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Thursday, October 8, 2009

मुलैठी खाने से पैदा होते हैं बुद्धु बच्चे ?


एक रिसर्च ने निष्कर्ष निकाला है कि जो महिलायें मुलैठी खाने की दीवानी हैं उन के बच्चे बुद्धु पैदा होते हैं। ऐसा बताया गया है कि गर्भावस्था के दौरान मुलैठी में मौजूद ग्लाईराईज़िन प्लेसैंटा को क्षति पहुंचाता है जिस से मां के स्ट्रैस-हारमोनज़ बच्चे के दिमाग तक पहुंच जाते हैं----रिजल्ट ? बच्चे जल्दी पैदा हो जाते हैं और आगे चल कर कुशाग्र बुद्धि के मालिक नहीं हो पाते।

मुझे तो आज ही पता चला कि पश्चिमी देशों मे भी लोग मुलैठी ( जेठीमधु, मधुयष्टिका) के इतने दीवाने हैं ---चेतावनी यह है कि गर्भवस्था के दौरान अगर एक सप्ताह में 100ग्राम शुद्ध मुलैठी खा लेती हैं तो बच्चों की बुद्धि पर एवं उन के व्यवहार पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

मेरा मुलैठी ज्ञान आज तक बहुत सीमित था --- अधिकतर व्यक्तिगत अनुभवों पर ही आधारित था। बचपन से अब तक गला खराब होने पर ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां लेने में मुझे कभी भी विश्वास ही नहीं रहा। बस, दो-चार मुलैठी चूस लेने से गला एकदम फिट लगने लगता है, इसलिये मेरी इस पर अटूट श्रद्धा कायम है और मै अपने मरीज़ों को भी कहता हूं कि गले तकी छोटी मोटी मौसमी तकलीफ़ों के लिये ये सब देसी जुगाड़ ही असली इलाज हैं (शायद कोई तो मान लेता होगा !!!)

और कईं बार घर में मुलैठी का पावडर डाल कर चाय भी बनती है----वही खराब गले को लाइन पर लाने के लिये। मुझे इतना पता था कि आयुर्वैदिक दवाईयों में भी मुलैठी इस्तेमाल होती है।

मुलैठी कैंडी

लेकिन मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि पश्चिमी देशों में इस के बनी कैंडी आदि भी इतनी पापुलर हैं -- और यह मुलैठी खाने से बुद्धु बच्चे पैदा होने की बात सुन कर ही यह सब जानने की इच्छा हुई।

मुझे लगता है कि यह समस्या दूर-देशों की अपनी ही अनूठी समस्या है जहां पर कैंडी इत्यादि के मुलैठी का इ्स्तेमाल किया जाता है और इन कैंडियों का इतनी ज़्यादा मात्रा में इस्तेमाल होता है । सोच रहा हूं कि इतनी ज़्यादा कैंड़ी खाने से मुलैठी की मात्रा का तो टोटल हो गया, लेकिन जितनी शक्कर आदि शरीर में गई उस का क्या ?

जिस एरिये की महिलायों पर यह स्टडी हुई है मेरे विचार में वहां पर तो गर्भावस्था में इस तरह की इतनी ज़्यादा मुलैठी कैंडी से बच के ही रहा जाए।

लेकिन आप बिल्कुल पहले जैसे मुलैठी चबाते रहिये ----आप बिल्कुल लाइन पर चल रहे हैं-------हमारी समस्या है कि नईं पीढ़ी का इन सब बातों पर विश्वास नहीं है---चलिये, यह स्वयं भुगतेगी।

मुझे पता है कि इस न्यूज़-स्टोरी में आप के साथ कुछ साझा करने जैसा नहीं था, लेकिन इस के बहाने अगर हम लोगों ने मुलैठी जैसे प्रकृति के तोहफ़े को थोड़ा याद कर लिया है, उस के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की है ----क्या यह कम है ? वैसे बाज़ार में बिकने वाले खुले मुलैठी पावडर के बारे में आप का क्या विचार है ------ जहां लोग धनिया पावडर में अनाप-शनाप मिलावट करने से गुरेज नहीं करते वहां पर कैसे मिले शुद्ध मुलैठी पावडर !!

Monday, February 4, 2008

पंक्षियों के फ्लू से आखिर हम क्यों हैं इतने आतंकित ?


बर्ड-फ्लू अर्थात् पक्षियों का फ्लू आज कल काफी चर्चा में है। लेकिन जन मानस को इस रोग के बारे में कुछ ढंग की जानकारी नहीं है। चलिए सब से पहले शुरू यहां ही से करते हैं कि बर्ड-फ्लू को चिकित्सा भाषा में एवियन इनफ्लूऐंज़ा कहते हैं। दूसरी बात यह है कि जब हम पक्षियों की बात करते हैं तो इस में मुर्गे, मुर्गियां, बत्तखें इत्यादि भी शामिल हैं।

एवियन इनफ्लूऐंज़ा पक्षियों में इनफ्लूऐँज़ा वॉयरस की ए श्रेणी के द्वारा होने वाली एक इंफैक्शन (छूत) की बीमारी है। इस बीमारी को सर्वप्रथम 100वर्ष पूर्व इटली में पाया गया था, लेकिन यह महामारी के रूप में तो कहीं भी फूट सकती है।

एवियन इनफ्लूऐंज़ा किसी भी पक्षी को अपना शिकार बना सकती है। यह इंफैक्शन होने से पक्षियों में विविध रोग-लक्षण पैदा हो सकते हैं जो कि एक मामूली बीमारी से लेकर एक अत्यन्त संक्रामक जानलेवा रोग का रूप ले सकता है, तथा यह महामारी का रूप धारण कर लेती है। अत्यन्त उग्र एवियन इनफ्लूऐंज़ा में पक्षी अचानक ही बहुत बीमार हो जाते हैं और शीघ्र ही मर जाते हैं, शत-प्रतिशत केसों में यह जानलेवा सिद्ध हो सकती है।

सामान्य तौर पर एवियन इनफ्लूऐँजा वॉयरस पक्षियों एवं सूअरों के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी में बीमारी पैदा नहीं करते। सबसे पहले 1977 में हांग-कांग में इस वॉयरस ने मनुष्यों को अपनी चपेट में लिया। वैज्ञानिक जांच ने बताया है कि मनुष्यों में यह बीमारी बर्ड-फ्लू से ग्रस्त जीवित मुर्गे-मुर्गियों के नज़दीकी संपर्क के कारण हुई। जिन 18व्यक्तियों का यह बीमारी हुई उन में से 6की मौत हो गई। इस के परिणाम स्वरूप हांग-कांग के सारे मुर्गे-मुर्गियों का , जो उस समय लगभग 15 लाख के करीब थे, सफाया कर दिया गया। उस के बाद सन 1999 में फिर हांग-कांग में तथा सन 2003 में यह हांग-कांग एवं नैदरलैंड में फैली।

अकसर मरीज हम से पूछते हैं कि इस बीमारी के रहते कुछ अरसा पहले चीन में 14000 बत्तखों को क्यों मार दिया गया ?—उस का कारण यही है कि जंगली बत्तखों में एवियन इनफ्लूऐँज़ा वायरसों का प्राकृतिक भंडार होते हुए भी, उन में इस बीमारी से इंफैक्शन होने की संभावना बहुत कम होती है। मुरगी-खाने के जीवों – मुर्गों, मुर्गियों, पीरू( अमेरिकी गीध) में इस उग्र रूप वाले घातक एवियन इनफ्लूऐंज़ा का रोग होने की आशंका बनी रहती है। इन मुर्गे, मुर्गियों का जंगली बत्तखों से सीधा संपर्क एवं अप्रत्यक्ष संपर्क महामारी का कारण बनता है। जिंदा पंक्षियों की मार्कीट भी इस महामारी को फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब कभी इस रोग के केस दिखने शुरू होते हैं तो विभिन्न देशों में दूसरे देशों से मुर्गों के आयात पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया जाता है।

कुछ देश दूसरे देशों से आने वाले चिकन का निरीक्षण करते तो हैं लिकन विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस बात का हमें विशेष रूप से ध्यान रखना होगा जिस के अनुसार जिन पक्षियों ( मुर्गे, मुर्गियों इत्यादि) में यह इंफैक्शन होती है और वे बच जाते हैं, वे कम से कम दस दिन तक मुंह से एवं मल द्वारा वॉयरस फैलाते रहते हैं, जिस से ज़िंदा मुर्गे-मुर्गियों के बाज़ारों में तथा प्रवासी पंक्षियों में यह बीमारी बड़ी आसानी से फैल सकती है।

एक बात और हमें समझनी जरूरी है कि इस बीमारी से संबद्ध जो वॉयरस होते हैं वे बड़ी शीघ्र गति से बदलते रहते हैं और इन विषाणुओं में एक और विशेषता यह रहती है कि आम तौर पर पक्षियों में एवियन इनफ्लूऐँज़ा पैदा करने वाले वॉयरस तथा मनुष्यों में इनफ्लूऐँज़ा फैलाने वाले वॉयरस कुछ इस तरह से मिल जाते हैं जिस से फिर कुछ ऐसे वॉयरस विकसित होते हैं जिन के अभी टीके का भी विकास नहीं हुया होता और यह रोग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलना शुरू हो जाता है, जिस से कि एक बहुत ही विषम स्थिति पैदा हो जाती है।

आप भी यही सोच रहे होंगे कि इस तरह का मेल-मिलाप संभव कहां है ?--- यह संभव है उन मनुष्यों में जो कि घरेलू मुर्गी एवं मुर्गों के नज़दीक रहते हैं और सूअर भी इस मिलाप को संभव बनाते हैं। सूअर दोनों तरह की ही अर्थात् मनुष्य एवं पक्षियों को बीमारी फैलाने वाली वॉयरसों से ही ग्रस्त होने के कारण उन वॉयरसों को मिलाने एवं नए उग्र वॉयरस उत्पन्न करने का काम भी करते हैं , जिन का अभी कोई टीका भी नहीं आया होता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों को सचेत किया है कि वे जब ऐसे क्षेत्रों में जायें जहां के मुर्गे, मुर्गियों में यह महामारी फैली हुई है , तो वे ज़िंदा पशुओं की मार्कीट एवं मुरगी –खानों के संपर्क में बिल्कुल न आएं। ऐसे पक्षियों की ड्रापिंग्स ( मल, बीट) भी इस बीमारी की वॉयरसों से लैस होती हैं।

एक महत्त्वपूर्ण यह भी है कि एवियन इनफ्लूऐंज़ा वॉयरस ताप से नष्ट हो जाती है। अतः उपभोक्ताओं को अच्छी तरह से सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि पोल्ट्री से प्राप्त खाने की चीज़ों ( अंडे आदि भी) को अच्छी तरह से पकाया गया है।

Tuesday, January 22, 2008

थोड़ी थोड़ी पिया करो...?


तंग आ गया हूं, दोस्तो, मैं मरीजों की इस बात का जवाब दे देकर जब वे यह कहते हैं कि यह बात तो आजकल आप डाक्टर लोग ही कहते हो कि थोड़ी थोड़ी पीने में कोई खराबी नहीं है। इस का जो जवाब मैं उन्हें देता हूं—उस पर तो मैं बाद में आता हूं, पहले ब्रिटेन में हुई एक स्टडी के बारे में आप को बताना चाहूंगा।

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के रिसर्चकर्त्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि जिन लोगों की जीवन-शैली में चार स्वस्थ आदतें शामिल हैं----धूम्रपान न करना, शीरीरिक कसरत करना, थोड़ी-थोड़ी दारू पीना,और दिन में पांच बार किसी फल अथवा सब्जी का सेवन करना ---- ये लोग उऩ लोगों की बजाय 14वर्ष ज्यादा जीतें हैं जिन लोगों में इन चारों में से कोई एक बिहेव्यिर भी नहीं होता। इस रिसर्च को 45 से 79 वर्ष के बीस हज़ार पुरूषों एवं औरतों पर किया गया।

यह तो हुई इस रिसर्च की बात....अब आती है मेरी बात...अर्थात् बाल की खाल उतारने की बारी। एक बार ऐसा अध्ययन लोगों की नज़र में आ गया ,तो बस वे समझते हैं कि उन्हें तो मिल गया है एक परमिट पूरी मैडीकल कम्यूनिटी की तरफ से कि पियो, पियो, डोंट वरी, पियो ...अगर जीना है तो पियो......बस कुछ कुछ ठीक उस गाने की तरह ही ....पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए।

अब मेरी व्यक्तिगत राय सुनिए। जब कोई मरीज मेरे से ऐसी बात पूछता है तो मैं उस से पूछता हूं कि पहले तो यह बताओ कि तुम्हारा स्टैंडर्ड आफ लिविंग उन विदेशियों जैसा है.... जिस तरह का जीवन वे लोग जी रहे हैं....क्या आपने तंबाकू का सेवन छोड़ दिया है, रिसर्च ने तो कह दिया धूम्रपान...लेकिन हमें तो चबाने वाले एवं मुंह में रखे जाने तंबाकू से भी उतना ही डरना है। दूसरी बात है शारीरिक कसरत की ---तो क्या वह करते हो। अकसर जवाब मिलता है ...क्या करें, इच्छा तो होती है, लेकिन टाइम ही नहीं मिलता। आगे पूछता हूं कि दिन में पांच बार कोई फल अथवा सब्जी लेते हो.....उस का जवाब मिलता है कि अब इस महंगाई में यह फ्रूट वूट रोज़ाना कहां से ले पाते हैं, दाल रोटी चल जाए – तब भी गनीमत जानिए। तो, फिर मेरी बारी होती है बोलने की ---जब पहली तीन शर्तें तो पूरी की नहीं, और जो सब से आसान बात लगी जिस से अपनी बीसियों साल पुरानी आदत पर एक पर्दा डालने का बहाना मिल रहा है, वह अपनाने में आप को बड़ी सुविधा महसूस हो रही है।

इसलिए मैं तो व्यक्तिगत तौर पर भी ऐसी किसी भी स्टेटमैंट का घोर विरोधी हूं जिस में थोड़ी-थोडी़ पीने की बात कही जाती है। इस के कारणों की चर्चा थोडी़ विस्तार से करते हैं। दोस्तो, हम ने न तो खाने में परहेज किया...घी, तेल दबा के खाए जा रहे हैं, ट्रांस-फैट्स से लैस जंक फूड्स में हमारी रूचि दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, उस के ऊपर यह दारू को भी अपने जीवन में शामिल कर लेंगे तो क्या हम अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का काम नहीं करेंगे। शत-प्रतिशत करेंगे, क्यों नहीं करेंगे !

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि सेहत को ठीक रखने के लिए आखिर दारू का क्या काम है....This is just an escape route…... अब अगर हम यह कहें कि मन को थोड़ा रिलैक्स करने के लिए 1-2 छोटे छोटे पैग मारने में क्या हर्ज है, यह तो बात बिलकुल अनुचित जान पड़ती है, वो वैस्टर्न वर्ड तो इस तनाव को दूर भगाने के लिए अपने यहां की ओरियंटल बातों जैसे कि योग, मैडीटेशन को अपना रहा है और हम वही उन के घिसे-पिटे रास्ते पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

एक बात और भी है न कि अगर छोटे-छोटे पैग मारने की किसी डाक्टर ने सलाह दे भी दी, तो क्या गारंटी है कि वे छोटे पैग पटियाला पैग में नहीं बदलेंगे। क्योंकि मुझे पता है न कि हमारे लोग इस सुरा के मामले में इतने मैच्योर नहीं है। यह जानना भी बेहद जरूरी है कि अच्छी क्वालिटी की शराब कुछ कम खराब असर करती है और वह भी तब जब साथ में खाने का पूरा ध्यान रखा जाए..यानि प्रोटीन का भी पीने वालों की डाइट में पूरा समावेश हो। अमीर देशों में तो वे ड्राइ-फ्रूट को भी पीते समय साथ रखते हैं............लेकिन हमारे अधिकांश लोग न तो ढंग की दारू ही खरीदने में समर्थ हैं, न ही कुछ ढंग का खाने को ही रखते हैं.....अब कटे हुए प्याज को आम के आचार के साथ चाटते हुए जो बंदा दारू पी रहा है, वह अपना लिवर ही जला रहा है, और क्या ! इस का अभिप्रायः कृपया यह मत लीजिए कि महंगी शराब जिसे काजू के साथ खाया जाए उस की कोई बात नहीं ----बात है, दोस्तो, बिल्कुल बात है। नुकसान तो वह भी करती ही है -----There is absolutely no doubt about that.

एक बात और भी है न कि जब आदमी शराब पीनी शुरू करता है न, तो पहले तो वह उस को पीता है, बाद में मैंने तो अपनी प्रैक्टिस में यही देखा है कि उस की ज़रूरत बढ़ती ही जाती है......जैसे लोग कहते हैं न कि फिर शराब बंदे को पीना शुरू कर देती है,और धीरे धीरे उस को पूरा चट कर जाती है।

क्या मैं नहीं पीता ?---आप की उत्सुकता भी शांत किए देता हूं। दोस्तो, मैं गीता के ऊपर हाथ रख कर सौगंध खा कर कहता हूं कि दारू तो दूर मैंने आज तक बीयर को भी नहीं चखा। इस के लिए मैं ज्यादातर श्रेय गौरमिंट मैडीकल कालेज , अमृतसर की पैथालोजी विभाग की अपनी प्रोफैसर मिसिज वडेरा को देता हूं जिस ने 18-19 साल की उम्र में हमें अल्कोहल के हमारे शरीर पर विशेषकर लिवर पर होने वाले खतरनाक प्रभावों को इतने बेहतरीन ढंग से पढ़ाया कि मैंने मन ही मन कसम खा ली कि कुछ भी हो, इस ज़हर को कभी नहीं छूना। सोचता हूं कि यार, ये टीचर लोग भी क्या ग्रेट चीज़ होते हैं न, क्यों कुछ टीचर्ज़ की बातों में इतनी कशिश होती है, इतना मर्म होता है कि उन की एक एक बात मन में घर जाती है..................क्योंकि वे सब अपना काम दिल से, शत-प्रतिशत समर्पण भाव से कर रहे होते हैं। आप इस के बारे में क्या कहते हैं, दोस्तो, कमैंट्स में लिखना।

सो, Lesson of the story is…….Please, please, please…..please stay away from alcohol…………..यह हमारी सीधी सादी मासूम ज़िंदगी में केवल ज़हर घोलती है। क्या हमारे आसपास वैसे ही तरह तरह का ज़हर कम फैला हुया है कि ऊपर से हमें इस के लेने की भी ज़रूरत महसूस हो रही है।

अच्छा, तो दोस्तो, अब उंगलियों को विराम दे रहा हूं क्योंकि खाने का समय हो गया है।

22.1.08 (9pm)

Wednesday, January 16, 2008

इस बवासीर, फिश्चूला, मस्सों को कभी भी न लें इतनी लाइटली----


एनो-रैंकल एरिया में होने वाली आम तकलीफ़ों जैसे कि बवासीर, मस्सों एवं फिश्चूला (जिसे अकसर भगंदर भी कहते हैं) इत्यादि को कभी भी लाइटली न लिया जाए। इस प्रकार की बीमारियां मरीज की ज़िंदगी में एक तरह से ज़हर ही घोल सकती हैं। अकसर देखा गया है कि लोग इन तकलीफों को बड़ा ही लाइटली लेते हैं ।

ऐसे ऐसे मरीज हैं जो वर्षों तक इन तकलीफों से परेशान रहेंगे लेकिन प्रशिक्षित डाक्टर के पास जाने से कतराते रहेंगे या झिझकते रहेंगे। लेकिन मेरी समझ में यह कभी नहीं आया कि डाक्टर के पास जाने में किसी तरह की शर्म आखिर क्यों----जैसे शरीर के बाकी अंग हैं, वैसे ही यह भी है और दूसरी बात यह कि डाक्टरों के लिए यह कोई विशेष बात है ही नहीं....उन के पास रोज़ाना इस तरह के शायद दर्जनों मरीज आते ही हैं।

सालों साल मल द्वार (ano-rectal) की तकलीफों से जूझने का मतलब बार-बार अपनी ही मरजी से तरह तरह की खाने की व लगाने वाली दवाईयां इस्तेमाल करना, जो अकसर रोग को दबा तो देती हैं लेकिन जड़ से खत्म नहीं करतीं। अपने शुभचिंतकों की सलाह से कोई भी दवा शुरू कर दी जाती है, कुछ समय ठीक ----फिर वही तकलीफ और वह भी पहले से ज्यादा उग्र रूप में।

जगह-जगह पोस्टर लगे हुए आप ने भी देखे होंगे जो यह दावा कर रहे होते हैं कि एक ही टीके से पुरानी से पुरानी बवासीर को जड़ से खत्म करें.......ऐसे इश्तिहार अकसर नीम हकीमों के ही होते हैं, प्लीज़ इन के चक्कर में पड़ कर अपने रोग को बढ़ावा कभी न दें। अकसर इन धन-लोलुप नीम-हकीमों के चक्कर में पढ़ कर लोग अपना रोग तो बढ़ा ही लेते हैं, और यह भी नहीं पता कि वो कौन सी सिरिंजें एवं सूईंयां इस्तेमाल कर रहे हैं.....पता ही नहीं कौन कौन से और रोग साथ में उपहार स्वरूप दे दें......देखिए कहीं लेने के देने ही न पड़ जाएं।

एक तो इस देश में विज्ञापन-कर्त्ताओं ने भी भोली-भाली, जल्दी ही किसी की बातों में आ जाने वाली जनता का पीछा न छोड़ने की ठान रखी है। दीवारों पर एक क्रीम का इश्तेहार जहां तहां नज़र आता रहता है कि इस क्रीम के इस्तेमाल से आप बवासीर, भगंदर से पूरी तरह छुटकारा पा सकते हैं।

जी नहीं, अकसर बवासीर, भगंदर (फिश्चूला) आदि रोगों का डैफिनिटिव इलाज(definitive treatment) करवाना ही पड़ता है, जितना जल्दी हो जाए, उतना ही ठीक है ....नहीं तो ये अकसर बहुत बढ़ जाते हैं। डैफिनिटिव इलाज से भाव है कि अगर कोई बंदा ऐसी तकलीफ से जूझ रहा है तो उसे सर्जन को जा कर दिखाना ही होगा, उस के कहे अनुसार दवाईयां भी लेनी होंगी और अगर वह आप्रेशन की सलाह दे रहे हैं तो झट से करवाने में ही समझदारी है। ऐसा कभी नहीं होता कि फिश्चूला अपने आप ही ठीक हो जाएगा...हां, वो कुछ समय के लिए दब जरूर सकता है जिस से मरीज यह वहम पाल लेते हैं कि यह तो अपने आप ठीक हो जाएगा।

दोस्तो, मेरे साथ काम करने वाले एक डाक्टर को भी इस फिश्चूला की तकलीफ ने कैसे परेशान किए रखा, आप को बताना चाहूंगा। उसे 6-7 साल पहले ऐसे ही मल-द्वार के पास दर्द हुई--- सर्जने को दिखाने पर उस ने एनल ग्लैंड की इंफैक्शन की बात कही, कुछ दवाईयां दीं, जिस से हमारे उस मित्र का बुखार भी टूट गया और वह ठीक सा भी महसूस करने लगा। लेकिन उसे उस जगह में हमेशा भारीपन सा रहने लगा...थोड़ी थोड़ी दर्द हमेशा ही रहने लगी। फिर बुखार हो गया ---फिर दवाईंया खानी पड़ी...फिर ठीक हो गया.....यह सिलसिला 4-5 महीने चलता रहा और आखिर उसे सर्जन से उस एबसैस को ड्रेन करवाना ही पड़ा।

जब उस सर्जन ने उस एबसैस से पस निकाली तो उसे वह पस थोड़ी पनीर जैसी दिखी ( cheesy material) – इसलिए उसे लैब में टैस्ट के लिए भेजा गया। रिपोर्ट कुछ ऐसी आई कि कुछ इस तरह की कोशिकाएं उस में दिखीं हैं जो टीबी में होती हैं.....तो क्या था, उस को टीबी की दवाईयां शुरू कर दी गईं कि शायद दो-महीने का कोर्स करने से तकलीफ जड़ से खत्म हो जाएगी जिस से कि आप्रेशन का जख्म भी बिलकुल ठीक हो जाएगा। लेकिन यह क्या, उस का जख्म तो क्या सूखना था, वहां से तो रोज़ाना रिसाव ही शुरू हो गया ....टीबी की दवाईयां भी छःमहीने तक खा ली गईं लेकिन कोई राहत महसूस न हुई। उसे एक और आप्रेशन करवाने की सलाह दी गई।

दोस्तो, आप सुन कर हैरान होंगे कि बस इसी तकलीफ से जूझते हुए उस ने चार-पांच साल निकाल दिए.....बस आलस की बात कि कौन पड़े दोबारा इस आप्रेशन के चक्कर में । लेकिन आखिर जब इस तकलीफ ने उस का जीना दूभर ही कर दिया तो उसे दोबारा से एक अन्य वरिष्ठ सर्जन से आप्रेशन करवाना ही पड़ा...............दो महीने तो वह छुट्टी पर रहे....और पूरे 6 महीने तक उन की पट्टियां चलीं.

दोस्तो, यह हमारे ही एक डाक्टर की आपबीती इसलिए यहां बतानी ज़रूरी समझी कि हम सब यह समझ सकें कि इन तकलीफों के लिए हमें बेकार में लालची किस्म के नीम-हकीमों के चक्कर में न पड़ कर किसी अनुभवी सर्जन से परामर्श करना चाहिए ताकि शुरू में ही ऐसी किसी तकलीफ का डट कर मुकाबला किया जाए ताकि वह फिर से अपना सिर न उठा सके।

हमारे उस सहकर्मी डाक्टर को आप्रेशन करने वाले सर्जन ने यह बताया कि तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि एनल-स्फिंकटर बच गया नहीं तो मल के त्यागने पर कंट्रोल हमेशा के लिए समाप्त हो सकता था।

अच्छा, तो दोस्तो, एक बात और कि इन सब रोगों को कब्ज अथवा टायलेट करते समय ज़ोर लगाना जैसी अवस्थाएं बढ़ावा देती हैं. इसलिए कब्ज को दूर रखें....अपने खाने-पीने में सावधानियां बरते, मोटे आटे का ही सेवन करें जिस में से चोकर न निकाला गया हो, अंकुरित दालों का प्रचुर मात्रा में सेवन करें, खूब स्लाद-सब्जियां खाएं....आंवले का इस्तेमाल किसी भी रूप में जरूर किया करें....इससे कब्ज दूर रहेगी। अपनी ही मरजी से कब्ज तक की दवाई लेते रहना चाहे खाने वाली या पीने वाली ----बिलकुल ठीक बात नहीं है, एक बार यह दवाईयां आप ने अपनी ही मरजी से लेनी शुरू कर दी तो आप फिर इन के चक्रव्यूह से मुश्किल से ही निकल पाते हैं। So, then why not to go natural and make some minor changes in our day-to-day life to keep such irritating problems miles away………लेकिन कब्ज नहीं भी है , तो भी , ऊपर लिखी हुई तकलीफ़ों के लिए क्वालीफाइड एवं अनुभवी डाक्टर से मिलना जरूरी है.....शायद वह आप को किसी आप्रेशन की सलाह ही न दे और शुरूआती दौर में आप का दवाईयों से ही मामला सुलट जाएगा। जो भी हो, लेकिन please, for God’s sake, don’t ever ignore these ano-rectal problems…..take care !!

Monday, January 14, 2008

जब पित्ते की पथरियां परेशान करने लग जाएं.......( Gall stones…..क्या हैं ये स्टोन और इन से कैसे निबटा जाए)


अकसर आप ने अपने आसपास लोगों को कहते सुना होगा कि फलां फलां बंदे के पित्ते में पथरियां थीं, बेहद परेशान था इसलिए उस को आप्रेशन करवाना पड़ा। कईं बार यह भी सुना होगा कि कोई व्यक्ति पित्ते की पथरी के दर्द से बेहद परेशान सा रहता है।

चलिए, आज पित्ते की पथरी के बारे में ही कुछ बातें करते हैं॥

पित्ते की पथरियां महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती हैं। बार-बार गर्भ धारण करना, मोटापा एवं अचानक वजन कम करने वाली महिलाओं में ये अधिकतर होती हैं।

पित्ते की पथरी के अधिकांश मरीजों को तो कईं कईं साल तक कोई तकलीफ़ ही नहीं होती और कुछ मरीजों में तो कभी भी इन का कुछ भी कष्ट नहीं होता। लेकिन इन पथरियों की वजह से कुछ व्यक्तियों में उग्र तरह के परिणाम देखने को भी मिलते हैं जैसेकि पेट में कभी कभी होना वाले बहुत ही ज्यादा दर्द, और कभी कभी तो जीवन को ही खतरे में डाल देने वाली अवस्थाएं जैसे कि पित्ते की सूजन (acute cholecystitis), पैनक्रियाज़ की सूजन(acute pancreatitis) या किसे बहुत ही विरले केस में पित्ते का कैंसर।

पित्ते की पथरियां ज्यादातर कोलैस्ट्रोल की ही बनी होती हैं। एक बार जब यह बनना शुरू हो जाती हैं तो फिर अगले दो-तीन वर्ष तक बढ़ती रहती हैं। लेकिन पित्ते की 85प्रतिशत पथरीयां दो सैंटीमीटर से कम डायामीटर वाली ही होती हैं।

आम तौर बीस साल पहले तक तो पित्ते की पथरी के इलाज का एक ही साधन हुया करता था जिस में आप्रेशन कर के पथरी समेत पित्ते को बाहर निकाल दिया जाता था। यह आप्रेशन तो आजकल भी किया जाता है। और सामान्यतयः इस आप्रेशन के बाद हस्पताल में पांच दिन तक दाखिल रहना पड़ता है और पूरी तरह से ठीक ठाक होने में तीन से छः हफ्ते का समय लग जाता है। पिछले कुछ सालों से पित्ते की पथरी के लिए दूरबीनी आप्रेशन भी बड़ा कामयाब सिद्ध हुया है।

बहुत से लोगों को पता नहीं है कि यह दूरबीनी आप्रेशन कैसे किया जाता है। थोड़ा बता देते हैं ......इस आप्रेशन के दौरान पेट (abdominal cavity) को कार्बनडाइआक्साइड गैस भर कर फुला दिया जाता है, उस के बाद लगभगआधे इंच के कुछ कट्स के रास्ते से अंदर से दूरबीनी फोटो लेने वाले एवं सर्जीकल औज़ारों को अंदरघुसा दिया जाता है। और इस आप्रेशन कीलाइव तस्वीरों को ओ.टी में लगी एक बड़ी स्क्रीन पर देखा जाता है। आप्रेशन के दौरान गाल-बलैडर (gall bladder-- पित्ते) को लिवर से अलग किया जाता है( सब कुछ दूरबीन से देख कर ही किया जाता है) और एक बार जब यह पित्ता फ्री हो जाता है तो उसे उन छोटे-छोटे कट्स में से किसी एक कट् के रास्ते से बाहर खींच लिया जाता है.....उसके बाद दूरबीन एवं अन्य औजारोको भी बाहर निकाल लिया जाता है, और जो पेट पर जो छोटे छोटे कट्स दिए गए होते हैं उन को बहुत सा आसानी से टांक दिया जाता है और एक छोटी पट्टी से उसे कवर कर दिया जाता है। इस प्रकार के दूरबीनी आप्रेशन के लिए हास्पीटल में केवल एक-दो दिन ही रहना पड़ता है और एक-दो हफ्ते में बंदा एकदम परफैक्टली फिट भी हो जाता है।

ज्यादातर पित्ते की पथरीयां सारी उम्र कोई भी तकलीफ नहीं देती हैं। एक बात और यह भी है कि जिन मरीज़ों में भी पित्ते की पथरी की वजह से किसी तरह की जटिलता ( complication) पैदा होती है, वह अचानक ही पैदा नहीं होती, उस से पहले अकसर पित्ते की पथरी के कईं प्रकार के लक्षण दिख जाते हैं। कुछ अपवादों (exceptions) को छोड़ कर, एक बार किसी मरीज़ के पित्ते में पथरीयां पाईं जाने पर और वह भी बिना किसी लक्षण के हैं और किसी तरह की उनकी कोई तकलीफ़ भी नहीं है, तो ऐसे केसों में भविष्य में किसी कंप्लीकेशन से बचने के लिए आप्रेशन की सलाह विशेषज्ञ अकसर नहीं देते हैं। जिन अपवादों की बात की है, उन में से एक तो यही है कि चाहे कोई लक्षण अथवा तकलीफ है या नहीं, लेकिन अगर पित्ते की पथरी तीन सैंटीमीटर डायामीटर से भी ज्यादा है तो उस का आप्रेशन तो हो ही जाना चाहिए। बाकी अपवाद इस लेख के scope से थोड़ा परे की ही बात है क्योंकि उन्हें मेरे लिए इतना सिंप्लीफाई कर के आप को बताना बड़ा मुश्किल लग रहा है कि वे आसानी से आप की समझ में आ जाएं।


एक बार अगर पित्ते की पथरीयों की कोई तकलीफ अथवा लक्षण हो जाता है तो फिर ये तकलीफ अधिकांश मरीजों में बार-बार होती रहती है। इस का मतलब यही है कि जिन मरीजों में भी पित्ते की पथरी के कुछ लक्षण दिखें अथवा उन्हें इस की कोई तकलीफ़ है, उन्हें तो इलाज करवा ही लेना चाहिए। यही कारण है कि संबंधित डाक्टर को पहले यही सुनिश्चित करना होता है कि किसी मरीज में पेट में दर्द किसी निष्क्रिय पड़ी हुईं पित्ते की पथरियों की वजह से है या किसी और तकलीफ से है। आप समझ रहे हैं न------कहीं ऐसा न हो कि मरीज को पित्ते की पथरीयों की वजह से तो कोई तकलीफ हो नहीं और उस के पित्ते का आप्रेशन कर दिया जाए। ऐसे केसों में असली कारण तो भी ज्यों का त्यों बना रहेगा। पित्ते की पथरी का दर्द जिसे अकसर बीलियरी कोलिक (biliary colic) भी कहा जाता है, यह दर्द अच्छा-खासा तेज़, अचानक ही उठता है, पेट के ऊपरी हिस्से में (epigastric) या पेट के ऊपरी दायें हिस्से में यह दर्द होता है जो कि एक घंटे से लेकर पांच घंटे तक रहता है और अकसर मरीज़ को रात में नींद से जगा देता है।


जो पित्ते के आप्रेशन के लिए दूरबीनी आप्रेशन की बात हो रही थी, कईं केसों में विशेषज्ञ वह करवाने की सलाह नहीं देते। लेकिन यह ध्यान रखें कि इस काम के लिए किसी अनुभवी लैपरोस्कोपिक सर्जन के पास ही जाना ठीक है जिसे इस तकनीक द्वारा पित्ते के आप्रेशन का अच्छा अनुभव हो। कईं लोग यह सोच लेते हैं कि मोटे लोगों में यह दूरबीनी आप्रेशन नहीं हो सकता, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मोटे मरीज़ों में भी यह दूरबीनी आप्रेशन किया जा सकता है बशर्ते कि उन की पेट की चर्बी ( abdominal wall) इतनी ज्यादा हो कि उस में से दूरबीनी आप्रेशन में इस्तेमाल होने वाले औज़ार ही अंदर न जा सके।


दोस्तो, यह सब जानकारी एक बैक-ग्राउंड इंफरमेशन है,, कोई भी तकलीफ होने पर अपने चिकित्सक से सम्पर्क करें जो आप को आपकी शारीरिक स्थिति के अनुसार आप को सलाह देंगे।

वैसे आज मुझे एक बार फिर लग रहा है कि मैडीकल विषयों को आम जनता तक उन की ही बोलचाल में उन के सामने रखना अच्छा-खासा मुश्किल काम है........पर क्या करूं मैं भी ऐसे काम करने के लिए अपनी आदत से मजबूर हूं........क्योंकि यही सोचता हूं कि अगर यह काम हम जैसे लोग नहीं करेंगे तो फिर और कौन करेगा।

OK ---friends-----wish you all a wonderful new year full of health , happiness and broad smiles and lot of SUNSHINE !!!

Saturday, January 12, 2008

मोशन सिकनैस--- जब मतली कर देती है हालत पतली


दोस्तो, अकसर हम देखते हैं कि बसों, गाड़ियों एवं अन्य वाहनों में यात्रा कर रहे लोगों को अकसर बार-बार मतली होने लगती है और कईँ बार तो यह उल्टियां उन की यात्रा का सारा मज़ा ही किरकिरा कर देती है। दोस्तो, मैं तो स्वयं ही इस का भुक्त-भोगी हूं ---- बस में यात्रा करना मेरे लिए आज भी आफ़त से कम नहीं है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि बस में ही यात्रा के दौरान किसी को यह तकलीफ़ हो, किसी को मोटर-कार में अथवा किसी को गाड़ी में भी यह तकलीफ होना बिलकुल संभव है। तो फिर इस से बचें कैसे.....अथवा एक बार जब ये उल्टियों वगैरह का चक्कर शुरू हो ही जाए तो इस से कैसे निबटा जाए।

तो, दोस्तो, सुनिए इस मोशन सिकनैस से बचने का सब से कारगर तरीका है कि आप बस अथवा गाड़ी (जिस के दौरान भी आप को यह तकलीफ होती है) में चढ़ने से लगभग आधा-या पौन घंटा पहले एक टेबलेट पानी के साथ ले लें.....उस टेबलेट में प्रोमैथाज़ीन नाम की दवा रहती है और यह 25(पच्चीस मिलीग्राम) की टेबलेट आसानी से बाज़ार में मिलती है। इस का एक ब्रांड तो बेहद पापुलर है— लेकिन मैं इस ब्रांड का नाम लिखना यहां ठीक नहीं समझता। दस टेबलेट्स की स्ट्रिप लगभग पच्चीस रूपये की मिलती है। फिर भी आप किसी भी केमिस्ट से जब सफर में उल्टियों आदि से बचाव की टेबलेट मांगेगे तो अधिकतर आप को यही ब्रांड ही मिलेगा। वैसे तो ब्रांड कोई भी हो, लेकिन ध्यान बस यह रहे कि उस में साल्ट प्रोमैथाज़ीन ही हो। अगर आप एक टेबलेट सफ़र शुरू होने से आधा-पौन घंटा पहले पानी से ले लेते हैं तो आप अगले 6-8 घंटे के लिए निश्चिंत हो सकते हैं। दस साल से कम आयु के बच्चों को इस पच्चीस मिलीग्राम की आधी टेबलेट ही काफी है।

कुछ और बातों की तरफ ध्यान दीजिएगा-
  • ये दवाई तो तभी प्रभावी है अगर इसे सफर शुरू होने के आधा-पौना घंटे पहले ले लिया जाए।
  • जिन लोगों को मोशन-सिकनैस की शिकायत होती हो, वो ये टेबलेट तो ले लें, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि इस को लेने से पहले पेट को परांठों से कहीं ठूंस मत लें। उन्हें तो सफर से पहले अथवा सफर में बिल्कुल हल्के फुल्के पेय-पदार्थ ( नहीं, नहीं, मैं कोल्ड-ड्रिंक्स की बात नहीं कर रहा) जैसे कि पतली लस्सी , नींबू-पानी, शर्बत, फलों का जूस इत्यादि ही लेना चाहिए....कोई एक-आध फल भी ले लें तो ठीक ही है। गलती से भी बच्चों के स्पाईसी स्नैक्स, भुजिया वगैरा न चख लें....हालत पतली से भी पतली हो जाएगी.....उसे क्या कहेंगे, पता नहीं।
  • अगर आप ने यह टेबलेट यात्रा शुरू होने के बाद मतली होने पर ली है तो इस का कोई इफैक्ट होता नहीं है।
  • वैसे तो दोस्तो इस बात का मोशन-सिकनैस से कोई सीधा संबंध है नहीं, लेकिन शायद मनोवैज्ञानिक रूप में ही सही, कुछ तो जरूर लगता है ......यात्रा से पहले अपना पेट साफ़ होने देना चाहिए।
चलो दोस्तो, अब छोड़ें इस बात को ---इस का एक छोटा सा सुखद पहलू यह भी है कि यह आस-पास की सीटों पर बैठे लोगों में अचानक सहानुभूति की एक भावना सी जगा देता है....झट से खिड़की वाली सीट खाली कर दी जाती है,कोई मेरे जैसे डाक्टर झट से कोई गोली निकाल लेता है, कोई मेरी मां जैसी अपनी चूरण की डिब्बी झट से निकाल लेती है, कोई वही दशकों से चली आ रही संतरे वाली खट्टी-मीठी गोली आप को देना चाहता है तो कोई अपने थैले में रखे हुए आधे नींबू के ऊपर नमक लगा कर थमा देता है .................How touching and how lovely !! This is real India where everybody is concerned about fellow passengers। Of course, except the ones who smoke in a crowded bus – these souls are least concerned about anything else – except ‘roasting their own lungs”----but, friends, this second hand smoke is a great contributing factor towards initiation of motion-sickness type symptoms in susceptible individuals like me….so, just take care and don’t hesitate to ask a smoker to stop it at least for the sake of his fellow passengers.

दोस्तो, परसों शाम को जब मैं भी बस की एक घंटे की यात्रा के दौरान सोनीपत जा रहा था, तो भरी बस में जब मैंने धुएं की छल्ले देखे तो मुझे पता लग गया कि आज मेरी खैर नहीं। कंडैक्टर को कहा कि यार, बंद करवाओ न ये बीड़ी......उस बेचारे ने भी अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए यह कह दिया कि क्या करें, ये नहीं मानते, मैं तो खुद बीड़ी नहीं पीता, लेकिन क्या करें। खैर, अभी यह बात खत्म ही हुई होगी कि मेरा उल्टियों का सिलसिला शुरू हो गया......पर जब मैं दरवाजा खोल कर अपने आप को हल्का करने की कोशिश कर रहा था,तो कंडैक्टर ने एक मिनट के लिए बस रूकवा दी।

और, मैने एक बार फिर से सबक ले लिया है कि वो प्रो-मैथाज़िन की गोलियों की एक स्ट्रिप हमेशा घर में रखनी चाहिएं....क्या पता कब जरूरत पड़ जाए। अगली बार यात्रा के दौरान आप भी ध्यान रखिएगा.....take care, please !!

Wednesday, December 19, 2007

यह विविध भारती सेवा भी कमाल की चीज़ है.......

मैं कल सुबह रेडियो सुन रहा था। उस पर एक प्रोग्राम चल रहा था जिस में एक डाक्टर साहब नवजात शिशुओं की सेहत के बारे में बातें कर रहे थे। बीच बीच में उन की पसंद के फिल्मी गीत बज रहे थे। वे इतनी अच्छी तरह से सब कुछ समझा रहे थे कि उन की कही काम की बातें एक निरक्षर बंदे के भी दिल में उतर गई होंगी। वैसे विविध भारती ऐसे प्रोग्राम देश के करोड़ो श्रोताओं पर पहुंचाने के लिए बधाई की पात्र है।वे देश के प्रख्यात विशेषज्ञों को हमारे घर में जैसे ले आती है। और ये डाक्टर भी इतने सुलझे हुए होते हैं कि ऐसा लगता है कि वे आम बंदे से बात ही कर रहे हैं। आम जनता क्या, कईं बार तो हम डाक्टर लोग भी एक दूसरे से कई नई बातें सुन लेते हैं, सीख लेते हैं। मैं अकसर कहता हूं जब कोई अनुभवी व्यक्ति ऐसे कार्यक्रमों में बात करता है तो अपने सारे अनुभव उस एक घंटे में ही भर देता है। बस उस का फायदा लेने वाला बंदा चाहिए। ऐसे किसी कार्यक्रम की एक बात भी दिल में उतर गई तो समझो कल्याण हो गया।
उस कार्यक्रम के बाद एक प्रोग्राम था हैलो, एफ एम लाईफ लाइन----वह भी कमाल की पेशकश थी. इतने अपनेपन से वह महिला डाक्टर श्रोताओं के प्रश्नों का जवाब दे रही थीं.
दोस्तो, एफ एम ने निःसंदेह देश में मनोरंजन एवं ज्ञान अर्जन के क्षेत्र में एक क्रांति सी ला दी है। तो क्यों न हम रेडियों से भी अपना नाता एक बार फिर से कायम ही कर लें....

Tuesday, November 20, 2007

मीडिया में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी

मीडिया में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जिस तरह से उपलब्ध करवाई जाती है, उस के बारे में मैं अकसर बहुत सोचता हूं। कई बार तो मुझे लगता है कि आम जन को इससे क्या कुछ फायदा भी होता होगा..... वैसे मैं प्रिंट मीडिया की बात ज्यादा कर रहा हूं। प्रिंट मीडिया में भी हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं वाले कई प्रकाशनों ने तो ऐसा माहोल बना रखा है कि आम बंदे तक सही जानकारी पहुंचे तो आखिर पहुंचे कैसे। कई कई बार तो सुधि पाठकों को ही नहीं पता चल पाता कि वे चिकित्सा से संबंधित कोई विज्ञापन पढ़ रहे हैं अथवा कोई लेख पढ़ रहे हैं। मैं तो कई बार यही सोचता हूं कि बेचारे आम बंदे को हम कंफ्यूज़ कर के ही रखते हैं....उसे शायद अंधकार में ही रखने में ही मार्कीट शक्तियों का स्वार्थ भरा है। हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं की बात मैं इस लिए कह रहा हूं कि जिन लोगों की अंग्रेज़ी पर अच्छी पकड़ है उन के लिए तो स्वास्थ्य संबंधी जानकारी सहेजने के ढ़ेरों विकल्प मौजूद हैं, वे चाहें तो नेट पर सर्च कर लें, चाहें तो अच्छी पत्रिकाएं पढ़ लें, लेकिन आम बंद कहां अपना माथा फोड़े।
मुझे मेरे किशोर बेटे विशाल ने प्रेरित किया है कि पापा, अखबारों में तो लिखते रहते हो, नेट पर लिखा करो. आज जो मैं यह ब्लाग हिंदी में आप के पास पहुंचा रहा हूं, इस में उसी प्रेरणा की काफी भूमिका है।
अंग्रेज़ी प्रिंट मीडिया की थोड़ी बात करें....दोस्तो, उन में भी सेहत बनाने के या सेहत कायम रखने के लिए अनेकों बार ऐसी वस्तुओं का जिक्र होता है कि जिन का हम डाक्टरों ने ही इस देश में नाम ही नहीं सुना होता। ब्रा़डकास्ट मीडिया में भी अकसर शरीर को कसा हुया बनाए रखने के नुस्खे, झुर्रियां दूर करने की क्रीमों की बातें और फेशियल वगैरह की बातें ज्यादा ही होती हैं........आम बंदे के उपयोग की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को कहीं किसी कौने में धकेल दिया जाता है।
क्या करूं....कुछ समझ में नहीं आ रहा....बस हिंदी एवं क्षेत्रीय समाचार-पत्रों में स्वास्थ्य संबंधी लेख लिख कर बस थोड़ा बहुत अपने दिल को समझा लेता हूं। और इस काम के लिए कभी किसी तरह के मानदेय की उम्मीद नहीं रखता। शायद एक दिन ऐसा भी आए कि लोगों में इस के बारे में भी जागृति पैदा हो जिस से कि ज्यादा से ज्यादा लोगों का इस तरह के लेखन के प्रति रूझान पैदा हो....

इन परिंदों को मिलेगी मंजि़ल इक दिन,
ये हवा में खुले इन के पंख बोलते हैं.....



शुभकामनाएं एवं आशीष....