मंगलवार, 8 जनवरी 2008

जटरोफा के बीजों से सावधान रहिए !

जटरोफा कुरकास(जंगली अरंडी) सारे भारतवर्ष में पाया जाने वाला एक आम पौधा है। जटरोफा के बीजों में 40प्रतिशत तक तेल होता है। इससे बायोडीज़ल प्राप्त करने हेतु सैंकड़ों प्रोजेक्ट चल रहे हैं। जटरोपा के बीजों से प्राप्त तेल मनुष्य के खाने योग्य नही होता।

जटरोपा के विषैले गुण इस में मौजूद कुरसिन एवं सायनिक एसिड नामक टाक्स-एल्ब्यूमिन के कारण होते हैं। वैसे तो पौधे के सभी भाग विषैले होते हैं लेकिन इन के बीजों में इस की सर्वाधिक मात्रा होती है। इन बीजों को खा लेने के पश्चात शरीर में होने वाले दुःप्रभाव मूल रूप से पेट एवं आंतों की सूजन के कारण उत्पन्न होते हैं।

गलती से जटरोफा के बीज खा लेने की वजह से बच्चों में इस तरह के हादसे आए दिन देखने-सुनने को मिलते रहते हैं। इन आकर्षक बीजों को देख कर बच्चे अनायास ही इन्हें खाने को उतावले हो उठते हैं।

इस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि इस पौधे के कितने बीज खाने पर विषैलेपन के लक्षण पैदा होते हैं। कुछ बच्चों की तो सिर्फ तीन बीज खा लेने ही से हालत पतली हो जाती है, जब कि कुछ अन्य केसों में पचास बीज खा लेने पर भी बस छोटे-मोटे लक्षण ही पैदा हुए। धारणा यह भी है कि इन बीजों को भून लेने से विष खत्म हो जाता है, लेकिन भुने हुए बीज खाने पर भी बड़े हादसे देखने में आये हैं।

उल्टियां आना एवं बिल्कुल पानी जैसे पतले दस्त लग जाना इन बीजों से उत्पन्न विष के मुख्य लक्षण हैं। पेट-दर्द, सिर-दर्द, बुखार एवं गले में जलन होना इस के अन्य लक्षण हैं। इस विष से प्रभावित होने पर अकसर बहुत ज्यादा प्यास लगती है। इस के विष से मृत्यु की संभावना बहुत ही कम होती है।

क्या करें ..........
बेशक जटरोफा बीज में मौजूद विष को काटने वाली कोई दवा (एंटीडोट) नहीं है, फिर भी अगर बच्चे ने इन बीजों को खा ही लिया है तो आप घबराएं नहीं।
बच्चे को किसी चिकित्सक के पास तुरंत ले कर जाएं। अगर बच्चा सचेत है, पानी निगल सकता है तो चिकित्सक के पास जाने तक भी उसे पेय पदार्थ (दूध या पानी) पिलाते रहें जिस से कि पेट में मौजूद विष हल्का पड़ जाए। चिकित्सक के पास जाने के पश्चात् अगर वह जरूरी समझते हैं तो अन्य दवाईयों के साथ-साथ वे नली द्वारा (IV fluids)कुछ दवाईयां शुरू कर देते हैं। इस अवस्था का इलाज सामान्यतयः बहुत सरल है। 6घंटे के भीतर अकसर बच्चे सामान्य हो जाते हैं।

रोकथाम---------------बच्चों को इन बीजों के बारे में पहले से बता कर रखें। उन्हें किसी भी पौधे को अथवा बीजों को ऐसे ही खेल-खेल में खा लेने के प्रति सचेत करें। स्कूल की किताबों में इन पौधों का विस्तृत वर्णन होना चाहिए। अध्यापकों को भी कक्षाओं में बच्चों को इन बीजों से संबंधित जानकारी देते रहना चाहिए।

खुद मोल खरीदा जाने वाला एक शैतान ...


कुछ समय पहले एक 17वर्षीय किशोर से मिलने का मौका मिला जो अपने पिता के साथ मेरे पास मुंह के छालों के इलाज के लिए आया था। उस के मुंह के अंदर एक नज़र मारने मात्र से पता चला कि उस के मुंह के अंदर एक गाल पर सफेद, झुर्रीदार दाग एवं एक ज़ख्म है। उसे इस के बारे में न तो कुछ पता ही था और न ही उसे इस की कोई तकलीफ ही थी। सीधी सी बात है कि जब उसे यह ही नहीं पता था कि गाल के ऊपर ऐसा-वैसा कुछ है तो कितने समय से यह है, यह पूछने का तो सवाल ही न उठता था। दोस्तो, इस अवस्था तो ओरल-ल्यूकोप्लेकिया (oral leukoplakia) कहा जाता है ----यह मुंह के कैंसर की कैंसर पूर्व-अवस्था (प्री-कैंसर) है। अगर किसी भी रूप में तंबाकू का उपभोग इस अवस्था में भी छोड़ दिया जाए तो स्थिति के आसानी से काबू आने के काफी चांस होते हैं। लेकिन सोचने वाली बात तो यही है दोस्तो कि तंबाकू छोड़ने के लिए इस अवस्था में पहुंचने तक आखिर इंतजार ही क्यों किया जाए ?--- इस अवस्था में पहुंचने पर भी अगर तंबाकू, गुटखे, पानमसाले एवं पान से मोह बना रहे तो यह प्री-कैंसर की अवस्था मुख कैंसर का रूप भी धारण कर सकती है।

हां, तो मैं उस 17वर्षीय लड़के की बात कर रहा था, लेकिन वह लड़का तो यह मानने को तैयार ही न था कि उसने कभी भी तंबाकू को किसी भी रूप में इस्तेमाल किया है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि ल्यूकोप्लेकिया की यह अवस्था सामान्यतयः इन खतरनाक उत्पादों के सेवन के बिना तो हो ही नहीं सकती। बार-बार एक ही बात पूछने पर लड़के ने आखिर बता ही दिया कि वह पिछले पांच वर्षों से तंबाकू-चूने का सेवन कर रहा है। उसने झट से अपनी जेब से तंबाकू-चूने का पाउच भी निकाल कर बाहर मेरी टेबल पर रख दिया।

शायद यह पढ़ कर आप भी सकते में आ गये होंगे लेकिन चौंकाने वाला कड़वा सत्य यही है कि अब छोटी उम्र में भी इस तरह की समस्या एक विकराल रूप धारण किए जा रही है। किशोरावस्था में ही इन रोगों की प्रारंभिक अवस्थाएं दिखना चिकित्सकों के लिए दुःखद चुनौती तो है , इस के साथ ही साथ समाज के लिए भी यह खतरे की घंटी है।

पिछले लगभग दो दशकों से मुंह के कैंसर से ग्रस्त रोगियों को अकाल मृत्यु का ग्रास बनते देख रहा हूं। हमारे देश में मुंह के कैंसर के रोगियों की संख्या बहुत ज्यादा है। इन में से अधिकांश के पीछे एक ही शैतान है---विलेन नं1---अर्थात् किसी भी रूप में तंबाकू का उपयोग। यह अकसर देखने में आया है कि लोग अकसर सिगरेट को ही ज्यादा बुरा समझते हैं जब कि वास्तविकता यह है कि स्मोकलैस तंबाकू( जिस के कश तो न खींचे जाएं, लेकिन जिसे चबाया जाए, गाल के अंदर रख कर चूसा जाए, गुटखा, ऩसवार, मसूड़ों के ऊपर लगाए जाने वाले तंबाकू वाले मंजन....लिस्ट काफी लंबी है) के भी सभी रूप बेहद घातक हैं।

आप इस विडंबना की तरफ भी गौर कीजिए - शरीर के अंदरूनी हिस्सों की तुलना में मसूड़े, गाल के अंदरूनी हिस्से, होंठ, जिह्वा, तालू ....ये सब शरीर के वे भाग हैं जिन में होने वाले किसी भी घाव अथवा बदलाव को बड़ी आसानी से प्रारंभिक अवस्था में ही देखा जा सकता है, फिर भी मुख-कैंसर के अधिकांश मरीज़ इस बीमारी के काफी उग्र रूप धारण कर लेने पर ही विशेषज्ञ के पास जाते हैं, लेकिन तब तक अकसर काफी देर हो चुकी होती है। जो मरीज मुंह में ल्यूकोप्लेकिया होने के बावजूद भी तंबाकू की गिरफ्त में हैं, दोस्तो, इसे हम धीरे-धीरे की जाने वाली आत्महत्या नहीं तो और क्या कहें ?--वैसे तो हमें नियमित रूप से स्वयं भी घर पर अपने मुख के अंदरूनी हिस्सों को शीशे में कभी-कभार जरूर देखते रहना चाहिए ताकि किसी तरह के बदलाव अथवा घाव को तुरंत पकड़ा जा सके।

दोस्तो, एक तो वैसे ही हमारे द्वारा किए जा रहे प्रकृति के अंधाधुंध शोषण के फलस्वरूप जल,वायु एवं खाध्य पदार्थों के प्रदूषण के बारे में तो हम सब को पता ही है, ऊपर से तंबाकू एवं शराब जैसे मादक पदार्थों को जले पर नमक छिड़कने के लिए खरीद कर हम अपनी ज़िंदगी से आखिर क्यों खिलवाड़ करते हैं !!---तंबाकू के तो , दोस्तो, सभी रूप ही घातक हैं, इस के सभी उत्पाद केवल उत्पात ही मचाते हैं। यहां तक कि हुक्का पीना भी खतरे से खाली नहीं है। समझदारी इसी में ही है कि हम इन सब वस्तुओं से मीलों दूर रहें , सीधा-सादा संतुलित आहार लें जिस में हरी-पत्तेदार सब्जियां एवं मौसमी फल भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो।

हमारे देश में तो बहुत से लोग तंबाकू-चूने एवं गुटखे को होठों या गाल के अंदर दबा लेते हैं जहां से धीरे धीरे इस का रस चूसते रहते हैं। जिन लोगों को तंबाकू चबाने के इलावा शराब पीने की भी आदत है, उन में तो मुख-कैंसर होने की और भी ज्यादा संभावना रहती है। कुछ लोग तो इस तंबाकू-चूने के मिश्रण को रात में भी मुंह में दबा कर सो जाते हैं। बम्बई के टाटा हास्पीटल के एक पूर्व निर्देशक, डा.राव साहब, एक बार कह रहे थे कि अगर लोग रात को सोने से पहले अपने दांत साफ करने की आदत ही डाल लें तो भी मुंह के कैंसर के रोगियों की संख्या में भारी गिरावट आ जाएगी----इस का कारण यह है कि एक बार रात में सोने से पहले अपना मुंह साफ कर लेने के पश्चात तंबाकू-चूने अथवा गुटखे को मुंह में दबाने की भला किसे इच्छा होगी !! कितनी सही बात है !!!

सोमवार, 7 जनवरी 2008

हेयर-ड्रेसर के पास जाने से पहले.....

दोस्तो, मैं अकसर सोचता हूं कि हम बड़ी बड़ी बातों की तरफ तो बहुत ध्यान देते हैं लेकिन कईं बार बहुत महत्वपूर्ण बातें जो देखने में बिल्कुल छोटी मालूम पड़ती हैं, उन को जाने-अनजाने में इग्नोर कर देते हैं। ऐसी ही एक बात मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं कि हम हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाने को कभी सीरियस्ली लेते नहीं है, पता नहीं झिझकते हैं या फिर भी....पता नहीं क्या।

दोस्तो, किट से मेरा भाव है कि हमें चाहिए अपनी एक सिज़र, एक-दो कंघीयां व एक रेज़र हर बार हेयर-ड्रेसर के पास अपना ही लेकर जाना चाहिए। दोस्तो, मैं कोई अनड्यू पैनिक क्रियेट करने की बिल्कुल कोशिश नहीं कर रहा हूं, मुझे तो यह पिछले 15 सालों से लग रहा है कि यह आज के समय की मांग है। दोस्तो, आप ज़रा सोचें कि हम सब लोग अपने घर में भी एक दूसरी की कंघी इस्तेमाल नहीं करते----घर में आया कोई मेहमान आप की कंघी इस्तेमाल कर ले,तो इमानदारी से जवाब दीजिए कोफ्त सी होने लगती है न। तो फिर, हेयर-ड्रेसर के यहां हज़ारों सिरों के ऊपर चल चुकी उस कंघी से हम परहेज़ करने की कोशिश क्यों नहीं करते। प्लीज़ सोचिए !! अब करते हैं, रेज़र की बात----मान लिया कि ब्लेड तो वह बदल लेता है, लेकिन दोस्तो अगर किसी कंटमर को कट लगा है , तो इस बात की भी संभावना रहती है कि थोड़ा-बहुत रेज़र( उस्तरे) पर भी लगा रह गया हो। बातें तो ,दोस्तो, छोटी छोटी हैं लेकिन जिस तरह से एड्स और हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियों ने आजकल अपना मुंह फाड़ रखा है तो एक ही बात ध्यान आती है----पूरी तरह से सावधानी रखना ही ठीक है। अब जब लोग शेव करवा रहे हैं या कटिंग करवा रहे हैं तो जरूरी नहीं हर कट हमें दिखे, कुछ कट ऐसे भी होते हैं जो हमें दिखते नहीं हैं..अर्थात् माइक्रोकट्स। जहां तक हो सके शेव तो स्वयं ही करने की आदत होनी चाहिए। कंघी, उस्तरे की बात कर रहे थे, तो पता नहीं किस को कौन सी स्किन इंफैक्शन है, क्या है , क्या नहीं है----ऐसे में एक यह सब चीज़े शेयर करना मुसीबत मोल लेने के बराबर नहीं तो और क्या है। तो, सीधी सी बात है कि अपनी किट लेकर ही हेयर-ड्रेसर के पास जाया जाए। आप को शायद एक-दो बाहर थोड़ा odd सा लगे, लेकिन फिर सब सामान्य सा लगने लगता है। दोस्तो, मैं पिछले लगभग 15 सालों से हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाता हूं, और बहुत से अपने मरीज़ों को भी ऐसा करने के लिए कहता रहता हूं। क्या आप भी मेरी बात मानेंगे ?
जो मैंने बात कही है कि शेव वगैरह तो स्वयं घर पर ही करने की आदत डाल लेनी चाहिए---दोस्तो, चिंता नहीं करें, इस से आप के हेयर-ड्रेसरों के धंधे पर कुछ असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि वे तो पहले से ही आज की युवा पीढ़ी के नए-नए शौक पूरा करने में मशगूल हैं-----हेयर ब्लीचिंग, हेयर पर्मिंग, हेयर सटरेटनिंग......पता नहीं क्या क्या आज के यह नौजवान करवाते रहते हैं, लेकिन सब से ज्यादा दुःख तो उस समय होता है जब कोई 18-20 साल का नौजवान अपना फेशियल करवा रहा होता है।
दोस्तो, समय सचमुच बहुत ही ज्यादा बदल गया है ...अपने बचपन के दिन याद करता हूं तो एक लड़की की बड़ी सी कुर्सी पर एक लकड़ी के फट्टे पर एक नाई की दुकान पर अपने आप को बैठे पाता हूं जिस की सारी दीवारें मायापुरी की पत्रिका में से धर्म भाजी की फोटों की कतरनों से भरी रहती थीं और उस नाई को एक चमड़े की बेल्ट पर अपना उस्तरा तेज़ करते देख कर मन कांप जाता था कि आज खैर नहीं......लेकिन उस बर्फी के लालच में जो पिता जी हर बार हजामत के बाद साथ वाली हलवाई की दुकान से खरीद कर खिलवाते थे,यह सब कुछ सहन करना ही पड़ता था, और खास कर के वह अजीबोगरीब मशीन जो इस तरह से चलती थी मानो घास काटने की मशीन हो। बीच बीच में उस मशीन के बीच जब बाल अटक जाते थे, तो बडा़ दर्द भी होता था, और एक-दो अच्छे बड़े कट्स कटिंग के दौरान हमेशा न लगें हों, ऐसा तो मुझे याद नहीं.
वैसे दोस्तो, अब लगता है कि वही टाइम अच्छा था, न किसी बीमारी का डर, न कोई किट साथ लेकर जाने का झंझट......लेकिन दोस्तो, अफसोस, अब न तो वह नाई रहा, न ही उस का साज़ो-सामान और न ही पिता जी। लेकिन आज आप से बतियाने के बहाने देखिए मैंने अपने बचपन को फिर से थोड़ा जी लिया....................आप भी कहीं कुछ ऐसी ही यादों में तो नहीं खो गए---चलिए,खो भी गए हैं तो अच्छा ही है, वैसे भी मैं अकसर हमेशा कहता रहता हूं ............
Enjoy the little things in life, someday you will look back and realise that those were indeed the big things !!!!!...........................................What do you say ??

Ok, friends, Good night!!

इन ट्रांस्फैटस से बच कर रहने में ही है समझदारी !!

समोसे, जलेबीया, अमरतियां, गर्मागर्म पकोड़े( भजिया), वड़ा-पाव वाले वड़े, आलू की टिक्कीयां,पूरी छोले, चने-भटूरे,नूडल्स........दोस्तों, लिस्ट बहुत लंबी है, कहीं पढ़ कर हमारे मुंह में इतना पानी भी न आ जाए कि अंतरजाल में बाढ़ ही आ जाए....वैसे भी लगता है कि इतनी मेहनत क्यों करें.....सीधी बात करते हैं कि हमारे यहां ये जो भी फ्राइड वस्तुएं बिकती हैं न, ये ट्रांसफैट्स से लैस होती हैं। वैसे मेरी तरह से आप को भी क्या नहीं लगता कि भई ये सब तो हम बरसों से अच्छी तरह खाते आ रहे हैं, इस के बारे में पता नहीं अब मीडिया को इतना ज्यादा लिखने की क्या सूझी है। जी हां, जब बीस-तीस साल की आयु में लोग दिल के रोगों के शिकार हो रहे हैं, मोटापा बेलगाम बढ़े जा रहा है, जिस की वजह से छोटी उम्र में ही लोग डायबिटिज़ जैसी बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं, तो मीडिया कैसे हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहे !!---- दोस्तो, इन ट्रांसफैट्स की वजह से हमारे शरीर में लो-डैंसिटि लाइपोप्रोटीन अथवा बुरे कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ जाता है, जिस के कारण यह हमारी रक्त की नाड़ियों में जमने लगता है और दिल की बीमारियों को खुला निमंत्रण दे देता है।
Transfats could raise levels of low -density lipoproteins or Bad cholesterol in the body and lead to clogged arteries or heart disease.

दोस्तो, कैनेडा का पश्चिमी शहर कैलगैरी कैनेडा का पहला शहर बन गया है जिस ने होटलों, रेस्तराओं में इस्तेमाल किए जाने वाले घी में ट्रांसफैट्स की मात्रा से संबंधित कड़े नियम बना दिए हैं और खाने में उपयोग होने वाले तेल में ट्रांसफैटस की मात्रा दो फीसदी से कम होने के नियम बना दिए हैं। उन्होंने तो साफ कह दिया है कि या तो अपने यहां इस्तेमाल होने वाले तेल बदल लो, नहीं तो फलां-फलां ताऱीख के बाद इन आदेशों की अवज्ञा करने वाले होटलों पर ताला लटका दिया जाएगा।
हमारे यहां तो बस नालेज अध-कचरी होने की वजह से लोगों को घुमा कर रखना कोई मुश्किल काम नहीं है----Thanks to the over-zealous advertising of these products.....और एक और फैशन सा चल पड़ा है, कुछ दिन पहले मैं चिप्स वगैरह के पैकेट पर यह भी बड़ा-बड़ा लिखा पढ़ रहा था.....contains NO Transfats!!.....यह सब ग्राहक को खुश करने के तरीके नहीं हैं तो और क्या हैं, इससे क्या ये पैकेट्स नुकसानदायक से स्वास्थ्यवर्धक बन जाएंगे....बिल्कुल नहीं। ये तो जंक फूड हैं और जंक ही रहेंगे----चाहे ट्रांसफैट्स जीरो हों या कुछ हो।


दोस्तो, अब हमारे यहां कि शिचुएशन देखिए--- कभी आप इन पकोड़े बनाने वालों, जलेबीयां बनाने वालों की कढ़ाही में सुबह से उबल रहे तेल की तरफ देखिए-----दोस्तो, ऐसा तेल हमारी सेहत को पूरी तरह बर्बाद करने में पूरा योगदान देता है......ट्रांसफैट्स की मात्रा के बारे में तो आप पूछो ही नहीं, उस के ऊपर तो यह रोना भी है कि उस तेल की क्वालिटी क्या है, उस में पता नहीं कौन कौन सी मिलावटें हुई हुईं हैं.........दोस्तो, हमारे यहां कि समस्याएं निःसंदेह बेहद जटिल हैं, क्या हम ऐसे किसी कानून की उम्मीद कर सकते हैं जो इन हलवाईयों, रेहड़ी वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तेल की क्वालिटी को नियंत्रित कर सके----------मुझे तो कोई उम्मीद लगती नहीं ,, बस दोस्तो उम्मीद है तो आप ही से --क्योंकि अगर हम so-called intellactuals किसी बात से कन्विंस हो जाते हैं और पहले हम स्वयं इन नुकसानदायक खाध्य पदार्थों से परहेज़ करने लगेंगे तो हम आस पास के लोगों को भी कंविंस कर पाएंगे। दोस्तो, समय वह आ गया कि हमें बाज़ार के तेलों से बनी इन वस्तुओं से दूरी बना कर के रखनी चाहिए...............हां, तीज-त्योहारों पर इस कसम को कभी कभी तोड़ने के बारे में आप क्या सोच रहे हैं ??-----Oh,sorry, यह भी मैं क्या लिख गया ----इन तीज-त्योहारों की जगह आप दीवाली-दशहरा सी पढ़े क्योंकि अगर हम तीज-त्योहारों की बात करेंगे तो भी मैं और आप आए दिन समोसे, टिक्के के डोने हाथ में लिए रखेंगे क्यों कि हमारा देश तो वैसे ही तीज-त्योहारों का देश है-----यहां तो हर रोज कोई न कोई पर्व होता है...........हर दिन दीवाली है ।

हेयर-ड्रेसर के पास जाने से पहले.....


दोस्तो, मैं अकसर सोचता हूं कि हम बड़ी बड़ी बातों की तरफ तो बहुत ध्यान देते हैं लेकिन कईं बार बहुत महत्वपूर्ण बातें जो देखने में बिल्कुल छोटी मालूम पड़ती हैं, उन को जाने-अनजाने में इग्नोर कर देते हैं। ऐसी ही एक बात मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं कि हम हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाने को कभी सीरियस्ली लेते नहीं है, पता नहीं झिझकते हैं या फिर भी....पता नहीं क्या।

दोस्तो, किट से मेरा भाव है कि हमें चाहिए अपनी एक सिज़र, एक-दो कंघीयां व एक रेज़र हर बार हेयर-ड्रेसर के पास अपना ही लेकर जाना चाहिए। दोस्तो, मैं कोई अनड्यू पैनिक क्रियेट करने की बिल्कुल कोशिश नहीं कर रहा हूं, मुझे तो यह पिछले 15 सालों से लग रहा है कि यह आज के समय की मांग है। दोस्तो, आप ज़रा सोचें कि हम सब लोग अपने घर में भी एक दूसरी की कंघी इस्तेमाल नहीं करते----घर में आया कोई मेहमान आप की कंघी इस्तेमाल कर ले,तो इमानदारी से जवाब दीजिए कोफ्त सी होने लगती है न। तो फिर, हेयर-ड्रेसर के यहां हज़ारों सिरों के ऊपर चल चुकी उस कंघी से हम परहेज़ करने की कोशिश क्यों नहीं करते। प्लीज़ सोचिए !! अब करते हैं, रेज़र की बात----मान लिया कि ब्लेड तो वह बदल लेता है, लेकिन दोस्तो अगर किसी कंटमर को कट लगा है , तो इस बात की भी संभावना रहती है कि थोड़ा-बहुत रेज़र( उस्तरे) पर भी लगा रह गया हो। बातें तो ,दोस्तो, छोटी छोटी हैं लेकिन जिस तरह से एड्स और हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियों ने आजकल अपना मुंह फाड़ रखा है तो एक ही बात ध्यान आती है----पूरी तरह से सावधानी रखना ही ठीक है। अब जब लोग शेव करवा रहे हैं या कटिंग करवा रहे हैं तो जरूरी नहीं हर कट हमें दिखे, कुछ कट ऐसे भी होते हैं जो हमें दिखते नहीं हैं..अर्थात् माइक्रोकट्स। जहां तक हो सके शेव तो स्वयं ही करने की आदत होनी चाहिए। कंघी, उस्तरे की बात कर रहे थे, तो पता नहीं किस को कौन सी स्किन इंफैक्शन है, क्या है , क्या नहीं है----ऐसे में एक यह सब चीज़े शेयर करना मुसीबत मोल लेने के बराबर नहीं तो और क्या है। तो, सीधी सी बात है कि अपनी किट लेकर ही हेयर-ड्रेसर के पास जाया जाए। आप को शायद एक-दो बाहर थोड़ा odd सा लगे, लेकिन फिर सब सामान्य सा लगने लगता है। दोस्तो, मैं पिछले लगभग 15 सालों से हेयर-ड्रेसर के पास अपनी किट ले कर जाता हूं, और बहुत से अपने मरीज़ों को भी ऐसा करने के लिए कहता रहता हूं। क्या आप भी मेरी बात मानेंगे ?
जो मैंने बात कही है कि शेव वगैरह तो स्वयं घर पर ही करने की आदत डाल लेनी चाहिए---दोस्तो, चिंता नहीं करें, इस से आप के हेयर-ड्रेसरों के धंधे पर कुछ असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि वे तो पहले से ही आज की युवा पीढ़ी के नए-नए शौक पूरा करने में मशगूल हैं-----हेयर ब्लीचिंग, हेयर पर्मिंग, हेयर सटरेटनिंग......पता नहीं क्या क्या आज के यह नौजवान करवाते रहते हैं, लेकिन सब से ज्यादा दुःख तो उस समय होता है जब कोई 18-20 साल का नौजवान अपना फेशियल करवा रहा होता है।
दोस्तो, समय सचमुच बहुत ही ज्यादा बदल गया है ...अपने बचपन के दिन याद करता हूं तो एक लड़की की बड़ी सी कुर्सी पर एक लकड़ी के फट्टे पर एक नाई की दुकान पर अपने आप को बैठे पाता हूं जिस की सारी दीवारें मायापुरी की पत्रिका में से धर्म भाजी की फोटों की कतरनों से भरी रहती थीं और उस नाई को एक चमड़े की बेल्ट पर अपना उस्तरा तेज़ करते देख कर मन कांप जाता था कि आज खैर नहीं......लेकिन उस बर्फी के लालच में जो पिता जी हर बार हजामत के बाद साथ वाली हलवाई की दुकान से खरीद कर खिलवाते थे,यह सब कुछ सहन करना ही पड़ता था, और खास कर के वह अजीबोगरीब मशीन जो इस तरह से चलती थी मानो घास काटने की मशीन हो। बीच बीच में उस मशीन के बीच जब बाल अटक जाते थे, तो बडा़ दर्द भी होता था, और एक-दो अच्छे बड़े कट्स कटिंग के दौरान हमेशा न लगें हों, ऐसा तो मुझे याद नहीं.
वैसे दोस्तो, अब लगता है कि वही टाइम अच्छा था, न किसी बीमारी का डर, न कोई किट साथ लेकर जाने का झंझट......लेकिन दोस्तो, अफसोस, अब न तो वह नाई रहा, न ही उस का साज़ो-सामान और न ही पिता जी। लेकिन आज आप से बतियाने के बहाने देखिए मैंने अपने बचपन को फिर से थोड़ा जी लिया....................आप भी कहीं कुछ ऐसी ही यादों में तो नहीं खो गए---चलिए,खो भी गए हैं तो अच्छा ही है, वैसे भी मैं अकसर हमेशा कहता रहता हूं ............
Enjoy the little things in life, someday you will look back and realise that those were indeed the big things !!!!!...........................................What do you say ??

Ok, friends, Good night!!

2 comments:

दादी का दवाखाना said...
सही है
शास्त्री जे सी फिलिप् said...
जानकारी से भरपूर इस लेख के लिये आभार. इसी तरह जन जन का मार्गदर्शन करते रहें.

हर पेराग्राफ के बीच एक खाली पंक्ति जरूर डालें. लेख अधिक पठनीय हो जायगा.

इन ट्रांस्फैटस से बच कर रहने में ही है समझदारी !!


समोसे, जलेबीया, अमरतियां, गर्मागर्म पकोड़े( भजिया), वड़ा-पाव वाले वड़े, आलू की टिक्कीयां,पूरी छोले, चने-भटूरे,नूडल्स........दोस्तों, लिस्ट बहुत लंबी है, कहीं पढ़ कर हमारे मुंह में इतना पानी भी न आ जाए कि अंतरजाल में बाढ़ ही आ जाए....वैसे भी लगता है कि इतनी मेहनत क्यों करें.....सीधी बात करते हैं कि हमारे यहां ये जो भी फ्राइड वस्तुएं बिकती हैं न, ये ट्रांसफैट्स से लैस होती हैं। वैसे मेरी तरह से आप को भी क्या नहीं लगता कि भई ये सब तो हम बरसों से अच्छी तरह खाते आ रहे हैं, इस के बारे में पता नहीं अब मीडिया को इतना ज्यादा लिखने की क्या सूझी है। जी हां, जब बीस-तीस साल की आयु में लोग दिल के रोगों के शिकार हो रहे हैं, मोटापा बेलगाम बढ़े जा रहा है, जिस की वजह से छोटी उम्र में ही लोग डायबिटिज़ जैसी बीमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं, तो मीडिया कैसे हाथ पर हाथ रख कर बैठा रहे !!---- दोस्तो, इन ट्रांसफैट्स की वजह से हमारे शरीर में लो-डैंसिटि लाइपोप्रोटीन अथवा बुरे कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ जाता है, जिस के कारण यह हमारी रक्त की नाड़ियों में जमने लगता है और दिल की बीमारियों को खुला निमंत्रण दे देता है।
Transfats could raise levels of low -density lipoproteins or Bad cholesterol in the body and lead to clogged arteries or heart disease.

दोस्तो, कैनेडा का पश्चिमी शहर कैलगैरी कैनेडा का पहला शहर बन गया है जिस ने होटलों, रेस्तराओं में इस्तेमाल किए जाने वाले घी में ट्रांसफैट्स की मात्रा से संबंधित कड़े नियम बना दिए हैं और खाने में उपयोग होने वाले तेल में ट्रांसफैटस की मात्रा दो फीसदी से कम होने के नियम बना दिए हैं। उन्होंने तो साफ कह दिया है कि या तो अपने यहां इस्तेमाल होने वाले तेल बदल लो, नहीं तो फलां-फलां ताऱीख के बाद इन आदेशों की अवज्ञा करने वाले होटलों पर ताला लटका दिया जाएगा।
हमारे यहां तो बस नालेज अध-कचरी होने की वजह से लोगों को घुमा कर रखना कोई मुश्किल काम नहीं है----Thanks to the over-zealous advertising of these products.....और एक और फैशन सा चल पड़ा है, कुछ दिन पहले मैं चिप्स वगैरह के पैकेट पर यह भी बड़ा-बड़ा लिखा पढ़ रहा था.....contains NO Transfats!!.....यह सब ग्राहक को खुश करने के तरीके नहीं हैं तो और क्या हैं, इससे क्या ये पैकेट्स नुकसानदायक से स्वास्थ्यवर्धक बन जाएंगे....बिल्कुल नहीं। ये तो जंक फूड हैं और जंक ही रहेंगे----चाहे ट्रांसफैट्स जीरो हों या कुछ हो।


दोस्तो, अब हमारे यहां कि शिचुएशन देखिए--- कभी आप इन पकोड़े बनाने वालों, जलेबीयां बनाने वालों की कढ़ाही में सुबह से उबल रहे तेल की तरफ देखिए-----दोस्तो, ऐसा तेल हमारी सेहत को पूरी तरह बर्बाद करने में पूरा योगदान देता है......ट्रांसफैट्स की मात्रा के बारे में तो आप पूछो ही नहीं, उस के ऊपर तो यह रोना भी है कि उस तेल की क्वालिटी क्या है, उस में पता नहीं कौन कौन सी मिलावटें हुई हुईं हैं.........दोस्तो, हमारे यहां कि समस्याएं निःसंदेह बेहद जटिल हैं, क्या हम ऐसे किसी कानून की उम्मीद कर सकते हैं जो इन हलवाईयों, रेहड़ी वालों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले तेल की क्वालिटी को नियंत्रित कर सके----------मुझे तो कोई उम्मीद लगती नहीं ,, बस दोस्तो उम्मीद है तो आप ही से --क्योंकि अगर हम so-called intellactuals किसी बात से कन्विंस हो जाते हैं और पहले हम स्वयं इन नुकसानदायक खाध्य पदार्थों से परहेज़ करने लगेंगे तो हम आस पास के लोगों को भी कंविंस कर पाएंगे। दोस्तो, समय वह आ गया कि हमें बाज़ार के तेलों से बनी इन वस्तुओं से दूरी बना कर के रखनी चाहिए...............हां, तीज-त्योहारों पर इस कसम को कभी कभी तोड़ने के बारे में आप क्या सोच रहे हैं ??-----Oh,sorry, यह भी मैं क्या लिख गया ----इन तीज-त्योहारों की जगह आप दीवाली-दशहरा सी पढ़े क्योंकि अगर हम तीज-त्योहारों की बात करेंगे तो भी मैं और आप आए दिन समोसे, टिक्के के डोने हाथ में लिए रखेंगे क्यों कि हमारा देश तो वैसे ही तीज-त्योहारों का देश है-----यहां तो हर रोज कोई न कोई पर्व होता है...........हर दिन दीवाली है ।

2 comments:

शास्त्री जे सी फिलिप् said...
इस तरह के फेट से बचने के लिये क्या करना होगा यह भी बता दें !
PD said...
मुझे फिरसे अपना होस्टल याद आ गया.. मेरे मेस का खाना बहुत स्वादिष्ट तो नहीं पर उसे खाकर आज तक किसी को जौंडिस हुआ हो ऐसा मैंने नहीं सुना है..
वहां एक दिन पापड़ बहुत ही खराब जले हुये तेल में तला हुआ था.. मैंने उसे तेल बदल कर पापड़ तलने को कहा.. उसने देखा की कहीं ये लड़का हंगामा ना कर दे सो उसने मुझे अलग से अच्छा वाला पापड़ लाकर दिया.. मैंने कहा की बस मुझे नहीं पूरा पापड़ चेंज करो.. थोड़ी देर बाद मैंने देखा की वही अभी तक रखा हुआ है.. बस मैंने पापड़ की थाली से एक के बाद एक पापड़ फ़ेंकना चालू कर दिया..
तब मेरे होस्टल इंचार्ज आये और गुस्से से पूछा की ऐसा क्यों किया? मेरा सीधा सा जवाब था की अगर आप अपने बेटे को ये पापड़ खिला सकते हैं तो मैं अपनी गलती मान लूंगा और फाईन भी भड़ दूंगा.. नहीं तो आप जहां भी मेरा कंप्लेन करेंगे वहां तक मैं लड़ने को तैयार हूं.. यहां तक की कोर्ट में भी..
उनको शायद मुझसे पहले किसी ने ये जवाब नहीं दिया था, सो पहले अकचकाये फिर पापड़ बदलने का आदेश देकर चुपचाप चले गये.. :)

शनिवार, 5 जनवरी 2008

क्यों लेते हैं मुहांसों को इतनी सीरियस्ली ?

इस में लगता यही है कि ये कंपनियां जो कुछ ही दिनों में मुहांसे गायब करवाने के सपने दिखाती हैं न वे ही हमारे युवाओं द्वारा इन मुहांसों को इतना सीरियल्सी लेने के लिए इतनी जिम्मेदार हैं। तो फिर, क्या करें- न लगाएं कोई भी क्रीम इन पर ?—क्या जरूरत है , यह तो दोस्तो आपने भी नोटिस किया होगा कि जो लोग इन पर जितनी ज्यादा ट्यूबें लगाते हैं, उन को ये उतना ही ज्यादा तंग करते हैं। इन को खत्म करने के लिए ज्यादा दवाईयां (एंटीबायोटिक दवाईयां) लेते रहने अथवा महंगी महंगी क्रीमें खरीद कर लगाने से ये बद से बदतर ही हो जाते हैं (क्योंकि आप सब तो साहित्य से बहुत जुड़े हुए हो ....वो एक शेयर है न कि जितना ज्यादा इलाज किया मर्ज बढ़ता चला गया....बस ठीक वैसे ही कुछ)।
दोस्तो, यह तो आप ने भी देखा होगा जब हम युवावस्था में प्रवेश करते हैं तो अकसर कुछ समय के लिए ये मुहांसे थोड़ा बहुत परेशान करते ही हैं......But then why don’t today’s youth take all these quite sportingly….it is all part of our growing up !! We don’t remember having taken any pill or having applied any cream for these innocent heads.
दोस्तो, इस हैड से मुझे ध्यान आया है कि कईं बार युवा इन को नाखुनों से फोड़ते रहते हैं, जिस से इन में कई बार पस पड़ जाती है अर्थात इंफैक्शन हो जाती है।और ये बड़े-बड़े काले से दिखने शुरू हो जाते हैं (Black heads) ऐसी कुछ परेशानी बार बार हो तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से अवश्य संपर्क करना चाहिए।
और हां, केवल समाचार-पत्र में या टीवी के विज्ञापन देख कर कुछ भी इन के ऊपर लगा लेना, आफत मोल लेने के बराबर है। कईं बार तो मैं कुछ टीनएजर्स को इन के ऊपर स्टीरायड्स( steroids) मिली हुई क्रीमें बिना किसी डाक्टरी सलाह के लगाते हुए देख कर बहुत परेशान होता हूं।
जैसे अपने बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते आए हैं न कि इन मुहांसों को मत फोड़ो, चेहरा साफ सुथरा रखो और ऐसी वैसी चालू किस्म की क्रीमों से चेहरे पर लीपा-पोती न करो, वे ठीक ही कह रहे हैं। ये जो आज कल छोटी उम्र से ही ब्यूटी पार्लर जाने का फैशन हो गया है न, यह भी एक तरह से परेशानी का बाईस ही है.....First of all, let’s give an opportunity for beauty to take form----only then one needs to temper with it. By the way, ideally speaking beauty needs no ornaments…..then why all these hassles?? Just pay attention to your diet and your thoughts…..be happy--- it is a sureshot recipe for glowing golden skin!!
दोस्तो, अपनी जो बात हो रही थी , वह तो अभी बीच में ही है। आम तौर पर पौष्टिक खाना न खाना एवं अपनी त्वचा की देखभाल न करने को मुहांसों का कारण बताया जाता है, लेकिन इन के पीछे कुछ ऐसे भी कारण होते हैं जिन को ऊपर कईं बार कोई कंट्रोल होता नहीं है। तो आईए कुछ ऐसे ही कारणों पर नज़र डालते हैं.....
The US National Women’s Health Information Centre offers this list of potential risk factors for acne (मुहांसे)---
· युवावस्था में प्रवेश करते समय कुछ हारमोनल बदलाव जो हमारे शरीर में होते हैं.
· महिलाओं में मासिक धर्म, गर्भावस्था एवं मासिक धर्म के बंद होने (मीनोपाज़) के दौरान होने वाले हारमोनल बदलाव
· कुछ दवाईयों की वजह से भी मुहांसों के होने की आशंका बढ़ जाती है, जैसे कि एपीलैप्सी एवं डिप्रेशन के इलाज के लिए दी जाने दवाईयां
· मुंह पर मेक-अप लगाने से भी मुहांसों से जूझना पड़ सकता है
· हैल्मेट वगैरह से होने वाली स्किन इरीटेशन ( अब यह पढ़ कर यंगस्टरस ये भी न समझें कि हैल्मेट न पहने का एक और बहाना मिल गया ---बिलकुल नहीं, आप हैल्मेट जरूर पहनिए, मुहांसे होंगे भी तो संभाल लेंगे।
· जिन युवाओं में मुहांसों की पारिवारिक हिस्ट्री होती है उन में भी इन मुहांसों का आशंका रहती है।

क्यों लेते हैं मुहांसों को इतनी सीरियस्ली ?


इस में लगता यही है कि ये कंपनियां जो कुछ ही दिनों में मुहांसे गायब करवाने के सपने दिखाती हैं न वे ही हमारे युवाओं द्वारा इन मुहांसों को इतना सीरियल्सी लेने के लिए इतनी जिम्मेदार हैं। तो फिर, क्या करें- न लगाएं कोई भी क्रीम इन पर ?—क्या जरूरत है , यह तो दोस्तो आपने भी नोटिस किया होगा कि जो लोग इन पर जितनी ज्यादा ट्यूबें लगाते हैं, उन को ये उतना ही ज्यादा तंग करते हैं। इन को खत्म करने के लिए ज्यादा दवाईयां (एंटीबायोटिक दवाईयां) लेते रहने अथवा महंगी महंगी क्रीमें खरीद कर लगाने से ये बद से बदतर ही हो जाते हैं (क्योंकि आप सब तो साहित्य से बहुत जुड़े हुए हो ....वो एक शेयर है न कि जितना ज्यादा इलाज किया मर्ज बढ़ता चला गया....बस ठीक वैसे ही कुछ)।
दोस्तो, यह तो आप ने भी देखा होगा जब हम युवावस्था में प्रवेश करते हैं तो अकसर कुछ समय के लिए ये मुहांसे थोड़ा बहुत परेशान करते ही हैं......But then why don’t today’s youth take all these quite sportingly….it is all part of our growing up !! We don’t remember having taken any pill or having applied any cream for these innocent heads.
दोस्तो, इस हैड से मुझे ध्यान आया है कि कईं बार युवा इन को नाखुनों से फोड़ते रहते हैं, जिस से इन में कई बार पस पड़ जाती है अर्थात इंफैक्शन हो जाती है।और ये बड़े-बड़े काले से दिखने शुरू हो जाते हैं (Black heads) ऐसी कुछ परेशानी बार बार हो तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से अवश्य संपर्क करना चाहिए।
और हां, केवल समाचार-पत्र में या टीवी के विज्ञापन देख कर कुछ भी इन के ऊपर लगा लेना, आफत मोल लेने के बराबर है। कईं बार तो मैं कुछ टीनएजर्स को इन के ऊपर स्टीरायड्स( steroids) मिली हुई क्रीमें बिना किसी डाक्टरी सलाह के लगाते हुए देख कर बहुत परेशान होता हूं।
जैसे अपने बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते आए हैं न कि इन मुहांसों को मत फोड़ो, चेहरा साफ सुथरा रखो और ऐसी वैसी चालू किस्म की क्रीमों से चेहरे पर लीपा-पोती न करो, वे ठीक ही कह रहे हैं। ये जो आज कल छोटी उम्र से ही ब्यूटी पार्लर जाने का फैशन हो गया है न, यह भी एक तरह से परेशानी का बाईस ही है.....First of all, let’s give an opportunity for beauty to take form----only then one needs to temper with it. By the way, ideally speaking beauty needs no ornaments…..then why all these hassles?? Just pay attention to your diet and your thoughts…..be happy--- it is a sureshot recipe for glowing golden skin!!
दोस्तो, अपनी जो बात हो रही थी , वह तो अभी बीच में ही है। आम तौर पर पौष्टिक खाना न खाना एवं अपनी त्वचा की देखभाल न करने को मुहांसों का कारण बताया जाता है, लेकिन इन के पीछे कुछ ऐसे भी कारण होते हैं जिन को ऊपर कईं बार कोई कंट्रोल होता नहीं है। तो आईए कुछ ऐसे ही कारणों पर नज़र डालते हैं.....
The US National Women’s Health Information Centre offers this list of potential risk factors for acne (मुहांसे)---
· युवावस्था में प्रवेश करते समय कुछ हारमोनल बदलाव जो हमारे शरीर में होते हैं.
· महिलाओं में मासिक धर्म, गर्भावस्था एवं मासिक धर्म के बंद होने (मीनोपाज़) के दौरान होने वाले हारमोनल बदलाव
· कुछ दवाईयों की वजह से भी मुहांसों के होने की आशंका बढ़ जाती है, जैसे कि एपीलैप्सी एवं डिप्रेशन के इलाज के लिए दी जाने दवाईयां
· मुंह पर मेक-अप लगाने से भी मुहांसों से जूझना पड़ सकता है
· हैल्मेट वगैरह से होने वाली स्किन इरीटेशन ( अब यह पढ़ कर यंगस्टरस ये भी न समझें कि हैल्मेट न पहने का एक और बहाना मिल गया ---बिलकुल नहीं, आप हैल्मेट जरूर पहनिए, मुहांसे होंगे भी तो संभाल लेंगे।
· जिन युवाओं में मुहांसों की पारिवारिक हिस्ट्री होती है उन में भी इन मुहांसों का आशंका रहती है।

3 comments:

Gyandutt Pandey said...
बढ़िया लेख डाक्टर साहब। बस मेरे जैसे के लिये केवल ३० साल देरी से। वैसे तब मुहासों को ले कर इतनी हीन भावना नहीं थी और उनको मिटाने का इतना बड़ा कारोबार भी नहीं था।
गलत समय जनमे हम! :-)
sunita (shanoo) said...
शुक्रिया डॉक्टर साहब...मेरा बेटा भी बहुत परेशान है मुहासों से...
दादी का दवाखाना said...
वाह, अच्छा लिखा है

धूल चाट रहे वाकिंग शूज़ को साफ़ करने के इलावा कोई चारा है ही नहीं....

अमेरिकन जर्नल आफ कारडीयोलाजी में छपे एक लेख के अनुसार धूल चाट रहे वाकिंग शूज़ को साफ़ करने के इलावा कोई चारा है ही नहीं....अगर हम सप्ताह में छः दिन रोज़ाना आधे घंटे तक तेज़-तेज़ सैर करते हैं तो इस से हम कमर से कमरा बन रही अपनी कमर को कम तो कर ही सकते हैं, इस के साथ ही साथ मोटापे एवं स्थूल जीवण-शैली( सिडेंटरी लाइफ-स्टाइल) के कारण होने वाले मैटाबालिक सिंड्रोम के रिस्क को भी कम करने में मदद मिलती है।

डयूक यूनिवर्सिटी मैडीकल सेंटर के इस अध्ययन में तो वैज्ञानिकों ने यहां तक देखा है कि अगर खाने-पीने की आदतों में कोई बदलाव न भी किया जाए तो भी तेज़-2 सैर करने से होने वाले लाभ तो हमें प्राप्त होते ही हैं। लेकिन, प्लीज़, मेरी बात मानिए तो इस खाने पीने की आदतों में कोई बदलाव न करने की आदत को आप इतना सीरियस्ली न ही लें--- जैसा हम लोगों का खान-पान है न, हमें तो वैसे ही बहुत ही ख्याल रखना होगा, दोस्तो।

दोस्तो, अमेरिका की लगभग एक चौथाई जनसंख्या इस मैटाबालिक सिंड्रोम से जूझ रही है। मैटाबालिक सिंड्रोम क्या है ?- दोस्तो, आप इतना जान लीजिए कि यह मैटाबालिक सिंड्रोम कई तरह के रिस्क फैक्टरों (risk factors) का एक समूह है जिस की वजह से हृदय रोग, डायबिटीज़ एवं स्ट्रोक होने की आशंका ज्यादा ही हो जाती है।

तो, चलिए, इन रिस्क फैक्टर्ज़ की ही कुछ बात कर लें ---अगर किसी व्यक्ति में नीचे लिखे पांच रिस्क फैक्टर्ज़ में से कम से कम तीन फैक्टर्ज़ हैं तो समझ लीजिए उसे मैटाबालिक सिंड्रोम है—
· बड़ी हुई कमर (large waistline)
· हाई-ब्लड प्रेशर
· नुकसान दायक ट्राईग्लिसरायड्स का बढ़ा हुया होना (high levels of harmful triglycerides)
· अच्छे ट्राइग्लिसरायड्स का स्तर कम होना (low levels of good cholesterol)
· हाई- ब्लड-शुगर
दोस्तो, अगर आप इन नुकसानदायक और फायदेमंद ट्राइग्लिसरायड्स की बात कुछ कुछ नहीं समझ पा रहे हैं तो कोई बात नहीं---बस इतना ही समझना काफी है कि जब हम अपने रक्त की जांच (लिपिड प्रोफाइल) करवाते हैं न, तो यह सारे स्तर हमें पता लग जाते हैं। दूसरा, यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि तेज़ तेज़ सैर करने से हमारे शरीर में ये नुकसान दायक तत्व कम होने लगते हैं और फायदेमंद ट्राइग्लिसरायड्स का स्तर बढ़ने लगता है जिस से रक्त की नाड़ियों में अवरोध पैदा होने की संभावना घटने लगती है।
अमेरिकी जर्नल आफ कार्डिलाजी के अनुसार बिल्कुल ही शारीरिक व्यायाम न करने से कुछ व्यायाम करना तो बेहतर है ही, और ज्यादा शारीरिक परिश्रम करना कम परिश्रम करने से तो निःसंदेह अच्छा है ही, लेकिन बिल्कुल शारीरिक व्यायाम करना तो भाई बेहद खतरनाक है।–क्या यही बात हम सैंकड़ों वर्षों से नहीं जानते ?
क्या हुया, आप तो डर से गए ?--- नहीं,नहीं, ऐसी डरने वाली कोई बात भी नहीं है, बस आज ही रैक पर पड़े अपने सैर करने वाले शूज़ की धूल साफ कर ही दीजिए। चलिए, मैं भी आज से यही प्रण करता हूं कि प्रवचनों पर खुद भी चल कर दिखाऊंगा...................
बेटा, ज़रा मेरे काले कैनव्स शूज़ देना !
तो, दोस्तो, आप भी उठिए, टहलते हुए किसी पार्क में मिलते हैं।....................
Good morning, India !!!!!
-

शुक्रवार, 4 जनवरी 2008

यह चक्कर आने का क्या चक्कर है ?

दोस्तो, यह चक्कर आना कोई बीमारी नहीं है, लेकिन यह किसी और रोग का एक लक्षण जरूर है। वैसे तो चक्कर आना कोई इतनी गंभीर बात है नहीं और यह आम तौर पर एक टेंपरेरी सी परेशानी होती है ,लेकिन अगर हमें इस के कारण का पता रहता है तो हम मुनासिब एक्शन ले सकते हैं----
चक्कर आने के आम कारण ये हैं---
-कान के अंदरूनी भाग में कोई इंफैक्शन या कान की कोई और बीमारी
-थकावट, तनाव या बुखार के चलते भी अकसर चक्कर आ जाता है
-ब्लड-शुगर कम होना भी चक्कर आने के कारणों में शामिल है-----------इस लिए कहते हैं न कि आज के युवाओं की सुबह नाशता स्किप करने की आदत बहुत खराब है।
-खून की कमी अथवा एनीमिया में भी चक्कर आ सकते हैं.
-डीहाइड्रेशन--- जब कभी हमें दस्त एवं उलटियां परेशान करती हैं,तो शरीर में पानी की कमी को ही डीहाइड्रेशन कहते हैं.
-सिर के ऊपर कोई चोट लगने से भी सिर घूमने लगता है
-दिल की अथवा सरकुलेटरी सिस्टम की कोई बीमारी
-दिमाग में स्ट्रोक हो जाना
-कुछ दवाईयों का साइड-इफैक्ट होने से भी सिर घूमने लगता है---तो,इसलिए अगर आप को चक्कर आ रहे हैं और आप ने कोई नई दवा लेनी शुरू की है, तो अपने डाक्टर से परामर्श जरूर कीजिए।

शुभकामऩाएं !!

यह चक्कर आने का क्या चक्कर है ?

दोस्तो, यह चक्कर आना कोई बीमारी नहीं है, लेकिन यह किसी और रोग का एक लक्षण जरूर है। वैसे तो चक्कर आना कोई इतनी गंभीर बात है नहीं और यह आम तौर पर एक टेंपरेरी सी परेशानी होती है ,लेकिन अगर हमें इस के कारण का पता रहता है तो हम मुनासिब एक्शन ले सकते हैं----

चक्कर आने के आम कारण ये हैं---
-कान के अंदरूनी भाग में कोई इंफैक्शन या कान की कोई और बीमारी
-थकावट, तनाव या बुखार के चलते भी अकसर चक्कर आ जाता है
-ब्लड-शुगर कम होना भी चक्कर आने के कारणों में शामिल है-----------इस लिए कहते हैं न कि आज के युवाओं की सुबह नाशता स्किप करने की आदत बहुत खराब है।
-खून की कमी अथवा एनीमिया में भी चक्कर आ सकते हैं.
-डीहाइड्रेशन--- जब कभी हमें दस्त एवं उलटियां परेशान करती हैं,तो शरीर में पानी की कमी को ही डीहाइड्रेशन कहते हैं.
-सिर के ऊपर कोई चोट लगने से भी सिर घूमने लगता है
-दिल की अथवा सरकुलेटरी सिस्टम की कोई बीमारी
-दिमाग में स्ट्रोक हो जाना
-कुछ दवाईयों का साइड-इफैक्ट होने से भी सिर घूमने लगता है---तो,इसलिए अगर आप को चक्कर आ रहे हैं और आप ने कोई नई दवा लेनी शुरू की है, तो अपने डाक्टर से परामर्श जरूर कीजिए।

शुभकामऩाएं !!

1 comments:

Gyandutt Pandey said...
बहुत रोचक लगा आपका लेखन। आप जैसे ब्लॉगर पिछले साल मिलते और मित्र होते तो शायद मुझे अपना यह प्रॉजेक्ट शेल्व न करना पड़ता!

गुरुवार, 3 जनवरी 2008

इन लेखकों एवं चित्रकारों का टेलेंट तो रेलगाड़ी के बाथरूमों तक ही सीमित होता है.....

चलिए , यह भी एक इत्मीनान की ही बात है कि इन चित्रकारों का टेलेंट तो रेलगाड़ी के बाथरूमों तक ही सीमित रहता है। उन की यह कला उस से बाहर न ही आए तो ही ठीक है, नहीं तो गदर मच जाएगा। जब ये तरह तरह की अश्लील बातें अथवा ऊट-पटांग बातें मोटे मोटे अक्षरों में वहां लिखते हैं तो यह क्यों भूल जाते हैं कि इन पर समाज के हर आयु वर्ग के लोगों की नज़र पढ़ेगी। कई बार तो अबोध बच्चे भी यह सब पढ़ कर, चित्रकारी देख कर हैरान परेशान हो जाते होंगे। मैं अकसर सोचता हूं कि इस देश के अबोध बच्चों की यौन-शिक्षा के पहले पाठ तो शायद यहीं लिखे रहते हैं...।अफसोस तो बस इसी बात का ही होता है कि इन बाथ-रूम बलागरों को भी लगता है कि अपनी कला के जौहर दिखाने का उचित मौका मिला नहीं। इस अजीबो-गरीब बलागरी का दुनिया भी कुछ इंटरनैट ब्लागरी जैसी ही चलती है----अर्थात् कई लोग तो ये विवरण देख कर एवं लाइन ड्रांईंग देख कर इतने भड़क जाते हैं कि उन्होंने टिप्पणी के रूप में अपना करारा सा जवाब भी लिखा होता है। इस तरह की ग्रैफिटी रेल के बाथरूमों में ही नहीं, कईं बार तो मुझे मुंबई की लोकल गाड़ीयों में भी देखने को मिलीं। लेकिन बम्बई में इस तरह की ग्रैफिटी के ऊपर तुरंत कुछ पेंट पोत दिया जाता है...भई, ऐसे तो हज़ारों लोगों की नज़रों में यह सब आ जाएगा। कई बार तो नोटों पर भी इस तरह की ग्रैफिटी देखने को मिलती है, लेकिन वह बड़ी शालीन सी ही दिखती है। बंटी लव्स बबली या पिंचू लव्स पिंकी तक ही यह सीमित होती है। लेकिन कईं बार तो ये कलाकार एतिहासिक स्थानों को भी स्पेयर नहीं करते-- और उन पर भी अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश करते हैं। अरे भाई, कुछ ऐसी छाप ही छोड़नी है तो शाहजहां का अनुसरण करिए......उस ने कैसे अपने प्यार को अमर ही कर दिया। इन छोटी-मोटी हरकतों से तो कुछ हासिल होने से रहा, rather you are only corrupting the tender yound minds of our dear youngsters which happen to be our greatest assets!!

काश!! ऊपर वाला इन आत्माओं को सदबुद्धि प्रदान करें ताकि वे अपनी कलम के जौहर दिखाने के लिए बलागरी में पांव रखें।

सांस की दुर्गंध----परेशानी !..........कोई तो रास्ता होगा इस से बचने का...

जी हां, जरूर है और वह भी बिल्कुल सस्ता, सुंदर और टिकाऊ। यह रास्ता,दोस्तो, यह है कि अगर हम अपने दांतों को रात में सोने से पहले भी ब्रुश करें और प्रतिदिन सुबह-सवेरे अपनी जुबान को जुबान साफ करने वाली पत्ती से साफ कर लें,तो यकीन मानिए हम सब इस दुर्गंध की परेशानी से बच सकते हैं। दोस्तो, हम अकसर देखते हैं कि अपने लोग यह साधारण से काम तो करते नहीं---महंगी महंगी माउथ-वाश की बोतलों के पीछे भागना शुरू कर देते हैं। यह तो दोस्तो वही बात है कि मैं दो दिन स्नान न करूं,और हस्पताल जाने से पहले अपने शरीर पर यू-डी-क्लोन या कोई और महंगा सा इत्र छिड़क लूं। दोस्तो, इस से पसीने की बदबू शायद कुछ घंटे के लिए दब तो जाएगी , लेकिन दूर कदापि न होगी। उस के लिए तो दोस्तो खुले पानी से स्नान लेना ही होगा। ठीक उसी तरह ---रात में दांत साफ करना व रोज सुबह सवेरे अपनी जुबान को पत्ती से साफ करना भी मुंह की महक को कायम रखने के लिए नितांत जरूरी है। दोस्तो, यह कोई नहीं बात नहीं है, अपने देश में तो जुबान को नित्य प्रतिदिन साफ करने की आदत तो हज़ारों साल पुरानी है। बस, कभी कभी हम ही सुस्ती कर जाते हैं।
दोस्तो, इस का रहस्य यह है कि अब यह सिद्ध हो चुका है कि हमारे मुंह में दुर्गंध पैदा करने वाले कीटाणु हमारी जुबान की कोटिंग (वही, सफेद सी काई, दोस्तो) में ही फलते फूलते हैं और अगर हम इस काई को रोज सुबह सवेरे साफ करते रहें तो फिर सारा दिन सांसें महकती रहेंगी। यहां एक बात और साफ करनी जरूरी है कि आज कल लोग पानमसाले को भी माउथ-फ्रैशनर के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। यही खतरनाक है-इस प्रकार हम कई बीमारियों को मोल ले लेते हैं। अपनी वोह पुरानी वाल छोटी इलायची या सौंफ ही ठीक है। पानमसालों वगैरह के चक्कर में कभी न पड़ें। लेकिन एक बात का और भी ध्यान रखना जरूर है कि आप के मसूड़े एवं दांत स्वस्थ होने चाहिए ---क्योंकि अगर पायरिया है तो उस का इलाज करवाना भी बहुत जरूरी है क्योंकि पायरिया भी मुंह की दुर्गंध पैदा करने में बहुत ज्यादा जिम्मेदार है।