कहावत है --- There is never a wrong time to do the right thing. इसलिये अगर किसी को इस तरह की तकलीफ़ है भी तो यह कौन सी इतनी बड़ी आफ़त है -----डाक्टर हैं, उन से दिल खोल कर बात करने की देर है---- उन के पास समाधानों का पिटारा है। शायद मरीज़ को लगे कि यार, यह सब डाक्टर को पता लगेगा तो वह क्या सोचेगा? ---उन के पास रोज़ाना ऐसे मरीज़ आते हैं और उन्हें कहां इतनी फुर्सत है कि मरीज़ के जाने के बाद भी ये सब सोच कर परेशान होते रहें। अच्छे डाक्टर का केवल एक लक्ष्य होता है कि कैसे उसे के चेहरे पर मुस्कान लौटाई जाए -----अब इतना पढ़ने के बाद भी कोई इधर उधर चक्करों में पड़ना चाहे तो कोई उसे क्या कहे।
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