यह मेरी स्टेटमेंट नहीं है, मैं इतनी हिम्मत नहीं रखता कि अपने रिस्क पर इस तरह की बात लिख दूं अपने ब्लॉग में ….और उस से फ़र्क भी क्या पड़ता?....गालियां ज़रूर यहां वहां से पड़ जातीं….लेकिन जब मद्रास उच्च न्यायालय ने ही यह बात परसों कह दी तो 50 बरसों तक मेरे दिल के अंदर दबी बातें भी उछल-कूद करने लगीं…इसीलिए मैं भी महीने के आखिरी रविवार के दिन अपने मन की बात लिखने बैठ गया….
निदा फ़ाज़ली बहुत से बढ़िया दोहे, गज़लें, शे’र …हमें थमा कर गए हैं….ऐसा ही एक आज याद आ रहा है …
सीधा सादा डाकिया जादू करे महान्…
एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान….।
इस से सुंदर और बड़ी बात चंद अल्फ़ाज़ में और कोई कैसे ही लिख लेगा….ठीक इसी तरह के खयाल मैं अखबार के बारे में रखता हूं …यह भी एक पूरा पैकेज लिए रहती है …सारी अखबार बलात्कार, दलित शोषण, छीना-झपटी, मार-धाड़, नकली दवाईयां, नकली दारू, नकली मिठाईयां, धोखा-धड़ी, जाल-साज़ी, छुरेमारी, कत्ल, खुदकुशी, ससुराल-बहु के लफड़े…पेपर लीक होने की दिल को हिला देने वाली खबरों से सनी होती हैं जिन्हें पढ़ कर सुबह सुबह ही दम घुटने लगता है लेकिन बीच बीच में कोई किसी पन्ने पर मई जून के महीने में किसी ताज़ा हवा के झोंके की तरह ऐसी ख़बरें भी दिखती हैं जिस से मानवता पर, व्यवस्था पर और सब से ऊपर अपनी अदालतों पर विश्वास पक्का होता है ….जजों की सोच, उन की निडरता और उन के बेखौफ़ फ़ैसलों की झलत इस में मिलती है….इस वक्त वह जज याद आ रहा है जब सिरसे वाले बाबे को उम्र कैद की सज़ा किसी सीबीआई कोर्ट के एक जज ने सुनवाई ….टीवी पर लाइव कवरेज चल रहा था ….सारा पंजाब हरियाणा कोर्ट के बाहर पंचकूला में पहुंचा हुआ था …2017 की बात है …लेकिन बंदे ने वही फ़ैसला किया जो उसे करना था …ऐसी बहुत सी मिसालें मिल जाएंगी ..लेकिन कुछ दिन, कुछ फैसले हमारे दिलो-दिमाग में सदा के लिए फ्रीज़ हो जाते हैं….दुनिया ऐसे लोगो के भरोसे ही टिकी हुई है …
कुछ पुरानी बातें हम सब के ज़ेहन में दफ़न ज़रूर हो जाती हैं लेकिन सारी उम्र वे तूफ़ान की तरह बीच बीच में उठती रहती हैं ….जैसे कि मेरी यह याद …
आज से लगभग 45-50 बरस पुराने दिन …यही कोई 1979-80 के दिन थे …अमृतसर में रहते थे, दो हज़ार रुपए के करीब पैसा था हमारे पास जो उन दिनों अच्छी खासी रकम थी… (पहले यह मज़ेदार बात थी कि घर में लगभग हर किसी को दूसरे की जेब के बारे में पता होता था …अब तो अपनी ही जेब में क्या है, कईं बार पता ही नहीं होता..) ..मैं, मेरा बड़ा भाई और मां बस में किसी धार्मिक स्थान के लिए चले ..चार पांच घंटे के बाद वहां पहुंच गए ….
लेकिन यह क्या, इतनी भीड़…मई-जून का महीना, इतनी गर्मी, इतनी उमस, याद आ रहा है भाई ने पता किया कि लाईनों में खड़े रहे तो एक-डेढ़ दिन लग जाएगा…दर्शन करने में ….अभी लाईन में खड़े कुछ वक्त ही बीता था तो किसी ने उसे कुछ कहा …वह उस के साथ चला गया….हमें फ़िक्र हुई ..यह गया कहां?...वापिस लौट आया …दस-पंद्रह मिनट में …जो आदमी उसे लाइन में से पिक-अप कर के ले गया था ….वह कौन था, क्या कहूं ..वह दलाल किस्म का था, जिस की अंदर सैटिंग थी …सैटिंग क्या, दरअसल वह उस जगह में कार्यरत था….लेकिन मैं तो दलाल ही लिखूंगा ….कलम इस वक्त मेरे हाथ में है। जो महसूस किया उसे ही न लिखा तो फिर लिख ही क्यों रहा हूं यह डॉयरी !!
मेरी उम्र उन दिनों 16-17 साल की थी…भाई ने उस दलाल से मिलने के बाद हमें आ कर बताया कि वह कह रहा है अभी फ़ौरन दर्शन करवा देगा …तीन सौ रुपए एक आदमी के लगेंगे …इतने ही लेगा ….कह रहा था वह तो सेवा कर रहा है, पैसे तो उसे आगे देने हैं…अभी लिखते हुए बरसों बाद यह बात याद आ गई कि इतना पैसा उन दिनों दर्शनों पर लगा देना ….बहुत बडी़ बात थी …मां ने भाई को कहा कि ऐसा कर ..तू ही दर्शन कर ले ..हम कतार में खड़े रहते हैं, अगर जल्दी नंबर आ गया तो ठीक, वरना ऐसे ही लौट जाएंगे…यहां तक पहुंच तो चुके ही हैं…शायद मैंने भी कहा कि आप दोनों दर्शन कर के आ जाओ…मैं यहीं रहता हूं …कहने का मतलब यही कि किसी न किसी के तीन सौ रुपए बच जाएं…
लेकिन भाई कहां किसी की सुनने वाला था ..नहीं, नहीं, सभी दर्शन करेंगे …तो जी नौ सौ रुपए उस दलाल को थमा दिए गए और वह किन्हीं तंग गलियों, चौबारों, घरों में से निकाल कर हमें अगले चंद मिनटों में ही झटपट दर्शन करवा के बाहर तक छोड़ भी गया …लेकिन यह क्या, दस बीस मिनट ही में हम फारिग भी हो गए …न कोई मेहनत लगी, न पसीना बहा, न ही खडे़ रहने की थकावट ही हुई …ऐसा मुझे तो लग रहा था जैसे कुछ छूट गया ..क्या हो सकता था …इंतज़ार का रोमांच ….इंतज़ार के दौरान लोगों में उमड़ता जोश, जयकारों के उदघोष….कहीं न कहीं बाल मन में यह बात बैठ गई कि हम तो चीटिंग से पास भले ही हो गए हैं, मेहनत तो इन की सफल होगी ….अर्ज़ी तो इन की ही कबूल की जाएगी….
खैर, चलिए, खाने पीने की बात करें ..जो बात अमृतसरियों को सब से ज़रूरी लगती है …हम लोग बढ़िया से होटल में तंदूरी रोटियां, राजमाह और पनीर का लंच करने और लस्सी पीने बैठ गए….आनंद आया।
ऐसे लग रहा था जैसे दर्शन करने का बोझ सा था, वह सिर से उतर गया है …और इमानदारी से यह भी लिख दूं कि उस दिन जो एक व्ही-आई-पी जैसा महसूस किया …वैसा ज़िंदगी में फिर न कभी महसूस किया ..और न ही करने की इच्छा ही है …हां, हो सकता है वह बालमन की नासमझी होगी …ज़रूर होगी….क्योंकि जब हम लोग दर्शन कर के वापिस उन्हीं लाइनों को देख रहे थे तो मुझे तो कुछ अलग सा लग रहा था …क्या लिखूं….कुछ कुछ होता है ….वैसे ही कुछ…यानी के हम तो अभी गए और झट से दर्शन कर के बाहर भी आ गए…और यह लोग अभी भी पसीने से तर-बतर उमस में झुलस रहे हैं………छोटी उम्र की नासमझी वाली बातें…
और बाकी लोगों का रिएक्शन….मां को तो 900 रुपए यूं ही बरबाद होने का मलाल था ..भाई को बिलकुल नहीं था, वह कह रहा था, क्या हुआ, आराम से दर्शन भी तो कर आए…लेकिन वह दलाल के लिए जो बातें बोल रहा था ..वह सुन कर हम तीनों बार बार हंस रहे थे…लिखने वाली नहीं हैं वे पंजाबी बातें ….कुछ बातें सिर्फ़ मज़ा लेने के लिए होती हैं…लिखने विखने से बवाल हो जाता है …
यह तो मैं इतने लंबा लिखने लग गया ..चलिए, वापिस अमृतसर के बस-अड्डे पर पहुंचते हैं …हम लोगों ने खूब मज़े से वापिसी की यात्रा की, खाया पीया…(पीया मतलब लस्सी, कोल्ड-ड्रिंक्स…शिंकजी आदि) …थोड़ी बहुत खरीदारी की, परशाद के पैकेट खरीदे……..और हालत हम लोगों की यह थी कि बस अड्डे से घर के लिए हमें दो साईकिल रिक्शे लेने थे ….दस रुपए मेरी मां के पर्स में बचे थे और दस रुपए मेेरे भाई की की जेब में … हम रिक्शे पर बैठते वक्त भी बहुत हंसे …कि शुक्र है कि रिक्शा का किराया तो बचा ….घर पहुंच गए तो यह बात जितनी बात भी याद आती …हम लोग हंसते हंसते लोटपाट हो जाते ….
लोटपोट हो जाना बात ठीक है …लेकिन मेरे बालमन पर इस घटना ने एक अमिट छाप छोड़ दी …दिल में बहुत से सवाल पैदा हो गए कि क्या ऐसे दर्शन करना ठीक है, उन लोगों का क्या जो घंटों तक लाइन में खड़े रहे ….हम उन से आगे कैसे निकल गए …कभी भी वैसे वाली फील फिर न आई जैसा मैंने ऊपर लिखा है कि दर्शन कर के बाहर लौटते वक्त उन इंतज़ार कर रहे भगतों को देख कर आई थी ….हां, यह ज़रूर है कि इतने साल बीतने के बाद भी जब भी वह बात याद आती है तो खुद पर शर्मिंदगी ज़रूर महसूस होती है ….
खैर, यह तो मैंने अपना अनुभव बांट दिया …हां, शायद इस अनुभव ने अंदर ही अंदर मुझे बहुत बड़ी सीख दे डाली ….मुझे याद नहीं मैंंने फिर कभी इस तरह से व्ही-आई-पी दर्शन या किसी तरह से अतिरिक्त पैसे का भुगतान कर के कहीं पर दर्शन किए हों….और यह अभी तक कायम है …अभी भी मैं ऐसे किसी मौके का फायदा न उठाना चाहूंगा …व्ही-आई-पी दर्शन बिना पैसे के भी मिल रहे हों तो भी मेरा दिल इस के लिए राज़ी न होगा….
पिछले पचास बरसों से लोगों के किस्से सुनते रहा हूं …किस तरह से किस बंदे ने किस जगह पर विशेष दर्शन, व्ही आई पी दर्शन का जुगाड़ कर लिया …साथ में पूरा सरकारी गाड़ीयों को काफिला गया …वहां पर पहले ही से सूचना दे दी गई ….इस तरह की जब कुछ लोगों को शेखी बघारते देखा या किसी बडे़ उद्योगपति की ऐसी जगहों पर स्पैशल दर्शन करते हुए तस्वीरें देखीं तो कुछ भी ऐसा न लगा जिस से प्रभावित हुआ जा सके…सिर्फ़ इन सब की अज्ञानता पर ही तरस आया …यही सोच कर कि अर्ज़ी तो इन की ऐसे कैसे धौंस जमा कर मंज़ूर होगी …नामुमकिन ….ऐसा मुझे लगता है…क्या पता ऊपर वाले का निज़ाम कैसे चल रहा है? …
बहुत सी जगहें हैं जहां पर यह सुविधा उन लोगों के लिए उपलब्ध है जो इन की चाहत रखते हैं और उस के लिए पैसे या रसूख का इस्तेमाल करने के सक्षम हैं……भई, उन सब को ये सब दर्शन, स्पैशल दर्शन, व्ही-आई-पी दर्शन मुबारक…….हम इस तरह से बैक-डोर बिना दर्शन के ही सही हैं।
हमें तो मद्रास हाईकोर्ट के फैसले की बहुत खुशी है …इतने बरसों बाद किसी कोर्ट-कचहरी में यह मुद्दा तो उठा और कोर्ट ने अच्छे से खबर भी ली ….आगे पढि़ए माननीय उच्च न्यायालय में क्या कहा …
“Paid VIP darshan at Hindu Temples is wrong and discriminatory, Madras HC said on Friday while rejecting state’s submission that withdrawing paid VIP darshan would cause loss of revenue. No such practice is followed in churches and mosques, HC further said.
Hearing a PIL, the vacation bench said….Let ministers and MLAs not think that they could walk into a temple any time and that God would be waiting for them. Why do we need VIP darshan at all? Everyone is equal before God.”
इसे भी पढ़ लीजिए….भगवान के सामने सब बराबर हैंं….
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| इसी खबर में यह छोटी सी खबर भी दुबकी पड़ी थी ...टाइम्स आफ इंडिया दिनांक 30 मई 2026 |
हम पढ़ लेते हैं …संतों की वाणी पढ़ते हैं, पीर पैगंबरों की बातें सुनते हैं…भावना के भूखे भगवन….किस तरह से भगवान राम को जब शबरी ने दिल से पुकारा तो उस के जूठे बेर खाने के लिए उस की कुटिया पर पहुंच गए ….गुरु नानक देव जी महाराज ने भी भाई लालो और मलिक भागो की साखी के ज़रिए यही संदेश दिया…भाई लालो एक ईमानदार गरीब बढ़ई था और मलिक भागो एक भ्रष्ट बेईमान रईस इंसान ….वे भाई लालो के यहां ठहरना स्वीकार करते हैं ...
लिखते लिखते तो कागज़ काले करते जाएंगे …बस, बात पल्ले पढ़नी चाहिए …मेरे तो पल्ले पचास साल पहले ही पड़ गई थी ..खुशकिस्मती से …ऊपर लिखे उस एक वाक्ये के ज़रिए….न कभी फिर अभी तक इस तरह के दर्शन की इच्छा ही हुई और न ही शायद होगी ….बस, एक ही बात स्मरण रहे ….भावना के भूखे भगवन….। बाकी, हर किसी की अपनी आस्था है, विश्वास, भरोसा, अकीदा है ….सब की आस बनी रहे …विश्वास पक्का बना रहे लेकिन ओछी हरकतों से, दिखावे से कुछ होने वाला नहीं ….।
इस बात को यहीं पर विराम देते हैं….
| काली घटा छाई .....मुंबई 31 मई 2026 |
आज सुबह छः बजे उठा तो मौसम खुशनुमा था ….चंद मिनटों में बरसात शुरु हो गई ….कुछ मिनट तक बूंदाबांदी हुई …व्हीडियो बना ली ….प्री-मानसून की बौछार थी या कुछ और …नहीं पता, यह बताना मौसम वैज्ञानिकों का काम है, कल अखबार में पढ़ लेंगे….लेकिन इस ने बचपन-जवानी की बरसात की पहली बौछार वाले दिन याद दिला दिए….कपड़े उतार कर पहली बारिश में भीगनी, सूखी मिट्टी पर पड़ी बरसात से निकलती सौंधी सौंधी खुशबू और पेड़-पौधों का पहली बारिश में झूमना ….सब यादें हैं…….अब बहुमंज़िला इमारतों तक कैसे पहुंचे पहली बारिश के बाद मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू ……वैसे भी हम लोगों ने मिट्टी का कहीं नामोनिशां ही कहीं छोड़ा हो तभी तो ऐसी तमन्ना भी करें …..हर तरफ़ कंकरीट के जंगल खड़े हैं, बिछे पड़े हैं……
दुआ करते हैं कि इस बार की मानसून बढ़िया हो ….दुआ में आप भी इस गीत के ज़रिए शामिल हो जाइए ….

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