गुरुवार, 15 जनवरी 2009

आखिर बीड़ी के पैकेट पर किसी खौफ़नाक सी तस्वीर की इंतज़ार हो क्यों रही है ?

मेरी विचार में तो वह आदमी सब से ज़्यादा बदकिस्मत है जो तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन करता है अथवा शराब का आदि हो चुका है । जो लोग इन दोनों का सेवन नहीं करते हैं वे भी मरते हैं ---लेकिन मरने मरने में भी अंतर है। यह तो एक किस्म की आत्महत्या है।

आज शाम को उस समय मूड बहुत खराब हुआ जब एक परिचित से मुलाकात हुई जिस से पता चला कि उस के भाई को जो 58 वर्ष का है फेफड़े का कैंसर हो गया है जो कि आखिरी स्टेज में बताया गया है --- सभी डाक्टरों ने जवाब दे दिया है , कह रहे हैं जितनी सेवा-सुश्रुषा कर सकते हो कर लो। उस का भाई बता रहा था कि तीन महीने पहले तक इसे कुछ भी न था, बस कुछ दिन छाती में दर्द हुआ----डाक्टर के पास गया, सारी जांच हुई तो पता चला कि फेफड़े का कैंसर है। वह यह भी बता रहा था कि उस के भाई को कभी बुखार भी नहीं हुआ था -----बस, यह सिगरेट की आदत ही इसे ले डूबी। मुझे भी सुन कर बहुत बुरा लगा --- आज कल 58 साल की उम्र ही क्या होती है। और इन तीन महीनों में वह हड्डियों का ढांचा बन कर रह गया है।

और मैं रोज़ाना लगभग एक-दो मरीज़ ऐसे देख लेता हूं जिन के मुंह में मुझे तंबाकू के द्वारा किये गये विनाश की गाथा देखने को मिलती है । और अधिकांश तौर पर यह मुंह के कैंसर की पूर्व-अवस्था ही होती है। मैं हर ऐसे मरीज़ के साथ दस मिनट ज़रूर बिताता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि किसी तरह से अगर यह अभी भी तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन छोड़ दे तो बचाव हो सकता है। और मुझे पता है कि इन में से अधिकांश मरीज़ उस दिन के बाद मेरे पास आना ही छोड़ देते हैं- मुझे यह लिखते हुये बहुत अजीब सा लग रहा है। शायद उन को लगता होगा कि डाक्टर कुछ ज़्यादा ही बकवास कर रहा है !!

कुछ दिन पहले भी मेरे पास जो 17-18 साल का एक लड़का आया था , मैंने उस को भी बहुत ही समझाया था कि इस गुटखे को अभी भी त्याग दे, वरना कुछ भी हो सकता है । लेकिन मैंने उसे बार बार यह भी तो कहा था कि अभी भी बात बिगड़ी नहीं है , सब कुछ नियंत्रण में ही है । लेकिन वह लड़का भी मेरे पास वापिस लौट कर नहीं आया। अब ऐसा कोई व्यवस्था तो है नहीं कि जबरदस्ती किसी मरीज़ का मैं गुटखा छुड़वा सकूं ----कभी भी जब ऐसा मरीज़ आज कल दिखता है तो यह तो मैं समझ ही जाता हूं कि यह तो शायद ही लौट कर आयेगा, इसीलिये मैं उसी दिन उस के साथ 10-20मिनट बिताने बहुत ज़रूरी समझता हूं। मैं तो भई अपनी पूरी जी-जान लगा देता हूं कि किसी तरह से आज के बाद यह तंबाकू के सभी रूपों से दूर ही रहे , आगे उस की किस्मत, इस से ज़्यादा और क्या करें क्योंकि तब तक इस तरह का कोई दूसरा रोगी ओपीडी के कपड़े के बाहर खड़ा दस्तक दे रहा होता है !!

इस लड़के की मैंने बात विशेष रूप से इस लिये की क्योंकि इस के मुंह की जो अवस्था मैंने देखी थी ---- कैंसर की पूर्व-अवस्था जिसे मैडीकल भाषा में ओरल-ल्यूकोप्लेकिया भी कहा जाता है ----- यह मैंने इस से पहले शायद ही कभी इस 17-18 साल की उम्र में किसी के मुंह में देखी थी --- अकसर ऐसे केस 35-40 वर्ष या उस के बाद की अवस्था में ही मेरे द्वारा देखे गये थे। यह केस देख कर तो मैं भी भौचक्का रह गया था -- उम्र 18 साल और बीमारी पचास साल वाली !!

वैसे देखा जाये तो डाक्टर लोग भी क्या कर लेंगे ----अच्छी तरह से समझा-बुझा दिया और क्या करें !! लेकिन एक बात तो तय है कि जितना विनाश इस संसार में यह तंबाकू एवं शराब द्वारा किया जा रहा है शायद ही अन्य किसी दूसरे पदार्थ से इतना कोहराम मच रहा हो।

तंबाकू के मुंह के अंदर होने वाले प्रभाव की तो बात कर ली ---मरीज़ ने भी देख लिया, शायद समझ लिया लेकिन उस विनाश का क्या जो शरीर के अंदरूनी भागों में हो रहा है ---उस का तो ज्वालामुखी बस कभी भी फूट सकता है जैसे मेरे उस परिचित के भाई के साथ हुआ। गले का कैंसर, खाने की नली का कैंसर, पेट का कैंसर, आंतड़ी का कैंसर, मूत्राशय का कैंसर, दिल की बीमारी, दिमाग में रक्त-स्राव, नपुंसकता ---------आखिर कोई तकलीफ़ ऐसी भी है जो इस तंबाकू रूपी शैतान छोड़ देता होगा।

और यह भी हम लोग रोज़ देखते ही हैं कि अगर कोई खुशकिस्मत बंदा कैंसर जैसे रोग से बच भी गया तो तंबाकू एवं शराब से होन वाली तरह तरह की अन्य बीमारियों की गिरफ्त में आ जाता है। फेफड़े खराब हो जाते हैं, सांस फूलने लगती है , पेट में अल्सर हो सकता है ------बस , संक्षेप में तो यही कह दें कि ऐसी कौन सी भयानक बीमारी है जो तंबाकू और शराब के सेवन से नहीं होती !! और ऊपर से हम लोगों की कोई इतनी बढ़िया स्क्रीनिंग तो होती नहीं, जब धमाका होती है बस तभी पता चलता है ।

बात सोचने की यह भी है कि अगर तंबाकू इतना ही बड़ा विलेन है तो फिर क्या हम इसे छोड़ने के लिये क्यों बीड़ी,सिगरेट और गुटखे के बंडलों पर इस के विनाश की खौफ़नाक तस्वीरें देखने के बाद ही इसे छोड़ने का मन बनाने की सोच रहे हैं । आज ही सेहत चिट्ठाजगत के एक लेख पर पढ़ रहा था कि उस कानून को लागू करने में अभी अड़चने हैं -----चलिये, उन अड़चनों की बात छोड़े, वे तो रहेंगी ही ---------लेकिन हम स्वयं सोचें कि क्या इन विनाशकारी वस्तुओं को लात मारने के लिये हमें किसी कानून की ज़रूरत है ..................भई, यह हमारी अपनी सेहत का सवाल है, तो फैसला भी हमें ही करना है।

जो मैं इतने सारी बात कर लेता हूं तो अकसर मेरे मरीज़ यह कहते हैं कि यह कैसे हो पायेगा, यह लत आखिर छूटेगी कैसे ----तो मैं उन्हें यही कहता हूं कि होगा, ज़रूर होगा लेकिन इस के लिये बस केवल आप को 8-10 दिन धैर्य रखना होगा----- थोड़ा बहुत बदन-दर्द हो, सिर दर्द हो तो कोई दर्द निवारक टीकिया से काम चला लो, हो सके तो पांच-छः दिन की छुट्टी ले कर घर बैठ जाओ, टीवी देखो---कुछ भी करो, क्योंकि इन दिनों जब आप इस व्यसन को छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं तो आप के पुराने संगी-साथी आप को जितना नहीं मिलेंगे ,उतना ही बेहतर है।

मुझे बहुत दिक्कत होती है जब मैं इस तंबाकू और शराब से होने वाले कोहराम को अपने इर्द-गिर्द रोज़ाना देखता हूं -----हमें उस एटम-बंब की बजाये इस तरह के अंदरूनी बंबों से डरना चाहिये ---- वह एटम-बंब तो मारेगा तो पता भी नहीं चलेगा---एक ही झटके में सब का सफाया हो जायेगा , लेकिन ये छोटे बंब हमें न ही जीने देते हैं और न ही मरने देते हैं---- मेरे ताऊ जी ने लगभग 60-65 साल की उम्र में सिगरेट पीने छोड़े लेकिन इस के बाद भी जो 18-20 साल वो जिये -----सारी सारी रात खांसते ही जिये और उन के अंत समय तक उन के पलंग के नीचे रेत से भरा हुआ एक तसला पड़ा रहता था जिसमें वो बलगम गिराते रहते थे ----- उन की खांसी की आवाज़ सुन कर डर लगता है , रोज़ ऐसे ही लगता था कि कुछ भी हो सकता है !!

आप ने सुना है कि आज कल तो सैकेंड-हैंड स्मोक के साथ साथ थर्ड-हैंड स्मोक की बातें होने लगी हैं -----अर्थात् यह तो हम सब जानते ही हैं कि धूम्रपान करने वाले आदमी के साथ बैठे व्यक्ति को भी तंबाकू के धुएं से कुछ न कुछ प्रसाद तो मिलता ही था ( सैकेंड-हैंड स्मोक) लेकिन अब तो चटाई, पर्दों , चद्दरों, सोफ़ों पर जो तंबाकू का धुआं टिका रह जाता है उस के दुष्परिणामों की चर्चा होने लगी है( जिसे थर्ड-हैंड स्मोक कहा जाने लगा है ) --- तो ऐसे में कैसे भी हो इस तंबाकू आदि से जितना बचा जा सके बच लिया जाये -----नहीं, नहीं , जितना बचा जा सके नहीं ------------------किसी भी कीमत पर बिलकुल ही बचा जाये। इस के अलावा कोई रास्ता नहीं है ।

जीवन में वैसे ही इतना प्रदूषण है ---- जीवन में वैसे ही इतनी अनिश्चिता है तो फिर ऊपर से ये तंबाकू और शराब जैसे शैतान हम क्यों पाल लेते हैं--------------------------------यह हमारी, हमारी परिवार की, हमारे समाज की और इन सब से ऊपर छोटे छोटे मासूम बच्चों की बदकिस्मती नहीं है तो और क्या है !!

बीड़ी केवल पीने की ही तो चीज़ नहीं है , इसे सुन कर भी तो काम चलाया ही जा सकता है ना ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. काश, लोग इसे सिर्फ सुन कर काम चला लेते.. मगर ऐब न हो तो दुनिया, दुनिया कैसे हो?

    बस, जागरुकता की अलख जलाये रखिये. बहुत शुभकामनाऐं.

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  2. मेरी विचार में तो वह आदमी सब से ज़्यादा बदकिस्मत है जो तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन करता है अथवा शराब का आदि हो चुका है । जो लोग इन दोनों का सेवन नहीं करते हैं वे भी मरते हैं ---लेकिन मरने मरने में भी अंतर है। यह तो एक किस्म की आत्महत्या है।
    " बहुत उपयोगी जानकारी ये तो सब जानते हैं की तम्बाकू जानलेवा और घातक है जाने कितने प्रकार के कैंसर हो सकतें हैं फ़िर भी लोग इनका सेवन करतें हैं.....सच कहा की आत्महत्या से कम नही.."
    Regards

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  3. चोपडा साहब नमस्कार, और मुझे पता है कि इन में से अधिकांश मरीज़ उस दिन के बाद मेरे पास आना ही छोड़ देते हैं-
    आप की बात बिलकुल सही है, लोग इन आदतो को छोडना नही चाहते, रोकने पर उन्हे बुरा लगता है, लेकिन हमारे यहां , सरकार ने नय़ा ढंग निकाला है, चित्रो के साथ, इतने खतरनाक चित्र की आदमी देख कर खुद पुछॆ अब मै केसे छोडू, कार तेज चलाने वालो के लिये सडको के किनारे कोई अन्य विग्यापन नही, बस एक ही बात बार बार अगर बेध्यानीमे, ओर सीमा से अधीक चलाओगे तो....फ़िर जुर्माना...यह चित्र बहुत काम करते है,
    तो क्यो ना आप भी ऎसे चित्र लगा लो, DIN A4 मे छाप कर फ़िए देखे, मरीज उन्हे देखे गे, ओर खुद ही आप से पुछेगे केसे बचे इन सब से....
    धन्यवाद, फ़िर से सुंदर लेख के लिये
    ओर इस इस बिहारी बीडी पिलाने के लिये

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  4. मेरी विचार में तो वह आदमी सब से ज़्यादा बदकिस्मत है जो तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन करता है अथवा शराब का आदि हो चुका है ।
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    उस दिन अपने सी.एम.एस. साहब को जर्दे के पाउच का सेवन करते देख बहुत अजीब लगा। स्वास्थ्य के लिये लोग उन्हें आदर्श मानते होंगे!

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  5. हम इस मामले में खुद को बहुत खुशकिस्मत समझते हैं कि सभी प्रकार के नशों से दूर हैं। सैकड़ों बार दोस्तों के द्वारा प्रलोभन देकर, बहला फुसला कर इनके प्रयोग के लिये उकसाया गया लेकिन हमारे इनड्रॉक्ट्रिनेशन्स तथा निश्चय इतना मजबूत था कि बदला नहीं।

    एक चाचा जी बीड़ी पीते हैं, जैसे ही पीना शुरु करते हैं खांसना शुरु हो जाते हैं, मैंने मजाक किया कि बीड़ी से गला साफ होता है इसीलिये पीते ही खांसने लगते हो।

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