शुक्रवार, 14 मई 2021

कभी पेड़ का साया...पेड़ के काम न आया...

 हमारे स्कूल के ज़माने का यह गीत ...हमने इस के बोलों की तरफ़ कभी ध्यान भी न दिया होगा ...उन दिनों में किसे इतनी फ़ुर्सत होती है ...बस, इसे सुनना मन को भाता था, इसलिए रेडियो पर बजता था तो सुन लेेते थे ...तपस्या फिल्म का यह सुंदर गीत है ...१९७६ की फिल्म थी तपस्या....

पिछले लगभग आठ-दस साल से शायरों, फिल्मी गीतकारों के बारे में जिज्ञासा होने लगी कि ये लोग ऐसे दिल को छू-लेने वाले बोल कैसे लिख लेते हैं... लखनऊ में रहते हुए कुछ को मिलने का मौक़ा मिला..कुछ को देखने का ...और अभी बंबई में रहते कुछ गीतकारों की अगली पीड़ी से उन के बारे में सुनने का, उन को पढ़ने का सबब हासिल हुआ...

मैं भी किन बातों में पड़ गया...बात तो उस गीत की कर रहा था ...जी हां, मुझे फिल्मी गीत रेडियो पर और विविध भारती पर ही सुनने पसंद हैं। रविंद्र जैन की सुंदर फिल्मी और गैर फिल्मी रचनाओं से कौन वाक़िफ़ न होगा .. उन के सभी गीत और भजन दिल को छू जाते हैं ...बार बार सुन कर भी बंदे की प्यास नहीं बुझती। 

अच्छा, यह जो गीत है ....यह मुझे बेहद पसंद है ... मैंने कुछ दिन पहले इसे कईं बार सुना था ... और मैं अकसर अपने पसंदीदा गीतों की दो चार लाइनें अपनी किसी कापी में लिख लेता हूं ....बाद में इसे ढूंढने में मुझे आसानी होती है ...क्योंकि मेरी यही पूंजी है 😆..लेकिन इस के बारे में मुझे मेरी नोटबुक में कहीं कुछ दिखा नहीं।

दो दिन से मैं इस गीत को तलाश कर रहा था ...बस, मुझे इतना ही याद था कि पेड़ अपने साये में ख़ुद नहीं बैठते ...सो, यही लिख कर मैंने गूगल किया ...और मुझे धुंधला सा यह भी याद था कि इसे लिखा भी रविंद्र जैन ही था शायद...मन सब तरह से गूगल कर लिया लेकिन मुझे इस का कुछ पता नहीं चल रहा था ....

कुछ क़रीबी लोगों से पूछा ..लेकिन कोई मदद न कर पाया....तो आज देर शाम में जब मैं अपने मोबाइल पर विविध भारती सुन रहा था तो अचानक यह गीत बजने लगा...मुझे इतनी ख़ुशी हुई कि मैं ब्यां नहीं कर सकता ...सच में मुझे एक बार तो ऐसे लगा कि जैसे मेरी लॉटरी लग गई हो.. इसलिए मैं आज मौक़ा हाथ से जाने नहीं दिया...विविध भारती पर सुनने के बाद इसे कईं बार यू-टयूब पर देखा और साथ साथ उसे लिख कर भी रख लिया.... 

फिल्म तपस्या के इस बेहद सुंदर गीत को लिखा था..एम जी हश्मत ने...संगीत दिया था ...रविंद्र जैन ने और गायक थे ...किशोर कुमार और इन सब ने मिल कर जिस बेमिसाल गीत को जन्म दिया, उस का कमाल तो हम देख ही रहे हैं...इतने बरसों से ...👏

पेड़ और इस बुज़ुर्ग महिला की तस्वीर मैंने गुजरात के एक स्टेशन पर कुछ दिन पहले खींची थी ....आज अचानक लगा कि यह गीत इन दोनों की दास्तां ही जैसे ब्यां कर रहा हो


मुझे कईं बार लगता है जहां चाह वहां राह ...जिस चीज़ को हम लोग बड़ी शिद्दत से चाहते हैं, कुदरत भी उसे दिलाने में हमारी मदद  करती ही है ज़रूर ...

1 टिप्पणी:

  1. आपने सही कहा कि किसी चीज को अगर हम शिद्दत से चाहते हैं तो कुरदत कई बार हमें उससे मिलाने का प्रयास करती है... कई बार मैंने भी ऐसे ही महसूस किया है...

    जवाब देंहटाएं

मेरे लिए आलेख के बारे में आप की फीडबैक बहुत अहम् है...कृपया बिंदास कुछ भी लिख कर जाइए...