आज से ५०-६० साल पहले कुछ मासिक पत्रिकाएं थीं जैसे कि सत्यकथा, मनोहर कहानियां, सच्ची दुनिया….१९७० में हम लोग स्कूल में थे और किताबों-पत्रिकाओं की दुकानों पर ये भी डिस्पले की होती थीं…
इन को पढ़ना ज़्यादा अच्छा नहीं माना जाता था …लेकिन दसवीं या उस के बाद की कक्षाओं में पहुंचते पहुंचते इन पत्रिकाओं की एक-आध कहानी पढ़ ही लेते थे और सारी की सारी पत्रिका के पन्ने तो उलटा-पलटा लेते ही थे …
इस तरह की पत्रिकाओं को पढ़ने का हमारे यहां किसी को भी कोई शौक न था …तो फिर यह कैसे हमारे हाथों तक पहुंचती थी….
दरअसल मेरे बड़े मामा को इस तरह की जासूसी और जुर्म की पत्रिकाओं पढ़ने का बड़ा चस्का था….जब भी वह हमारे यहां आते - यही कोई साल में एक दो बार ..दो तीन दिन के लिए …तो मैं अकसर उन को लेटे-लेटे इसी तरह की किताबें पढ़ता ही देखता …
अभी लिखते लिखते ख्याल आ रहा है कि मेरी मां उन को कईं बार टोका भी करती थीं …क्या राम (उन का नाम), तुम यह सब क्या पढ़ते रहते हो, ऐसा क्या है इन पत्रिकाओं में …
खैर, मामा की आदत जैसी थी वैसी ही बरकरार रही …लेकिन हां, वे इंगलिश की कारवां और रीडर-डाइजेस्ट और इंडिया टूडे जैसी पत्रिकाएं भी खूब पढ़ते थे …
मुझे कभी यह सत्यकथा, मनोहर कहानियां….सच्ची दुनिया…ये सब पढ़ कर अच्छा नहीं लगा…प्रेम-प्रसंग में हत्या, जुर्म या लूट-पाट यही कुछ होता था …और यह भी कहा जाता था कि ये सब सच्ची घटनाओं पर आधारित हुआ करती थीं…ज़रूर होंगी, क्यों कि उन के अंदर जुर्म की विचलित करने वाली तस्वीरें भी छपी होती थीं…
लेकिन आज कल जिस तरह की खबरें रोज़ाना देखने-पढ़ने को मिल रही हैं, उस से यही लगता है कि इस दौर में तो वे पत्रिकाएं भी बहुत पीछे रह गई हैं…हां, अभी सत्यकथा तो मिलती है, लेकिन बहुत कम …अब जब रोज़ाना क्राइम का कंटैंट बाज़ार में धड़ल्ले से आ रहा है, ऐसे में कहां तक वे पत्रिकाएं भी अपने को इतना अपडेट कर पाएं….आज कल तो क्राइम-तक का रोज़ाना एक आधे घंटे का बुलेटिन आने लगा है …और एक नहीं, कईं यू-ट्यूब चैनल हैं ऐसे जो सुबह से शाम तक जुर्म के सभी ऐंगल दिखा दिखा कर सिर दुखा कर दम लेते हैं…।
सिया, तू काहे की सिया…
सिया काण्ड ने तो देश की नींद उड़ा दी है …कितने दिन हो गए सिया के शातिर दिमाग का ही ख्याल बना रहता है हर वक्त। एक २० साल की लड़की इतनी क्रिमिनल-माईंडेड भी हो सकती है। इस केस से जुड़ी एक एक बात हिला देने वाली है। पूरी एक ओटीटी की सीरीज़ जैसी….उस से भी डरावनी।
जाने वाला गया …अब मोमबती पकड़ के कैंडिल मार्च करें या कुछ और …वह नहीं आने वाला… तीन परिवारों की ज़िंदगी बिना किसी कसूर के बरबाद हो गई …ऊपर से मीडिया वाले उन को परेशान कर रहे हैं, सो अलग।
मैं तो वैसे भी ओटीटी पर सीरीज़ बहुत कम.. न के बराबर ही देखता हूं। सिर दुखने लगता है ..वही घिसी पिटी गालियां, एडल्ट कंटैंट और मार-धाड़, चीर-फाड़ …कौन देखे यह सब….वैसे भी जब रियल लाईफ में सिया-चेतन जैसे किरदार मौजूद हैं, आप को सब कुछ लाइव बताने के लिए …तो ओटीटी के किस्से-कहानियों में रखा ही क्या है…
लोकल ट्रेन में कत्ल ….
कौन सा ओटीटी प्लेटफार्म हमें ऐसा कुछ लाईव दिखा सकता है …जो बंबई की लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच में भरे लोगों ने देखा कि एक आदमी ने एक २२ साल के युवक को चाकू से मार डाला…तमाशबीन देखते रह गए …व्हीडियो बनाते रहे ….पकड़ा गया, लेकिन उस से क्या, जाने वाला गया …जो वॉयरल हुई व्हीडियो ने फौरन दुनिया के कोने कोने तक पहुंचा दिया, क्या यह काम सत्यकथाएं कर सकती हैं….
खरबूजा खाने से मौत …
एक परिवार के चार मैंबर कुछ दिन पहले तरबूज़ खा के मर गए…उस में चूहेमार दवा की मिलावट पाई गई …अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है कि वह कैसे उस तरबूज़ तक पहुंची …
सात साल के लड़के की ओक्सीटोसिन इंजेक्शन लगने से मौत …
किसी रंजिश के चलते एक आदमी ने पड़ोसी के सात साल के बच्चे में जानवरों को लगने वाला ओक्सीटोसिन इंजेक्शन घोंप दिया ….वह मर गया …यह कल की खबर थी …मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था …लेकिन फिर जब मैंने गूगल पर जा कर थोड़ी रिसर्च की तो कुछ कुछ समझ में आया कि उस की मौत क्यों हुई होगी….।
ये ओक्सीटोसिन के टीके पशुओं का दूध निकालने से पहले देते हैं …यह सब तो हम लोग पचास पचपन बरस पहले भी अपनी आंखों से देखते रहे हैं …किस तरह से गाय या भैंस को दूध वाले का बेटा कुक्कू झट से एक पहले से भरा हुआ टीका ठोंक देता था…जी हां, बिल्कुल सही लिखा है, ठोक देता था, क्योंकि टीका लगाते तो मेडीकल स्टाफ हैं, दूसरे तो ठोकते ही हैं…अंजाम कुछ भी हो….कोई परवाह नहीं।
मुहर्रम के जूलूस में जहर वाले कैप्सूल फैंकने की साजिश …
दो दिन पहले जुलूस में एक आदमी ने पब्लिक में दर्द-निवारक कैप्सूल बांटने चाहे ताकि लोगों का शारीरिक दर्द कम हो …और उन की इम्यूनिटी बढ जाए। ५० किलो ज़िंक-सल्फाईड मंगवाता है आनलाईन और ३० हज़ार खाली कैप्सूल …फिर उन को भरने काम करता रहा, एक सस्ती सी लॉज में किराए पर एक कमरा ले कर रह रहा था। पेपर में लिखा था कि उस का टॉरगेट था ३० हज़ार लोगों को निपटा देना…लेकिन खबर ही पागल पन जैसी लगी थी …चूहेमार दवाई ठीक है, ज़हर है, लेकिन चूहों की तरह ३० हज़ार लोग वहीं के वहीं थोड़े न ढेर हो जाएंगे…कुछ लक्षण होंगे ….कुछ खाएंगे, कुछ नहीं खाएंगे…अभी उसने थोड़े ही केप्सूल बांटे थे कि पुलिस के हत्थे चढ़ गया….
आज के पेपर में यही आया है कि उस का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है….खिसका हुआ है हर तरह से…ऐसा काम इसी तरह का ही इंसान कर सकता है ….।
देशी घी की मिलावट ….
अभी अभी हमारे एक सीनियर डाक्टर ने एक व्हीडियो शेयर की है जिस में बताया गया है कि देशी घी के नाम पर इतनी मिलावट, इतनी धोखेबाजी हो रही है, पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल हो रहा है ….टैलो नाम आप को याद होगा, यह कोई नईं बात नहीं है….जहां तक मुझे ख्याल है ये सब धंधे हम कम से कम ३०-४० साल से तो देखते ही आ रहे हैं…..पशुओं की चर्बी को देशी घी में मिलावट के लिए इस्तेमाल करना या पशुओं की चर्बी से तैयार किया घी और तेल होटलों, रेस्टरां में इस्तेमाल होना ….अब ये खबरें पुरानी हो गई हैं …सब जानते हैं …लेेकिन हम जान कर अनजान बनने का मज़ा ले रहे हैं ..यही सोच कर कि होता होगी मिलावट कहीं और, हमारे आस पास तो नहीं है ….चलिए, खुशफ़हमी का आनंद लीजिए….
लेकिन एक बात जो आज के संदर्भ में बहुत ज़रुरी है …वह लिख कर इस पोस्ट को बंद करता हूं …कुछ महीने पहले मैं अपने किसी मित्र के पास बैठा हुआ था …अचानक फोन आया …जैसे डिलीवरी वालों का आता है …पता चला कि राजस्थान से उन का शुद्ध देशी घी आ रहा है ….बताने लगे कि ऑन-लाईन एक व्हीडियो देखी थी कि ये लोग शुद्ध घी बेचते हैं ….और इसीलिए उन्होंने भी एक किलो आर्डर कर दिया ….दो हज़ार रुपए में एक किलो था….
वह बंदा एक किलो देसी घी की बोतल दे गया ….फिर वह दोस्त उस को हर तरफ़ से देखने लगा …पूछने लगा कि क्या यह आप को सही लग रहा है …
मैं हंसने लगा …
वह कहने लगा कि इस बार तो मंगवा लिया है ..आगे से ऑनलाईन पेमेंट करने की जल्दी नहीं करूंगा…
पंगा यह है कि आज कल यू-ट्यूब पर अनेकों व्हीडियोज़ की भरमार है …जो लोग देशी घी बनाते दिखते हैं …हर कोई कह रहा है उस का शुद्ध नहीं …शुद्धतम् है….लोग कंफ्यूज़ हैं….बडे़ बड़े ब्रांडों के देशी घी का हाल आए दिन मीडिया में हम देख रहे हैं….किसे कैद हुई, किसे फांसी। सब कुछ चल रहा है ….मैंने तो जहां भी इस तरह के देशी घी के किलो-दो किलो के जार देखे हैं, सब यही कहते हैं कि यह हमारे जानने वाले ने भेजा है, यह नज़दीकी रिश्तेदार ने भेजा है ….
मेरी एक ख्वाहिश है …कभी इन सब स्टार्ट-अप्स को एक टास्क दिया जाए …१५००-१६०० का जितने का यह एक किलो देशी घी बेचते हैं ….इन को इतने पैसे का भैंस का शुद्ध दूध दिया जाए…और अपने सामने कहा जाए कि करो इस से एक किलो देशी घी तैयार ….अपने आप दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा….

बात तो सर आपने बिल्कुल सही लिखी है, जो वाकया आपने शेयर किए है उसके आगे नोवेल की क्या औकात, दुःख होता है बस, और दिनोंदिन ये बढ़ ही रहा है।
जवाब देंहटाएंवैसे हम भी पढ़ा करते थे कॉमिक्स, चाचा चौधरी, पिंकी, साबू, ज्यादा मारधाड़ वाली कॉमिक्स ना पसंद आई और ना पढ़ी,पर अलग ही मजा था, किराए पर 50 पैसे में पढ़ते थे। चार्ज भी दो तरह के थे, वहीं पढ़नी है है तो 50 पैसे और घर ले जानी है तो 1 रुपया पर उसमें सिक्योरिटी या गारंटर रखना जरूरी था, धीरे धीरे हमारा भी प्रमोशन हुआ था और हम भी बने थे गारंटर, वो अलग बात है कि किसी ने गबन नहीं किया, नहीं तो बचपन की सल्तनत लुट जाती।
अतीत के सुनहरे पन्ने आपके लेख से पलट दिए आज
*✍️🎊 *यादें...*Memories are always Young....They never become old*
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