आज मैं बरसों बाद सुबह उठ कर लिखने बैठा हूं...जब मैंने ठीक 20 बरस पहले ब्लॉग लिखना शुरु किया था ...तो मैं अगले आठ-दस बरस तड़के चार पांच बजे यह डॉयरी लिखने बैठ जाता था...ठिठुरने भरी सर्दी होती या फिर सुबह सुबह पसीने छुटाने वाली गर्मी..मैं एक दो घंटे लिख ही लेता था...अब तो बरसों से सुबह उठ कर लिखना तो दूर, उठने की इच्छा ही नहीं होती...बहुत बार सोचता हूं कि ऐसा क्या था, गुज़रे दौर में...फिर ख्याल आया कि तब मां थी, वह सुबह सुबह उठ जाती और अपने लिखने, पढ़ने, सिलने, पूजा-पाठ, योग ...के काम में लग जाती और उन को देखते देखते हम भी जल्दी उठने लगे...खैर, 10 साल होने को हैं मां को उड़ारी मारे हुए...इसलिए उन के बाद हम भी घोर आलसी हो गए...
यह जो मैं पोस्ट लिख रहा हूं इस वक्त....इसे लिखने के लिए मैं पिछले 8-10 दिन से उतावला हूं....लेकिन हर रोज़ आज शाम में लिखूंगा, नहीं ..कल सुबह लिखूंगा...ब्लॉग का मामला ऐसा है कि एक बार अगर कोई ख़याल आ जाता है तो जब तक वो अपने आप को लिखवा नहीं लेता, चैन से बैठने नहीं देता....
पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि जिस तरह से दुनिया पर पागलपन तारी है इस वक्त, कुकिंग गैस की किल्लत की तो बात ही क्या करें, हम लोगों को घासलेट पर ही न लौट आना पड़े कहीं....सामान्य ज्ञान भी कितना असामान्य है ....गूगल से तो पता कर ही लेंगे...मैंने ठीक ठाक साईंस की पढ़ाई की है लेकिन इस वक्त (बिना गूगल से पूछे) मुझे यह भी पता नहीं है कि घासलेट कहां से आता है .....लेकिन इस से जुड़ी यादें हैं बहुत सी ....मेरी उम्र 60 साल से ऊपर है ....इसलिए यही पीढ़ी है अगर जो चाहे जितना चाहे अपनी जाने से पहले बातों को समेट के चली जाए....वरना मेरे से पिछली पीढ़ी जो अब 80-90 के चक्कर में ज़िदगी की सीढ़ी के आखिरी पायदान को पकड़े खड़ी है, उन में से कितने हैं अपनी यादें लिख पाने की इच्छा ही रखते हैं....
जब हमारे मां-बाप हमारे आसपास होते हैं तो हमें लगता है कि इन से जो बातें पूछनी हैं, बाद में पूछ लेंगे ....लेकिन वक्त फुर्र कर के उड़ जाता है और हमारे सवाल अंदर ही दबे रह जाते हैं....यहां तक कि हमें अपने दादा से पिछली पीढ़ी से जुड़े किसी शख्स का नाम या किरदार ही नहीं पता होता ....यह सच है बिल्कुल....
इसलिए मैं सोचता हूं कि अपनी यादों को अपने अनुभवों को संजोते रहना चाहिए....बिना किसी तरह की अपेक्षा किए हुए...यह भी एक धर्म ही है, साधना है, तपस्या ही है ...लिखने के लिए बैठना.....
सुबह सुबह राहत इंदौरी की बात याद आ गई ....
आंख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो....
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो....
इस पो्स्ट का शीर्षक ही बहुत कुछ ब्यां कर देता है ...जब मेरी पीढ़ी के लोग 1960 के दशक की पैदावार ..जब वे अपने दिनों की बातें करेंगे को घासलेट की ही नहीं, सिगड़ी, तंदूर, चूल्हे, हीटर, स्टोव की बातें भी अनायास उमड़ने लगती हैं...वे हमें अच्छी लगें या न लगें, असहज करें या खुश, भूलना चाहें भी अगर ....लेकिन ये बार बार उछल-कूद करती ही रहती हैं....लिखने वालों के पास एक साधन है, लिख कर फ़ारिग हो जाते हैं....मैं भी वही काम करने बैठा हूं ....यह पोस्ट में लिखने से इसलिए भी गुरेज़ करता रहा क्योंकि बातें इतनी सारी हैं....बहुत लिखना पडे़गा...फिर सोचा कि शुरु तो करूं...एक नहीं तो दो तीन पोस्टों में लिख लूंगा....मुझे कौन रोक रहा है?
घासलेट की बात करते वक्त कुछ छूट गया था लगता है .....
घासलेट की मैं कुछ यादें लिखीं...अधिकतर तो सरकारी डिपो से मिलने वाले मिट्टी के तेल की ही थीं....जो अकसर पांच लिटर की पीपी में किसी महीने मिला तो मिला, नहीं तो डिपो के चक्कर काट काट के शांत बैठ जाते थे ....और उसी डिपो वाले की किसी दुकान से उसे बाज़ार के रेट पर खरीदना पड़ता था ....जहां तक मुझे याद पड़ता है ....राशनिंग के उस दौर में सामान्य घर में यही कोई पांच लिटर घासलेट लग ही जाता था ....
मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के अलावा, इसे लालटेन और दीयों में भी इस्तेमाल किया जाता था ....क्योंकि बत्ती बार बार गुल हो जाना आम सी बात थी ....बहुत ही आम....लालटेन के अलावा हर घर में तीन चार दीये भी होते थे ....अधिकांश किसी दारु की बोतल के ढक्कन में छेद कर के कपड़े की बत्ती डाल कर बनाए हुए....उन दिनों भी कहीं भी पौवों की कमी कभी महसूस नहीं होती थी ...अधिकतर इस काम के लिए पव्वे की कांच की बोतल ही काम में ली जाती थी ...अधिये की खाली बोतल से तैयार दीए भी दिख तो जाते थे, बहुत कम.....क्योंकि इतना मिट्टी का तेल होता ही क्हां था....
शादी-ब्याह में जब बैंड वाले चलते थे ...बड़ी बड़ी लाइटों के साथ तो उन में भी मिट्टी के तेल का इस्तेमाल होता था और ट्रेनों के परिचालन में भी स्टेशनों पर सिगनेल के लिए जो लाईटें जलाई जाती थीं उन में भी यही मिट्टी का तेल इस्तेमाल होता था। और इतिहास गवाह है कि मिट्टी के तेल ने अनगिनत बहु-बेटियों की जान भी ली है...यह भी उस दौर का काला सच है ....स्टोव जब भी फटा, उसने बहु-बेटी को ही अकसर चपेट में लिया ....बड़ा पक्षपात करता था स्टोव भी ........और सुनवाई? - कौन सुनाएगा, किसी की सुनवाई....जो हालात आज हैं इसी से अंदाज़ा लगा लीजिए कि आज से 50-60 बरस पहले हालात कितने भयावह होंगे ...
बत्ती गुल होने पर मिट्टी के दीए की मदद से खाना पकाया जाता, पढ़ाई लिखाई का काम निपटाया जाता (दिन की रोशनी में या बत्ती के रहते समय बरबाद करना और दीए की रोशनी में बैठ कर हिसाब की किताब पकड़ लेना, यह दिखावा, टाईम-पास भी अकसर देखने को मिल जाता ...अकसर)....हां, पेपरों के दिनों में रात में बत्ती गुल होना एक गंभीर मुद्दा हो जाता ....दीए वीए में क्या कोई पढ़ता, क्या याद रहता ...सारा साल पढ़े नहीं ...और सारी मशक्कत एक रात पहले ही करने से जैसे ...। यह लिखते लिखते मुझे मेरा एक कज़िन याद आ गया....वह अकसर किताब ही पेपर होने के एक -दो दिन पहले लाता था....और फिर मैंने देखा कि यह किताब वह पेपर में चीटिंग करने के लिए पर्चियां बनाने के लिए इस्तेमाल करता था....पूरा पूरा रात लगा रहता था....दीए की रोशनी में भी उसे मेहनत करते देखा है ....उसे बचपन ही से यह आदत लगी हुई थी...हमारे ज़माने में स्ट्रैचलॉन की निक्करें भी हम लोग स्कूल में कभी कभी पहन जाया करते थे ...वह अपनी जांघों पर भी कुछ कुछ लिख कर ले जाया करता था .. इम्तिहान में कुछ मदद हो जाए, इसलिए....और वह अपनी पर्चीयों को इस्तेमाल भी कर के आता था ....सातवीं आठवीं कक्षा में मैं भी उस की देखा देखी एक दो पर्ची लेकर तो गया लेकिन डर इतना लगा कि खोल न पाया...जब जेब में उन के रखने से अपना याद किया हुआ माल ही कागज़ पर उंडेलने में दिक्कत होने लगी तो जा कर वॉश-रूम में फैंक आया....
यह क्या विषय़ किधर का किधर निकल गया ..दीए की रोशनी में ....
घासलेट को घर में दूसरे कामों के लिए भी लिया जाता था ....कोई ताला नहीं खुल रहा, कहीं जंग लग गया हो....अभी तो यही कुछ याद आ रहा है ....
बातें लिखते लिखते कहां से याद आ जाती हैं, खुद पता नहीं लगता....जैसे मुझे अभी याद आया कि सरकारी डिपो वाला मिट्टी का तेल खत्म होने पर बाज़ार से तीन-चार रूपए की एक बोतल घासलेट की मिलती थी ...इस के लिए कांच की खाली दारू की बोतल अपनी लेकर जानी होती थी .....दारू की बोतल से बड़ी बोतल कोई उन दिनों देखने को न मिलती थी ...कहने को एक लीटर आता था उस बोतल में लेेकिन होती यह शायद 750 मि.लीटर की ही थी....।आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि पहले प्लास्टिक की बोतलें ही न थींं.....और हां, मिट्टी के तेल की बोतलें अपने आस पास से, अड़ोस-पड़ोस से उधार भी ले लिया जाता था ...
फिर एक वक्त आ गया कि घासलेट हार्ड-वेयर की दुकानों में ही बिकने लगा ....मैंने शायद 10-15 साल पहले एक बार घासलेट की एक बोतल 50 रुपए की खरीदी थी ....यही जंग वंग उतारने के लिए ....तालों के, उपकरणों के जंग का तो इलाज है लेकिन जब बैठे बैठे हम लोगों को जंग लग जाता है, काश! उस को भी उतारने का कुछ तो जुगाड़ हो ....
सिगड़ी कहें या अंगीठी.....एक ही बात है ...
हम लोगों ने बचपन में सिगड़ी या अँगीठी पर ही सभी काम होते देखे...कभी कभी जब अंगीठी न जल रही होती और कोई छोटा मोटा चाय बनाने जैसा या दाल-सब्जी गर्म करने जैसा काम करना या दर्द के लिए अचानक पानी गर्म की ज़रूरत पड़ती तो स्टोव कर ही कर लिया जाता .....
लेकिन सिगड़ी की बातें, अंगीठी के किस्से ...ये इतने ज़्यादा हैं कि अब इस वक्त यह सब नहीं लिख पाऊंगा....इस की पूरी प्रक्रिया, इसे जलाने की मशक्कत, कोयला कहां से आता था, कितने तरह का होता था, कहां से मिलता था.....अंगीठी चलाना भी एक आर्ट था, मैंने कब अंगीठी जलाई.....और हां, नानी के उन के बचपन की यादें कि उन दिनों आग जलाने के लिए माचिस भी नहीं हुआ करती थी ..तो फिर आग कैसे जलती थी, जी हां, पड़ोसी के चूल्हे ही से आग लाई जाती थी...जलते हुए उपले से ....(यह सब हमने मां से सुना है ..इसलिेेए प्रामाणिक है)...गुलज़ार साहब ने भी यह सब देखा लगता है जो उसने अपने गीतों में शरारत से पिरो दिया ...वैसे गुलज़ार साहब और मेरी नानी का शहर एक ही था ....ब्रिटिश भारत का ज़िला गुजरात (अब जो पाकिस्तान में है)....अभी ध्यान आया कि वह तो अंगीठी जलाने के लिए नहीं बीड़ी जलाने के लिए पड़ोसी के चूल्हे से आग लेने की बात कर रहे हैं....
खैर, अगली पोस्ट में अंगीठी की बातें ...पूरी पोस्ट इसी पर ....जो कुछ याद है, अपनी डॉयरी में लिख लेना ज़रूरी लगता है .....
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