26.3.26 - रात 10 बजे
मैं आज सुबह सोच ही रहा था कि मुझे आज अंगीठी से जुड़ी यादें इस वेब-लॉग पर लिखनी हैं...मैं रिक्शा में था, इतने में मुझे एक चाय की दुकान दिख गई ...अंगीठी पर चाय बन रही थी....यह फोटो आज सुबह की ही है ...यह सबूत ही काफ़ी है कि गैस सिलेंडर की किल्लत तो है ही ...बहुत अरसे बाद किसी अंगीठी पर चाय खौलती देखी....इच्छा हुई कि यही उतर जाऊं और अपने मनपसंद चाय पी लूं, फिर आगे चलूं....
| मुंबई -बांद्रा की एक नुक्कड़ की यह तस्वीर ...दिनांक 26 मार्च, 2026 |
अंगीठी पर लिख रहा हूं....मेरी पीढ़ी के लगभग सभी लोगों की यादें इस के साथ जुड़ी हैं....मुझे अच्छा लगता है कि जब लोग मुझे मैसेज करते है्ं कि हमारी यादें भी तु्म्हारे जैसी ही हैं....क्या लिखा आज एक पाठक ने ...."मेरा मानना है. हम अपनी परछाईयों से ही भागते रहे जब कि आप की दौलत उन्हीं फ्लैशबैक में निहित है.." ...ठीक है, हर किसी को लिखना चाहिए...बात के साथ बात जुड़ती है, बात से बात निकलती है तो ही बात आगे बढ़ती है ....खैर, मैं तो हर किसी को प्रेरित करता हूं कि अपनी डॉयरी लिखने से शुरुआत कीजिए...
हां, तो अंगीठी की बात शुरु हुई थी .....
एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस टॉपिक पर मैं जो अनुभव लिख रहा हूं ...वे सभी पंजाब के अमृतसर शहर की एक मध्यमवर्गीय कॉलोनी से जुड़े हुए हैं...न मैं कभी किसी गांव में रहा और न ही मेरा अमृतसर के किसी बड़े पॉश इलाके में कभी आना जाना हुआ...इसलिए ये सारी यादें एक मध्यमवर्गीय इलाके से जुड़ी हुई हैं....
1960 के दशक का मेरा जन्म है --अमृतसर में ही मेरा अवतार हुआ ...वहां की रेलवे कॉलोनी में ही आंखें खोली, और अगले लगभग 25-26 बरस उसी का ही पानी पिया...हां, तो जहां तक बचपन की याद है कि हर घर के बाहर सुबह और शाम के वक्त एक अंगीठी तैयार कर के रखी जाती थी ... किस लिए ? -- अंगीठी भखन लई ....यानि अंगीठी को भखने के लिए रख दिया जाता था ....मेरे पास अब अंगीठी के भखने के लिए कोई हिंदी लफ़्ज नहीं है, हां, समझा सकता हूं कि अंगीठी को जब आग लगा के घर के बाहर दरवाजे के पास रखा जाता था तो शुरुआत में लगभग 10-15 मिनट उस में से धुआं निकलता रहता था ....फिर अचानक धुआं खत्म हो जाता और उसमें से आग की लपटें निकलने लगती....
मुझे याद है जब अंगीठी अच्छे से भख जाती ...उसमें से आग की ऊंची ऊंची लपटें निकलने लगती तो मां की खुशी देखने लायक होती ....सच में उसे ऐसे लगता जैसे की कोई लाटरी लग गई हो ....क्या गजब का वक्त था, छोटी छोटी बातों में भी कितनी बड़ी बड़ी खुशियां छुपी रहती थीं.....वैसे अंगीठी का अच्छे से लट-लट कर के जलना छोटी बात नहीं थी, घर की गृहिणी को ही पता होता अगर अंगीठी की आग कभी मद्द्म रह जाती तो उस पर खाना तैयार करना और दुनिया भर के आग पर किए जाने वाले काम कितने दुश्वार हो जाते .....
27.3.26 प्रातः 4.30 बजे
अच्छा, एक बात और ….अंगीठी जब जला के घर के बाहर रख दी जाती थी, उस में से धुआँ छटने के बाद आग की लपटें निकलने के इंतज़ार में तो बीच बीच में उसे एक दो बार बाहर जा के देखने भी होता था…यह इसलिए कि कईं बार कुछ छोटी मोटी माइनर एडजस्टमैंट करनी पड़ती थी ….लोहे की किसी पतली सीख (डंडी) से कोयलों को थोड़ा हिलाना ढुलाना पड़ता था ..और कईं बार उसे किसी मोटे कार्डबोर्ड से ( जो कि हमेशा ही अपनी किसी नोटबुक या पुरानी किताब की जिल्द होती थी, और उसे भी ढूंढना पड़ता था.. …अफसोस, उस वक्त स्विग्गी या ज़ोमेटो न था, न ही फ्लिपकार्ट, इसलिए अब रोज़ाना इक्ट्ठे होने वाले कार्डबोर्ड के डिब्बे नहीं होते थे ….) थोड़ी हवा खिलानी पड़ती थी ….और देखते ही देखते
आग धधक पड़ती थी …और फ़ौरन अंगीठी को अंदर ले आ कर उस पर बढ़िया, मस्त चाय के लिए पानी चढ़ाया जाता था …सब कुछ इलायची, सौंफ, अदरक-वदरक कूट पर उस में डाल के ….
अच्छा, एक बात और याद आ गई….जब मां घर के गेट के बाहर अपनी अंगीठी उठा कर अंदर लेकर आने के लिए जाती तो आस पास कपूर, सोढ़ी, रामलाल और विद्या की मां और टीटू के घर के आगे पड़ी अंगीठीयों की तरफ़ भी नज़र डाल लेती ….किस की अंगीठी कहां तक पहुंची….हां, कईं बार अगर किसी ने अंगीठी जलाते वक्त उपले या लकड़ीयां थोड़ी गीली इस्तेमाल की होतीं तो फिर अडो़स-पड़ोस वाले बहुत ज़्यादा धुएं से परेशान हो जाते ….लेकिन कोई किसी को कहता कुछ नहीं था, बेहद सब्र था सभी में ….चुपचाप उस धुएं की वजह से हुई अपनी गीली आंखों को हाथों से पोंछ देते थे….बस!
कईं बार अंगीठी को बाहर रखे रखे लंबा अरसा हो जाता …न उसमें से धुआं निकलता, न ही आग की लपटें…सीधा सीधा मतलब होता कि प्रोजेक्ट फेल हो गया है ….जुगाड़ लगाए जाते, कईं बार चल भी जाते…जैसे उस के ऊपर मिट्टी के तेल का छिड़काव किया जाता ताकि उसके प्रजवलन में चु्स्ती आ सके….कईं बार यह काम कर जाता, वरना फिर से दोबारा अंगीठी जलाने की मशक करनी पड़ती….
अधिकतर अंगीठी तैयार करने का काम मां के सुपुर्द ही होता….उसे कोई छुट्टी नहीं, सर दुःख रहा होता तो सिर पर दुपट्टा कस के या दांत दुःख रहा होता तो दांतों पर नसवार लगा कर भी अंगीठी तैयार तो करनी ही होती …कईं बार मैंने पिता जी को भी यह काम करते देखा और मैने भी दो चार बार यह काम किया है ….याद नहीं, ऐसी कौन सी एमरजैंसी आ गई होगी …शायद मां 1-2 दिन के लिए बाहर गई होगी ….
मैंने कल जो फोटो खींची सिगड़ी पर चाय बनती देख कर ….यह उन दिनों एक आम बात थी…हर तरफ़ अंगीठी पर ही चाय बनती थी ….चाय के ठेलों पर, चाय की दुकान पर, हलवाई के यहां, किसी ढाबे पर ….सारा काम बड़ी बड़ी अंगीठीयों पर ही होता था….जिसे हम लोग भट्ठी कहते हैं ….बड़े से मिट्टी के तंदूर टाइप बने होते थे …फिक्स किए होते थे ….जिन में कोयलों से अंगारे निकलते रहते थे …और उन्हीं पर दाल मक्खनी, जलेबियां, समोसे, पूरी-छोले, भटूरे-छोले बना करते थे ….
बचपन की यादों की अलमारी की एक बहुत पुरानी, दीमक की मार से खस्ताहाल हो चुकी एक शेल्फ पर एक कोने में अभी एक ईमानदार सा हलवाई भी रखा पड़ा है ….जो कईं कईं घंटों तक भट्ठी पर खौलते दूध को हिलाता करता और शाम को एक दो ट्रे बर्फी तैयार करता था …देखते ही देखते वो खाली हो जाती थी ….वैसे बर्फी न तो कभी खाई और न ही खाने का कोई स्कोप ही है ….जब भी उधर से गुज़रते पिता जी मुझे छोटे लिफाफे में वह ज़रूर दिलाया करते ….यही कोई एक रूपए के आसपास मिल जाती थी …या इससे भी कम …वाह, क्या महक होती थी …सीधी ज़ुबान पर रखते ही घुल जाती थी …उस हलवाई के पास एक नाई की दुकान थी….जो एक बड़ी सख्त सी मशीन से कटिंग किया करता था, कटिंग क्या, नोचता हो जैसे बालों को ….और फिर उस्तरे को बेल्ट पर घिस कर मेरे सर पर रगड़ दिया करता था…कईं कट लग जाते थे …और जले पर नमक छिड़कने के लिए उन पर फिटकड़ी घिसा देता…बस, मेरा रोना चालू….पिता जी बाहर आते ही मुझे जैेसे ही उस बर्फी की दुकान पर ले कर जाते, मेरा दर्द-वर्द कहां भाग जाता, पता नहीं….50-60 बाद भी जब मुझे इस हलवाई का ख्याल आता है तो मुझे हंंसी आती है …..क्या कमा लेता होगा …इतनी मेहनत मशक्कत के बाद …फिर भी इतना सब्र….इतनी मोहब्बत, खुलूस रखता था सब के लिए….अच्छा, लेते सब इतनी ही थे ….50 ग्राम, 100 ग्राम….एक पाव (250ग्राम) तो किसी मेहमान के घर आने पर ही चाय के वक्त लाई जाती थी…समोसों के साथ….या तो समोसे-जलेबी, वरना …समोसे, बर्फी ….यही मेन्यू था, यही स्कोप और यही दायरा था उस वक्त की मेहमान-नवाज़ी का ….
दिनांक ...28 मार्च 2026
अंगीठी में कोयले कौन से इस्तेमाल होते थे ...
अंगीठी में सामान्यतः हार्ड-कोक ही इस्तेमाल होता था...यह ज़्यादातर कोयले के डिपो से ही लाना होता था...वज़न के हिसाब से बिकता था...बीस-तीस किलो या पूरी एक बोरी लाई जाती थी ..साईकिल रिक्शा पर रख कर ....अगर 10-20 किलो ही होते तो साईकिल के पीछे कैरियर पर ढो लिए जाते।
अंगीठी जलाना भी एक कला है....बहुत इत्मीनान, बहुत फोकस चाहिए....जैसे मैंने ऊपर लिखा कि कुछ बार मैंने भी अंगीठी जलाई..कईं बार जल गई, कईं बार फुस हो कर मुझे मुंह चिढ़ाने लगती।ऐसे ही नहीं कहते ..करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान.....गृहिणियों के पास यह महारत बहुत थी।
अंगीठी को जलाने के लिेए तैयार करने से पहले सब से नीचे सूखे दो चार गोबर के उपलों के दो चार टुकडे़ रखे जाते जिन पर थोड़ा सा मिटटी का तेल छिड़क दिया जाता ...फिर उन के ऊपर बिल्कुल पतली सी लकड़ीयों के दा चार पांच टुकड़े रखे जाते और फिर उन के ऊपर कोयले सजा दिए जाते ...बहुत ज़्यादा ठंड के दिनों में या बरसात के दिनों में अंगीठी जलाना मुश्किल काम होता..लाटरी लगने जैसा ...लगी तो लगी, नहीं तो ठनठन गोपाल.....खैर, इसी चक्कर में बाहर ओस या बरसात होने की वजह से कईं बार अंगीठी जलाने के लिए उसे घर के बाहर या घर के आंगन में रखने की बजाए, बरामदे में ही रखना पड़ता...
जैसा कि मैं ऊपर लिख ही चुका हूं ...मेरी तो भई आंखे ही खुली रेलवे कॉलोनी में ....इसलिए बचपन ही से रेलवे के हर तरह के मुलाजिम को देखते देखते मैं रेलवे के बारे में बहुत कुछ समझ गया....फॉयरमैन, ड्राईवर, खलासी, वर्कशाप के मकेनिक, गार्ड, टीटी, टिकट बाबू, बुकिंग क्लर्क, गैगमैन (एक्टिव गैंगमेन और पैसिव गैंगमैन - जो रसोईये, माली, चपरासी, बाबू के काम में लगे रहना अपना सौभाग्य समझते थे)........मैं क्या, कोई भी इन सब रेल मुलाजिमों को देखते ही पहचान लेता ...बिना वर्दी के भी ....अकसर भाप ईजन के दौर में यह माना जाता था कि फॉयरमैन और ड्राईवर बहुत गुस्से वाले होते हैं....खैर, हर काम की अपनी चुनौतियां हैं....क्या कहें इस बारे में ज़्यादा!
बहुत खूब
जवाब देंहटाएंआप का बहुत बहुत शुक्रिया....आप ने इतनी लंबी पोस्ट पढ़ी...
जवाब देंहटाएंऐसा लगता है जैसे आपने उन दिनों की याद दिला दी जब लोग होते थे , आज तो टेक्नोलॉजी है ।
जवाब देंहटाएंजी हां, आप ने बिल्कुल सही फरमाया,...उस दौर में इत्मीनान था, एक ठहराव था, सुकून था....अब तो कोई किसी से बात कर के राज़ी नहीं ...सब कुछ टेक्नालॉजी से कर लेते हैं...लेकिन ह्यूमन टच, मानवीय अनुभूति एक दम गायब....
हटाएंआप ने अपनी बात लिखी...बहुत बहुत शुक्रिया...