मंगलवार, 15 जनवरी 2008

जहां पर वडे-पाव का भी भरोसा नहीं, वहां भी रेडियो-जाकी........

हां, तो दोस्तो बात हो रही थी मुझे मेरी स्लेट मिलने की जो मुझे कल इस बलोग के रूप में मिल ही गई। अब आएगा मज़ा---साथियो, अब देखना मैं कैसी मस्ती से इस पर अपने दबे हुए, अव्यवस्थित , उलझे हुए, literally cluttered विचारों से नित नईं तस्वीरें बनाऊंगा...............और इस के साथ ही साथ जो जिंदगी में सीखा उसे दोबारा से भूलने के लिए भी इस स्लेट का इस्तेमाल करूंगा। लेकिन आप का साथ जरूरी है, हौंसला बना रहेगा, अगर अकेला हो गया तो कहीं डर न जाऊं----ठीक उसी तरह से जैसे बचपन में मां रात के समय स्टोर से कुछ लाने को कहतीं तो मैं चला तो जाता लेकिन वहां जाते हुए भी और वहां से वापिस आते हुए भी ...बीजी, बीजी, बीजी, ......पुकारता रहता था, और वह भी बार बार हां, हां, हां कहते कहां थकती थीं।
दोस्तो, एक विचार जो अभी आ रहा है वह यह है कि जब स्कूल के पहले दिन स्लेट थमा दी जाती है तो लिखने को कुछ खास नहीं होता....लेकिन आज लिखने को इतना कुछ है कि समझ में ही नहीं आ रहा कि आखिर कहां से शुरूआत करूं......लेकिन यह भी कोई बात है ...लिखना तो शुरू करना ही होगा....अब यह बहाने बाजीयां आप से तो चलेंगी नहीं।
वैसे हैं तो हम पक्के बहाने बाज........अकसर यह भी बहाना करने से नहीं चूकते कि ज़िंदगी में कुछ मज़ा है नहीं.....कुछ spark सा नहीं है यार लाइफ....लेकिन अगर हम अपने आसपास एक नज़र दौडाएं तो हम समझ पाएंगे कि ज़िंदगी आखिर है क्या......इतनी ज्यादा इंस्पीऱेशन इस कायनात के कतरे कतरे में भरी पड़ी है कि हम जितनी बटोरना चाहें बटोर लें। चलिए, बात एक रेडियो-जाकी की जिंदगी से करते हैं......क्या आप समझते हैं कि उस खुदा के बंदे की लाइफ में कोई धूप-छांव नहीं होगी.....क्या उस का मूड हमेशा टाप गेयर में ही होता होगा....नहीं, बिलकुल जरूरी नहीं , वह भी आखिर इंसान है.....पता नहीं किन किन जिंदगी की परेशानियों से वह बेचारा दोचार हो रहा है या हो रही है, लेकिन हम तो बस हर बात को टेकन फार गारंटिड वाले अपने मांदड-सेट से नहीं निकल पाते। लेकिन उस की ज़िंदा दिली देखिए कि वह अपने हिस्से के तनाव कितनी बखूबी किसी भीतरी कौने में दबा के कैसे आप के चेहरे पर सुबह सुबह पहली मुस्कुराहट लाता है। जीना इसी का नाम है.....कितना बडा आर्ट है किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट बिखेरना..............चेहरे पर असली मुस्कुराहट तभी आती है जब अंदर से रूह खुश होती है, नहीं तो भला किसे पड़ी है आज के दौर में अपने चेहरे की मांसपेशियों को कष्ट देने की। So, hats off to these radio-jockeys !! I am highly impressed by their energy levels…..howsoever turbulent times they might be facing in their personal lives. May God bless them always so that they keep on spreading broad smiles on the faces of a common man……फुटपाथ पर अखबारों का बिस्तर बना कर सो रहे जिन बेचारों को यह भी नहीं पता होता कि सुबह के वडे-पाव का जुगाड़ होना भी है या नहीं, उन को भी यह हमारा हीरो- रेडियो जाकी- नए दिन की शुभकामनाएं खुले दिल से बांटने बिलकुल समय पर आ जाता है जिसे वह अपना फुटपाथी बंधू झट से या तो अपने पास ही पड़े किसी एफएम पर उसी समय रिसीव कर लेता है , नहीं तो पास के किसी चाय के खोमचे से एफएम की आवाज़ सुन कर यही समझता है कि वह रेडियो वाला उसे ही सुप्रभात कह रहा है, कह रहा है कि उठ जा बंदे, कमर कस ले, देख आज का सूरज तेरे लिए एक नया संदेश, नया तोहफा लेकर आया है कि जी ले जितनी जिंदादिली से जी सकता है...............बस यही है जिंदगी.........और साथ में अपना रेडियो-जाकी एक फड़कता हुया गाना भी सुना देता है.......
ओ सिकंदर- ओ सिकंदर – ओ सिकंदर--------
झांक ले झांक ले तू दिल के अंदर......
.......
आँख भला तेरी क्यों नम होती है,
पल में हवाएं पूरब से पश्चिम होती हैं।
वैसे, दोस्तो, अब मेरे एफएम पर भी एक दिल को छू लेने वाला फड़कता हुया गीत बज रहा है....विविध भारती पर सुहाना सफर कार्यक्रम में.............
आंसू भी हैं और खुशियां भी हैं,
दुःख सुख से भरी है यह जिंदगी,
तुझे कैसी मिली है यह जिंदगी,
ज़रा जी के तो देखो......
वाह, भई, वाह......कवि भाईयों, आप की भी कल्पना की उड़ान की दाद दिए बिना मैं कैसे विराम ले लूं......पता नहीं ये सब किस जगह बैठ कर यह सब कुछ रच देते हैं। लेकिन,दोस्तो, आपने फिर एक बार इतना हिला देने वाला गाना मिस कर दिया न.......इस लिए तो कहता हूं कि एफएम विशेषकर विविध भारती प्रोग्राम जरूर सुना करो.....यह हम सब देशवासियों को एक माला में तो पिरो के रखता ही है, साथ ही साथ मेरे जैसे करोड़ों को जमीन से जोड़ के भी रखता है। आप को क्या लगता है ....
अच्छा,तो दोस्तो, मेरी स्लेटी खत्म हो गई है, साथ में स्लेट भी तो भर गई है........चलो, कहीं से डस्तर ढूढता हूं.......
फिर मिलते हैं।।। Please take care !!

केवल नमक ही तो नहीं है नमकीन !

अकसर हम लोग केवल नमक को ही नमकीन की कैटेगरी में लेने की चूक कर देते हैं। यह तो हम सब जानते ही हैं कि नमक का हमारी सेहत के साथ विशेषकर हमारे ब्लड-प्रेशर के साथ चोली-दामन का साथ है। शरीर में जितना भी नमक ज्यादा होगा, उतना ही हमारे शरीर में पानी की मात्रा बढ़ जायेगी जिस से फिर ब्लड-प्रेशर होना स्वाभाविक ही है। वास्तव में, दोस्तो , हम जो नमक खाते हैं , उस का फार्मूला है सोडियम क्लोराइड( केवल उन बंधुओं के लिए बता रहा हूं जो साईंस बैकग्राउंड से नहीं हैं) .....और वास्तव में यह सारा खेल नमक में मौजूद सोडियम आय्न्स( sodium ions) का ही है, उन की यही विशेषता है कि वे हमारे शरीर में वाटर रिटेंशन को बढ़ावा देते हैं। इसलिए हमें इस सोडियम से बच के ही रहना चाहिए ।

ो, अब बात आती है कि अगर सोडियम ही विलेन है तो सोडियम तो फिर हमारे खाने वाली और भी चीज़ों में मौजूद है, क्या वह हमारी सेहत को खराब नहीं करता ? -- आप बिल्कुल ठीक सोच रहे हैं कि सोडियम कहीं से भी हमारे शरीर में आए, वह हमारे शरीर में पानी तो इक्टठा करता ही है। चलिए, बात करते हैं ---मीठे सोडे की, वही जिसे हम लोग बेकिंग सोडा भी कहते हैं, इस का कैमिकल फार्मूला है---सोडियम बाईकार्बोनेट अर्थात् फिर वही विलेन सोडियम.....जी हां, यह वाला सोडियम भी उसी कैटेगरी में ही आता है। यहां यह ध्यान रहे कि सभी बेकरी प्राड्क्टस में, प्रोसैस्ड फूड्स इत्यादि में भी यह बेकिंग पावडर मिला ही होता है, जिन के माध्यम से भी सोडियम हमारे शरीर में जाता रहता है। तो, अगली बार जब आप का डाक्टर नमक कम करने की सलाह दे, तो आप यह मत भूलिएगा कि केवल नमक ही नमकीन नहीं है......कुछ छुपे रूस्तम और भी हैं।

यह बात भी नहीं है कि जिस बंदे को ब्लड-प्रेशर है केवल उसे ही ज्यादा नमक से बच के रहना है, बल्कि एक स्वस्थ बंदे का भी इस सोडियम नामक विलेन से बचने में ही बचाव है। यहां तक कि बच्चों में भी जितना कम नमक खाने की आदत डाली जाए, उतनी ही ठीक है.....देखिए, यह नमक ही नमकीन वाली मैंटैलिटि कितनी हमारे अंदर घर कर चुकी है कि मैं सोडियम की बजाए बार-बार नमक ही लिखे जा रहा हूं। , चलें, देखते हैं कि कैसे इस नमक के कम इस्तेमाल से हम अपनी तंदरूस्ती में मिठास घोल सकते हैं....
  • सब से पहले तो अपनी खाने वाली टेबल से वह बरसों पुरानी नमकदानी अभी हटा दीजिए। न वह वहां पड़ी होगी, और न ही झट से आप उस के ऊपर लपकेंगे। उसे किचन से मंगवाने में या तो आप ही आलस कर जाएंगे या तो लाने वाला ही शायद भूल जाएगा। सो, दही, सब्जी, दाल में खाने की मेज पर बैठ कर नमक न छिड़कें।
  • दूसरी बात यह है कि स्लाद के ऊपर, विभिन्न फलों के ऊपर नमक न ही डालें तो ठीक है। दही , लस्सी , जूस भी बिना नमक के ही पिएं तो ही आप की सेहत के लिए ज्यादा ठीक होगा। शिकंजी में भी नमक की मात्रा कम ही रखें। बाजार में गन्ने का रस पीते समय भी दुकानदार को नमक न ही डालने की ही हिदायत दें।
  • छोटे बच्चों में भी इन सब बातों का ध्यान रखें क्योंकि जब वे बढ़े होंगे तो फिर उन के भी स्वाद वैसे ही डिवैल्प हो जाएंग।
  • अकसर , कईं मरीजों को कहते सुना है कि इस ब्लड-प्रेशर की वजह से अब तो दाल-सब्जी भी फीकी ही खानी शुरू कर दी है, लेकिन यही लोग बाद मेंबताते हैं कि वे बस नमकीन लस्सी, नमकीन दही, आचार आदि के ही शौकीन हैं। इस का मतलब सोडियम तो शरीर में पहुंच ही गया --चाहे किसी भी रूप में ही पहुंचे।
  • हां, तो आचार से याद आया कि इस में नमक की बहुत ही ज्यादा मात्रा होती है, इस लिए अगर ब्लड-प्रेशर के मरीज इस से भी बच कर ही रहें तो ही बेहतर होगा।
  • यहां तक कि बाजार में बिकने वाले जंक फूड में , भुजिया वगैरह में भी नमक की मात्रा बहुत ज्यादा होती है।
  • दोस्तो, यह कोई कर्फ्यू वाली बात तो है नहीं कि मैंने कहा और आपने आज ही से सारी चीज़ें खानी छोड़ देनी हैं , बस मेरी तो इतनी सी गुज़ारिश है कि जो कुछ भी खाएं उस के अपने शरीर पर होने वाले प्रभावों के बारे में भी जरूर सोच लिया करें। देखिए, आप को भी मेरी तरह कैसे इन सब चीज़ों से विरक्ति सी ही हो जाएगी।
  • कभी कभी कसम तोड़ने में भी कोई बुराई नहीं है......बहुत ज्यादा गर्मी में नमकीन लस्सी ,नमकीन शिकंजी अथवा तरबूज पर नमक लगाने का स्वाद भी तो भूले नहीं भूलता ....क्या करें......ठीकहै, ठीक है, कभी कभी कसम तोड़ देने से ही जान में जान आती है।
  • वैसे तो दोस्तो, किताबों में यह भी लिखा है कि एक बंदे को दिन में बस इतने ग्राम नमक ही खाना चाहिए....लेकिन पता नहीं जो बात लोगों को कंफ्यूज़ करे, मुझे उन से हमेशा ही से चिड़ रही है। अब, कौन यह हिसाब किताब रखे.....ऐसे में बेहतर यही है न कि ऊपर लिखी हुईं सीधी साधारण बातों को ही अपने जीवन में उतार लिया जाए। दाल, सब्जी में तो हम लोग वैसे ही स्वाद से थोडा़ सा भी ज्यादा नमक कहां सहन कर पाते हैं। वैसे भी कुदरती खाद्य़ पदार्थों में तो पहले से ही सोडियम रहता ही है।
  • दोस्तो, वैसे तो बाज़ार में ब्लड-प्रेशर के मरीज़ों के लिए बाज़ार में कम-सोडियम वाला नमक भी मिलता है, लेकिन प्रैक्टिस में मैंने देखा है कि ज्यादातर लोग वह खरीद नहीं पाते हैं और एक-आध बार खरीद भी लेते हैं तो उसे लगातार लेना उन से निभ नहीं पाता है।सैंकड़ों-हज़ारों में कोई एक इस को नियमित यूज़ कर भी लेता होगा, लेकिन इस सौ करोड़ से भी ज्यादा लोगों के देश में इस की बात ज्यादा क्या करें जहां अभी तक आम आदमी किसी बढ़िया सी कंपनी का आयोडाइजंड नमक तो लेने से कतराता रहता है।इसलिए हमारी भलाई तो इसी में है कि हम ऊपर लिखी छोटी छोटी बातों को अपने जीवन में उतारना, चाहे शुरू में थोड़ा-थोड़ा ही सही, शुरू कर दें। बात वही करनी मुनासिब सी लगती है जो कोई भी बंदा आज से ही क्या, अभी से ही अपनी जिंदगी में उतार ले।
  • तो , ठीक है ,दोस्तो , अगर आप ने आज गन्ने का रस पीने से पहले उस दुकानदार को नमक न मिलाने के लिए कह दिया ,तो मुझे यह लगेगा कि मेरी यह पोस्ट लिखने की मेहनत सफल हो गई.........क्या , आप समझ रहे हैं कि नहीं तो मैं लिखना बंद कर दूंगा...................अफसोस, दोस्तो, ऐसा न कर पाऊंगा क्योंकि आदत से मजबूर हूं and they say .....Old habits die hard !!

तंबाकू की लत से जुड़े कुछ मिथक....


कुछ दिन पहले जब मैं मुंबई के लोकल स्टेशनों के बाहर सुबह-सवेरे कुछ महिलाओं एवं बच्चों को दांतों पर मेशरी (जला हुया तंबाकू) घिसते हुए देख कर यही सोच रहा था कि यद्यपि यह भयंकर आदत मुंह के कैंसर को निमंत्रण देने के बराबर ही तो है, फिर भी जब हम विश्व तंबाकू मुक्ति दिवस मनाते हैं, तो उस अभियान में यह लोग केंद्र-बिंदु क्यों नहीं बन पाते। तम्बाकू पीना, चबाना, मुंह में लगाना या किसी भी रूप में प्रयोग करना नई महामारी को खुला निमंत्रण दिए जा रहा है और हम अपने अधिकतर संसाधन लोगों को केवल सिगरेट के दुष्परिणामों से वाकिफ़ करवाने में ही लगा देते हैं.........लेकिन समय की मांग है कि इस के साथ-साथ देश में व्याप्त तंबाकू प्रयोग से संबंधित विभिन्न मिथकों को तोड़ा जाए !!

बीड़ी सिगरेट से कम हानिकारक ?----

यह बिल्कुल गलत सोच है। बीड़ी भी कम से कम सिगरेट के जितनी तो घातक है ही। इस को सिगरेट की तुलना में चार से पांच गुणा लोग पीते हैं। एक ग्राम तंबाकू से औसतन एक सिगरेट तैयार होती है लेकिन इतना तंबाकू 3या 4 बीड़ीयां बनाने के काम आता है।

बीड़ी का आधा वज़न तो उस तेंदू के पत्ते का ही होता है जिस में तम्बाकू लपेटा जाता है। इतनी कम मात्रा में तम्बाकू होते हुए और अपना छोटा आकार होते हुए भी एक बीड़ी कम से कम भारत में बने एक सिगरेट के समान टार तथा निकोटीन उगल देती है, जब कि कार्बनमोनोआक्साइड तथा अन्य विषैले रसायनों की मात्रा तो बीड़ी में सिगरेट की अपेक्षा काफी ज्यादा होती है।

हुक्का पीना....कोई बात ही नहीं.....यह तो सब से सुरक्षित है ही !---रीयली ???-----हुक्के के कश में निकोटीन की मात्रा थोड़ी कम होती है क्योंकि इस में धुआं लम्बी नली व पानी में से छन कर आता है, लेकिन कार्बन-मोनोआक्साईड तथा कैंसर पैदा करने की क्षमता में कमी नहीं होती है। हुक्के में तंबाकू की मात्रा ज्यादा होती है जिससे शरीर में निकोटीन की मात्रा, ज्यादा देर तक हुक्का पीने के कारण बीड़ी सिगरेट के बराबर ही हानि पहुंचाती है।

यार, पिछले बीस-तीस साल से तो ज़र्दा-धूम्रपान का मज़ा लूट रहे हैं, अब क्या खाक होगा !----- ज़र्दा एवं धूम्रपान से होने वाली बीमारियों का शुरू शुरू में तो कुछ पता चलता नहीं है, इन का पता तब ही लगता है जब कोई लाइलाज बीमारी हो जाती है। लेकिन यह ही पता नहीं होता कि किस को यह लाइलाज बीमारी पांच वर्ष ज़र्दा-धूम्रपान के सेवन के बाद होगी या तीस वर्ष के बाद। चलिए, एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं--- अपने मकान के पिछवाड़े में बार-बार भरने वाले बरसात के पानी को यदि आप न देख पायें तो नींव में जाने वाले इस पानी के खतरे का अहसास आप को नहीं होगा। इस का पता तो तभी चलेगा जब इससे मकान की दीवार में दरार आ जाए या मकान गिर जाए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। ज़र्दा-धूम्रपान एक प्रकार से बार-बार पिछवाड़े में भरने वाले पानी के समान है।

रोगों को मिल गई खान,

जिसने किया ज़र्दा-धूम्रपान !!

पान-मसाला, ज़र्दा मुंह को बस थोड़ा तरोताज़ाही ही तो करता है, और है क्या, काहे की टेंशन मोल लें ?-

दोस्तो, पिछले दो-तीन दशकों से तो हमारे देश में तंबाकू खाने की लत बहुत ही बढ़ गई है। पान-सुपारी-चूना वगैरह के साथ तंबाकू मिलाकर उसे चबाने की अथवा गालों के अंदर या जीभ के नीचे या फिर होठों के पीछे दबा कर रखने की बुरी आदत शहरी एवं ग्रामीण दोनों वर्गों में बहुत ज्यादा देखने को मिलती है। पान-मसालों या तंबाकू युक्त गुटखा के उत्पादों का आकर्षण तो बस बढ़ता ही जा रहा है। इन को तो विज्ञापनों की मदद से कुछ इस तरह से पेश किया जाता है कि ये तो मात्र माउथ-फ्रेशनर ही तो हैं !!—लेकिन ये लतें भी धूम्रपान जितनी ही नुकसानदायक हैं।

इन के प्रयोग से मुंह की कोमल त्वचा सूखी, खुरदरी तथा झुर्रीदार बन जाती है। मरीज का मुंह धीरे-धीरे खुलना बंद हो जाता है और उस व्यक्ति की गरम, ठंडा, तीखा, खट्टा सहन करने की क्षमता बहुत ही कम हो जाती है। इस स्थिति को ही सब-म्यूकस फाईब्रोसिस कहा जाता है और यह मुंह में होने वाले कैंसर के लिए खतरे की घंटी ही है।

अब, देखा जाए तो देश में तंबाकू की रोकथाम के कायदे-कानून तो काफी हैं...लेकिन, दोस्तो, बात फिर वहीं आकर खत्म होती है कि कायदे, कानून कितने भी बन जाएं, लेकिन फैसला तो केवल और केवल आप के मन का ही है कि आप स्वास्थ्य चाहते हैं या तंबाकू-----अफसोस, आप दोनों को नहीं चुन सकते। बस, कोई भी फैसला लेते समय ज़रा ये पंक्तियां ध्यान में रखिएगा तो बेहतर होगा....

ज़र्दा-धूम्रपान की लत जो डाली,देह रह गई बस हड्डीवाली !!

तंबाकू की लत से जुड़े कुछ मिथक....



कुछ दिन पहले जब मैं मुंबई के लोकल स्टेशनों के बाहर सुबह-सवेरे कुछ महिलाओं एवं बच्चों को दांतों पर मेशरी (जला हुया तंबाकू) घिसते हुए देख कर यही सोच रहा था कि यद्यपि यह भयंकर आदत मुंह के कैंसर को निमंत्रण देने के बराबर ही तो है, फिर भी जब हम विश्व तंबाकू मुक्ति दिवस मनाते हैं, तो उस अभियान में यह लोग केंद्र-बिंदु क्यों नहीं बन पाते। तम्बाकू पीना, चबाना, मुंह में लगाना या किसी भी रूप में प्रयोग करना नई महामारी को खुला निमंत्रण दिए जा रहा है और हम अपने अधिकतर संसाधन लोगों को केवल सिगरेट के दुष्परिणामों से वाकिफ़ करवाने में ही लगा देते हैं.........लेकिन समय की मांग है कि इस के साथ-साथ देश में व्याप्त तंबाकू प्रयोग से संबंधित विभिन्न मिथकों को तोड़ा जाए !!
बीड़ी सिगरेट से कम हानिकारक ?----
यह बिल्कुल गलत सोच है। बीड़ी भी कम से कम सिगरेट के जितनी तो घातक है ही। इस को सिगरेट की तुलना में चार से पांच गुणा लोग पीते हैं। एक ग्राम तंबाकू से औसतन एक सिगरेट तैयार होती है लेकिन इतना तंबाकू 3या 4 बीड़ीयां बनाने के काम आता है।
बीड़ी का आधा वज़न तो उस तेंदू के पत्ते का ही होता है जिस में तम्बाकू लपेटा जाता है। इतनी कम मात्रा में तम्बाकू होते हुए और अपना छोटा आकार होते हुए भी एक बीड़ी कम से कम भारत में बने एक सिगरेट के समान टार तथा निकोटीन उगल देती है, जब कि कार्बनमोनोआक्साइड तथा अन्य विषैले रसायनों की मात्रा तो बीड़ी में सिगरेट की अपेक्षा काफी ज्यादा होती है।
हुक्का पीना....कोई बात ही नहीं.....यह तो सब से सुरक्षित है ही !---रीयली ???-----हुक्के के कश में निकोटीन की मात्रा थोड़ी कम होती है क्योंकि इस में धुआं लम्बी नली व पानी में से छन कर आता है, लेकिन कार्बन-मोनोआक्साईड तथा कैंसर पैदा करने की क्षमता में कमी नहीं होती है। हुक्के में तंबाकू की मात्रा ज्यादा होती है जिससे शरीर में निकोटीन की मात्रा, ज्यादा देर तक हुक्का पीने के कारण बीड़ी सिगरेट के बराबर ही हानि पहुंचाती है।
यार, पिछले बीस-तीस साल से तो ज़र्दा-धूम्रपान का मज़ा लूट रहे हैं, अब क्या खाक होगा !----- ज़र्दा एवं धूम्रपान से होने वाली बीमारियों का शुरू शुरू में तो कुछ पता चलता नहीं है, इन का पता तब ही लगता है जब कोई लाइलाज बीमारी हो जाती है। लेकिन यह ही पता नहीं होता कि किस को यह लाइलाज बीमारी पांच वर्ष ज़र्दा-धूम्रपान के सेवन के बाद होगी या तीस वर्ष के बाद। चलिए, एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं--- अपने मकान के पिछवाड़े में बार-बार भरने वाले बरसात के पानी को यदि आप न देख पायें तो नींव में जाने वाले इस पानी के खतरे का अहसास आप को नहीं होगा। इस का पता तो तभी चलेगा जब इससे मकान की दीवार में दरार आ जाए या मकान गिर जाए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। ज़र्दा-धूम्रपान एक प्रकार से बार-बार पिछवाड़े में भरने वाले पानी के समान है।
रोगों को मिल गई खान,
जिसने किया ज़र्दा-धूम्रपान !!
पान-मसाला, ज़र्दा मुंह को बस थोड़ा तरोताज़ाही ही तो करता है, और है क्या, काहे की टेंशन मोल लें ?-
दोस्तो, पिछले दो-तीन दशकों से तो हमारे देश में तंबाकू खाने की लत बहुत ही बढ़ गई है। पान-सुपारी-चूना वगैरह के साथ तंबाकू मिलाकर उसे चबाने की अथवा गालों के अंदर या जीभ के नीचे या फिर होठों के पीछे दबा कर रखने की बुरी आदत शहरी एवं ग्रामीण दोनों वर्गों में बहुत ज्यादा देखने को मिलती है। पान-मसालों या तंबाकू युक्त गुटखा के उत्पादों का आकर्षण तो बस बढ़ता ही जा रहा है। इन को तो विज्ञापनों की मदद से कुछ इस तरह से पेश किया जाता है कि ये तो मात्र माउथ-फ्रेशनर ही तो हैं !!—लेकिन ये लतें भी धूम्रपान जितनी ही नुकसानदायक हैं।
इन के प्रयोग से मुंह की कोमल त्वचा सूखी, खुरदरी तथा झुर्रीदार बन जाती है। मरीज का मुंह धीरे-धीरे खुलना बंद हो जाता है और उस व्यक्ति की गरम, ठंडा, तीखा, खट्टा सहन करने की क्षमता बहुत ही कम हो जाती है। इस स्थिति को ही सब-म्यूकस फाईब्रोसिस कहा जाता है और यह मुंह में होने वाले कैंसर के लिए खतरे की घंटी ही है।
अब, देखा जाए तो देश में तंबाकू की रोकथाम के कायदे-कानून तो काफी हैं...लेकिन, दोस्तो, बात फिर वहीं आकर खत्म होती है कि कायदे, कानून कितने भी बन जाएं, लेकिन फैसला तो केवल और केवल आप के मन का ही है कि आप स्वास्थ्य चाहते हैं या तंबाकू-----अफसोस, आप दोनों को नहीं चुन सकते। बस, कोई भी फैसला लेते समय ज़रा ये पंक्तियां ध्यान में रखिएगा तो बेहतर होगा....
ज़र्दा-धूम्रपान की लत जो डाली,देह रह गई बस हड्डीवाली !!

2 comments:

Gyandutt Pandey said...
कोई केन्सर अस्पताल का एक भ्रमण कर ले और मुंह के केन्सर के रोगियों की तादाद और व्यथा देखले तो तम्बाकू से वितृष्णा हो जाये - चाहे उसका सेवन किसी भी तरीके से हो।
Dr.Parveen Chopra said...
पांडे जी, आप बिलकुल सही फरमा रहे हैं। मुंह के कैंसर के रोगियों की मौत निसंदेह बेहद खौफनाक होती है।
पांडे जी, समय समय पर आप के द्वारा दिए गए प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

सोमवार, 14 जनवरी 2008

दोस्तो, मेरी तो भई आज तलाश खत्म हो गई !!


मैं बहुत दिनों से एक ऐसी बलोग लिखने की कोशिश में था जिस में जो मेरा दिल करे मैं लिखूं, जितना मन करे लिखूं, जब चाहे लिखना बंद कर दूं, जब चाहे फिर से शुरू कर दूं.....बेसिकली वह बलोग मैं अपने लिए ही लिखूं......जिस में अपनी प्लस प्वाईंटस एवं निगेटिव पवाईंटस बस मैं अपने आप को रिलीज़ करने के लिए लिखूं न कि टिप्पणीयां पाने के लिए। बस,जैसा मैं सोचूं वैसा ही लिख डालूं.....बिना किसी फिक्र-फाके के ......मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि अपने आप को किसी विषय विशेष में बांध कर रखने में मेरा तो सिर भारी हो जाता है। ठीक है, डाक्टर हूं, डाकटरी मेरा पेशा है, उस पर तो लिखूंगा ही , लेकिन मेरे अंदर भी जो आम आदमी की तरह लावा दहक रहा है उसे मैं कहां उंडेलूं.....मैं भी इंसान हूं.....मैं अपने आप को कैसे शांत करूं.......बस बहुत दिनों से क्या, बहुत महीनों से और शायद बहुत बरसों से ही ऐसे विचार तंग आते जा रहे थे.......अखबार वालों की शायद अपनी मजबूरी है कि वे ऐसा वैसा क्यों छापेंगे, लेकिन मेरी मजबूरी है कि मैं ऐसा वैसा लिखे बगैर रह नहीं सकता क्योंकि अपने मनकी बातें मन के अंदर दबा के मेरा तो भई सिर भारी हो जाता है। बस , मैं यही सोच रहा था कि इस को शीर्षक क्या दूं......बहुत दिनों से सोच रहा था कि इस को ग्रैफिटि नाम से पुकारूंगा...फिर लग रहा था कि यार, हिंदी ब्लागिंग में ऐसा नाम कुछ जंचता नहीं.....लेकिन, मैं अपने बलोग का शीर्षक कुछ इस तरह का देना चाह रहा था जिस में मेरे विचारों की स्वतंत्रता, लापरवाही, बेपरवाही झलके और मैं अपने आप को उड़ता हुया सा महसूस करूं। लेकिन दोस्तो कोई appropriate नाम सूझ नहीं रहा था, बस ऐसे ही सपने देखता रहा, ऐसे ही विचार करता रहा, ऐसे ही मनसूबे बनाता रहा।
दोस्तो, आज शाम को बैठे बैठे ध्यान आया कि चलो डिक्शनरी ले कर बैठ जाता हूं और ढूंढता हूंकोई अच्छा सा उपर्युक्त सा शीर्षक.........तो मैंने एक ओक्सफोर्ड डिक्शनरी, एक समांतर कोश- हिंदी का, और एक अंगरेजी हिंदी कोश ली और रजाई में बैठ गया। पहले तो ग्रैफिटी के ही अर्थ को हिंदी कोश में ढूंढने की कोशिश की.....लेकिन मजा आया नहीं, फिर और भी कुछ कुछ शब्द मन में आए----पोस्टर, placard आदि ...लेकिन पता नहीं , मुझे लगा सभी शब्द जो मेरे ध्यान में आए वे मेरी अभिव्यक्ति से कोसों दूर हैं।
बहुत परेशान सा लग रहा था कि अचानक बचपन में अमृतसर के कुंदन स्कूल में लिखी फट्टी की याद आ गई........दोस्तो, आप की जानकारी के लिए बताना चाहूंगा कि पंजाबी में हम लोग तखती को फट्टी कहते हैं। एक बार फट्टी की याद आ गई तो सलेट और सलेटी की याद भी आ गई। तो फिर वोह छोटी सी लोहे की दवात, काली स्याही और कलम कहां पीछे रह जाती।
बस,दोस्तो, मेरी तलाश आज पूरी हो गई है, और मैं एक बार अपने आप को चार-पांच साल के बच्चे जितना ही बेपरवाह महसूस कर रहा हूं ....मेरा जो दिल करेगा मैं अपनी सलेट पर लिखूंगा, लिखूंगा फिर मिटा दूंगा, फिर कुछ और बनाऊंगा.....बस बिलकुल किसी लापरवाह बच्चे की तरह....जिसे किसी तरह की सीमाएं बांध नही पाती हैं और न ही उसे किसी प्रकार की इन फिजूल की बंदिशों से कोई मतलब ही होता है। बस, आज तो मजा आ गया---मेरी फट्टी मुझे एक बार फिर मिल गई लगती है, जो चाहे करूंगा.......जब दिल करेगा अतीत की तस्वीर इस पर बनाऊंगा, जब दिल आने वाले समय के सपने बुनने को करेगा, तो उस में भी आशाओं के रंग भर कर अपनी फट्टी पर तैयार करूंगा.....................बस, शाम को उन सब को मिटा दिया करूंगा। दोस्तो, मुझे तो यही अफसोस हो रहा है कि मेरी यह प्यारी फट्टी, मेरी सलेट मेरे को पहले क्यों नहीं मिली......अब तक तो पता नहीं अपने अंदर तूफान मचा रहे विचारों को शांत भी कर चुका होता। लेकिन कोई बात नहीं ....There is a very important saying ……There is never a wrong time to do the right thing.
दोस्तो, आप ने अगर कभी तख्ती पर या स्लेट पर लिखा है तो आप भी मेरे से सहमत होंगे ही कि यारो हम उन दिनों में कितने बादशाह हुया करते थे.......जेब में पैसे टोटल दस.....पांच पैसे की दो स्लेटियां लेने पर, फिर यह च्वाईस तो अपनी ही हुया करती थी कि बचे हुए पांच पैसे का आमपापड़ लेना है, खट्टी मीठी कोई गोली लेनी है या वह टाटरी वाला बेहद खट्टा चूरऩ लेना है....यही बात हम जैसों को बादशाह की फिलींग दिलाने के लिए काफी थी ----थी न दोस्तो .........मैं कोई झूठ बोलया......कोई ना ...भई कोई ना !!!
दोस्तो, वो भी क्या दिन थे......कोई टेंशन नहीं ( केवल स्लेटी के जल्दी जल्दी घिसने के सिवा.....जिसे मैं कभी कभी खा भी जाया करता था...लेकिन किसी और से न कहना, नहीं तो वो मेरी डाक्टरी वाली बलोग्स में विश्वास करना बंद कर देंगे........खैर, दोस्तो, आज मुझे कोई परवाह नहीं....यह उन की प्राबलम होगी क्योंकि मुझे मेरी तख्ती, मेरी स्लेट इस ब्लोग के रूप में वापिस मिल गई है जिस पर मैं कुछ भी लिख कर एक बार फिर से अपनी मरजी का बादशाह बन कर आप को दिखाऊंगा.....क्या यार, मैं भी क्या क्या लिख जाता हूं... आप को क्या दिखाना---- आप तो अपने ही बलागर बंधु हो, मेरी किशती में ही सवार हो और अपना अपना खोया बेपरवाह बचपना ढूंढने में व्यस्त हो, आप से कोई कंपीटीशन थोडा ही है, आप तो सहयात्री हो, दुःख सुख के साथी हो। वो बचपन का साथी तो पता नहीं अब कहां है जिस के साथ जब पहले दिन हाथ में हाथ डाल कर, बस्ते में स्लेट डाल के, पीतल की छोटी सी डिब्बी में एक परांठा और एक गुड़ की ढली और वह पीले रंग का दस पैसे का वह सिक्का मुझे जो मेरे पिता जी ने बड़े प्यार से दिया था......इन सब से लैस होकर दुनिया के सबक सीखने के लिए उस पहले दिन जब स्कूल के लिए पैदल निकला था, तो रास्ते मे एक ग्रांउड में एक गहरा खड्डा देख कर हम ने पहले तो अपने उस लंच का भरपूर लुत्फ उठाया ,फिर अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ चले। कहां हो यार, चंद्रकांत आज कल तुम। लेकिन आज कल आप सब ब्लागर बंधुओं में भी मुझे उस दोस्त चंद्रकात की तस्वीर ही दिख रही है क्योंकि मुझे जब से मेरी फट्टी , मेरी स्लेट मिली है न , मैं बहुत ज्यादा लापरवाह, बेपरवाह, आज़ाद, बिल्कुल उड़ता हुया सा ही महसूस कर रहा हूं।
हां, तो जाते जाते एक बात और कीअब चूंकि मुझे मेरे बचपन की स्लेट .... एवं फट्टी मिल गई है, अब मुझे कोई भी किसी भी विषय की सीमाओं में नहीं बाँधा पाएगा। पर, अब एक दुःख है कि अपने आप को इतना तीसमार खां समझने लगा हूं कि यही समझ नहीं पा रहा हूं कि अब तख्ती पर पूरने किस से डलवाऊंगा-----पूरने समझते हैं न आप, जी , वही पैंसिल के साथ फट्टी के ऊपर लिखे गए फीके-फीके अक्षर जो अकसर मेरी बड़ी बहन बड़े ही प्रेम से डाल दिया करती थीं, जिस के ऊपर फिर मुझे लिखना होता था। ठीक है, दोस्तो, अब बिना किसी तरह के पूरनों की मदद से लिखने की कोशिश करूंगा.........................आप, प्लीज., मेरा साथ दीजिएगा।

जब पित्ते की पथरियां परेशान करने लग जाएं.......( Gall stones…..क्या हैं ये स्टोन और इन से कैसे निबटा जाए)


अकसर आप ने अपने आसपास लोगों को कहते सुना होगा कि फलां फलां बंदे के पित्ते में पथरियां थीं, बेहद परेशान था इसलिए उस को आप्रेशन करवाना पड़ा। कईं बार यह भी सुना होगा कि कोई व्यक्ति पित्ते की पथरी के दर्द से बेहद परेशान सा रहता है।

चलिए, आज पित्ते की पथरी के बारे में ही कुछ बातें करते हैं॥

पित्ते की पथरियां महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती हैं। बार-बार गर्भ धारण करना, मोटापा एवं अचानक वजन कम करने वाली महिलाओं में ये अधिकतर होती हैं।

पित्ते की पथरी के अधिकांश मरीजों को तो कईं कईं साल तक कोई तकलीफ़ ही नहीं होती और कुछ मरीजों में तो कभी भी इन का कुछ भी कष्ट नहीं होता। लेकिन इन पथरियों की वजह से कुछ व्यक्तियों में उग्र तरह के परिणाम देखने को भी मिलते हैं जैसेकि पेट में कभी कभी होना वाले बहुत ही ज्यादा दर्द, और कभी कभी तो जीवन को ही खतरे में डाल देने वाली अवस्थाएं जैसे कि पित्ते की सूजन (acute cholecystitis), पैनक्रियाज़ की सूजन(acute pancreatitis) या किसे बहुत ही विरले केस में पित्ते का कैंसर।

पित्ते की पथरियां ज्यादातर कोलैस्ट्रोल की ही बनी होती हैं। एक बार जब यह बनना शुरू हो जाती हैं तो फिर अगले दो-तीन वर्ष तक बढ़ती रहती हैं। लेकिन पित्ते की 85प्रतिशत पथरीयां दो सैंटीमीटर से कम डायामीटर वाली ही होती हैं।

आम तौर बीस साल पहले तक तो पित्ते की पथरी के इलाज का एक ही साधन हुया करता था जिस में आप्रेशन कर के पथरी समेत पित्ते को बाहर निकाल दिया जाता था। यह आप्रेशन तो आजकल भी किया जाता है। और सामान्यतयः इस आप्रेशन के बाद हस्पताल में पांच दिन तक दाखिल रहना पड़ता है और पूरी तरह से ठीक ठाक होने में तीन से छः हफ्ते का समय लग जाता है। पिछले कुछ सालों से पित्ते की पथरी के लिए दूरबीनी आप्रेशन भी बड़ा कामयाब सिद्ध हुया है।

बहुत से लोगों को पता नहीं है कि यह दूरबीनी आप्रेशन कैसे किया जाता है। थोड़ा बता देते हैं ......इस आप्रेशन के दौरान पेट (abdominal cavity) को कार्बनडाइआक्साइड गैस भर कर फुला दिया जाता है, उस के बाद लगभगआधे इंच के कुछ कट्स के रास्ते से अंदर से दूरबीनी फोटो लेने वाले एवं सर्जीकल औज़ारों को अंदरघुसा दिया जाता है। और इस आप्रेशन कीलाइव तस्वीरों को ओ.टी में लगी एक बड़ी स्क्रीन पर देखा जाता है। आप्रेशन के दौरान गाल-बलैडर (gall bladder-- पित्ते) को लिवर से अलग किया जाता है( सब कुछ दूरबीन से देख कर ही किया जाता है) और एक बार जब यह पित्ता फ्री हो जाता है तो उसे उन छोटे-छोटे कट्स में से किसी एक कट् के रास्ते से बाहर खींच लिया जाता है.....उसके बाद दूरबीन एवं अन्य औजारोको भी बाहर निकाल लिया जाता है, और जो पेट पर जो छोटे छोटे कट्स दिए गए होते हैं उन को बहुत सा आसानी से टांक दिया जाता है और एक छोटी पट्टी से उसे कवर कर दिया जाता है। इस प्रकार के दूरबीनी आप्रेशन के लिए हास्पीटल में केवल एक-दो दिन ही रहना पड़ता है और एक-दो हफ्ते में बंदा एकदम परफैक्टली फिट भी हो जाता है।

ज्यादातर पित्ते की पथरीयां सारी उम्र कोई भी तकलीफ नहीं देती हैं। एक बात और यह भी है कि जिन मरीज़ों में भी पित्ते की पथरी की वजह से किसी तरह की जटिलता ( complication) पैदा होती है, वह अचानक ही पैदा नहीं होती, उस से पहले अकसर पित्ते की पथरी के कईं प्रकार के लक्षण दिख जाते हैं। कुछ अपवादों (exceptions) को छोड़ कर, एक बार किसी मरीज़ के पित्ते में पथरीयां पाईं जाने पर और वह भी बिना किसी लक्षण के हैं और किसी तरह की उनकी कोई तकलीफ़ भी नहीं है, तो ऐसे केसों में भविष्य में किसी कंप्लीकेशन से बचने के लिए आप्रेशन की सलाह विशेषज्ञ अकसर नहीं देते हैं। जिन अपवादों की बात की है, उन में से एक तो यही है कि चाहे कोई लक्षण अथवा तकलीफ है या नहीं, लेकिन अगर पित्ते की पथरी तीन सैंटीमीटर डायामीटर से भी ज्यादा है तो उस का आप्रेशन तो हो ही जाना चाहिए। बाकी अपवाद इस लेख के scope से थोड़ा परे की ही बात है क्योंकि उन्हें मेरे लिए इतना सिंप्लीफाई कर के आप को बताना बड़ा मुश्किल लग रहा है कि वे आसानी से आप की समझ में आ जाएं।


एक बार अगर पित्ते की पथरीयों की कोई तकलीफ अथवा लक्षण हो जाता है तो फिर ये तकलीफ अधिकांश मरीजों में बार-बार होती रहती है। इस का मतलब यही है कि जिन मरीजों में भी पित्ते की पथरी के कुछ लक्षण दिखें अथवा उन्हें इस की कोई तकलीफ़ है, उन्हें तो इलाज करवा ही लेना चाहिए। यही कारण है कि संबंधित डाक्टर को पहले यही सुनिश्चित करना होता है कि किसी मरीज में पेट में दर्द किसी निष्क्रिय पड़ी हुईं पित्ते की पथरियों की वजह से है या किसी और तकलीफ से है। आप समझ रहे हैं न------कहीं ऐसा न हो कि मरीज को पित्ते की पथरीयों की वजह से तो कोई तकलीफ हो नहीं और उस के पित्ते का आप्रेशन कर दिया जाए। ऐसे केसों में असली कारण तो भी ज्यों का त्यों बना रहेगा। पित्ते की पथरी का दर्द जिसे अकसर बीलियरी कोलिक (biliary colic) भी कहा जाता है, यह दर्द अच्छा-खासा तेज़, अचानक ही उठता है, पेट के ऊपरी हिस्से में (epigastric) या पेट के ऊपरी दायें हिस्से में यह दर्द होता है जो कि एक घंटे से लेकर पांच घंटे तक रहता है और अकसर मरीज़ को रात में नींद से जगा देता है।


जो पित्ते के आप्रेशन के लिए दूरबीनी आप्रेशन की बात हो रही थी, कईं केसों में विशेषज्ञ वह करवाने की सलाह नहीं देते। लेकिन यह ध्यान रखें कि इस काम के लिए किसी अनुभवी लैपरोस्कोपिक सर्जन के पास ही जाना ठीक है जिसे इस तकनीक द्वारा पित्ते के आप्रेशन का अच्छा अनुभव हो। कईं लोग यह सोच लेते हैं कि मोटे लोगों में यह दूरबीनी आप्रेशन नहीं हो सकता, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोटे मरीज़ों में भी यह दूरबीनी आप्रेशन किया जा सकता है बशर्ते कि उन की पेट की चर्बी ( abdominal wall) इतनी ज्यादा हो कि उस में से दूरबीनी आप्रेशन में इस्तेमाल होने वाले औज़ार ही अंदर न जा सके।


दोस्तो, यह सब जानकारी एक बैक-ग्राउंड इंफरमेशन है,, कोई भी तकलीफ होने पर अपने चिकित्सक से सम्पर्क करें जो आप को आपकी शारीरिक स्थिति के अनुसार आप को सलाह देंगे।

वैसे आज मुझे एक बार फिर लग रहा है कि मैडीकल विषयों को आम जनता तक उन की ही बोलचाल में उन के सामने रखना अच्छा-खासा मुश्किल काम है........पर क्या करूं मैं भी ऐसे काम करने के लिए अपनी आदत से मजबूर हूं........क्योंकि यही सोचता हूं कि अगर यह काम हम जैसे लोग नहीं करेंगे तो फिर और कौन करेगा।

OK ---friends-----wish you all a wonderful new year full of health , happiness and broad smiles and lot of SUNSHINE !!!

चमत्कारी दवाईयां – लेकिन लेने से पहले ज़रा सोच लें !!


यह क्या, आप भी क्या सोचने लग गए ?- वैसे आप भी बिलकुल ठीक ही सोच रहे हैं- ये वही चमत्कारी दवाईयां हैं जिन के बारे में आप और हम तरह तरह के विज्ञापन देखते, पढ़ते और सुनते रहते हैं जिनमें यह दावा किया जाता है कि हमारी चमत्कारी दवा से किसी भी मरीज़ का पोलियो, कैंसर, अधरंग, नसों का ढीलापन, पीलिया रोग शर्तिया तौर पर जड़ से खत्म कर दिया जाता है। वैसे, चलिए आज अपनी बात पीलिया रोग तक ही सीमित रखते हैं।


चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण बहुत से मरीज़ों से ऐसा सुनने को मिला कि पीलिया होने पर फलां-फलां शहर से लाकर चमत्कारी जड़ी-बूटी इस्तेमाल की, तब कहीं जाकर पीलिये के रोग से छुटकारा मिला। साथ में यह भी बताना नहीं भूलते कि जो शख्स यह काम कर रहा है उस को पीलिये के इलाज का कुछ रब्बी वरदान (बख्श) ही मिला हुया है – वह तो बस यह सब सेवा भाव से ही करता है, न कोई फीस, न कोई पैसा।

हमारे देश की प्राकृतिक वन-सम्पदा तो वैसे ही निराली है- औषधीय जड़ी बूटियों का तो भंडार है हमारे यहां। हमारी सरकार इन पर होने वाले अनुसंधान को खूब बढ़ावा देने के लिए सदैव तत्पर रहती है। इस तरह की योजनाओं के अंतर्गत सरकार चाहती है कि हमारी जनता इस औषधीय सम्पदा के बारे में जितना भी ज्ञान है उसे प्रगट करे जिससे कि सरकार उन पौधों एवं जड़ी बूटियों का विश्लेषण करने के पश्चात् उन की कार्यविधि की जानकारी हासिल तो करें ही, साथ ही साथ यह भी पता लगाएं कि वे मनुष्य द्वारा खाने के लिए सुरक्षित भी हैं या नहीं अथवा उन्हें खाने से भविष्य में क्या कुछ दोष भी हो सकते हैं ?


अच्छा, तो बात चल रही थी , पीलिये के लिए लोगों द्वारा दी जाने वाली चमत्कारी दवाईयों की। आप यह बात अच्छे से समझ लें कि पीलिये के मरीज़ की आंखों का अथवा पेशाब का पीलापन ठीक होना ही पर्याप्त नहीं है, लिवर की कार्य-क्षमता की जांच के साथ-साथ इस बात की भी पुष्टि होनी ही चाहिए कि यह जड़ी-बूटी शरीर के किसी भी महत्वपूर्ण अंग पर कोई भी गल्त प्रभाव न तो अब डाल रही है और न ही इस के प्रयोग के कईं वर्षों के पश्चात् ऐसे किसी कुप्रभाव की आशंका है। इस संबंध में चिकित्सा वैज्ञानिकों की तो राय यही है कि इन के समर्थकों का दावा कुछ भी हो, उन की पूरा वैज्ञानिक विश्लेषण तो होना ही चाहिए कि वे काम कैसे करती हैं और उन में से कौन से सक्रिय रसायन हैं जिसकी वजह से यह सब प्रभाव हो रहा है।


अकसर ऐसा भी सुनने में आता है कि ऐसी चमत्कारी दवाईयां देने

वाले लोग इन दवाई के राज़ को राज़ ही बनाए रखना चाहते हैं---उन्हें यह डर रहता है कि कहीं इस का ज्ञान सार्वजनिक करने से उनकी यह खानदानी शफ़ा ही न चली जाए। वैसे तो आज कल के वैज्ञानिक संदर्भ में यह सब हास्यास्पद ही जान पड़ता है। --- क्योंकि यह मुद्दा पैसे लेने या न लेने का उतना नहीं है जितना इश्यू इस बात का है कि आखिर इन जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक विश्लेषण क्या कहता है ?- वैसे कौन कह सकता है कि किसी के द्वारा छिपा कर रखे इस ज्ञान की वैज्ञानिक जांच के पश्चात् यही सात-समुंदर पार भी लाखों-करोड़ों लोगों की सेवा कर सकें।


वैसे तो एक बहुत जरूरी बात यह भी है कि किसी को पीलिया होने पर तुरंत ही इन बूटियों का इस्तेमाल करना उचित नहीं लगता –कारण मैं बता रहा हूं। जिस रोग को हम पीलिया कहते हैं वह तो मात्र एक लक्षण है जिस में भूख न लगना, मतली आना, उल्टियां होने के साथ-साथ पेशाब का रंग गहरा पीला हो जाता है, कईं बार मल का रंग सफेद सा हो जाता है और साथ ही साथ आंखों के सफेद भाग पर पीलापन नज़र आता है।

पीलिये के कईं कारण हैं और केवल एक प्रशिक्षित चिकित्सक ही पूरी जांच के बाद यह बता सकता है कि किसी केस में पीलिये का कारण क्या है......क्या यह लिवर की सूजन की वजह से है या फिर किसी और वजह से है। यह जानना इस लिए जरूरी है क्योंकि उस मरीज का इलाज फिर ढ़ूंढे गए कारण के मुताबिक ही किया जाता है।

मैं सोचता हूं कि थोड़ी चर्चा और कर लें। दोस्तो, मैं बात कर रहा था एक ऐसे कारण की जिस में लिवर में सूजन आने की जिस की वजह से पीलिया हो जाता है। अब देखा जाए तो इस जिगर की सूजन के भी वैसे तो कईं कारण हैं,लेकिन हम इस समय थोड़ा ध्यान देते हैं केवल विषाणुओं (वायरस) से होने वाले यकृतशोथ (लिवर की सूजन) की ओर, जिसे अंगरेज़ी में हिपेटाइटिस कहते हैं। अब इन वायरस से होने वाले हिपेटाइटिस की भी कईं किस्में हैं,लेकिन हम केवल आम तौर पर होने वाली किस्मों की बात अभी करेंगे----- हिपेटाइटिस ए जो कि हिपेटाइटिस ए वायरस से इंफैक्शन से होता है। ये विषाणु मुख्यतः दूषित जल तथा भोजन के माध्यम से फैलते हैं। इस के मरीजों में ऊपर बताए लक्षण बच्चों में अधिक तीव्र होते हैं। इस में कुछ खास करने की जरूरत होती नहीं , बस कुछ खाने-पीने में सावधानियां ही बरतनी होती हैं.....साधारणतयः ये लक्षण 6 से 8 सप्ताह ( औसतन 4-5 सप्ताह) तक रहते हैं। इसके पश्चात् लगभग सभी रोगियों में रोग पूर्णतयः समाप्त हो जाता है। हिपेटाइटिस बी जैसा कि आप सब जानते हैं कि दूषित रक्त अथवा इंफैक्टिड व्यक्ति के साथ यौन-संबंधों से फैलता है।


बात लंबी हो गई लगती है, कहीं उबाऊ ही न हो जाए, तो ठीक है जल्दी से कुछ विशेष बातों को गिनते हैं....

· अगर किसी को पीलिया हो जाए तो पहले चिकित्सक से मिलना बेहद जरूरी है जो कि शारीरिक परीक्षण एवं लेबोरेट्री जांच के द्वारा यह पता लगायेगा कि यह कहीं हैपेटाइटिस बी तो नहीं है अथवा किसी अन्य प्रकार का हैपेटाइटिस तो नहीं है।

· इस के साथ ही साथ रक्त में बिलिर्यूबिन (Serum Bilirubin) की मात्रा की भी होती है ---दोस्तो, यह एक पिगमैंट है जिस की मात्रा अन्य लिवर फंक्शन टैस्टों (Liver function tests which include SGOT, SGPT and of course , Serum Bilirubin) के साथ किसी व्यक्ति के लिवर के कार्यकुशल अथवा रोग-ग्रस्त होने का प्रतीक तो हैं ही, इस के साथ ही साथ मरीज के उपचार के पश्चात् ठीक होने का भी सही पता इन टैस्टों से ही चलता है।

· इन टैस्टों के बाद डायग्नोसिस के अनुसार ही फिर चिकित्सक द्वारा इलाज शुरू किया जाएगा। कुछ समय के पश्चात ऊपर लिखे गए टैस्ट या कुछ और भी जांच करवा के यह सुनिश्चित किया जाता है कि रोगी का लिवर वापिस अपनी सामान्य अवस्था में किस गति से आ रहा है।

· दोस्तो, जहां तक हिपेटाइटिस बी की बात है उस का इलाज भी पूरा करवाना चाहिए। अगर किसी पेट के विशेषज्ञ ( Gastroenterologist) से परामर्श कर लिया जाए तो बहुत ही अच्छा है। यह वही पीलिया है जिस अकसर लोग खतरनाक पीलिया अथवा काला पीलिया भी कह देते हैं। इस बीमारी में तो कुछ समय के बाद ब्लड-टैस्ट दोबारा भी करवाये जाते हैं ताकि इस बात का भी पता लग सके कि क्या अभी भी कोई दूसरा व्यक्ति मरीज़ के रक्त के संपर्क में आने से इंफैक्टेड हो सकता है अथवा नहीं। ऐसे मरीज़ों को आगे चल कर किन तकलीफ़ों का सामना करना पड़ सकता है, इस को पूरी तरह से आंका जाता है।

बात थोड़ी जरूर हो गई है, लेकिन शायद यह जरूरी भी थी। दोस्तो, हम ने देखा कि चमत्कारी दवाईयां लेने से पहले अपने चिकित्सक से बात करनी कितनी ज़रूरी है और बहुत सोचने समझने के पश्चात् ही कोई निर्णय लें-----अपनी बात को तो, दोस्तो, मैं यहीं विराम देता हूं लेकिन फैसला तो आप का ही रहेगा। लेकिन अगर कोई व्यक्ति जड़ी –बूटियों द्वारा ही अपना इलाज करवाना चाहता है तो भी उसे आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों से विमर्श करने के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए।

दोस्तो, यार यह हमारी डाक्टरों की भी पता नहीं क्या मानसिकता है.....मकर-संक्रांति की सुहानी सुबह में क्या बीमारीयों की बातें करने लग पड़ा हूं....आप को अभी विश भी नहीं की...................

आप सब को मकर-संक्रांति को ढ़ेरों बधाईयां .......आप सब इस वर्ष नईं ऊंचाईंयां छुएं और सदैव प्रसन्न एवं स्वस्थ रहें !!

चमत्कारी दवाईयां – लेकिन लेने से पहले ज़रा सोच लें !!



यह क्या, आप भी क्या सोचने लग गए ?- वैसे आप भी बिलकुल ठीक ही सोच रहे हैं- ये वही चमत्कारी दवाईयां हैं जिन के बारे में आप और हम तरह तरह के विज्ञापन देखते, पढ़ते और सुनते रहते हैं जिनमें यह दावा किया जाता है कि हमारी चमत्कारी दवा से किसी भी मरीज़ का पोलियो, कैंसर, अधरंग, नसों का ढीलापन, पीलिया रोग शर्तिया तौर पर जड़ से खत्म कर दिया जाता है। वैसे, चलिए आज अपनी बात पीलिया रोग तक ही सीमित रखते हैं।

चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े होने के कारण बहुत से मरीज़ों से ऐसा सुनने को मिला कि पीलिया होने पर फलां-फलां शहर से लाकर चमत्कारी जड़ी-बूटी इस्तेमाल की, तब कहीं जाकर पीलिये के रोग से छुटकारा मिला। साथ में यह भी बताना नहीं भूलते कि जो शख्स यह काम कर रहा है उस को पीलिये के इलाज का कुछ रब्बी वरदान (बख्श) ही मिला हुया है – वह तो बस यह सब सेवा भाव से ही करता है, न कोई फीस, न कोई पैसा।
हमारे देश की प्राकृतिक वन-सम्पदा तो वैसे ही निराली है- औषधीय जड़ी बूटियों का तो भंडार है हमारे यहां। हमारी सरकार इन पर होने वाले अनुसंधान को खूब बढ़ावा देने के लिए सदैव तत्पर रहती है। इस तरह की योजनाओं के अंतर्गत सरकार चाहती है कि हमारी जनता इस औषधीय सम्पदा के बारे में जितना भी ज्ञान है उसे प्रगट करे जिससे कि सरकार उन पौधों एवं जड़ी बूटियों का विश्लेषण करने के पश्चात् उन की कार्यविधि की जानकारी हासिल तो करें ही, साथ ही साथ यह भी पता लगाएं कि वे मनुष्य द्वारा खाने के लिए सुरक्षित भी हैं या नहीं अथवा उन्हें खाने से भविष्य में क्या कुछ दोष भी हो सकते हैं ?

अच्छा, तो बात चल रही थी , पीलिये के लिए लोगों द्वारा दी जाने वाली चमत्कारी दवाईयों की। आप यह बात अच्छे से समझ लें कि पीलिये के मरीज़ की आंखों का अथवा पेशाब का पीलापन ठीक होना ही पर्याप्त नहीं है, लिवर की कार्य-क्षमता की जांच के साथ-साथ इस बात की भी पुष्टि होनी ही चाहिए कि यह जड़ी-बूटी शरीर के किसी भी महत्वपूर्ण अंग पर कोई भी गल्त प्रभाव न तो अब डाल रही है और न ही इस के प्रयोग के कईं वर्षों के पश्चात् ऐसे किसी कुप्रभाव की आशंका है। इस संबंध में चिकित्सा वैज्ञानिकों की तो राय यही है कि इन के समर्थकों का दावा कुछ भी हो, उन की पूरा वैज्ञानिक विश्लेषण तो होना ही चाहिए कि वे काम कैसे करती हैं और उन में से कौन से सक्रिय रसायन हैं जिसकी वजह से यह सब प्रभाव हो रहा है।

अकसर ऐसा भी सुनने में आता है कि ऐसी चमत्कारी दवाईयां देने
वाले लोग इन दवाई के राज़ को राज़ ही बनाए रखना चाहते हैं---उन्हें यह डर रहता है कि कहीं इस का ज्ञान सार्वजनिक करने से उनकी यह खानदानी शफ़ा ही न चली जाए। वैसे तो आज कल के वैज्ञानिक संदर्भ में यह सब हास्यास्पद ही जान पड़ता है। --- क्योंकि यह मुद्दा पैसे लेने या न लेने का उतना नहीं है जितना इश्यू इस बात का है कि आखिर इन जड़ी-बूटियों का वैज्ञानिक विश्लेषण क्या कहता है ?- वैसे कौन कह सकता है कि किसी के द्वारा छिपा कर रखे इस ज्ञान की वैज्ञानिक जांच के पश्चात् यही सात-समुंदर पार भी लाखों-करोड़ों लोगों की सेवा कर सकें।

वैसे तो एक बहुत जरूरी बात यह भी है कि किसी को पीलिया होने पर तुरंत ही इन बूटियों का इस्तेमाल करना उचित नहीं लगता –कारण मैं बता रहा हूं। जिस रोग को हम पीलिया कहते हैं वह तो मात्र एक लक्षण है जिस में भूख न लगना, मतली आना, उल्टियां होने के साथ-साथ पेशाब का रंग गहरा पीला हो जाता है, कईं बार मल का रंग सफेद सा हो जाता है और साथ ही साथ आंखों के सफेद भाग पर पीलापन नज़र आता है।
पीलिये के कईं कारण हैं और केवल एक प्रशिक्षित चिकित्सक ही पूरी जांच के बाद यह बता सकता है कि किसी केस में पीलिये का कारण क्या है......क्या यह लिवर की सूजन की वजह से है या फिर किसी और वजह से है। यह जानना इस लिए जरूरी है क्योंकि उस मरीज का इलाज फिर ढ़ूंढे गए कारण के मुताबिक ही किया जाता है।
मैं सोचता हूं कि थोड़ी चर्चा और कर लें। दोस्तो, मैं बात कर रहा था एक ऐसे कारण की जिस में लिवर में सूजन आने की जिस की वजह से पीलिया हो जाता है। अब देखा जाए तो इस जिगर की सूजन के भी वैसे तो कईं कारण हैं,लेकिन हम इस समय थोड़ा ध्यान देते हैं केवल विषाणुओं (वायरस) से होने वाले यकृतशोथ (लिवर की सूजन) की ओर, जिसे अंगरेज़ी में हिपेटाइटिस कहते हैं। अब इन वायरस से होने वाले हिपेटाइटिस की भी कईं किस्में हैं,लेकिन हम केवल आम तौर पर होने वाली किस्मों की बात अभी करेंगे----- हिपेटाइटिस ए जो कि हिपेटाइटिस ए वायरस से इंफैक्शन से होता है। ये विषाणु मुख्यतः दूषित जल तथा भोजन के माध्यम से फैलते हैं। इस के मरीजों में ऊपर बताए लक्षण बच्चों में अधिक तीव्र होते हैं। इस में कुछ खास करने की जरूरत होती नहीं , बस कुछ खाने-पीने में सावधानियां ही बरतनी होती हैं.....साधारणतयः ये लक्षण 6 से 8 सप्ताह ( औसतन 4-5 सप्ताह) तक रहते हैं। इसके पश्चात् लगभग सभी रोगियों में रोग पूर्णतयः समाप्त हो जाता है। हिपेटाइटिस बी जैसा कि आप सब जानते हैं कि दूषित रक्त अथवा इंफैक्टिड व्यक्ति के साथ यौन-संबंधों से फैलता है।

बात लंबी हो गई लगती है, कहीं उबाऊ ही न हो जाए, तो ठीक है जल्दी से कुछ विशेष बातों को गिनते हैं....
· अगर किसी को पीलिया हो जाए तो पहले चिकित्सक से मिलना बेहद जरूरी है जो कि शारीरिक परीक्षण एवं लेबोरेट्री जांच के द्वारा यह पता लगायेगा कि यह कहीं हैपेटाइटिस बी तो नहीं है अथवा किसी अन्य प्रकार का हैपेटाइटिस तो नहीं है।
· इस के साथ ही साथ रक्त में बिलिर्यूबिन (Serum Bilirubin) की मात्रा की भी होती है ---दोस्तो, यह एक पिगमैंट है जिस की मात्रा अन्य लिवर फंक्शन टैस्टों (Liver function tests which include SGOT, SGPT and of course , Serum Bilirubin) के साथ किसी व्यक्ति के लिवर के कार्यकुशल अथवा रोग-ग्रस्त होने का प्रतीक तो हैं ही, इस के साथ ही साथ मरीज के उपचार के पश्चात् ठीक होने का भी सही पता इन टैस्टों से ही चलता है।
· इन टैस्टों के बाद डायग्नोसिस के अनुसार ही फिर चिकित्सक द्वारा इलाज शुरू किया जाएगा। कुछ समय के पश्चात ऊपर लिखे गए टैस्ट या कुछ और भी जांच करवा के यह सुनिश्चित किया जाता है कि रोगी का लिवर वापिस अपनी सामान्य अवस्था में किस गति से आ रहा है।
· दोस्तो, जहां तक हिपेटाइटिस बी की बात है उस का इलाज भी पूरा करवाना चाहिए। अगर किसी पेट के विशेषज्ञ ( Gastroenterologist) से परामर्श कर लिया जाए तो बहुत ही अच्छा है। यह वही पीलिया है जिस अकसर लोग खतरनाक पीलिया अथवा काला पीलिया भी कह देते हैं। इस बीमारी में तो कुछ समय के बाद ब्लड-टैस्ट दोबारा भी करवाये जाते हैं ताकि इस बात का भी पता लग सके कि क्या अभी भी कोई दूसरा व्यक्ति मरीज़ के रक्त के संपर्क में आने से इंफैक्टेड हो सकता है अथवा नहीं। ऐसे मरीज़ों को आगे चल कर किन तकलीफ़ों का सामना करना पड़ सकता है, इस को पूरी तरह से आंका जाता है।
बात थोड़ी जरूर हो गई है, लेकिन शायद यह जरूरी भी थी। दोस्तो, हम ने देखा कि चमत्कारी दवाईयां लेने से पहले अपने चिकित्सक से बात करनी कितनी ज़रूरी है और बहुत सोचने समझने के पश्चात् ही कोई निर्णय लें-----अपनी बात को तो, दोस्तो, मैं यहीं विराम देता हूं लेकिन फैसला तो आप का ही रहेगा। लेकिन अगर कोई व्यक्ति जड़ी –बूटियों द्वारा ही अपना इलाज करवाना चाहता है तो भी उसे आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों से विमर्श करने के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए।
दोस्तो, यार यह हमारी डाक्टरों की भी पता नहीं क्या मानसिकता है.....मकर-संक्रांति की सुहानी सुबह में क्या बीमारीयों की बातें करने लग पड़ा हूं....आप को अभी विश भी नहीं की...................
आप सब को मकर-संक्रांति को ढ़ेरों बधाईयां .......आप सब इस वर्ष नईं ऊंचाईंयां छुएं और सदैव प्रसन्न एवं स्वस्थ रहें !!

0 comments:


रविवार, 13 जनवरी 2008

हैल्थ-न्यूज़ अपडेट- II

HIV Test होने से करोड़ों लोगों को रिस्क
यह समस्या हमारे देश में ही नहीं, अमेरिका में भी हैअभी तक अमेरिका की एक-तिहाई जनसंख्या ने हीएचआईव्ही टैस्ट करवाया हैयहां तक कि असुरक्षित संभोग करने वाले एवं नशे के लिए सूईंयों का इस्तेमालकरने वाले लोगों में से भी केवल एक चौथाई लोगों पर यह टैस्ट किया गया हैइसी वजह के कारण ही इसइंफैक्शन के फैलने को रोकना बेहद मुश्किल जान पड़ रहा है
चिकित्सा विशेषज्ञों का यही मानना है कि HIV testing की सुविधाओं को और भी ज्यादा व्यापक बनाना होगाऔर इसे सामान्य हैल्थ चैक-अप का एक हिस्सा ही बनाना होगा
अमेरिका के यू.एस सैंटर फार डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार अमेरिका में 11लाख लोग HIV infection सेग्रस्त हैं जिनमें से 25प्रतिशत तो यह जानते भी नहीं हैं कि उन में वायरस हैयही 25% लोग आधी से ज्यादा नईइंफैक्शन फैला रहे हैं क्योंकि ये बचाव के सुरक्षात्मक तरीके नहीं अपनाते
मलेरिया से बचाव का टीका----
मलेरिया के टीके पर हो रही शुरूआती रिसर्च से काफी उत्साहवर्द्धक परिणाम मिल रहे हैंवैज्ञानिकों के अनुसारइस से अफ्रीकी शिशुओं में मलेरिया होने के रिस्क में 65प्रतिशत कमी आईइसी टीम ने यह भी पाया कि मलेरियाका टीका सुरक्षित हैइससे पहले हुए एक अध्ययन के अनुसार 1से 4वर्ष के बच्चों में इस टीके से नये मलेरियासंक्रमण का रिस्क 45% तक घट जाता हैइस टीके पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने इस टीके से उत्पन्नऐंटीबाडीज़(रोग प्रतिऱोधक गुण) के कारण मलेरिया इंफैक्शन के कम होते रिस्क को सिद्ध किया है
उच्च रक्त-चाप का कंट्रोल भी टीके से-----
क्या आश्चर्यजनक नहीं लगता कि उच्च रक्त-चाप को कंट्रोल करने के लिए डाक्टर केवल लगवाने का नुस्खा हीथमा देंलेकिन अमेरिकन हार्ट एसोशिएशन के बैज्ञानिकों को एक ऐसे ही टीके के परीक्षण से अच्छे परिणाम मिलेहैंइन्हें उम्मीद है कि उम्र भर तक उच्च रक्तचाप के कंट्रोल के लिए बस चंद टीके ही पर्याप्त होंगे
यह नया टीका शरीर में एंजियोटैंसन-II (angiotensin II)नामक रसायन की उत्पति को रोकता हैऔर इसरसायन की वजह से ही रक्तचाप बढ़ता है क्योंकि यह एंजियोटैंसन हमारी धमनियों एवं शिराओं (blood vessels) में सिकुड़न पैदा करता हैआजकल बाज़ार में बी पी के कंट्रोल के लिए उपलब्ध बहुत सी दवाईयां भी इसीएंजियोटैंसन- II को ही अपना निशाना बनाती हैंइस टीके पर अभी और भी काम होना बाकी है
दोस्तो, यह बीपी को टीके से कंट्रोल करने वाली बात लिखते लिखते मैं तो यही सोच रहा हूं कि आखिर हमारी यहकुदरत से आगे निकल जाने की दौड़ कहां तक चलेगी.....क्या हम वास्तव में उस से आगे निकल जाएंगे ?----- असंभव !!.............Mother Nature is so full of mysteries ……..लेकिन फिर भी कुछ नया सोचना, कुछ नयाकरना, कुछ नये नये सपने देखना, हवाई किले बनाना....यही तो ज़िंदगी है.......हमारी लाइफ इसी के इर्द-गिर्द हीघूमती है

PS……….I trust I have told my fellow bloggers that my teenage son is behind my starting these blogs…..he told me that dad, go ahead, you can now write in Hindi on the net…….I was a bit skeptical about it….but he insisted and I took the plunge. But, now I want to tell you that he is annoyed with me ----simply because of the fact that I am so much time to this blog posts. He quite often laughingly says…….पापा, मैं ते बडा़ पछताना वां कि ओह केहड़ी घड़ी सी जदों मैं तुहानूं इस हिंदीलिखन बारे दस दित्ता.......( पापा, मैं तो सचमुच पछता रहा हूं कि वह कौन सी घड़ी थी जिस समय मैंने आप कोइस हिंदीविंदी लिखने के बारे में बतला दिया.....मैंने तो अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है) ...........उस के ऐसेकहने के पीछे छुपे कारण को तो, दोस्तो, आप समझ ही चुके होंगे.....यही कि अब उसे नेट पर बैठने के लिए समय़कम मिलता है ....क्योंकि बापू ज्यादा टैक-सेवी हो गया हैआप ही थोड़ा समझाइए उसे कि यह तो उस के लिएवैसी ही blessing in disguise है क्योंकि प्लस-टू की बोर्ड परीक्षा के लिए ब्लागिंग सिलेबस में है ही नहीं
मैंने कुछ बोर करना तो नहीं शुरू कर दिया.....अच्छा दोस्तो, फिर मिलते हैं....हैपी लोहड़ी......अभी बाहर सेबार-बार आवाज़े रही हैं कि अब बाहर भी आओ, लोहड़ी जलानी है...................लेकिन ब्लागिये भी ठहरे पक्केगपोड़ी, एक बार की-पैड पर हाथ थिरकने लगे कि बस ठहरने का नाम ही नहीं लेते..........उस प्रभु से यही प्रार्थना हैकि सब ब्लागियों के हाथ यूं ही निरंतर चलते रहें ताकि वे सब मिल कर ज्ञान की अलख जगाते रहें....। .


सर्दी लग जाने पर क्या करें ?

सर्दी लग जाने पर क्या करें ?

दोस्तो, इस मौसम में तो लगता है हर कोई ठंड लग जाने से हुई खांसी जुकाम से परेशान है। शीत लहर अपने पूरे यौवन पर है। इस से बचने एवं साधारण उपचार पर चलिए थोड़ा प्रकाश डालते हैं..........

  • · इस मौसम में तो लोग खांसी-जुकाम से परेशान हो जाते हैं।

ठंड के मौसम में वैसे भी हम सब की इम्यूनिटी (रोग से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता) कम होती है। ऊपर से इन तकलीफों से संबंधित विषाणु (विशेषकर वायरस) खूब तेज़ी से फलते-फूलते हैं। ज्यादा लोगों को पास पास एक ही जगह पर रहने से अथवा एकत्रित होने से खांसी एवं छींकों के साथ निकलने वाले वायरस (ड्रापलैट इंफैक्शन) एक रोगी से दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों को जल्दी ही अपनी चपेट में ले लेते हैं।

  • · अब प्रश्न यही उठता है कि इस से बचें कैसे....क्या कुछ विशेष खाना चाहिए ..

इस से बचे रहने का मूलमंत्र तो यही है कि आप पर्याप्त एवं उपर्युक्त कपड़े पहन कर ठंडी से बचें। ऐसे कोई विशेष खाध्य पदार्थ नहीं हैं जिससे आप इस से बच सकें। आप को तो केवल शरीर की इम्यूनिटि बढ़ाने के लिए सीधा-सादा, संतुलित आहार लेना चाहिए--- इस से तरह तरह की दालों, साग, सब्जियों, मौसमी फलों , आंवले इत्यादि का प्रचुर मात्रा में सेवन आवश्यक है।

  • · लोग अकसर इन तकलीफों में स्वयं ही एंटीबायोटिक दवाईयां लेनी शुरू कर देते हैं.....क्या यह ठीक है ??

सामान्यतयः इन मौसमी छोटी मोटी तकलीफों में ऐंटीबायोटिक दवाईयों का कोई स्थान नहीं है। अगर यह खांसी –जुकाम बिगड़ जाए तो भी चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही दवाईया लें।

  • · इस अवस्था में पहले तो लोग घरेलु नुस्खों से ही काम चला लिया करते थे और वे स्वस्थ भी हो जाया करते थे।

ये घरेलु नुस्खे आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने पहले हुया करते थे। इस में मुलहट्ठी चूसना, चाय में एक चुटकी नमक डाल कर पीना, नींबू और शहद का इस्तेमाल, भाप लेना, नमक वाले गर्म पानी से गरारे करना शामिल हैं। ध्यान रहे कि भाप लेते समय पानी में कुछ भी डालने की आवश्यकता नहीं है।

  • · घरेलु नुस्खों के साथ-साथ और क्या करें ?

हां,हां, यह बहुत जरूरी है कि रोगी को उस के स्वाद एवं उपलब्धता के अनुसार खूब पीने वाले पदार्थ देते रहें, मरीज पर्याप्त आराम भी लें। बुखार एवं बदन टूटने के लिए दर्द निवारक टेबलेट ले लें।

  • · नन्हे-मुन्ने शिशुओं का नाक को अकसर इतना बंद हो जाता है कि वे मां का दूध तक नहीं पी पाते ...

ऐसा होने पर यह करें कि एक गिलास पानी में एक चम्मच नमक डाल कर उबाल लें। फिर उसे ठंडा होने दें। बस हो गई तैयार आप के शिशु के नाक में डालने की दवा। आवश्यकतानुसार इस की 3-4 बूंदें शिशु के नाक में डालते रहें जिस से उस के नाक में जमा हुया रेशा ( dried-up secretions) नरम होकर छींक के साथ बाहर आ जाएगा और शिशु का नाक खुल जाएगा। वैसे तो इस तरह की नाक में डालने की बूंदें (सेलाइन नेज़ल ड्राप्स) आप को कैमिस्ट की दुकान से भी आसानी से मिल सकती हैं।

  • · कईं बार जब जुकाम से पीड़ित मरीज़ अपनी नाक साफ करता है तो खून निकल आता है जिससे वह बंदा बहुत डर जाता है, ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिए ...

ज्यादा जुकाम होने की वजह से भी सामान्यतयः नाक को साफ करते समय दो-चार बूंदें रक्त की निकल सकती हैं। लेकिन ऐसी अवस्था में किसी ईएऩटी विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श कर ही लेना चाहिए।

  • · ऐसा कौन सी अवस्थाएं हैं जिन में कान-नाक-गला विशेषज्ञ से संपर्क कर लेना चाहिए...

खांसी जुकाम से पीड़ित मरीज को अगर कान में दर्द है, सांस लेने में कठिनाई हो रही है, गले में इतन दर्द है कि थूक भी नहीं निगला जा रहा, गले अथवा नाक से खून निकलने लगे,आवाज़ बैठ जाए, खांसी की आवाज़ भी अगर बदली सी लगे, खांसी-जुकाम से आप को तंग होते हुए अगर सात दिन से ज्यादा हो जाये अथवा यह तकलीफ़ आप को बार-बार होने लगे------इन सब अवस्थाओं में ईएनटी विशेषज्ञ से तुरंत मिलें।

  • · लोग अकसर थोड़ी बहुत तकलीफ होने पर ही नाक में डालने वाली दवाईयों तथा खांसी की पीने वीली शीशीयां इस्तेमाल करनी शुरू कर देते हैं......

नाक में डालने वाली दवाईयों तथा नाक खोलने के लिए उपयोग किए जाने वाले इंहेलर का भी चिकित्सक की सलाह के बिना पांच दिन से ज्यादा उपयोग न करें। इन को लम्बे समय तक इस्तेमाल करने से और भी ज्यादा जुकाम होने का डर बना रहता है। रही बात खांसी की शीशीयों की, बाज़ार में उपलब्ध ज्यादातर खांसी की इन दवाईयों का इस अवस्था में कोई उपयोग है ही नहीं।

  • · कान में दर्द तो आम तौर पर सभी को कभी कभार हो ही जाता है न......इस में तो कोई खास बात नहीं है न ?

कान में दर्द किसी सामान्य कारण (जैसे मैल वगैरह) से है या कान के भीतरी भागों में इंफैक्शन जैसी किसी सीरियस वजह से है, इस का पता ईएनटी विशेषज्ञ से तुरंत मिल कर लगाना बहुत ज़रूरी है। विशेषकर पांच साल से छोटे बच्चों में तो इस का विशेष ध्यान रखें क्योंकि ऐसी इंफैक्शन कान के परदे में 24 से 48 घंटों के अंदर ही सुराख कर सकती है।

सर्दी लग जाने पर क्या करें ?



दोस्तो, इस मौसम में तो लगता है हर कोई ठंड लग जाने से हुई खांसी जुकाम से परेशान है। शीत लहर अपने पूरे यौवन पर है। इस से बचने एवं साधारण उपचार पर चलिए थोड़ा प्रकाश डालते हैं..........

  • · इस मौसम में तो लोग खांसी-जुकाम से परेशान हो जाते हैं।

ठंड के मौसम में वैसे भी हम सब की इम्यूनिटी (रोग से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता) कम होती है। ऊपर से इन तकलीफों से संबंधित विषाणु (विशेषकर वायरस) खूब तेज़ी से फलते-फूलते हैं। ज्यादा लोगों को पास पास एक ही जगह पर रहने से अथवा एकत्रित होने से खांसी एवं छींकों के साथ निकलने वाले वायरस (ड्रापलैट इंफैक्शन) एक रोगी से दूसरे स्वस्थ व्यक्तियों को जल्दी ही अपनी चपेट में ले लेते हैं।

  • · अब प्रश्न यही उठता है कि इस से बचें कैसे....क्या कुछ विशेष खाना चाहिए ..

इस से बचे रहने का मूलमंत्र तो यही है कि आप पर्याप्त एवं उपर्युक्त कपड़े पहन कर ठंडी से बचें। ऐसे कोई विशेष खाध्य पदार्थ नहीं हैं जिससे आप इस से बच सकें। आप को तो केवल शरीर की इम्यूनिटि बढ़ाने के लिए सीधा-सादा, संतुलित आहार लेना चाहिए--- इस से तरह तरह की दालों, साग, सब्जियों, मौसमी फलों , आंवले इत्यादि का प्रचुर मात्रा में सेवन आवश्यक है।

  • · लोग अकसर इन तकलीफों में स्वयं ही एंटीबायोटिक दवाईयां लेनी शुरू कर देते हैं.....क्या यह ठीक है ??

सामान्यतयः इन मौसमी छोटी मोटी तकलीफों में ऐंटीबायोटिक दवाईयों का कोई स्थान नहीं है। अगर यह खांसी –जुकाम बिगड़ जाए तो भी चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही दवाईया लें।

  • · इस अवस्था में पहले तो लोग घरेलु नुस्खों से ही काम चला लिया करते थे और वे स्वस्थ भी हो जाया करते थे।

ये घरेलु नुस्खे आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने पहले हुया करते थे। इस में मुलहट्ठी चूसना, चाय में एक चुटकी नमक डाल कर पीना, नींबू और शहद का इस्तेमाल, भाप लेना, नमक वाले गर्म पानी से गरारे करना शामिल हैं। ध्यान रहे कि भाप लेते समय पानी में कुछ भी डालने की आवश्यकता नहीं है।

  • · घरेलु नुस्खों के साथ-साथ और क्या करें ?

हां,हां, यह बहुत जरूरी है कि रोगी को उस के स्वाद एवं उपलब्धता के अनुसार खूब पीने वाले पदार्थ देते रहें, मरीज पर्याप्त आराम भी लें। बुखार एवं बदन टूटने के लिए दर्द निवारक टेबलेट ले लें।

  • · नन्हे-मुन्ने शिशुओं का नाक को अकसर इतना बंद हो जाता है कि वे मां का दूध तक नहीं पी पाते ...

ऐसा होने पर यह करें कि एक गिलास पानी में एक चम्मच नमक डाल कर उबाल लें। फिर उसे ठंडा होने दें। बस हो गई तैयार आप के शिशु के नाक में डालने की दवा। आवश्यकतानुसार इस की 3-4 बूंदें शिशु के नाक में डालते रहें जिस से उस के नाक में जमा हुया रेशा ( dried-up secretions) नरम होकर छींक के साथ बाहर आ जाएगा और शिशु का नाक खुल जाएगा। वैसे तो इस तरह की नाक में डालने की बूंदें (सेलाइन नेज़ल ड्राप्स) आप को कैमिस्ट की दुकान से भी आसानी से मिल सकती हैं।

  • · कईं बार जब जुकाम से पीड़ित मरीज़ अपनी नाक साफ करता है तो खून निकल आता है जिससे वह बंदा बहुत डर जाता है, ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिए ...

ज्यादा जुकाम होने की वजह से भी सामान्यतयः नाक को साफ करते समय दो-चार बूंदें रक्त की निकल सकती हैं। लेकिन ऐसी अवस्था में किसी ईएऩटी विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श कर ही लेना चाहिए।

  • · ऐसा कौन सी अवस्थाएं हैं जिन में कान-नाक-गला विशेषज्ञ से संपर्क कर लेना चाहिए...

खांसी जुकाम से पीड़ित मरीज को अगर कान में दर्द है, सांस लेने में कठिनाई हो रही है, गले में इतन दर्द है कि थूक भी नहीं निगला जा रहा, गले अथवा नाक से खून निकलने लगे,आवाज़ बैठ जाए, खांसी की आवाज़ भी अगर बदली सी लगे, खांसी-जुकाम से आप को तंग होते हुए अगर सात दिन से ज्यादा हो जाये अथवा यह तकलीफ़ आप को बार-बार होने लगे------इन सब अवस्थाओं में ईएनटी विशेषज्ञ से तुरंत मिलें।

  • · लोग अकसर थोड़ी बहुत तकलीफ होने पर ही नाक में डालने वाली दवाईयों तथा खांसी की पीने वीली शीशीयां इस्तेमाल करनी शुरू कर देते हैं......

नाक में डालने वाली दवाईयों तथा नाक खोलने के लिए उपयोग किए जाने वाले इंहेलर का भी चिकित्सक की सलाह के बिना पांच दिन से ज्यादा उपयोग न करें। इन को लम्बे समय तक इस्तेमाल करने से और भी ज्यादा जुकाम होने का डर बना रहता है। रही बात खांसी की शीशीयों की, बाज़ार में उपलब्ध ज्यादातर खांसी की इन दवाईयों का इस अवस्था में कोई उपयोग है ही नहीं।

  • · कान में दर्द तो आम तौर पर सभी को कभी कभार हो ही जाता है न......इस में तो कोई खास बात नहीं है न ?

कान में दर्द किसी सामान्य कारण (जैसे मैल वगैरह) से है या कान के भीतरी भागों में इंफैक्शन जैसी किसी सीरियस वजह से है, इस का पता ईएनटी विशेषज्ञ से तुरंत मिल कर लगाना बहुत ज़रूरी है। विशेषकर पांच साल से छोटे बच्चों में तो इस का विशेष ध्यान रखें क्योंकि ऐसी इंफैक्शन कान के परदे में 24 से 48 घंटों के अंदर ही सुराख कर सकती है।

2 comments:

Gyandutt Pandey said...

१. बहुत बढ़िया कि एक डाक्टर ने इस विषय पर बिना भयानक लगने वाले लम्बे लम्बे रोग-नामों के सरल तरीके से बताया।
२. आपका पोस्ट का फॉण्ट जरूर बड़ा है और डराता है!
३. बहुत धन्यवाद।

yunus said...

डॉकदर साहब तुसी ग्रेट हो जी । हम तो सर्दी से अकसर परेशान रहते हैं गला खराब तो अनाउंसर की छुट्टी । आपके उपाय नोट कर लिये हैं । शुक्रिया जी ।