शनिवार, 22 मार्च 2008

आज विश्व जल दिवस है..............अ..च्..छा..........तो ?

इस दिन अखबारों में इस के बारे में खूब चिल्ला-चिल्ली होती है। वैसे मैंने भी हिंदी के एक अखबार में इस से संबंधित एक विज्ञापन देख कर सुबह सुबह ही एक रस्म-अदायगी कर छोड़ी थी। लेकिन अब लेटे लेटे कुछ विचार आ रहे हैं जिन्हें अपनी स्लेट पर बेफिक्र हो कर लिख रहा हूं।

विचार आ रहा है कि तरह तरह के बहुत कुछ दावे हम लोग विभिन्न फोरमों पर सुनते रहते हैं कि पानी के क्षेत्र में हम लोग कुछ समय पहले कहां थे और अब देखो कहां के कहां आ गये हैं। सोच रहा हूं कि सचमुच ही कहां से कहां आ गये हैं.....विचार आया कि बचपन से शुरू कर के देख तो लूं कि आखिर हम ने इस दिशा में आखिर कितने परचम लहरा दिये हैं.....

स्कूल में पानी ...... सोच रहा हूं हम लोगों को कहां स्कूल में पानी ले कर जाने की ज़रूरत पड़ती थी !...बस, स्कूल में लगे हैंड-पंप से पानी भी पी लिया करते थे और एक दूसरे के ऊपर थोड़ा बहुत छिड़क कर रोज़ाना होली का आनंद भी लूट लिया करते थे ...जब फिर बड़े स्कूल में गये तो एक बहुत बड़ी पानी की टैंकी से अपनी ज़रूरत पूरी कर लिया करते थे जिस के नीचे 10-12 टूटियां लगी रहती थीं। और अब देखो, हमारे बच्चों को भारी भरकम बस्ते (हम तो भई इन्हें बस्ते ही कहते थे !) के साथ ही साथ इस पानी की बोतल का बोझ उठाने की भी चिंता सताये रहती है। और गर्मी के दिनों में तो अकसर यह बोतल भी कम पड़ जाती है। तो, अपने मन से पूछ रहा हूं कि क्या इस को विकास मान लूं कि छोटे बच्चों को अपनी सेहत के लिये पानी भी उठा कर ले जाने को विवश होना पड़ रहा है। लेकिन बच्चे भी क्या करें और इन के मां-बाप भी क्या करें.......हम ने तो प्राकृतिक संसाधनों का शोषण ही इतना कर दिया है कि क्या कहूं !

हाटेल में पानी .......जब भी बचपन में हम कभी होटल वगैरह या शादी-पार्टी (कहो तो उंगलियों के पोरों पर गिन कर रख दूं !!)..में जाते थे तो पानी पीने से पहले किसी तरह का सोचना थोड़े ही पड़ता था। लेकिन अब जब होटल में जाते हैं तो अकसर पानी की बोतल घर से उठा कर ले जाते हैं। और जब यह बोतल नहीं होती और छोटे बेटे की पानी पीने की इच्छा होती है तो वह झिझकते हुये पूछता है कि पापा, यह वाला पानी पी लूं..............तो हमें भी उतनी ही झिझक के साथ कहना ही पड़ता है कि बेटा, देखना एक-दो घूंट ही पीना, बस अब घर चल ही रहे हैं। तो क्या बच्चों को इस तरह से पानी पीने से भी जब डराया जा रहा है , ऐसे में इसे विकास मान लूं !

विवाह-शादियों का नज़ारा तो देखिये....बारातियों की सेवा के लिये अब तो प्लास्टिक के गिलास भी आते हैं....चाहे पहले बार चखी ( फ्री-फंड में !).....महंगी अंग्रेज़ी शराब के नशे में धुत अस्त-व्यस्त सी गुलाबी पगड़ी डाल कर झूमता हुया, तंदूरी चिकन की एक टंगड़ी को अपने गुटखे से रंगे हुये दांतों से छीलते हुये दुल्हे का मौसा उस पानी के गिलास का एक ही घूंट भरेगा , लेकिन सुबह तो इस तरह के सैंकड़ों प्लास्टिक के गिलास उस बैंकेट हाल के साथ लगते नाले को ब्लाक नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे.................समझ में नहीं आ रहा कि पानी परोसने के इस नये अंदाज़ को क्या विकास मान लूं !

वो दस रूपये वाली पानी की बोतल खरीदने को विकास मान लूं ?...........ट्रेन में दूध के लिये बिलखता किसी का नन्हा मुन्ना बच्चा रो-रो कर जब हार जाता है लेकिन उसे दूध नसीब नहीं होता, तो वह आखिर हार कर अपनी बिल्कुल कमज़ोर सी मां की सूखी छाती पर जब टूट पड़ता है और पास ही में मेरे जैसा कोई बाबू जैंटलमैन उस दस रूपये की पानी की बोतल को ज़रूरत न होने पर भी इसलिये बड़े ठाठ से पी रहा होता है कि यार, स्टेशन आ रहा है और इसे पिये बिना कैसे फैक दूं...... तो क्या इसे विकास मान लूं......................नहीं, नहीं , धिक्कार है ऐसी पानी की बोतल पर जिस पर खर्च किये पैसे से एक बच्चे का पेट भर सकता था।
वैसे तो जब देश में पेय-जल की समस्या पर हो रहे सैमीनारों के दौरान स्टेज पर इस तरह के पानी की दर्जनों बोतलें नज़र आने पर जो विचार मेरे मन को उद्वेलित करते हैं उन का मैं यहां पर जिक्र नहीं करना चाहूंगा..........फिर कभी देखूंगा....अभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ।
पीछे कितना आ रहा था कि इन पानी की बोतलों में यह है ,वो है, कीटनाशकों के अवशेष हैं.....लेकिन क्या इन की बिक्री में कोई कमी दिख रही है, मुझे तो नहीं लगता। यही तो वास्तविक विकास है , और क्या !!

पानी शुद्धिकरण ...एक अच्छा-खासा उद्योग.................बचपन में नानी के यहां जाते थे तो हैंड-पंप का मीठा पानी पी कर मजा करते थे। थोड़े बड़े हुये तो देखा कि मां पानी की टूटी के ऊपर मल-मल के कपड़े की एक लीर बांध देती है ताकि मिट्टी रूक जाये और सांप वगैरह न आ जाये........थोड़े और बड़े हुये तो देखा कि एक फिल्टर सा पानी को स्टोर करने के लिये इस्तेमाल किया जाने लगा है......कुछ समय बाद शायद उस में लगी कैंडल्स के साथ भी प्राबलम होने लगी तो एक छोटा सा फिल्टर पानी की टूटी पर लगाने वाला ही 100-150 रूपये का चल निकला। बचपन में तो पानी के शुद्धिकरण के बारे में कभी सुना ही न था...बस एक बार याद है कि बड़े भाई को दस्त लगे थे तो, हमारे सामने रह रहे एक झोला-छाप नकली डाक्टर (तब पता नहीं था कि कौन असली और कौन नकली होता है, हमारा बचपन गांव जैसे माहौल में ही बीता है !)…..ने एक टीका लगा कर यह निर्देश दे दिया था कि पप्पू (मेरा बड़ा भाई ) को दो-तीन दिन पानी उबाल कर ही देना होगा।

वैसे सोचता हूं कि कितना आसान है मरीज़ों को इस तरह की सलाह दे देना कि पानी उबाल कर पी लेना.....लेकिन क्या यह इतना प्रैक्टीकल आइडिया है?......चूंकि मैं अपनी ही स्लेट पर लिख रहा हूं और ठीक-गलत की किसी तरह की परवाह किये बिना सब कुछ लिख रहा हूं कि मुझे कभी भी यह आइडिया प्रैक्टीकल लगा ही नहीं। हां, जब तक घर में कोई बीमार है तो समझ में आता है कि घर की गृहिणी यह एक्स्ट्रा काम खुशी खुशी कर लेगी...........लेकिन जिस तरह के ज़्यादातर लोगों के हालात हैं , परिस्थितयां हैं , ऐसे में मुझे इस तरह की किसी को सलाह हमेशा के लिये दे देना भी एक धकौंसलेबाजी ज़्यादा लगती है। लेकिन जो लोग यह पानी उबाल कर पीने की अपनी आदत निभा पा रहे हैं , वे बधाई के पात्र हैं............और उन्हें हमेशा यह आदत कायम रखनी चाहिये क्योंकि पानी को उबाल कर पीना बहुत फायदेमंद है।

वैसे तो मुझे इन क्लोरीन की गोलियों की भी एक आपबीती याद है। हमारे शहर में 1995 में बाढ़ आ गई.....मैं और मेरी मां हम जब एक-डेढ़ महीने बाद वापिस अपने घर पहुंचे तो वहां पर यह बात की बहुत चर्चा थी कि पानी में क्लोरीन की गोलियां डाल कर पीना होगा ताकि कीटाणुरहित जल का ही सेवन किया जाये। लेकिन सारा शहर छान लेने पर भी जब वे नहीं मिलीं तो हम ने उस मटमैले पानी को उबाल कर ही कितने दिनों तक इस्तेमाल किया ।
लेकिन अब मैं अपने मरीज़ों को इतना ज़रूर कहता हूं कि आप में से जो लोग भी अफोर्ड कर सकते हैं वे कोई भी इलैक्ट्रोनिक संयंत्र रसोई-घर में ज़रूर लगवा लें...क्योंकि यह अब किसी तरह की भौतिक सम्पन्नता का प्रतीक रह कर एक ज़रूरत ही बन चुका है। चूंकि ये अभी भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं.....लगभग पांच हज़ार की मशीन और लगभग एक हज़ार रूपये की सालाना एएमसी.......इसलिये जब रतन टाटा ने नैनो कार के दर्शन करवाये तो उन्होंने आम आदमी के लिये एक जल-शुद्धिकरण यंत्र बाज़ार में उतारने की बात कही तो मुझे बहुत अच्छा लगा। मुझे नैनो से भी ज़्यादा खुशी इस यंत्र की होगी..।

अब छोड़े इन बातों को इधर ही, इन बातों को खींचने की तो कोई लिमिट है ही नहीं, जितना खींचेंगे खिंचती चली जायेंगी। तो , मैंने भी अपने अंदाज़ में विश्व जल दिवस मना लिया है। मैंने आज सुबह सुबह घऱ में कल ही लाये गये नये मटके से पानी ग्रहण कर लिया है। मेरी प्यास तो उस लंबी सी डंडी वाले स्टील के बर्तन से मटके से निकला पानी ही बिना मुंह लगाये पी कर ही बुझती है। एक साल में लगभग 8-9 महीने जब तक कि मटके के ठंडे पानी से दांत में सिहरन नहीं उठने लग जाती , तब तक तो मैं तो भई इसी तरह से ही पानी पीने का आदि हूं। हां, वो बात अलग है कि मटके में पानी उस इलैक्ट्रोनिक संयंत्र द्वारा शुद्ध किया ही डाला जाता है। सोचता हूं कि इस जालिम मटके के पानी की महक में भी क्या गज़ब की बात है कि बंदे को मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू भी साथ में हर बार उस की माटी की याद दिलाती है जिससे उस के शरीर की प्यास ही नहीं रूह की प्यास भी मिटती दिखती है। अब मुझे लगता है कि फिलासफी झाड़ने पर उतरने लगा हूं..............इसलिये पोस्ट को तुरंत पब्लिश करने में ही समझदारी है।

आज विश्व जल दिवस है..............अ..च्..छा..........तो ?


इस दिन अखबारों में इस के बारे में खूब चिल्ला-चिल्ली होती है। वैसे मैंने भी हिंदी के एक अखबार में इस से संबंधित एक विज्ञापन देख कर सुबह सुबह ही एक रस्म-अदायगी कर छोड़ी थी। लेकिन अब लेटे लेटे कुछ विचार आ रहे हैं जिन्हें अपनी स्लेट पर बेफिक्र हो कर लिख रहा हूं।

विचार आ रहा है कि तरह तरह के बहुत कुछ दावे हम लोग विभिन्न फोरमों पर सुनते रहते हैं कि पानी के क्षेत्र में हम लोग कुछ समय पहले कहां थे और अब देखो कहां के कहां आ गये हैं। सोच रहा हूं कि सचमुच ही कहां से कहां आ गये हैं.....विचार आया कि बचपन से शुरू कर के देख तो लूं कि आखिर हम ने इस दिशा में आखिर कितने परचम लहरा दिये हैं.....

स्कूल में पानी ...... सोच रहा हूं हम लोगों को कहां स्कूल में पानी ले कर जाने की ज़रूरत पड़ती थी !...बस, स्कूल में लगे हैंड-पंप से पानी भी पी लिया करते थे और एक दूसरे के ऊपर थोड़ा बहुत छिड़क कर रोज़ाना होली का आनंद भी लूट लिया करते थे ...जब फिर बड़े स्कूल में गये तो एक बहुत बड़ी पानी की टैंकी से अपनी ज़रूरत पूरी कर लिया करते थे जिस के नीचे 10-12 टूटियां लगी रहती थीं। और अब देखो, हमारे बच्चों को भारी भरकम बस्ते (हम तो भई इन्हें बस्ते ही कहते थे !) के साथ ही साथ इस पानी की बोतल का बोझ उठाने की भी चिंता सताये रहती है। और गर्मी के दिनों में तो अकसर यह बोतल भी कम पड़ जाती है। तो, अपने मन से पूछ रहा हूं कि क्या इस को विकास मान लूं कि छोटे बच्चों को अपनी सेहत के लिये पानी भी उठा कर ले जाने को विवश होना पड़ रहा है। लेकिन बच्चे भी क्या करें और इन के मां-बाप भी क्या करें.......हम ने तो प्राकृतिक संसाधनों का शोषण ही इतना कर दिया है कि क्या कहूं !

हाटेल में पानी .......जब भी बचपन में हम कभी होटल वगैरह या शादी-पार्टी (कहो तो उंगलियों के पोरों पर गिन कर रख दूं !!)..में जाते थे तो पानी पीने से पहले किसी तरह का सोचना थोड़े ही पड़ता था। लेकिन अब जब होटल में जाते हैं तो अकसर पानी की बोतल घर से उठा कर ले जाते हैं। और जब यह बोतल नहीं होती और छोटे बेटे की पानी पीने की इच्छा होती है तो वह झिझकते हुये पूछता है कि पापा, यह वाला पानी पी लूं..............तो हमें भी उतनी ही झिझक के साथ कहना ही पड़ता है कि बेटा, देखना एक-दो घूंट ही पीना, बस अब घर चल ही रहे हैं। तो क्या बच्चों को इस तरह से पानी पीने से भी जब डराया जा रहा है , ऐसे में इसे विकास मान लूं !

विवाह-शादियों का नज़ारा तो देखिये....बारातियों की सेवा के लिये अब तो प्लास्टिक के गिलास भी आते हैं....चाहे पहले बार चखी ( फ्री-फंड में !).....महंगी अंग्रेज़ी शराब के नशे में धुत अस्त-व्यस्त सी गुलाबी पगड़ी डाल कर झूमता हुया, तंदूरी चिकन की एक टंगड़ी को अपने गुटखे से रंगे हुये दांतों से छीलते हुये दुल्हे का मौसा उस पानी के गिलास का एक ही घूंट भरेगा , लेकिन सुबह तो इस तरह के सैंकड़ों प्लास्टिक के गिलास उस बैंकेट हाल के साथ लगते नाले को ब्लाक नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे.................समझ में नहीं आ रहा कि पानी परोसने के इस नये अंदाज़ को क्या विकास मान लूं !

वो दस रूपये वाली पानी की बोतल खरीदने को विकास मान लूं ?...........ट्रेन में दूध के लिये बिलखता किसी का नन्हा मुन्ना बच्चा रो-रो कर जब हार जाता है लेकिन उसे दूध नसीब नहीं होता, तो वह आखिर हार कर अपनी बिल्कुल कमज़ोर सी मां की सूखी छाती पर जब टूट पड़ता है और पास ही में मेरे जैसा कोई बाबू जैंटलमैन उस दस रूपये की पानी की बोतल को ज़रूरत न होने पर भी इसलिये बड़े ठाठ से पी रहा होता है कि यार, स्टेशन आ रहा है और इसे पिये बिना कैसे फैक दूं...... तो क्या इसे विकास मान लूं......................नहीं, नहीं , धिक्कार है ऐसी पानी की बोतल पर जिस पर खर्च किये पैसे से एक बच्चे का पेट भर सकता था।
वैसे तो जब देश में पेय-जल की समस्या पर हो रहे सैमीनारों के दौरान स्टेज पर इस तरह के पानी की दर्जनों बोतलें नज़र आने पर जो विचार मेरे मन को उद्वेलित करते हैं उन का मैं यहां पर जिक्र नहीं करना चाहूंगा..........फिर कभी देखूंगा....अभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ।
पीछे कितना आ रहा था कि इन पानी की बोतलों में यह है ,वो है, कीटनाशकों के अवशेष हैं.....लेकिन क्या इन की बिक्री में कोई कमी दिख रही है, मुझे तो नहीं लगता। यही तो वास्तविक विकास है , और क्या !!

पानी शुद्धिकरण ...एक अच्छा-खासा उद्योग.................बचपन में नानी के यहां जाते थे तो हैंड-पंप का मीठा पानी पी कर मजा करते थे। थोड़े बड़े हुये तो देखा कि मां पानी की टूटी के ऊपर मल-मल के कपड़े की एक लीर बांध देती है ताकि मिट्टी रूक जाये और सांप वगैरह न आ जाये........थोड़े और बड़े हुये तो देखा कि एक फिल्टर सा पानी को स्टोर करने के लिये इस्तेमाल किया जाने लगा है......कुछ समय बाद शायद उस में लगी कैंडल्स के साथ भी प्राबलम होने लगी तो एक छोटा सा फिल्टर पानी की टूटी पर लगाने वाला ही 100-150 रूपये का चल निकला। बचपन में तो पानी के शुद्धिकरण के बारे में कभी सुना ही न था...बस एक बार याद है कि बड़े भाई को दस्त लगे थे तो, हमारे सामने रह रहे एक झोला-छाप नकली डाक्टर (तब पता नहीं था कि कौन असली और कौन नकली होता है, हमारा बचपन गांव जैसे माहौल में ही बीता है !)…..ने एक टीका लगा कर यह निर्देश दे दिया था कि पप्पू (मेरा बड़ा भाई ) को दो-तीन दिन पानी उबाल कर ही देना होगा।

वैसे सोचता हूं कि कितना आसान है मरीज़ों को इस तरह की सलाह दे देना कि पानी उबाल कर पी लेना.....लेकिन क्या यह इतना प्रैक्टीकल आइडिया है?......चूंकि मैं अपनी ही स्लेट पर लिख रहा हूं और ठीक-गलत की किसी तरह की परवाह किये बिना सब कुछ लिख रहा हूं कि मुझे कभी भी यह आइडिया प्रैक्टीकल लगा ही नहीं। हां, जब तक घर में कोई बीमार है तो समझ में आता है कि घर की गृहिणी यह एक्स्ट्रा काम खुशी खुशी कर लेगी...........लेकिन जिस तरह के ज़्यादातर लोगों के हालात हैं , परिस्थितयां हैं , ऐसे में मुझे इस तरह की किसी को सलाह हमेशा के लिये दे देना भी एक धकौंसलेबाजी ज़्यादा लगती है। लेकिन जो लोग यह पानी उबाल कर पीने की अपनी आदत निभा पा रहे हैं , वे बधाई के पात्र हैं............और उन्हें हमेशा यह आदत कायम रखनी चाहिये क्योंकि पानी को उबाल कर पीना बहुत फायदेमंद है।

वैसे तो मुझे इन क्लोरीन की गोलियों की भी एक आपबीती याद है। हमारे शहर में 1995 में बाढ़ आ गई.....मैं और मेरी मां हम जब एक-डेढ़ महीने बाद वापिस अपने घर पहुंचे तो वहां पर यह बात की बहुत चर्चा थी कि पानी में क्लोरीन की गोलियां डाल कर पीना होगा ताकि कीटाणुरहित जल का ही सेवन किया जाये। लेकिन सारा शहर छान लेने पर भी जब वे नहीं मिलीं तो हम ने उस मटमैले पानी को उबाल कर ही कितने दिनों तक इस्तेमाल किया ।
लेकिन अब मैं अपने मरीज़ों को इतना ज़रूर कहता हूं कि आप में से जो लोग भी अफोर्ड कर सकते हैं वे कोई भी इलैक्ट्रोनिक संयंत्र रसोई-घर में ज़रूर लगवा लें...क्योंकि यह अब किसी तरह की भौतिक सम्पन्नता का प्रतीक रह कर एक ज़रूरत ही बन चुका है। चूंकि ये अभी भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं.....लगभग पांच हज़ार की मशीन और लगभग एक हज़ार रूपये की सालाना एएमसी.......इसलिये जब रतन टाटा ने नैनो कार के दर्शन करवाये तो उन्होंने आम आदमी के लिये एक जल-शुद्धिकरण यंत्र बाज़ार में उतारने की बात कही तो मुझे बहुत अच्छा लगा। मुझे नैनो से भी ज़्यादा खुशी इस यंत्र की होगी..।

अब छोड़े इन बातों को इधर ही, इन बातों को खींचने की तो कोई लिमिट है ही नहीं, जितना खींचेंगे खिंचती चली जायेंगी। तो , मैंने भी अपने अंदाज़ में विश्व जल दिवस मना लिया है। मैंने आज सुबह सुबह घऱ में कल ही लाये गये नये मटके से पानी ग्रहण कर लिया है। मेरी प्यास तो उस लंबी सी डंडी वाले स्टील के बर्तन से मटके से निकला पानी ही बिना मुंह लगाये पी कर ही बुझती है। एक साल में लगभग 8-9 महीने जब तक कि मटके के ठंडे पानी से दांत में सिहरन नहीं उठने लग जाती , तब तक तो मैं तो भई इसी तरह से ही पानी पीने का आदि हूं। हां, वो बात अलग है कि मटके में पानी उस इलैक्ट्रोनिक संयंत्र द्वारा शुद्ध किया ही डाला जाता है। सोचता हूं कि इस जालिम मटके के पानी की महक में भी क्या गज़ब की बात है कि बंदे को मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू भी साथ में हर बार उस की माटी की याद दिलाती है जिससे उस के शरीर की प्यास ही नहीं रूह की प्यास भी मिटती दिखती है। अब मुझे लगता है कि फिलासफी झाड़ने पर उतरने लगा हूं..............इसलिये पोस्ट को तुरंत पब्लिश करने में ही समझदारी है।

7 comments:

sunita (shanoo) said...

होली आपको बहुत-बहुत मुबारक हो...

दिनेशराय द्विवेदी said...

डॉक्टर साहब। आप की आदतें और सोच इस पोस्ट में बिलकुल मेरी जैसी हैं। आप की इस पोस्ट से पूरी सहमति है।
होली पर हार्दिक शुभ कामनाएं!

परमजीत बाली said...

आप को होली की बहुत-बहुत बधाई।

Gyandutt Pandey said...

हमारे एक सीनियर अफसर थे। रेलवे बोर्ड के सदस्य। उनके लिये बोतल बन्द पानी ले जाना मना था। वे फिल्टर या अक्वागार्ड के पानी का प्रयोग करते थे। किसी भी स्टेशन पर वाटर फिल्टरेशन प्लाण्ट का पूरी गम्भीरता से निरीक्षण करते थे। क्लोरीनेशन और उसकी आवृति पर पूरा जोर देते थे।
मेरे विचार से उनके जैसी सोच की जरूरत है वाटर मैनेजमेण्ट मेँ।

PD said...

होली की सुभकामनाऐं..

Sanjeet Tripathi said...

होली मुबारक डॉ साहेब!!

Vikas said...

अच्छा लेख है.पानी का भी बाज़ारीकरण हो गया है.कभी सोचा नही था की पानी खरीदना होगा और खरीदना भी हुआ तो चार बोतलों मे से चुनना होगा की कौन सा ज़्यादा अच्छा पानी है.

इस फिल्मी जोड़ी के फन को सलाम !

अभी अभी मैं यह मुमताज और राजेश खन्ना पर फिल्माया गया यह गीत टीवी के एक चैनल पर टीवी के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया देख रहा था। कसम से, 0.1% भी आनंद नहीं आया। आप दोनों के ऊपर यह गीत जिस बिंदास अंदाज़ में फिल्माया गया है .....उस की जितनी भी तारीफ की जाये कम है। इसीलिये शायद मैं आप के इस गीत का जबरदस्त फैन हूं। बस, होली के अवसर पर आपसे इतना ही कह कर आप दोनों को बहुत बहुत मुबारकबाद देना चाहता हूं। तुसीं दोवें ग्रेट हो जी, तुहाड़ी जोड़ी ने वी जो फिल्मी दुनिया दी सेवा कीती ऐ, ओह आऊन वालीयां कईं पीडि़यां याद रखन गीयां।

शुक्रवार, 21 मार्च 2008

आखिर ये हैं क्या---होली के रंग, रंगीन मिट्टी, सफेदी या चाक मिट्टी....

बचपन में जहां तक होली की यादें हैं उन में बस रेहड़ीयां ही याद हैं जिन के ऊपर छोटी-छोटी थैलियों में तरह तरह के रंग बिका करते थे। लेकिन आज जब बाज़ार में तो कुछ अजीब ही नज़ारा देखने को मिला......तरह तरह के रंग तो बिक रहे थे...लेकिन जिस तरह से बिक रहे थे , वो तरीका देख कर बहुत अचंभा हुया । आप भी इन तस्वीरों में देख सकते हैं कि इतनी इतनी बड़ी बोरियों में ये तथाकथित रंग बिक रहे हैं कि यकीन ही नहीं हो पा रहा कि ये रंग ही हैं। इन को देख कर हंसी ज्यादा आ रही है क्योंकि ये तो रंगीन मिट्टी , चाक, सफेदी के इलावा तो मुझे कुछ भी नहीं लग रहे। लेकिन अगर आप को इस तरह से बिक रहे रंगों के बारे में कुछ विस्तृत जानकारी हो तो कृपया बतलाईएगा।

इन बिक रहे रंगों की भी अलग अलग श्रेणीयां हैं....एक है बीस रूपये किलो और दूसरी क्वालिटी थी चालीस रुपये किलो !

अब मेरी हिमाकत देखिये....मैं आप सब के लिये इन की फोटो खींचने में इतना तल्लीन था कि मुझे यह भी नहीं पता कि बेटे ने गुब्बारों और पिचकारी के इलावा कुछ रंग भी खरीदे हैं या नहीं। अगर रंग भी खरीदे हैं तो कल पूरा ध्यान रखना पड़ेगा। वैसे मैंने दुकानदार से पूछ ही लिया कि वैसे इन रंगों में होता क्या है। उस का जवाब भी तो पहले ही से तैयार था......... यह हमें कुछ नहीं पता...बस जो पीछे से आ रहा है, हम बेच देते हैं।उस की बात सुन मेरे मन में क्या विचार आया, अब यह भी आप को बताना पड़ेगा क्या !

चलिये, छोड़िये....काहे के लिये होली मूड को खराब किया जाए !


अच्छा तो आप सब को होली की बहुत बहुत मुबारकबाद। और यह लीजिये हमारी तरफ से होली का तोहफा.....बस क्लिक मारिये और सुन लीजिये।

आखिर ये हैं क्या---होली के रंग, रंगीन मिट्टी, सफेदी या चाक मिट्टी....


बचपन में जहां तक होली की यादें हैं उन में बस रेहड़ीयां ही याद हैं जिन के ऊपर छोटी-छोटी थैलियों में तरह तरह के रंग बिका करते थे। लेकिन आज जब बाज़ार में तो कुछ अजीब ही नज़ारा देखने को मिला......तरह तरह के रंग तो बिक रहे थे...लेकिन जिस तरह से बिक रहे थे , वो तरीका देख कर बहुत अचंभा हुया । आप भी इन तस्वीरों में देख सकते हैं कि इतनी इतनी बड़ी बोरियों में ये तथाकथित रंग बिक रहे हैं कि यकीन ही नहीं हो पा रहा कि ये रंग ही हैं। इन को देख कर हंसी ज्यादा आ रही है क्योंकि ये तो रंगीन मिट्टी , चाक, सफेदी के इलावा तो मुझे कुछ भी नहीं लग रहे। लेकिन अगर आप को इस तरह से बिक रहे रंगों के बारे में कुछ विस्तृत जानकारी हो तो कृपया बतलाईएगा।

इन बिक रहे रंगों की भी अलग अलग श्रेणीयां हैं....एक है बीस रूपये किलो और दूसरी क्वालिटी थी चालीस रुपये किलो !

अब मेरी हिमाकत देखिये....मैं आप सब के लिये इन की फोटो खींचने में इतना तल्लीन था कि मुझे यह भी नहीं पता कि बेटे ने गुब्बारों और पिचकारी के इलावा कुछ रंग भी खरीदे हैं या नहीं। अगर रंग भी खरीदे हैं तो कल पूरा ध्यान रखना पड़ेगा। वैसे मैंने दुकानदार से पूछ ही लिया कि वैसे इन रंगों में होता क्या है। उस का जवाब भी तो पहले ही से तैयार था......... यह हमें कुछ नहीं पता...बस जो पीछे से आ रहा है, हम बेच देते हैं।उस की बात सुन मेरे मन में क्या विचार आया, अब यह भी आप को बताना पड़ेगा क्या !

चलिये, छोड़िये....काहे के लिये होली मूड को खराब किया जाए !


अच्छा तो आप सब को होली की बहुत बहुत मुबारकबाद। और यह लीजिये हमारी तरफ से होली का तोहफा.....बस क्लिक मारिये और सुन लीजिये।

6 comments:

Kagahn said...

See here or here

PD said...

Don't click there.. 99% chance of Virus.. :)
holi me khushi manaaiye... virus ka gam na paalen.. :D

PD said...

ek baat to bhul hi gaya..
Holi mubarak ho Dr. sahab.. :)

मीत said...

होली आप को भी बहुत बहुत मुबारक़ !

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

आपको होली की हार्दिक शुभकामनाए।

Dr.Parveen Chopra said...

कृपया नोट करें कि जैसे डियर PD ने हमें सचेत किया है...इस पोस्ट में कोई वॉयरस नहीं है , केवल एक Kagahn नामक id से जो कमैंट आया है उस पर क्लिक न करने को कहा गया है। वैसे मैं सोचता हूं कि अब जैसे जैसे हिंदी की प्रयोग इंटरनैट पर बढ़ेगा,ये सब चीज़ें भी , ये सब शरारतें, सैडिस्टिक हरकतें भी बढ़ेंगी....इसलिये इन की क्या परवाह करनी । वैसे आज तो पीडी की एडवाइस ने बचा लिया।
@मीत जी, आप को भी बहुत बहुत होली मुबारक, आशा है अब आप की अक्कू आप के साथ होली का हुड़दंग मचाने के लिये बिल्कुल फिट हो गई होंगी। बॉय गाड, उस दिन आप की पोस्ट बहुत टचिंग थी, शायद हम सब ने ही अक्कू के शीघ्र स्वास्थय लाभ की प्रार्थना कर डाली होगी।
@ पंकज अवधिया जी, आप के लिये एक काम है..कृपया इसी बलोग पर पिछली पोस्ट...रंगों का त्योहार न लाये.....ज़रूर देखें। आप को भी होली की बहुत बहुत शुभकामनायें....आप सब बलोगर बंधुओं की पोस्टें पढ़ता रहता हूं .....लेकिन बस बात ही नहीं हो पाती।
@PD, I am very thankful to you for your timely help. May God bless you...today I went to your blog reg..telephonic conversation but the comment box never opened up. It was a nice post.....आज होली की पूर्व-संध्या पर आप ने अपने बचपन के कॉमिक्स को याद कर लिया...अच्छा है। खुश रहो।
@अरे भईया Kagahn तेरा भी बहुत बहुत शुक्रिया...तूने की तो बहुत शरारत...लेकिन तेरी इस शरारत ने भी हम लोगों को बहुत सिखा दिया ..वह यह कि किसी भी अनजान बंदे की टिप्पणी पर किसी लिंक को क्लिक करने की कोशिश मत करो।
एक तो यह जब से बलोगिंग की है, बच्चे पास ही बैठे रहते हैं.....और इस समय डायलाग मार रहे हैं कि बापू, कमैंट को मार रहा है, इतना ही लिखना है तो एक पोस्ट ही लिख डाल।
सो, अब बंद करता हूं।
शुभकामनायें।

रंगों का त्योहार.......न लाये रोगों की बौछार !

कहते हैं कि भगवान कृष्ण टेसू के फूलों से होली खेला करते थे जो कि होली का एक पारंपरिक रंग है। ये फूल तो वैसे औषधीय गुणों से भी लैस होते हैं। इन्हें एक रात के लिये पानी में भिगो दिया जाता है, खुशबूदार संतरी पीले रंग के लिये इन्हें उबाला भी जा सकता है। प्रकृति में तो सभी रंगों का भंडार है और इन्हीं से प्राकृतिक रंग बनाये जाते हैं। कुछ रंग तो हम आसानी से घर पर ही बना सकते हैं।


जैसे जैसे समय बदलता गया.....अन्य चीज़ों के साथ-साथ होली का स्वरूप भी अच्छा खासा बदला हुया दिख रहा है। होली के दिन हम चमकीले रंग वाले पेंट से लोगों के चेहरों को पुते हुये देखते हैं। और कुछ नहीं तो पानी से भरी बाल्टीयां, पानी से भरे गुब्बारे राहगीरों पर फैंक कर ही उन्हें परेशान करने का एक सिलसिला कईँ सालों से शुरू है।


होली रंगों और खुशियों का त्योहार है...लेकिन बाज़ार में बिकने वाले रंग कोरे कैमिकल्स हैं....इन में ऐसे अनेक पदार्थ मौजूद रहते हैं जो हम सब की सेहत तो खराब करते ही हैं, इस के साथ ही साथ ये कैमिकल्स पानी में रहने वाले जीवों के लिये भी विषैले होते हैं। इन्हीं कैमिकल्स की वजह से चमड़ी एवं आंखों के रोगों के साथ-साथ दमा एवं एलर्जी भी अकसर हो जाती है। एक अनुमान के अनुसार यदि दिल्ली की आधी जनसंख्या भी करीब 100ग्राम कैमिकल्स युक्त रंग प्रति व्यक्ति इस्तेमाल करे तो इससे लगभग 70टन कैमिकल्स यमुना में मिलने की संभावना रहती है।


विभिन्न तरह के पेंटस जिन में कारखानों में इस्तेमाल होने वाले रंग, इंजन आयल, कापर सल्फेट, क्रोमियम आयोडाइड, एल्यूमीनियम ब्रोमाइड, लैड ऑक्साइड एवं कूटा हुया कांच .........ये सब कैमिकल्स को निःसंदेह चमकीला तो बना देते हैं, लेकिन हमारे शरीर को इनसे होने वाले नुकसान के रूप में बहुत बड़ा मोल चुकाना पड़ता है। इन के दुष्प्रभावों से हमारा शरीर, मन और मस्तिष्क कईं बार स्थायी तौर पर प्रभावित हो सकता है। बाज़ार में उपलब्ध कुछ रासायनिक रंगों की थोड़ी चर्चा करते हैं.....

काला रंग (लैड ऑक्साइड

)...यह रंग गुर्दे व मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है।

हरा रंग( कॉपर सल्फेट)...इसे आम भाषा में नीला थोथा कहते हैं। इस को लगाने से आँखों की एलर्जी व अस्थायी अंधापन हो सकता है, वैसे तो इस कैमिकल से होने वाले भयंकर घातक प्रभावों के बारे में तो आप सब भली-भांति परिचित ही हैं।

बैंगनी रंग( क्रोमियम ऑयोडाइड)...इस के इस्तेमाल से दमा ओर एलर्जी होती है।

सिल्वर रंग( एल्यूमीनियम ब्रोमाइड)...यह रंग कैंसर पैदा कर सकता है।

लाल रंग ( मरक्यूरिक सल्फाइट)...इस के इस्तेमाल से चमड़ी का कैंसर, दिमागी कमज़ोरी, लकवा हो सकता है और दृष्टि पर असर पड़ सकता है।


तो फिर क्या सोचा है आपने ?.....सुरक्षित होली खेलने के लिये हमें प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करना चाहिये जो कि कईं जगहों पर उपलब्ध होते हैं लेकिन विभिन्न प्रकार के फूलों से इन्हें घर में ही प्राप्त कर लेते हैं। कईं लोग लाल चंदन पावडर से होली खेलते हैं। एक बात है ना....होली कैसे भी खेलें...लेकिन प्रेम से....होली को गंदे तरीके से खेल कर ना तो हमें अपना और ना ही किसी और का मज़ा किरकिरा करना है। जहां तक हो सके...अपने मित्रों, रिश्तेदारों एवं परिचितों के साथ ही होली खेलें....ऐसे ही हर राहगीर पर पानी फैंकना तो होली ना हुई!


वैसे मुझे इस समय ध्यान आ रहा है कि होली के त्योहार पर फिल्माए गये फिल्मों के सुप्रसिद्ध गीत जो सुबह से ही रेडियो, केबल और लाउड-स्पीकरों पर उस दिन बजते रहते हैं, वे लोगों के उत्साह में चार चांद लगाने का काम करते हैं। लेकिन मेरी पसंद में सब से ऊपर शोले फिल्म का यह वाली गीत है........जिसे मैं होली के बिना भी बार-बार सुन लेता हूं और इस में ऊधम मचा रहे हर बंदे के फन की दाद दिये बिना नहीं रह सकता। आप को इन सब हुड़दंगियों के साथ यह उत्सव मनाने से कौन रोक रहा है ............तो मारिये एक क्लिक और हो जाइए शुरू !!


PS…..पंकज अवधिया जी , आप तो वनस्पति विज्ञान के बहुत बड़े शोधकर्त्ता हो, मेरी एक समस्या का समाधान कीजिये। मैं इन मच्छरों से बहुत परेशान हूं......सुबह सुबह ढंग से पोस्ट भी नहीं लिखने देते। इसलिये हम सब लोगों को आप यह बतलायें कि क्या कोई ऐसा घास,कोई ऐसा पौधा नहीं बना ...या कोई ऐसी चीज़ जो इन पौधों से प्राप्त होती हो जिस की धूनि जला कर इन मच्छरों को दूर भगाया जा सके। मुझे आशा है कि आप के पास इस का भी ज़रूर कोई फार्मूला होगा......तो शेयर कीजियेगा। दरअसल बात यह भी है ना कि इन कैमिकल युक्त मच्छर-भगाऊ या मच्छर-मारू टिकियों एवं कॉयलों के ज़्यादा इस्तेमाल से भी डर ही लगता है....रात को तो चलिये मज़बूरी होती है लेकिन सुबह उठ कर इन्हें इस्तेमाल करने की इच्छा नहीं होती। अवधिया जी, आप ही इस परेशानी का हल निकाल सकते हैं। एडवांस में धन्यवाद और होली की मुबारकबाद....।

रूकावट के लिये खेद है............अब आप होली के रंग में रंगे इन हुड़दंगियों के जश्न में शामिल हो सकते हैं।


रंगों का त्योहार.......न लाये रोगों की बौछार !


कहते हैं कि भगवान कृष्ण टेसू के फूलों से होली खेला करते थे जो कि होली का एक पारंपरिक रंग है। ये फूल तो वैसे औषधीय गुणों से भी लैस होते हैं। इन्हें एक रात के लिये पानी में भिगो दिया जाता है, खुशबूदार संतरी पीले रंग के लिये इन्हें उबाला भी जा सकता है। प्रकृति में तो सभी रंगों का भंडार है और इन्हीं से प्राकृतिक रंग बनाये जाते हैं। कुछ रंग तो हम आसानी से घर पर ही बना सकते हैं।


जैसे जैसे समय बदलता गया.....अन्य चीज़ों के साथ-साथ होली का स्वरूप भी अच्छा खासा बदला हुया दिख रहा है। होली के दिन हम चमकीले रंग वाले पेंट से लोगों के चेहरों को पुते हुये देखते हैं। और कुछ नहीं तो पानी से भरी बाल्टीयां, पानी से भरे गुब्बारे राहगीरों पर फैंक कर ही उन्हें परेशान करने का एक सिलसिला कईँ सालों से शुरू है।


होली रंगों और खुशियों का त्योहार है...लेकिन बाज़ार में बिकने वाले रंग कोरे कैमिकल्स हैं....इन में ऐसे अनेक पदार्थ मौजूद रहते हैं जो हम सब की सेहत तो खराब करते ही हैं, इस के साथ ही साथ ये कैमिकल्स पानी में रहने वाले जीवों के लिये भी विषैले होते हैं। इन्हीं कैमिकल्स की वजह से चमड़ी एवं आंखों के रोगों के साथ-साथ दमा एवं एलर्जी भी अकसर हो जाती है। एक अनुमान के अनुसार यदि दिल्ली की आधी जनसंख्या भी करीब 100ग्राम कैमिकल्स युक्त रंग प्रति व्यक्ति इस्तेमाल करे तो इससे लगभग 70टन कैमिकल्स यमुना में मिलने की संभावना रहती है।


विभिन्न तरह के पेंटस जिन में कारखानों में इस्तेमाल होने वाले रंग, इंजन आयल, कापर सल्फेट, क्रोमियम आयोडाइड, एल्यूमीनियम ब्रोमाइड, लैड ऑक्साइड एवं कूटा हुया कांच .........ये सब कैमिकल्स को निःसंदेह चमकीला तो बना देते हैं, लेकिन हमारे शरीर को इनसे होने वाले नुकसान के रूप में बहुत बड़ा मोल चुकाना पड़ता है। इन के दुष्प्रभावों से हमारा शरीर, मन और मस्तिष्क कईं बार स्थायी तौर पर प्रभावित हो सकता है। बाज़ार में उपलब्ध कुछ रासायनिक रंगों की थोड़ी चर्चा करते हैं.....

काला रंग (लैड ऑक्साइड

)...यह रंग गुर्दे व मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है।

हरा रंग( कॉपर सल्फेट)...इसे आम भाषा में नीला थोथा कहते हैं। इस को लगाने से आँखों की एलर्जी व अस्थायी अंधापन हो सकता है, वैसे तो इस कैमिकल से होने वाले भयंकर घातक प्रभावों के बारे में तो आप सब भली-भांति परिचित ही हैं।

बैंगनी रंग( क्रोमियम ऑयोडाइड)...इस के इस्तेमाल से दमा ओर एलर्जी होती है।

सिल्वर रंग( एल्यूमीनियम ब्रोमाइड)...यह रंग कैंसर पैदा कर सकता है।

लाल रंग ( मरक्यूरिक सल्फाइट)...इस के इस्तेमाल से चमड़ी का कैंसर, दिमागी कमज़ोरी, लकवा हो सकता है और दृष्टि पर असर पड़ सकता है।


तो फिर क्या सोचा है आपने ?.....सुरक्षित होली खेलने के लिये हमें प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करना चाहिये जो कि कईं जगहों पर उपलब्ध होते हैं लेकिन विभिन्न प्रकार के फूलों से इन्हें घर में ही प्राप्त कर लेते हैं। कईं लोग लाल चंदन पावडर से होली खेलते हैं। एक बात है ना....होली कैसे भी खेलें...लेकिन प्रेम से....होली को गंदे तरीके से खेल कर ना तो हमें अपना और ना ही किसी और का मज़ा किरकिरा करना है। जहां तक हो सके...अपने मित्रों, रिश्तेदारों एवं परिचितों के साथ ही होली खेलें....ऐसे ही हर राहगीर पर पानी फैंकना तो होली ना हुई!


वैसे मुझे इस समय ध्यान आ रहा है कि होली के त्योहार पर फिल्माए गये फिल्मों के सुप्रसिद्ध गीत जो सुबह से ही रेडियो, केबल और लाउड-स्पीकरों पर उस दिन बजते रहते हैं, वे लोगों के उत्साह में चार चांद लगाने का काम करते हैं। लेकिन मेरी पसंद में सब से ऊपर शोले फिल्म का यह वाली गीत है........जिसे मैं होली के बिना भी बार-बार सुन लेता हूं और इस में ऊधम मचा रहे हर बंदे के फन की दाद दिये बिना नहीं रह सकता। आप को इन सब हुड़दंगियों के साथ यह उत्सव मनाने से कौन रोक रहा है ............तो मारिये एक क्लिक और हो जाइए शुरू !!


PS…..पंकज अवधिया जी , आप तो वनस्पति विज्ञान के बहुत बड़े शोधकर्त्ता हो, मेरी एक समस्या का समाधान कीजिये। मैं इन मच्छरों से बहुत परेशान हूं......सुबह सुबह ढंग से पोस्ट भी नहीं लिखने देते। इसलिये हम सब लोगों को आप यह बतलायें कि क्या कोई ऐसा घास,कोई ऐसा पौधा नहीं बना ...या कोई ऐसी चीज़ जो इन पौधों से प्राप्त होती हो जिस की धूनि जला कर इन मच्छरों को दूर भगाया जा सके। मुझे आशा है कि आप के पास इस का भी ज़रूर कोई फार्मूला होगा......तो शेयर कीजियेगा। दरअसल बात यह भी है ना कि इन कैमिकल युक्त मच्छर-भगाऊ या मच्छर-मारू टिकियों एवं कॉयलों के ज़्यादा इस्तेमाल से भी डर ही लगता है....रात को तो चलिये मज़बूरी होती है लेकिन सुबह उठ कर इन्हें इस्तेमाल करने की इच्छा नहीं होती। अवधिया जी, आप ही इस परेशानी का हल निकाल सकते हैं। एडवांस में धन्यवाद और होली की मुबारकबाद....।

रूकावट के लिये खेद है............अब आप होली के रंग में रंगे इन हुड़दंगियों के जश्न में शामिल हो सकते हैं।


5 comments:

रवीन्द्र प्रभात said...

आपको होली की कोटिश: बधाईयाँ !

राज भाटिय़ा said...

आपको भी होली की शुभकामनाएं !!

परमजीत बाली said...

एक अच्छी पोस्ट के सा्थ ,होली के अच्छे रंग बिखेरे हैं। होली मुबारक।

Gyandutt Pandey said...

सही में रसायनिक होली नहीं होनी चाहिये। मैं तो एलर्जी के कारण न सूखे न गीले रंगों का प्रयोग करता हूं।
हां होली का मन होना चाहिये - जरूर। होली मुबारक जी।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

क्षमा करे आने मे देरी हो गयी। आप कहाँ पर है यह तो मुझे पता नही पर अभी पूरे देश मे ब्लूमिया लेसेरा नामक खरपतवार उग रहा है। इसे कुकरौन्दा भी कहा जाता है। इसे सुखाकर जलाने से अच्छी सुगन्ध भी आयेगी और मच्छर भी भागेंगे। आयुर्वेद मे दमा के लिये इस धुँए को लाभकारी माना गया है खासकर अटैक के समय। यहाँ होली मे इसी पौधे को जलाने की सलाह मै देता हूँ ताकि पूरे शहर को मच्छरो से मुक्ति मिल सके। ब्लूमिया के चित्रो और इस पर मेरे आलेखो की कडी नीचे दी गयी है। फिर भी पहचान मे दिक्कत हो तो निसंकोच लिखे।


http://ecoport.org/ep?Plant=3744&entityType=PL****&entityDisplayCategory=eArticles

http://ecoport.org/ep?SearchType=pdb&Subject=blumea&Author=oudhia&SubjectWild=CO&Thumbnails=Only&AuthorWild=CO

सत्तर से अधिक शोध आलेख और 400 से अधिक चित्र है इन कडियो मे।

गुरुवार, 20 मार्च 2008

मेरी लेखन यात्रा.....


कल मैंने अपनी पोस्ट में उल्लेख किया था कि किस तरह से लेखक बनने की जब मेरे ऊपर धुन सवार हुई और किस तरह से मैंने इस के लिये दो दूरस्थ पाठ्यक्रमों में पूरे पैसे भेजे, किताबें भी आ गईं लेकिन कुछ कारणों के कारण( जिन का जिक्र कल मैंने किया था..) उन्हें कभी देखने की भी इच्छा नहीं हुई। मेरी श्रीमति जी अकसर मेरे से कभी कभार पूछ भी लेतीं कि हां, उस कोर्स का क्या बना जिस में तीस हज़ार रूपये भेजे थे......लेकिन मैं भी कहां कम था....बिलकुल एक स्कूली बच्चे की तरह हर बार टाल जाता....हां, हां, करना है, क्या करूं सारी दिक्कत टाइम की हो रही है। खैर, इतने सारी रकम एक टुच्चे से कोर्स के लिये भेज देने के लिये मैं अपने हाथ ज़ोर से अपने माथे पर मारने में मशगूल ही था कि एक हल्की सी आशा की किरण दिखी....यह वर्ष 2002 की बात है।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के बारे में तो आप में से काफी लोग जानते ही होंगे...यह संस्था तरह तरह के कार्यक्रम हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिये चलाती रहती है। उन में से एक यह भी है कि यह नवलेखकों के लिये भी नवलेखक शिविर लगा कर उन्हें उत्साहित करती है। ऐसा ही एक विज्ञापन एक बार मेरी नज़र में पड़ गया....इस में उन्होंने अहिंदी भाषी नवलेखकों से उन की एक रचना मांगी थी.......मैंने भी अपने आप को कहा कि यार, तू इतने वर्षों से कुछ न कुछ लिख रहा है, अनगिनत सरकारी निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में बार-बार पुरस्कृत होता रहता है ...इसलिये इस नवलेखक शिविर वाली ओखली में भी सिर घुसा ही दे। अपने आप को समझाने की कोशिश की कि देख, उन्होंने नव-लेखक ही मांगा है ....तू भी लिख कुछ भी ऐसे ही .....उस को भेज दे इस निदेशालय को और करवा ले अपने नाम को नव-लेखकों की सूची में दाखिल।
मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं कईं दिन सोचता रहा कि यार, अब मैं क्या लिखूं.....ठीक है, मैं चिकित्सा विषयों के ऊपर लिखता रहता हूं लेकिन अब इन को क्या लिख कर भेजूं। तभी मुझे एक ऐसी शख्सियत का ध्यान आया जिस से मैं बचपन से ही बहुत प्रभावित रहा हूं............यानि अपना डाकिया। बचपन से ही डाकिये के बारे में मेरे मन में बहुत विचार आते थे.....एक दिन मैंने इन सब विचारों को एक लेख में पिरो कर तैयार कर दिया एक लेख ......डाकिया डाक लाया। मुझे अपने आप को यह लेख बहुत पसंद आया ( किस लिखने वाले को यह खुशफ़हमी नहीं होती..!)…और मैंने इसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय को भेज दिया।
मुझे याद है कि इस लेख को लिखने के लिये मुझे अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ी थी...पहले शायद एक-दो बार रफ लिखा। उस की एक प्रति मैंने अब भी संभाल कर रखी हुई है...........जब भी उसे पढ़ता हूं तो अच्छा लगता है....चलो, ठीक है कल होली के उपलक्ष्य में अपने इस पहले लेख....डाकिया डाक लाया......को अपनी पोस्ट के माध्यम से प्रस्तुत करूंगा। मुझे याद है कि यह लिखने के बाद मैं अपने आप में बहुत हल्कापन महसूस कर रहा था।
और हां, मैं यहां पर यह भी बताना चाहूंगा कि वर्ष 2001 में मैंने इंगलिश टाइपिंग भी सीखी...क्योंकि अपनी चिट्ठीयां किसी से टाइप करवा के मेरी कभी तसल्ली नहीं होती थी। या तो टाइप करने वाले को बार-बार कोमा, साइऩ ऑफ एक्सक्लैमेशन....इत्यादि के लिये खुद याद दिलायो ...नहीं तो उस के द्वारा टंकित कागज़ को देख देख कर कुढ़ते रहो। और 2002 के शुरू शुरू में कंप्यूटर पर हिंदी किस तरह से टाइप करनी है...यह भी सीख लिया, लेकिन इंस्क्रिप्ट शैली में और तब से एक सॉफ्टवेयर...आईएसएम2000....की मदद से हिंदी में टाइप करना शुरू कर दिया।
अच्छा तो मैंने उस डाकिया डाक लाया वाले लेख के बारे में आप को बता दिया है कि मैंने उसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय को भेज दिया। और लगभग एक-डेढ़ महीने के पश्चात् मुझे चिट्ठी आई कि मेरी रचना का चयन कर लिया गया है और मुझे उन्होंने नव-लेखक शिविर में सम्मिलित होने का आमंत्रण भी दिया । यह शिविर जोरहाट( आसाम) में होना तय हुया था और यह आठ-दस दिन चलने वाला था। मुझे इस चयन की इतनी खुशी थी कि मैं वहां पहुंच गया।
उस नवलेखक शिविर में इस निदेशालय द्वारा हिंदी लेखन की विभिन्न विधाओं के मंजे हुये खिलाड़ीयों को नवलेखकों के साथ अपने अनुभव साझे करने के लिये बुलाया गया था....सो, वह अनुभव बहुत सार्थक सिद्ध हुया । यह कार्यशाला सुबह से शाम नौ दिन तक चली.........मैंने चिकित्सा क्षेत्र के बाहर आकर पहली बार यह अनुभव किया कि यह लेखन-वेखन वाली बात भी कितनी रोमांचाक है। वे हमें वहां से एक टापू ...मजौली...पर स्टडी-टूर पर भी एक दिन के लिये ले गये थे।
खैर , वहां पर जब भी कुछ लिखने को कहा जाता है, मैं भी उस में पूरी तरह से सम्मिलित होता.....लेकिन जब कभी कविता लिखने की बारी आती, मेरी सारी पोल खुल जाती। मुझ से कभी कविता की एक लाइन भी नहीं लिखी गई। मुझे यह दुनिया का सब से मुश्किल काम लगता है...और मैं उन सब कवियों को बहुत हैरानी से सुनता रहता, देखता रहता….और देख कर हैरान होता रहता कि यार, किसी का मन इतनी लंबी उड़ान भी भर सकता है ! खैर, जब वहां पर मैंने एक कहानी लिखी तो इस की बहुत प्रशंसा हुई ...और मुझे कहा गया कि आप सरिता के स्तर की कहानी तो लिख ही सकते हो।
और हां, उन दस दिनों में यह भी तो सीखा कि लेखन है क्या.....किस तरह से इस झिझक को दूर किया जाये। सब से अहम् बात जो मैंने वहां से सीखी कि लेखन का मतलब है बस लिखते जायो...........कुछ भी लिखो.....किसी भी विधा में ...जिस में भी आप अपने आप को सहज सा अनुभव करते हो..........लिखो..........और जब लिख रहो हो तो बिल्कुल एक अबोध बालक की तरह बेपरवाह हो कर लिखो.......जैसे वह पतंग के पेचे लगाते हुये सारी दुनिया भूला होता है, बस उस तन्मयता से लिखो...............और लिखते समय किसी बात की फिक्र न करो.............बस, अपनी कलम को कागज़ पर खुला छोड़ दो..............बाकी सब कुछ अपने आप हो जायेगा। ये विचार-वार तो अपने आप आयेंगे..............लेकिन आप तो बस पहला कदम उठायो और कलम लेकर बैठ जायो ..........एकांत में। और हां, उस शिविर में यह भी जाना कि किस तरह से हमारे आस-पास सैंकडों लेख बिखरे हुये हमारी कलम की इंतजार में हैं। बस, यही समझा कि अपने विचारों को बेलगाम छोड़ कर कागज पर लिख देना ही लेखन है। वहां पर एक विद्वान आये थे...तिवारी जी....उन्होंने बताया कि देखो, यह साहित्य रचना कोई दुर्गम काम तो है नहीं.....आप लोग अपने आस पास जो भी देखते हो, बस शुरूआत इसी बात से करो कि उन सब बातों को कागज़ पर उतारते जायो। उन्होंने यह भी कहा कि आप लोग कम से कम एक पन्ना रोज़ाना लिखा करें.........साल में लिखे उन 365 पन्नों में से चालीस-पचास पन्ने तो ऐसे होंगे ही जो प्रकाशित किये जा सकते हों। उन्होंने बतलाया कि उन के नाना जी सन् 1901( जी हां, सौ साल पहले...)....में एक कापी पर रोज़ाना सारे दिन का बस हिसाब-किताब ही लिख लेते थे कि घी इतने रूपये में इतने सेर आया, गुड़ इस रेट में मिला.........उन्होंने बताया कि अब वह वाली कॉपी भी किसी साहित्यिक कृत्ति से क्या कम है !!
उस लेखक-शिविर में हमें यह भी बताया गया कि हमें हिंदी भाषा में अपना ज्ञान बढ़ाने के लिये कौन कौन से शब्द-कोष पढ़ने चाहिये.........कॉमिल बुरके का महान नाम भी इसी शिविर में ही पहली बार सुना, वहीं से अरविंद कुमार एवं कुसुम कुमार द्वारा रचित हिंदी समांतर कोष के बारे में सुना और वापिस आ कर तीन-चार शब्द-कोष और समांतर कोष खरीदे।
लेखन के तालाब में छलांग लगाने की इच्छा और भी दृढ़ हो गई। और लेखक शिविर से वापिस लौटते ही खूब लिखना शुरू किया....समाचार-पत्रों के लिये खूब लिखा....सामाजिक विषयों पर लिखा, व्यंग्य-बाण छोड़े और हां, चिकित्सा से संबंधित मुद्दों पर तो लिखा ही। बस, ऐसे ही हौंसला बढ़ता चला गया।
शायद एक-दो साल बाद एक अन्य नवलेखक शिविर में बुला लिया गया...यह शिविर डीएवी कॉलेज अमृतसर में होना तय हुया था......चूंकि यह मेरा पुराना कॉलेज भी था, इसलिये वहां भी मैंने इस शिविर में पूरा भाग लिया। यह शिविर भी केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा ही आयोजित किया गया था। वहां जा कर भी बहुत अच्छा लगा....बहुत कुछ सीखा...चोटी के हिंदी लेखक एवं अनुवादक आये हुये थे....वहां पर मैंने एक लेख लिया....एंटीबॉयोटिक दवाईया...कहीं आप की सेहत न बिगाड़ दें !!........इस लेख की बहुत सराहना हुई ....जब इतने इतने महान लेखकों ने इसे सराहा तो मुझे लगा कि मेरे लेखन में कुछ तो बात होगी .......अब इतने सारे लोग तो गल्त नहीं ना कह रहे होंगे। खास कर मेरी सहज, साधारण, आसानी से समझ में आ जाने वाली शैली की बहुत प्रशंसा हुई। सो, एक बार फिर हौंसला बुलंद हो गया। ( और हां, वह वाला लेख भी एक-दो दिन बाद पोस्ट में डालूंगा)....।
इन्हीं वर्षों में ही एनसीईआरटी के लिये उन के निमंत्रण पर हिंदी में एक किताब की मैन्यूस्क्रिप्ट लिख कर उन्हें सौंप दी......। बस, यह लेखन-यात्रा तो चल ही रही थी....लेकिन अब संपादकों को बार बार अपने लेख फैक्स करना और फिर फोन पर पूछना कि फैक्स ठीक ठाक पहुंच गया है ना .....यह सब पिछले कुछ अरसे से अखर रहा था....और वैसे भी कुछ संपादक कहने लगे थे कि आप फलां-फलां फांट में अपने लेख ई-मेल ही कर दिया करें.............लेकिन मुझे लगता था कि अब मैं कैसे यह लिख पायूंगा...क्योंकि मुझे तो केवल इंस्क्रिप्ट के द्वारा ही लिखना आता है।
लेकिन मेरा बेटा जो अकसर कंप्यूटर पर बैठा कुछ न कुछ पंगे लेता रहता है ....मेरी इसी हिंदी में ई-मेल न कर सकने की समस्या का तोड़ निकालने में लगा हुया था कि उसे इस हिंदी बलोगिंग के बारे में पता चला............उस ने पता नहीं कैसे रविरतलामी जी का हिंदी बलाग किसी सर्च इंजन से ढूंढ निकाला और मेरे को इस के बारे में बतलाया। दो-दिन बाद बताने लगा कि बापू, अब तुम हिंदी में भी ई-मेल भेज सकते हो ....और मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि कैफे-हिंदी नाम से कुछ नेट पर है.........ट्राई किया तो मेरी बांछे खिल गईं.......और अगले ही दिन ब्लागर पर अपनी बलाग बना कर पोस्टें डालनी शुरू कर दीं......यह सब चार-पांच महीने की ही बातें हैं..........लेकिन यह मुझे अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम प्रतीत हो रहा है।
बस, सफर अभी ज़ारी है...........मंज़िल बहुत दूर है........लेकिन बस इन्हीं पंक्तियों को अपने मन ही मन दोहराता रहता हूं और दूसरे लोगों को भी कुछ भी लिखने के लिये उकसाता रहता हूं............
इन परिंदों को भी मिलीगी मंज़िल एक दिन
ये हवा में खुले इन के पंख बोलते हैं।
अच्छा, तो साथियो, इस बेहद लंबी पोस्ट पढ़ने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.................भगवान आप की कलम भी सलामत रखे !!!